बाली उमर की प्यास compleet

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raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:29

बाली उमर की प्यास पार्ट--16

गतांक से आगे.......................

"मैं क्या करूँ? मेरी तो कुच्छ समझ में ही नही आ रहा.. मुझे डर लग रहा है.. उसको फोन कैसे करूँगी मैं? वो तो.. वो तो मुझे कॉलेज से ले जाने की बात कर रहा था.. मैं अकेली भला..." मीनू परेशान सी होकर बोल रही थी...

"कल चल पड़ना दीदी.. कल हमारी छुट्टी है.. मैं भी आपके साथ चल पड़ूँगी..!" पिंकी ने उसको सहारा सा देने की कोशिश की...

"नही.. मम्मी पापा कैसे मानेंगे? कोई बहाना भी नही है.. आए अंजू! तू चल पड़ ना मेरे साथ... प्लीज़!" मीनू ने कुच्छ सोचकर कहा," मैं चाचा चाची को बोल के देख लूँगी...!"

"पर.. पर मैं क्या करूँगी दीदी..?" मैने अचकचा कर कहा...

"देख ले यार.. तेरे साथ मुझे भी थोड़ी हिम्मत मिल जाएगी.. हम दोनो को देख कर तो वो भी..." मीनू ने याचना भरी निगाहों से मेरी और देखा...

"ठीक है.. पर.. पापा से पूच्छना पड़ेगा.. 'वो' मना कर सकते हैं.. और फिर बहाना तो वहाँ भी बनाना पड़ेगा कुच्छ.." मैने 'अपनी' तरफ से हां कहते हुए बोला...

"चल.. मैं अभी तेरे साथ घर चलती हूँ... मैं मना लूँगी उनको.. किसी भी तरह..!" मीनू थोड़े उत्साह के साथ बोली...

"पर.. अभी तो हमें एक बार सीखा के घर जाना है.. वो बुला रही थी हमें.. पता नही क्या बात है?" पिंकी बीच में ही बोल पड़ी... मैं तो भूल ही गयी थी..

"ठीक है.. तुम तब तक वहाँ हो आओ.. मैं चाची के पास जा रही हूँ.. चाचा ने अभी पी तो नही रखी होगी ना?" मीनू मुझसे पूच्छने लगी...

"नही.. अभी तो शुरू नही की होगी.. आप अभी चली जाओ.. पर मेरा नाम मत लेना की मुझे जाना है.. पापा मना कर देंगे.." मैने उसको पापा के मेरे बारे में विचारों से अवगत कराया...

"ठीक है.. मैं अभी जा कर आती हूँ.. तुम भी मिल आओ शिखा से.." मीनू ने कहा और बाहर चली गयी.. हम भी चाची को बोलकर संदीप के घर की और चल पड़े....

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हम सीखा के घर में उपर चढ़ ही रहे थे कि नीचे से संदीप का बड़ा भाई 'ढोलू' आ गया.. मुझे उसके असली नाम का नही पता.. गाँव में सब उसको 'ढोलू' ही कहते हैं.... हमारे मूड कर देखते ही वह मुस्कुरकर बोला..," आओ.. आओ.. आज कैसे दर्शन दे दिए देवियो!"

"शिखा है भैया?" पिंकी ने सीढ़ियों में ही खड़े होकर पूचछा....

"उपर तो चलो... यहीं से वापस जाओगी क्या?" उसने हंसते हुए कहा और हमारे पास आकर 'मेरे' कंधे पर हाथ रख लिया..

हम ऐसे ही उपर आ गये.. उसने मेरे कंधे से अपना हाथ नही हटाया... मेरे शरीर में गड़ रही उसकी उंगलियों का दबाव मुझे कुच्छ 'दूसरी' ही तरह का महसूस हुआ... उनकी च्छुअन मेरे स्कूल के टीचर्स की उंगलियों की तरह थी.. जो मौका मिलते ही मेरे बदन पर यहाँ वहाँ 'अपने' हाथ सॉफ करना नही भूलते थे.....

"भाभी जी कहाँ हैं..?" मैने कसमसा कर उनकी पत्नी के बारे में पूचछा..

ढोलू ने अपना हाथ हटा लिया..," वो... वो तो मायके गयी है अपने... 2-4 दिन में आएगी....

"और शिखा...?" पिंकी ने पूचछा...

"वो सब तरुण के घर गये हुए हैं... बस आते ही होंगे.. बैठो...!" ढोलू की नज़रें लगातार मेरी उठती बैठती छातियों पर गढ़ी हुई थी.. शर्ट में उनकी कसावट बाहर से ही सॉफ नज़र आ रही थी...," तब तक टीवी देख लो..!" उसने टीवी चलाया और दूसरे कमरे में चला गया...

करीब 2-4 ही मिनिट हुए होंगे.. ढोलू ने मुझे दूसरे कमरे से आवाज़ दी," इधर आना, अंजू! एक बार!"

मैने पिंकी की तरफ देखा.. वह यूँही हल्क से मुस्कुरा दी.. मैने खड़ी होकर कहा,"शायद मुझे बुला रहा है.. मैं अभी आई..!"

"ठीक है.."पिंकी ने जवाब दिया और फिर टीवी की ओर देखने लगी.. मैं बाहर निकल कर दूसरे कमरे के दरवाजे पर जाकर खड़ी हो गयी..और बड़ी शराफ़त से पूचछा,"क्या?"

"ओह्हो.. अंदर तो आओ!" हाथ में रेवोल्वेर लिए उसकी नली में फूँक मारता हुआ वा बोला... मैं अजीब सी नज़रों से देखती हुई उसके मनो भावों को पढ़ने की कोशिश करते हुए उसके पास जाकर खड़ी हो गयी.. गाँव में सबको पता था कि वह ऐसे ही उल्टे सीधे काम करता रहता है.. इसीलिए उसके हाथ में रेवोल्वेर देख कर मुझे हैरानी नही हुई.....,"हां?"

"तू तो पूरी जवान हो गयी है अंजू! मैने तो तुझे साल भर बाद देखा है.." उसने मेरे पास जाने के बाद रेवोल्वेर एक तरफ रख दी और आँखों ही आँखों में मेरी छातियो का भार सा तोलने लगा....

मैने लजा कर नज़रें झुका ली.. मीनू दीदी ठीक ही कहती थी.. आदमी तो सारे ही 'कुत्ते' होते हैं.. लड़की को तो बस जवान होने की देर होती है..

"हा हा हा.. शर्मा गयी... है ना?" उसने मेरा हाथ पकड़ लिया...

"क्क्या कह रहे थे आप?" मैने अचकचा कर पूचछा.. पिंकी के वहाँ होने का असर मेरे जवाब पर सॉफ दिखाई दे रहा था.. मैं डरी हुई सी थी...

"पहले तो ये बता.. पर्चे (एग्ज़ॅम्स) कैसे जा रहे हैं तेरे...?" वह अब भी मेरे एक हाथ को पकड़े हुए था...

"ठीक जा रहे हैं.. अभी तक!" मैने हड़बड़ाहट में जवाब दिया.. मेरी कलाई पर उसके हाथ की पकड़ मजबूत होती जा रही थी...

"शाबाश! कोई लोचा हो तो बताना.. किसी बात की फिकर मत किया कर.. मस्त रहा कर.. किसी से घबराने की कोई ज़रूरत नही है.. कोई छेड़े तो बस एक बार नाम बता देना... समझ गयी ना!" उसने बोलते हुए रेवोल्वेर उठा कर मुझे दिखाई और वापस तकिये के नीचे रख दी... मुझे पहली बार लगा कि शायद उसने पी रखी है...

मैने अपना सिर हिला दिया.. पर बोल नही पाई...

"हे हे हे.. शरमाते हुए तो तू और भी गजब की लगती है.. क्या जवानी दी है राम ने तुझे! सुना था तेरे बारे में लड़कों से.. पर विश्वास नही था कि तू सच में इतना मस्त माल बन गयी होगी...." बोलते बोलते उसने मेरा दूसरा हाथ भी पकड़ कर अपनी तरफ खींच लिया.. मेरे अपने मंन में पिंकी के इधर आ जाने के डर को छ्चोड़ कर कोई और डर नही था...

उसके मुझे अपनी तरफ खींचते ही मैं खींचती चली गयी... बेड पर बैठे हुए ढोलू का घुटना मेरे घुटनो के बीच आ फँसा.. ना चाहते हुए भी मुझे अपनी जांघें खोल देनी पड़ी.. और मेरे गाल शर्म से लाल हो गये...

"कुच्छ तो बोल अंजू! क्या इरादा है? मुझे भी बाकी लड़कों की तरह तडपाएगी क्या?" ढोलू मुझे धीरे धीरे और भी ज़्यादा अपने पास खींचना जा रहा था.. पर वह शायद इसी कोशिश में था की मैं भी कुच्छ पहल करूँ.. इसीलिए वो पूरा ज़ोर नही लगा रहा होगा...

मैं कुच्छ ना बोली.. घबरा कर अपना चेहरा घुमाया और दरवाजे की ओर देखने लगी...

"थोड़े दिन पहले तेरे बॅग में तुझे एक लव लेटर मिला होगा.. मिला था ना.." उसने एक हाथ से मेरा हाथ छ्चोड़ कर मेरा चेहरा अपनी और घुमा लिया.. मैं तुरंत नीचे देखने लगी... कुच्छ बोल नही पाई...

"बोल ना! मिला था ना लेटर?" उसने दोबारा पूचछा.. तो मैने 'हां' में सिर हिला दिया...

"वो अपना खास चेला है.. एक नंबर. का बच्चा है.. बहुत नाम कमाएगा.. हे हे हे.. नाम बताउ उसका?" ढोलू ने मेरे स्कर्ट का सामने वाला निचला सिरा पकड़ कर अपने हाथ में ले लिया...

मैं कुच्छ नही बोल पाई.. उसकी इन छ्होटी छ्होटी हरकतों से मेरे बदन में वासना का तूफान सा उठने लगा था....

"बोल ना.. नाम बता दूँ क्या?" ढोलू मेरी स्कर्ट के कपड़े को धीरे धीरे अपनी हथेली में लपेट'ता जा रहा था..

"पिंकी आ जाएगी.." मैने उसकी आँखों में देख कर अपने डर की वजह बताई...

"चल पागल.. मेरे होते हुए भी डरती है.. सुन! शीलू है 'वो' .. तेरी जवानी पर बहुत मरता है.. उसी ने मुझे बोला था.. संदीप से तेरे लिए एक धान्सु सा गरमा गरम 'लव लेटर' लिखवाने को.. मस्त लिखा हुआ था ना?" ढोलू की इस बात ने तो मेरा दिल बुरी तरह धड़का दिया....

