खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:12

खूनी हवेली की वासना पार्ट --22

गतान्क से आगे........................

"क्या हुआ?" उनकी सोच ठाकुर की आवाज़ से टूटी.

"कुच्छ नही" उन्होने धीरे से कहा और लड़के को चलने का इशारा किया "चलो"

वो लड़का आगे आगे और ठकुराइन पिछे पिछे चल पड़े. उस दिन जो छत पर हुआ था उसके बाद ठकुराइन और उस लड़के की अब तक कोई बात नही हुई थी और ना ही उसके बाद उसने कोई और हरकत करने की कोशिश की थी. पर जाने क्यूँ ठकुराइन को लग रहा था के वो अकेले में उन्हें इसलिए ले जा रहा है ताकि उनके साथ फिर कुच्छ कर सके. जो बात उन्हे समझ नही आ रही थी वो ये थी के सब कुच्छ जानते हुए भी वो क्यूँ उसकी हर बात रख लेती थी, करने देती थी उसको वो सब जो की वो करना चाहता था. क्या इसकी वजह ये थी के कहीं दिल में उन्हें भी ये सब अच्छा लग रहा था? क्या वो खुद भी अंजाने में इस खेल में भाग ले रही थी.

"ये खेल जो की इसलिए मज़ेदार था क्यूंकी ये पूरी दुनिया की नज़र में सबसे बड़ा पाप था? और क्यूंकी इसमें किसी को पता चल जाए तो जान जाने का ख़तरा था? क्या पाप और ख़तरे का रोमांच इस खेल को मज़ेदार बना रहा था जिसकी वजह से वो खुद भी बिना सोचे समझे उस लड़के के साथ कदम मिलाए जा रही थी?"

अचानक वो लड़का रुका तो ठकुराइन का सोचने का सिलसिला टूट गया.

"ये सामने" उसने सामने लगे एक हॅंडपंप की तरफ इशारा किया.

ठकुराइन ने देखा के वो बाग के बीच बना एक छ्होटा सा कमरा था जिसमें शायद खेत की ज़रूरत का समान रखा हुआ था. कमरे पर बाहर ताला लगा था और उसके बाहर एक हॅंडपंप लगा हुआ था.

"आप पानी पी लो" लड़के ने नलके की हत्थी को पकड़ा और उपेर नीचे किया. नलके से पानी बह चला

वहाँ पानी पीने के लिए कोई ग्लास या कोई और बर्तन नही था इसलिए ठकुराइन को झुक कर नलके के नीचे हाथ लगाना पड़ा ताकि वो पानी पी सकें. कुच्छ देर तक वो नलके की हत्थी चलाता रहा और ठकुराइन पानी पीती रही. प्यास बुझ गयी तो ठकुराइन ने वैसे ही झुके झुके अपना चेहरा धोना शुरू कर दिया.

अचानक नलके से पानी आना बंद हो गया. ठकुराइन ने चेहरा उठाकर देखा तो वो लड़का अब नलके की हत्थी पकड़े नही खड़ा था वो सोच ही रही थी के अचानक उन्हें अपनी गांद पर 2 हाथ महसूस हुए. वो समझ गयी के हाथ किसके थे.

चेहरा धोते वक़्त उनकी आँखें बंद थी इसलिए उनको पता ही नही चला के कब वो लड़का चुप चाप नालका चलाना छ्चोड़कर उनके पिछे जा खड़ा हुआ.

ठकुराइन के जिस्म को जैसे लकवा मार गया. उनके दिल की धड़कन तेज़ हो गयी और उन्होने फ़ौरन सीधी होने की कोशिश की पर उसने उनकी कमर पर अपना हाथ रखा और उन्हें दबाकर फिर झुका दिया. ठकुराइन ने अपने सामने लगे हॅंडपंप को पकड़ लिया और फिर झुक गयी.

लकड़े ने अपने दोनो हाथों से उनकी गांद को पकड़ रखा था और सारी के उपेर से ही धीरे धीरे सहला रहा था. उसके हाथ उनकी गांद की गोलैईयों की पूरी तरह नाप रहे थे. वो महसूस कर सकती थी के उसके दोनो हाथ काँप रहे थे पर फिर भी वो ऐसे लगा हुआ था जैसे की आटा गूँध रहा हो.

ठकुराइन वैसे ही खामोशी से झुकी रही. खुद उनकी समझ से बाहर था के वो ऐसा क्यूँ कर रही थी.

"क्या वो इसलिए ये सब कर रही थी क्यूंकी ये पाप है और पाप का एहसास इसको और मज़ेदार बना रहा है? क्या इसलिए के इसमें ख़तरा है के वो यूँ खुले में ये सब कर रही थी और ठाकुर कहीं से भी आ सकते थे?" जो भी था, वो वैसे ही झुकी रही.

लड़का थोड़ी देर तक सारी के उपेर से उनकी गांद को दबाता रहा. उसके हाथ धीरे धीरे गांद से उपेर सरक कर सारी और ब्लाउस के बीच उनके नंगे पेट पर आ गये. ठकुराइन के दिल दी धड़कन अपने नंगे जिस्म पर उसके हाथ महसूस करते ही और तेज़ हो गयी और उनके घुटने काँपने लगे.

पर उसके हाथ उनके पेट पर रुके नही. वो धीरे धीरे और उपेर को आते रहे. ठकुराइन समझ गयी के उसके हाथ कहाँ जा रहे हैं पर इससे पहले के वो कुच्छ कहती या करती, हाथ अपनी मंज़िल पर पहुँच गये.

ब्लाउस के उपेर से ही उसने उनकी बड़ी बड़ी चूचियो को अपने हाथों में भर लिया और पूरे ज़ोर से दबा दिया.

और ठीक उसी पल झुकी हुई ठकुराइन की चीज़ पर कोई सख़्त चीज़ आ लगी. वो जानती थी के ये उसका लंड था.

ठकुराइन फ़ौरन उठकर सीधी खड़ी हो गयी और लड़के का हाथ पकड़ कर एक झटके से अपनी छाती से हटा दिया. उनका दिल इतनी तेज़ी से धड़क रहा था जैसे अभी छाती से निकलकर उनके मुँह में आ जाएगा.

ठकुराइन उस लड़के से अलग हुई और दो कदम आगे को आकर अपनी उखड़ी हुई साँस संभालने लगी. हैरत उन्हें इस बात की थी के उस वक़्त उनकी खुद की टाँगो के बीच की जगह गीली हो चुकी थी.

वो लड़का फिर धीरे से उनके पिछे आया और ठकुराइन के कंधे पर हाथ रखा. ठकुराइन घबराकर थोड़ा और आगे को हुई और सामने खड़े बड़े से पेड़ के साथ जा लगी. वो लड़का फिर उनके पिछे आ गया और आकर उनसे सॅट गया.

वो लंबाई में ठकुराइन के बराबर ही था इसलिए पिछे से जब वो उनसे सटा तो उसका लंड सीधा फिर उनकी गांद पर आकर दबने लगा. उसकी छाती ठकुराइन की कमर पर और चेहरा उनकी गर्दन पर आ गया.

ठकुराइन बेसूध से पेड़ की तरफ मुँह किए खड़ी थी. उनके चेहरे के सामने उस बड़े से आम के पेड़ का तना था जिसको वो पकड़े खड़ी थी.

आँखें तो उनकी कबकि बंद हो चुकी थी.

"कोई आ जाएगा" उखड़ती हुई सांसो के बीच उन्होने धीरे से कहा

"बस 2 मिनिट" उस लड़के ने जवाब दिया और अपना चेहरा ठकुराइन के कंधे पर उनके बालों के बीच दबा दिया. ठकुराइन भी जैसे उसकी बात मानकर 2 मिनिट के लिए सब भूल गयी. भूल गयी के वो एक आम के बाग में खुले में खड़े थे. उनके चारों तरफ आम के पेड़ थे पर वो ये भूल गयी के थोड़ी ही दूर पर खुद ठाकुर और घर के 3 नौकर थे.

अब वो लड़का साफ साफ उनकी गांद पर अपना लंड रगड़ रहा था. वो पिछे से कपड़े के उपेर से ही उनकी गांद पर इतनी ज़ोर ज़ोर से धक्के मार रहा था के ठकुराइन का पूरा शरीर पेड़ के तने के साथ घिसने लगा था. वो अब भी अपना चेहरा उनके बालों में च्छुपाए हुए था.

उसके दोनो हाथ अब तक ठकुराइन की कमर को पकड़े हुए थे पर फिर धीरे से उसका एक हाथ ठकुराइन के पेट पर आ गया और उपेर को आने लगा. ठकुराइन जानती थी के वो फिर उनकी छाती पर आकर ही रुकेगा पर अब ना तो उनमें उसको रोकने की हिम्मत थी और ना ही शायद वो रोकना चाहती थी. उसका हाथ उपेर को खिसकता हुआ उनकी चूचियो पर आकर रुका और ब्लाउस के उपेर से वो उनकी चूचियाँ मसल्ने लगा. पीछे से वो अब भी उनकी गांद पर अपना लंड रगड़ रहा था.

