बाली उमर की प्यास compleet

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raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:24

बाली उमर की प्यास पार्ट--13

गतांक से आगे.......................

"कौन है?" जैसे ही बाहर दरवाजे पर ख़त खाट हुई.. हम सब अचानक चुप हो गये.. हमारी तरफ से ये लगभग तय हो चुका था कि हम किसी को बताए बिना ही कुच्छ तरीका निकालने की सोचेंगे.. पिंकी ने भी काफ़ी देर तक रोते रहने के बाद शायद परिस्थितियों से समझौता कर लिया था.. हम सब अब तरुण के कामीनेपन की बात कर रहे थे.. और मीनू हमें कुच्छ और बातें बताने वाली थी जो कॉलेज में उसके साथ तरुण आज कल कर रहा था...

बाहर से कोई जवाब नही आया.. कुच्छ देर बाद अचानक किसी ने फिर दरवाजा खटखटाया..

"मैं देखती हूँ..!" कहकर मीनू उठी और दरवाजे के पास जाकर फिर पूचछा..," कौन है?"

"मैं हूँ.. दरवाजा खोलो!" बाहर से आवाज़ आई...

मीनू अचानक क्रोधित सी हो गयी.. फिर अपने आप पर काबू पाते हुए घूम कर बोली,"वही है.. तरुण!"

"दरवाजा मत खोलना दीदी.. उस कामीने को घर में मत घुसने दो..!" पिंकी लगभग चिल्लाते हुए बोली...

मीनू ने एक लंबी साँस ली और गुमसूँ सी आवाज़ में बोली," अब ऐसा करने से क्या होगा..? देखें तो सही.. ये अब क्या कहेगा...?"

"नही दीदी.. आप बिल्कुल भी इस कुत्ते को अंदर मत आने दो.. मैं इसकी शकल भी देखना नही चाहती..!" पिंकी उखड़ कर खड़ी हो गयी.. और अपनी आँखों में अजीब से भाव ले आई....

"समझा करो!" मीनू ने हताश होकर कहा...

"नही दीदी.. इसको अंदर नही आने देना है.. वरना मैं अभी उपर जाकर मम्मी को सब बता दूँगी..." पिंकी मान'ने को तैयार ही ना हुई....

"ठीक है.. जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.." मीनू वापस चारपाई पर आकर बैठ गयी," पर इस'से फायडा क्या होगा पिंकी? ये कल फिर नाटक करेगा...!"

तभी हमें तरुण की उँची आवाज़ सुनाई दी," चाची जी...! ओऊओ चाची जी!"

"हां.. कौन है? अरे बेटा तरुण!.. वो बच्चे नीचे ही पढ़ रहे हैं.. दरवाजे पर हाथ मार दो..." उपर से चाचा जी की आवाज़ आई....

"दरवाजा नही खोल रही.. सो तो नही गयी हैं वो?" तरुण ने जवाब दिया...

"अभी से कैसे सो जाएँगी... ? मैं आता हूँ..." चाचा जी ने कहा और अगले ही पल उनके कदमों की आहट हमें जीने में सुनाई दी... सब चुप होकर किताब में देखने लगे....

"अरे भाई.. दरवाजा क्यूँ नही खोल रहे तुम लोग..? बाहर तरुण खड़ा है.." चाचा जी ने आकर हमें पढ़ते देखा और दरवाजा खोल दिया...

"ववो.. हमें सुनाई ही नही दिया.." मीनू ने किताब में देखते हुए ही जवाब दिया...

"नमस्ते चाचा जी.." तरुण ने अंदर आते ही दोनो हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए प्रणाम किया...

"नमस्ते बेटा तरुण! देखना कहीं कल वाला पेपर भी आज की तरह ही बेकार ना हो जाए.. आज बड़ी मुश्किल से चुप कराया है इसको..." चाचा जी ने कहा और बोले," भाई.. हम तो मूवी देख रहे हैं.. शोले.. बड़ी मस्त पिक्चर है.. मैं तो चलता हूँ... तुम लोग पढ़ लो!"

"कोई बात नही चाचा जी.." तरुण ने कहा और चाचा जी के उपर चढ़ते ही अपने असली रूप में आ गया," यहाँ मुझे भी काफ़ी अच्छि मूवी देखने को मिलेगी आज.. हे हे हे..."

हम तीनो किताबों में आँखें गड़ाए बैठे रहे.. किसी ने उसकी तरफ देखा तक नही.. सिवाय मेरे.. मैने भी बस हल्की सी नज़र उठा कर ही उसको देखा था...

"क्या बात है.. ऐसा गुस्सा तो मैने किसी को आते नही देखा... कब तक ऐसे ही बैठे रहोगे...?" तरुण ने कहा और मेरे पास आकर बैठ गया,"क्या बात है लाडो! आज तो स्कूल में ही काम चालू कर रखा था.. क्या मस्त सीन था यार..?" कहते हुए उसने मेरी जाँघ पर हाथ रख दिया और धीरे धीरे सहलाने लगा.... मैने उसकी हरकत का कोई विरोध नही किया....

"दीदी.. इस कामीने को बोल दो यहाँ से चला जाए.. वरना मैं अभी सब कुच्छ मम्मी को बता दूँगी..." पिंकी ने गुस्से से मीनू की और देखते हुए कहा और रोने सी लगी...

"अच्च्छा! ओह ले ले ले ले ले.. मम्मी को बता देगी मुनिया..." तरुण ने उसकी बात का मज़ाक सा बनाया और फिर चेहरे पर ख़ूँख़ार से भाव लाते हुए कहा,"जा! बता दे जिसको बताना है.. मुझे भी मौका मिल जाएगा बताने का.. आख़िर कब तक इतनी बड़े राज को दिल में छुपा कर रखूँगा... मैं सबूत भी साथ लाया हूँ..!" तरुण ने कहा और गंदी सी हँसी हँसने लगा....

पिंकी गुस्से में लाल पीली होती हुई तपाक से खड़ी हो गयी.. अब तक तो वह उपर जा भी चुकी होती.. अगर मीनू ने उसका हाथ ना पकड़ लिया होता," मान तो जा पिंकी.. बैठ जा आराम से.. मैं तुझसे बाद में बात करूँगी.. मान जा प्लीज़!"

"पर दीदी.. आप मुझे बताने दो ना मम्मी को.. आपको क्या फ़र्क पड़ता है.. मम्मी गुस्सा करेंगी तो मुझ पर करेंगी.. इसके चेहरे से तो नकाब हट जाएगा ना.. कुच्छ नही होगा.. आप विश्वास करो.. मम्मी हमारी ही बात का विश्वास करेंगी.. इस 'कुत्ते' की बात का नही.. छ्चोड़ दो मुझे.. बस एक बार उपर जाने दो...

"हां हां.. जाने दो ना.. क्यूँ पकड़ रखा है बेचारी को..? मम्मी तो इसकी ही बात का विश्वास करेंगी ना!" तरुण ने उत्तेजित होते हुए कहा...

"मान जा पिंकी.. प्लीज़..!" मीनू ने उसका हाथ पकड़े रखा...

"पर क्यूँ दीदी?.. मुझसे ये यहाँ बैठा हुआ देखा नही जा रहा..." पिंकी ने एक बार भी तरुण के चेहरे की ओर नही देखा था....

"इसके पास..." मीनू बोलते हुए बिलख पड़ी..," मेरे भी सबूत हैं... मैने इसकी बातों में आकर इसको लेटर लिखे थे.. कयि बार तो इसने खुद लिख कर भी मेरी राइटिंग में मुझसे कॉपी करवाए हैं.. मैं इसकी बातों में आ गयी थी पिंकी.. कयि लेटर बहुत गंदे हैं.. मान जा प्लीज़!" मीनू ने कहने के बाद पिंकी का हाथ छ्चोड़ दिया.. पर पिंकी उपर नही जा पाई और अपने कंबल में घुस कर सुबकने लगी.....

