खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:00

खूनी हवेली की वासना पार्ट --10

गतान्क से आगे........................

"आइ नो" जै बोला "और शायद मैं ये बात करता भी नही पर एक दिन मैने चाचा जी को उनके वक़ील देवधर से बात करते सुना. मैं उनके कमरे के बाहर से गुज़र रहा था के अचानक उनकी आवाज़ मेरे कानो में पड़ी. वो अपनी विल की बात कर रहे थे जिसके अनुसार सारी प्रॉपर्टी उनको 3 बेटों और बेटी कामिनी में बराबर बाट दी जाती यानी के मेरे हिस्से में आता बाबाजी का घंटा जिसको मैं सारी उमर बैठके हिलाता रहता"

ख़ान हल्के से हसा.

". ये बात बर्दाश्त ना हुई" जै ने बात जारी रखी "मैं छोटा ज़रूर था पर इतनी समझ थी मुझ में. उसी दिन रात को डिन्नर के बाद मैने चाचा जी से प्रॉपर्टी में अपने हिस्से की बात की जिसको लेकर वो मुझपर बहुत चिल्लाए और अगले ही दिन मुझे हवेली से निकाल दिया गया."

"एक आखरी सवाल" ख़ान अपनी कॅप उठाते हुए बोला "जब तुम कमरे में दाखिल हुए या जब कमरे की तरफ जा रहे थे, तब किसी और को तुमने कमरे से निकलते देखा?

जै ने इनकार में सर हिलाया

"ठाकुर साहब के कमरे में एक खिड़की है जो हवेली के पिच्छले हिस्से की तरफ खुलती है. जब तुम कमरे में गये तो खिड़की बंद थी या खुली हुई? ख़ान ने खड़े होते हुए कहा

जै सोचने लगा और फिर गर्दन हिलाता हुआ बोला

"कह नही सकता. ध्यान ही नही दिया मैने. मेरे सामने चाचा जी पड़े थे और मेरा पूरा ध्यान उन्ही पर था"

करीब 15 मिनट बाद ख़ान पोलीस स्टेशन से निकला और अपनी जीप में बैठकर गाँव की तरफ चल पड़ा. उसका ये यकीन के जै ने खून नही किया और पक्का हो गया था और वो जानता था के अपनी तरफ से वो जै को बचाने की पूरी कोशिश करेगा क्यूंकी वो जानता था के जै के साथ ना-इंसाफी होगी अगर उसको सज़ा हुई तो. बहुत साल पहले खुद ख़ान के साथ ना-इंसाफी हुई थी जिसकी वजह से उसकी माँ की मौत हो गयी थी पर उसको किसी ने इंसाफ़ नही दिया था तबसे ही उसको हमदर्दी थी जै जैसे लोगों से जो बेकार ही सूली चढ़ा दिए जाते थे.

सबसे बड़ा सवाल अब भी ख़ान के सामने वैसा ही खड़ा था. अगर जै ने ठाकुर को नही मारा तो किसने मारा, और 10 मिनट के अंदर अंदर कैसे मारा?

...................................................

उस रात अपने माँ बाप के बेडरूम में सोने के बाद रूपाली के लिए जैसे सब कुच्छ बदल गया था. जो भी झिझक दिल में बची थी सब जाती रही. वो समझ गयी थी के यूँ आपस में लिपटा लिपटी करने में मज़ा आता है. वो अक्सर अब अपने आप से खेलने लगी थी.

अगले 2 हफ़्तो तक वो इंतेज़ार करती रही के फिर से शंभू और कल्लो का खेल देखे पर किस्मत ने साथ नही दिया. तबीयत खराब होने की वजह से उसके माँ बाप खुद तो मंदिर गये पर उसके भाई को साथ नही ले गये. वो घर पर ही होता और उसकी देख रेख करने के लिए एक नौकरानी और घर में रहती. रूपाली का दिल ऐसे टूटा जैसे किसी बच्चे का खिलोना छिन गया हो. वो कल्लो और शंभू का खेल देखने के लिए मरी जा रही थी, उन दोनो को फिर से नंगा देखने की उत्सुकता बढ़ रही थी.

ऐसे ही एक दिन शाम को रूपाली बैठी टीवी देख रही थी के हाथ में झाड़ू उठाए कल्लो कमरे में दाखिल हुई. रूपाली का पूरा ध्यान टीवी की तरफ था और कल्लो कमरे में झाड़ू लगा रही थी. झाड़ू लगाती लगती कल्लो उस सोफा के सामने आई जिस पर रूपाली बैठी हुई थी.

"पावं थोड़ा उपर करना बीबी" कल्लो ने कहा

रूपाली ने टीवी की तरफ देखते देखते ही अपने पावं उपेर करके सोफे पर रख लिए. कल्लो सोफा के नीच से झाड़ू लगाने के लिए अपने घुटनो पर बैठ गयी और झुक कर झाड़ू निकालने लगी. तभी रूपाली की नज़र एक पल के लिए उसपर पड़ी और वहीं थम कर रह गयी.

कल्लो ठीक उसके सामने घुटनो पर बैठी ज़मीन पर झुक कर सोफा के नीचे झाड़ू घुमा रही थी. उसने एक काले रंग का सलवार सूट पहेन रखा था जिसका गला काफ़ी बड़ा था. झुकी होने के वजह से गला खुल सा गया था और रूपाली की नज़र कमीज़ से होती हुई सीधी कल्लो के सीने पर पड़ी.

कल्लो ने सफेद रंग का ब्रा पहें रखा था. उस सफेद ब्रा में क़ैद उसकी काली रंग की चूचियाँ मुश्किल से ब्रा के अंदर समा पा रही थी. रूपाली पहले भी एक बार इन छातियों को देख चुकी थी पर ब्रा के अंदर नही. उसकी खुद की छ्होटी छ्होटी छातियो ब्रा के अंदर गायब हो जाती थी, बल्कि ब्रा हल्का ढीला ही रह जाता था पर कल्लो का ब्रा देख कर तो ऐसा लग रहा था जैसे फॅट जाएगा. ब्लॅक & वाइट का वो कॉंबिनेशन देख कर रूपाली की नज़र कुच्छ पल के लिए वहीं अटक गयी थी.

तभी उसको एहसास हुआ के कल्लो एक ही जगह पर रुकी हुई है और झाड़ू के लिए उसका हाथ अब हिल नही रहा था. रूपाली ने फ़ौरन नज़र उठाई और उसकी नज़र सीधी कल्लो की नज़र से टकराई. कल्लो सीधा रूपाली की तरफ देख रही थी पर वैसे ही आराम से झुकी हुई थी, जैसे खुद रूपाली को अपनी छातियों दिखा र्है हो. उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी.

अपनी चोरी पकड़े जाने पर रूपाली एकदम हड़बड़ा गयी. वो फ़ौरन उठ खड़ी हुई और टीवी ऐसे ही ऑन छ्चोड़ कर अपने कमरे की तरफ चल पड़ी. पीछे खड़ी कल्लो अब भी मुस्कुरा रही थी.

रूपाली कुच्छ देर तक यूँ ही अपने बिस्तर पर पड़ी रही. उसकी समझ नही आ रहा था के क्या करे.. डर लग रहा था के कल्लो ने अगर किसी को कुच्छ कह दिया तो? अगर कल्लो ने उसकी माँ से शिकायत कर दी के रूपाली क्या देख रही थी तो?

तभी दिल में ख्याल आया के अगर कल्लो ने कुच्छ कहा तो वो भी अपनी माँ को कह देगी के कल्लो और शंभू सनडे को उनके कमरे में ही क्या करते थे. इस ख्याल ने उसको थोड़ा हौसला दिया पर उसकी हिम्मत अब भी कल्लो से आँख मिलाने की नही हो रही थी.

उसने घड़ी पर नज़र डाली. शाम के 4 बज रहे थे. रूपाली का कुच्छ खाने का दिल हुआ और वो अपने कमरे से निकल कर किचन की तरफ बढ़ी.दिल ही दिल में वो ये दुआ कर रही थी के कल्लो से सामना ना हो और उसकी दुआ जैसे क़बूल हो गयी. उसको कल्लो घर में कहीं दिखाई नही दी. रूपाली किचन में पहुँची तो वहाँ उसको शंभू काका भी दिखाई नही दिए.

रूपाली को बहुत भूख लगी थी और अक्सर वो अपनी माँ से ही खाने को कुच्छ माँगा करती थी पर इस वक़्त उसके माँ बाप घर पर नही थे. उसके पास सिवाय शंभू काका से कुच्छ बनाने को कहने के अलावा कोई चारा नही था.

"शायद स्टोर से कुच्छ लाने को गये हों" सोचकर रूपाली स्टोर रूम की तरफ बढ़ी.

स्टोर रूम घर के पिछे बना हुआ था. रूपाली के पिता भी एक ठाकुर थे और अपने खेत थे. अक्सर उन खेतों से आया गेहूँ और चावल घर के पिछे बने हुए एक स्टोर रूम में रखा होता था. घर की आधी से ज़्यादा ज़रूरत की चीज़ें उसी स्टोर रूम में होती थी इसलिए शंभू के पास हमेशा उसकी चाबी होती थी.

धीरे कदमो से चलती रूपाली स्टोर के पास आई. दरवाज़े पर ताला नही था पर दरवाज़ा बंद था. रूपाली जैसे ही दरवाज़े के नज़दीक आई उसको एक जानी पहचानी आवाज़ सुनाई पड़ी.

आवाज़ कल्लो की थी.

रूपाली आवाज़ सुनते ही पहचान गयी के ऐसी आवाज़ कल्लो के मुँह से कब निकलती है. घर से कल्लो और शंभू काका दोनो ही गायब थे. उसको एक पल में समझ आ गया के वो दोनो अंदर स्टोर में था और क्या कर रहे थे.

रूपाली के दिल की धड़कन बढ़ चली. एक पल को तो उसको ख्याल आया के वापिस चली जाए पर अगले ही पल उसने अपना इरादा बदल दिया. वो तो खुद कब्से ये नज़ारा देखने के लिए सनडे का इंतेज़ार कर रही ही. उसने अपना मंन अंदर देखने का बना लिया और उस वक़्त ये काम ज़्यादा मुश्किल भी साबित नही हुआ.