फिर एक पल को वो रुका. उसका लंड ठकुराइन की गांद से हट गया और जिस हाथ से उसने उनकी कमर पकड़ रखी थी वो हाथ भी हटा लिया. दूसरे हाथ से वो अब भी उनकी चूचियाँ दबा रहा था. ठकुराइन को लगा के शायद उसका काम हो गया और वो हिलने ही लगी थी के उसने फिर दूसरे हाथ से उनकी कमर को थाम लिया और फिर अपना लंड उनकी गांद से सटा दिया.

ठकुराइन को समझते देर नही लगी के वो क्या कर रहा था. उसने अपना पाजामा खोल कर अपना लंड बाहर निकाल लिया था और अब अब अपना नंगा लंड उनकी सारी के उपेर से उनकी गांद पर रगड़ रहा था.

"कोई आ जाएगा" उन्होने फिर आँखें बंद करते हुए कहा

"बस हो गया" उसने धीरे से उनके कान में कहा

और उसके बाद तो जैसे एक तूफान सा आ गया. उनके पिछे खड़ा वो जैसे वासना से पागल हो उठा था. पूरी तेज़ी से वो अपना लंड कभी उनकी गांद पर रगड़ता तो कभी ऐसे धक्के मारता जैसे सही में उनकी गांद मार रहा हो. उसके हाथ भी अब एक जगाब पर नही रुके. एक हाथ जो कमर तक था अब कपड़ो के उपेर से ही कभी उनकी गांद पर जाता तो कभी उनकी टाँगो पर. दूसरा हाथ कभी चूचियाँ दबाता तो कभी उनके नंगे पेट पर आ जाता.

और फिर उसकी हिम्मत बढ़ती चली गयी.

इस बार उसका हाथ जब छातियो तक आया तो रुका नही. उपेर आता हुआ सीधा ठकुराइन के गले तक आया और अपना रास्ता ढूंढता हुआ सीधा पहले उनके ब्लाउस और फिर उनकी ब्रा से होता हुआ उनकी नंगी चूचियो पर आ रुका.

"आआअहह" ठकुराइन सिर्फ़ इतना ही कह सकी.

उसने एक हाथ से उनकी नंगी चूची पूरे ज़ोर से दबाकर पकड़ ली. अपनी चूत पर कुच्छ महसूस हुआ तो ठकुराइन को पता चला के उसका दूसरा हाथ अब सारी के उपेर से सीधा उनकी चूत पर था.

एक हाथ से उनकी नंगी चूची को पकड़े, दूसरे हाथ से चूत को सारी के उपेर से रगड़ते हुए वो उनकी गांद पर ऐसे धक्के मार रहा था जैसे लंड गांद के अंदर बाहर कर रहा हो.

उसकी साँस बढ़ती चली गयी. धक्को में और तेज़ी आ गयी. ठकुराइन जानती थी के अब क्या होगा.

"मेरी सारी खराब मत करना" उनका इतना कहना ही था के वो लड़का एक झटके से अलग हो गया. ठकुराइन ने उसपर एक नज़र डाली तो वो उनसे अलग खड़ा अपना लंड हिला रहा था. ज़मीन पर गिरते उसके वीर्य को देख कर ठकुराइन को फिर अपने मुँह में उसके टेस्ट की याद आ गयी.

"बड़ी देर लगा दी माँ बेटे ने" थोड़ी देर बाद जब अपनी हालत ठीक करके वो ठाकुर से मिले तो ठाकुर ने कहा "अच्छा आप एक काम करें. आप दोनो हवेली निकल जाओ. मुझे कुच्छ काम है यहाँ खेतों पर तो मैं शाम तक आ जाऊँगा"

थोड़ी देर बाद ठकुराइन उस लड़के के साथ अकेली कार में बैठी हवेली की तरफ जा रही थी. ठाकुर और तीनो नौकर पिछे खेतों पर ही रुक गये थे.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --22

gataank se aage........................

"Kya hua?" Unki soch thakur ki aawaz se tooti.

"Kuchh nahi" Unhone dheere se kaha aur ladke ko chalne ka ishara kiya "Chalo"

Vo ladka aage aage aur thakurain pichhe pichhe chal pade. Us din jo chhat par hua tha uske baad thakurain aur us ladke ki ab tak koi baat nahi hui thi aur na hi uske baad usne koi aur harkat karne ki koshish ki thi. Par jaane kyun thakurain ko lag raha tha ke vo akele mein unhen isliye le ja raha hai taaki unke saath phir kuchh kar sake. Jo baat unehn samajh nahi aa rahi thi vo ye thi ke sab kuchh jaante hue bhi vo kyun uske har baat rakh leti thi, karne deti thi usko vo sab jo ki vo karna chahta tha. Kya iski vajah ye thi ke kahin dil mein unhen bhi ye sab achha lag raha tha? Kya vo khud bhi anjane mein is khel mein bhaag le rahi thi.

"Ye khel jo ki isliye mazedaar tha kyunki ye poori duniya ki nazar mein sabse bada paap tha? Aur kyunki ismein kisi ko pata chal jaaye toh jaan jaane ka khatra tha? Kya paap aur khatre ka romanch is khel ko mazedaar bana raha tha jiski vajah se vo khud bhi bina soche samjhe us ladke ke saath kadam milaye ja rahi thi?"

Achanak vo ladka ruka toh thakurain ka sochne ka silsila toot gaya.

"Ye saamne" Usne saamne lage ek handpump ki taraf ishara kiya.

Thakurain ne dekha ke vo baagh ke beech bana ek chhota sa kamra tha jismein shayad khet ki zaroorat ka saman rakha hua tha. Kamre par bahar tala laga tha aur uske bahar ek handpump laga hua tha.

"Aap pani pi lo" Ladke ne nalke ki hatthi ko pakda aur uper neeche kiya. Nalke se pani beh chala

Vahan pani pine ke liye koi glass ya koi aur bartan nahi tha isliye thakurain ko jhuk kar nalke ke neeche haath laga pada taaki vo paani pi saken. Kuchh der tak vo nalke ki hatthi chalata raha aur thakurain pani peeti rahi. Pyaas bujh gayi toh thakurain ne vaise hi jhuke jhuke apna chehra dhona shuru kar diya.

Achanak nalke se pani aana band ho gaya. Thakurain ne chehra uthakar dekha toh vo ladka ab nalke ki hatthi pakde nahi khada tha Vo soch hi rahi thi ke achanak unhen apni gaand par 2 haath mehsoos hue. Vo samajh gayi ke haath kiske the.

Chehra dhote waqt unki aankhen band thi isliye unko pata hi nahi chala ke kab vo ladka chup chap nalka chalana chhodkar unke pichhe ja khada hua.

Thakurain ke jism ko jaise lakwa maar gaya. Unke dil ki dhadkan tez ho gayi aur unhone fauran sidhi hone ki koshish ki par usne unki kamar par apna haath rakha aur unhen dabakar phir jhuka diya. Thakurain ne apne saamne lage handpump ko pakad liya aur phir jhuk gayi.

Lakde ne apne dono haathon se unki gaand ko pakad rakha tha aur saree ke uper se hi dheere dheere sehla raha tha. Uske haath unki gaand ki golaiyon ki poori tarah naap rahe the. Vo mehsoos kar sakthi thi ke uske dono haath kaanp rahe the par phir bhi vo aise laga hua tha jaise ki aata goondh raha ho.

Thakurain vaise hi khamoshi se jhuki rahi. Khud unki samajh se bahar tha ke vo aisa kyun kar rahi thi.

"Kya vo isliye ye sab kar rahi thi kyunki ye paap hai aur paap ka ehsaas isko aur mazedaar bana raha hai? Kya isliye ke ismein khatra hai ke vo yun khule mein ye sab kar rahi thi aur thakur kahin se bhi aa sakte the?" Jo bhi tha, vo vaise hi jhuki rahi.

Ladka thodi der tak saree ke uper se unki gaand ko dabata raha. Uske haath dheere dheere gaand se uper sarak kar saree aur blouse ke beech unke nange pet par aa gaye. Thakurain ke dil di dhadkan apne nange jism par uske haath mehsoos karte hi aur tez ho gayi aur unke ghutne kaanpne lage.

Par uske haath unke pet par ruke nahi. Vo dheere dheere aur uper ko aate rahe. Thakurain samajh gayi ke uske haath kahan ja rahe hain par isse pehle ke vo kuchh kehti ya karti, haath apni manzil par pahunch gaye.

Blouse ke uper se hi usne unki badi badi chhatiyon ko apne haathon mein bhar liya aur poore zor se daba diya.

Aur theek usi pal jhuki hui thakurain ki cheez par koi sakht cheez aa lagi. Vo janti thi ke ye uska lund tha.

Thakurain fauran uthkar sidhi khadi ho gayi aur ladke ka haath pakad kar ek jhatke se apni chhati se hata diya. Unka dil itni tezi se dhadak raha tha jaise abhi chhati se nikalkar unke munh mein aa jayega.