"नही नही.. फिर भी.. तुम्हारी मर्ज़ी है! मैं तो इतना ही शरीफ हूँ.. पिंकी ने थप्पड़ मारा.. मैने कुच्छ नही कहा.. अब चाचा चाची भी पीट लेंगे.. मेरा क्या जाता है?" तरुण ने चटखारा सा लेकर कहा और अपना हाथ सरकाते हुए मेरी जांघों की जड़ तक ले गया.. मैं कसमसा उठी.. पर मैने उस समय उसके हाथ को वहाँ से हटाना चाहा....

"अच्च्छा.. इनकी देखा देखी अब तू भी आँख मटकाने लगी.. तेरे से तो मैं बाद में निपट लूँगा.. बहुत अच्च्छा सोच रखा है तेरे बारे में.." उसने कहा और अपना हाथ वहाँ से हटा लिया..

"तुम..." मीनू की आँखों में आँसू उमड़ आए..," तुम चाहते क्या हो तरुण? क्यूँ हमारी जिंदगी बर्बाद करने पर तुले हुए हो.. क्या मिल जाएगा तुम्हे?"

"तुम सब जानती हो जान! फिर पूच्छ क्यूँ रही हो.. बात तो तुम्हे मान'नि ही पड़ेगी.. आज नही तो कल.. मैं तो तुम्हारे फ़ायदे के लिए ही यहाँ आया हूँ... वरना मुझे शहर में कोई जुगाड़ करना पड़ा तो जिसके कमरे पर ले जाउन्गा.. वो भी लालच करेगा.. समझ रही हो ना तुम!" तरुण ने जिस अंदाज में बात कही थी.. मैं भी सिहर उठी...

मीनू ने अपनी नज़रें झुका ली और अंदर ही अंदर सुबक्ती रही.. लग रहा था.. जैसे वो पूरी तरह टूट चुकी है," मैं.. तुम्हारी बात मान लूँगी तरुण.. मुझे बस थोड़ा सा वक़्त दो.. तुम नही जानते मुझ पर क्या बीत रही है.. जो कुच्छ भी हुआ.. उसमें मैं खुद अपनी ग़लती मान रही हूँ... मैं.. मैं ही नीच थी जो ऐसा वैसा सोचा.. तुमसे... " मीनू फफक पड़ी.. पर उसने बोलना जारी रखा," तुमसे प्यार किया.. ....तुम्हारे.... दिखाए हुए सपने...... अपनी आँखों में बसा लिए.. इसमें तुम्हारा क्या दोष है तरुण... है ना?"

"देखो.. मुझे अब एमोशनल करके और बेवकूफ़ बनाने की कोशिश मत करो.. कितने दीनो से मैं तुम्हारी यही बात सुनता आ रहा हूँ... तुम हर बार.. अपने आँसू दिखा कर मुझे मजबूर कर देती हो... आज कुच्छ मत कहो.. सिर्फ़ ये बताओ कि करना है या नही.. वरना मैं कल सारी चीज़ें अपने दोस्तों में बाँट दूँगा.. फिर करती रहना उनको इकट्ठे.. एक एक के कमरे पर जाकर..!"

पिंकी जो अब तक कंबल में लिपटी सूबक रही थी.. अचानक उठ बैठी और बिफर पड़ी," लो.. कर लो तुम्हे जो करना है.. आ जाओ.. सो जाओ मेरे साथ.. पर मेरी दीदी को कुच्छ मत कहो.. इनके सारे लेटर वापस दे दो..." पिंकी की आवाज़ में गुस्सा और तड़प दोनो ही बराबर थे... मुझे दोनो बहनो की बड़ी दया आ रही थी.. बेचारी किस उलझन में फँस गयी दोनो .. और एक तो.. मुझे अहसास था कि एक तो मेरी वजह से ही फँस गयी थी... शायद इसको ही कहते हैं 'कोयले की दलाली में मुँह काला'

पर तरुण जाने किस मिट्टी का बना हुआ था.. उसके चेहरे पर एक शिकन तक ना आई.. उल्टा बेशार्मों की तरह खिलखिलाने लगा," ये हुई ना बात! बोलो.. क्या कहती हो? शुरुआत किस'से करूँ?"

"तुम चुप हो जाओ पिंकी! तुम उपर जाकर पढ़ लो..." मीनू ने कहा..

"नही.. मैं आपको छ्चोड़ कर कहीं नही जाउन्गि.." पिंकी ने कहा और वापस लेट कर सुबकने लगी...

शायद पिंकी वाला आइडिया उसके जेहन में चढ़ गया था," ठीक है.. जो चाहो.. मेरे साथ कर लेना.. पर आज की रेकॉर्डिंग मेरे सामने डेलीट कर दो पहले... बोलो!" मीनू ने अपने आँसू पौंचछते हुए कहा...

तरुण कुच्छ देर चुप चाप उसको देखता रहा.. फिर बोला," आज नही.. कल कर दूँगा.. तुम्हारे सामने!"

"नही.. ये बात मेरी मान लो.. अभी सब कुच्छ डेलीट करो मेरे सामने... और वो सारे लेटर भी आज ही ले आओ.. मैं आज के बाद तुमसे कोई वास्ता नही रखना चाहती...!" मीनू ने थोड़ा दृढ़ होकर कहा....

"तुमने बाद में मना कर दिया तो?" तरुण ने पूचछा...

"नही करूँगी.. वादा करती हूँ.. और लेटर चाहे बाद में मुझे दे देना... पर रेकॉर्डिंग अभी डेलीट करो...."

"पर फिर मैं इस'से बदला कैसे लूँगा... ?" तरुण पिंकी को रास्ते पर आते देख खुश होते हुए बोला..

"देखो.. अब ऐसे बकवास मत करो...! इसकी तरफ से मैं तुमसे माफी माँग लेती हूँ.. और.. और ये भी माँग लेगी.. पर कम से कम इतना तो मत गिरो तरुण.. ये.. ये तुम्हे भाई कहती है... तुम क्यूँ?.प्लीज़.. जब मैं तुम्हारी हर बात मान रही हूँ तो तुम क्यूँ....?"

"ओके..." तरुण ने कुच्छ देर सोचने के बाद कहा..," आ जाओ.. तुम्हारे सामने ही डेलीट कर देता हूँ.. पर पहले इस'से बोलो की मुझसे माफी माँगे...."

मीनू तुरंत उठकर हमारे पास आकर तरुण के दूसरी और बैठ गयी...," माँग लेगी तरुण.. प्लीज़.. अब उसको तंग क्यूँ कर रहे हो..? कल इनका पेपर भी है...!"

"उसकी चिंता अब तुम मत करो.. वो मेरा काम है... साला भाग कर जाएगा तो जाएगा कहाँ...?.. ये देखो.." कह कर तरुण ने अपने मोबाइल में रेकॉर्ड की हुई वीडियो चला दी... मैने मीनू की ओर देखा.. उसने अपना सिर झुकाया हुआ था.. पर तिर्छि नज़रों से वा स्क्रीन की ओर ही देख रही थी.... तस्वीर इतनी सॉफ नही थी.. पर हम दोनो पहचाने जा सकते थे... जैसे ही मेरे सर की जांघों के बीच बैठ कर उसके लिंग को मुँह में लिए हुए होने का सीन आया.. तरुण ने मुस्कुरकर मेरी और देखा.. शायद उसके बाद मीनू ने भी.. पर तब तक मैने नज़रें झुका ली थी...

"देखा.. कितनी मस्ती से चूस रही है.. हा हा हा.. ये है मस्त लड़की.. तुम जाने क्यूँ बिदक्ति रहती हो.." तरुण ने मीनू की और देखते हुए कहा...

"लाओ.. मुझे दे दो.. मैं खुद डेलीट करूँगी.."मीनू ने कहा...

"ये लो जान.. तुम्हारे लिए तो मैं जान भी दे सकता हूँ..." तरुण ने मीनू को मोबाइल दे दिया...

"मज़ाक कर रहे हो या...!" मीनू बोल कर रुक गयी...

"कमाल है मीनू.. क्या तुम्हे नही पता मैं तुमसे कितना प्यार करता था.. वो तो..." बोलता हुआ तरुण अचानक दंग रह गया.. और साथ में मैं भी....

