संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 25 Dec 2014 03:07

कोई जबाव ना पा कर सावित्री के मन मे एक सवाल उठी की आख़िर मा मिट्टी का तेल लेने अंधेरा होने के बाद क्यों गयी. दिन मे भी तो जा सकती थी. दूसरी बात ये की मिट्टी का तेल तो गाओं के दूसरी छ्होर पर एकांत मे बने गोदाम पर बिकता है और ये गोदाम वाले मिट्टी के तेल की दुकान का मालिक जग्गू भाई था जो गुंडा किस्म का आदमी था. तो क्या मा वहाँ गयी थी मिट्टी का तेल लाने?. कोठरी मे खड़ी हो कर इन सवालों मे उलझी सावित्री फिर बाहर आ गयी. थोड़ी देर बाद उसकी मा मूत कर घर के पीच्छवाड़े से वापस आ गयी और अपने पैरों को धोने के बाद मुँह को भी पानी से धोने लगी और मुँह मे पानी ले कर कुल्ली करने लगी. ये सब सावित्री को कुच्छ अजीब लग रही थी. फिर सावित्री ने सोचा की हो सकता है उसकी मा के साथ कोई दूसरी औरत भी मिट्टी का तेल लेने गयी होगी क्योंकि अंधेरा होने के बाद उसकी मा अकेले भला कैसे जा सकती है उस एकांत सुनसान गोदाम के पास जहाँ मिट्टी का तेल बिकता है. यही मन मे सोच रही थी की लक्ष्मी चाची ही गयी होगी उसके साथ और दूसरे पल सावित्री ने अपने अंदाज़ा को सही ठहराने के लिए पुछि "..लक्ष्मी चाची भी गयी थी क्या ..मिट्टी का तेल लेने...तुम्हारे साथ...." इतना कह कर सावित्री अपनी मा के तरफ देखने लगी जो पानी अपने मुँह मे ले कर बार बार कुल्ली करते हुए पीचकारी की तरह निकाल रही थी. सीता अपना मुँह को ठीक से धोने के बाद कुच्छ देर तक चुप रही मानो वो सावित्री के सवाल का जबाव नही देना चाहती हो. अपने मुँह को सारी मे पोन्छते हुए कोठारी मे जाते हुए बोली "...जब तेल नही था तो लाना ही पड़ेगा ...नही तो अंधेरे मे भला कैसे कोई रहेगा.." इतना कह कर सीता चुप हो गयी और अपना मुँह कोठरी के दीवार मे लगे छोटे सीसे मे दिया के रोशनी मे निहारने लगी. सावित्री को आभास हुआ की उसके सवाल का जबाव उसकी मा नही देना चाह रही हो. यही सोच कर सावित्री ने बाहर से ही कोठरी के अंदर सीसे मे देख कर अपने बालों को ठीक करती सीता को एक नज़र देखी. सावित्री को कुच्छ ऐसा लगा मानो उसकी मा के बाल कुच्छ उलझ से गये हों जिसे वो ठीक कर रही है. लेकिन अपनी मा के उपर ज़्यादे नज़र रखना उसे ठीक नही लगा और वह चुपचाप छप्पर मे आ गयी और चूल्‍हे पर पक रहे चावल को देखने की कोशिश करने लगी. छप्पर मे कोई दिया ना जलाने से अंधेरा था. घर मे बस एक ही दिया था जो अंदर कोठारी मे जल रहा था. चावल कहीं चूल्‍हे पर जल ना जाए यही सोच कर सावित्री दिया लाने के लिए कोठारी मे जैसे ही घुसी तो देखी की उसकी मा अपनी सारी को ठीक कर रही थी. जो कुच्छ अस्त-व्यस्त हो गयी थी शायद. दिया के रोशनी मे अपनी सारी और कपड़े को ठीक कर रही सीता का पीठ सावित्री की ओर थी. सावित्री को यह सब कुच्छ अजीब लग रही थी. लेकिन उसे दिया की ज़रूरत थी ताकि उसकी रोशनी मे चावल को देख लेती की कहीं जल ना जाए. सावित्री यही सोच कर दिया को हाथ मे लेती बोली "...चावल देखना है...इससे.." सीता ने कोई जबाव नही दी बल्कि अपनी सारी को कमर मे ठीक करते हुए पहनने लगी. दिया को लेकर सावित्री छप्पर मे चूल्‍हे पर पक रहे चावल को देखने लगी. और फिर दिए को वापस कोठारी मे ले कर आई तो दिए की रोशनी फैल गयी जिसमे सावित्री ने देखा की उसकी मा अपने पीठ को तेज़ी से उसके तरफ करके ब्लाउज को ठीक करने लगी. सावित्री को ऐसा लगा मानो उसकी मा उससे अपनी छाती को छिपाना चाह रही हो और शायद उसे इस बात का अंदाज़ा नही था की इतनी जल्दी सावित्री दिया को वापस कमरे मे ले आएगी. अब सावित्री के मन मे कुच्छ शक़ पैदा होने लगा. लेकिन उसे अपनी मा पर बहुत विश्वास था. इस वजह से वह कोठारी से बाहर आ कर सोचने लगी की उसे कही भ्रम तो नही हो रहा. आख़िर मा के बारे मे ऐसी बात क्यों सोच रही है. तभी सीता ने कोठारी मे से दिया खुद ही लेकर छप्पर मे जा कर पक रहे चावल को देखते हुए कुच्छ गुस्से मे बोली "....तू हमेशा चावल मे पानी कम डालती है...और ..चावल रोज़ जल जाता है...पता नही कब तुझे खाना बनाने आएगा......" इतना कह कर गुस्से से सीता ने सावित्री की ओर देखने लगी तो गुस्से मे लाल चेहरे को सावित्री ने अनायास ही देखने लगी और दिया सीता के हाथ मे ही होने से रोशनी सीधे सीता के मुँह पर पड़ रही थी जिसमे जल्द ही धोया हुया चेहरा ऐसे लग रहा था मानो अभी नहा कर आई हो लेकिन दूसरे ही पल सावित्री की नज़र अपनी मा के निचले होंठ पर पड़ी तो उसे ऐसे लगा की चक्कर आ जाएगा और जल रहे चूल्‍हे पर ही गिर पड़ेगी. सावित्री बिना किसी जबाव दिए और पक रहे चावल को बिना देखे ही छप्पर से बाहर आ गयी. उसने दिया के रोशनी मे जो कुच्छ देखा यकीन नही हो रहा था. उसकी मा के निचले होंठ पर कुच्छ नीले और काले रंग का दाग लग रहा था. जो किसी के दाँत के काटने के वजह से हो सकता था.