Thakurain us ladke se alag hui aur do kadam aage ko aakar apni ukhdi hui saans sambhalne lagi. Hairat unhen is baat ki thi ke us waqt unki khud ki taango ke beech ki jagah geeli ho chuki thi.

Vo ladka phir dheere se unke pichhe aaya aur thakurain ke kandhe par haath rakha. Thakurain ghabrakar thoda aur aage ko hui aur saamne khade bade se ped ke saath ja lagi. Vo ladka phir unke pichhe aa gaya aur aakar unse sat gaya.

Vo lambai mein thakurain ke barabar hi tha isliye pichhe se jab vo unse sata toh uska lund sidha phir unki gaand par aakar dabne laga. Uski chhati thakurain ki kamar par aur chehra unki gardan par aa gaya.

Thakurain besudh se ped ki taraf munh kiye khadi thi. Unke chehre ke saamne us bade se aam ke ped ka tana tha jisko vo pakde khadi thi.

Aankhen toh unki kabki band ho chuki thi.

"Koi aa jayega" Ukhadti hui saanso ke beech unhone dheere se kaha

"Bas 2 minute" Us ladke ne jawab diya aur apna chehra thakurain ke kandhe par unke baalon ke beech daba diya. Thakurain bhi jaise uski baat maankar 2 minute ke liye sab bhool gayi. Bhool gayi ke vo ek aam ke baagh mein khule mein khade the. Unke chaaron taraf aam ke ped the par vo ye bhool gayi ke thodi hi door par khud thakur aur ghar ke 3 naukar the.

Ab vo ladka saaf saaf unki gaand par apna lund ragad raha tha. Vo pichhe se kapde ke uper se hi unki gaand par itni zor zor se dhakke maar raha tha ke thakurain ka poora shareer ped ke tane ke saath ghisne laga tha. Vo ab bhi apna chehra unke baalon mein chhupaye hue the.

Uske dono haath ab tak thakurain ki kamar ko pakde hue the par phir dheere se uska ek haath thakurain ke pet par aa gaya aur uper ko aane laga. Thakurain jaanti thi ke vo phir unki chhati par aakar hi rukega par ab na toh unmein usko rokne ki himmat thi aur na hi shayad vo rokna chahti thi. Uska haath uper ko khiskata hua unki chhatiyon par aakar ruka aur blouse ke uper se vo unki chhatiyan masalne laga. Pichhe se vo ab bhi unki gaand par apna lund ragad raha tha.

Phir ek pal ko vo ruka. Uska lund thakurain ki gaand se hat gaya aur jis haath se usne unki kamar pakad rakhi thi vo haath bhi hata liya. Doosre haath se vo ab bhi unki chhatiyan daba raha tha. Thakurain ko laga ke shayad uska kaam ho gaya aur vo hilne hi lagi thi ke usne phir doosre haath se unki kamar ko thaaam liya aur phir apna lund unki gaand se sata diya.

Thakurain ko samajhte der nahi lagi ke vo kya kar raha tha. Usne apna pajama khol kar apna lund bahar nikal liya tha aur ab ab apna nanga lund unki saree ke uper se unki gaand par ragad raha tha.

"Koi aa jaayega" Unhone phir aankhen band karte hue kaha

"Bas ho gaya" Usne dheere se unke kaan mein kaha

Aur uske baad toh jaise ek toofan sa aa gaya. Unke pichhe khada vo jaise vaasna se pagal ho utha tha. Poori tezi se vo apna lund kabhi unki gaand par ragadta toh kabhi aise dhakke maarta jaise sahi mein unki gaand maar raha ho. Uske haath bhi ab ek jagab par nahi ruke. Ek haath jo kamar tak tha ab kapdo ke uper se hi kabhi unki gaand par jata toh kabhi unki taango par. Doosra haath kabhi chhatiyan dabata toh kabhi unke nange pet par aa jata.

Aur phir uski himmat badhti chali gayi.

Is baar uska haath jab chhaityon tak aaya toh ruka nahi. Uper aata hua sidha thakurain ke gale tak aaya aur apna raasta dhoondhta hua sidha pehle unke blouse aur phir unki bra se hota hua unki nangi chhati par aa ruka.

"aaaaahhhhh" Thakurain sirf itna hi keh saki.

Usne ek haath se unki nangi chhati poore zor se dabakar pakad li. Apni choot par kuchh mehsoos hua toh thakurain ko pata chala ke uska doosra haath ab saree ke uper se sidha unki choot par tha.

Ek haath se unki nangi chhati ko pakde, doosre haath se choot ko saree ke uper se ragadte hue vo unki gaand par aise dhakke maar raha tha jaise lund gaand ke andar bahar kar raha ho.

Uski saans badhti chali gayi. Dhakko mein aur tezi aa gayi. Thakurain jaanti thi ke ab kya hoga.

"Meri saree kharab mat karna" Unka itna kehna hi tha ke vo ladka ek jhatke se alag ho gaya. Thakurain ne uspar ek nazr daali toh vo unse alag khada apna lund hila raha tha. Zameen par girte uske veerya ko dekh kar thakurain ko phir apne munh mein uske taste ki yaad aa gayi.

"Badi der laga di maan bete ne" Thodi der baad jab apni halat theek karke vo thakur se mile toh thakur ne kaha "Achha aap ek kaam karen. Aap dono haweli nikal jao. Mujhe kuchh kaam hai yahan kheton par toh main shaam tak aa jaoonga"

Thodi der baad thakurain us ladke ke saath akeli car mein bethi haweli ki taraf ja rahi thi. Thakur aur teeno naukar pichhe kheton par hi ruk gaye the.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:13

खूनी हवेली की वासना पार्ट --23

गतान्क से आगे........................

बिंदिया अपने कमरे में समान बाँधे बैठी थी. चंदर अपना समान बाँध रहा था और पायल बाहर खेल रही थी.

"चंदर" बिंदिया ने कहा

चंदर ने नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा.

"ठाकुर साहब ने आज फिर कहलवाया है के तुझे हवेली ना लेकर जाऊं. वो चाहते हैं के तू यहीं रुक कर खेतों की देख भाल करे"

चंदर ने अजीब नज़रों से उसकी तरफ देखा.

"ऐसे मत देख मेरी तरफ" बिंदिया बोली "रुक जा ना यहीं पर. मैं रोज़ आ जाया करूँगी तेरे पास. तब चोद लेना. और वैसे भी हवेली में किसी को भनक पड़ गयी के तेरे मेरे बीच क्या चल रहा है तो आफ़त आ जाएगी"

चंदर ने इनकार में सर हिलाया

"समझ मेरी बात को. यहाँ आराम से कोई नही होता. मैं दिन में तुझसे एक बार मिलने आ जाया करूँगी और तब जितना जी चाहे चोद लिया करना. जैसे चाहे चोद लेना मैं मना नही करूँगी पर हवेली चलने की ज़िद ना कर. मुझे ठाकुर साहब की बात ना मानते हुए डर लगता है"

चंदर ने गुस्से में उसकी तरफ देखा और फिर अपने पावं पटकता हुआ झोपड़ी से बाहर निकल गया.

सुबह ही ठाकुर साहब ने कहलवाया था के बिंदिया अब हवेली आकर रहना शुरू कर दे. पूरे गाओं को पता चल चुका था के ठकुराइन बिस्तर से लग चुकी हैं. अब चल फिर नही सकती और हर पल कोई ना कोई उनके साथ चाहिए जो उनकी देख रेख कर सके.

दूसरी बात जो पूरे गाओं में जंगल में आग की तरह फेली थी वो ये थी के जै को ठाकुर साहब ने हवेली से निकाल दिया था. कोई नही जानता था के क्यूँ पर अब वो शहर में बने ठाकुर के एक मकान में रहता था. पूरे गाओं का यही कहना था के ठाकुर ने उसको हवेली से इसलिए निकाला ताकि उन्हें जायदाद में बटवारा ना करना पड़े.

जो भी था, बिंदिया को सिर्फ़ ये पता था के उसको अब हवेली में जाकर रहना है. और एक तरह से वो ये सोचकर खुश भी थी. यूँ खेतों के बीच अकेले रहते हुए उसको डर भी लगता था. उसकी बेटी पायल अब जवानी की दहलीज़ पर कदम रख रही थी और बिंदिया के पास उसके बढ़ते जिस्म को ढकने के लिए कपड़े तक नही थे. अब अगर वो हवेली में रहेगी, तो पैसे भी थोड़े ज़्यादा मिल जाया करेंगे और खाना पीना भी हवेली में ही हो जाया करेगा.

यही सब सोचती वो अपनी जगह से उठी और समान पर एक आखरी नज़र डाली. पूरी हवेली में अब कुच्छ भी नही था. सिर्फ़ एक टूटी हुई चारपाई पड़ी थी. बाकी सब समान बँध चुका था. चंदर ने भी बिंदिया के कहने पर अपना समान बाँध लिया था पर बिंदिया को ठाकुर का हुकुम ना मानते हुए दर लग रहा था और उनका हुकुम था के चंदर यहीं खेतों में रहे, हवेली ना आए.