स्टोर का दरवाज़ा लकड़ी का था और बहुत पुराना था. वो दरवाज़ा नीचे के हिस्से से हल्का सा टूटा हुआ था जिसकी वजह से ज़मीन और दरवाज़े के बीच हल्की सी जगह होती थी जहाँ से अंदर देखा जा सकता था. रूपाली फ़ौरन ज़मीन पर लेट सी गयी और कमरे के अंदर झाँका.

स्टोर के अंदर आते चावल की बोरियाँ हमेशा भरी रहती थी जिसकी वजह से कमरे के अंदर जगह नही होती थी. थोड़ी सी जगह बस दरवाज़े के पास ही होती थी ताकि अंदर जाने वाला दरवाज़ा खोलकर अंदर खड़ा हो सके और बोरियाँ बाहर निकाली जा सकें. इसी वजह से जैसे ही रूपाली ने अंदर नज़र डाली, उसको शंभू और कल्लो बिल्कुल दरवाज़े के पास ही नज़र आए. मुश्किल से 4 फुट का फासला था. इस तरफ रूपाली ज़मीन पर लेटी हुई देख रही थी, बीच में दरवाज़े और दरवाज़े के बिल्कुल पास ही दूसरी तरफ कल्लो और शंभू.

पहली नज़र पड़ते ही एक पल के लिए रूपाली को समझ नही आ सका के वो क्या देख रही थी. दरार छ्होटी सी ही थी इसलिए ज़्यादा नज़र आ रहा था और जो नज़र आ रहा था वो इंसानी शरीर ही थी पर कौन सा हिस्सा ये रूपाली को समझ नही आया. उसने गौर से देखा और समझने की कोशिश की. वो हिस्सा जो भी था वो हिल रहा था और थोड़ी देर गौर से देखने के बाद रूपाली समझ गयी के वो क्या था.

कमरे के दूसरी तरफ कल्लो नीचे ज़मीन पर लेटी हुई. उसका सर दूसरी तरफ और पावं दरवाज़े की तरफ थे और खुले हुए थे. उसने सलवार उतार रखी थी इसलिए रूपाली की नज़र सीधी उसकी टाँगो के बीच पड़ रही थी. कल्लो की दोनो टांगे उपेर हवा में उठी हुई थी और उसकी टाँगो को पकड़े हुए बीच में बैठे थे शंभू काका.

काका का चेहरा दरवाज़े की दूसरी तरफ यानी कल्लो की तरफ था और उनकी पीठ दरवाज़े की ओर. रूपाली को पिछे से उनकी पीठ और उनकी गांद दिखाई दे रही थी. वो अपने पंजो पर उकड़ू बैठे हुए और आगे पिछे हो रहे थे. उनके दोनो तरफ कल्लो की टांगे उपेर उठी हुई थी जिनको उन्होने अपने हाथ से पकड़ रखा था और आगे पिछे हिल रहे थे.

"हाए मेरी माँ" कल्लो की आवाज़ आई "ज़ोर से धक्का लगाओ"

ये बात सुनकर काका ज़ोर ज़ोर से अपनी कमर हिलाने लगे और तब रूपाली का ध्यान उनकी गांद के नीचे लटक रहे उनको आंडो की तरफ गया. वो जानती थी के ये क्या हैं पर इतने बड़े होते हैं वो ये पहली बार देख रही थी. आंडो से ही लगा काका की लड़कों वाली चीज़ थी जो कल्लो की ......

रूपाली की आँखें हैरत से खुल गयी.

वो कल्लो की लड़कियों वाली चीज़ के अंदर घुसी हुई और अंदर बाहर हो रही थी.

रूपाली का दिल धक से रह गया. तो लड़के ये यहाँ भी डालते हैं. उसको वो रात याद आई जब उसने अपने माँ बाप को देखा था. वो जानती थी के पापा ने मम्मी के पिछे से घुसा रखा था और अब काका ने कल्लो के आगे से. मतलब आगे पिछे दोनो तरफ घुसा सकते हैं?

रूपाली चुप चाप लेटी देखती रही. काका हिल रहे थे और वो लंबी सी चीज़ कल्लो के अंदर बाहर हो रही थी.

"और तेज़ ... ज़ोर से .... ज़ोर से ...." कल्लो की आवाज़ आ रही थी.

"तो इसको गांद मारना कहते हैं" रूपाली ने उस दिन अपनी माँ के मुँह से निकले शब्दों के बारे में सोचा.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --10

gataank se aage........................

"I know" Jai bola "Aur shayad main ye baat karta bhi nahi par ek din maine chacha ji ko unke waqeel Devdhar se baat karte suna. Main unke kamre ke bahar se guzar raha tha ke achanak unki aawaz mere kaano mein padi. Vo apni will ki baat kar rahe the jiske anusaar saari property unko 3 beton aur beti Kamini mein barabar baat di jaati yaani ke mere hisse mein aata Babaji ka Ghanta jisko main saari umar bethke hilata rehta"

Khan halke se hasa.

"Mujhse ye baat bardasht na hui" Jai ne baat jaari rakhi "Main chhota zaroor tha par itni samajh thi mujh mein. Usi din raat ko dinner ke baad main chacha ji se property mein apne hisse ki baat ki jisko lekar vo mujhpar bahut chillaye aur agle hi din mujhe haweli se nikal diya gaya."

"Ek aakhri sawal" Khan apni cap uthate hue bola "Jab tum kamre mein daakhil hue ya jab kamre ki taraf ja rahe the, tab kisi aur ko tumne kamre se nikalte dekha?

Jai ne inkaar mein sar hilaya

"Thakur sahab ke kamre mein ek khidki hai jo haweli ke pichhle hisse ki taraf khulti hai. Jab tum kamre mein gaye toh khidki band thi ya khuli hui? Khan ne khade hote hue kaha

Jai sochne laga aur phir gardan hilata hua bola

"Keh nahi sakta. Dhyaan hi nahi diya maine. Mere saamne Chacha ji pade the aur mera poora dhyaan unhi par tha"

Kareeb 15 min baad Khan police station se nikla aur apni jeep mein bethkar gaon ki taraf chal pada. Uska ye yakeen ke Jai ne khoon nahi kiya aur pakka ho gaya tha aur vo janta tha ke apni taraf se vo Jai ko bachane ki poori koshish karega kyunki vo janta tha ke Jai ke saath na-insafi hogi agar usko saza hui toh. Bahut saaal pehle khud Khan ke saath na-insafi hui thi jiski vajah se uski maan ki maut ho gayi thi par usko kisi ne insaaf nahi diya tha tabse hi usko hamdardi thi Jai jaise logon se jo bekaar hi sooli chadha diye jaate the.

Sabse bada sawal ab bhi Khan ke saamne vaisa hi khada tha. Agar Jai ne Thakur ko nahi maara toh kisne mara, aur 10 mein ke andar andar kaise mara?

Us raat apne maan baap ke bedroom mein sone ke baad Rupali ke liye jaise sab kuchh badal gaya tha. Jo bhi jhijhak dil mein bachi thi sab jaati rahi. Vo samajh gayi thi ke yun aapas mein lipta lipti karne mein maza aata hai. Vo aksar ab apne aap se khelne lagi thi.

Agle 2 hafto tak vo intezaar karti rahi ke phir se Shambhu aur Kallo ka khel dekhe par kismat ne saath nahi diya. Tabiat kharab hone ki wajah se uske maan baap khud toh mandir gaye par uske bhai ko saath nahi le gaye. Vo ghar par hi hota aur uski dekh rekh karne ke liye ek naukrani aur ghar mein rehti. Rupali ka dil aise toota jaise kisi bachche ka khilona chhin gaya ho. Vo Kallo aur Shambhu ka khel dekhne ke liye mari ja rahi thi, un dono ko phir se nanga dekhne ki utsukta badh rahi thi.

Aise hi ek din shaam ko Rupali bethi TV dekh rahi thi ke haath mein jhadu uthaye Kallo kamre mein daakhil hui. Rupali ka poora dhyaan TV ki taraf tha aur Kallo kamre mein jhaadu laga rahi thi. Jhaadu lagati lagati Kallo us sofa ke saamne aayi jis par Rupali bethi hui thi.

"Paon thoda upar karna bibi" Kallo ne kaha

Rupali ne TV ki taraf dekhte dekhte hi apne paon uper karke sofe par rakh liye. Kallo sofa ke neech se jhaadu lagane ke liye apne ghutno par beth gayi aur jhuk kar jhaadu nikalne lagi. Tabhi Rupali ki nazar ek pal ke liye uspar padi aur vahin tham kar reh gayi.

Kallo theek uske saamne ghutno par bethi zameen par jhuk kar sofa ke neeche jhaadu ghuma rahi thi. Usne ek kaale rang ka salwar suit pehen rakha tha jiska gala kaafi bada tha. Jhuki hone ke vajah se gala khul sa gaya tha aur Rupali ki naza kameez se hoti hui sidhi Kallo ke seene par padi.

Kallo ne safed rang ka bra pehen rakha tha. Us safed bra mein qaid uski kaali rang ki chhatiyan mushkil se bra ke andar sama pa rahi thi. Rupali pehle bhi ek baar in chhatiyon ko dekh chuki thi par bra ke andar nahi. Uski khud ki chhoti chhoti chhatiyan bra ke andar gayab ho jaati thi, balki bra halka dheela hi reh jata tha par Kallo ka bra dekh kar toh aisa lag raha tha jaise phat jaayega. Black & white ka vo combination dekh kar Rupali ki nazar kuchh pal ke liye vahin atak gayi thi.

Tabhi usko ehsaas hua ke Kallo ek hi jagah par ruki hui hai aur jhaadu ke liye uska haath ab hil nahi raha tha. Rupali ne fauran nazar uthayi aur uski nazar sidhi Kallo ki nazar se takrayi. Kallo sidha Rupali ki taraf dekh rahi thi par vaise hi aaram se jhuki hui thi, jaise khud Rupali ko apni chhatiyan dikha rhai ho. Uske chehre par ek halki si muskaan thi.