"मैं तुम्हे ग़लत समझ रही थी तरुण.. मुझे माफ़ कर दो प्लीज़... अब जैसा तुम कहोगे.. मैं खुशी खुशी करने को तैयार हूँ.. और हमेशा करूँगी... आइ लव यू जान..." मीनू ने अचानक तरुण को अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंटो को अपने होंटो में लेकर चूसने लगी... मैं चौंक पड़ी.. ये अचानक मीनू को क्या हो गया....?

"लो.. यही बात थी तो पहले ही ना बोल देती.. ऐसे ही गरम होना था तो मैं एक से एक बढ़िया ब्लू फिल्म दिखा देता तुम्हे.." तरुण अपने होंटो को आज़ाद करवा कर हंसता हुआ बोला..," अभी दिखाउ क्या? .. मोबाइल में और भी हैं.. असली वाली...!"

"नही.. पर मुझे तुम्हारा ये ब्लॅकमेलिंग वाला तरीका बिल्कुल पसंद नही.. क्या मैं तुम्हे वैसे नही करने देती सब कुच्छ.. एक ना एक दिन तो मान ही जाती ना.. तुमसे सब्र ही नही हुआ..." मीनू ने उसकी छाती पर हाथ फेरते हुए कहा...

तरुण भी एकदम पिघल सा गया," मीनू की छातियों को एक एक करके अपने हाथों में लेकर देखता हुआ बोला," ववो.. तो पिंकी ने दिमाग़ खराब कर दिया था.. वरना मैने पहले कब किया ऐसा.. बोलो.. कितने दिन से तुम मुझे हाथ नही लगाने देती थी.. अगर मुझे ये तरीका उसे करना होता तो मैं पहले ही ना कर लेता..."

"फिर.. वो.. गंदे लेटर क्यूँ लिखवाए मुझसे.. बोलो!" मीनू उसकी किसी हरकत का कोई विरोध नही कर रही थी.... और तुम कह रहे थे कि उस दिन तुमने मेरे फोटो भी खींचे थे.. वो क्यूँ भला.." मीनू ने प्यार से बोलते हुए ही कहा.. मेरी समझ में नही आ रहा था की मीनू अचानक पलटी कैसे मार गयी....

तरुण हंसता हुआ थोड़ा शर्मिंदा होकर बोला..," हां.. वो मैं अपनी ग़लती मानता हूँ... पर वो सिर्फ़ आख़िरी हथियार था... मैं तुम्हारा इस कदर दीवाना हो गया हूँ कि मुझे हमेशा डर लगता था कि कहीं.. कभी.. तुम मुझसे दूर हो गयी तो.."

"ओह जान! आइ लव यू.. तुमने ऐसा सोच भी कैसे लिया.. क्या तुम्हे नही पता कि मैं तुम्हे अपनी जान से भी ज़्यादा प्यार करती हूँ.. कुच्छ भी कर सकती हूँ.. तुम्हे खुश करने के लिए.....!" मीनू ने कहा और एक बार फिर उस'से लिपट गयी....

"पिंकी को उपर भेज दो.. इसका कुच्छ पता नही.. कब बखेड़ा कर दे.."तरुण ने आहिस्ता से उसके कान में कहा....

"एक बात कहूँ... तरुण... अगर बुरा ना मानो तो.."

"हां.. बोलो ना.. आज कुच्छ भी बोलो जान....!" तरुण लट्तू हो गया था.. मीनू की अदाओं पर....

"मुझे रह रह कर वो लेटर याद आ रहे हैं.. मेरा दिमाग़ खराब हो रहा है.. प्लीज़.. तुम उन्हे मेरे सामने जला दो.. फिर मैं तुम्हे ऐसा प्यार करूँगी कि तुम कभी मुझे भूल नही पाओगे...!" मीनू ने गुनगुनाते हुए बात कही...

"मेरा उल्लू बना रही हो ना?... मैं सब समझ गया.. मूवी डेलीट करवा ली.. लेटर और जला दिए तो मेरे पास क्या बचेगा...? तुम रंग बदल गयी तो.." तरुण का माथा अचानक ठनका...

"तुम्हारी यही बात मुझे सबसे ज़्यादा खराब लगती है.. इतने शक्की क्यूँ हो तुम..? मैने आज तक अपनी कोई बात पलटी है क्या?.. चलो कोई बात नही... तुम वो लेटर लाकर दिखा दो मुझे.. तीनो के तीनो.. फिर जी भर कर प्यार करने के बाद जला देना.. मुझे बहुत अच्च्छा लगेगा जान.. तुम्हे नही पता.. उस दिन के बाद से मैं ढंग से सो भी नही पाई हूँ.. प्लीज़.." कहकर मीनू ने फिर से तरुण के होंटो को अपने काबू में कर लिया...

कुच्छ देर तरुण मस्ती से मीनू के गुलाबी होंटो को चूस्ता रहा.. फिर हट कर बोला," आज तो तुम कुच्छ ज़्यादा ही गरम हो गयी हो जान.. आज तो अपने आप तुमने मेरा पकड़ भी लिया.. ठीक है.. मैं लेटर लेने जा रहा हूँ.. तुम अपना मूड मत बदलना.. देखना कितना मज़ा दूँगा मैं तुम्हे.." तरुण ने कहा और उसके हाथ से मोबाइल लेकर चला गया.....

तरुण के जाते ही पिंकी उठकर बैठ गयी," तुम बहुत गंदी हो दीदी... मुझसे बात मत करना आज के बाद!"

क्रमशः........................

...

raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:25

"Koun hai?" Jaise hi bahar darwaje par khat khat huyi.. Hum sab achanak chup ho gaye.. Hamari taraf se ye lagbhag tay ho chuka tha ki hum kisi ko bataye bina hi kuchh tareeka nikalne ki sochenge.. Pinky ne bhi kafi der tak rote rahne ke baad shayad paristhitiyon se samjhouta kar liya tha.. Hum sab ab Tarun ke kaminepan ki baat kar rahe the.. aur Meenu hamein kuchh aur baatein batane wali thi jo college mein uske sath Tarun aaj kal kar raha tha...

Bahar se koyi jawab nahi aaya.. Kuchh der baad achanak kisi ne fir darwaja khatkhataya..

"Main dekhti hoon..!" Kahkar Meenu uthi aur darwaje ke paas jakar fir poochha..," Koun hai?"

"Main hoon.. darwaja kholo!" Bahar se aawaj aayi...

Meenu achanak krodhit si ho gayi.. fir apne aap par kabu pate huye ghoom kar boli,"Wahi hai.. Tarun!"

"Darwaja mat kholna didi.. uss kamine ko ghar mein mat ghusne do..!" Pinky lagbhag chillate huye boli...

Meenu ne ek lumbi saans li aur gumsum si aawaj mein boli," Ab aisa karne se kya hoga..? Dekhein toh sahi.. ye ab kya kahega...?"

"Nahi didi.. aap bilkul bhi iss kutte ko andar mat aane do.. main iski shakal bhi dekhna nahi chahti..!" Pinky ukhad kar khadi ho gayi.. aur apni aankhon mein ajeeb se bhav le aayi....

"Samjha karo!" Meenu ne hatash hokar kaha...

"Nahi didi.. isko andar nahi aane dena hai.. warna main abhi upar jakar mummy ko sab bata doongi..." Pinky maan'ne ko taiyaar hi na huyi....

"Theek hai.. jaisi tumhari marji.." Meenu wapas charpayi par aakar baith gayi," Par iss'se fayda kya hoga Pinky? Ye kal fir natak karega...!"

Tabhi hamein Tarun ki unchi aawaj sunayi di," Chachi ji...! Oooo Chachi Ji!"

"Haan.. koun hai? arey beta Tarun!.. wo bachche neeche hi padh rahe hain.. darwaje par hath maar do..." Upar se chacha ji ki aawaj aayi....

"Darwaja nahi khol rahI.. so toh nahi gayi hain wo?" Tarun ne jawab diya...