"इसको समझाना पड़ेगा. बाद में आती जाती रहूंगी. ये इस बात को नही समझ रहा के सिर्फ़ मैं इसकी ज़रूरत नही, ये खुद भी मेरी ज़रूरत है" सोचते हुए बिंदिया उठी और झोपड़ी के टूटे हुए दरवाज़े को बंद करके परदा डाल दिया.

झोपड़ी के कोने में ही उसने नहाने की जगह बना रखी थी. समान बाँधने के चक्कर में उसकी हालत खराब हो चुकी थी इसलिए उसने हवेली जाने से पहले एक बार नहाने की सोची.

बिंदिया ने अपने कपड़े उतारकर वहीं कोने में टाँग दिए और पूरी नंगी होकर अपने आपको एक बार देखा. अपने जिस्म पर उसको हमेशा से ही गर्व रहा था. एक बच्चे की माँ थी वो पर जिस्म पर कहीं भी ज़रा भी चर्बी ना निशान नही था. खेतों में काम करते करते उसका पूरा जिस्म गाथा हुआ था. चौड़े कंधे, पतली कमर, गठी हुई टांगे, बड़ी बड़ी पर एकदम तनी हुई चूचियाँ. उसके कूल्हे तक ज़रा भी ढीले नही पड़े थे और एकदम टाइट थे. जब वो घाघरा पहनकर चलती, तो पिछे से सारे मर्द उसकी टाइट गांद देखकर आहें भरते रहते थे, ये बात वो खुद भी जानती थी.

मुस्कुराते हुए उसने वहीं रखी बाल्टी से लेकर पानी अपने उपेर डाला और पूरे जिस्म पर साबुन मलने लगी.

वो अभी नहा ही रही थी के झोपड़ी का दरवाज़ा, जिसमें कुण्डा नही थी, खुला और परदा हटाता हुआ चंदर अंदर आ गया.

बिंदिया ने एक नज़र उसपर डाली और मुस्कुरा कर अपने जिस्म पर साबुन लगाती रही.

"पायल कहाँ है" बिंदिया ने पुछा तो चंदर ने उसको इशारे से बताया के बाहर पेड़ के नीचे वो खेलती खेलती सो गयी थी.

बिंदिया जानती थी के चंदर कभी पायल के सामने उसके साथ कोई हरकत नही करेगा इसलिए जब उसने कहा के पायल बाहर सो रही है, वो समझ गयी के वो अंदर क्या करने आया है.

चंदर ने भी एक एक करके अपने सारे कपड़े उतार दिए. अपने खड़े लंड को हिलाता हुआ वो बिंदिया के करीब आया और उसके कंधो पर हाथ रखा.

उसके छूते ही बिंदिया का पूरा शरीर सिहर उठा. वो एक बहुत ही गरम औरत थी जिसको गरम होने में ज़रा भी वक़्त नही लगता था. उसका बस चलता तो वो दिन में 10 बार चुदवाती. इस वक़्त भी चंदर को यूँ नंगा होकर अपने करीब आते देखकर उसकी चूत से पानी बह चला था.

पर चंदर के दिमाग़ में शायद कुच्छ और ही था. बिंदिया ने आगे बढ़कर उसके होंठ चूमने की कोशिश ही की थी के चंदर ने उसको दोनो कंधो से पकड़ा और लगभग धक्का देते हुए घूमकर दीवार से लगा दिया.

अब बिंदिया दीवार के साथ लगी खड़ी थी. उसका चेहरा दीवार की तरफ और कमर चंदर की तरफ थी जिससे वो सटा खड़ा था. उसका नंगा जिस्म बिंदिया के जिस्म से रग़ाद रहा था और लंड गांद के बीच फसा हुआ था. बिंदिया के पूरे शरीर पर साबुन लगा हुआ था जिसकी वजह से दोनो के जिस्म आपस में एक दूसरे पर बिना किसी रुकावट के फिसल रहे थे.

"क्या हुआ?" बिंदिया बोली "अभी तक नाराज़ है?"

जवाब में चंदर ने उसके हाथ में पकड़ा साबुन लिया और अपने एक हाथ में लेकर साबुन अपने लंड पर रगड़ने लगा.

"क्या कर रहा है?" बिंदिया ने पुछा

वो पलटकर चंदर की तरफ देखने ही वाली थी के चंदर ने उसको फिर दीवार से धक्का देकर सटा दिया.

"चंदर" इससे पहले के बिंदिया आगे को कुच्छ कहती, चंदर का साबुन लगा लंड उसकी गांद के बीच आ फसा. बिंदिया समझ गयी के वो क्या करने वाला है और वो फिर पलटने लगी पर तब तक देर हो चुकी थी.

चंदर ने पूरी ताक़त से धक्का लगाया. लंड और बिंदिया की गांद, दोनो पर साबुन लगा हुआ था. लंड बिना रुके पूरा का पूरा बिंदिया की गांद में घुसता चला गया.

"निकाल निकाल" बिंदिया ऐसे तड़प उठी जैसे पानी बिना मच्चली. उसको दिन में तारे दिखाई देने लगे थे. चंदर का पूरा लंड उसकी गांद में समाया हुआ था और उसे ऐसे लग रहा था जैसे उसको काटकर 2 टुकड़ो में बाँट दिया गया हो.

बिंदिया पूरी ताक़त से चंदर को अपने से दूर करने की कोशिश कर रही थी पर वो उसके लिए काफ़ी ताक़तवर साबित हुआ. पूरी जान लगाने के बाद भी बिंदिया ना तो उसको अलग कर पाई और ना ही दीवार से हट सकी.

चंदर ने धक्के मारने शुरू कर दिए थे. उसका लंड बिंदिया की गांद में अंदर बाहर हो रहा था.

"मार ली तूने मेरी चंदर" बिंदिया की आँखों से आँसू बह चले "निकाल ले अपना लंड बाहर. मेरी जान निकल रही है. आआहह आअहह ... मत कर"

बिंदिया रोए जा रही थी, बड़बदाए जा रही थी और चंदर चुप चाप उसकी गांद पर धक्के लगाए जा रहा था. उस वक़्त जैसे वो गूंगे के साथ साथ बेहरा भी हो गया था.

"आआहह .... मर गयी मैं माँ .... मार ली रे तूने चंदर..... आज मेरी गांद भी मार ली ... " बिंदिया का दर्द जैसे बढ़ता जा रहा था.

आज से पहले भी चंदर ने उसकी गांद केयी बार मारने की कोशिश की थी पर बिंदिया ने कभी उसको लंड डालने नही दिया था. बस वो अपनी अंगुली ही उसको चोद्ते वक़्त उसकी गांद में घुसा लेता था. पर आज अचानक हुए इस हमले में ना तो बिंदिया उसको रोक पाई, ना कुच्छ कह पाई.

चंदर का लंड पूरी तरह से उसकी गांद में अंदर बाहर हो रहा था.

"आआहह चंदर..... " बिंदिया वैसे ही बड़बड़ा रही थी "धीरे .... धीरे कर. .... पूरा तो बाहर मत निकाल ... थोड़ा सा अंदर बाहर करता रह .... पूरा बाहर निकालके मत डाल ... अया"

और फिर दर्द जैसे कम होता चला गया. बिंदिया की गांद ने अपने आपको लंड के अनुसार अड्जस्ट कर लिया और बिंदिया के दर्द की जगह एक अजीब मज़े ने ले ली थी जिसका अंदाज़ा उसको आज से पहले कभी ना हुआ था.

"आअहह चंदर" वो अब भी बड़बड़ा रही थी पर बोल बदल चुके थे "मज़ा आ गया रे ,..... इतने वक़्त से क्यूँ रुका हुआ था ... इतनी मस्त गांद मैं तेरे सामने सारा दिन हिलती फिरती थी .. पहले क्यूँ नही मारी?"

उसकी हर बात पर चंदर का जोश बढ़ता जा रहा था और वो और ज़ोर से धक्के मार रहा था.

"अब तक क्यूँ सिर्फ़ चूत मारकर काम चला रहा था? मेरे मुँह में लंड घुसा लिया, चूत में घुसा लिया तो गांद क्यूँ छ्चोड़ रखी थी ... यहाँ भी घुसाता ... ये मज़ा मुझे पहले क्यूँ नही दिया रे"

चंदर के धक्के और बिंदिया का बड़बड़ा दोनो ही तेज़ होते जा रहे थे

"और ज़ोर से ... हां ऐसे ही ... धक्का ज़ोर से लगा ... पूरा लंड बाहर खींच ... हां अब घुसा पूरा अंदर तक ... मार ले मेरी गांद ... तेरे लिए ही बचा रखी थी ... इस गांद के बहुत दीवाने हैं पर आज मारी तूने है"

दोनो अब जैसे पागल हो चुके थे. चंदर पागलपन में धक्के लगा रहा था और बिंदिया पागल की तरह बड़बड़ा रही थी, गांद मरा रही थी.