Apni chori pakde jaane par Rupali ekdam hadbada gayi. Vo fauran uth khadi hui aur TV aise hi on chhod kar apne kamre ki taraf chal padi. Pichhe khadi Kallo ab bhi muskura rahi thi.

Rupali kuchh der tak yun hi apne bistar par padi rahi. Uski samajh nahi aa raha tha ke kya kare.. Darr kag raha tha ke Kallo ne agar kisi ko kuchh keh diya toh? Agar Kallo ne uski maan se shikayat kar di ke Rupali kya dekh rahi thi toh?

Tabhi dil mein khyaal aaya ke agar Kallo ne kuchh kaha toh vo bhi apni maan ko keh degi ke Kallo aur Shambhu Sunday ko unke kamre mein hi kya karte the. Is khyaal ne usko thoda hausla diya par uski himmat ab bhi Kallo se aankh milane ki nahi ho rahi thi.

Usne ghadi par nazar daali. Shaam ke 4 baj rahe the. Rupali ka kuchh khaane ka dil hua aur vo apne kamre se nikal kar kitchen ki taraf badhi.Dil hi dil mein vo ye dua kar rahi thi ke Kallo se samna na ho aur uski dua jaise qabool ho gayi. Usko Kallo ghar mein kahin dikhai nahi di. Ruapli kitchen mein pahunchi toh vahan usko Shambhu Kaka bhi dikhai nahi diye.

Rupali ko bahut bhookh lagi thi aur aksar vo apni maan se hi khaane ko kuchh maanga karti thi par is waqt uske maan baap ghar par nahi the. Uske paas sivaay Shambhu Kaka se kuchh banane ko kehne ke alawa koi chara nahi tha.

"Shayad store se kuchh laane ko gaye hon" Sochkar Rupali store room ki taraf badhi.

Store room ghar ke pichhe bana hua tha. Rupali ke pita bhi ek thakur the aur apne khet the. Aksar un kheton se aayan ghehun aur chawal ghar ke pichhe bane hue ek store room mein rakha hota tha. Ghar ki aadhi se zyada zaroorat ki cheezen usi store room mein hoti thi isliye Shambhi ke paas hamesha uski chaabi hoti thi.

Dheere kadmo se chalti Rupali Store ke paas aayi. Darwaze par taala nahi tha par darwaza band tha. Rupali jaise hi darwaze ke nazdeek aayi usko ek jaani pehchani aawaz sunai padi.

Aawaz Kallo ki thi.

Rupali aawaz sunte hi pehchan gayi ke aisi aawaz Kallo ke munh se kab nikalti hai. Ghar se Kallo aur Shambhi Kaka dono hi gayab the. Usko ek pal mein samajh aa gaya ke vo dono andar store mein tha aur kya kar rahe the.

Rupali ke dil ki dhadkan badh chali. Ek pal ko toh usko khyaal aaya ke vaapis chali jaaye par agle hi pal usne apna irada badal diya. Vo toh khud kabse ye nazara dekhne ke liye Sunday ka intezaar kar rahi hi. Usne apne mann andar dekhne ka bana liya aur us waqt ye kaam zyada mushkil bhi saabit nahi hua.

Store ka darwaza lakdi ka tha aur bahut purana tha. Vo darwaza neeche ke hisse se halka sa toota hua tha jiski vajah se zameen aur darwaze ke beech halki si jagah hoti thi jahan se andar dekha ja sakta tha. Rupali fauran zameen par let si gayi aur kamre ke andar jhaanka.

Store ke andar aate chawal ki boriyaan hamesha bhari rehti thi jiski vajah se kamre ke andar jagah nahi hoti thi. Thodi si jagah bas darwaze ke paas hi hoti thi taaki andar jaane wala darwaza kholkar andar khada ho sake aur boriyaan bahan nikali ja saken. Isi vajah se jaise hi Rupali ne andar nazar daali, usko Shambhu aur Kallo bilkul darwaze ke paas hi nazar aaye. Mushkil se 4 foot ka faasla tha. Is taraf Rupali zameen par leti hui dekh rahi thi, beech mein darwaze aur darwaze ke bilkul paas hi doosri taraf Kallo aur Shambhu.

Pehli nazar padte hi ek pal ke liye Rupali ko samajh nahi aa saka ke vo kya dekh rahi thi. Darar chhoti si hi thi isliye zyada nazar aa raha tha aur jo nazar aa raha tha vo insaani shareer hi thi par kaun sa hissa ye Rupali ko samajh nahi aaya. Usne gaur se dekha aur samajhne ki koshish ki. Vo hissa jo bhi tha vo hil raha tha aur thodi der gaur se dekhne ke baad Rupali samajh gayi ke vo kya tha.

Kamre ke doosri taraf Kallo neeche zameen par leti hui. Uska sar doosri taraf aur paon darwaze ki taraf the aur khule hue the. Usne salwar utar rakhi thi isliye Rupali ki nazar sidhi uski taango ke beech pad rahi thi. Kallo ki dono taange uper hawa mein uthi hui thi aur uski taango ko pakde hue beech mein bethe the Shambhu Kaka.

Kaka ka chehra darwaze ki doosri taraf yaani Kallo ki taraf tha aur unki peeth darwaze ki aur. Rupali ko pichhe se unki peeth aur unki gaand dikhai de rahi thi. Voapne panjo par ukdu behte hue aur aage pichhe ho rahe the. Unke dono taraf Kallo ki taange uper uthi hui thi jinko unhone apne haath se pakad raha tha aur aage pichhe hil rahe the.

"Haaye meri maan" Kallo ki aawaz aayi "Zor se dhakka lago"

Ye baat sunkar Kaka zor zor se apni kamar hilane lage aur tab Ruapli ka dhyaan unki gaand ke neeche latak rahe unko ando ki taraf gaya. Vo jaanti thi ke ye kya hain par itne bade hote hain vo ye pehli baar dekh rahi thi. Ando se hi laga Kaka ki ladkon wali cheez thi jo Kallo ki ......

Rupali ki aankhen hairat se khul gayi.

Vo kallo ki ladkiyon wali cheez ke andar ghusi hui aur andar bahar ho rahi thi.

Rupali ka dil dhak se reh gaya. Toh ladke ye yahan bhi daalte hain. Usko vo raat yaad aayi jab usne apne maan baap ko dekha tha. Vo jaanti thi ke Papa ne Mummy ke pichhe se ghusa rakha tha aur ab Kaka ne Kallo ke aage se. Matlab aage pichhe dono taraf ghusa sakte hain?

Rupali chup chup leti dekhti rahi. Kaka hil rahe the aur vo Lambi si cheez Kallo ke andar bahar ho rahi thi.

"Aur tez ... zor se .... zor se ...." Kallo ki aawaz aa rahi thi.

"Toh isko gaand marna kehte hain" Rupali ne us din apni maan ke munh se nikle shabdon ke baare mein socha.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:02

खूनी हवेली की वासना पार्ट --11

गतान्क से आगे........................

तभी काका उठ खड़े हुए. अब रूपाली को कल्लो की फेली हुई टाँगें और उसकी टाँगो के बीच का होल दिखाई दे रहा था जो बहुत गीला सा हो रखा था. काका उसकी टाँगो के बीच खड़े थे और रूपाली को सिर्फ़ उनके पावं दिख रहे थे.

"क्या हुआ?" कल्लो ने पुछा

"ऐसे ठीक से हो नही रहा" काका ने कहा "जगह कम है इसलिए मैं लेट नही पा रहा"

"तो फिर?" कल्लो ने पुछा

"एक काम कर" काका बोले "तू इधर दरवाज़े के साथ लेट जा. फिर मैं आराम से तेरे उपेर चढ़ सकता हूँ"

कल्लो हिली और लेटी लेटी ही सरक्ति हुई दरवाज़े के साथ हो गयी. अब रूपाली को उसका जिस्म साइड से दिखाई दे रहा था. काका ने फिर कल्लो की टाँगें पकड़कर उपेर उठाई और अपनी चीज़ पकड़कर उसकी टाँगो के बीच बैठ गये.

"आआहह" कल्लो के मुँह से आवाज़ आई

रूपाली समझ गयी के काका ने फिर से कल्लो के अंदर अपना घुसाया है. आगे या पिछे वो ये अब देख नही पा रही थी.

तभी रूपाली ने कोशिश करके अपनी नज़र कल्लो की टाँगो से हटाकर उसके चेहरे पर डाली और उसका दिल एकदम धक से रह गया. वो फ़ौरन उठ खड़ी हुई और घर की तरफ वापिस चल दी.

कल्लो सीधा दरवाज़े में बनी उस दरार की तरफ देख रही थी. रूपाली जानती थी के कल्लो समझ गयी थी के कोई वहाँ से अंदर देख रहा था. वैसे तो कल्लो को बस अंदर झाँकति एक आँख ही दिखाई दी होगी पर जाने क्यूँ रूपाली को लग रहा था के कल्लो ने उसकी चोरी पकड़ ली है, वो समझ गयी है के अंदर रूपाली ही झाँक रही थी.

उस पूरी शाम रूपाली अपने कमरे से बाहर नही निकली. खाना भी उसने जल्दी जल्दी ख़तम किया और सोने चली गयी ताकि कल्लो से सामना ना हो. चोरी असल में कल्लो और शंभू की पकड़ी गयी थी, डरना उन्हें चाहिए थे के रूपाली किसी को कह ना दे पर हो उल्टा रहा था. रूपाली को लग रहा था के उसकी चोरी पकड़ी गयी है और अगर कल्लो ने किसी से कह दिया के रूपाली देख रही थी तो जाने क्या होगा.

रात को रूपाली को पता ही नही चला के वो कब सो गयी.

सुबह दरवाज़े पर किसी ने नॉक किया तो रूपाली की आँख खुली. उसने उठकर अपने कमरे का दरवाज़ा खोला तो सामने कल्लो खड़ी थी. रूपाली की साँस आधी उपेर और आधी नीचे रह गयी.

"कमरा साफ करना है बीबी जी" कल्लो बोली.