"Abhi se kaise so jayengi... ? main aata hoon..." Chacha ji ne kaha aur agle hi pal unke kadmon ki aahat hamein jeene mein sunayi di... Sab chup hokar kitaab mein dekhne lage....

"Arey bhai.. darwaja kyun nahi khol rahe tum log..? bahar Tarun khada hai.." Chacha ji ne aakar hamein padhte dekha aur darwaja khol diya...

"wwo.. hamein sunayi hi nahi diya.." Meenu ne kitaab mein dekhte huye hi jawab diya...

"Namastey chacha ji.." Tarun ne andar aate hi dono hath jod kar muskurate huye pranaam kiya...

"Namastey beta Tarun! Dekhna kahin kal wala paper bhi aaj ki tarah hi bekar na ho jaye.. aaj badi mushkil se chup karaya hai isko..." Chacha ji ne kaha aur bole," Bhai.. hum toh movie dekh rahe hain.. Sholey.. badi mast picture hai.. main toh chalta hoon... tum log padh lo!"

"Koyi baat nahi chacha ji.." Tarun ne kaha aur chacha ji ke upar chadhte hi apne asli roop mein aa gaya," yahan mujhe bhi kafi achchhi movie dekhne ko milegi aaj.. he he he..."

Hum teeno kitaabon mein aankhein gadaye baithe rahe.. kisi ne uski taraf dekha tak nahi.. sivay mere.. maine bhi bus hulki si najar utha kar hi usko dekha tha...

"Kya baat hai.. aisa gussa toh maine kisi ko aate nahi dekha... kab tak aise hi baithe rahoge...?" Tarun ne kaha aur mere paas akar baith gaya,"Kya baat hai laado! aaj toh school mein hi kaam chalu kar rakha tha.. kya mast scene tha yaar..?" Kahte huye usne meri jaangh par hath rakh diya aur dheere dheere sahlane laga.... maine uski harkat ka koyi virodh nahi kiya....

"Didi.. iss kamine ko bol do yahan se chala jaye.. warna main abhi sab kuchh mummy ko bata doongi..." Pinky ne gusse se Meenu ki aur dekhte huye kaha aur rone si lagi...

"Achchha! oh le le le le le.. mummy ko bata degi muniya..." Tarun ne uski baat ka majak sa banaya aur fir chehre par khoonkhar se bhav late huye kaha,"Ja! bata de jisko batana hai.. mujhe bhi mouka mil jayega batane ka.. aakhir kab tak itni bade raaj ko dil mein chhupa kar rakhoonga... main saboot bhi sath laya hoon..!" Tarun ne kaha aur gandi si hansi hansne laga....

Pinky gusse mein laal peeli hoti huyi tapak se khadi ho gayi.. ab tak toh wah upar ja bhi chuki hoti.. agar Meenu ne uska hath na pakad liya hota," Maan toh ja Pinky.. baith ja aaram se.. main tujhse baad mein baat karoongi.. maan ja pls!"

"Par didi.. aap mujhe batane do na mummy ko.. aapko kya fark padta hai.. mummy gussa karengi toh mujh par karengi.. iske chehre se toh nakaab hat jayega na.. kuchh nahi hoga.. aap vishvas karo.. mummy hamari hi baat ka vishvas karengi.. iss 'kutte' ki baat ka nahi.. chhod do mujhe.. bus ek baar upar jane do...

"Haan haan.. jane do na.. kyun pakad rakha hai bechari ko..? Mummy toh iski hi baat ka vishvas karengi na!" Tarun ne uttejit hote huye kaha...

"Maan ja pinky.. pls..!" Meenu ne uska hath pakde rakha...

"Par kyun didi?.. mujhse ye yahan baitha hua dekha nahi ja raha..." Pinky ne ek baar bhi Tarun ke chehre ki aur nahi dekha tha....

"Iske paas..." Meenu bolte huye bilakh padi..," Mere bhi saboot hain... maine iski baaton mein aakar isko letter likhe the.. kayi baar toh isne khud likh kar bhi meri writing mein mujhse copy karwaye hain.. main iski baaton mein aa gayi thi Pinky.. kayi letter bahut gande hain.. maan ja pls!" Meenu ne kahne ke baad Pinky ka hath chhod diya.. par Pinky upar nahi ja payi aur apne kambal mein ghus kar subakne lagi.....

"Nahi nahi.. fir bhi.. tumhari marji hai! main toh itna hi shareef hoon.. Pinky ne thappad mara.. maine kuchh nahi kaha.. ab chacha chachi bhi peet lenge.. mera kya jata hai?" Tarun ne chatkhara sa lekar kaha aur apna hath sarkate huye meri jaanghon ki jad tak le gaya.. Main kasmasa uthi.. par maine uss samay uske hath ko wahan se hatana chaha....

"Achchha.. inki dekha dekhi ab tu bhi aankh matkane lagi.. tere se toh main baad mein nipat loonga.. bahut achchha soch rakha hai tere baare mein.." Usne kaha aur apna hath wahan se hata liya..

"Tum..." Meenu ki aankhon mein aansoo umad aaye..," tum chahte kya ho Tarun? Kyun hamari jindagi barbaad karne par tule huye ho.. kya mil jayega tumhe?"

"Tum sab jaanti ho jaan! fir poochh kyun rahi ho.. baat toh tumhe maan'ni hi padegi.. aaj nahi toh kal.. main toh tumhare fayde ke liye hi yahan aaya hoon... warna mujhe shahar mein koyi jugad karna pada toh jiske kamre par le jaaunga.. wo bhi lalach karega.. samajh rahi ho na tum!" Tarun ne jis andaj mein baat kahi thi.. main bhi sihar uthi...

Meenu ne apni najrein jhuka li aur andar hi andar subakti rahi.. lag raha tha.. jaise wo poori tarah toot chuki hai," Main.. tumhari baat maan loongi Tarun.. mujhe bus thoda sa waqt do.. tum nahi jante mujh par kya beet rahi hai.. jo kuchh bhi hua.. usmein main khud apni galti maan rahi hoon... Main.. Main hi neech thi jo aisa waisa socha.. tumse... " Meenu fafak padi.. par usne bolna jari rakha," Tumse pyar kiya.. ....tumhare.... dikhaye huye sapne...... apni aankhon mein basa liye.. ismein tumhara kya dosh hai Tarun... hai na?"

"Dekho.. mujhe ab emotional karke aur bewkoof banane ki koshish mat karo.. kitne dino se main tumhari yahi baat sunta aa raha hoon... tum har baar.. apne aansu dikha kar mujhe majboor kar deti ho... aaj kuchh mat kaho.. sirf ye batao ki karna hai ya nahi.. warna main kal sari cheejein apne doston mein baant doonga.. fir karti rahna unko ikatthe.. ek ek ke kamre par jakar..!"

Pinky jo ab tak kambal mein lipti subak rahi thi.. achanak uth baithi aur bifar padi," Lo.. kar lo tumhe jo karna hai.. aa jao.. so jao mere sath.. par meri didi ko kuchh mat kaho.. inke sare letter wapas de do..." Pinky ki aawaj mein gussa aur tadap dono hi barabar the... Mujhe dono behno ki badi daya aa rahi thi.. bechari kis uljhan mein fans gayi dono .. aur ek toh.. mujhe ahsaas tha ki ek toh meri wajah se hi fans gayi thi... shayad isko hi kahte hain 'Koyle ki dalali mein munh kala'

Par Tarun jane kis mitti ka bana hua tha.. uske chehre par ek shikan tak na aayi.. ulta besharmon ki tarah khilkhilane laga," Ye huyi na baat! bolo.. kya kahti ho? shuruaat kis'se karoon?"

"Tum chup ho jao Pinky! tum upar jakar padh lo..." Meenu ne kaha..

"Nahi.. main aapko chhod kar kahin nahi jaaungi.." Pinki ne kaha aur wapas late kar subakne lagi...

shayad Pinky wala idea uske jehan mein chadh gaya tha," Theek hai.. jo chaho.. mere sath kar lena.. par aaj ki recording mere saamne delete kar do pahle... Bolo!" Meenu ne apne aansoo pounchhte huye kaha...