"क्या? संदीप....." मैने लगभग उच्छलते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी....

"हां.. पर ये बात संदीप से मत पूच्छना.. उसने शीलू से कसम ली है कि 'वो' किसी को नही बताएगा.. समझ गयी ना..." मुझे अहसास भी नही हुआ कि कब उसने मेरी स्कर्ट को आगे से पूरा लपेट लिया.. जैसे ही मेरी 'कछी' के किनारों पर उसकी उंगलियों का अहसास हुआ.. मैने घबराकर एक बार झुक कर अपनी नंगी हो चुकी जांघों; एक बार बाहर दरवाजे की और; और फिर कसमसाते हुए उसकी आँखों में देखा....

"नही बोलेगी ना किसी को भी.. ये अंदर की बातें होती हैं पागल.. ऐसी बातें बाहर नही बताते.... नही बताएगी ना तू.." ढोलू ने अपना घुटना मेरी टाँगों के बीच से निकाला और मुझे पुर ज़ोर से अपनी ओर खींच लिया.. उसका चेहरा मेरी चूचियो से आकर टकराया.. शराब की गंध मेरे नथुनो में समा गयी.. उसका एक हाथ मेरे हाथ को पकड़े हुए अपने लिंग पर था.. मेरी हालत खराब हो गयी...

मेरी साँसों को तेज होते देख वह उत्साहित सा होकर बोला,"बोल ना मेरी रानी.. किसी को कुच्छ नही बताएगी ना..!"

"नही!" मैने अपने सिर को हल्का सा हिला कर अपना जवाब दिया.. और बग्लें झाँकने लगी...

"दे देगी ना शीलू को.. तेरा दीवाना है वो.. मदारचोड़ पागल सा हो गया है.. जब से तूने स्कूल जाना बंद किया है.. मेरी मान ले.. दे देगी ना उसको?" ढोलू ने कहते हुए मेरे हाथ को अपने हाथ के नीचे लेकर अपने लिंग पर दबा दिया..

'वो' पल तो मैं जिंदगी भर नही भूल सकती.. उसके बिना कहे ही मैने अपनी उंगलियों का घेरा बना कर उसके 'लिंग' को कसकर अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया और सिसकते हुए बोली," आआह... हाआ.. दे दूँगी... पर कहाँ दूं..?"

"हाए मेरी जान.. तेरी मुट्ठी कितनी गरम है.. तेरी चूत कैसी होगी साअलीईई.." वह पागला सा गया.. मेरी स्कर्ट को उपर उठा कर उसने हाथ को आगे कछी में फँसा कर नीचे सरका दिया..," ओह तेरी मा का लौदा.... ऐसी गौरी ओर चिकनी चूत तो मैने जिंदगी भर नही देखी.. ये तो अभी से टपक रही है..."

ढोलू ने एक उंगली मेरी योनि की फांकों में घुमाई और उसको बाहर निकाल कर मेरी और अपनी आँखों के सामने करके ऐसे खुश हुआ मानो मधु मक्खियों के छत्ते से शहद निकाल लाया हो... ," तेरी चूत तो मैं लूँगा... छ्चोड़ साले बेहन के लौदे को.. 'उस' पिद्दी की औलाद को इस माल की क्या कदर होगी.. 'वो' भी साला तेरी ओर देखेगा तो उसकी गांद में गोली मार दूँगा सीधी.... तू तो एक नंबर का सामान है.. बोल कब देगी मुझे?"

उसकी बातों और हरकतों से मैं भी पागल सी हो चुकी थी.. मुझे 'वैसे' भी इस बात से कोई फ़र्क़ नही पड़ना था कि मेरी जवानी से 'वो' बेहन का लौदा खेले ये 'ये' बेहन का लौदा... पर मैं इतनी मदहोश हो चुकी थी कि बात का जवाब देना ही भूल गयी...

"बोल ना मेरी रंगीली छमियिया.. अब मैं तेरी चूत मारे बिना नही मानूँगा.. देगी ना मुझे.. लेगी ना मेरा लौदा अपनी चूत में..?" वा मेरा हाथ छ्चोड़ कर दोनो हाथों को स्कर्ट में पिछे ले जाकर मेरे नितंबों को बुरी तरह मसलता हुआ बोला.....

"आआआआहह!" मैं सिसकते हुए बोली," पर कहाँ लूऊऊँ.." मेरी आँखें बंद हो गयी.. मैं सब कुच्छ भूल चुकी थी....

"यहीं ले ले रानी.. अभी ले ले..." उसने जाकर दरवाजा बंद किया और वापस आकर बैठते ही अपनी पॅंट की ज़िप खोल कर अपना फंफनता हुआ लिंग बाहर निकाल लिया...

मैं डर गयी..," नही.. अभी नही.. पिंकी है यहाँ..!"

"अर्र्र्र्रररीईयययी.." उसने मेरी एक ना सुनी और मुझे उठाकर अपनी गोद में बैठाते हुए मेरी टाँगों को अपनी कमर के दोनो और पिछे निकाल दिया...," वो तो टीवी देख रही है... बस दो मिनिट की बात है.. एक बार तो यहीं घुस्वा कर देख ले.. तेरी चूत को भी मेरे लौदे का चस्का लग जाएगा.."

उसने कहते ही मेरी कछी मेरे घुटनो तक नीचे सरका दी और मेरे घुटनो को मोड़ कर मुझे और आगे सरकाते हुए अपने लिंग पर बैठा लिया.. उसका लिंग मेरे नितंबों की दरार के बीचों बींच फँसा खड़ा था.. और मेरी योनि की फाँकें उसकी मोटाई के अनुरूप फैल कर उस पर टिकी हुई थी..

अपने लिंग को मेरे योनि के च्छेद पर टिकाने के लिए उसने मुझे उपर उकसाया ही था कि तभी दरवाजा खुला.. मेरे कानो में 'सॉरी भाई' बोलने की आवाज़ आई और दरवाजा फिर से बंद हो गया.....

हड़बड़ा कर उसने मुझे छ्चोड़ दिया.. आवाज़ संदीप की थी.. मैं खड़ी होकर अपनी कछी को उपर सरकाते हुए रोने लगी..," तुमने दरवाजा बंद क्यूँ नही किया.."

"इसकी मा की चूत.. इस दरवाजे पर अंदर कुण्डी नही है.. पर तू चिंता क्यूँ कर रही है.. कुच्छ नही होगा... " ढोलू अपनी पॅंट की ज़िप बंद करता हुआ बोला...

"संदीप ने देख लिया..." मैं रोती हुई बोली....

"तू रो क्यूँ रही है मेरी रानी.. मैं तेरा यार हूँ.. और वो मेरा भाई.. क्या हुआ जो उसने देख लिया तो.. ये बता.. कब आएगी मेरे पास..?"

मैं कुच्छ नही बोली.. खड़ी खड़ी सुबक्ती रही...

"मोबाइल है तेरे पास?" ढोलू ने मेरा हाथ वापस पकड़ लिया.. मैं 'ना' में सिर हिलाते हुए अपने आँसू पौंच्छने लगी....

"देख.. तेरे यार के पास तीन मोबाइल हैं.. जो मर्ज़ी ले जा.. बस मेरे नाम के अलावा कोई भी फोन आए तो उठाना मत.. तेरे पास जब भी मौका हो.. मुझे फोन करके बुला लेना.. या मैं बुला लूँगा.. ले ले.. कोई भी एक फोन उठा ले..." उसने अपने तीनो मोबाइल मेरे आगे रख दिए...

"नही.. मैं फोन नही रख सकती.. घर में पता चल जाएगा किसी को.." मैने इनकार में अपना सिर हिलाते हुए कहा...

"अरे.. वाइब्रेशन कर दूँगा मेरी रानी.. अपनी छातियो में छुपा कर रखना.. जब भी मेरा फोन आएगा.. तेरी चूचियो में गुदगुदी सी होगी... किसी को पता नही चलेगा रानी.. ले ले..." उसने अपने आप ही एक मोबाइल को सेट्टिंग्स चेंज करके मेरी स्कर्ट की जेब में डाल दिया," जा अब.. चिंता मत करना किसी भी बात की... और हां.. शिखा आज ही मामा के घर चली गयी है.. 2-3 दिन बाद आएगी तो मैं फोन करके बता दूँगा..... अब तुम आराम से घर जाओ.. चिंता नही करना.. किसी भी बात की.. मैं हूँ ना... तेरा यार!"


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:29

gataank se aage..............

"Main kya karoon? meri toh kuchh samajh mein hi nahi aa raha.. mujhe darr lag raha hai.. usko phone kaise karoongi main? wo toh.. wo toh mujhe college se le jane ki baat kar raha tha.. main akeli bhala..." Meenu pareshan si hokar bol rahi thi...

"Kal chal padna didi.. kal hamari chhutti hai.. main bhi aapke sath chal padoongi..!" Pinky ne usko sahara sa dene ki koshish ki...

"nahi.. mummy papa kaise maanenge? koyi bahana bhi nahi hai.. Aey Anju! tu chal pad na mere sath... plz!" Meenu ne kuchh sochkar kaha," Main chacha chachi ko bol ke dekh loongi...!"

"Par.. par main kya karoongi didi..?" Maine achkacha kar kaha...

"Dekh le yaar.. tere sath mujhe bhi thodi himmat mil jayegi.. hum dono ko dekh kar toh wo bhi..." Meenu ne yachna bhari nigaahon se meri aur dekha...

"Theek hai.. par.. papa se poochhna padega.. 'wo' mana kar sakte hain.. aur fir bahana toh wahan bhi banana padega kuchh.." Maine 'apni' taraf se haan kahte huye bola...

"Chal.. main abhi tere sath ghar chalti hoon... main mana loongi unko.. kisi bhi tarah..!" Meenu thode utsaah ke sath boli...

"Par.. abhi toh hamein ek baar Sikha ke ghar jana hai.. wo bula rahi thi hamein.. pata nahi kya baat hai?" Pinky beech mein hi bol padi... main toh bhool hi gayi thi..

"Theek hai.. tum tab tak wahan ho aao.. main chachi ke paas ja rahi hoon.. chacha ne abhi pi toh nahi rakhi hogi na?" Meenu mujhse poochhne lagi...

"Nahi.. abhi toh shuru nahi ki hogi.. aap abhi chali jao.. par mera naam mat lena ki mujhe jana hai.. papa mana kar denge.." Maine usko papa ke mere baare mein vicharon se awgat karaya...

"Theek hai.. main abhi ja kar aati hoon.. tum bhi mil aao Shikha se.." Meenu ne kaha aur bahar chali gayi.. hum bhi chachi ko bolkar Sandeep ke ghar ki aur chal pade....