रूपाली का कमरा वो हमेशा सबसे आख़िर में सॉफ किया करती थी क्यूंकी रूपाली को देर तक सोने की आदत थी. फिर आज इतनी सुबह? रूपाली ने घड़ी पर नज़र डाली. 8 बज रहे थे.

"इतनी सुबह?" उसने कल्लो से पुछा

"हां मुझे जल्दी घर जाना है इसलिए सब काम निपटा रही हूँ" कल्लो बोली तो रूपाली ने दरवाज़े से हटकर उसको अंदर आने की जगह दे दी.

कल्लो कमरा सॉफ करने लगी और खुद रूपाली फिर बिस्तर पर लेट गयी पर आँखों में नीद कहाँ थी. कल्लो से नज़र बचाने के लिए उसने अपने चेहरे पर चादर डाल ली थी.

"बीबी जी" थोड़ी देर बाद कल्लो की आवाज़ आई

"ह्म्‍म्म्म" रूपाली ने चादर चेहरे से हटाए बिना ही कहा

"आप किसी से कहेंगी तो नही ना?" कल्लो धीरे से बोली

रूपाली का दिल जैसे फिर धक से रह गया.

"क्या नही कहूँगी?" वो थूक निगलते हुए बोली. चेहरे पर अब भी चादर पड़ी हुई थी.

कल्लो कुच्छ नही बोली. थोड़ी देर कमरे में खामोशी रही.

"मैं जानती हूँ के कल आप ही थी स्टोर रूम के बाहर. मैने देख लिया था. आप अकेली ही हो घर में जिसकी आँखें भूरी हैं और मैने दरार में से आपको झाँकते देख लिया था.

कमरे में कुच्छ देर तक पूरी तरफ सन्नाटा रहा.

"आप किसी से कहोगी तो नही ना?" कल्लो ने फिर पुचछा.

रूपाली जानती थी के उसकी चोरी पकड़ी गयी है. उसके दिमाग़ में जो सवाल उठ रहा था के क्या शंभू भी जानता है के रूपाली अंदर झाँक रही थी? अगर जानता है तो?

"हे भगवान" रूपाली जैसे शरम से गड़ गयी

अचानक उसको एक तरीका सूझा. कल्लो अब भी उसके कमरे की सफाई करती उसके जवाब का इंतेज़ार कर रही थी.

"कौन था तुम्हारे साथ?" उसने चादर के अंदर से पुछा. वो जानती थी के ये सवाल पुच्छ कर उसने इस बात का इक़रार कर लिया है के वही स्टोर रूम के अंदर झाँक रही थी.

"वो आप छ्चोड़िए ना मालकिन" कल्लो बोली "था कोई. उसने आपको नही देखा"

खुद कल्लो ने भी राहत की साँस ली के रूपाली को नही पता था के अंदर उसके साथ मर्द कौन था.

"अगर मैं मम्मी पापा को बता दूं तो?" रूपाली ने पुछा. चादर अब भी उसने ओढ़ रखी थी पर महसूस हो गया था के कल्लो ने उसके पावं पकड़ लिए हैं.

"ऐसा ज़ुल्म मत करना मालकिन" कल्लो की रोटी हुई आवाज़ आई सुनकर रूपाली ने अपने चेहरे से चादर हटाई और उठकर बैठ गयी "अगर किसी को पता चल गया तो मालिक मुझे नौकरी से निकाल देंगे और मेरा घरवाला तो मुझे जान से ही मार डालेगा"

रूपाली खामोशी से बैठी रही.

"आप किसी से कहेंगी तो नही ना मालकिन? कल्लो फिर बोली "आप जो कहेंगी मैं करने को तैय्यार हून. बस इसका ज़िक्र किसी से मत करना"

"ठीक है" आख़िर कार रूपाली बोली "मैं किसी से नही कहूँगी. अब कमरा साफ करके बाहर जाओ और मुझे सोने दो"

कल्लो का चेहरा खुशी से चमक उठा. वो फ़ौरन हाथ जोड़कर गर्दन हिलाती खड़ी हो गयी और अपने काम में लग गयी.

रूपाली चादर ओढकर फिर लेट गयी पर उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट थी. डर जाता रहा. कल्लो ने जिस तरह से उसके पावं पकड़े थे, जिस तरह से वो गिड़गिदा रही थी उससे रूपाली को ये भरोसा हो गया था के उसे खुद को डरने के कोई ज़रूरत नही. बल्कि डर तो उससे दूसरे रहे थे, वो तो डरा सकती थी.

उसके चेहरे पर मुस्कुराहट और गहरी हो गयी.

..............................................

शर्मा और ख़ान दोनो ही खाने की टेबल पर बैठे थे.

"सर एक बात कहूँ?" शर्मा बोला "बुरा तो नही मानेंगे?"

"जनता हूँ क्या कहने वेल हो" ख़ान बोला "खाना बहुत बकवास बनाता हूँ मैं"

शर्मा हस पड़ा

"आपको कैसे पता चला?

"अर्रे तुम पहले नही हो यार. बहुतो ने कहा है ये" ख़ान ने कहा. उस रात खाना उसने ही बनाया था.

ख़ान ने शर्मा को अपने घर खाना खाने के लिए बुलाया था. वो चाहता था के केस पर वो दोनो बैठकर थोड़ी देर बात करें क्यूंकी गाओं और गाओं के लोगों के बारे में एक शर्मा ही था जो अच्छी तरह से जानता था. जब सारा दिन सुकून से बात करने का मौका नही मिला तो ख़ान शर्मा को लेकर अपने घर ही आ गया.

दोनो ने खाना खाया और सिगरेट जलाकर आराम से बैठ गये.

"सर आप शादी क्यूँ नही कर लेते?" शर्मा बोला

"अर्रे मैं तो काब्से तैय्यर बैठ हूँ यार पर कोई कम्बख़्त मुझे शादी करने को राज़ी तो हो" ख़ान ने कहा

"कैसी बात करते हैं सर, आपको तो 56 मिल जाएगंगी. कहो तो मैं ही बात चलाऊं? शर्मा ने सिगरेट का कश लगाया.

"अर्रे नही यार" ख़ान ने हस्कर कहा "मुझे मेरे हाल पर ही छ्चोड़ दो तुम. ऐसे ही ठीक हूँ. वैसे तुम्हारी तो शादी हो चुकी है ना?

"2 बच्चे भी हैं सर" शर्मा ने जवाब दिया

"गुड वेरी गुड" कहते हुए ख़ान ने अपनी डाइयरी उठाई.

"बचपन से मेरी आदत रही है के जब कुच्छ मेरी समझ से बाहर होता है तो मैं उसको लिख लेता हूँ. समझ आने में काफ़ी आसानी होती है. ऐसा ही कुच्छ मैने इस केस के साथ भी किया है. फिलहाल जो मैने लिखा हूँ वो ये है" कहते हुए ख़ान ने डाइयरी खोलकर शर्मा की तरफ बढ़ा दी.

शर्मा ने डाइयरी पर नज़र डाली. सामने पेज पर कुच्छ पायंट्स लिखे हुए थे.

1. क़त्ल की रात ठाकुर ने अपने कमरे में ही डिन्नर किया था. उनको अपने कमरे के बाहर आखरी बार 8 बजे देखा गया था, ड्रॉयिंग हॉल में टीवी देखते हुए.

2. 8:15 के करीब वो अपने कमरे में चले गये थे और उसके बाद उनकी नौकरानी पायल खाना देने कमरे में गयी.

3. 8:30 के आस पास नौकरानी ठाकुर के बुलाने पर वापिस उनके कमरे में पहुँची. ठाकुर ने ज़्यादा कुच्छ नही खाया था और उसको प्लेट्स ले जाने के लिए कहा.

4. इसके बाद 9:15 के आस पास उनकी बहू रूपाली कपड़े लेने के लिए हवेली की पिछे वाले हिस्से में गयी जहाँ ठाकुर के कमरे की खिड़की खुलती थी और खिड़की से ठाकुर उसको अपने कमरे में खड़े हुए दिखाई दिए. वो अकेले थे.

5. उसके बाद तकरीबन 9.30 बजे तेज अपने बाप के कमरे में उनसे बात करने पहुँचा था. क्या बात करनी थी ये उसने नही बताया. सिर्फ़ कुच्छ बात करनी थी.

6. 9:40 के करीब सरिता देवी अपने पति के कमरे में पहुँची. उनके आने के बाद तेज वहाँ से चला गया.

7. 9:45 के करीब ठाकुर ने भूषण को बुलाकर गाड़ी निकालने को कहा. कहाँ जाना था ये नही बताया और खुद सरिता देवी भी ये नही जानती थी के उनके पति कहाँ जा रहे हैं.

8. 10:00 बजे के करीब भूषण वापिस ठाकुर के कमरे में चाबी लेने गया. ठाकुर उस वक़्त कमरे में अकेले थे और सरिता देवी बाहर कॉरिडर में बैठी थी.

9. 10:00 के करीब ही जब भूषण ठाकुर के कमरे से बाहर निकला तो पायल कमरे में गयी ये पुच्छने के लिए के ठाकुर को और कुच्छ तो नही चाहिए था. ठाकुर ने उसको मना कर दिया.

10. 10:05 के करीब जब भूषण कार पार्किंग की ओर जा रहा था तब उसने और ठकुराइन ने जै को हवेली में दाखिल होते हुए देखा.

11. 10:15 पर जब पायल किचन बंद करके अपने कमरे की ओर जा रही थी तब उसने ठाकुर के कमरे से जै को बाहर निकलते देखा. वो पूरा खून में सना हुआ था जिसके बाद उसने चीख मारी.

12. उसकी चीख की आवाज़ सुनकर जै को समझ नही आया के क्या करे. वो पायल को बताने लगा के अंदर ठाकुर साहब ज़ख़्मी हैं और इसी वक़्त पुरुषोत्तम और तेज आ गये. जब उन्होने जै को खून में सना देखा और अपने बाप को अंदर नीचे ज़मीन पर पड़ा देखा तो वो जै को मारने लगे.

13. जै भागकर किचन में घुस गया और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया.

14. 10:45 के करीब ख़ान को फोन आया था के ठाकुर का खून हो गया है जिसके बाद वो हवेली पहुँचा.

