खेल खिलाड़ी का compleet

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raj..
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Re: खेल खिलाड़ी का

Unread post by raj.. » 10 Nov 2014 16:47

खेल खिलाड़ी का पार्ट--25

गतान्क से आगे...................

रात के 10 बजे भी लोक विकास पार्टी के दफ़्तर के बाहर बहुत भीड़ थी क्यूकी अभी उमीड़वारो की लिस्ट जारी होने वाली थी.सभी लोग खड़े अटकले लगा रहे थे कि किसे टिकेट मिलेगा & किसे नही.बाहर जर्नलिस्ट्स की भी अच्छी ख़ासी तादाद मौजूद थी.तभी अंदर से 1 पार्टी वर्कर काग़ज़ो का पुलिंदा लिए बाहर आया & नोटीस बोर्ड खोल उसमे काग़ज़ चिपकाने लगा.धक्का-मुक्की करते लोग आगे बढ़ उसकी लगाई लिस्ट पढ़ने की कोशिश करने लगे.

वर्कर ने ऑफीस के बाहर 2 जगह लिस्ट चिपका दी & चला गया.लिस्ट लगते ही किसी के चेहरे पे खुशी थी तो किसी के चेहरे पे उदासी.जर्नलिस्ट्स जल्दी-2 लिस्ट पढ़ के देख रहे थे कि कौन सा बड़ा नाम चूक गया & कौन सा नया नाम इस बार मौका पा रहा है.

थोड़ी देर बाद सभी के होतो पे 1 ही बात थी कि आख़िर डेवाले सेंट्रल से जसजीत प्रधान के खिलाफ पार्टी हाइ कमॅंड ने राम्या सेन को क्यू टिकेट दिया.सभी यही सोच रहे थे कि पार्टी ने ये मान लिया है कि वो सीट तो वो जीत नही सकती.केवल बलदेव काबरा ये बात जानता था कि उसी सीट से वो जनहित का तख्ता पलटने की शुरुआत करेगा.

उधर अपने पार्टी के दफ़्तर मे बैठे प्रधान ने जैसे ही ये खबर सुनी उसके होंठो पे मुस्कान फैल गयी.उसे भाय्या जी से ऐसी ही कुच्छ उमीद थी.चाहे जो भी हो जीत तो उसकी पक्की थी लेकिन साथ ही उसे बहुमत भी तो चाहिए था.इसके लिए उसने कोई कसर नही छ्चोड़ी थी.राज्य के छ्होटे से छ्होटे इलाक़े का भी वो खुद दौरा कर रहा था वाहा के उमीड़वार के साथ.लोगो की भीड़ उमड़ रही थी उसे देखने के लिए,उसे सुनने के लिए.

ये सब बहुत अच्छा था मगर दिल के किसी कोने मे जसजीत को ये डर भी था कि ये भीड़ वोट्स मे तब्दील होगी या नही.होगी क्यू नही!वो खड़ा हुआ & खिड़की से बाहर देखा.पार्टी वर्कर्स मे जो जोश था वो उसने पहले कभी नही देखा था & जो भीड़ उनकी रॅलीस मे आ रही थी वो भी बहुत ज़्यादा थी.उनमे से सभी ने नही अगर दो तिहाई ने भी उन्हे वोट दे दिया तो उनकी जीत पक्की थी.

अपनी मेज़ से उठा वो आने वाले दिनो का अपना प्रोग्राम देखने लगा कि उसका मोबाइल बजा.उसने नंबर देखा & हल्के से मुस्कुराया,"कितनी बार कहा है काम के बीच परेशान मत किया करो....हूँ..ठीक है..हां..मैं जब फ़ुर्सत होगी आ जाउन्गा..बाइ!",उसने फोन बंद किया & पाजामे के उपर से ही अपने लंड को दबाया & फिर से अपना प्रोग्राम देखने लगा.

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दिव्या ने गर्दन घुमा के अपने बाई तरफ देखा,अजीत गहरी नींद मे सो रहा था.चुदाई का तूफान अब थम चुका था & दोनो बेताब दिलो को अब सुकून था.दिव्या के दिमाग़ मे काई सवाल घूमड़ रहे थे..आख़िर अजीत क्यू आया था उसके पास?क्या वो अपनी बीवी से खुश नही?क्या वो दिव्या को अब तक भूला नही था?

उसने करवट बदली & अपनी पीठ सोते हुए अजीत की तरफ कर दी.वो अजीत से उसकी ज़ाति ज़िंदगी,उसकी शादी के बारे मे कोई सवाल नही करेगी..उसे चुदाई बहुत पसंद थी & अजीत से चुदना तो उसे बहुत पसंद था लेकिन अगर आज के बाद अजीत दोबारा उसके पास नही आया तो वो उसे बुलाने नही जाएगी.आज रात जो हुआ वो इसलिए क्यूकी दोनो के जिस्म 1 दूसरे के लिए तड़प रहे थे.अगर ये तड़प आगे भी यू ही बरकरार रही तो दोनो मिलते रहेंगे वरना अगर अजीत अपनी बीवी से बेवफ़ाई नही करना चाहेगा तो वो भी इस रिश्ते को वही ख़त्म कर देगी.

ऐसा नही था कि उसने अजीत को कभी प्यार नही किया था.अगर अजीत ने शादी ना की होती तो दोनो आज भी साथ होते & वो उसके सिवा किसी और मर्द से रिश्ता नही रखती लेकिन अजीत ने उसे बंधन मे बाँधने की कोशिश की थी जो उसे बिल्कुल गवारा नही था.अब हालत भी बदल चुके थे,अजीत शादीशुदा था & उसकी ज़िंदगी मे भी अजीत के अलावा डीसीपी वेर्मा थे &..

तभी उसकी नज़र साइड-टेबल पे रखी प्रोफेसर दीक्षित की किताब पे पड़ी & उसके होंठो पे मुस्कान फैल गयी..& हो सकता है प्रोफेसर के साथ भी कोई सिलसिला चल निकले.तभी अजीत की बाँह ने उसकी कमर को घेर लिया & उसके पेट पे उसका हाथ चलने लगा.दिव्या मुस्कुराती हुई पीछे हो उस से सत गयी & अपना सर पीछे कर अजीत को चूमने लगी.