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 25 Dec 2014 03:08

सावित्री यही समझने की कोशिस कर रही थी की आख़िर मा आज अंधेरा होने के बाद कहाँ मिट्टी का तेल लेने गयी थी और कुच्छ देर के बाद वापस आई. आने के तुरंत बात पेशाब करने गयी और फिर अपने मुँह को पानी के ठीक से धोइ और मूह मे पानी ले कर गलगाला भी की. इन्सब के अलावा उसके निचले होंठ पर कुच्छ दाँत के कटे के निशान तो यही बता रहे हैं की मा किसी मर्द के पास गयी थी. और यदि ऐसा सच है तो आख़िर मा इतना गंदा कम कब सुरू कर दी और वो कौन है जो मा के साथ ये सब किया होगा. इन्ही सोचों मे उलझी सावित्री को कुच्छ समझ नही आ रहा थी. थोड़ी देर बाद जैसे ही खाना तैयार हुया की मा बेटी दोनो खाना खाए. सावित्री को काफ़ी भूख लगी थी और थकान तो इतना की लगता था खड़े खड़े ही गिर जाएगी. कारण भी था की कई बार झाड़ गई थी और तेजू भी खूब जम के चुदाई कर दिया था. सावित्री को अब सोने के अलावा कुछ नही दिखाई दे रहा था.

बिस्तर पर पड़ते ही सावित्री को कब नीद लगी उसे पता ही नई चला. जैसे ही सोई थी ठीक वैसे ही सुबह हो गयी और एक करवट भी नही ले सकी थी. सुबह जब उसकी मा ने उसे ज़ोर से झकझोर कर उठाया तब जा कर चौंक कर उठी. एक गहरी साँस छ्चोड़ते हुए अपनी आँखे मीस्ते हुए उठी और लड़खड़ाते कदमो से घर के पीच्छवाड़े मूतने चली गयी. पेशाब भी बहुत तेज लगी थी. ढेर सारा मूतने के बाद सावित्री महसूस की कि उसकी बुर मे एक अजीब ताज़गी भर गयी है मानो उसके साथ साथ उसकी बुर की भी थकान मिट चुकी हो.