"सही है सर" शर्मा ने कहा "टाइम का अंदाज़ा तो बहुत सही लगाया है आपने. अब?"

"अब मेरे दोस्त ज़रा उन लोगों पर नज़र डालें जो उस रात हवेली में थे" कहते हुए ख़ान ने शर्मा से डाइयरी वापिस ली और पेन निकालकर लिखने लगा.

"ठाकुर की बीवी से ही शुरू करते हैं

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --11

gataank se aage........................

Tabhi Kaka uth khade hue. Ab Rupali ko Kallo ki pheli hui taangen aur uski taango ke beech ka hole dikhai de raha tha jo bahut geela sa ho rakha tha. Kaka uski taango ke beech khade the aur Rupali ko sirf unke paon dikh rahe the.

"Kya hua?" Kallo ne puchha

"Aise theek se ho nahi raha" Kaka ne kaha "Jagah kam hai isliye main let nahi pa raha"

"Toh phir?" Kallo ne puchha

"Ek kaam kar" Kaka bole "Tu idhar darwaze ke saath let ja. Phir main aaram se tere uper chadh sakta hoon"

Kallo hili aur leti leti hi sarakti hui darwaze ke saath ho gayi. Ab Rupali ko uska jism side si dikhai de raha tha. Kaka ne phir Kallo ki taangen pakadkar uper uthayi aur apni cheez pakadkar uski taango ke beech beth gaye.

"Aaaahhh" Kallo ke munh se aawaz aayi

Rupali samajh gayi ke Kaka ne phir se Kallo ke andar apna ghusaya hai. Aage ya pichhe vo ye ab dekh nahi pa rahi thi.

Tabhi Rupali ne koshish karke apni nazar Kallo ki taango se hatakar uske chehre par daali aur uska dil ekdam dhak se reh gaya. Vo fauran uth khadi hui aur ghar ki taraf vaapis chal di.

Kallo sidha darwaze mein bani us darar ki taraf dekh rahi thi. Rupali jaanti thi ke Kallo samajh gayi thi ke koi vahan se andar dekh raha tha. Vaise toh Kallo ko bas andar jhaankti ek aankh hi dikhai di hogi par jaane kyun Rupali ko lag raha tha ke Kallo ne uski chori pakad li hai, vo samajh gayi hai ke andar Rupali hi jhaank rahi thi.

Us poori Shaam Rupali apne kamre se bahar nahi nikli. Khana bhi usne jaldi jaldi khatam kiya aur sone chali gayi taaki Kallo se saamna na ho. Chori asal mein Kallo aur Shambhu ki pakdi gayi thi, darna unhen chahiye the ke Rupali kisi ko keh na de par ho ulta raha tha. Rupali ko lag raha tha ke uski chori pakdi gayi hai aur agar Kallo ne kisi se keh diya ke Rupali dekh rahi thi to jaane kya hoga.

Raat ko Rupali ko pata hi nahi chala ke vo kab so gayi.

Subah darwaze par kisi ne knock kiya to Rupali ki aankh khuli. Usne uthkar apne kamre ka darwaza khola toh saamne Kallo khadi thi. Rupali ki saans aadhi uper aur aadhi neeche reh gayi.

"Kamra saaf karna hai Bibi ji" Kallo boli.

Rupali ka kamra vo hamesha sabse aakhir mein kiya karti thi kyunki Rupali ko der tak sone ki aadat thi. Phir aaj itni subah? Rupali ne ghadi par nazar daali. 8 baj rahe the.

"Itni subah?" Usne Kallo se puchha

"Haan mujhe jaldi ghar jana hai isliye sab kaam nipta rahi hoon" Kallo boli toh Rupali ne darwaze se hatkar usko andar aane ki jagah de di.

Kallo kamra saaf karne lagi aur khud Rupali phir bistar par let gayi par aankhon mein need kahan thi. Kallo se nazar bachane ke liye usne apne chehre par chadar daal li thi.

"Bibi ji" Thodi der baad Kallo ki aawaz aayi

"Hmmmm" Rupali ne chadar chehre se hataye bina hi kaha

"Aap kisi se kahengi toh nahi na?" Kallo dheere se boli

Rupali ka di jaise phir dhak se reh gaya.

"Kya nahi kahungi?" Vo thook nigalte hue boli. Chehre par ab bhi chadar padi hui thi.

Kallo kuchh nahi boli. Thodi der kamre mein khamoshi rahi.

"Main janti hoon ke kal aap hi thi store room ke bahar. Maine dekh liya tha. Aap akeli hi ho ghar mein jiski aankhen bhoori hain aur maine darar mein se aapko jhaankte dekh liya tha.

Kamre mein kuchh der tak poori taraf sannata raha.

"Aap kisi se kahogi toh nahi na?" Kallo ne phir puchha.

Rupali janti thi ke uski chori pakdi gayi hai. Uske dimag mein jo sawal uth raha tha ke kya Shambhu bhi janta hai ke Rupali andar jhaank rahi thi? Agar jaanta hai toh?

"Hey Bhagwan" Rupali jaise sharam se gad gayi

Achanak usko ek tarika soojha. Kallo ab bhi uske kamre ki safai karti uske jawab ka intezaar kar rahi thi.

"Kaun tha tumhare saath?" Usne chadar ke andar se puchha. Vo janti thi ke ye sawal puchh kar usne is baat ka iqraar kar liya hai ke vahi store room ke andar jhaank rahi thi.

"Vo aap chhodiye na malkin" Kallo boli "Tha koi. Usne aapko nahi dekha"

Khud Kallo ne bhi rahat ki saans li ke Rupali ko nahi pata tha ke andar uske saath mard kaun tha.

"Agar main mummy papa ko bata doon toh?" Rupali ne puchha. chadar ab bhi usne odh rakhi thi par mehsoos ho gaya tha ke Kallo ne uske paon pakad liye hain.

"Aisa zulm mat karna malkin" Kallo ki roti hui aawaz aayi sunkar Rupali ne apne chehre se chadar hatayi aur uthkar beth gayi "Agar kisi ko pata chal gaya toh maalik mujhe naukri se nikal denge aur mera gharwala toh mujhe jaan se hi maar dalega"

Rupali khamoshi se bethi rahi.

"Aap kisi se kahengi toh nahi na malkin? Kallo phir boli "Aap jo kahengi main karne ko taiyyar hoon. Bas iska zikr kisi se mat karna"

"Theek hai" Aakhir kaar Rupali boli "Main kisi se nahi kahungi. Ab kamra saaf karke bahar jao aur mujhe sone do"

Kallo ka chehra khushi se chamak utha. Vo fauran haath jodkar gardan hilati khadi ho gayi aur apne kaam mein lag gayi.

Rupali chadar odhkar phir let gayi par uske chehre par ek muskurahat thi. Darr jata raha. Kallo ne jis tarah se uske paon pakde the, jis tarah se vo gidgida rahi thi usse Rupali ko ye bharosa ho gaya tha ke use khud ko darne ke koi zaroorat nahi. Balki darr toh usse doosre rahe the, vo toh dara sakti thi.

Uske chehre par muskurata aur gehri ho gayi.

Sharma aur Khan dono hi khaane ki table par bethe the.

"Sir ek baat kahun?" Sharma bola "Bura toh nahi manenge?"

"Janta hoon kya kehne wale ho" Khan bola "Khana bahut bakwaas banata hoon main"

Sharma has pada

"Aapko kaise pata chala?

"Arrey tum pehle nahi ho yaar. Bahuto ne kaha hai ye" Khan ne kaha. Us raat khana usne hi banaya tha.

Khan ne Sharma ko apne ghar khaana khane ke liye bulaya tha. Vo chahta tha ke case par vo dono bethkar thodi der baat karen kyunki gaon aur gaon ke logon ke baare mein ek Sharma hi tha jo achhi tarah se janta tha. Jab saara din sukoon se baat karne ka mauka nahi mila toh Khan Sharma ko lekar apne ghar hi aa gaya.

Dono ne khana khaya aur cigarette jalakar aaram se beth gaye.

"Sir aap shaadi kyun nahi kar lete?" Sharma bola

"Arrey main toh kabse taiyyar betha hoon yaar par koi kambakht mujhe shaadi karne ko raazi toh ho" Khan ne kaha

"Kaisi baat karte hain Sir, Aapko toh 56 mil jaayegngi. Kaho toh main hi baat chalaoon? Sharma ne cigarette ka kash lagaya.

"Arrey nahi yaar" Khan ne haskar kaha "Mujhe mere haal par hi chhod do tum. Aise hi theek hoon. Vaise tumhari toh shaadi ho chuki hai na?

"2 bachche bhi hain sir" Sharma ne jawab diya

"Good very good" Kehte hue khan ne apni Diary uthayi.

"Bachpan se meri aadat rahi hai ke jab kuchh meri samajh se bahar hota hai toh main usko likh leta hoon. Samajh aane mein kaafi aasani hoti hai. Aisa hi kuchh maine is case ke saath bhi kiya hai. Filhal jo maine likha hoon vo ye hai" Kehte hue Khan ne Diary kholkar Sharma ki taraf badha di.

Sharma ne diary par nazar daali. Saamne page par kuchh points likhe hue the.

1. Qatl ki raat Thakur ne apne kamre mein hi dinner kiya tha. Unko apne kamre ke bahar aakhri baar 8 baje dekha gaya tha, drawing hall mein TV dekhte hue.

2. 8:15 ke kareeb vo apne kamre mein chale gaye the aur uske baad unki naukrani Payal khana dene kamre mein gayi.

3. 8:30 ke aas paas naukrani thakur ke bulane par vaapis unke kamre mein pahunchi. Thakur ne zyada kuchh nahi khaya tha aur usko plates le jaane ke liye kaha.

4. Iske baad 9:15 ke aas paas unki bahu Rupali kapde lene ke liye Haweli ki pichhe wale hisse mein gayi jahan thakur ke kamre ki khidki khulti thi aur khidki se thakur usko apne kamre mein khade hue dikhai diye. Vo akele the.

5. Uske baad takreeban 9.30 baje Tej apne baap ke kamre mein unse baat karne pahuncha tha. Kya baat karni thi ye usne nahi bataya. Sirf kuchh baat karni thi.