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Hum Sikha ke ghar mein upar chadh hi rahe the ki neeche se Sandeep ka bada bhai 'Dholu' aa gaya.. Mujhe uske asli naam ka nahi pata.. Gaanv mein sab usko 'Dholu' hi kahte hain.... Hamare mud kar dekhte hi wah muskurakar bola..," aao.. aao.. aaj kaise darshan de diye deviyo!"

"Shikha hai bhaiya?" Pinky ne seedhiyon mein hi khade hokar poochha....

"Upar toh chalo... yahin se wapas jaaogi kya?" Usne hanste huye kaha aur hamare paas aakar 'mere' kandhe par hath rakh liya..

Ham aise hi upar aa gaye.. usne mere kandhe se apna hath nahi hataya... Mere shareer mein gad rahi Uski ungaliyon ka dabaav mujhe kuchh 'dusri' hi tarah ka mahsoos huaa... Unki chhuan mere School ke teachers ki ungaliyon ki tarah thi.. jo mouka milte hi mere badan par yahan wahan 'apne' hath saaf karna nahi bhoolte the.....

"Bhabhi ji kahan hain..?" Maine kasmasa kar unki patni ke baare mein poochha..

Dholu ne apna hath hata liya..," Wo... wo toh mayke gayi hai apne... 2-4 din mein aayegi....

"Aur Shikha...?" Pinky ne poochha...

"Wo sab Tarun ke ghar gaye huye hain... bus aate hi honge.. baitho...!" Dholu ki najrein lagatar meri uthti baithti chhatiyon par gadi huyi thi.. Shirt mein unki kasawat bahar se hi saaf nazar aa rahi thi...," tab tak TV dekh lo..!" Usne TV chalaya aur dusre kamre mein chala gaya...

Kareeb 2-4 hi minute huye honge.. Dholu ne mujhe dusre kamre se aawaj di," Idhar aana, Anju! ek baar!"

Maine Pinky ki taraf dekha.. wah yunhi hulke se muskura di.. Maine khadi hokar kaha,"Shayad mujhe bula raha hai.. main abhi aayi..!"

"Theek hai.."Pinky ne jawab diya aur fir TV ki aur dekhne lagi.. Main bahar nikal kar dusre kamre ke darwaje par jakar khadi ho gayi..aur badi sharaafat se poochha,"Kya?"

"Ohho.. andar toh aao!" Hath mein revolver liye uski nali mein foonk maarta hua wah bola... Main ajeeb si najron se dekhti huyi uske mano bhavon ko padhne ki koshish karte huye uske paas jakar khadi ho gayi.. Gaanv mein sabko pata tha ki wah aise hi ulte seedhe kaam karta rahta hai.. isiliye uske hath mein revolver dekh kar mujhe hairani nahi huyi.....,"Haan?"

"Tu toh poori jawaan ho gayi hai Anju! maine toh tujhe saal bhar baad dekha hai.." Usne mere paas jane ke baad revolver ek taraf rakh di aur aankhon hi aankhon mein meri chhatiyon ka bhar sa tolne laga....

Maine laja kar najrein jhuka li.. Meenu didi theek hi kahti thi.. aadmi toh sare hi 'kutte' hote hain.. ladki ko toh bus jawaan hone ki der hoti hai..

"Ha ha ha.. sharma gayi... hai na?" Usne mera hath pakad liya...

"Kkya kah rahe the aap?" Maine achkacha kar poochha.. Pinky ke wahan hone ka asar mere jawaab par saaf dikhayi de raha tha.. main dari huyi si thi...

"Pahle toh ye bata.. parche (Exams) kaise ja rahe hain tere...?" Wah ab bhi mere ek hath ko pakde huye tha...

"Theek ja rahe hain.. abhi tak!" Maine hadbadahat mein jawab diya.. Meri kalayi par uske hath ki pakad majboot hoti ja rahi thi...

"Shabaash! koyi locha ho toh batana.. kisi baat ki fikar mat kiya kar.. mast raha kar.. kisi se ghabrane ki koyi jarurat nahi hai.. koyi chhede chhude toh bus ek baar naam bata dena... Samajh gayi na!" Usne bolte huye revolver utha kar mujhe dikhayi aur wapas takiye ke neeche rakh di... Mujhe pahli baar laga ki shayad usne pi rakhi hai...

Maine apna sir hila diya.. par bol nahi payi...

"He he he.. Sharmate huye toh tu aur bhi gajab ki lagti hai.. kya jawani di hai ram ne tujhe! Suna tha tere baare mein ladkon se.. par vishvas nahi tha ki tu sach mein itna mast maal ban gayi hogi...." Bolte bolte usne mera dusra hath bhi pakad kar apni taraf kheench liya.. Mere apne mann mein Pinky ke idhar aa jane ke darr ko chhod kar koyi aur darr nahi tha...

Uske mujhe apni taraf kheenchte hi main khinchti chali gayi... Bed par baithe huye Dholu ka ghutna mere ghutno ke beech aa fansa.. na chahte huye bhi mujhe apni jaanghein khol deni padi.. aur mere gaal sharm se laal ho gaye...

"Kuchh toh bol Anju! kya iraada hai? Mujhe bhi baki ladkon ki tarah tadpayegi kya?" Dholu mujhe dheere dheere aur bhi jyada apne paas kheenchna ja raha tha.. par wah shayad isi koshish mein tha ki main bhi kuchh pahal karoon.. isiliye wo poora jor nahi laga raha hoga...

Main kuchh na boli.. ghabra kar apna chehra ghumaya aur darwaje ki aur dekhne lagi...

"thode din pahle tere bag mein tujhe ek love letter mila hoga.. mila tha na.." Usne ek hath se mera hath chhod kar mera chehra apni aur ghuma liya.. main turant neeche dekhne lagi... kuchh bol nahi payi...

"Bol na! Mila tha na letter?" Usne dobara poochha.. toh maine 'haan' mein sir hila diya...

"Wo apna khas chela hai.. ek no. ka bachcha hai.. bahut naam kamayega.. he he he.. naam bataaun uska?" Dholu ne mere skirt ka saamne wala nichla sira pakad kar apne hath mein le liya...

Main kuchh nahi bol payi.. uski inn chhoti chhoti harkaton se mere badan mein waasna ka toofan sa uthne laga tha....

"Bol na.. naam bata doon kya?" Dholu meri skirt ke kapde ko dheere dheere apni hatheli mein lapet'ta ja raha tha..

"Pinky aa jayegi.." Maine uski aankhon mein dekh kar apne darr ki wajah batayi...

"Chal pagal.. mere hote huye bhi darti hai.. Sun! Sheelu hai 'wo' .. teri jawani par bahut marta hai.. usi ne mujhe bola tha.. Sandeep se tere liye ek dhansu sa garma garam 'love letter' likhwane ko.. Mast likha hua tha na?" Dholu ki iss baat ne toh mera dil buri tarah dhadka diya....

"Kyaaaaa? Sandeee....." Maine lagbhag uchhalte huye apni pratikriya di....

"Haan.. par ye baat Sandeep se mat poochhna.. usne Sheelu se kasam li hai ki 'wo' kisi ko nahi batayega.. Samajh gayi na..." Mujhe ahsaas bhi nahi hua ki kab usne meri skirt ko aage se poora lapet liya.. jaise hi meri 'kachchhi' ke kinaron par uski ungaliyon ka ahsaas hua.. maine ghabrakar el baar jhuk kar apni nangi ho chuki jaanghon; ek baar bahar darwaje ki aur; aur fir kasmasate huye uski aankhon mein dekha....

"Nahi bolegi na kisi ko bhi.. ye andar ki baatein hoti hain pagal.. aisi baatein bahar nahi batate.... nahi batayegi na tu.." Dholu ne apna ghutna meri taangon ke beech se nikala aur mujhe poore jor se apni aur kheench liya.. uska chehra meri chhatiyon se aakar takraya.. Sharaab ki gandh mere nathunon mein sama gayi.. uska ek hath mere hath ko pakde huye apne ling par tha.. Meri halat kharaab ho gayi...

Meri saanson ko tej hote dekh wah utsahit sa hokar bola,"Bol na meri Rani.. kisi ko kuchh nahi batayegi na..!"

"Nahi!" Maine apne sir ko hulka sa hila kar apna jawab diya.. aur baglein jhankne lagi...

"De degi na Sheelu ko.. tera deewana hai wo.. madarchod pagal sa ho gaya hai.. jab se tune school jana band kiya hai.. meri maan le.. de degi na usko?" Dholu ne kahte huye mere hath ko apne hath ke neeche lekar apne ling par daba diya..

'Wo' pal toh main jindagi bhar nahi bhool sakti.. Uske bina kahe hi maine apni ungaliyon ka ghera bana kar uske 'ling' ko kaskar apni mutthi mein pakad liya aur sisakte huye boli," aaaah... haaaan.. de doongi... par kahan doon..?"

"Haye meri jaan.. teri mutthi kitni garam hai.. teri choot kaisi hogi saaaliiiiii.." Wah pagla sa gaya.. meri skirt ko upar utha kar usne hath ko aage kachchhi mein fansa kar neeche sarka diya..," Oh teri maa ka louda.... aisi gouri aur chikni choot toh maine jindagi bhar nahi dekhi.. ye toh abhi se tapak rahi hai..."

Dholu ne ek ungali meri yoni ki faankon mein ghumayi aur usko bahar nikal kar meri aur apni aankhon ke saamne karke aise khush hua mano madhu makkhiyon ke chhatte se shahad nikal laya ho... ," Teri choot toh main loonga... chhod saale behan ke loude ko.. 'uss' piddi ki aulaad ko iss maal ki kya kadar hogi.. 'wo' bhi sala teri aur dekhega toh uski gaand mein goli maar doonga seedhi.... tu toh ek number ka samaan hai.. bol kab degi mujhe?"

Uski baaton aur harkaton se main bhi pagal si ho chuki thi.. mujhe 'waise' bhi iss baat se koyi farq nahi padna tha ki meri jawani se 'wo' behan ka louda khele ye 'ye' behan ka louda... Par main itni madhosh ho chuki thi ki baat ka jawaab dena hi bhool gayi...

"Bol na meri rangeeli chhamiya.. ab main teri choot mare bina nahi maanoonga.. degi na mujhe.. legi na mera louda apni choot mein..?" wah mera hath chhod kar dono hathon ko skirt mein pichhe le jakar mere nitambon ko buri tarah masalta hua bola.....

"aaaaaaaahhhh!" Main sisakte huye boli," Par kahan loooooon.." Meri aankhein band ho gayi.. main sab kuchh bhool chuki thi....

"Yahin le le rani.. abhi le le..." Usne jakar darwaja band kiya aur wapas aakar baithte hi apni pant ki zip khol kar apna fanfanata hua ling bahar nikal liya...