"गुड मॉर्निंग,दिव्या जी.",प्रोफेसर दीक्षित दिव्या के सामने की कुर्सी पे आ बैठा.

"गुड मॉर्निंग,प्रोफेसर."

"आपने मेरी दी किताब पढ़ी?"

"ना-नही..वो कल ज़रा ज़्यादा थक गयी थी तो जल्दी सो गयी थी.आज मौका मिलेगा तो पढ़ूंगी.",अजीत के साथ बिताई रंगीन रात की यादो ने अंजाने मे ही दिव्या के गालो का रंग और सुर्ख कर दिया.

"कोई बात नही.आज ज़्यादा मेहनत मत करिएगा.",प्रोफेसर मुस्कुराया & उसकी मुस्कान से दिव्या को ऐसा लगा मानो वो समझ गया हो कि दिव्या की थकान का राज़ क्या था.

"प्रोफेसर,ये सेठ मोहन लाल वाले केस की फाइल है.अब तक की सभी जानकारी इसमे जोड़ दी गयी है.मैं चाहती हू कि आप 1 बार फिर से इसे पढ़ें.हो सकता है कोई और सुराग मिल जाए."

"ओके.वैसे मेरे मन मे 1 बात आई थी."

"क्या?"

"हमे ये तो पता चल गया है कि वो जो आर्म्स डीलर है वो इन लुटेरो से किसी तरह से जुड़ा था तो हम क्यू ना उसका स्केच भी इन लुटेरो के साथ मुल्क के बाकी राज्यो की पोलीस को भेज दें."

"नही,प्रोफेसर.",दिव्या के जवाब से प्रोफेसर के माथे पे शिकन पड़ गयी,"मैं चाहती हू की उस आर्म्स डीलर का ध्यान पूरा का पूरा अजीत & मुर्शिद की ओर रहे.उसे इस बात की भनक भी ना हो कि हमे ये पता चल गया है की वो लुटेरो को भी जानता था.इस तरह वो अजीत से बचता रहेगा & हमारी तरफ उसका ध्यान भी नही जाएगा & हो सकता है हम उसे पकड़ लें."

"हूँ.",प्रोफेसर मुस्कुराया,"..जितनी आप हसीन हैं उतनी ही तेज़ दिमाग़ भी.",उसने फाइल खोली & पढ़ने लगा.थोड़ी देर बाद दोनो जीप मे बैठे सेठ मोहन लाल की दुकान की ओर जा रहे थे.

"लुटेरे तो सेठ के काले 35 लाख पे ऐश कर रहे होंगे & हमे पता भी नही चल रहा है लेकिन 1 बात मेरे दिमाग़ मे खटक रही है."

"क्या प्रोफेसर?"

"कि लुटेरो को सेठ की तिजोरी के बारे मे पता कैसे चला इत्तेफ़ाक़ से या फिर उन्हे किसी ने उसके बारे मे बताया या फिर उन चारो मे से कोई 1 सेठ के यहा काम कर चुका था & उसे उस छिपि तिजोरी का पता चल गया."

"हूँ..",दिव्या सोच मे पड़ गयी,"..देखिए,सेठ के स्टाफ का 1-1 मेंबर अभी भी दुकान पे काम कर रहा है & इलाक़े के थानेदार की छनबीन से भी किसी पे शक़ की कोई वजह नही मिली है.हां,आपकी बात की कोई पहले काम कर चुका आदमी लुटेरो से मिला हो वो मुमकिन लगती है."

"1 काम करते हैं दिव्या जी."

"क्या?"

"आप सेठ से मिलने अंदर जाइएएगा & मैं बाहर ही कुच्छ पता लगाने की कोशिश करता हू."

"ओके."

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"सेठ जी,ज़रा इन स्केचस को देखिए.",दिव्या ने उसे दोनो लुटेरो की तस्वीरे थमायी,"गौर से देखिए साथ याद कीजिए की आपने इन्हे कभी भी देखा है."

"लुटेरो ने तो नकाब पहनो तो,मेडम."

"हां,वो तो है लेकिन सेठ जी बिना प्लॅनिंग के कोई लूट नही होती.अब देखिए,लुटेरो को ये पता था की आप बुधवार को कितने बजे दुकान आते हैं.तो मुमकिन है कि दुकान के आस-पास या फिर अंदर आपने उन्हे कभी देखा हो."

"हूँ.",सेठ स्केचस को देखने लगा,"देखो,इसकी आँखे देख के म्हारे को लगता है कि यो यो लुटेरो के संग रहो मगर ये दूसरो के बारे मे पक्का नही कह सको हू.",सेठ ने उसी लुटेरे को पहचाना था जिसे गुलाबो विकी नाम से जानती थी.दिव्या ने कुच्छ सोचा & हथ्यारो के कारोबारी का स्केच भी सेठ को दिखाया मगर सेठ ने उसे कभी नही देखा था.

"सेठ,शोभा कहा है?",प्रोफेसर धड़ाधड़ाता कमरे मे दाखिल हुआ.

"वो तो 4 दिन की छुट्टी लेके गयो हो.",सेठ ने सवालिया निगाहो से प्रोफेसर को देखा.

"सेठ,उसे तनख़्वाह के अलावा और क्या-2 देते थे?"

"यो कैइसो सवाल करो हो,भाया.",सेठ दिव्या से मुखातिब हुआ,"मेडम,आपको साथी क्या म्हारो ही लुटेरो समझ रहो है?"

"सेठ,मेरी तरफ देखो.",प्रोफेसर ने सेठ की बाहे पकड़ उसे अपनी ओर देखने पे मजबूर किया,"शोभा के साथ तुम्हारी रासलीला यही होती थी ना?",सेठ कुच्छ नही बोला & बगले झाँकने लगा.

"मैं बाहर गार्ड से बात कर रहा था..",प्रोफेसर ने सेठ की बाहे छ्चोड़ी & दिव्या से मुखातिब हुआ,"..ईमानदार & शरीफ आदमी है.पिच्छले 5 सालो से यहा काम कर रहा है.उसने बोला की कोई 7 महीने पहले शोभा ने यहा नौकरी की थी.वैसे तो सेठ हमेशा इसी कोशिश मे रहता है की उसकी कोई ना कोई सेलेज़्गर्ल उसके काउंटर के पीछे खड़ी होने के अलावा काउंटर के मालिक के नीचे भी लेट जाए लेकिन कभी भी किसी लड़की के साथ कोई लंबा चक्कर नही चला लेकिन शोभा के साथ पिच्छले 5 महीनो से सेठ का सिलसिला चल रहा है.हर बुधवार को बही देखने के बाद सेठ उसके जिस्म को देखता था.है ना सेठ?"