"मार मेरी गांद ... मार ... मार ... ज़ोर से मार ... लगा धक्का ... पूरा घुसा ... मर्द नही है क्या .... बच्चे की तरह मत मार ... ज़ोर लगाके ढककर मार"

और अचानक चंदर ने पूरा लंड उसकी गांद में घुसाया और वहीं रुक गया. लंड से निकलता वीर्य बिंदिया की गांद में भरने लगा.

आउज़ इसके साथ खुद बिंदिया भी ख़तम होती चली गयी.

थोड़ी देर बाद जब दोनो की साँस थमी तो बिंदिया ने अपनी आँखें बंद किए हुए पिछे खड़े चंदर के बालों में हाथ फिराया. वो दोनो अब भी वैसे ही खड़े थे और लंड अब तक बिंदिया की गांद में था.

"तू मेरे साथ ही चलेगा चंदर" बिंदिया बोली "ठाकुर साहब कुच्छ भी कहें, तू हवेली में ही रहेगा मेरे साथ. तुझे यहाँ छ्चोड़ गयी तो हवेली में मेरी गांद कौन मारा करेगा?"

पीछे खड़े चंदर के चेहरे पर मुस्कुराहट फेल गयी. उसका प्लान कामयाबी की तरफ बढ़ रहा था. हवेली में रहना मतलब ठाकुर के करीब रहना और मौका मिलते ही ....

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --23

gataank se aage........................

Bindiya apne kamre mein saman baandhe bethi thi. Chander apna saman baandh raha tha aur Payal bahar khel rahi thi.

"Chander" Bindiya ne kaha

Chander ne nazar uthakar uski taraf dekha.

"Thakur Sahab ne aaj phir kehalvaya hai ke tujhe haweli na lekar jaoon. Vo chahte hain ke tu yahin ruk kar kheton ki dekh bhaal kare"

Chander ne ajeeb nazron se uski taraf dekha.

"Aise mat dekh meri taraf" Bindiya boli "Ruk ja na yahin par. Main roz aa jaya karungi tere paas. Tab chod lena. Aur vaise bhi haweli mein kisi ko bhanak pad gayi ke tere mere beech kya chal raha hai toh aafat aa jayegi"

Chander ne inkaar mein sar hilaya

"Samajh meri baat ko. Yahan aaram se koi nahi hota. Main din mein tujhse ek baar milne aa jaya karungi aur tab jitna ji chahe chod liya karna. Jaise chahe chod lena main mana nahi karungi par haweli chalne ki zid na kar. Mujhe Thakur sahab ki baat na maante hue darr lagta hai"

Chander ne gusse mein uski taraf dekha aur phir apne paon patakta hua jhopdi se bahar nikal gaya.

Subah hi Thakur sahab ne kehalvaya tha ke Bindiya ab haweli aakar rehna shuru kar de. Poore gaon ko pata chal chuka tha ke Thakurain bistar se lag chuki hain. Ab chal phir nahi sakti aur har pal koi na koi unke saath chahiye jo unki dekh rekh kar sake.

Doosri baat jo poore gaon mein jungle mein aag ki tarah pheli thi vo ye thi ke Jai ko Thakur Sahab ne haweli se nikal diya tha. Koi nahi jaanta tha ke kyun par ab vo Shehar mein bane Thakur ke ek makaan mein rehta tha. Poore gaon ka yahi kehna tha ke thakur ne usko haweli se isliye nikala taaki unhen jaaydad mein batwara na karna pade.

Jo bhi tha, Bindiya ko sirf ye pata tha ke usko ab haweli mein jakar rehna hai. Aur ek tarah se vo ye sochkar khush bhi thi. Yun kheton ke beech akele rehte hue usko darr bhi lagta tha. Uski beti Payal ab jawani ki dehleez par kadam rakh rahi thi aur Bindiya ke paas uske badhte jism ko dhakne ke liye kapde tak nahi the. Ab agar vo haweli mein rahegi, toh paise bhi thode zyada mil jaya karenge aur khana peena bhi haweli mein hi ho jaya karega.

Yahi sab sochti vo apni jagah se uthi aur saman par ek aakhri nazar daali. Poori haweli mein ab kuchh bhi nahi tha. Sirf ek tooti hui charpai padi thi. Baaki sab saman bandh chuka tha. Chander ne bhi Bindiya ke kehne par apna saman baandh liya tha par Bindiya ko thakur ka hukum na maante hue darr lag raha tha aur unka hukum tha ke Chander yahin kheton mein rahe, haweli na aaye.

"Isko samjhana padega. Baad mein aati jaati rahungi. Ye is baat ko nahi samajh raha ke sirf main iski zaroorat nahi, ye khud bhi meri zaroorat hai" Sochte hue Bindiya uthi aur Jhopdi ke toote hue darwaze ko band karke parda daal diya.

Jhopdi ke kone mein hi usne nahane ki jagah bana rakhi thi. Saman bandhne ke chakkar mein uski halat kharab ho chuki thi isliye usne haweli jaane se pehle ek baar nahane ki sochi.

Bindiya ne apne kapde utarkar vahin kone mein taang diye aur poori nangi hokar apne aapko ek baar dekha. Apne jism par usko hamesha se hi garv raha tha. Ek bachche ki maan thi vo par jism par kahin bhi zara bhi charbi na nishan nahi tha. Kheton mein kaam karte karte uska poora jism gatha hua tha. Chaude kandhe, patli kamar, gathi hui taange, badi badi par ekdam tani hui chhatiyan. Uske koolhe tak zara bhi dheele nahi pade the aur ekdam tight the. Jab vo ghaghra pehankar chalti, toh pichhe se saare mard uski tight gaand dekhkar aahen bharte rehte the, ye baat vo khud bhi jaanti thi.

Muskurate hue usne vahin rakhi baalti se lekar paani apne uper dala aur poore jism par saabun malne lagi.

Vo abhi naha hi rahi thi ke jhopdi ka darwaza, jismein kunda nahi thi, khula aur parda hatata hua Chander andar aa gaya.

Bindiya ne ek nazar uspar daali aur muskura kar apne jism par saabun lagati rahi.

"Payal kahan hai" Bindiya ne puchha toh Chander ne usko ishare se bataye ke bahar ped ke niche vo khelti khelti so gayi thi.

Bindiya jaanti thi ke Chander kabhi Payal ke saamne uske saath koi harkat nahi karega isliye jab usne kaha ke Payal bahar so rahi hai, vo samajh gayi ke vo andar kya karne aaya hai.

Chander ne bhi ek ek karke apne saare kapde utaar diye. Apne khade lund ko hilata hua vo Bindiya ke kareeb aaya aur uske kandho par haath rakha.

Uske chhote hi Bindiya ka poora shareer sihar utha. Vo ek bahut hi garam aurat thi jisko garam hone mein zara bhi waqt nahi lagta tha. Uska bas chalta toh vo din mein 10 baar chudwati. Is waqt bhi Chander ko yun nanga hokar apne kareeb aate dekhkar uski choot se pani beh chala tha.

Par Chander ke dimaag mein shayad kuchh aur hi tha. Bindiya ne aage badhkar uske honth choomne ki koshish hi ki the ke Chander ne usko dono kandho se pakda aur lagbhag dhakka dete hue ghumakar deewar se laga diya.

Ab Bindiya deewar ke saath lagi khadi thi. Uska chehra deewar ki taraf aur kamar Chander ki taraf thi jisse vo sata khada tha. Uska nanga jism Bindiya ke jism se ragad raha tha aur lund gaand ke beech phasa hua tha. Bindiya ke poore shareer par saabun laga hua tha jiski vajah se dono ke jism aapas mein ek doosre par bina kisi rukawat ke phisal rahe the.

"Kya hua?" Bindiya boli "Abhi tak naraz hai?"

Jawab mein Chander ne uske haath mein pakda saabun liye aur apne ek haath mein lekar saabun apne lund par ragadne laga.

"Kya kar raha hai?" Bindia ne puchha

Vo palatkar Chander ki taraf dekhne hi wali thi ke Chander ne usko phir deewar se dhakka dekar sata diya.

"Chander" Isse pehle ke Bindiya aage ko kuchh kehti, Chander ka saabun laga lund uski gaand ke beech aa phasa. Bindiya samajh gayi ke vo kya karne wala hai aur vo phir palatne lagi par tab tak der ho chuki thi.

Chander ne poori taakat se dhakka lagaya. Lund aur Bindiya ki gaand, dono par saabun laga hua tha. Lund bina ruke poora ka poora Bindiya ki gaand mein ghusta chala gaya.

"Nikaal nikaal" Bindiya aise tadap uthi jaise paani bina machhli. Usko din mein taare dikhai dene lage the. Chander ka poora lund uski gaand mein samaya hua tha aur use aise lag raha tha jaise usko kaatkar 2 tukdo mein baant diya gaya ho.

Bindiya poori taaqat se Chander ko apne se door karne ki koshish kar rahi thi par vo uske liye kaafi taaqatwar saabit hua. Poori jaan lagane ke baad bhi Bindiya na toh usko alag kar paayi aur na hi deewar se hat saki.

Chander ne dhakke maarne shuru kar diye the. Uska lund Bindiya ki gaand mein andar bahar ho raha tha.