Main darr gayi..," Nahi.. abhi nahi.. Pinky hai yahan..!"

"Arrrrrrreeeeyyyy.." Usne meri ek na suni aur mujhe uthakar apni god mein baithate huye meri taangon ko apni kamar ke dono aur pichhe nikal diya...," wo toh TV dekh rahi hai... bus do minute ki baat hai.. ek baar toh yahin ghuswa kar dekh le.. teri choot ko bhi mere loude ka chaska lag jayega.."

Usne kahte hi meri kachchhi mere ghutno tak neeche sarka di aur mere ghutno ko mod kar mujhe aur aage sarkate huye apne ling par baitha liya.. uska ling mere nitambon ki daraar ke beechon beench fansa khada tha.. aur meri yoni ki faankein uski motayi ke anuroop fail kar uss par tiki huyi thi..

Apne ling ko mere yoni ke chhed par tikane ke liye usne mujhe upar uksaya hi tha ki tabhi darwaja khula.. Mere kaano mein 'sorry bhai' bolne ki aawaj aayi aur darwaja fir se band ho gaya.....

Hadbada kar usne mujhe chhod diya.. aawaj Sandeep ki thi.. Main khadi hokar apni kachchhi ko upar sarkate huye rone lagi..," Tumne darwaja band kyun nahi kiya.."

"Iski maa ki choot.. iss darwaje par andar kundi nahi hai.. par tu chinta kyun kar rahi hai.. kuchh nahi hoga... " Dholu apni pant ki zip band karta hua bola...

"Sandeep ne dekh liya..." main roti huyi boli....

"Tu ro kyun rahi hai meri rani.. main tera yaar hoon.. aur wo mera bhai.. kya hua jo usne dekh liya toh.. ye bata.. kab aayegi mere paas..?"

Main kuchh nahi boli.. khadi khadi subakti rahi...

"Mobile hai tere paas?" Dholu ne mera hath wapas pakad liya.. Main 'na' mein sir hilate huye apne aansoo pounchhne lagi....

"Dekh.. tere yaar ke paas teen mobile hain.. jo marji le ja.. bus mere naam ke alawa koyi bhi fone aaye toh uthana mat.. tere paas jab bhi mouka ho.. mujhe fone karke bula lena.. ya main bula loonga.. le le.. koyi bhi ek fone utha le..." Usne apne teeno mobile mere aage rakh diye...

"Nahi.. main fone nahi rakh sakti.. ghar mein pata chal jayega kisi ko.." Maine inkaar mein apna sir hilate huye kaha...

"Arey.. vibration kar doonga meri rani.. apni chhatiyon mein chhupa kar rakhna.. jab bhi mera fone aayega.. teri chhatiyon mein gudgudi si hogi... kisi ko pata nahi chalega Rani.. le le..." Usne apne aap hi ek mobile ko settings change karke meri skirt ki jeb mein daal diya," ja ab.. chinta mat karna kisi bhi baat ki... aur haan.. Shikha aaj hi mama ke ghar chali gayi hai.. 2-3 din baad aayegi toh main fone karke bata doonga..... ab tum aaram se ghar jao.. chinta nahi karna.. kisi bhi baat ki.. main hoon na... tera yaar!"

kramshah...........................


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:30

बाली उमर की प्यास पार्ट--17

गतांक से आगे.......................

मैने अपनी जेब में हाथ मार कर मोबाइल के कारण उभर सी गयी स्कर्ट को ठीक किया और बिना कोई जवाब दिए दरवाजा खोलकर बाहर निकल गयी..

संदीप पिंकी के साथ दूसरे कमरे में चुपचाप बैठा था.. पर मैं उसकी तरफ देख नही पाई..," चलें... पिंकी!"

"हाँ.. एक मिनिट.." पिंकी ने खड़े होकर मुझसे कहा और संदीप की ओर पलट गयी..," परसों तक आ जाएगी ना शिखा?"

"मैं.. बता दूँगा.." मुझे संदीप की आवाज़ आई.. मैं पहले ही बाहर की ओर अपना चेहरा घुमा चुकी थी.. पिंकी के बाहर आते ही हम सीढ़ियों से नीचे उतर गये...

"क्या कह रहा था ढोलू?" गली में आते ही पिंकी ने मुझसे पूचछा...

"एयेए.. हाआँ.. कुच्छ नही.. बस..." मैं उसका सवाल सुनकर हड़बड़ा गयी...

"तो फिर 10 मिनिट से उसके पास क्या कर रही थी...? अच्च्छा लड़का नही है वो.. इसके घर वाले भी इस'के काम धंधों से परेशान रहते हैं... तुझे ज़्यादा देर उसके पास नही रुकना चाहिए था..." पिंकी ने मुझे हिदायत सी देते हुए कहा....

"हां.. मुझे पता है.. पर मैं क्या करती.. इधेर उधर की बातें करता रहा.. पर्चे कैसे चल रहे हैं.. कोई दिक्कत तो नही है.. वग़ैरह वग़ैरह.. इसके पास तो रेवोल्वेर भी है.. मुझे दिखा रहा था.. बोल रहा था कि कोई प्राब्लम हो तो बता देना..." मैं अपने आप को बचाते हुए बातें बताने लगी...

"चल छ्चोड़.. हम दीदी को वो बात तो बताना भूल ही गये.. मनीषा वाली.." मैने बीच में ही रुक कर उसको बताया....

"अर्रे हाँ!.." पिंकी ने जवाब दिया..," चल.. जल्दी घर चल...

हम घर पहुँचे तो मीनू वापस आ चुकी थी.. घर के अंदर जाते ही वो मुझे कहने लगी..," चाचा मान गये.. कल तू मेरे साथ ही चलना..!"

मैने उसकी बात पर हल्की सी प्रतिक्रिया देते हुए कहा..," हाँ.. पर एक बात ग़लत हो गयी दीदी!"

"क्या?" मीनू ने चिंतित होते हुए पूचछा...

"वो.. हमने कल इनस्पेक्टर को ये कहा था ना कि तरुण परसों यहाँ से 11 बजे गया है......" मुझे मीनू ने बीच में ही रोक दिया..," एक मिनिट.. पिंकी.. मम्मी पापा तरुण के घर गये हैं.. तू चाय बना ला भाग कर...!"

"क्या दीदी? मुझे हमेशा अपने पास से उठा कर भगा देते हो.. मुझे सब पता है.. जो ये आपको बताएगी..." पिंकी ने अपना मुँह चढ़ा कर कहा....

"वो बात नही है पागल.. सच में चाय का दिल कर रहा है.. जब तक अंजू बात बता रही है.. तू भाग कर चाय बना ला.. प्ल्स!" मीनू ने याचना सी करते हुए कहा...

"ठीक है..!" पिंकी ने मुँह लटकाया और उपर चली गयी....

"तू पहले एक बात बता अंजू! कल अगर वो इनस्पेक्टर कुच्छ उल्टा सीधा बोलने लगा तो..?" मीनू ने पिंकी के जाते ही मुझसे कहा....

"क्या मतलब दीदी? मैं समझी नही" मैने कहा...

"वो.. मेरा कहने का मतलब है कि उसके पास वो 'लेटर्स' हैं.. अगर वो भी मुझे ब्लॅकमेल करने लगा तो..?" मीनू ने उदास होकर कहा...

"तो..." मैं चुपचाप उसके चेहरे को यूँही देखती रही..," मैं क्या बताउ दीदी?"

"चल छ्चोड़.. कल ही पता लगेगा.. उसके मॅन में क्या है.. तू क्या बता रही थी..." मीनू वापस मेरी बात पर आकर बोली...

" वो.. मानीषा है ना.. ट्रॅक्टर वाली....!" मैने कहा...

"हां.. क्या हुआ ?"

"उसने परसों रात 9:00 बजे के आसपास चौपाल में लड़ाई की आवाज़ सुनी थी.. उसने शायद इनस्पेक्टर को भी बता दी....!" मैने कहा...

"तो इसमें....!" मीनू बोलते बोलते अचानक रुकी और बात समझ में आते ही उसकी टोन बदल गयी," हे भगवान.. कब बताई उसने इनस्पेक्टर को ये बात?"

"शायद यहाँ आने से पहले ही उसको पता चल गया होगा.. तभी तो मुझे दोबारा ठीक से सोच कर बताने को बोल रहा था...!" मैने मीनू की तरह ही मरा सा मुँह बना कर कहा....

"ओह्ह.. इस'से तो हमारी झूठ पकड़ी जाएगी... इस बात पर तो हम अड़ भी सकते हैं.. पर अगर तरुण को किसी ने ग्यारह बजे से पहले ही मार दिया होगा तो हम ज़रूर झूठे हो जाएँगे... पोस्ट्मॉर्टम रिपोर्ट में तो सब कुच्छ आ जाएगा... फिर हम क्या कहेंगे...." मीनू रोने को हो गयी....

"एक बात कहूँ दीदी.. बुरा ना मानो तो.." मेरे दिमाग़ में कुच्छ आया था....

"हां.. बोल.. अब इस'से बुरा क्या होगा मेरे साथ..!" मीनू पूरी तरह हताश हो चुकी थी...

"वो.. मैं ये कह रही हूं कि उसको लेटर्स तो मिल ही चुके हैं... आप उसको सब सच सच क्यूँ नही बता देते.. कि वो आपको ब्लॅकमेल कर रहा था... उन्न लेटर्स के लिए.... फिर हम ये भी बोल देंगे कि हमने इसी बात को छिपाने के लिए झूठ बोला था..." मैने कहा....

मीनू कुच्छ देर तक चुपचाप बैठी सोचती रही... उसने मेरी बात पर कोई प्रतिक्रिया नही दी..," पर वो तो पिछे पड़ा है कि मुझे कातिल के बारे में पता है.. मैं कातिल कहाँ से लाकर दूँ उसको...."

तभी पिंकी चाय लेकर आ गयी," फँस गये ना हम दीदी?" उसने आते ही पूचछा...

"क्यूँ..? क्यूँ डरा रही है...?" मीनू ने हड़बड़ा कर कहा..

"नही.. वो 11 बजे वाली बात तो इनस्पेक्टर को पता लग गयी ना.. कि हमने झूठ बोला था...!"

मीनू ने पिंकी की बात का कोई जवाब नही दिया... तभी मैने प्रिन्सिपल मेडम की बात छेड़ दी..," एक बात और बताई है प्रिन्सिपल मेडम ने.. आज मुझे!"

"हां.. वो क्या कह रही थी तुझे.. अकेले में बुला कर...!" पिंकी ने पूचछा.....