6. 9:40 ke kareeb Sarita Devi apne pati ke kamre mein pahunchi. Unke aane ke baad Tej vahan se chala gaya.

7. 9:45 ke kareeb Thakur ne Bhushan ko bulakar gaadi nikalne ko kaha. Kahan jaana tha ye nahi bataya aur khud Sarita Devi bhi ye nahi jaanti thi ke unke pati kahan ja rahe hain.

8. 10:00 baje ke kareeb Bhushan vaapis Thakur ke kamre mein chaabi lene gaya. Thakur us waqt kamre mein akele the aur Sarita Devi bahar corridor mein bethi thi.

9. 10:00 ke kareeb hi jab Bhushan Thakur ke kamre se bahar nikla toh Payal kamre mein gayi ye puchhne ke liye ke Thakur ko aur kuchh toh nahi chahiye tha. Thakur ne usko mana kar diya.

10. 10:05 ke kareeb jab Bhushan car parking ki aur ja raha tha tab usne aur Thakurain ne Jai ko haweli mein daakhil hote hue dekha.

11. 10:15 par jab Payal kitchen band karke apne kamre ki aur ja rahi thi tab usne Thakur ke kamre se Jai ko bahar nikalte dekha. Vo poora khoon mein sana hua tha jiske baad usne cheek maari.

12. Uski cheekh ki aawaz sunkar Jai ko samajh nahi aaya ke kya kare. Vo Payal ko batane laga ke andar Thakur Sahab zakhmi hain aur isi waqt Purushottam aur Tej aa gaye. Jab unhone Jai ko khoon mein sana dekha aur apne baap ko andar neeche zameen par pada dekha toh vo Jai ko maarne lage.

13. Jai Bhagkar kitchen mein ghus gaya aur andar se darwaza band kar liya.

14. 10:45 ke kareeb Khan ko phone aaya tha ke Thakur ka khoon ho gaya hai jiske baad vo haweli pahuncha.

"Sahi hai sir" sharma ne kaha "Time ka andaza toh bahut sahi lagaya hai aapne. Ab?"

"Ab mere dost zara un logon par nazar daalen jo us raat haweli mein the" Kehte hue Khan ne Sharma se Diary vaapis li aur pen nikalkar likhne laga.

"Thakur ki biwi se hi shuru karte hain

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:02

खूनी हवेली की वासना पार्ट --12

गतान्क से आगे........................

1. सरिता देवी - पूरी शाम अपने कमरे में थी. बीमारी की वजह से अपने पति से अलग सोती थी. रात का खाना कमरे में ही खाया. हर रात सोने से पहले वो अपने पति के कमरे में जाती थी और थोड़ी देर बात करके वापिस अपने कमरे में ही आकर सो जाती थी. उस रात भी 9.40 के करीब वो ठाकुर साहब के कमरे में पहुँची और तकरीबन 10 बजे तक रही. इस बात की गवाही घर के 2 नौकर दे सकते हैं. पहले बिंदिया जो ठकुराइन की व्हील चेर को धकेल कर यहाँ से वहाँ ले जाती है. वो ही ठकुराइन को व्हील चेर पर बैठाती और उतारती है. उसने उस रात ठकुराइन को कमरे से ठाकुर के कमरे तक छ्चोड़ा और करीब 15-20 मिनट बाद कमरे से बाहर लाकर कॉरिडर में छ्चोड़ा. दूसरी गवाही भूषण दे सकता है जिसने ठकुराइन को पहले ठाकुर के कमरे में बात करते देखा और फिर बाद में कॉरिडर में बैठी देखा. इस पूरे वक़्त के दौरान ठाकुर साहब ज़िंदा थे याकि की क़ातिल अब तक सिर्फ़ मौके की तलाश में था. सरिता देवी के कमरे से बाहर आते ही उसको मौका मिला और ठाकुर का काम ख़तम.

2. पुरुषोत्तम सिंग - शाम को तकरीबन 6 बजे घर वापिस आया था. अपने कमरे में गया और रात 8 बजे तक वहीं रहा. उसके बाद वो ऐसे ही थोड़ा घूमने के लिए बाहर निकला, शराब की दुकान से शराब खरीदी, नहर के किनारे बैठकर पी और 9 बजे के करीब घर वापिस आया और उसके बाद अपने कमरे में ही चला गया. इन साहब की गवाही इनकी बीवी दे सकती हैं जो 8 से पहले और 9 के बाद इनके साथ कमरे में थी.

3. तेजविंदर सिंग - इन साहब की कहानी की गवाह इनकी माँ हैं. कहते हैं कि पहले कहीं दोस्तों के साथ शराब पी रहे थे, तकरीबन 9.30 बजे वापिस आए. पिता के कमरे में गये. 10 मिनट वहाँ रुके और ठकुराइन के आने के बाद अपने कमरे में चले गये.

4. कुलदीप सिंग - ख़ास कुच्छ नही. बीमार थे इसलिए सारा दिन पड़े सोते रहे. क़त्ल की शाम और क़त्ल के वक़्त भी अपने कमरे में ही दवाई खाकर सो रहे थे. इनकी गवाह इनकी बेहन है जिसका कमरा इनके कमरे के साथ ही है. इनके हिसाब से कुलदीप पूरी शाम और रात सोता रहा. उसको तो क़त्ल का पता भी खून होने के 2 घंटे बाद चला.

5. कामिनी - इनकी कहानी का कोई गवाह नही. कहती हैं के पूरी शाम अपने कमरे में ही थी और चीख की आवाज़ सुनकर ही कमरे से निकली थी. ना किसी ने इनको देखा और ना कोई गवाही दे सकता है. इनकी बीच बीच की गवाही रूपाली का भाई ईन्देर दे सकता है जिसके मुताबिक वो 2-3 बार थोड़ी थोड़ी देर के लिए कुच्छ किताबें लेने कामिनी के कमरे में गया था

6. भूषण - घर के छ्होटे मोटे काम करता रहा. रात 9 बजे वापिस अपने कमरे में पहुँचा. ठाकुर के बुलाने पर उनके कमरे में गया और फिर गाड़ी निकाली. इसकी गवाही ठकुराइन और खुद जै दे सकता है जिन्होने इसको खून के टाइम हवेली के बाहर खड़ा देखा.

7. बिंदिया - पूरा दिन ठकुराइन के साथ थी. बस क़त्ल के वक़्त अपने बेटी के साथ थी. इसकी गवाही इसकी बेटी दे सकती है.

8. पायल - घर के काम करती रही सारा दिन. 8.15 ठाकुर को खाना देके आई, फिर 10 बजे दोबारा ठाकुर से कुच्छ ज़रूरत को पुच्छने गयी और उसके बाद 10.15 पर खून होता देखकर चिल्लाई. क़त्ल के वक़्त की इसकी गवाही इसकी माँ दे सकती है.

9. रूपाली - इनकी सारे वक़्त की गवाही है. घर के नौकर या इनके पाती, किसी ना किसी के ये साथ थी. खून होने के टाइम तक. सिर्फ़ एक टाइम पर ये अकेली थी और वो जब ये हवेली के पिछे से कुच्छ कपड़े लेने के लिए गयी.

10. इंद्रासेन राणा - अपने कमरे में बैठे हॅरी पॉटर सीरीस देख रहे थे. इन साहब की बस थोड़े से टाइम की गवाही है. एक तो तब जब पायल इनके कमरे में इनको चाइ देने गयी और दूसरा जब ये कामिनी के कमरे में बुक्स लेने गये.

11. चंदर - शाम से ही गेट पर बैठा हुआ पहरा दे रहा था. इसकी गवाही तो तेज ही दे सकता है जिसने इसको हवेली के अंदर दाखिल होते हुए इसको गाते के पास बैठे देखा था. "

"यहाँ तो हर किसी का गवाही कोई ना कोई दे रहा है सर" शर्मा बोला

"पर कोई ना कोई तो यहाँ झूठ बोल रहा है" ख़ान ने कहा "सवाल ये है के कौन"

जहाँ रूपाली एक और जवानी के खेल अभी खेलना सीख ही रही थी वहीं दूसरी और बिंदिया जवानी के एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हुई थी जहाँ उसको समझ नही आ रहा था के क्या करे. समाज के क़ानून, भगवान का डर, धरम की बंदिश, एक औरत की मर्यादा, और कई साल से जिस्म की ना मिटी भूख उसके दिल और दिमाग़ को जैसे पागल कर रहे थे.

दिन के कोई 12 बज रहे थे. उसकी 12 साल की बेटी पायल अपनी सहेलियों के साथ खेलने बाहर गयी थी और घर पर सिर्फ़ बिंदिया और उसका बेटा चंदर थे. ठाकुर साहब के खेतों के बीच बनी अपनी छ्होटी से झोपड़ी में जो की बिंदिया का घर थी उस वक़्त वो दोनो अकेले ही थे.

झोपड़ी के बीच बिंदिया खामोशी से खड़ी थी. वो जानती थी के चंदर भी झोपड़ी के अंदर ही है.

बिंदिया ने अपनी आँखें खोली और चंदर की तरफ देखा.. चंदर की आँखें वासना से भरी हुई थी और अपनी माँ के शरीर को उपेर से नीचे तक देख रही थी. कभी वो उस पुराने से ब्लाउस में उपेर नीचे होती बिंदिया की छातियों देखता तो कभी नज़र नीचे करके बिंदिया की कमर और उठी हुई गांद देखने लगता. बिंदिया ये जानती थी के कुच्छ होने वाला है और उसकी साँस उखाड़ने लगी थी. वो जानती थी के अब जो भी होगा वो चंदर और खुद उसकी मर्ज़ी दोनो से होगा क्यूंकी वो दोनो ही ऐसा चाहते थे पर फिर भी हासिल करने से डरते थे.

चंदर ने आगे बढ़कर बिंदिया का हाथ पकड़ा. बिंदिया ने फिर अपनी आँखें बंद कर ली. कुच्छ देर तक वो बिंदिया का हाथ ऐसे ही पकड़े खड़ा रहा और जाने क्या करता रहा. आँखें बंद किए खड़ी बिंदिया कपड़ो की आवाज़ सुनकर सिर्फ़ इतना अंदाज़ा लगा पाई के शायद चंदर दूसरे हाथ से अपने कपड़े उतार रहा है. फिर भी जाने क्यूँ ना तो वो कुच्छ कर पाई और ना ही कह पाई. ना तो उसने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की और ना ही चंदर को रोकने की.