सेठ माथे का पसीना पोंच्छ रहा था,"क्या सेठ जी आपको हमे ये बताना था ना.",दिव्या बोली,अब उस रोज़ भी तो बुधवार था तो शोभा भी लूट के वक़्त मौजूद थी क्या?",सेठ ने बस हां मे सर हिलाया.

"तू कैसा धंधा करता है रे?मैने तो सुना था कि तुम लोग उस कहावत मे विश्वास रखते हो की चमड़ी चली जाए मगर दमडी ना जाए.",प्रोफेसर ने सेठ की पीठ पे धौल जमाया,"चल बता क्यू नही बताया था हमे शोभा के बारे मे?"

"अरे भाया,सेठानी तो म्हरी जान ले लेती.",दिव्या को हँसी आ गयी जिसे उसने बड़ी मुश्किल से दबाया,"..फिर कितनी बदनामी होती म्हरी."

"हूँ..लूट के दौरान शोभा क्या कर रही थी?"

"कुच्छ ना.1 लुटेरे ने उसके माथे पे भी बंदूक लगा के उसे कोने मे खड़ा कर दिया."

"अच्छा सेठ जी,ठीक से याद करिए शोभा का क्या रिक्षन था,घबराई थी,बंदूक देख के चिल्लाई-विल्लाई तो नही थी?"

"अरे ना.माने तो लागो है कि बहुत डर गयी थी तो मुँह से आवाज़ भी ना निकल पा रही थी."

"अच्छा,उसे लुटेरे ने कहा पे पकड़ के रखा था?",सेठ ने अपनी गद्दी के सामने के कोने की ओर इशारा किया.

"अब वो छुट्टी पे कब गयी है & वजह क्या बताई है?"

"3 दिन पहले.कहो थी कि मया की तबीयत अचनाक खराब हो गयो हो."

"ज़रा उसे फोन तो लगाइए,सेठ जी.",सेठ काफ़ी देर तक कोशिश करता रहा मगर फोन नही लगा.

"सेठ,तूने उस लड़की से जितना लिया वो उस से कही ज़्यादा वसूल के निकल गयी.उसे किसी तरह इस तिजोरी का पता चल गया & उसके साथियो ने सेठ को लूट लिया लेकिन 1 बात समझ मे नही आई कि उसने फिर उपरी मंज़िल पे हाथ साफ क्यो नही किया?"

"वो इसलिए प्रोफेसर क्यूकी वाहा का सारा माल जायज़ है & सबका रेकॉर्ड सेठ जी के पास है.उसपे हाथ डालते तो हमे सबसे पहले स्टाफ पे शक़ होता & दूसरा उसे ठिकाने लगाना भी आसान नही होता."

"अच्छा सेठ तुम्हारी धोखेबाज़ महबूबा की कोई तस्वीर है तुम्हारे पास?",सेठ थूक गटाकने लगा & पास रखे जग से निकाल के पानी पीने लगा.

"क्या हुआ सेठ जी है कि नही?"

"है..मगर.."

"अगर-मगर छ्चोड़ सेठ नही तो माल को भूल जा!",सेठ ने जेब से अपना मोबाइल निकाला & आगे बढ़ा दिया.

"इसमे है फोटो?"

"ना."

"तो?"

"इसमे फिलम है?"

"फिलम?..ओह्ह फिल्म?",सेठ ने हाँ मे सर हिलाया.प्रोफेसर ने ठहाका लगाया & मोबाइल खोलने लगा.

"हूँ..",दिव्या प्रोफेसर की बगल मे बैठ के मोबाइल को देखने लगी,"..ये उसे बिना बताए बनाया था सेठ जी?",पसीना पोंचछते सेठ ने फिर से हाँ मे सर हिलाया.मोबाइल मे 1 म्‍मस था जिसमे सेठ शोभा को चोद रहा था.दिव्या भी बड़े गौर से म्‍मस को देख रही थी.उसका मक़सद शोभा के चेहरे को ठीक से देखने का था मगर थोड़ी देर बाद उसे एहसास हुआ कि वो 1 मर्द के साथ बैठ किसी और की चुदाई का वीडियो देख रही है तो उसे थोड़ी उलझन हुई.शोभा 1 मस्त लड़की थी & सेठ से चुद्ते हुए बड़ी गर्म हरकते & तेज़ आहे भर रही थी.सेठ क्यू उसक दीवाना होवा गया था ये अब दिव्या की समझ मे आया था.

"सेठ जी,मैने ये म्‍मस अपने मोबाइल पे ले लिया है मगर आप इसे डेलीट नही करेंगे & घबराईए मत आपका राज़ हमारे पास महफूज़ है."

"मेडम,म्हरी इज़्ज़त को सवाल हो.बाल-बच्चेदार आदमी हू."

"सेठ जी,ये तो आपको उस लड़की के चक्कर मे फँसने से पहले सोचना चाहिए था.शुक्र कीजिए उसने लूट की अगर ब्लॅकमेल करती तो इस से कही ज़्यादा वसूलती आपसे.अच्छा अब हम चलते हैं & प्लीज़ सेठ जी,अब हमसे कोई बात च्छुपाए मत.जितना वक़्त हम आपकी कारस्तानियो की तफ़तीश मे लगा रहे हैं अगर उतना लुटेरो के बारे मे आपकी दी जानकारी से उनकी तफ़तीश मे लगते तो हो सकता है अभी तक आपके पैसे मिल गये होते.",दिव्या प्रोफेसर के साथ बाहर निकल गयी & सेठ वाहा बैठा पसीना पोंचछता रहा.