" तरुण और सोनू परसों वापस स्कूल में गये थे.. सर से अकेले में कुच्छ बात की थी उन्होने.. मेडम कह रही थी कि ज़रूर उन्होने सर के साथ कोई समझौता किया था.. शायद उस रेकॉर्डिंग को दिखा कर ही डराया होगा उनको... तरुण उस दिन कह भी रहा था.. कि वो मास्टर अब कहाँ जाएगा बच कर...!" मैने उनको याद दिलाया...

"हाँ.. पर इस बात का क्या मतलब है?" मीनू ने मेरे बात बताने का मकसद पूचछा...

"मेडम बता रही थी कि उस मास्टर की पहुँच काफ़ी उपर तक है.. शराब के ठेके लेने जैसे कयि धंधे हैं उसके.. ऐसे आदमी ख़तरनाक तो होते ही हैं..." मैने आगे कहा....

"मतलब.. उस मास्टर ने तरुण को...." मीनू अचानक चुप हो गयी.. और फिर बोली..," पर उसको क्या पता कि तरुण हमारे पास आता है.. और उसको तरुण का घर भी कैसे पता होगा...." मीनू सोचते हुए बोली...

"मैं आज दिन भर यही सोच रही थी दीदी... सर को पता था कि तरुण हमारे गाँव का ही है.. फिर गाँव में आकर तरुण का घर पता करना मुश्किल नही है... हो सकता है उन्होने किसी को इस काम के लिए लगा दिया हो... और तरुण जब लेटर लेने के लिए घर गया हो तो वो आदमी तरुण के पिछे पिछे आ गया हो... और मौका देख कर मार कर चौपाल में...." मैने दिन भर इस बात पर की हुई मथापच्ची का निचोड़ उनको सुना दिया....

"हूंम्म्म..." मीनू मेरी बात पर सहमति जताते हुए बोली..," ज़रूर यही हुआ होगा.. तो क्या हम ये बात इनस्पेक्टर को बता दें..?"

"पर.. इस'से पिंकी की और मेरी पोले भी खुल जाएगी.. अगर वो इनस्पेक्टर सर के पास पहुँच गया तो..!" मैने डरते हुए कहा...

"फिर इस इनस्पेक्टर से पिच्छा कैसे च्चुड़ायें यार..? 'वो' तो मेरे पिछे ही पड़ा रहेगा.. जब तक कातिल नही पकड़ा जाता...!" मीनू रुनवासी सी होकर बोली....

"पहले कल आप सिर्फ़ वो ब्लॅकमेलिंग वाली बात बता कर देख लो दीदी.. बाद में सोच लेना..." मैने कहा...

"कल मेरे साथ चल तो रही है ना.. तू भी?" मीनू ने मुझसे पूचछा...

"हां.. चल पड़ूँगी दीदी.. पर प्लीज़.. ये बात मेरे सामने मत बताना उसको.. सर वाली..." मैने प्रार्थना सी की....

"चल ठीक है.. वो सब बाड़म आइन सोच लेंगे...."मीनू ने मेरी बात पर सहमति जताई....

"मैं घर जाकर आती हूँ दीदी... थोड़ी देर बाद आ जाउन्गि..." मैने खड़ी होकर कहा...

"चल ठीक है.. तेरे आने के बाद ही बात करेंगे...." मीनू बोली...

मैं घर के लिए निकली तो शाम ढलने लगी थी.. कयि तरह की बातों का भंवर सा इकट्ठा होकर मेरे दिमाग़ में उथल पुथल सी मचा रहा था.. अचानक मनीषा को अपने घर की दीवार से मुझे देखते पाकर मेरे कदम ठिठक गये.. मैं कुच्छ सोच कर पलट गयी और उसकी तरफ मुस्कुरकर बोली," कैसी हो मनीषा?"

शायद वह मुझे नही देख रही थी.. उसका ध्यान कहीं और ही था.. मेरे टोकने पर उसका ध्यान भंग हुआ..,"एयेए.. हां.. ठीक हूँ.." वह भी मेरी और मुस्कुरा दी...

एक बार मैने चलने की सोची... पर पता नही क्यूँ.. कुच्छ देर गली में खड़ी रही और फिर उनके आँगन में घुस गयी,"क्या कर रही हो?"

"कुच्छ नही.. " मुझे अंदर आई देख वह कुच्छ सकपका सी गयी..," ठंड जाने लगी है ना... अब कटिया को भी बाहर बाँधना है... उसी के लिए बाहर खूँटा गाड़ रहा हूँ.." उसने कहा और अपने थेग्लि (पॅचस) लगे हुए कुर्ते के हिस्से को छिपाने सी लगी.. घर का काम कर रही होने की वजह से ही शायद उसने इतने गंदे कपड़े डाल रखे थे....

शायद वह मेरे वापस जाने का इंतजार कर रही थी.. पर मेरे मंन में तो कुच्छ और ही चल रहा था..," वो तुमने परसों 9:00 बजे चौपाल से क्या आवाज़ें सुनी थी...?"

"एक मिनिट.. अंदर आ जाओ.. मैं 2 मिनिट में आती हूँ.." मनीषा ने नलके (हॅंडपंप) पर हाथ धोते हुए कहा और उपर भाग गयी... उसकी ये हरकत मेरी समझ में नही आई.. पर मैं उस'से परसों रात के बारे में जान'ना चाहती थी.. इसीलिए नीचे वाले कमरे में जाकर चारपाई पर बैठ गयी....

करीब पाँच मिनिट बाद वह नीचे आई और मुस्कुरकर मेरी और देखने लगी..

"तुम कपड़े बदलने ही गयी थी क्या?" मैने उसके पहने हुए नये कपड़ों की ओर देखते हुए पूचछा... उसने अपने हाथ पिछे छुपा रखे थे...

"हां.." उसने थोडा हिचक कर अपने हाथ आगे किए.. उसके हाथों में थमी एक प्लेट में कुच्छ मिठाई थी.. वह मेरे पास आकर बैठ गयी,"लो.. तुम्हारे लिए...!"

मैने मुस्कुरकर उसकी तरफ देखा और प्लेट में से एक बरफी उठा ली...

"तुम्हारे...... पेपर कैसे चल रहे हैं अंजू!" मेरी और प्यार से देखते हुए उसने पूचछा...

"अच्च्चे चल रहे हैं..! चाचा कहाँ हैं...?" मैने यूँही बात करने के लिए पूचछा....

"उपर पड़ा होगा दारू पीकर साअला!" उसने ज़मीन में देखते हुए कहा... उसके चेहरे के भाव ही बदल गये अचानक.. मुझे लगा मैने ग़लत बात छेड़ दी... पर अचानक ही मेरी और देखते ही उसकी मुस्कान फिर लौट आई," लो.. ना.. और खाओ! मैं शहर से लाया था.... आज!"

अपने लिए बोलते हुए वह कयि बार पुरषवचक शब्दों का प्रयोग कर देती थी.. पर गाँव में कोई उसकी इस बात पर हंसता नही था.. काम भी तो आख़िर वह कोल्हू के बैल की तरह करती थी.. ऐसा कौनसा काम था.. जो आदमी कर सकते थे और वह नही..!

मेरी दादी अक्सर बताती थी....उसकी मा के मरने के बाद घर के बदले माहौल ने बेचारी की स्थिति को बचपन में ही दयनीय सा बना दिया था... बाप पहले ही शराबी था.. कुनबे के नाम पर एक चाचा ही थे जिन्होने शहर में जाने के बाद कभी उनकी सुध ली ही नही.. गाँव वालों ने उसके बापू को बहुत समझाया था कि तेरे पल्ले एक बेटी है.. छ्चोड़ दे दारू! पर 'वो' कभी नही सुधरा.. अपनी आधी से ज़्यादा ज़मीन को तो वो दारू में घोल कर ही पी गया...

पर कहते हैं कि कुच्छ लोग नियती के बंजर खेत को अपनी मेहनत और संघर्ष के कुदाल (क़ास्सी) से पलट कर अपने जीने के लिए उसमें भी 2-4 मीठे फल उगा ही लेते हैं.. मनीषा उन्ही लोगों में से एक निकली.. जब से होश संभाला.. अपने घर को ही संभाल लिया..! बचे हुए खेतों में जी तोड़ कर मेहनत की.. अपने लिए 2 वक़्त की रोटी का भी जुगाड़ किया.. और अपने बाप के लिए शराब का भी.. पर बाकी ज़मीन बिकने ना दी... गाँव में सब उसकी मेहनत और जीने के जज़्बे की कद्र करते थे.....

"क्या हुआ? कहाँ खो गयी अंजू?" मनीषा की बात से मैं विचारों की दुनिया से निकल कर बाहर आई..," आ..आ.. कुच्छ नही.."

"और ले ना! अच्छि नही लगी क्या?" उसने हिचकते हुए पूचछा....

"नही.. बहुत अच्छि है.. मेरा पेट भर गया... वो बताओ ना मनीषा? परसों तुमने क्या सुना था चौपाल में.." मैने पूचछा...

उसने मिठाई की प्लेट उठकर स्लॅब पर रख दी और मेरे पास आकर बैठ गयी..," छ्चोड़ो ना.. जो होना था हो गया.. जिसको बताना था बता दिया.. तुम कुच्छ और बात करो.." बोलकर उसने मेरा हाथ पकड़ लिया.. उसके हाथ मर्दों की तरह खुरदारे से थे.. और उनमें जान भी बहुत लग रही थी...

"नही.. फिर भी.. बेचारा तरुण.. बिना बात ही मारा गया.. हो सकता है उस वक़्त ही किसी ने उसको मार दिया हो...!" मुझे उसके हाथ की पकड़ कुच्छ अजीब सी लग रही थी.. मैने अपना हाथ छुड़ा लिया...

वह कुच्छ देर चुप रही..," ना.. उस वक़्त किसी ने किसी को नही मारा.. उस वक़्त तो वो चले गये थे.. वो तो नशेड़ी होंगे शायद.. 'ये' काम तो किसी ने बाद में ही किया है... यहाँ उसके पेट में कोई 10-10 बार चाकू घौंपेगा तो वो चीखेगा नही क्या..?" मनीषा ने विचलित सी होते हुए कहा...

"हां.. ये बात तो है.. वो कोई और ही होंगे फिर.." मैं मंन ही मंन खुश हो गयी... तूने इनस्पेक्टर को क्या क्या बताया है...?"

"छ्चोड़ ना अंजू.. क्यूँ इस बात को बार बार उठा रही है... वैसे भी तरुण अच्च्छा लड़का नही था.... तुझे तो पता ही होगा...!"

उसकी बात सुनकर मैं हड़बड़ा गयी..," क्क्या मतलब?"

"छ्चोड़ जाने दे.. तू और सुना!" वह मेरी और मुस्कुरकर प्यार से बोली..