कुच्छ देर बाद चंदर के हाथ ने हरकत की और बिंदिया के हाथ को पकड़कर आगे की ओर करने लगा. एक मदहोशी के से आलम में बिंदिया ने उसको जो चाहा करने दिया. उसने अपना हाथ वापिस लेने या रोकने की कोई कोशिशी नही की. अगले ही पल उसके हाथ में एक मोटी सी डंडे जैसी चीज़ आ गयी. फरक सिर्फ़ ये था के ये चीज़ किसी डंडे की तरफ सख़्त तो थी पर डंडे के जैसे ठंडी नही थी. ये चीज़ बहुत गरम थी, जैसे कोई लोहे की सलाख जो अभी अभी आग से निकली गयी हो.

बिंदिया की साँस फिर उखाड़ने लगी और दिल की धड़कन तेज़ हो गयी. वो जानती थी के ये गरम डंडा कुच्छ और नही बल्कि चंदर का लंड था.

उसको अपनी उंगलियाँ चंदर के लंड पर महसूस हुई और अगले ही पल चंदर ने अपने हाथ से बिंदिया की उंगलियों को बंद करते हुए एक मुट्ठी बना दिया.

मुट्ठी में चंदर का लंड था.

बिंदिया की मुट्ठी में चंदर का लंड फूल रहा था जैसे वो भी अलग से साँस ले रहा हो और बिंदिया को उसकी लंबाई और मोटाई का सॉफ अंदाज़ा हो रहा था. ना चाहते हुए भी उसकी मुट्ठी लंड के गिर्द और कसति चली गयी और अगले ही पल उसके कानो में चंदर की आह की आवाज़ सुनाई दी. वो जानती थी के ये आह दर्द नही बल्कि मज़े की वजह से निकली है. वो मज़ा जो एक जवान औरत के लंड पकड़ने पर हर मर्द को आता है.

बिंदिया ने अपनी आँखें खोली और चंदर की तरफ देखा और फिर बड़ी ही बेशर्मी से उसकी आँखें उसके चेहरे से सीधा लंड पर गयी.

बिंदिया इस लंड को पहले भी देख चुकी थी और अपने शरीर पर महसूस भी कर चुकी थी पर आज पहली बार इतने करीब से देख रही थी. ना चाहते हुए भी उसके वासना की आग जैसे अचानक से दुगुनी हो गयी. उसने अपने जीवन में ये दूसरा लंड देखा था. पहला अपने पति का और दूसरा चंदर का.

और उसके पति का लंड उसके हाथ में पकड़े लंड का आधा भी नही था.

बिंदिया के दिमाग़ ने जैसे काम करना बंद कर दिया था. बिना कुच्छ और सोचे उसका हाथ चंदर के लंड पर कसता चला गया और उपेर नीचे होने लगा. चंदर उसके बिल्कुल ठीक सामने खड़ा था. कद काठी में वो बिंदिया के बराबर ही था इसलिए सीधा बिंदिया से नज़र मिलाए उसकी आँखों में देख रहा था. खुद वो भी बड़ी बेशर्मी सी उससे नज़र मिलाए उसका लंड हिलाने लगी.

पहले उसका हाथ धीरे धीरे उपेर नीचे हो रहा था पर फिर बहुत तेज़ी से चंदर का लंड हिलाने लगी. अब आँखें बंद करने की बारी चंदर की थी. जहाँ उसके मुँह से हल्की हल्की आह आह की आवाज़ निकल रही थी वहीं खुद बिंदिया भी अपनी आवाज़ को दबा नही पाई. उसके साँस भारी थी और वो भी धीरे धीरे मज़े में कराह रही थी.

बिंदिया ने लंड हिलाना जारी रखा और तभी चंदर ने अपना एक हाथ उतारा बिंदिया की छाती पर रख दिया. उसका हाथ गीला था और गीलापन बिंदिया को अपने ब्लाउस के उपेर से भी सॉफ महसूस हुआ. हाथ की ठंडक ने इस बार उसके मुँह से निकलती धीमी आवाज़ो को और तेज़ कर दिया.

बिंदिया मज़े में कराहती रही, लंड हिलाती रही और चंदर बे अपना दूसरा हाथ भी उठाकर उसकी दोनो चूचियों को रगड़ना शुरू कर दिया.

"नही," अचानक बिंदिया ने कहा. "ओह्ह्ह, नही, रुक जा. ये ग़लत है ... ओह, चंदू!"

जवाब में चंदर के गले से सिर्फ़ एक आवाज़ निकली, जैसे कोई कुत्ता गुर्रा रहा हो और उसका एक हाथ बिंदिया की छाती से होता हुआ उसकी गांद पर आ गया.

उसका हाथ बिंदिया की गांद में घाघरे के उपेर से धस्ता चला गया. और यहाँ पर आकर बिंदिया का बचा हुआ सब्र भी जवाब दे गया.

उसने फ़ौरन आगे बढ़कर अपने होंठ चंदर के होंठों पर टीका दिए.

बिंदिया की जीभ उसके मुँह से निकलकर सीधा चंदर के मुँह में जा घुसी जिससे एक पल के लिए चंदर भी चौक गया और लड़खड़ा गया. उसकी माँ की जीभ उसके मुँह के अंदर घूम रही थी, वो अजीब भूखे अंदाज़ में उसके होंठों को कभी चाट रही थी तो कभी काट रही थी. बिंदिया आगे बढ़कर चंदर से चिपक गयी थी जिसके वजह से खड़ा हुआ लंड घाघरे के उपेर से सीधा चूत से टकरा रहा था.

बिंदिया ने अपनी टाँगें थोड़ा खोली और लंड को सीधा कपड़े के उपेर से ही अपनी जाँघो के बीच फसा लिया. लंड बीच में आते ही उसने अपनी टांगे दोबारा बंद की और अपनी गांद आगे पिछे हिलाने लगी. कपड़े के उपेर से ही उसकी चूत लंड पर घिसने लगी और वासना से बिंदिया का सर चकरा गया.

उसके घुटने कमज़ोर पड़ गये और वो वहीं नीचे ज़मीन पर गिरती चली गयी. पहले वो बैठी और अगले ही पल पीठ के बल नीचे लेटकर अपनी टांगे फेला दी. चंदर का लंड अब भी उसके हाथ में था जिसकी वजह से चंदर भी उसके उपेर गिरता चला गया.बिंदिया ने एक पागलपन के अंदाज़ में अपने घाघरे का नाडा खोला और बाकी काम चंदर ने कर दिया. एक पल घाघरा उसके जिस्म पर था और अगले पल नाडा खुलते ही नीचे को खींचा और हवा में उड़ता हुआ कमरे के एक कोने में जा गिरा.

बिंदिया ने फ़ौरन हाथ आगे बढ़ा कर चंदर का लंड पकड़ लिया.

"जल्दी कर!" उसने एक प्यासी शेरनी के से अंदाज़ में कहा. "हे भगवान ... जल्दी कर ना, चंदू!"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --12

gataank se aage........................

1. Sarita Devi - Poori shaam apne kamre mein thi. Bimari ki vajah se apne pati se alag soti thi. Raat ka khana kamre mein hi khaya. Har raat sone se pehle vo apne pati ke kamre mein jaati thi aur thodi der baat karke vaapis apne kamre mein hi aakar so jaati thi. Us raat bhi 9.40 ke kareeb vo Thakur Sahab ke kamre mein pahunchi aur takreeban 10 baje tak rahi. Is baat ki gawahi ghar ke 2 naukar de sakte hain. Pehle Bindiya jo Thakurain ki wheel chair ko dhakel kar yahan se vahan le jaati hai. Vo hi Thakurain ko wheel chair par bethati aur utarti hai. Usne us raat Thakurain ko kamre se Thakur ke kamre tak chhoda aur kareeb 15-20 min baad kamre se bahar lakar Corridor mein chhoda. Doosri gawahi Bhushan de sakta hai jisne Thakurain ko pehle Thakur ke kamre mein baat karte dekha aur phir baad mein corridor mein bethe dekha. Is poore waqt ke dauran Thakur Sahab zinda the yaaki ki qatil ab tak sirf mauke ki talash mein tha. Sarita Devi ke kamre se bahar aate hi usko mauka mila aur Thakur ka kaam khatam.

2. Purushottam Singh - Shaam ko takreeban 6 baje ghar vaapis aaya tha. Apne kamre mein gaya aur raat 8 baje tak vahin raha. Uske baad vo aise hi thoda ghoomne ke liye bahar nikla, sharab ki dukaan se sharab khadiri, nehar ke kinare bethkar pi aur 9 baje ke kareeb ghar vapis aaya aur uske baad apne kamre mein hi chala gaya. In sahab ki gawahi inki biwi de sakti hain jo 8 se pehle aur 9 ke baad inke saath kamre mein thi.

3. Tejvinder Singh - In sahab ki kahani ki gawah inki maan hain. Kehte hain ki pehle kahin doston ke saath sharab pi rahe the, takreeban 9.30 baje vaapis aaye. Pita ke kamre mein gaye. 10 min vahan ruke aur Thakurain ke aane ke baad apne kamre mein chale gaye.

4. Kuldeep Singh - Khaas kuchh nahi. Bimaar the isliye saara din pade sote rahe. Qatl ki shaam aur qatl ke waqt bhi apne kamre mein hi dawai khakar so rahe the. Inki gawah inki behan hai jiska kamra inke kamre ke saath hi hai. Inke hisaab se Kuldeep poori shaam aur raat sota raha. Usko toh qatl ka pata bhi khoon hone ke 2 ghante baad chala.