थोड़ी देर बाद पीच्छले दीनो की बाते फिर दिमाग़ मे उठने लगी. कुच्छ समय बिता और उसकी मा बाहर रखे बाल्टी का पानी ले कर नहाने के लिए बनी जगह मे चली गयी और चारो ओर से घीरे हुए इस स्थान मे केवल एक तरफ से थोड़ा सा खुली जगह जो किसी दरवाजे की बराबर था उसमे सारी का परदा लगा दी और नहाना सुरू कर दी. सावित्री छप्पर मे बैठ कर सुबह के खाना बनाने की तैयारी मे लग गयी थी सब्जी काटते हुए पीच्छले दिन की बातों को थोड़ी देर के लिए भूल गयी थी. तभी उसे सब्जी धोने के लिए पानी की ज़रूरत थी. आज देर से उठने के वजह से घर के पीछे बड़े बगीचे के कुआँ से पानी भी भर के नही लाई थी. और पानी घर मे और कहीं नही था बल्कि उस नहाने वाले जगह मे कुच्छ पानी रखा रहता था जो कभी कम पड़ जाने की स्थिति मे उपयोग होता था. अगले पल सावित्री ने सब्जी धोने के लिए तुरंत पानी लेने नहा रही मा के पास गयी और परदा हटाई तो देखी की उसकी मा एकदम नंगी खड़ी थी और उसका पूरा बदन भीगा हुआ था. उसकी नज़र अपनी मा के दोनो चुचिओ के काले घुंडीओ के आस पास चारो ओर लाल और सुर्ख रंग के दाँत के काटने के निशान एकदम साफ साफ दीख रहे थे. लेकिन सीता ने कुच्छ बोले बगैर चुप चाप अपनी बदन को रगड़ रगड़ कर मैल छुड़ा रही थी और दोनो चुचियाँ हिल रही थी जिसको सावित्री बार बार देख रही थी. तभी सीता ने पुचछा "क्या चाहिए..." इतना सुनकर सावित्री के सूखे गले से आवाज़ निकली "...प पानी व वो सब्जी धोने के..लिए.." फिस सीता ने कहा "...पानी क्या ले जा रही है..सब्जी ही ले आ यहीं धो ले...जा ले आ.." इतना सुन कर सावित्री जाने के पहले एकदम नंगी खड़ी हो कर नहा रही अपनी मा के बुर को देखी तो और चौंक गयी. बुर पर एक भी बाल नही थे मानो ऐसा लगता था जैसे पीच्छले ही दिन झांतों को सॉफ की हो. लेकिन अपनी नज़रें उसकी सॉफ सुथरे बुर से हटाने के तुरंत वापस सब्जी लाने चली गयी. अब सावित्री का कलेजा धक धक कर रहा था. उसे अपनी आँखों पर यकीन ही नही हो रहा था की उसकी मा आज एकदम नंगी ही नहा रही थी और उसकी दोनो चुचिओ को किसी ने दाँतों से खूब काटा था. उसने वर्तन मे सब्जी को उठाई तो उसे महसूस हुआ मानो हाथ कांप रहे हों और सब्जी कभी भी गिर जाए. आख़िर फिर नहाने वाली जगह गयी और परदा को हटा कर अंदर हुई तो देखी की उसकी मा झांतों से एकदम सॉफ सुथरी बुर को ठीक सामने करके बैठी थी और पानी को डाल कर नहा रही थी. सावित्री किसी तरह पानी से सब्जी को धोने लगी और रह रह कर बुर और चुचिओ को देख भी लेती थी. तभी उसकी मा सावित्री के सामने ही अपने दोनो जांघों को फैला कर बुर पर पानी डालते हुए दूसरे हाथ से बुर को रगड़ रगड़ कर धोने लगी. कभी कभी बीच वाली उंगली भी अपनी बुर मे घुसा कर धोने लगती दो सावित्री को लगता की वह अपनी बुर मे नही बल्कि उसी की बुर मे उंगली कर रही है. सावित्री यह भूल गयी की उसकी मा उसे देख रही थी की वो बुर को पानी से धोते हुए ध्यान से देख रही है. सीता ने सावित्री की ओर देखा और जैसे ही आँखे मिली सीता ने बोली "तुम भी अपनी जंगल झाड़ की सफाई कर लिया करो...जंगल पाल कर रखी हो पता नही क्या करोगी..." सावित्री अपनी आँखें अब सब्जी धोने पर लगा दी. तभी सीता ने फिर कहा "कल मैं बाल बनाने वाला ले आई हूँ नहाने के पहले ही बना लेना.....इस जगह को भी सॉफ रखा करो..." इतना सुनते ही सावित्री की साँसे तेज हो गयी और सब्जी धोने के बाद जल्दी से वापस छप्पर मे आ गयी.