"ठीक है.. मैं जा रही हूँ अब..!" मैं कहकर खड़ी हो गयी....

"आ जाया कर... कभी कभी.. मैं तो अकेला ही रहता हूँ..!" मनीषा ने मेरे साथ ही खड़े होते हुए कहा.... और मेरे साथ साथ बाहर आ गयी...

"हुम्म.. देखूँगी..!" मैने उसकी ओर मुस्कुरकर कहा और दरवाजे की तरफ चल दी..

मैनशा ने तुरंत ही फर्श से भैंसॉं का गोबर उठाना शुरू कर दिया.. मैं घर जाते हुए सोच रही थी.. बेचारी को काम के लिए लेट कर दिया....

"म्‍मह....म्‍म्म्मह....म्‍म्म्

ममह.." मैने अपने आपको उन्ही जाने पहचाने हाथों के चंगुल से छुड़ाने की जी तोड़ कोशिश की.. पर मैं कुच्छ ना कर सकी...

उसका एक हाथ पहले की तरह ही मेरे मुँह पर था.. और दूसरा मेरी कमर से होता हुआ मेरे पेट पर कसा हुआ था... वह मुझे लगभग पूरी ही उठा कर चौपाल की और घसीट'ने लगी.. पर उस दिन ऐसी हालत में भी मेरा ध्यान मेरी कमर में गढ़ी हुई उसकी सुगढ़ और कसी हुई चूचियो पर चला ही गया था... निसचीत तौर पर वह वही लड़की थी जिसने एक बार पहले भी मेरे साथ चौपाल में 'प्यार' का खेल खेला था....

दरअसल.. मैं करीब 8:00 बजे अपने घर से पिंकी के घर के लिए चली थी.. चौपाल के सामने आते ही जैसे ही कंबल में लिपटा हुआ एक साया मेरी और बढ़ा.. मैं एक दम घबरा गयी.. मैने डर कर भागने की कोशिश भी की पर मेरे कदम जड़वत से होकर ज़मीन से ही चिपके रह गये.. वह आई और मुझे किसी मूक खिलौने की भाँति चौपाल में उठा कर उसी जगह ले गयी.. जिस जगह वह पहली बार मुझे लेकर गयी थी...

मैं ना भी डरती.. पर उस दिन हालात बदल चुके थे.. दो दिन पहले ही चौपाल में तरुण की लाश मिली थी.. और कातिल का कुच्छ पता नही था.. 'क्या पता.. इसी ने...' .. ये सोच कर मेरी रूह तक सिहर उठी.. मेरा सारा बदन थर थर काँपने लगा..

काफ़ी देर तक वह मेरे पिछे खड़ी रह कर मेरे मुँह को दबाए हुए मेरे शरीर के साथ छेड़ छाड़ करती रही.. वह मेरी चूचियो को बारी बारी पकड़ कर हिलाते हुए उन्हे मसालती रही.. मेरे कानो में साँसें सी छ्चोड़ती हुई उन्हे हल्का हल्का काट'ती रही... पर पिच्छली बार की तरह वह ना तो मेरे शरीर में जवानी की आग भड़का सकी.. और ना ही मेरे दिल का डर ही दूर कर पाई.. मैं अब भी खड़ी खड़ी काँप रही थी...

थक हार कर उसने मेरे मुँह से हाथ हटाया और मुझे अपनी तरफ पलट लिया.. मेरे गालों को अपने हाथों में लिया और मेरे होंटो पर अपने होन्ट रख दिए.. अजीब सी वो सुखद अनुभूति भी मेरे मॅन से डर निकल नही पाई..

मैं थर थर काँप रही थी.. और इस डर को शायद वह भी समझ चुकी थी.. शायद इसीलिए बार बार मुझे छ्चोड़ कर.. पकड़ कर.. यहाँ वहाँ सहला कर.. मेरा डर दूर करने की कोशिश कर रही थी... वह मुझे विश्वास दिलाना चाह रही थी कि वह ज़बरदस्ती नही कर रही और मुझे उस'से डरना नही चाहिए... पर मेरी ये हालत थी कि मेरे होंटो से एक बोल भी निकल नही पा रहा था.....

अचानक उसने मेरी स्कर्ट को उपर उठा कर अपना हाथ अंदर डाला और मेरी जाँघ को पकड़ कर मेरी एक टाँग उपर उठा ली.. फिर दूसरे हाथ की उंगलियों को मेरे दूसरी तरफ से कछी में डाल कर नितंबों की दरार में मेरी योनि ढूँढने लगी.. उसको मिल भी गयी.. पर एकदम सूखी हुई सी.. जब मेरा गला तक डर के मारे सूख चुका था तो उसको तो सूखा रहना ही था...

शायद वो जैसा सोच रही थी.. मेरे साथ इतना सब कुच्छ करने के बाद भी वो कर नही पा रही थी.. उसकी पल पल में जगह बदल रही छेड़ छाड़ से उसकी झल्लाहट का पता चल रहा था..

अचानक उसने अपने हाथ में लेकर उपर उठाई हुई जाँघ को भी छ्चोड़ दिया.. और इसके साथ ही मुझे ज़मीन पर कुच्छ गिरने की आवाज़ आई.. आवाज़ का होना था कि वह तुरंत हड़बड़ा कर नीचे बैठी और मेरे पैरों के पास हाथ मार कर देखने लगी..

अचानक मुझे ध्यान आया.. मैने धीरे से अपनी स्कर्ट की जेब पर हाथ लगा कर देखा.. मोबाइल गायब था... 'ओह्ह!' मेरे मुँह से निकला और मेरी नज़रें झुक गयी...

अगले ही पल मेरी साँसें हलक में अटक कर रह गयी.. किस्मत कहें या बद किस्मती.. उसको मोबाइल मिल गया और शायद छ्छू कर देखते हुए उसका कोई बटन दब गया.....

"एम्म...एम्म...एम्म..." मेरे काँपते हुए होन्ट उसका नाम लेना चाहते थे.. पर इस'से पहले कि मैं पूरा बोल पाती.. उसने खड़ी होकर मेरे मुँह पर हाथ रख दिया..," ष्ह्ह्ह्ह्ह्ह.... जान से मार दूँगी.. अगर मेरा नाम लिया तो!"

उसने एक बार और बटन दबा कर मोबाइल की स्क्रीन ऑन करके देखा और उसको अपनी चूचियो में थूस लिया....

अब की बार मैने मनीषा का चेहरा बिल्कुल सॉफ देखा था.. और देखने के बाद तो मेरे होश ही उड़ चले थे... पर उसकी जान से मारने की धमकी के बाद मेरी आवाज़ निकलना तो दूर.. साँसें भी थम थम कर आ रही थी... मेरा पूरा शरीर पसीने में नहा चुका था...

"मैं.. मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूँ अंजलि.. इतना प्यार की तुम सोच भी नही सकती.. सिर्फ़ तुम्हे एक बार देखने की खातिर घंटों अपने घर की दीवार से गली में देखता रहता हूँ.. पर तुम्हारे सामने ये सब बोलने की मेरी हिम्मत ही नही हुई..." मनीषा धीरे धीरे बोलने लगी...

मुझे उसकी बातें बहुत अजीब लग रही थी.. वो भी एक लड़की और मैं भी.. 'ये कैसा प्यार?' मैं मंन ही मंन भगवान से मुझे वहाँ से निकल लेने की प्रार्थना करती रही....

"तुम भी कुच्छ बोलो ना अंजू! मैं कैसा लगता हूँ तुम्हे..?" मैनशा ने मेरे गाल पर हाथ रखा और अपना खुरदारा अंगूठा मेरे काँप रहे होंटो पर रख लिया...," बोलो ना कुच्छ.. ऐसे क्यूँ तडपा रही हो तुम..." लड़की की ज़ुबान से मर्दाना ज़ज्बात.. सचमुच बड़ा ही अजीब पल था वो.. मेरे लिए....

"म्म..म्‍म्म.. कैसे बोलूं..? त्त्तुम म्मुझे भी मार डोगी.." मुझे विश्वास हो चला था कि मनीषा ने तरुण को भी ऐसे ही मार दिया होगा.. बोलने पर..

"आए पागल.. तू तो मेरी जान है.. तुझे भला में कैसे मार सकता हूँ.. तू डर क्यूँ रही है अंजू?" मनीषा ने कह कर मुझे अपने सीने से चिपका लिया.. हमारी छातिया एक दूसरी की छातियो से टकरा गयी...

"त्तुम ही तो.... कह रही थी कि मैं बोली तो तुम जान से मार दोगि..." मैने डरते डरते कहा....

"हट पागल! वो तो मैं खुद ही डर गया था.. कि तुमने मुझे पहचान लिया.. उसका ये मतलब थोड़े ही था... प्लीज़.. कुच्छ बोलो ना!" मनीषा ने मेरे चेहरे को चुंबनो से लबरेज करते हुए कहा....

"मुझे जाने दो प्लीज़..!" मेरे मुँह से डरते डरते निकला...

"क्या? इसका मतलब तुम मुझसे प्यार नही करती! क्या तुम सच में मुझसे प्यार नही करती अंजू!" उसके शब्दों में निराशा और हताशा सॉफ झलक रही थी...

"नही.. करती हूँ..!" मैं अपनी कमर पर सख़्त होते उसके हाथों को महसूस करके काँप उठी..

"झूठ बोल रही हो ना तुम.. प्लीज़.. मुझे सच सच बता दो.. तुम मुझसे प्यार करती हो या नही.. प्लीज़ अंजू.. मैं तुम्हारे मुँह से 'हां' सुन'ने को तड़प रहा हूँ.." मनीषा बोलती रही..

"झूठ नही बोल रही.. तुम मुझे बहुत अच्छि लगती हो.. बहुत प्यारी.. सच में!" मुझे लगा, मेरे बचने का सिर्फ़ यही एक रास्ता है...

"फिर जाने देने के लिए क्यूँ बोल रही हो.. मुझसे प्यार करो ना.. उस दिन भी तो किया था तुमने.. कितनी अच्छि तरह.... कितना प्यारा है तुम्हारा शरीर... हर जगह से.. कितनी रसीली सी हो तुम...!" मनीषा मुझे ये सब बोलती हुई दुनिया का आठवाँ अजूबा लग रही थी.. हा! कोई लड़का होता तो.....

"पपता नही क्यूँ.. आज.. यहाँ अंधेरे में मुझे डर सा लग रहा है... मैं इसीलिए बोल रही थी बस.." मैने सफाई दी...