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क्रमशः...........

raj..
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Re: खेल खिलाड़ी का

Unread post by raj.. » 10 Nov 2014 16:48

KHEL KHILADI KA paart--25

raat ke 10 baje bhi Lok Vikas Party ke daftar ke bahar bahut bhid thi kyuki abhi umeedvaro ki list jari hone wale thi.sabhi log khade atkale laga rahe the ki kise ticket milega & kise nahi.bahar journalists ki bhi achhi khasi tadad maujood thi.tabhi andar se 1 party worker kagazo ka pulinda liye bahar aya & notice board khol usme kagaz chipkane laga.dhakka-mukki karte log aage badh uski lagayi list padhne ki koshish karne lage.

worker ne office ke bahar 2 jagah list chipka di & chala gaya.list lagte hi kisi ke chehre pe khushi thi to kisi ke chehre pe udasi.journalists jaldi-2 list padh ke dekh rahe the ki kaun sa bada naam chuk gaya & kaun sa naya naam is baar mauka pa raha hai.

thodi der baad sabhi ke hotho pe 1 hi baat thi ki aakhir Devalay Central se Jasjit Pradhan ke khilaf party high command ne Ramya Sen ko kyu ticket diya.sabhi yehi soch rahe the ki party ne ye maan liya hai ki vo seat to vo jeet nahi sakti.keval Baldev kabra ye baat janta tha ki usi seat se vo Janhit ka takhta palatne ki shuruat karega.

udhar apne party ke daftar me baithe pradhan ne jaise hi ye khabar suni uske hotho pe muskan fail gayi.use Bhaiyya Ji se aisi hi kuchh umeed thi.chahe jo bhi ho jeet to uski pakki thi lekin sath hi use bahumat bhi to chahiye tha.iske liye usne koi kasar nahi chhodi thi.rajya ke chhote se chhote ilake ka bhi vo khud daura kar raha tha vaha ke umeedvaar ke sath.logo ki bheed umad rahi thi use dekhne ke liye,use sunane ke liye.

ye sab bahut achha tha magar dil ke kisi kone me jasjit ko ye darr bhi tha ki ye bheed votes me tabdil hogi ya nahi.hogi kyu nahi!vo khada hua & khidki se bahar dekha.party workers me jo josh tha vo usne pehle kabhi nahi dekha tha & jo bhid unki rallies me aa rahi thi vo bhi bahut zyada thi.unme se sabhi ne nahi agar do tihai ne bhi unhe vote de diya to unki jeet pakki thi.

apni mez se utha vo aane vale dino ka apna program dekhne laga ki uska mobile baja.usne number dekha & halke se muskuraya,"kitni baar kaha hai kaam ke beech pareshan mat kiya karo....hun..thik hai..haan..main jab fursat hogi aa jaunga..bye!",usne fone band kiya & pajame ke upar se hi apne lund ko dabaya & fir se apna program dekhne laga.

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divya ne gardan ghuma ke apne bayi taraf dekha,ajit gehri nind me so raha tha.chudai ka toofan ab tham chuka tha & dono betab dilo ko ab sukun tha.divya ke dimagh me kayi sawal ghumad rahe the..aakhir ajit kyu aaya tha uske paas?kya vo apni biwi se khush nahi?kya vo divya ko ab tak bhula nahi tha?

usne karwat badli & apni pith sote hue ajit ki taraf kar di.vo ajit se uski zati zindagi,uski shadi ke bare me koi sawal nahi karegi..use chudai bahut pasand thi & ajit se chudna to use bahut pasand tha lekin agar aaj ke baad ajit dobara uske paas nahi aya to vo use bulane nahi jayegi.aaj raat jo hua vo isliye kyuki dono ke jism 1 dusre ke liye tadap rahe the.agar ye tadap aage bhi yu hi barkarar rahi to dono milte rahenge varna agar ajit apni biwi se bewafai nahi karna chahega to vo bhi is rishte ko vahi khatm kar degi.

aisa nahi tha ki usne ajit ko kabhi pyar nahi kiya tha.agar ajit ne shadi na ki hoti to dono aaj bhi sath hote & vo uske siwa kisi aur mard se rishta nahi rakhti lekin ajit ne use bandhan me baandhane ki koshish ki thi jo use bilkul gawara nahi tha.ab haalat bhi badal chuke the,ajit shadishuda tha & uski zindagi me bhi ajit ke alawa DCP Verma the &..

tabhi uski nazar side-table pe rakhi professor dixit ki kitab pe padi & uske hotho pe muskan fail gayi..& ho sakta hai professor ke sath bhi koi silsila chal nikle.tabhi ajit ki banh ne uski kamar ko gher liya & uske pet pe uska hath chalne laga.divya muskurati hui peechhe ho us se sat gayi & apna sar peechhe kar ajit ko chumne lagi.

"Good morning,Divya ji.",Professor Dixit Divya ke samne ki kursi pe aa baitha.

"good morning,professor."

"aapne meri di kitab padhi?"

"na-nahi..vo kal zara zyada thak gayi thi to jaldi so gayi thi.aaj mauka milega to padhungi.",Ajit ke sath bitayi rangin raat ki yaado ne anjane me hi divya ke galo ka rang aur surkh kar diya.

"koi baat nahi.aaj zyada mehnat mat kariyega.",professor muskuraya & uski muskan se divya ko aisa laga mano vo samajh gaya ho ki divya ki thakan ka raaz kya tha.

"professor,ye Seth Mohan Lal vale case ki file hai.ab tak ki sabhi jankari isme jod di gayi hai.main chahti hu ki aap 1 baar fir se ise padhen.ho sakta hai koi aur surag mil jaye."

"ok.vaise mere man me 1 baat aayi thi."

"kya?"

"hume ye to pata chal gaya hai ki vo jo arms dealer hai vo in lutero se kisi tarah se juda tha to hum kyu na uska sketch bhi in lutero ke sath mulk ke baki rajyo ki police ko bhej den."

"nahi,professor.",divya ke jawab se professor ke mathe pe shikan pad gayi,"main chahti hu ki us arms dealer ka dhyan pura ka pura ajit & Murshid ki or rahe.use is baat ki bhanak bhi na ho ki hume ye pata chal gaya hai ki vo lutero ko bhi janta tha.is tarah vo ajit se bachta rahega & humari taraf uska dhyan bhi nahi jayega & ho sakta hai hum use pakad len."

"hun.",professor muskuraya,"..jitni aap haseen hain utni hi tez dimagh bhi.",usne file kholi & padhne laga.thodi der baad dono jeep me baithe seth mohan lal ki dukan ki or ja rahe the.

"lutere to seth ke kale Rs 35 lakh pe aish kar rahe honge & hume pata bhi nahi chal raha hai lekin 1 baat mere dimagh me khatak rahi hai."