"Maar li tune meri Chander" Bindiya ki aankhon se aansoo beh chale "Nikal le apna lund bahar. Meri jaan nikal rahi hai. Aaaahhhh aaahhhhh ... mat kar"

Bindiya roye ja rahi thi, badbadaye ja rahi thi aur Chander chup chap uski gaand par dhakke lagaye ja raha tha. Us waqt jaise vo goonge ke saath saath behra bhi ho gaya tha.

"Aaaahhhh .... mar gayi main maan .... maar li re tune chander..... aaj meri gaand bhi maar li ... " Bindiya ka dard jaise badhta ja raha tha.

Aaj se pehle bhi Chander ne uski gaand kayi baar maarne ki koshish ki thi par Bindiya ne kabhi usko lund daalne nahi diya tha. Bas vo apni anguli hi usko chodte waqt uski gaand mein ghusa leta tha. Par aaj achanak hue is hamle mein na toh Bindiya usko rok paayi, na kuchh keh paayi.

Chander ka lund poori tarah se uski gaand mein andar bahar ho raha tha.

"AAAAHHH Chander..... " Bindiya vaise hi badbada rahi thi "Dheere .... dheere kar. .... poora toh bahar mat nikal ... thoda sa andar bahar karta reh .... poora bahar nikalke mat daal ... aaah"

Aur phir dard jaise kam hota chala gaya. Bindiya ki gaand ne apne aapko lund ke anusaar adjust kar liya aur Bindiya ke dard ki jagah ek ajeeb maze ne le li thi jiska andaza usko aaj se pehle kabhi na hua tha.

"Aaahhhh Chander" Vo ab bhi badbada rahi thi par bol badal chuke the "Maza aa gaya re ,..... itne waqt se kyun ruka hua tha ... itni mast gaand main tere saamne sara din hilati phirti thi .. pehle kyun nahi maari?"

Uski har baat par Chander ka josh badhta ja raha tha aur vo aur zor se dhakke maar raha tha.

"Ab tak kyun sirf choot maarkar kaam chala raha tha? Mere mund mein lund ghusa liya, choot mein ghusa liya toh gaand kyun chhod rakhi thi ... yahan bhi ghusata ... ye maza mujhe pehle kyun nahi diya re"

Chander ke dhakke aur Bindiya ka badbada dono hi tez hote ja rahe the

"Aur zor se ... haan aise hi ... dhakka zor se laga ... poora lund bahar khinch ... haan ab ghusa poora andar tak ... maar le meri gaand ... tere liye hi bacha rakhi thi ... is gaand ke bahut deewane hain par aaj maari tune hai"

Dono ab jaise pagal ho chuke the. Chander pagalpan mein dhakke laga raha tha aur Bindiya pagal ki tarah badbada rahi thi, gaand mara rahi thi.

"Maar meri gaand ... maar ... maar ... zor se maar ... laga dhakka ... poora ghusa ... mard nahi hai kya .... bachche ki tarah mat maar ... zor lagake dhakkar maar"

Aur achanak Chander ne poora lund uski gaand mein ghusaya aur vahin ruk gaya. Lund se nikalta veerya Bindiya ki gaand mein bharne laga.

Aus iske saath khud Bindiya bhi khatam hoti chali gayi.

Thodi der baad jab dono ki saans thami toh Binidya ne apni aankhen band kiye hue pichhe khade Chander ke baalon mein haath phiraya. Vo dono ab bhi vaise hi khade the aur lund ab tak Bindiya ki gaand mein tha.

"tu mere saath hi chalega Chander" Bindiya boli "Thakur sahab kuchh bhi kahen, tu haweli mein hi rahega mere saath. Tujhe yahan chhod gayi toh haweli mein meri gaand kaun mara karega?"

Pichhe khade Chander ke chehre par muskurahat phel gayi. Uska plan kaamyabi ki taraf badh raha tha. Haweli mein rehna matlab Thakur ke kareeb rehna aur mauka milte hi ....

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:14

खूनी हवेली की वासना पार्ट --24

गतान्क से आगे........................

बिंदिया पोलीस स्टेशन में ख़ान के सामने बैठी थी.

"चाई लॉगी?" ख़ान ने पुछा तो बिंदिया ने इनकार में सर हिला दिया

ख़ान उसके सामने बैठ गया और एक पेन निकालकर अपनी डाइयरी खोली.

"हाँ तो अब बताना शुरू करो" उसने बिंदिया से कहाँ

"मैने कुच्छ नही किया साहब" बिंदिया ने फ़ौरन कहा

"तो मैने कब कहा के तुमने किया है?" ख़ान ने जवाब दिया "मैं तो सिर्फ़ तुमसे ये पुच्छ रहा हूँ के खून की रात तुम कहाँ थी और तुमने क्या देखा?"

"मैं किचन में थी साहब" बिंदिया ने कहा "उधर की काम कर रही थी, आप चाहें तो मेरी बेटी से पुच्छ लें, वो उधर ही थी मेरे साथ"

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान ने अपनी डाइयरी की तरफ देखा. वहाँ उसने पहले से ही यही लिखा हुआ था के बिंदिया खून के वक़्त अपनी बेटी के साथ थी.

"और बाकी सब लोग कहाँ थे उस वक़्त?" उसने बिंदिया से पुछा

"अभी मैं क्या बताऊं साहब" बिंदिया आँखें घूमाते हुए बोली "मैं तो शाम से ही किचन में खाने का इंटेज़ाम कर रही थी"

"

सोचके बताओ" ख़ान ने कहा

"ह्म्‍म्म्म .... चंदर बाहर दरवाज़े पर था, पायल मेरे साथ थी, भूषण बाहर कार लेने को गया था और मालकिन दरवाज़े के पास बैठी थी हमेशा की तरह. बाकी का पता नही"

"किसी को आते जाते देखा तुमने ठाकुर साहब के कमरे में?" ख़ान ने सवाल किया

"मैने तो देखा नही पर पायल बोली थी के छ्होटे मालिक गये थे बड़े मालिक के कमरे में"

"छ्होटे मालिक?" ख़ान ने सवालिया नज़र से देखा

"तेज बाबू" बिंदिया ने जवाब दिया

"फिर?"

"फिर कुच्छ ज़ोर ज़ोर से बोलने की आवाज़ आई. असल में उसी आवाज़ को सुनकर मैने पायल से पुछा था के क्या हुआ तो वो बोली के तेज बाबू गये थे बड़े मालिक के कमरे में"

"चिल्लाने की आवज़ किसकी थी?" ख़ान ने पुचछा

"बड़े मालिक और तेज बाबू दोनो की ही थी. कुच्छ कहा सुनी हो गयी थी शायद"

"किस बारे में बात कर रहे थे वो?" ख़ान ने डाइयरी में सारी बातें लिखते हुए सवाल किया

"ये तो समझ नही आया साहब" बिंदिया ने जवाब दिया पर ख़ान फ़ौरन समझ गया के वो झूठ बोल रही थी.

"खैर" उसने पेन नीचे रखा "कुच्छ हवेली में रहने वालो के बारे में बताओ"

ख़ान खुद जानता था के बिंदिया कुच्छ नही बताएगी. अभी थोड़ी देर पहले ही उसने सॉफ झूठ बोल दिया था के वो नही जानती तेज और ठाकुर किस बात को लेकर लड़ रहे थे.

"अभी मैं क्या बताऊं साहब" बिंदिया ने ख़ान की उम्मीद के मुताबिक ही जवाब दिया "मैं तो बस एक नौकरानी हूँ. बड़े लोगों की बातें मैं क्या जानूँगी भला"

"तो चलो मैं ही पुछ्ता हूँ" ख़ान ने फिर डाइयरी में लिखना शुरू किया "रूपाली के बारे में क्या जानती हो. सच बताना"

"मेमसाहिब बहुत अच्छी औरत हैं. सबका बहुत ध्यान रखती हैं. मेरे को अपने पुराने कपड़े देती हैं पहेन्ने को"

"मैं ये नही पुच्छ रहा. ये बताओ के उनका अपने पति और घर के बाकी लोगों के साथ रिश्ता कैसा था?"

"जैसा होना चाहिए वैसा ही था. सुख शांति से रहती थी" बिंदिया ने फिर गोल मोल जवाब दिया

ख़ान समझ गया के बिंदिया से इस तरह सवाल करके उसको कुच्छ हासिल नही होगा. खेली खाई औरत थी, ऐसे नही टूटेगी.

"काब्से रह रही हो तुम हवेली में?" उसने सवाल किया

"अभी तो बहुत बरस हो गये साहब" बिंदिया ने जवाब दिया "मेरे मरद के मरने के बाद से मैं, पायल और चंदर इधर ही रहने को आ गये थे हवेली में"

"और ऐसा क्यूँ?"

