खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:20

खूनी हवेली की वासना पार्ट --31

गतान्क से आगे........................

बिंदिया को उसकी बात सुनकर हैरत हुई. उसके चेहरे के भाव से पता चल रहा था के उसको पूरा यकीन था के ख़ान उसे चोदना चाहता है.

"बैठ जाओ" ख़ान ने दोबारा कहा तो हैरानी में बिंदिया फिर कुर्सी पर बैठ गयी.

"अपना पल्लू ठीक करो" बिंदिया के अब तक नीचे गिरे पल्लू की तरफ देखते हुए ख़ान ने इशारा किया. बिंदिया ने पल्लू उठाकर फिर अपने कंधे पर रख लिया.

"जैसा तुम सोच रही हो वैसा कुच्छ नही है" ख़ान बोला "मैं तुम पर ज़ोर इसलिए नही डाल रहा था के मैं तुम्हारे साथ सोना चाहता हूँ. मैं सिर्फ़ अपना काम कर रहा हूँ. सिर्फ़ अपनी तसल्ली कर लेना चाहता हूँ के ठाकुर साहब का खून जै ने ही किया है"

बिंदिया अब तक संभाल चुकी थी. उसने अब अपना पल्लू अच्छे से ठीक करके अपनी छातियो को पूरी तरह ढक लिया था.

"और आपको ऐसा क्यूँ लगता है के मैं कुच्छ जानती हूँ जो आपको बता नही रही" वो नज़र नीची किए बोली

"नही जानता" ख़ान ने जवाब दिया "पर एक हल्का सा शक है"

"ठीक है" बिंदिया ने उससे नज़र मिलाई "कहिए क्या जानना चाहते हैं"

ख़ान ने डाइयरी में लिखना शुरू किया.

"पहले तो तुम ये जान लो के तुम यहाँ जो कहोगी उसमें तुम्हारा नाम कहीं नही आएगा. मैं ये अच्छी तरह से समझता हूँ के तुम सिर्फ़ एक नौकरानी हो और अगर ठाकुरों को पता चला के तुमने उनके खिलाफ कुच्छ कहा है तो तुम्हें मरने में घंटे से ज़्यादा नही लगेगा. इसलिए इस बात की दुहाई देने की ज़रूरत तुम्हें नही है. मैं खुद इस बात की तसल्ली देता हूँ के तुम्हारा नाम कहीं नही आएगा.

"और आपको ये क्यूँ लगता है के मैं खुद भी ठाकुरों के खिलाफ जाना चाहूँगी?"

"क्यूंकी अगर तुम नही गयी तो मैं तुम्हारी इज़्ज़त पूरे गाओं में उच्छाल दूँगा" ख़ान का अब तक का नाराज़ लहज़ा सख़्त हो चला.

थोड़ी देर तक दोनो खामोश रहे.

"तो शुरू करते हैं" ख़ान ने कहा "ठाकुर से तुम्हारा क्या रिश्ता था?"

"मालिक और नौकर का" बिंदिया ने जवाब दिया

ख़ान एक पल के लिए रुका और अपना सवाल फिर दोहराया.

"ठाकुर से तुम्हारा क्या रिश्ता था?"

"कहा तो" बिंदिया हैरत से बोली "मालिक और नौकर का"

फिर एक पल के लिए खामोशी.

"ठाकुर से तुम्हारा क्या रिश्ता था?" ख़ान ने फिर वही बात पुछि.

"मालिक और नौकर का" इस बार बिंदिया झुंझला पड़ी

ख़ान के चेहरे के भाव ज़रा भी नही बदले.

"ठाकुर से तुम्हारा क्या रिश्ता था?"

"ठीक है ठीक है" बिंदिया बोली "सोई थी मैं उनके साथ. उनकी बीवी किसी काम की नही थी. जब उन्होने इशारा किया तो मैने पहले तो मना किया पर फिर बाद में उनके दबाव डालने पर मैने हां कर दी"

थोड़ी देर के लिए फिर खामोशी च्छा गयी. ख़ान को जैसे अपने दोनो सवालों का जवाब मिल गया था.

अब पता था के मरने से पहले ठाकुर किसके साथ सोया था.

और अब समझ आ गया था के क्यूँ ठाकुर अपनी जायदाद का कुच्छ हिस्सा बिंदिया की बेटी के नाम कर गया था.

.........................

ठाकुर बिंदिया के साथ उसकी पुरानी झोपड़ी में दाखिल हुए. यही वो झोपड़ी थी जहाँ बिंदिया पहले अपनी पति के साथ और उसके बाद पायल और चंदू के साथ रहती थी.

जो कभी उसका घर हुआ करता था आज एक पुरानी उजाड़ पड़ी झोपड़ी थी. अंधार आकर ठाकुर ने झोपड़ी का पूरा दरवाज़ा बंद किया और बिंदिया की तरफ देखा. वो इशारा समझ गयी और अपनी सलवार उतारने लगी.

ये हर आए दिन होता था. जिस दिन ठाकुर मूड में होते, वो बिंदिया को इशारा कर देते. उसके बाद बिंदिया हवेली से कुच्छ समान खरीदने के बहाने निकलती, फिर एक सुनसान जगह से ठाकुर उसको अपनी गाड़ी में बैठाते, और फिर दोनो यहाँ आकर अपनी जिस्म की गर्मी निकलते.

दोपहर के वक़्त खेतों पर काम करने वेल सारे नौकर अपने घर खाने के लिए चले जाते थे और इसी वक़्त ठाकुर बिंदिया के साथ सबकी नज़र बचाकर उसको यहाँ ले आते.