"kya professor?"

"ki lutero ko seth ki tijori mke bare me pata kaise chala ittefaq se ya fir unhe kisi ne uske bare me bataya ya fir un charo me se koi 1 seth ke yaha kaam kar chuka tha & use us chhipi tijori ka pata chal gaya."

"hun..",divya soch me pad gayi,"..dekhiye,seth ke staff ka 1-1 member abhi bhi dukan pe kaam kar raha hai & ilake ke thanedar ki chhanbeen se bhi kisi pe shaq ki koi vajah nahi mili hai.haan,aapki baat ki koi pehle kaam kar chuka aadmi lutero se mila ho vo mumkin lagti hai."

"1 kaam karte hain divya ji."

"kya?"

"aap seth se milne andar jaiyega & main bahar hi kuchh pata lagane ki koshish karta hu."

"ok."

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"seth ji,zara in sketches ko dekhiye.",divya ne use dono lutero ki tasvire thamayi,"gaur se dekhiye 7 yaad kijiye ki aapne inhe kabhi bhi dekha hai."

"lutero ne to nakab pehno tho,madam."

"haan,vo to hai lekin seth ji bina planning ke koi loot nahi hoti.ab dekhiye,lutero ko ye pata tha ki aap budhvar ko kitne baje dukan aate hain.to mumkin hai ki dukan ke aas-paas ya fir andar aapne unhe kabhi dekha ho."

"hun.",seth sketches ko dekhne laga,"dekho,iski aankhe dekh ke mhare ko lagta hai ki yo yo lutero ke sang raho magar ye dusro ke bare me pakka nahi keh sako hu.",seth ne usi lutere ko pehchana tha jise Gulabo Vicky naam se janti thi.divya ne kuchh socha & hathyaro ke karobari ka skecth bhi seth ko dikhaya magar seth ne use kabhi nahi dekha tha.

"seth,Shobha kaha hai?",professor dhadadhadata kamre me dakhil hua.

"vo to 4 din ki chhutti leke gayo ho.",seth ne sawaliya nigaho se professor ko dekha.

"seth,use tankhwah ke lawa aur kya-2 dete the?"

"yo kaiso sawal karo ho,bhaya.",seth divya se mukhatib hua,"madam,aapko sathi kya mharo hi lutero samajh raho hai?"

"seth,meri taraf dekho.",professor ne seth ki baahe pakad use apni or dekhne pe majbur kiya,"shobha ke sath tumhari rasleela yahi hoti thi na?",seth kuchh nahi bola & bagle jhankne laga.

"main bahar guard se baat kar raha tha..",professor ne seth ki baahe chhodi & divya se mukhatib hua,"..imandar & sharif aadmi hai.pichhle 5 salo se yaha kaam kar raha hai.usne bola ki koi 7 mahine pehle shobha ne yaha naukri ki thi.vaise to seth humesh isi koshish me rehta hai ki uski koi na koi salesgirl uske counter ke peechhe khadi hone ke alawa counter ke malik ke neeche bhi let jaye lekin kabhi bhi kisi ladki ke sath koi lumba chakkar nahi chala lekin shobha ke sath pichhle 5 mahino se seth ka silsila chal raha hai.har budhvar ko bahi dekhne ke baad seth uske jism ko dekhta tha.hai na seth?"

seth mathe ka paseena ponchh raha tha,"kya seth ji aapko hume ye batana tha na.",divya boli,ab us roz bhi to budhvar tha to shobha bhi loot ke waqt maujood thi kya?",seth ne bas haan me sar hilaya.

"tu kaisa dhandha karta hai re?maine to suna tha ki tum log us kahawat me vishwas rakhte ho ki chamdi chali jaye magar damdi na jaye.",professor ne seth ki pith pe dhaul jamaya,"chal bata kyu nahi bataya tha hume shobha ke bare me?"

"are bhaya,sethani to mhari jaan le leti.",divya ko hansi aa gayi jise usne badi mushkil se dabaya,"..fir kitni badnami hoti mhari."

"hun..loot ke dauran shobha kya kar rahi thi?"

"kuchh na.1 lutere ne uske mathe pe bhi banduk laga ke use kone me khada kar diya."

"achha seth ji,thik se yaad kariye shobha ka kya reaction tha,ghabrayi thi,banduk dekh ke chillayi-villayi to nahi thi?"

"are na.mane to lago hai ki bahut darr gayi thi to munh se aavaj bhi na nikal pa rahi thi."

"achha,use lutere ne kaha pe pakad ke rakha tha?",seth ne apni gaddi ke samne ke kone ki or ishara kiya.

"ab vo chhutti pe kab gayi hai & vajah kya batayi hai?"

"3 din pehle.kaho thi ki maa ki tabiyat achnak kharab ho gayo ho."

"zara use fone to lagaiye,seth ji.",seth kafi der tak koshish karta raha magar fone nahi laga.

"seth,tune us ladki se jitna liya vo us se kahi zyada vasul ke nikal gayi.use kisi tarah is tijori ka pata chal gaya & uske sathiyo ne seth ko loot liya lekin 1 baat samajh me nahi aayi ki usne fir upri manzil pe hath saaf kyo nahi kiya?"

"vo isliye professor kyuki vaha ka sara maal jayaz hai & sabka record seth ji ke paas hai.uspe hath dalte to hume sabse pehle staff pe shaq hota & dusra use thikane lagan bhi aasan nahi hota."

"achha seth tumhari dhokhebaaz mehbuba ki koi tasvir hai tumhare paas?",seth thuk gatakne laga & paas rakhe jug se nikal ke pani pine laga.

"kya hua seth ji hai ki nahi?"

"hai..magar.."

"agar-magar chhod seth nahi to maal ko bhul ja!",seth ne jeb se apna mobile nikala & aage badha diya.

"isme hai foto?"

"na."

"to?"

"isme philam hai?"

"philam?..ohh film?",seth ne haan me sar hilaya.professor ne thahaka lagaya & mobile kholne laga.