"मेरे घर चलतें हैं... नीचे कोई नही होता.. चलो!" मनीषा ने मुझे छ्चोड़ कर मेरा हाथ पकड़ कर मुझे कंबल में अपने साथ लपेटा और बाहर की ओर चलने लगी... ना तो मेरी 'ना' कहने की हिम्मत थी.. और ना ही मैं 'ना' कह पाई.. हां.. गली में उस वक़्त कोई आ जाता तो शायद मैं उस'से बचने की कोशिश कर लेती.. पर कोई नही आया.. हम चौपाल से निकले और उसके घर में घुस गये....

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अंदर कमरे में जाते ही उसने दरवाजा और खिड़कियाँ बंद की और कंबल उतार कर चारपाई पर रख दिया... मैने महसूस किया.. रोशनी में वो मुझसे नज़रें मिलने से कतरा रही थी..," कुच्छ लोगि तुम?" उसने चेहरा झुकाए हुए पूचछा...

"नही....." उसके इशारा करने के बाद में चारपाई पर जाकर बैठ गयी.. अब डर बाहर उतना नही था.. पर अंदर वैसे का वैसा ही था......

"मिठाई लाउ?" उसकी आँखें अब भी दीवार को ही देख रही थी....

"नही.. कुच्छ नही.. मुझे भूख नही है...!" मैने जवाब दिया...

मनीषा ने मेरे पास चारपाई पर बैठ कर मेरा हाथ अपने दोनो हाथों में लिया और उसको धीरे धीरे सहलाने लगी," कुच्छ बोलो ना.. तुम तो कुच्छ बोलती ही नही..."

"म्‍मैइन क्या बोलूं.. मेरी तो..." मैं बोलते हुए रुक गयी.. उसने बोलना शुरू कर दिया था..," बताओ ना.. मैं कैसा लगता हूँ तुम्हे? तुम्हे पता है मैं कब से तुमसे प्यार करता हूँ...?"

"तुम लड़की हो दीदी!" मैने हिम्मत करके बोल ही दिया..

"तो? ... तो क्या हुआ?" उसने पूचछा....

उसकी आवाज़ में हल्क से बदलाव से ही मैं डर गयी.. बड़ी मुश्किल से मैने अपनी बात को संभाला..," नही... कुच्छ नही हुआ... मैं तो बस... मैं तो ये पूच्छ रही थी कि तुम लड़कों की तरह 'ता हूँ'.. 'ता हूँ' क्यूँ बोलती हो?"

"अच्च्छा.. ये!" वो मुस्कुराते हुए बोली..," पता नही.. मुझे ऐसे ही बोलना अच्च्छा लगता है.. और खास तौर पर तब; जब मेरा..." वह बोलते हुए रुकी और नज़रें झुका ली," जब मेरा प्यार करने का मंन हो!"

"अच्च्छााअ.." मैने सिर हिलाते हुए जवाब दिया.. मेरा हाथ अब भी उसके हाथों में ही था.. जिसे वो अब तक बड़े प्यार से सहला रही थी....," एक बात बोल दूं.. गुस्सा नही होना..!" मैने बनावटी प्यार आँखों में उतार लिया...

"बोल ना! तेरी कसम.. बिल्कुल गुस्सा नही करूँगा...!" मनीषा ने बड़े प्यार से कहा...

"वो.. थोड़ी देर बाद मुझे जाना पड़ेगा.. नही तो पिंकी की मम्मी मेरे घर पर फोन करके पूछेगि...." मैने डरकर उसकी आँखों में देखने की कोशिश की..

कुच्छ देर वह यूँही मेरे चेहरे को प्यार से देखती रही.. फिर मेरे चेहरे को अपने हाथों में ले लिया..," ठीक है.. पर एक बार प्यार कर ले.. उसी दिन से तड़प रहा हूँ.. तुमसे प्यार करने के लिए...!" उसकी बात में आदेश भी था और प्रार्थना भी..

'ना' कहने की सोचने से भी डर लग रहा था मुझे.... पहली बार मुझे लग रहा था कि मनीषा 'पागल' है... मैने उसको निपटा देना ही ठीक लगा," ठीक है.. कर लो..!" मैने फीकी सी मुस्कुराहट चेहरे पर लाकर कहा...

"सारे कपड़े निकाल कर अच्छे से प्यार करेंगे.. ठीक है?" उसने पूचछा....

"पर.. पर कोई आ गया तो?" मैने जवाब में पूचछा..

"यहाँ तो दिन में भी कोई नही आता.. रात में कौन आएगा.. तुम डर क्यूँ रही हो?" उसने मुझे कंधों से पकड़ कर हिला दिया...

"ठीक है.." मैने कहा और अपनी शर्ट के बटन खोलने लगी...

"रूको.. मैं निकालूँगा.. प्यार से!" मनीषा ने कहा और मुझे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया.....

मेरी शर्ट को मेरे बदन से निकालने के बाद मनीषा ने मेरी एक चूची को अपने हाथ में पकड़ लिया," कितनी प्यारी है तू.. ब्रा कभी नही डालती क्या?"

मेरी चूची के दाने पर उसकी उंगली लगते ही वो जितना हो सकता था, तन कर खड़ा हो गया.. और सख़्त होकर छ्होटी किस्मीस के जैसा बन गया.. सिर्फ़ रंग का फ़र्क था.. 'दाना' एक दम गुलाबी था.. मैने उसको देखा और आँखें बंद करके बोली," नआई.."

"एक मिनिट ऐसे ही रह.." उसने कहा और मेरे 'दाने' को होंटो के बीच दबा लिया.. मेरी सिसकी निकल गयी," अया.."

"क्या हुआ? मैने तो दाँत से भी नही काटा.. ऐसे ही होंटो में लेकर देखा था.." उसने मेरे दाने से मुँह हटाया और मेरे गालों का चुंबन लेती हुई बोली..

मैं कुच्छ नही बोली.. आँखें बंद किए उसकी गोद मैं पड़ी रही..

"मज़ा आ रहा है ना.. अंजू?" उसने प्यार से मेरे बालों में हाथ फेरते हुए पूचछा...

मैने अपना सिर 'हां' में हिला दिया.. मज़ा नही आ रहा होता.. तो भी मुझे यही करना था..

"तेरा तो चेहरा ही इतना प्यारा है कि देख कर ही दिल मचल जाता है.. मैं तो कभी भी ये नही सोचता था कि तुझे रोशनी में भी प्यार कर पाउन्गा.. अब मुझे तू मिल गयी.. और कुच्छ नही चाहिए.. तेरी कसम!" मनीषा बोली...

मेरा ध्यान उसकी बातों से ज़्यादा मेरी चूचियो पर थिरक रहे उसके हाथ पर था... बड़े ही प्यार से वह मेरी सेब जैसी तनी हुई चूचियों को सहला रही थी. मेरे बदन में उसके हाथ के नीचे मेरी योनि तक चले जाने की तड़प बढ़ने लगी.. मैं थोड़ा सोच कर बोली," तुम भी निकाल दो ना!"

"नही.. तुम निकालो अपने हाथ से...!" उसने कहने के बाद मुझे अपनी गोद से नीचे उतार कर चारपाई पर बैठा दिया और मेरे सामने अपनी चूचिया तान कर अपने हाथ उपर उठा लिए... मैने उसकी कमीज़ नीचे से पकड़ी और उपर खींचते हुए निकाल दी... मैं उसकी चूचियो पर बँधे कपड़े को देख कर बोली," ये क्या है?" मोबाइल भी उसी कपड़े में फँसा हुआ सॉफ दिख रहा था...

"ये..?" मेरा इशारा समझ कर वह नीचे देख कर बोली," ये मैने इनको बाँध रखा है इस कपड़े में.. उपर उठी हुई मुझे अच्छि नही लगती!" उसने कहा और मुझे वापस अपनी गोद में खींच लिया... अगले ही पल उसने मेरी स्कर्ट का हुक खोला और मुझे उपर उठा कर स्कर्ट को मेरी टाँगों से बाहर निकाल दिया...

"आ.. आज तो तू मुझे पूरी नंगी देखने को मिलेगी..!" उसके मुँह से लार टपक कर मेरे नंगे पेट पर जा गिरी.. उसने मुझे एक बार फिर उपर उठाया और मेरी कछी भी नीचे सरका दी और मैने अपने पंजे उपर उठा दिए.. कछी चारपाई पर आ गिरी....

"हाए.. कितनी प्यारी है.. इस पर तो पूरी तरह 'झांतें' भी नही उगी हैं.. उउशह.....गोरी गोरी सी मक्खन जैसी..." कहते हुए उसने मेरी जांघों के बीच हाथ देकर मेरी योनि पर उंगलियाँ घुमाई..

"आआआअहह" मैने सिसक कर अपनी जांघें फैला दी... और अपनी योनि को देखने लगी.....

शायद ठंड की वजह से मेरी योनि सिकुड कर और भी छ्होटी सी हो गयी थी.. योनि की फांकों के सिकुड़ने की वजह से उनमें सिलवटें सी बनी हुई थी... और उनके बीच की नन्ही नही पत्तियाँ आपस में चिपकी हुई थी...

मनीषा ने अपनी एक उंगली और अंगूठे की सहायता से मेरी योनि की फांकों को फैलाकर उन्न पत्तियॉं को अलग अलग किया और सिसक कर उनके बीच अंगुली रख कर बोली..," हाए रे.. तेरा तो अंग अंग गुलाबी है.. तेरे होन्ट गुलाबी.. तेरे चूचक गुलाबी.. और तेरी ये भी अंदर से पूरी गुलाबी है... तू मुझे कैसे मिल गयी मेरी जाआआअन्न्न्न.." बोलते ही उसने मेरे होंटो पर अपने होन्ट रखे और मेरी रिसने लगी योनि में अपनी उंगली अंदर घुसा दी... आनंद के मारे मैं पागल सी हो गयी और मैने अपने नितंब उपर उठा दिए....

"मज़ा आया..?" उसने उंगली को बाहर करके फिर से अंदर सरका दिया और मेरे होन्ट छ्चोड़ कर पूचछा....

"आआआहाआआन.." मैने लंबी साँस ली और बोली...," तुम भी निकाल दो अपनी.. मैं भी ऐसे ही करूँगी तुम्हे...." कहकर आवेश में मैने उसकी चूचियो पर बँधे कपड़े पर दाँत गढ़ा दिए....

मेरी बात सुनकर वह बहुत खुश हुई.. मुझे अलग बिठाया और खड़ी होकर एक ही झटके में नाडा खोलते ही सलवार और पॅंटी.. दोनो निकाल दी... मुझसे सब्र नही हो रहा था...मैने उसी वक़्त आगे होकर अपना हाथ उसकी जांघों के बीच फँसा दिया... उसकी काले बालों वाली योनि में उंगली घुसाने के लिए....