5. Kamini - Inki kahani ka koi gawah nahi. Kehti hain ke poori shaam apne kamre mein hi thi aur cheekh ki aawaz sunkar hi kamre se nikli thi. Na kisi ne inko dekha aur na koi gawahi de sakta hai. Inki beech beech ki gawahi Rupali ka bhai Inder de sakta hai jiske mutaabik vo 2-3 baar thodi thodi der ke liye kuchh kitaben lene Kamini ke kamre mein gaya tha

6. Bhushan - Ghar ke chhote mote kaam karta raha. Raat 9 baje vaapis apne kamre mein pahuncha. Thakur ke bulane par unke kamre mein gaya aur phir gaadi nikali. Iski gawahi thakurain aur Khud Jai de sakta hai jinhone isko khoon ke time haweli ke bahar khada dekha.

7. Bindiya - Poora din Thakurain ke saath thi. Bas qatl ke waqt apne beti ke saath thi. Iski gawahi iski beti de sakti hai.

8. Payal - Ghar ke kaam karti rahi saara din. 8.15 Thakur ko khana deke aayi, phir 10 baje dobara Thakur se kuchh zaroorat ko puchhne gayi aur uske baad 10.15 Khoon hota dekhkar chillayi. Qatl ke waqt ki iski gawahi iski maan de sakti hai.

9. Rupali - Inki saare waqt ki gawahi hai. Ghar ke naukar ya inke pati, kisi na kisi ke ye saath thi. Khoon hone ke time tak. Sirf ek time par ye akeli thi aur vo jab ye haweli ke pichhe se kuchh kapde lene ke liye gayi.

10. Indrasen Rana - Apne kamre mein bethe Harry Potter Series dekh rahe the. In sahab ki bas thode se time ki gawahi hai. Ek toh tab jab Payal inke kamre mein inko chaai dene gayi aur doosra jab ye Kamini ke kamre mein books lene gaye.

11. Chander - Shaam se hi gate par betha hua pehra de raha tha. Iski gawahi toh Tej hi de sakta hai jisne isko haweli ke andar daakhil hote hue isko gate ke paas bethe dekha tha. "

"Yahan toh har kisi ka gawahi koi na koi de raha hai Sir" Sharma bola

"Par koi na koi toh yahan jhooth bol raha hai" Khan ne kaha "Sawal ye hai ke kaun"

Jahan Rupali ek aur Jawani ke khel abhi khelna seekh hi rahi thi vahin doosri aur Bindiya jawani ke ek aise mod par khadi hui thi jahan usko samajh nahi aa raha tha ke kya kare. Samaj ke kanoon, Bhagwan ka darr, dharam ki bandish, ek aurat ki maryada, aur kai saal se jism ki na miti bhookh uske dil aur dimag ko jaise pagal kar rahe the.

Din ke koi 12 baj rahe the. Uski 12 saal ki beti Payal apni saheliyon ke saath khelne bahar gayi thi aur ghar par sirf Bindiya aur uska beta Chander the. Thakur Sahab ke kheton ke beech bani apni chhoti se jhopdi mein jo ki Bindiya ka ghar thi us waqt vo dono akele hi the.

Jhopdi ke beech Bindiya khamoshi se khadi thi. Vo jaanti thi ke Chander bhi jhopdi ke andar hi hai.

Bindiya ne apni aankhen kholi aur Chander ki taraf dekha.. Chander ki aankhen vaasna se bhari hui thi aur apni maan ke shareer ko uper se neeche tak dekh rahi thi. Kabhi vo us purane se blouse mein uper neeche hoti Bindiya ki chhatiyan dekhta toh kabhi nazar neeche karke Bindiya ki kamar aur uthi hui gaand dekhne lagta. Bindiya ye jaanti thi ke kuchh hone wala hai aur uski saans ukhadne lagi thi. Vo jaanti thi ke ab jo bhi hoga vo Chander aur khud uski marzi dono se hoga kyunki vo dono hi aisa chahte the par phir bhi haasil karne se darte the.

Chander ne aage badhkar Bindiya ka haath pakda. Bindiya ne phir apni aankhen band kar li. Kuchh der tak vo Bindiya ka haath aise hi pakde khada raha aur jaane kya karta raha. Aankhen band kiye khadi Bindiya kapdo ki aawaz sunkar sirf itna andaza laga paayi ke shayad Chander doosre haath se apne kapde utaar raha hai. Phir bhi jaane kyun na toh vo kuchh kar paayi aur na hi keh paayi. Na toh usne apna haath chhudane ki koshish ki aur na hi Chander ko rokne ki.

Kuchh der baad Chander ke haath ne harkat ki aur Bindiya ke haath ko pakadkar aage ki aur karne laga. Ek madhoshi ke se aalam mein Bindiya ne usko jo chaha karne diya. Usne apna haath vaapis lene ya rokne ki koi koshishi nahi ki. Agle hi pal uske haath mein ek moti si dande jaise cheez aa gayi. Farak sirf ye tha ke ye cheez kisi dande ki taraf sakht to thi par dande ke jaise thandi nahi thi. Ye cheez bahut garam thi, jaise koi lohe ki salakh jo abhi abhi aag se nikali gayi ho.

Bindiya ki saans phir ukhadne lagi aur dil ki dhadkan tez ho gayi. Vo jaanti thi ke ye garam danda kuchh aur nahi balki Chander ka lund tha.

Usko apni ungliyan Chander ke lund par mehsoos hui aur agle hi pal Chander ne apne haath se Bindiya ki ungliyon ko band karte hue ek mutthi bana diya.

Mutthi mein Chander ka lund tha.

Bindiya ki mutthi mein Chander ka lund phool raha tha jaise vo bhi alag se saans le raha ho aur Bindiya ko uski lambai aur motai ka saaf andaza ho raha tha. Na chahte hue bhi uski mutthi lund ke gird aur kasti chali gayi aur agle hi pal uske kaano mein Chander ki aah ki aawaz sunai di. Vo jaanti thi ke ye aah dard nahi balki maze ki vajah se nikli hai. Vo maza jo ek jawan aurat ke lund pakadne par har mard ko aata hai.

Bindiya ne apni aankhen kholi aur Chander ki taraf dekha aur phir badi hi besharmi se uski aankhen uske chehre se sidha lund par gayi.

Bindiya is lund ko pehle bhi dekh chuki thi aur apne shareer par mehsoos bhi kar chuki thi par aaj pehli baar itne kareeb se dekh rahi thi. Na chahte hue bhi uske vaasna ki aag jaise achanak se duguni ho gayi. Usne apne jeewan mein ye doosra lund dekha tha. Pehla apne pati ka aur doosra Chander ka.

Aur uske pati ka lund uske haath mein pakde lund ka aadha bhi nahi tha.

Bindiya ke dimag ne jaise kaam karna band kar diya tha. Bina kuchh aur soche uska haath Chander ke lund par kasta chala gaya aur uper neeche hone laga. Chander uske bilkul theek saamne khada tha. Kad kaathi mein vo Bindiya ke barabar hi tha isliye sidha Bindiya se nazar milaye uski aankhon mein dekh raha tha. Khud vo bhi badi besharmi si usse nazar milaye uska lund hilane lagi.

Pehle uska haath dheere dheere uper neeche ho raha tha par phir vi vadi tezi se Chande ka lund hilane lagi. Ab aankhen band karne ki baari Chander ki thi. Jahan uske munh se halki halki aah aah ki aawaz nikal rahi thi vahin khud Bindiya bhi apni aawaz ko daba nahi paayi. Uske saans bhaari thi aur vo bhi dheere dheere maze mein karah rahi thi.

Bindiya ne lund hilana jaari rakha aur tabhi Chander ne apna ek haath uthara Bindiya ki chaati par rakh diya. Uska haath geela tha aur geelapan Bindiya ko apne blouse ke uper se bhi saaf mehsoos hua. Haath ki thandak ne is baar uske munh se nikalti dheemi aawazo ko aur tez kar diya.

Bindiya maze mein karahti rahi, lund hilati rahi aur Chander be apna doosra haath bhi uthakar uski dono chhatiyon ko ragadna shuru kar diya.

"Nahi," Achanak Bindiya ne kaha. "Ohhh, nahi, Ruk ja. Ye galat hai ... oh, Chandu!"

Jawab mein Chander ke gale se sirf ek aawaz nikli, jaise koi kutta gurra raha ho aur uska ek haath Bindiya ki chhati se hota hua uski gaand par aa gaya.

Uska haath Bindiya ki gaand mein ghaghre ke uper se dhasta chala gaya. Aur yahan par aakar Bindiya ka bacha hua sabr bhi jawab de gaya.

Usne fauran aage badhkar apne honth Chander ke honthon par tika diye.

Bindiya ki jeebh uske munh se nikalkar sidha Chander ke munh mein ja ghusi jisse ek pal ke liye Chander bhi chauk gaya aur ladkhada gaya. Uski maan ki jeebh uske munh ke andar ghoom rahi thi, vo ajeeb bhookhe andaz mein uske honthon ko kabhi chaat rahi thi toh kabhi kaat rahi thi. Bindiya aage badhkar Chander se chipak gayi thi jiske vajah se khada hua lund Ghaghre ke uper se sidha choote se takra raha tha.

Bindiya ne apni taangen thoda kholi aur lund ko sidha kapde ke uper se hi apni jaangho ke beech phasa liya. Lund beech mein aate hi usne apni taange dobara band ki aur apni gaand aage pichhe hilane lagi. Kapde ke uper se hi uski choot lund par ghisne lagi aur vaasna se Bindiya ka sar chakra gaya.

Uske ghutne kamzor pad gaye aur vo vahin neeche zameen par girti chali gayi. Pehle vo bethi aur agle hi pal peeth ke bal neeche letkar apni taange phela di. Chander ka lund ab bhi uske haath mein tha jiski vajah se Chander bhi uske uper girta chala gaya.Bindiya ne ek pagalpan ke andaz mein apne ghaghre ka naada khola aur baaki kaam Chander ne kar diya. Ek pal ghaghra uske jism par tha aur agle pal naadha khulte hi neeche ko khincha aur hawa mein udta hua kamre ke ek kone mein ja gira.

Bindiya ne fauran haath aage badha kar Chander ka lund pakad liya.

"Jaldi kar!" Usne ek pyaasi sherni ke se andaaz mein kaha. "Hey Bhagwan ... jaldi kar na, Chandu!"

kramashah........................................