"hun..",divya professor ki bagal me baith ke mobile ko dekhne lagi,"..ye use bina bataye banaya tha seth ji?",paseena ponchhte seth ne fir se haan me sar hilaya.mobile me 1 mms tha jisme seth shobha ko chod raha tha.divya bhi bade gaur se mms ko dekh rahi thi.uska maqsad shobha ke chehre ko thik se dekhne ka tha magar thodi der baad use ehsas hua ki vo 1 mard ke sath baith kisi aur ki chudai ka video dekh rahi hai to use thodi uljhan hui.shobha 1 mast ladki thi & seth se chudte hue badi garm harkate & tez aahe bhar rahi thi.seth kyu usak deewana hoa gaya tha ye ab divya ki samajh me aaya tha.

"seth ji,maine ye mms apne mobile pe le liya hai magar aap ise delete nahi karenge & ghabraiye mat aapka raaz humare paas mehfuz hai."

"madam,mhari ijjat ko sawal ho.baal-bachchedar aadmi hu."

"seth ji,ye to aapko us ladki ke chakkar me fansne se pehle sochna chahiye tha.shukr kijiye usne loot ki agar blackmail karti to is se kahi zyada vasulti aapse.achha ab hum chalte hain & please seth ji,ab hukjmse koi baat chhupaiye mat.jitna waqt hum aapki karastaniyo ki taftish me laga rahe hain agar utna lutero ke bare me aapki di jankari se unki taftish me lagate to ho sakta hai abhi tak aapke paise mil gaye hote.",divya professor ke sath bahar nikal gayi & seth vaha baitha paseena ponchhta raha.

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क्रमशः...........


raj..
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Re: खेल खिलाड़ी का

Unread post by raj.. » 10 Nov 2014 16:49

खेल खिलाड़ी का पार्ट--26

गतान्क से आगे ......

नारी उत्थान समिति के दफ़्तर के बाहर के मैदान मे शामियाना लगा था & स्टेज पे 5 औरतें बैठी थी.समिति हर साल 1 मेला लगाती थी जिसमे समिति के केन्द्र की वो औरते जिनकी मदद के लिए समिति बनी थी अपने हाथो से बनाई चीज़े बेचती थी.समिति को चलाने का ज़िम्मा शहर की जानी-मानी औरतो या फिर जाने-माने मर्दो की बीवियो का था तो हर साल मेले मे काफ़ी भीड़ जमा होती थी & सारा समान भी बिक जाता था.आज मेले का पहला दिन था & उद्घाटन से पहले प्रेस कान्फरेन्स थी जो अभी शुरू हुई थी.

"मिसेज़.प्रधान,आप समिति की वाइस-प्रेसीडेंट हैं & राम्या जी सेक्रेटरी जोकि आपके पति के खिलाफ चुनाव लड़ रही हैं.इस बात से समिति के काम मे तो कही सियासत आड़े नही आ रही?",अंजलि के जवाब देने से पहले ही राम्या ने माइक अपनी तरफ किया.

"कैसा सवाल पुचछा है आपने?ये समिति परेशान औरतो की मदद के लिए काम करती है,यहा सियासत नही होती.और आप क्या समझते हैं कि मैं प्रधान जी के खिलाफ चुनाव लड़ रही हू तो उनकी & मेरी कोई ज़ाति दुश्मनी है?!देखिए,हम पढ़े-लिखे,समझदार लोग हैं & चुनाव लड़ते हैं जीतने के लिए लेकिन इसके ये माने नही कि हम चुनाव को जंग समझते हैं.अंजलि जी,समिति की शायद सबसे ज़्यादा आक्टिव सदस्या हैं & ऐसे सवाल कर प्लीज़ उनकी तौहीन ना करे.",अंजलि को राम्या की बात बड़ी अच्छी लगी.वो उस से बस काम के सिलसिले मे ही बात करती थी मगर अभी उस पत्रकार को जवाब देकर उसने अपनी समझदारी दिखाई थी.

"आपको आपका जवाब तो मिल ही गया.",अंजलि ने राम्या से मुस्कुराते हुए माइक लिया,"..राम्या जी चुनाव लड़ रही हैं & बहुत मसरूफ़ हैं लेकिन फिर भी समिति के लिए वो हमेशा वक़्त देती हैं.मेरी आपसे गुज़ारिश है कि आप केवल समिति & मेले के बारे मे सवाल करें.यहा सियासत की बाते ना करे तो ये समिति के लिए अच्छा होगा."

"हम इतने दीनो से इस समिति से जुड़े हैं लेकिन आज हम दोनो का सही मयनो मे परिचय हुआ है.".प्रेस कान्फरेन्स के बाद सभी के लिए नाश्ते का इंतेज़ाम था & राम्या अंजलि को नाश्ते की तश्तरी थमा रही थी.

"थॅंक यू.",दिव्या ने प्लेट ली,"सही कहा आपने,राम्या जी.आपसे बाते करके मुझे बहुत अच्छा लगा है.आप कभी हमारे घर क्यू नही आती?"

"ज़रूर आऊँगी लेकिन उस से पहले आपको मेरे ग़रीबखाने आना पड़ेगा."

"मैं भी ज़रूर आऊँगी.वैसे आपके घर मे कौन-2 हैं?",दोनो औरतें अपने-2 परिवार के बारे मे बताने लगी.राम्या बात तो अंजलि से कर रही थी मगर उसके मन मे बस 1 ही सवाल घूमड़ रहा था कि आख़िर भाय्या जी ने उसे अंजलि से मेल-जोल बढ़ाने को क्यू कहा था?

"अच्छा,अब चलती हू राम्या जी."

"थोड़ी देर तो बैठिए,अंजलि जी."

"मन तो बहुत है पर क्या करू बड़े बेटे को उसकी क्रिकेट प्रॅक्टीस से लेना है."

"ओह्ह..तब तो मैं आपको नही रोकूंगी मगर मेरे घर आना नही भूलिएगा."

"ज़रूर आऊँगी,राम्या जी.नमस्ते!"

"नमस्ते!"

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अंजलि की कार कूपर पार्क से कोई 5 किमी की दूरी पे बने स्पोर्ट्स कॉंप्लेक्स के बाहर खड़ी थी & वो अंदर जा चुकी थी.क्रिकेट नेट्स कॉंप्लेक्स के बाहर की सड़क से भी दिखते थे.बाहर सड़क पे अंजलि की गाड़ी के अलावा और भी गाडिया थी.इनमे से 1 गाड़ी मे वो बैठा था & 1 बार फिर पुरानी यादो मे खोया था,"..वरुण अवस्थी,मॅन ऑफ दा मॅच."