Tarun kuchh der chup chap usko dekhta raha.. fir bola," aaj nahi.. kal kar doonga.. tumhare saamne!"

"Nahi.. ye baat meri maan lo.. abhi sab kuchh delete karo mere saamne... aur wo sare letter bhi aaj hi le aao.. main aaj ke baad tumse koyi vasta nahi rakhna chahti...!" Meenu ne thoda dridh hokar kaha....

"Tumne baad mein mana kar diya toh?" Tarun ne poochha...

"Nahi karoongi.. wada karti hoon.. aur letter chahe baad mein mujhe de dena... par recording abhi delete karo...."

"Par fir main iss'se badla kaise loonga... ?" Tarun Pinky ko raaste par aate dekh khush hote huye bola..

"Dekho.. ab aise bakwas mat karo...! Iski taraf se main tumse maafi maang leti hoon.. aur.. aur ye bhi maang legi.. par kum se kum itna toh mat giro Tarun.. ye.. ye tumhe bhai kahti hai... tum kyun?.. plz.. jab main tumhari har baat maan rahi hoon toh tum kyun....?"

"OK..." Tarun ne kuchh der sochne ke baad kaha..," aa jao.. tumhare saamne hi delete kar deta hoon.. par pahle iss'se bolo ki mujhse maafi maangey...."

Meenu turant uthkar hamare paas aakar Tarun ke dusri aur baith gayi...," Maang legi Tarun.. plz.. ab usko tang kyun kar rahe ho..? kal inka paper bhi hai...!"

"Uski chinta ab tum mat karo.. wo mera kaam hai... sala bhag kar jayega toh jayega kahan...?.. ye dekho.." kah kar Tarun ne apne mobile mein record ki huyi video chala di... Maine Meenu ki aur dekha.. usne apna sir jhukaya hua tha.. par tirchhi najron se wah screen ki aur hi dekh rahi thi.... Tasveer itni saaf nahi thi.. par hum dono pahchane ja sakte the... jaise hi mere Sir ki jaanghon ke beech baith kar uske ling ko munh mein liye huye hone ka scene aaya.. Tarun ne muskurakar meri aur dekha.. Shayad uske baad Meenu ne bhi.. par tab tak maine najrein jhuka li thi...

"Dekha.. kitni masti se choos rahi hai.. ha ha ha.. ye hai mast ladki.. tum jane kyun bidakti rahti ho.." Tarun ne Meenu ki aur dekhte huye kaha...

"Lao.. mujhe de do.. main khud delete karoongi.."Meenu ne kaha...

"Ye lo jaan.. tumhare liye toh main jaan bhi de sakta hoon..." Tarun ne Meenu ko mobile de diya...

"Majak kar rahe ho ya...!" Meenu bol kar ruk gayi...

"Kamaal hai Meenu.. kya tumhe nahi pata main tumse kitna pyar karta tha.. wo toh..." Bolta hua Tarun achanak dang rah gaya.. aur sath mein main bhi....

"Main tumhe galat samajh rahi thi Tarun.. mujhe maaf kar do pls... ab jaisa tum kahoge.. main khushi khushi karne ko taiyaar hoon.. aur hamesha karoongi... I love you jaan..." Meenu ne achanak Tarun ko apni baahon mein bhar liya aur uske honton ko apne honton mein lekar choosne lagi... Main chounk padi.. ye achanak Meenu ko kya ho gaya....?

"Lo.. yahi baat thi toh pahle hi na bol deti.. aise hi garam hona tha toh main ek se ek badhiya blue film dikha deta tumhe.." Tarun apne honton ko ajad karwa kar hansta hua bola..," Abhi dikhaaun kya? .. mobile mein aur bhi hain.. asli wali...!"

"Nahi.. par mujhe tumhara ye blackmailing wala tareeka bilkul pasand nahi.. kya main tumhe waise nahi karne deti sab kuchh.. ek na ek din toh maan hi jati na.. tumse sabra hi nahi hua..." Meenu ne uski chhati par hath ferte huye kaha...

Tarun bhi ekdum pighal sa gaya," Meenu ki chhatiyon ko ek ek karke apne hathon mein lekar dekhta hua bola," Wwo.. toh Pinky ne dimag kharab kar diya tha.. warna maine pahle kab kiya aisa.. bolo.. Kitne din se tum mujhe hath nahi lagane deti thi.. agar mujhe ye tareeka use karna hota toh main pahle hi na kar leta..."

"Fir.. wo.. gande letter kyun likhwaye mujhse.. bolo!" Meenu uski kisi harkat ka koyi virodh nahi kar rahi thi.... aur tum kah rahe the ki uss din tumne mere foto bhi kheenche the.. wo kyun bhala.." Meenu ne pyar se bolte huye hi kaha.. Meri samajh mein nahi aa raha tha ki Meenu achanak palti kaise maar gayi....

Tarun hansta hua thoda sharminda hokar bola..," haan.. wo main apni galati maanta hoon... par wo sirf aakhiri hathiyaar tha... main tumhara iss kadar deewana ho gaya hoon ki mujhe hamesha darr lagta tha ki kahin.. kabhi.. tum mujhse door ho gayi toh.."

"Oh jaan! I love you.. Tumne aisa soch bhi kaise liya.. kya tumhe nahi pata ki main tumhe apni jaan se bhi jyada pyar karti hoon.. kuchh bhi kar sakti hoon.. tumhe khush karne ke liye.....!" Meenu ne kaha aur ek baar fir uss'se lipat gayi....

"Pinky ko upar bhej do.. iska kuchh pata nahi.. kab bakheda kar de.."Tarun ne aahista se uske kaan mein kaha....

"Ek baat kahoon... Tarun... agar bura na mano toh.."

"Haan.. bolo na.. aaj kuchh bhi bolo jaan....!" Tarun lattu ho gaya tha.. Meenu ki adaaon par....

"Mujhe rah rah kar wo letter yaad aa rahe hain.. mera dimag kharab ho raha hai.. pls.. tum unhe mere saamne jala do.. fir main tumhe aisa pyar karoongi ki tum kabhi mujhe bhool nahi paaoge...!" Meenu ne gungunate huye baat kahi...

"Mera ulloo bana rahi ho na?... main sab samajh gaya.. movie delete karwa li.. letter aur jala diye toh mere paas kya bachega...? tum rang badal gayi toh.." Tarun ka matha achanak thanka...

"Tumhari yahi baat mujhe sabse jyada kharaab lagti hai.. itne shakki kyun ho tum..? maine aaj tak apni koyi baat palti hai kya?.. chalo koyi baat nahi... tum wo letter lakar dikha do mujhe.. teeno ke teeno.. fir ji bhar kar pyar karne ke baad jala dena.. mujhe bahut achchha lagega jaan.. tumhe nahi pata.. uss din ke baad se main dhang se so bhi nahi paayi hoon.. pls.." Kahkar Meenu ne fir se Tarun ke honton ko apne kaabu mein kar liya...

Kuchh der Tarun masti se Meenu ke gulabi honton ko choosta raha.. fir hat kar bola," aaj toh tum kuchh jyada hi garam ho gayi ho jaan.. aaj toh apne aap tumne mera pakad bhi liya.. theek hai.. main letter lene ja raha hoon.. tum apna mood mat badalna.. dekhna kitna maja doonga main tumhe.." Tarun ne kaha aur uske hath se mobile lekar chala gaya.....

Tarun ke jate hi Pinky uthkar baith gayi," tum bahut gandi ho didi... mujhse baat mat karna aaj ke baad!"

kramshah......................

.....


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:26

बाली उमर की प्यास पार्ट--14

गतांक से आगे.......................

"और मैं क्या करती पिंकी?" तरुण के जाते ही मीनू का चेहरा मुरझा गया.. उसने दरवाजा खोल कर बाहर झाँका और फिर बंद करके आ गयी..," मेरे पास कोई और रास्ता था ही नही.. उसको अपनी बातों में लेने के अलावा.. बस अब दुआ करो कि वो लेटर ले आए और यहाँ आने तक अपना मोबाइल ना देखे...!"