"बड़ी मालकिन को चोट लगने के बाद से उनका ख्याल रखती थी मैं. वो तो बिस्तर से खुद उठ भी नही सकती. रात को पानी वगेरह भी मैं ही उठके देती हूँ"

"तुम उनके कमरे में सोती हो?" ख़ान ने पुछा

"कभी कभी" बिंदिया बोलती रही "जब कभी उनकी तबीयत ज़्यादा खराब हो तब. नही तो मैं अपने ही कमरे में सोती हूँ"

"ठकुराइन और ठाकुर अलग अलग कमरे में क्यूँ सोते हैं?" ख़ान ने सवाल किया

थोड़ी देर के लिए खामोशी च्छा गयी. बिंदिया को समझ नही आ रहा था के वो क्या जवाब दे ये उसके चेहरे से सॉफ ज़ाहिर था.

"अभी उनके लिए एक अलग बिस्तर चाहिए. सोते में हिल डुल नही सकती इसलिए. कभी कभी रात भर दर्द में कराहती हैं जिससे ठाकुर साहब की नींद खराब होती थी इसलिए"

ख़ान को ये बात हाज़ाम नही हुई. अगर बीवी दर्द में कराह रही हो तो किस तरह का पति होगा जो जाकर अलग सो जाएगा, बजाय इसके के अपनी बीवी का ख्याल रखे.

"तुम्हारा अपना रिश्ता कैसा था ठाकुर साहब के साथ?"

ख़ान के सवाल करते ही बिंदिया के चेहरे पर जो भाव बदले उन्हें देखते ही ख़ान समझ गया के इस बार तीर निशाने पर लगा है.

"रिश्ता मतलब?" बिंदिया ने संभालते हुए पुछा

"मतलब तुम्हारी बात चीत कैसी थी ठाकुर साहब के साथ? तुम्हारे साथ उनका रवैयय्या कैसा था?"

"ठीक ही था" बिंदिया बोली "जैसा मालिक नौकर का होता है. कभी मैं ग़लती कर देती थी काम करते हुए तो चिल्ला भी देते थे ठाकुर साहब मुझपर"

थोड़ी देर बाद बिंदिया उठकर पोलीस स्टेशन से चली गयी. ख़ान उससे और भी पुच्छना चाहता था पर वो समझ गया था के बिंदिया आसानी से जवाब देने वाली औरतों में से नही. जिस एक बात का उसको पूरी तरह यकीन था वो ये थी के कुच्छ था बिंदिया और ठाकुर के बीच जिसकी वजह से रिश्ता शब्द सुनते ही वो बौखला गयी थी.

ख़ान जै के सामने बैठा था.

"बहुत दबाव है मेरे उपेर के अब तक चार्ज शीट क्यूँ दाखिल नही की गयी है" वो जै से बोला

"किसी पर शक है आपको?" जै ने पुछा

"सब पर है और किसी पर भी नही" ख़ान ने अपना सर पकड़ते हुए बोला "कहानी हर बार घूम कर फिर एक ही बात पे आ जाती है के हर किसी की गवाही कोई ना कोई दे रहा है. या तो हवेली में मौजूद लोगों को किसी ना किसी ने कहीं ना कहीं देखा है है जिनको नही देखा उनकी गवाही इस बात से मिल जाती है के उनको कमरे में जाते किसी ने भी नही देखा"

थोड़ी देर दोनो चुप बैठे रहे.

"केस शुरू हो गया तो क्या लगता है आपको?" जै ने चुप्पी तोड़ी

"शुरू हो गया तो एक या दो हियरिंग्स में ख़तम हो जाएगा और तुम्हें मौत की सज़ा ही होगी ये मानके चलो" ख़ान ने जवाब दिया

थोड़ी देर के लिए फिर खामोशी च्छा गयी.

"मुझे समझ ये नही आ रहा के शुरू करूँ तो किससे करूँ. तुम्हारे कहने के मुताबिक मैने नौकरों से शुरू किया पर जिससे बात की उसने गोल मोल जवाब ही दिए. ठाकुर खानदान इस सब में इन्वॉल्व्ड है और कई बड़े लोगों का दबाव होने की वजह से मैं ज़ोर ज़बरदस्ती से भी काम नही ले सकता"

"किससे बात की आपने?" जै ने पुचछा

"बिंदिया"

"ह्म्‍म्म्म" जै मुस्कुराते हुए बोला "वो ऐसे कुच्छ नही बोलेगी पर हां खून करने का हौसला और ताक़त दोनो है उसमें, अगर वजह उसके पास हो तो"

ख़ान ने अपनी आँखें सिकोडते हुए जै की तरफ देखा. जै इशारा समझ गया.

"कम ओन ख़ान साहब" जै ने जवाब दिया "गाओं की पली बढ़ी औरत है वो, खेतों में काम करती थी, पति के मरने के 2 बच्चो को पाल पोसकर बड़ा किया, आपको नही लगता के इतना जिगरा होगा उसमें?"

ख़ान ने हामी भरते हुए गर्दन हिलाई.

"और वो ऐसे कोई जवाब नही देगी, बल्कि हवेली का कोई नौकर अगर कुच्छ जानता है तो ऐसे नही बताएगा क्यूंकी उनको अपनी जान का ख़तरा है के अगर पुरुषोत्तम या तेज को ये पता चल गया के उन्होने ठाकुरों के खिलाफ कुच्छ बोला है तो"

"कहना क्या चाह रहे हो?" ख़ान ने पुछा

"यही ख़ान साहब के उन सबकी दुखती रग पे हाथ रखिए. एक ऐसी नस पकडीए जिसके दबाते ही वो गा कर आपको सब बताएँ"

"शाबाश मेरे शेर. अब इतना बता रहे हो तो ये भी बता दो के ऐसी दुखती रग मैं लाऊँ कहाँ से सबके लिए"

जै ख़ान की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा. उस पल वो किसी लोमड़ी की तरह लग रहा था जो हर किसी का कच्चा चिट्ठा जानती हो. ख़ान को समझते एक पल नही लगा.

"तुम जानते हो, ऑफ कोर्स. हवेली में रहे हो, ठाकुर खानदान का हिस्सा हो, तुम्हें तो पता होगा ही"

"सबके बारे में तो नही जानता पर इस बिंदिया के बारे में ऐसा कुच्छ बता सकता हूँ के वो आपके कदमों में गिर जाएगी और जो आप कहोने वो करेगी"

"बोलते रहो"

"ये एक गाओं है ख़ान साहब" जै ने टेबल पर अपने हाथों से तबला बजाते हुए कहा "यहाँ अब भी सबसे बड़ी चीज़ इज़्ज़त होती है, भले खाने के लिए 2 वक़्त की रोटी ना मिले. आप किसी की इज़्ज़त को उच्छालने की धमकी दो, वो वहीं टूट जाएगा"

"सीधे मतलब की बात पे आओ" ख़ान ने जै का हाथ पकड़ कर रोका "और ये तबला बजाना बंद करो"

"चंदू को जानते हैं?" जै ने पुछा

"हां. बिंदिया का बेटा. क्यूँ?"

"सगा बेटा नही है वो उसका" जै बोला

"जानता हूँ"

"तो आपको क्या लगता है के वो उसको अपने साथ क्यूँ रखती है, हर पल, हर जगह"

"इसमें ऐसा क्या है जो नॉर्मल नही है? वो उसको अपना बेटा मानती है"

"ठाकुर साहब के मना करने के बावजूद हवेली लाई थी वो उसको. सुलाती भी रात को अपने ही कमरे में है, किसी छ्होटे बच्चे की तरह"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --24

gataank se aage........................

Bindiya police station mein Khan ke saamne bethi thi.

"Chaai logi?" Khan ne puchha toh Bindiya ne inkaar mein sar hila diya

Khan uske saamne beth gaya aur ek pen nikalkar apni diary kholi.

"Haan toh ab batana shuru karo" Usne Bindiya se kahan

"Maine kuchh nahi kiya sahab" Bindiya ne fauran kaha

"Toh maine kaba kaha ke tumne kiya hai?" Khan ne jawab diya "Main toh sirf tumse ye puchh raha hoon ke khoon ki raat tum kahan thi aur tumne kya dekha?"

"Main kitchen mein thi Sahab" Bindiya ne kaha "Udhar ki kaam kar rahi thi, aap chahen toh meri beti se puchh len, vo udhar hi thi mere saath"

"Hmmmm" Khan ne apni diary ki taraf dekha. Vahan usne pehle se hi yahi likha hua tha ke Bindiya khoon ke waqt apni beti ke saath thi.

"Aur baaki sab log kahan the us waqt?" Usne Bindiya se puchha

"Abhi main kya bataoon sahab" Bindiya aankhen ghumate hue boli "Main toh shaam se hi kitchen mein khaane ka intezaam kar rahi thi"

"

Sochke batao" Khan ne kaha

"Hmmmm .... Chander bahar darwaze par tha, Payal mere saath thi, Bhushan bahar car lene ko gaya tha aur malkin darwaze ke paas bethi thi hamesha ki tarah. Baaki ka pata nahi"

"Kisi ko aate jaate dekha tumne Thakur Sahab ke kamre mein?" Khan ne sawal kiya

"Maine toh dekha nahi par Payal boli thi ke chhote malik gaye the bade malik ke kamre mein"

"chhote malik?" Khan ne sawaliya nazar se dekha

"Tej Babu" Bindiya ne jawab diya

"Phir?"