तभी उसकी मा ने बुलाया "थोड़ा मेरी पीठ मल तो ....मैल बैठ गया है...पीछे हाथ ही नही पहुँच पाती...सुन रही है..." इतनी बात कान मे पड़ते ही सावित्री की मुँह से बस " ह ह हूँ " निकला और तेज धड़कानो के साथ नहाने वाले बाथरूम की तरह बने जगह पर गयी और परदा हटा कर अंदर हो गयी. तभी एकदम नंगी बैठी हुई सीता ने अपनी पीठ उसकी ओर कर दी. सावित्री के काँपते हाथ उसके पीठ पर फिसलने लगे. रगड़ने पर भी मैल का कही नामो निशान नही था. तभी उसकी मा ने कहा " थोड़ा नीचे कमर की ओर भी मल...पीछे हाथ ना जाने से मैल छूट ही नही पाती..." सावित्री अपने हाथों को पीठ पर नीचे की ओर ले जा कर मलने लगी. थोड़ा सा मैल निकला ही था की उसकी मा ने फिर बोला " थोड़ा और नीचे रगड़....शरमाती क्या है...अब तू सयानी हो गयी है ..सब 'समझने' लगी है.." इतना सुनते ही सावित्री फिर से सनसना गयी. और नीचे का मतलब था सीता के बड़े बड़े दोनो चूतड़ और दोनो चूतदों के बीच एक मोटी लकीर जो बैठी होने की स्थिति मे एकदम फैली हुई थी देखने मे एकदम धन्नो चाची की तरह थी. जल्दी जल्दी अपने हाथों से रगड़ रही थी की उसकी मा ने फिर कहा " दोनो के बीच वाली जगह मे उंगली डाल के रगड़...ज़ोर लगा के रगड़...ऐसे क्या फूल की तरह छ्छू रही है. " अब सावित्री के सामने कोई चारा नही था. उसने अपनी मा के चूतदों के बीच वाली धारी मे उंगली रगड़ने लगी तो सीता ने अपनी आँखे मूंद कर हल्की सी सिसकारी ले ली जो सावित्री के कान मे पड़ते ही उसकी बुर चुनचुना उठी.

क्रमशः...........

rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 25 Dec 2014 03:10

Sangharsh--35

gataank se aage..........

isi chhappar ke saamne dusri or maa beti ke nahaane ka intjaam tha. jo baans aur ghas fus, puraane palaastic aur fati purani saari se gher kar bana huaa tha. is chhoti si jagah me darwaje ke aakar ka jagah chhuta hua tha. jiska munh chhappar ki or hi tha. maa beti nahaate samay is khule huye jagah par ek puraani saadi ka parda dal leti thi.