"क्या मतलब दीदी? तुम नाटक कर रही थी उसके साथ.." पिंकी खुश होकर बोली...

"और नही तो क्या? जो लड़का इतनी नीचे गिर सकता है कि मेरे साथ साथ तुम्हे भी अपनी हवस का शिकार बनाने के लिए ब्लॅकमेल करने की सोचे.. क्या मैं उसके बारे में ऐसा सोचूँगी...?" मीनू ने कहा और राज की बात बताते हुए बोली...," मैने उसका एमएमसीफ़ॉर्मेट कर दिया है उसके मोबाइल मैं जितनी भी वीडियो होंगी सब डिलीट हो गई होंगी

"क्या?" पिंकी से भी ज़्यादा खुशी मेरे चेहरे पर थी," ये.. एमएमसी क्या होता है?"

"मल्टी मीडीया कार्ड.. कल कॉलेज में उसने मुझे मेरे स्नॅप्स दिखाए थे.. वो भी उसी में थे.. और तुम्हारी रेकॉर्डिंग भी.. कम से कम तुम्हारा झंझट तो ख़तम हो गया अब.. अगर उसने अपने कंप्यूटर में कॉपी नही की होगी तो... आइन्दा से बच कर रहना... तुम बच्ची नही हो जो किसी की भी बातों में यूँ आ जाओ..!" मीनू ने कहा..

"ये तो कमाल हो गया..." पिंकी उठकर हमारे पास आ गयी.. अचानक उसका खिल चुका चेहरा फिर से मुरझा गया.....," पर अब अगर उसने लेटर नही दिए तो पहले.. वो तो कह रहा था कि वो 'पहले' नही देगा....."

"मैं कोशिश करके देखूँगी.. वरना.. बाद में तो मिल ही जाएँगे.. इसने मेरा जीना हराम कर दिया है कॉलेज में... मैं आज सब कुच्छ ख़तम कर देना चाहती हूँ.. चाहे वो... चाहे वो किसी भी कीमत पर हो...!" मीनू लंबी साँस लेते हुए बोली...

"एक काम करें दीदी..!" पिंकी ने मीनू के गालों पर हाथ लगा उसका चेहरा अपनी और घुमा लिया...

"क्या?" मीनू ने पूचछा..

"मैं दरवाजे के पिछे लट्ठ लेकर खड़ी हो जाती हूँ.. जैसे ही वो आएगा.. मैं ज़ोर से उसके सिर में दे मारूँगी... और आप दोनो उस'से लेटर..." पिंकी का आइडिया मुझे भी पसंद आया था.. पर मैं उनके इस खेल में शामिल होकर तरुण से दुश्मनी मोल नही लेना चाहती थी.... मैं उनको कुच्छ बहाना बनाकर घर जाने के लिए बोलने ही वाली थी कि मीनू बोल पड़ी...

"तुझे तो और कुच्छ आता ही नही.. पिच्छले जनम में तू कसाई थी क्या? अगर तुम उसको लट्ठ मरोगी तो उसकी चीख नही निकलेगी क्या? घर वाले नीचे आ गये तो सारे किए कराए पर पानी फिर जाएगा... और अगर वह बचकर भाग गया तो फिर मेरी खैर नही! मैं उसको प्यार से बातों में उलझा कर ही देखूँगी.. अगर बात बन गयी तो... नही तो" मीनू ने अपना सिर झुका लिया..," तू उपर चली जाना पिंकी.. प्लीज़.. तेरे आगे मुझसे नही होगा.. और मैं आज उस'से हर हालत में लेटर लेना चाहती हूँ... चाहे मुझे कुच्छ भी करना पड़े...!"

पिंकी उसके बाद कुच्छ नही बोली.. बस यूँही उदास बैठी कुच्छ सोचती रही.. अचानक मेरे मंन में ही एक सवाल कौंधा..," पर दीदी...?"

"क्या?" मीनू ने मेरी तरफ देख कर पूचछा...

"व..वो.. ऐसे तो आप.... आप के पेट में बच्चा आ जाएगा उसका...!" मैने शरमाते हुए कहा...

कुच्छ देर तो मीनू चुप रही.. फिर आह सी भरते हुए बोली," देखते हैं.. क्या होगा!"

"फिर देखोगी क्या? अगर आप ने उसके साथ 'वो' कर लिया तो फिर क्या करोगी.. फिर तो आप 'मा' बन ही जाओगी ना...!" मेरी बात पर जब मुझे नकारात्मक प्रतिक्रिया नही मिली तो मैने और खुलकर कहा...

मीनू इस बात पर हँसने सी लगी," तू बच्ची है अभी.. तुझे किसने बताया..?"

"ववो.. म्मेरी एक सहेली कह रही थी..." मैने बहाना बनाकर कहा....

"तुम्हारे आपस में यही सब बातें करती रहती हो क्या?" पिंकी ने मुझे डाँट'ते हुए कहा.. और फिर बोली," ऐसा नही होता.. ज़रूरी नही कि एक बार में ही 'ऐसा' हो जाए.. और फिर बाज़ार में इतनी दवाइयाँ भी तो आती हैं... अगर मजबूरी में मुझे करना पड़ा तो 'वो' ले लूँगी...."

"सच!" मैं चाहकर भी अपने चेहरे को खिलने से रोक ना सकी... ये बात तो मेरे तड़प रहे शरीर के लिए संजीवनी की तरह थी," सच में आती हैं ऐसी दवाई?"

"तू तो इस तरह खुश हो रही है जैसे मुसीबत मुझ पर नही.. तुझ पर आई हुई हो.. तुम दोनो तो निसचिंत हो ही जाओ.. जहाँ तक मेरा ख़याल है.. तुम्हारी रेकॉर्डिंग कॉपी नही की होगी उसने.. आज ही तो ली थी.. फिर उसका कंप्यूटर भी शहर में उसके दोस्त के पास है... पर मेरी बात ध्यान रखना.. लड़के कुत्ते होते हैं.. कभी भी इनकी बातों में मत आना...!" मीनू ने हम दोनो को समझाते हुए कहा...

"पर दीदी.. उसने आप की स्नॅप्स कॉपी कर रखी होंगी तो?" पिंकी चिंतित होकर बोली...

"आ.. देखा जाएगा.. अब करनी का फल तो भुगतना ही पड़ेगा.. मैं ही पागल थी जो उसकी बातों में आ गयी..." मीनू ने लंबी साँस लेकर कहा," चलो.. अब अपनी अपनी चारपाइयों पर बैठ जाओ.. तुम्हारे चेहरे से ये नही लगना चाहिए पिंकी की मैं नाटक कर रही हूँ.. तू तो ऐसा कर.. उपर चली जा..!"

मीनू जाकर अपनी चारपाई पर बैठ गयी.. पिंकी मेरे पास ही बैठी रही," नही दीदी.. आपको छ्चोड़ कर मैं उपर नही जाउन्गि.. मैं उसके आते ही सो जाउन्गि.. कंबल औध कर...."

हमें तरुण का इंतजार करते करते लगभग एक घंटा हो गया था... अब मीनू के दिमाग़ में तरह तरह की बातें आनी शुरू हो गयी थी...," कहीं ऐसा तो नही की उसने अपना मोबाइल देख लिया हो और वह मेरी चालाकी समझ गया हो?" मीनू ने चिंतित सी होते हुए कहा...

"फिर क्या होगा दीदी?" पिंकी का चेहरा भी मीनू जैसा ही हो गया..

"पता नही.. पर वो मुझ पर विश्वास नही करेगा आज के बाद.. मोबाइल देख लिया होगा तो शायद वो कल कॉलेज में ही बात करेगा मुझसे... 'मुझे और मौका शायद ही मिले अब.. कितने ही दीनो से उस'से प्यार से बात कर कर के टाइम मांगती आ रही हूँ... 'वो' मुझे धमकी देता है कि अगर मैने उसकी बात जल्द ही नही मानी तो वो मुझे दोस्तों के साथ..." बात अधूरी छ्चोड़ कर मीनू सुबकने लगी..," ये मैने क्या कर दिया भगवान....!"