"Phir kuchh zor zor se bolne ki aawaz aayi. Asal mein usi aawaz ko sunkar maine Payal se puchha tha ke kya hua toh vo boli ke Tej Babu gaye the bade maalik ke kamre mein"

"Chillane ki aawz kiski thi?" Khan ne puchha

"Bade maalik aur Tej Babu dono ki hi thi. Kuchh kaha suni ho gayi thi shayad"

"Kis baare mein baat kar rahe the vo?" Khan ne diary mein saari baaten likhte hue sawal kiya

"Ye toh samajh nahi aaya Sahab" Bindiya ne jawab diya par Khan fauran samajh gaya ke vo jhooth bol rahi thi.

"Khair" Usne pen neeche rakha "Kuchh Haweli mein rehne walo ke baare mein batao"

Khan khud janta tha ke Bindiya kuchh nahi batayegi. Abhi thodi der pehle hi usne saaf jhooth bol diya tha ke vo nahi janti Tej aur Thakur kis baat ko lekar lad rahe the.

"Abhi main kya bataoon Sahab" Bindiya ne Khan ki ummeed ke mutaabik hi jawab diya "Main toh bas ek naukrani hoon. Bade logon ki baaten main kya jaanungi bhala"

"Toh chalo main hi puchhta hoon" Khan ne phir diary mein likhna shuru kiya "Rupali ke baare mein kya janti ho. Sach batana"

"Memsahib bahut achhi aurat hain. Sabka bahut dhyaan rakhti hain. Mere ko apne purane kapde deti hain pehenne ko"

"Main ye nahi puchh raha. Ye batao ke unka apne pati aur ghar ke baaki logon ke saath rishta kaisa tha?"

"Jaisa hona chahiye vaisa hi tha. Sukh shanti se rehti thi" Bindiya ne phir gol mol jawab diya

Khan samajh gaya ke Bindiya se is tarah sawal karke usko kuchh haasil nahi hoga. Kheli khaayi aurat thi, aise nahi tootegi.

"Kabse reh rahi ho tum haweli mein?" Usne sawal kiya

"Abhi toh bahut baras ho gaye sahab" Bindiya ne jawab diya "Mere marad ke marne ke baad se main, payal aur Chander idhar hi rehne ko aa gaye the haweli mein"

"Aur aisa kyun?"

"Badi malkin ko chot lagne ke baad se unka khyaal rakhti thi main. Vo toh bistar se khud uth bhi nahi sakti. Raat ko pani vagerah bhi main hi uthke deti hoon"

"Tum unke kamre mein soti ho?" Khan ne puchha

"Kabhi kabhi" Bindiya bolti rahi "Jab kabhi unki tabiat zyada kharab ho tab. Nahi toh main apne hi kamre mein soti hoon"

"Thakurain aur Thakur alag alag kamre mein kyun sote hain?" Khan ne sawal kiya

Thodi der ke liye khamoshi chha gayi. Bindiya ko samajh nahi aa raha tha ke vo kya jawab de ye uske chehre se saaf zaahir tha.

"Abhi unke liye ek alag bistar chahiye. Sote mein hil dul nahi sakti isliye. Kabhi kabhi raat bhar dard mein karahti hain jisse Thakur sahab ki neend kharab hoti thi isliye"

Khan ko ye baat hazam nahi hui. Agar biwi dard mein karah rahi ho toh kis tarah ka pati hoga jo jakar alag so jayega, bajaay iske ke apni biwi ka khyaal rakhe.

"Tumhara apna rishta kaisa tha Thakur Sahab ke saath?"

Khan ke sawal karte hi Bindiya ke chehre par jo bhaav badle unhen dekhte hi Khan samajh gaya ke is baar teer nishane par laga hai.

"Rishta matlab?" Bindiya ne sambhalte hue puchha

"Matalab tumhari baat cheet kaisi thi Thakur Sahab ke saath? Tumhare saath unka ravaiyya kaisa tha?"

"Theek hi tha" Bindiya boli "Jaisa Maalik naukar ka hota hai. Kabhi main galti kar deti thi kaam karte hue toh chilla bhi dete the Thakur Sahab mujhpar"

Thodi der baad Bindiya uthkar police station se chali gayi. Khan usse aur bhi puchhna chahta tha par vo samajh gaya tha ke Bindiya aasani se jawab dene wali auraton mein se nahi. Jis ek baat ka usko poori tarah yakeen tha vo ye thi ke kuchh tha Bindiya aur Thakur ke beech jiski vajah se Rishta shabd sunte hi vo baukhla gayi thi.

Khan Jai ke saamne betha tha.

"Bahut dabaav hai mere uper ke ab tak charge sheet kyun daakhil nahi ki gayi hai" Vo Jai se bola

"Kisi par shak hai aapko?" Jai ne puchha

"Sab par hai aur kisi par bhi nahi" Khan ne apna sar pakadte hue bola "Kahani har baar ghum kar phir ek hi baat pe aa jaati hai ke har kisi ki gawahi koi na koi de raha hai. Ya toh haweli mein maujood logon ko kisi na kisi ne kahin na kahin dekha hai hai jinko nahi dekha unki gawahi is baat se mil jaati hai ke unko kamre mein jaate kisi ne bhi nahi dekha"

Thodi der dono chup bethe rahe.

"Case shuru ho gaya toh kya lagta hai aapko?" Jai ne chuppi todi

"Shuru ho gaya toh ek ya do hearings mein khatam ho jayega aur tumhein maut ki saza hi hogi ye maanke chalo" Khan ne jawab diya

Thodi der ke liye phir khamishi chha gayi.

"Mujhe samajh ye nahi aa raha ke shuru karun toh kisse karun. Tumhare kehne ke mutaabik maine naukron se shuru kiya par jisse baat ki usne gol mol jawab hi diye. Thakur khandaan is sab mein involved hai aur kai bade logon ka dabaav hone ki vajah se main zor zabardasti se bhi kaam nahi le sakta"

"Kisse baat ki aapne?" Jai ne puchha

"Bindiya"

"Hmmmm" Jai muskurate hue bola "Vo aise kuchh nahi bolegi par haan khoon karne ka hausla aur taaqat dono hai usmein, agar vajah uske paas ho to"

Khan ne apni aankhen sikodte hue Jai ki taraf dekha. Jai ishara samajh gaya.

"Come on Khan Sahab" Jai ne jawab diya "Gaon ki pali badhi aurat hai vo, kheton mein kaam karti thi, pati ke marne ke 2 bachcho ko paal poskar bada kiya, aapko nahi lagta ke itna jigra hoga usmein?"

Khan ne haami bharte hue gardan hilayi.

"Aur vo aise koi jawab nahi degi, balki haweli ka koi naukar agar kuchh janta hai toh aise nahi batayega kyunki unko apni jaan ka khatra hai ke agar Purushotta ya Tej ko ye pata chal gaya ke unhone thakuron ke khilaf kuchh bola hai to"

"Kehna kya chah rahe ho?" Khan ne puchha

"Yahi Khan Sahab ke un sabki dukhti rag pe haath rakhiye. Ek aisi nas pakadiye jiske dabate hi vo ga kar aapko sab batayen"

"Shabash mere sher. Ab itna bata rahe ho toh ye bhi bata do ke aisi dukhti rag main laaoon kahan se sabke liye"

Jai Khan ki taraf dekhkar muskurane laga. Us pal vo kisi lomdi ki tarah lag raha tha jo har kisi ka kachcha chittha jaanti ho. Khan ko samajhte ek pal nahi laga.

"Tum jaante ho, of course. Haweli mein rahe ho, Thakur Khandaan ka hissa ho, tumhein toh pata hoga hi"

"Sabke baare mein toh nahi jaanta par is Bindiya ke baare mein aisa kuchh bata sakta hoon ke vo aapke kadmon mein gir jayegi aur jo aap kahone vo karegi"

"Bolte raho"

"Ye ek gaon hai Khan Sahab" Jai ne table par apne haathon se tabla bajate hue kaha "Yahan ab bhi sabse badi cheez izzat hoti hai, bhale khane ke liye 2 waqt ki roti na mile. Aap kisi ki izzat ko uchhalne ki dhamki do, vo vahin toot jayega"

"Sidhe matlab ki baat pe aao" Khan ne Jai ka haath pakad kar roka "Aur ye Tabla bajana band karo"

"Chandu ko jaante hain?" Jai ne puchha

"Haan. Bindiya ka beta. Kyun?"

"Saga beta nahi hai vo uska" Jai bola

"Jaanta hoon"

"Toh aapko kya lagta hai ke vo usko apne saath kyun rakhti hai, har pal, har jagah"

"Ismein aisa kya hai jo normal nahi hai? vo usko apna beta maanti hai"

"Thakur sahab ke mana karne ke bavajood haweli laayi thi vo usko. Sulati bhi raat ko apne hi kamre mein hai, kisi chhote bachche ki tarah"

kramashah........................................