chulha me aag kisi tarah jal gai. abhi bhi ma vapas nahi aayi thi. savitri ko yah badhiya mauka tha ki ghee wali katori ko laakar garam kar leti. fir maa ke vapas aane ka dar man me daud gayaa. lekin dusre pal dhanno chachi ki kahi baat man ko himmat dene lagi. dhanno chachi kahi thi ki bina himmat ke koi mazaa nahi mil paayega. yahi soch kar savitri us chulhe ke pas khadi hokar kabhi chulhe me jal rahe aag ko dekhti to kabhi maa ke aane wale raste ki or. aur fir himmat wali baat. in teeno ke beech savitri ne ek gahri sans lee aur man me jid paida karti hui teji se kothri me ghusi aur kone me rakhe puraane lohe ke box ke neeche rakhi desi ghee ki katori ko lekar teji se vapas chhappar me jal rahe chulhe ke paas aa gayi. dusare pal maa ke aane wale raste ki or dekhti huyi desi ghee ke katori ko chulhe ke aag ke kinaare aise rakh di taaki halki garam ho aur desi ghee me gungunaa pan aa jaaye aur lagaane me jale nahi. ghee ke halka garm hote der nahi lagi. savitri ko abhi bhi dar lag rahaa tha ki kahi maa aa na jaaye. fir jal rahe chulhe par chawal banaane ke liye paani bharaa bartan rakh di. aur dusre pal garm ho chuke desi ghee ki katori le kar turant kothri me bhag gayi. kothari ke ander hi diya jal rahaa tha. savitri ne truant us diya ko kothari ke baahar rakh di. ab kothari me andhera ho gayaa tha aur baahar jal rahe deepak se ander itni roshni aa rahi thi ki andar lagbhag sab kuchh deekh ja rahaa tha. savitri ne darwaaje se baahar ki or maa ke aane wale raste ki or dekhna chah rahi thi lekin andhera hone ke vajah se jyade kuchh deekh nahi paa rahaa tha. ab ghee lagaane ki baari thi. savitri ko salwaar kholne me dar lag rahaa tha ki kahin maa aa na jaaye. savitri ne fir apne ko darti huyi mahsoos ki aur fir dhanno chachi ki baad yaad aa gayi. dusare pal hi savitri ne apne salwaar ke naade ko khol kar aur chaddhi ko turant thoda neeche sarka di aur apni nazaren darwaje se baahar ki or bhi tikaye rahi taaki maa ko aate dekhte hi kapade theek kar desi ghee ki katori bhi chhupa leti. lekin abhi bhi maa ka koi ata pata nahi hone se savitri ne katori me rakhe desi ghee me unglion ko dubaayi jo halki garm thi. aur dusare pal hi apni bur par jaldi jaldi lagaane lagi. thodi si hi ghee me bur puri bheeg si gayi fir agle pal savitri khadi hi khadi apni bur ke dono fankon ko desi ghee se lage hath aur unglion se theek se malish karne lagi. aisa karte huye uski najaren darwaje ke baahar bhi lagi rahi. desi ghee ki malish paate hi bur ki puttian mano thirkane lagi. savitri ko bahut anand aane lagaa. isi anand se sarabor ho kar savitri ne desi ghee se apni bur ko khub chipoda. fir kya tha jhanton ko bhi khub sahlayi aur ghee se jhanton ko bhi tar kar daali. ab bur me bas ek meethi dard hi rah gayi thi. bur aur jhanton ko desi ghee se malish karne ke baad savitri ne desi ghee se dubi unglion ko bur ke munh par lagayi to khud ko rok nahi paayi aur ungli ko kas ke ander ki or pel di aur desi ghee se chupoda hua ungli bur me sarak gayi aur savitri andand se sihar uthi. lagbhag char panch baar bur ke andar baahar unglion ko kar ke ghee ko theek se lagaa li. fir ek baar apni bur ko upar se achchhi tarah masal kar mast ho chuki savitri ko dhanno chachi ki kahi baat par bharosa ho gayaa ki yadi uske saath rahi to bahut mazaa karegi. fir savitri ne apni chaddhi ko upar ko khiskaa kar pahan li aur fir salwaar ke naade ko bhi baandh li. fir desi ghee ke katori ko jaldi se halki roshni me kothri ke kone me rakhe lohe ke purane box ke neeche chhupa di. kam ho gayaa tha. savitri fir baahar rakhe diye ko vapas ander kothari me laa kar rakh di. aur khud chhappar me chulhe par ubal rahe paani me chawal dalne chali gayi. abhi bhi maa vapas nahi aayi thi. yahi soch kar savitri chappar me chulhe ke bagal me bichhi khaat par letati huyi ek baar fir apni bur ko salwaar ke upar se hi halki si masli to sara badan masti me jhanjhanaa utha. tabhi maa ke kadmo ki aahat aate hi savitri khat par se uth kar khadi ho gayi aur maa ke hathon me sabji aur kuchh saman aur dusare hath me mitti ke tel ka bharaa huaa dibba ko thaamate huye puchhi "....kyon itni der ho gayi hai. achchha hota ki din me hi ye sab le aati ...dekho to kitna andhera ho gayaa hai...." itna sun kar sita kuchh sochi aur fir kuchh jhallate huye boli "...samaan lene me der to lagegi hi....aur..mitti ka tel khatm ho gayaa tha... ......" itna kah kar sita chup ho gayi, fir savitri ne apne haath me liye mitti ke tel ke dibbe ko andar rakhti huyi fir puchhi "...kahaan se mitti ka tel laayi ho..?" savitri ke is sawaal ka jabaav diye bagair sita ghar ke peechhwade mutane chali gayi.

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