"आप रो क्यूँ रही हो दीदी..? प्लीज़.. सब ठीक हो जाएगा.. मैं उस'से माफी भी माँग लूँगी.." पिंकी उसके पास जाकर बैठ गयी....," आप जैसा कहोगी मैं वैसा ही कर लूँगी.. आप रोवो मत प्लीज़..."

मीनू ने अपने आँसू पौंच्छ लिए.. पर तनाव उसके चेहरे पर सॉफ झलक रहा था..," कल अगर वो तुम्हे अपनी बाइक पर बैठने को कहे तो बैठना मत... बुल्की तुम बात ही मत करना... वैसे शायद वो मुझसे बात करने के लिए कॉलेज में जाएगा.. ज़रूर!"

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अगले दिन हम अकेले नही गये.. क्लास की कयि लड़कियाँ हमारे साथ थी... स्कूल में जाने के बाद भी हम उनके साथ ही रहे.. पेपर का टाइम होने पर हम अपनी अपनी सीट पर जाकर बैठ गये....

"तुम.. कल घर लेट पहुँची थी क्या?" संदीप ने मेरे पास बैठते ही पूचछा...

अचानक आते ही किए गये इस सवाल से में सकपका गयी.," नही.. हाआँ.. वो मैं पिंकी के साथ थी.."मैने आधा सच बोलते हुए सवाल किया," तुम्हे कैसे पता?"

"तुम्हारी मम्मी शिखा से पूच्छने आई थी... मुझे तो तब घर पहुँचे 2 घंटे हो गये थे...!" संदीप ने बताया और आगे पूचछा," आज की कैसी तैयारी है..?"

मैने कोई जवाब नही दिया.. बस मुस्कुरकर रह गयी... मुझे शर्म आ रही थी उसको 'हेल्प' की कहते हुए...

वो मेरी हालत भाँपते हुए बोला," पर्ची मत करना.. मेरे पेपर से उतारती रहना साथ साथ.. मैं टेढ़ा होकर बैठ जाउन्गा..."

मैने क्रितग्य नज़रों से उसकी और देखा तो वो मुस्कुरा दिया,"तुम पैदल आती हो क्या?"

"हां.." मैने उसकी और बिना देखे कहा.. आज पहली बार मुझे लग रहा था कि वो मुझ पर कुच्छ 'ज़्यादा' ही लत्तु है...

"चाहो तो मेरे साथ चल पड़ना.. पापा की बाइक लाया हूँ मैं आज!" संदीप ने सीधा होकर कहा.. रूम में सर आ गये थे...

"न..नही.. वो पिंकी भी मेरे साथ जाएगी..." मैने सर से नज़रें बचाकर उसकी बात का जवाब दे ही दिया... अपने स्टाइल में..!

कुच्छ देर चुप बैठा रहने के बाद उसकी आवाज़ एक बार फिर मेरे कानो तक आई," कोई बात नही.. वो भी चल पड़ेगी अगर तुम चलना चाहो तो.."

"ठीक है.. मैं बात करके देख लूँगी..!" मैने जवाब दिया और आन्सर सीट मिलते ही सब बच्चे चुप हो गये.. हम दोनो भी....

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एग्ज़ॅम ख़तम होने के बाद मैं बहुत खुश थी.. पिंकी भी.. उसका भी पेपर बहुत अच्च्छा हुआ था.. दरअसल आज कल के मुक़ाबले सख्तयि ना के बराबर थी.. और ना ही कल वाले सर ही हमें कहीं नज़र आए... जैसे ही मैं बाहर निकली, पिंकी खुशी से अपना बोर्ड घूमते हुए मुझसे आ टकराई," मज़े हो गये आज तो!"

संदीप हमसे कुच्छ ही आगे आगे चल रहा था.. जैसे ही हम ऑफीस के सामने से निकले.. मेडम ने हमें टोक दिया," कैसा पेपर हुआ अंजू!" वो दरवाजे के पास खड़ी शायद हमारा ही इंतजार कर रही थी....

"ठीक हो गया मेडम.." मैने सिर झुका कर कहा और ठिठक गयी...

"गुड.. किसी बात की चिंता मत करना बेटा.. समझ गयी ना दोनो!" मेडम ने मुस्कुरकर कहा...

"जी.." मैं और कुच्छ बोलती.. इस'से पहले ही पिंकी ने मेरा हाथ खींच लिया.. और थोड़ी आगे जाकर बोली," आज फिर फँसने का इरादा है क्या?"

"नही.. वो सुन..." मैने उसकी बात को टालते हुए कहा," ववो.. संदीप कह रहा था कि 'वो' आज बाइक लेकर आया है.. हम दोनो को साथ लेकर चलने की कह रहा था.. बोल?"

"अच्च्छा.. पर मुझे डर लग रहा है.. कहीं.." पिंकी अपनी बात बीच में ही छ्चोड़ कर चुप हो गयी...

"देख ले.. मैं तो बस बता रही हूँ.." मैने बात अपने सिर से टाल दी...

"हुम्म.. चल ठीक है.. कहाँ है 'वो'?" पिंकी ने शायद संदीप को हमारे आगे आगे चलते देखा नही था...

"वो रहा.. शायद हमारा ही वेट कर रहा है..!" मैने संदीप की ओर इशारा करते हुए कहा...

"चल...!" उसने कहा और हम दोनो उसके पास जाकर खड़े हो गये..

"क्या सोचा..? चलना है क्या?" संदीप ने मुझसे पूचछा तो मैं पिंकी की और देखने लगी...

"चलो! जल्दी पहुँच जाएँगे और क्या?" पिंकी ने जवाब दिया....

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संदीप बिके बाहर निकाल लाया और हमारे पास लाकर रोक दी.. मैं बैठने के लिए तैयार हो ही रही थी कि पिंकी मुझसे पहले ही उसके पिछे बैठ गयी.. और मुझसे बोली," आ जाओ!"

मैं मन मसोस कर पिंकी के पिछे जा बैठी.. पता नही क्यूँ.. पर मुझे लग रहा था कि मेरे और पिंकी के बीच में ज़्यादा जगह है.. और पिंकी और संदीप के बीच कम... मेरा मुँह सा चढ़ गया.. और हम चल पड़े!

अपने गाँव के स्टॅंड पर पहुँचे ही थे कि किसी ने हाथ देकर संदीप को रोक लिया..," कैसा पेपर हुआ?"

"अच्च्छा हो गया! चल घर आ जा.. आज क्रिकेट खेलने चलेंगे.. कल हिन्दी का पेपर है.." संदीप ने मुस्कुरकर कहा...

"नही यार.. आज नही.. ऐसे अच्च्छा नही लगेगा...!" उस लड़के ने संदीप से कहा...

"क्यूँ? आज क्या हो गया..?" संदीप ने उसी भाव में पूचछा...

"तुम्हे नही पता? ओह्ह.. तुम तो सुबह ही चले गये होगे पेपर देने.. वो किसी ने तरुण को मार दिया.. आज करीब 10 बजे पता लगा... किसी ने उसको कल रात में मार कर चौपाल में फैंक दिया....."

"क्याअ? कौनसा तरुण? अपने वाला?" संदीप के चेहरे का रंग अचानक सफेद हो गया... हमारी तो घिग्गी ही बाँध गयी थी.. हम दोनो डरी डरी सी आँखों से एक दूसरी को देखने लगी...

"हाँ यार.. गाँव में पोलीस आई हुई है.. बेचारा कितना शरीफ था... उस'से किसी ने क्या दुश्मनी निकाली होगी... बेचारा!"

"ओह्ह.. ये तो बहुत बुरा हुआ यार.. मैं अभी उसके घर जाकर आता हूँ.." संदीप ने कहा और पिछे देखने लगा....

"ठीक है.. हम चले जाएँगे..." पिंकी ने कहा और मेरे साथ ही नीचे उतर गयी...

"तुम्हे पढ़ाने आता था ना वो?" संदीप ने पूचछा....