यही नाम था उसका-वरुण.क्रिकेट का दीवाना वो कब से था उसे याद नही था लेकिन जब उसकी ज़िंदगी ख़ुशगवार हुआ करती थी,जब उसपे 1 सज़ायाफ़्ता मुजरिम का ठप्पा नही लगा था तब ये खेल उसकी ज़िंदगी हुआ करता था.अपने क्लब,कॉलेज & राज्य की अंडर-22 टीम का वो कॅप्टन & मैं बॅट्स्मन रह चुका था जब उसे राज्य की रणजी ट्रोफी टीम के लिए चुना गया था.ये उसके लिए & उसके परिवार,उसके दोस्तो के लिए बड़ी खुशी की बात थी लेकिन किसी को इस बात से कोई अचंभा नही हुआ था.सभी को पता था कि वरुण 1 दिन राज्य की टीम मे आ जाएगा.उसके कोच को तो उसका मुल्क की टीम मे आने का भी भरोसा था.ऐसा भी हो जाता अगर जसजीत प्रधान बीच मे नही आया होता तो.

अनीश,प्रधान का बेटा नेट्स मे बल्लेबाज़ी कर रहा था,"थूक..!",बिल्कुल सीधे बल्ले से उसने गेंद को गेंदबाज़ के बगल से निकाल दिया था..स्ट्रेट ड्राइव ज़ोरदार खेली थी बच्चे ने लेकिन पॉवेर उतना नही था..हूँ जिस्म का वज़न पिच्छले पाँव पे ज़रा सा ज़्यादा है..उसके कोच को नही दिख रहा ये..कोच है या घसियारा!..इस वक़्त वो जुर्म की प्लॅनिंग करता मुजरिम नही,1 क्रिकेट का दीवाना था.

मोना उसके खेल के चलते ही उसपे मर-मिटी थी.1 इंटर-स्कूल टूर्नमेंट खेलने वो मोना के स्कूल गया था जहा तेज़ गेंदबाज़ का बआउन्सर उसके निचले होंठ पे आ लगा था.4 टाँके लगे थे उसे मगर फिर भी वो टूर्नमेंट का अगला मॅच खेला था & सेंचुरी बनाई थी.मोना उसके हॉंसले से प्रभावित हुए बिना नही रह सकी थी फिर वो देखने मे भी सजीला था.खेलने की वजह से उसका जिस्म भी गथिला था.कॉलेज के दूसरे साल मे आते-2 दोनो 1 दूसरे के साथ जीने की कसमे खाने लगे थे.वो शायद उसकी ज़िंदगी का सबसे हसीन दौर था.मोना ने उसे अपना कुँवारापन सौंप दिया था & जब भी मौका मिलता दोनो 1 दूसरे के जिस्मो मे डूब जाते.

"थूक..!",लड़के ने दोबारा स्ट्रेट ड्राइव खेली थी बिल्कुल पहले जैसी.उसका दिल किया कि जाए & उसकी बॉडी पोज़िशन सही करे.वो जानता था की अभी स्कूल क्रिकेट मे तो वो बहुत रन बनाएगा मगर ज़्यु ही अंडर-19 या अंडर-22 खेलने गया की गेंदबाज़ उसकी इस छ्होटी सी ग़लती का फ़ायदा उठा उसे गेंद हवा मे खेल कॅच देने पे मजबूर कर देंगे.मगर लड़के के पास जाना ख़तरे से खाली नही था.वो उसे खेलता देखने लगा.थोड़ी देर बाद अंजलि उसे लिए बाहर आ गयी.

बड़ी खूबसूरत है ये & शरीफ भी लगती है.इसे इतनी तकलीफ़ पहुचना ठीक रहेगा क्या?..1 पल को उसका भरोसा फिर डगमगया कि तभी उसके दिल से आवाज़ उठी जंग & मोहब्बत मे सब जायज़ है & ये जंग है.उसने गौर किया की प्रधान का बेटा काफ़ी देर से बाहर आता था.सड़क किनारे बनी पार्किंग लगभग खाली थी.उसकी वॅन & प्रधान की कार के अलावा 1 टोयोटा इंनोवा & 1 बाइक खड़ी थी.इंनोवा के काले शीशो के पीछे कौन था उसे नही दिखा लेकिन बाइक सवार तो अपनी बाइक पे अढ़लेता सा अपने फोन पे किसी से बाते करने मे मशगूल था.इस वक़्त ज़्यादातर बच्चे आते थे अपनी पसन्द के खेल खेलने & सीखने..आया होगा किसी बच्चे को लेने.उसने वॅन स्टार्ट की.

"मस्त माल है ये तो!",इंनोवा की ड्राइवर सीट पे बैठे बल्लू के होंठो से धीमी सीटी निकली.

"साले!कुत्ते!",रानो उसका मुँह नोचने की कोशिश करती उसकी गोद मे चढ़ गयी.

"अरे!पागल क्या कर रही है?वो जा रही है..उसके पीछे नही जाना..छ्चोड़..छ्चोड़!",उसने रानो की कलाइयाँ पकड़ ली & उसे ज़बरदस्ती चूम लिया,"..तेरा गुस्सा तो 1 दिन मेरी जान लेगा!"

"फिर बकवास कर रहा है!",इस बार रानो ने उसे थप्पड़ लगाया & फिर उसी गाल पे चूम लिया,"..उस मोटी को मस्त क्यू बोला?"

"मोटी?कौन वो प्रधान की बीवी?..",बल्लू हँसने लगा,"..तू इतना जलती क्यू है रानो?",रानो मुँह बनाए उसकी गोद से उतरने लगी तो बल्लू ने उसे रोक लिया.

"पगली,तू जानती है तेरे सिवा मैं किसी और के बारे मे सोचता भी नही,बस छेड़ता हू तुझे फिर भी ऐसे करती है.",बल्लू अपनी प्रेमिका के बाल उसके चेहरे से हटा उसे देख रहा था.वो दीवाना था रानो का & रानो भी उसकी लफ़ज़ो से झलकती वफ़ा को समझ रही थी.उसका दिल खुशी से झूम उठा था मगर वो 1 लड़की थी & रूठ गयी थी तो अब बल्लू का काम था उसे मनाना.