"रूको तो एक मिनिट.. वहीं आ रहा हूँ.. चारपाई पर.." कह कर उसने अपनी सलवार अपनी कमीज़ के उपर रखी और चारपाई पर खड़ी हो गयी..," एक मिनिट.."उसने कहा और मुझे लिटा कर मेरी टाँगों की तरफ मुँह करके लेट गयी.. उसकी जांघों के बीच दुब्कि हुई उसकी योनि मेरी आँखों के सामने थी... मेरे जांघों पर हाथ लगते ही उसने अपनी जांघें खोल दी और मेरे नितंबों को पकड़ते हुए मुझे अपने चेहरे की ओर खींच लिया....

उसकी योनि की फाँकें साँवली सी थी और मेरी फांकों से दोगुनी मोटी भी.. मैने अपने दोनो हाथों से उसकी फांकों को अलग अलग किया और उसका छेद ढूँढा.. मुझे आस्चर्य हुआ.. मेरी योनि के मुक़ाबले दोगुनी योनि का छेद मेरी योनि के जितना ही था... अंदर से भी उसका रंग सांवला ही था.. उसकी योनि अंदर बाहर सारी रस से भीगी हुई थी... मैने अपनी एक उंगली को उसकी फांकों से रगड़ कर गीला किया और छेद पर रख कर अंदर धकेल दी....

मनीषा सिसक उठी और उसके मोटे मोटे नितंब थिरक उठे... पर अगले ही पल उच्छलने की बारी मेरी थी...

"आऐईईईईईईईईईई.. ये क्या कर रही हो.." मैने अपने नितंबों को उच्छाल कर मेरी जांघों के बीच घुसे हुए उसके मुँह से अलग किया....

".. अच्च्छा नही लगा क्या?" उसने मेरी तरफ देख कर पूचछा.....

"बहुत अच्च्छा.. लग रहा है.. पर सहन नही हो रहा.. गुदगुदी मच रही है.. मैने अपने नितंबो को वापस उसके हाथ में ढीला छ्चोड़ कर कहा....

"करने दो ना.. बहुत अच्छि गंध आ रही है.. तुम्हारी 'इस' में से.. चूसने दो ना थोड़ी सी देर.." मनीषा ने प्यार से कहा....

मैने आगे सरक कर अपनी जांघें खोल दी और गौर से उसकी योनि को देखती हुई अपनी उंगली अंदर बाहर करने लगी...

"अयाया...एक मिनिट बस..." कहकर वह उठी और मुझे सीधा करके लिटा लिया.. उसके बाद वह मेरे चेहरे के दोनो ओर दूर दूर अपने घुटने टिका कर मेरे उपर आ गयी... मैं बड़े प्यार से उसके ऊँचे उठे हुए नितंबों के बीच की गहरी दरार और पिच्चे की तरफ मुँह खोले खड़ी योनि को देखने लगी.. मैने अपना हाथ नीचे से बाहर निकाला और अपनी उंगली को योनि के आकर में उस पर घुमाने लगी...

उसने मेरी जांघों को पिछे की ओर करते हुए अपने हाथ इस तरह से उनमें फँसा लिए जैसे एक बार अनिल चाचा और सुन्दर ने मम्मी के साथ किया था.. मैं कल्पना करने लगी कि मेरी योनि भी मम्मी की योनि की तरह खुल कर उपर देखने लगी होगी....

अचानक वह उस पर झुकी और अपनी जीभ को मेरी योनि की दरारों में उपर नीचे चलाने लगी... मैने छॅट्पाटा कर नितंबों को अलग हटाने की कोशिश की.. पर मेरी जांघें मनीषा की बाजुओं में जकड़ी हुई थी.. मैं हिल तक नही सकी.... वह बेहिचक मेरी योनि को लपर लपर चाट'ते हुए धीरे धीरे मेरे छेद में जीभ घुसाने की कोशिश करने लगी.. मैं पागल सी हो गयी.. आनंद के मारे मैं सिसकियाँ लेते हुए अपने हाथ की मुट्ठी बनाकर उसके नितंबों पर पटापट मारने लगी.. पर उसने जी भर कर चूसने के बाद ही अपना मुँह वहाँ से हटाया...

"क्या हुआ? तुम तो करो उंगली से..." उसने कहा....

मेरी साँसें अनियंत्रित सी हो चुकी थी.. मैने हान्फ्ते हुए कहा..," मुझसे वहाँ जीभ सहन नही हो रही.. बहुत ज़्यादा गुदगुदी हो रही है.. मेरी चीख निकल जाएगी... तुम भी उंगली से करो.. मज़ा आता है..."

"अच्च्छा रूको..!" उसने कहा और उठकर बैठ गयी और मुझे भी बैठने को कहा...

मैने अपनी जांघें फैलाकर अपनी योनि को देखा.... उसकी सारी सिलवटें गायब हो चुकी थी.. मेरी योनि के रस और उसके थूक से सनी हुई 'वह' फूल कर छ्होटी सी डबल रोटी की तरह हो गयी थी...," करो ना उंगली...." मैने छॅट्पाटा कर कहा...

"अपनी टाँगें सीधी करो.."उसने कहा.. मैने कर ली...

मेरी एक जाँघ को अपनी एक जाँघ के उपर चढ़ा कर वह आगे सरक आई.. हम दोनो की योनियाँ एक दूसरी के आमने सामने थी.. मेरी समझा में नही आ रहा था.. वह क्या करना चाहती है....

"थोड़ी सी आगे आ जाओ.. मेरी चूत से अपनी चूत मिला लो.." उसने कहा...

मुझे थोडा सा टेढ़ा होना पड़ा.. पर मैने आगे सरक कर उसकी योनि से अपनी योनि मिला दी.. और उसके चेहरे की ओर देखने लगी....," अब?"

उसने जवाब नही दिया.. पर जैसे ही वह हिली.. उसकी योनि के कड़े और काले काले बाल मेरी योनि पर अंदर बाहर चुभने लगे.. पर उस चुभन में एक अलग ही मज़ा आया.. मैने थोड़ी सी और जांघें खोल दी और उसकी योनि से अपनी योनि बिल्कुल चिपका दी....

"ऐसे ही करो नाआअ... आआआः.. तुम भी.. मज़ा आ रहा है ना?" उसने अपने नितंबों को उपर नीचे करते करते हुए आँखें बंद करके पूचछा....

"हाआँ.. बहुत मज़ा आ रहा है... आआआहह.." मैं सिसकते हुए उस'से भी ज़्यादा तेज़ी से उपर नीचे होने लगी... उसके बाल 'योनि में घुस कर एक अलग ही मज़ा दे रहे थे... उसकी पता नही.. पर मेरी आँखें बंद थी.. और मैं बड़बड़ाते हुए लगातार उपर नीचे हो रही थी...

2 मिनिट से ज़्यादा मैं ऐसा नही कर पाई.. मैं भी थक चुकी थी और मेरी योनि ने भी अपने हाथ उठा दिए थे.. रस निकल कर मेरी और उसकी जांघों पर फैल गया...

मैं निढाल होकर गिर पड़ी....," बस.. बस..बस..."

उसने मेरा कहना मान लिया... उठकर अलग हुई और मेरे उपर लेट कर मेरी चूचियो को चूस्ते हुए एक उंगली मेरी योनि में उतरी और दूसरे हाथ से तेज़ी के साथ अपनी योनि में उंगली अंदर बाहर करने लगी.... मेरा बुरा हाल था.. और आख़िर आते आते उसका भी... कुच्छ देर बाद वह भी मेरी छातियाँ पर सिर रख कर हाँफने लगी......

" तुमने ये क्यूँ कहा कि तरुण अच्च्छा लड़का नही था..." मैने मौके का फाय्दा उठाते हुए पूचछा.....

"छ्चोड़ो ना.. बस मैने बता दिया ना कि नही था.. और जब तुम्हे पता ही है तो क्यूँ पूच्छ रही हो..." मनीषा ने अपनी साँसों पर काबू पाते हुए कहा और मेरी योनि में से अपनी उंगली निकाल ली....

"ंमुझे क्या पता? तुम ऐसे क्यूँ बोल रही हो...?" मैं उठ कर बैठ गयी....

"एक बात बताउ?" उसने कहा... मैं उसकी ओर देखने लगी....

"एक दिन तरुण तुम्हे चौपाल में लेकर गया था ना...?" उसने घूर कर मुझे देखते हुए कहा....

मुझसे कोई जवाब देते ना बना.. पर मुझे विश्वास हो गया कि जब हम दोनो बाहर खड़े थे.. तो जिस साए का मुझे आभास हुआ था.. वो वही थी.. मनीषा!

"मुझे सब पता है.. उस दिन मैं तेरी ताक में वहीं खड़ी थी.. चौपाल के दरवाजे पर.. पर तरुण तेरे साथ आ गया.. मुझे बड़ा दुख हुआ.. फिर जब तुम दोनो वहीं खड़े हो गये तो मैं चौपाल में घुस गयी.. कि कहीं तरुण देख ना ले.. थोड़ी देर बाद तरुण तुम्हे लेकर अंदर ही आ गया.. मैने तुम्हारी सारी बातें सुनी थी....!" मनीषा ने बताया....

मैं चुपचाप उसके चेहरे को घूरती रही...

"सच में बहुत कमीना था वो.. अच्च्छा हुआ जो मर गया...!" वह उठ कर अपने कपड़े पहन'ने लगी.. मैने भी अपना स्कर्ट उठा कर कछी ढूँढनी शुरू कर दी....

"कल फिर आओगी ना? मैं तुम्हारा इंतजार करूँगी..." मनीषा ने कपड़े पहनते ही मेरे पास आकर मुझे चूम लिया...

"ये.. मेरा मोबाइल...!" मैने उसकी बात टाल कर उसकी आँखों में देखते हुए कहा....

"हाँ..." उसने अपनी छातियो में हाथ डाल कर उसको निकाल कर मेरे हाथ में पकड़ा दिया," ये लो... मुझे याद नही रहा था... कल फिर आओगी ना?"

"कोशिश करूँगी.. पर अभी एग्ज़ॅम चल रहे हैं.... पक्का नही कह सकती..." मैने मजबूरी का वास्ता दिया...

"ठीक है.. पर अभी एक प्यारी सी 'चुम्मि' तो दे जाओ.." उसने मुझे दरवाजे के बाहर से वापस बुला लिया...

मैं जबरन मुस्कुराइ और वापस आकर उसके पास खड़ी हो गयी...

उसने थोड़ा सा नीचे झुक कर मेरे होंटो को अपने होंटो में दबा लिया.. और मेरी कमर में हाथ डाल कर काफ़ी देर तक इन्हे चूस्ति रही.. और फिर अलग हटकर बोली," तुमसे मीठी चीज़ दुनिया में कोई नही हो सकती!

क्रमशः.....................