"हां.." पिंकी ने सिर झुका कर कहा और बिना एक भी पल गँवाए चल दी... मैं भी डगमगाते हुए कदमों से उसके पिछे हो ली.....

"ये कैसे हुआ पिंकी?" मैने तरुण का जिकर किया...

"चुप... कुच्छ मत बोल यहाँ..." पिंकी ने कहा और हम गलियों के बीच से घर की ओर चलते रहे.....

हम जल्दी जल्दी चलते हुए पिंकी के घर पहुँच गये.. हम सीधे उपर चले गये..देखा तो मीनू भी वहीं बेड पर लेटी हुई थी.. चाचा चाची दोनो खामोश बैठे थे.. मीनू का चेहरा पीला पड़ा हुआ था...

"क्या हुआ मम्मी?" पिंकी ने सब जानते हुए भी सवाल किया...

"कुच्छ नही.. तुम नीचे जाकर पढ़ लो..!" चाचा ने कहा...

"नही.. वो गाँव में सब कह रहे हैं कि..." पिंकी ने बोला ही था कि चाचा शुरू हो गये....

"हां.. किस्मत के खेल निराले होते हैं बेटी.. कितना शरीफ था बेचारा... मुझे तो अब भी ऐसा लग रहा है कि वो नीचे से आवाज़ दे रहा है.. आख़िरी वक़्त भी ढंग से बात नही कर पाया मैं.. बड़ा पचहतावा हो रहा है.. पढ़ने में कितना तेज था.. उसके मा बाप की तो कमर ही टूट गयी होगी...." पिंकी के पापा भी बहुत दुखी लग रहे थे....

"पर.. पर ये हुआ कैसे?" मैं अपने आपको रोक नही पाई...

"कौन जाने बेटी? अब उसकी किसी से दुश्मनी भी क्या होगी? वो तो ज़्यादा बात भी नही करता था किसी से... भगवान ही जानता है क्या हुआ होगा...?" चाचा ने अपना माथा पकड़ लिया...

"अब छ्चोड़िए ना पापा.. होना था जो हो गया... आप क्यूँ बार बार..." मीनू की आँखें नम हो गयी...

"छ्चोड़ो बेटी.. छ्चोड़ो.." चाचा ने कहा और अपनी आँखें पौन्छ्ते हुए घुटने पर हाथ रखा और उठ गये..,"तू इतना छ्होटा मंन क्यूँ कर रही है.. पिंकी और अंजलि का भी तो भाई ही था 'वो'.. जब ये नही रो रही तो तू क्यूँ... सुबह से... छ्चोड़ बेटी.. होनी का लिखा कोई नही टाल सकता..."

मीनू कंबल में दुबक कर सिसक'ने लगी... मुझसे वहाँ और खड़ा ना रहा गया...," अच्च्छा चाची.. मैं चलती हूँ..!"

"ठीक है बेटी.. जा.. कपड़े बदल ले.. सुबह से कुच्छ खाया भी नही होगा..." चाची भी खड़ी हो गयी और जाकर मीनू के पास बैठ गयी...

मैं अपने घर जाने को पिंकी के घर से बाहर निकली ही थी कि एक मोटा सा थुलथुला पॉलिसिया घर के बाहर आकर खड़ा हो गया...," मीनू का घर आसपास ही है क्या?...?"

मैं हड़बड़ा गयी.. पोलीस वाला भला मीनू को क्यूँ पूच्छ रहा है..," जी.. यही है!" मैने हड़बड़ाहट में ही जवाब दिया...

"ठीक है.. धन्यवाद...!" उसने कहा और वापस हमारे घर की ओर चल दिया...

कुच्छ सोच कर मैं वापस हो ली.. अंदर सीढ़ियों पर जाकर मैने मीनू को आवाज़ दी," दीदी....."

"मीनू.. नीचे अंजू बोल रही है शायद...." उपर से चाचा की आवाज़ मेरे कानो में पड़ी....

कुच्छ देर बाद मीनू नीचे आ गयी.. मेरे पास आते ही वह फफक पड़ी..," आँखों में आँसुओं का झरना सा उमड़ पड़ा," ययए.. ये क्या हो गया अंजू..?"

"पर.. आप रो क्यूँ रही हैं दीदी.. जो हुआ सही हुआ.. हमें क्या मतलब है.. उसके कर्मों का फल मिल गया उसको..." मैने मीनू के कंधे पकड़ते हुए कहा...

"पता नही अंजू.. रह रह कर कलेजा सा फटा जा रहा है... बहुत याद आ रही है उसकी.. उसने धोखा दे दिया तो क्या हुआ.. मैने तो उस'से सच्चा प्यार किया था ना.. कल अगर उसको वापस ना भेजती तो शायद वो..." मीनू बुरी तरह कराहते हुए रोने लगी....

"ना.. दीदी.. प्लीज़.. ऐसा मत करो.. चुप हो जाओ.. मुझे आपको कुच्छ बताना है..." मैने उसके मुँह पर हाथ रख दिया... उसकी आवाज़ कुच्छ देर बाद बंद हो गयी.. पर आँसू नही थामे..,"क्या?"

"वो... एक पोलीस वाला बाहर आया था.. आपका नाम लेकर घर पूच्छ रहा था..." मैने उसके शांत होने के बाद जवाब दिया...

मीनू मेरी बात सुनते ही सुन्न रह गयी.... मुझे ऐसा लगा जैसे यूयेसेस पर एक और पहाड़ टूट पड़ा हो.. वा थरथर कांपति हुई बोली..," मेरा नाम लेकर... पर क्यूँ?"

"पता नही दीदी.. वो कुच्छ नही बोला.. पूच्छ कर वापस चला गया...!" मैने बुरा सा मुँह बना कर कहा...

"हे.. भगवान.. अब क्या होगा..." मीनू में खड़ी रहने तक की हिम्मत नही बची.. मैने उसको संभाला और चारपाई पर लिटा दिया.. अचानक वह निशब्द: सी हो गयी.. पता नही क्या हो गया उसको... मैं घबरा गयी.. मैने चाचा को आवाज़ लगाई," चाचा.. जल्दी आओ..."

मेरी आवाज़ में घबराहट को भाँप कर उपर से चाचा, चाची और पिंकी.. तीनो दौड़े दौड़े नीचे आए,"क्या हुआ?"

"पपता नही... अचानक बेहोश सी हो गयी.." मैने कहा और अलग खड़ी हो गयी...

"मीनू.. मीनू बेटी... पानी लेकर आओ जल्दी..."चाचा ने पिंकी से कहा...

कुच्छ देर बाद मीनू ने आँखें खोल दी.. आँखें खोलते ही वह चाचा से लिपट कर बुरी तरह रोने लगी....

"मान जा बेटी.. तू ऐसा करेगी तो इनका क्या होगा... बस कर.. चुप हो जा..." चाचा उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरने लगे.. कुच्छ देर बाद उसने अपनी आँखें बंद कर ली और धीरे धीरे शांत हो गयी....

थोड़ी देर बाद अचानक दरवाजे पर एक हटटा कॅटा लंबा सा पोलीस वाला प्रकट हुआ.. उसके पिछे वही थुलथुला सा पॉलिसिया खड़ा था... उन्होने अंदर देखा और बिना इजाज़त लिए ही अंदर आ गये.. चाचा, चाची और पिंकी; तीनो उन्न पोलीस वालों को देख कर हड़बड़ा से गये..

"जी कहिए?" चाचा खड़े हो गये...

"हूंम्म्म.." लंबू ने अपना सिर हिलाते हुए आगे कहा," तो........ ये मीनू है!"

"जी.. पर आप क्यूँ पूच्छ रहे हैं..?" चाचा भी उसके मुँह से मीनू का नाम सुनकर घबरा से गये.. पर मीनू आँख बंद किए लेटी रही....

पोलीस वाले ने चाचा की बात का कोई जवाब नही दिया.. चुपचाप खड़ा रहा.. फिर अचानक तेज तर्रार आवाज़ में बोला," क्या हो गया इसको?"

क्रमशः....................................