"अच्छा..चल मस्त नही मोटी है भैंस है वो..अब खुश?",रानो के होंठो पे हल्की सी मुस्कान आई तो बाल्लू ने उसे चूम लिया,"..अरे उतार अपनी सीट पे बैठ वो निकल रही है.",बल्लू ने गाड़ी स्टार्ट की & अंजलि की कार का पीछा करती वरुण की वॅन के पीछे चलने लगा.

ना वरुण को खबर थी ना ही बल्लू & रानो को की उनके पीछे कोई और भी अंजलि का पीछा कर रहा था.वो मोटरसाइकल सवार जिसे वरुण ने देखा था कोई और नही बल्कि महेश अरोरा का आदमी हीरा था.

कैसा अजीब इत्तेफ़ाक़ था!प्रधान पे तीन तरफ से हमला होने वाला था & वो तीनो अपने दिमाग़ मे 1 ही प्लान तैय्यार कर रहे थे..काम के लिए इस से बेहतर जगह और नही हो सकती..वरुण ड्राइव करते हुए सोच रहा था.मैन रोड से हटके बना है कॉंप्लेक्स & सड़क का ट्रॅफिक भी कम है & यहा ज़्यादा रुकता नही है फिर यहा से निकलने के 3 रास्ते हैं.

"काम यही करेंगे,बल्लू.",रानो ने दाया हाथ बल्लू की बाई जाँघ पे रखा हुआ था & सहला रही थी.

"तो गाड़ी लगाऊं साइड मे?"

"हां?"

"तूने बोला ना काम यही करेंगे तो खोल अपनी सलवार मैं गाड़ी लगाता हू.",बल्लू ने मज़ाक किया.

"कामीने!",रानो ने उसकी जीन्स के उपर से ही उसके लंड पे चिकोटी काट ली,"हर वक़्त तुझे बस इसी की चिंता रहती है ना?"

"और क्या तुझे इसकी चिंता नही रहती?",बल्लू ने बाया हाथ गियर शॅफ्ट से हटाया & रानो की टाँगो के बीच घुसा उसकी चूत को मसल दिया.

"ऊव्व..!",दोनो हँसने लगे & रानो ने अपनी बाहे बल्लू के गले मे डाल दी & उस से सॅट के बैठ गयी.

"तू ठीक कह रही है,काम यही करेंगे.इस से बढ़िया जगह नही मिलेगी इस भीड़ भरे शहर मे."

"बस सही दिन तय करते हैं."

"हूँ."

"साहब,कॉंप्लेक्स से बढ़िया जगह नही मिलेगी काम के लिए.",हीरा बाइक भगाता हुआ मोबाइल के हंडसफ़री किट से महेश अरोरा से बात कर रहा था.

"ठीक है.मैं बाकी इंतेज़ाम करता हू,तुम सही दिन तय करो."

"ठीक है,सा'ब.",हीरा ने बटन दबा फोन बंद किया & बाइक आगे बढ़ा दी.

"किसका फोन था?",नीना ने अंगड़ाई ली & बिस्तर से उतर गयी.आज महेश देर से आया था & अभी-2 दोनो की चुदाई ख़त्म हुई थी.नीना ने अपनी पॅंटी उठा ली.

"उस शख्स का जो हमे हमारी मंज़िल तक पहुचने मे हमारी मदद करेगा.",उसने नीना के हाथो से पॅंटी छीन ली.

"कौन है वो?..क्या कर रहे हो,महेश?..मुकुल के आने का वक़्त हो रहा है फिर श्लोक भी अपने दोस्त के यहा से आता ही होगा.",उसने पॅंटी वापस लेने की नाकाम कोशिश की.

"तो क्या हुआ?",महेश ने नीना को दबोच लिया & बिस्तर पे गिरा दिया & उसके उपर सवार हो गया,"..मैं तो तुम्हे तुम्हारे पति के सामने चोदना चाहता हू.देखना चाहता हू कि जब तुम मस्ती मे पागल हो मुझे चुमो,मेरे लंड को चूसो..",नीना की ना-नुकर को अनसुना करते हुए महेश ने उसकी टाँगे फैलाई & उसकी चूत मे अपना लंड घुसा दिया,"..मुझे और चोदने को कहो,तब उसके चेहरे का रंग कैसा होता है."

"पागल मत बनो महेश..ऑश..!",नीना ने उसे धकेल उसे अपने उपर से हटाना चाहा,"..मुकुल को पता चल गया तो सब चौपट हो जाएगा,"..हाईईइ..!",लेकिन महेश के धक्के उसे मदहोश कर रहे थे.

"घबराओ मत,नीना..",महेश उसे बाहो मे भरे उसके चेहरे को चूम रहा था.नीना भी अब उसकी पीठ पे हाथ फिरने लगी थी & अपने दाए पैर से उसकी पिच्छली जाँघ को सहला रही थी,"..तुम्हारे सारे सपने पूरे होंगे.तुमने जो कहा था उसकी सारी तैय्यारि हो गयी है.मेरे आदमी ने सब कुच्छ देख,समझ लिया है.बस कुच्छ ही दीनो मे जसजीत प्रधान की बर्बादी की शुरुआत होगी.",उसने सर नीचे किया & नीना की चूचियों को चूसने लगा.

नीना ने आँखे बंद कर ली..उसे अब अपने सपने साकार होने की उम्मीद नज़र आने लगी थी..वो भी जल्दी ही अंजलि की जगह डेवाले की रानी होगी..उसने अपनी बाहे महेश की पीठ पे कस दी & थोड़ा उचक उसके सर को चूम लिया.कामयाबी के ख़याल ने उसके जोश को और बढ़ा दिया था,"..ऊव्वववव..!",महेश ने उसकी बाई चूची पे काट लिया था.वो अब नीचे से कमर उचक उसका साथ दे रही थी.

महेश को भी अपना मक़सद पूरा होता नज़र आने लगा था.प्रधान ने उस से जो छ्चीना था अब उसकी कीमत चुकाने का वक़्त आ गया था.उसने अपने होंठ नीना के सीने पे और ज़ोर से कस दिए & अपने धक्को की रफ़्तार बढ़ा दी.कमरे मे दोनो की आहे गूँज रही थी & कमरे के बंद दरवाज़े के बाहर खड़ा श्लोक उन आवाज़ो का मतलब समझने की कोशिश करता खड़ा था.

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क्रमशः...........