दिन के वक़्त यहाँ किसी के देख लेने का ख़तरा हमेशा बना रहता था इसलिए दोनो उतने ही कपड़े उतारते जीतने के ज़रूरी थे. उस दिन भी बिंदिया ने अपनी सलवार उतारी और अपने साथ लाई एक चादर नीचे बिच्छा दी. ठाकुर पाजामा उतारकर चादर पर नीचे लेट गये.

बिंदिया आकर ठाकुर के बगल में बैठ गयी. अपने बाल उसने सिर के पिछे जूड़ा बनाकर बाँधे और ठाकुर के कुर्ते का पल्लू उठाकर उपेर किया.

लंड पूरी तरह खड़ा जैसे बिंदिया के सम्मान में सलामी दे रहा था.

उसने धीरे से लंड को अपने हाथ में पकड़ा और उपेर से नीचे तक सहलानी लगी. ठाकुर चुप चाप आँखें बंद किए लेटे थे. ज़्यादातर वक़्त ऐसा ही होता था के वो आराम से लेट जाते थे और सारा काम बिंदिया को करने देते थे. बिंदिया को ये पसंद भी था. वो उन औरतों में से थी जो बिस्तर पर चीज़ें मर्द के बजाय खुद अपने काबू में रखना चाहती हैं, सब खुद करना चाहती है और ठाकुर उसको इस बात का पूरा पूरा मौका देते थे.

थोड़ी देर लंड को यूँ ही सहलाने के बाद बिंदिया नीचे को झुकी, अपना मुँह खोला और लंड पूरा अपने हलक तक अंदर ले लिया.

"आआहह" ठाकुर के मुँह से आह निकली.

बिंदिया ने गीला लंड अपने मुँह से निकाला, हाथ एक बार उपेर से नीचे तक लंड पर रगड़ा और फिर अपने मुँह में लेकर चूसने लगी.

"जैसा तू चूस्ति है ना बिंदिया, कसम से आज तक किसी ने नही चूसा" ठाकुर ने उसके बाल पकड़ते हुए कहा.

और जो बिंदिया जो शुरू हुई तो रुकी नही. उसका सिर्फ़ लगातार उपेर नीचे होता रहा और हाथ नीचे से कभी लंड को रगड़ता तो कभी ठाकुर के टट्टों को सहलाता. कभी वो लंड को अपने हालत तक अंदर लेके चूस्ति तो कभी जीभ निकालकर चाटने लगती.

"बस बस" भारी होती साँसों के बीच ठाकुर ने कहा "आअज़ा अब"

बिंदिया ने अपने खुल चुके बालों को एक बार फिर सर के पिछे बँधा और अपनी कमीज़ का पल्लू उठाकर ठाकुर के उपेर आकर बैठ गयी. खड़ा लंड सीधा चूत पर आ लगा पर अंदर घुसने की बजाय फिसलकर साइड हो गया.

बिंदिया ने हाथ नीचे घुसाया, लंड को पकड़कर अपनी चूत पर फिर रखा और धीरे से नीचे बैठ गयी.

"आआहह बिंदिया. पक्की रांड़ है तू" ठाकुर ने कमीज़ के उपेर से ही उसकी चूचियाँ पकड़ ली.

"बोलते रहिए मालिक" बिंदिया ने कहा. जब ठाकुर उसको इस तरह बिस्तर पर गालियाँ देते तो उसे बहुत मज़ा आता था.

"रंडी है तू ... साली छिनाल ... जाने कितने लंड खा चुकी है आज तक पर चूत आज भी 16 साल की लड़की जैसी टाइट है ......."

और फिर उस झोपड़ी में गालियों और वासना का एक तूफान सा उठ गया. बिंदिया ने अपने दोनो हाथ ठाकुर के सर के पास नीचे रखे और झुक कर लंड चूत में अंदर बाहर करने लगी.

ठाकुर का एक हाथ उसकी चूचियाँ दबा रहा था जबकि दूसरा धीरे से नीचे उसकी गांद पर गया और ठाकुर की एक अंगुली उसकी गांद के अंदर घुस गयी.

बिंदिया उपेर नीचे होती रही, ठाकुर की अंगुली उसकी गांद में अंदर बाहर होती रही.

"रांड़ साली बेहेन्चोद, च्चिनाल, बस इतना ही दम है तेरी चूत में ... पूरा अंदर ले ... हां ऐसे ही ....."

अगले 15 मिनट तक ठाकुर की ऐसी आवाज़ों से झोपड़ी गूँज सी उठी

ख़ान बैठा हुआ बिंदिया की तरफ ऐसे देख रहा था जैसे उसने किसी बिल्ली को छीके से दूध चुराते पकड़ लिया हो.

"कबकि बात है ये?" उसने बिंदिया से पुछा

"मालिक के मरने से एक दिन पहले की" बिंदिया बोली

"क्या ये रोज़ का खेल था क्या?"

"ठाकुर साहब की मर्ज़ी पर था. कभी कभी तो कयि दिन तक रोज़ ही होता था और कभी कभी हफ़्तो कुच्छ नही" बिंदिया नज़र झुकाए बैठी थी.

"तो उनके मरने वाले दिन फिर से सोई थी तुम उनके साथ?"

बिंदिया ने इनकार में गर्दन हिलाई.

"मतलब ये आखरी बार था?"

बिंदिया ने हां में सर हिलाया.

"ह्म्‍म्म्मम" ख़ान ने कुच्छ परेशान सा होते हुए कहा.

"और कुच्छ जानती हो ऐसा जो मुझे बता सको?" ख़ान बोला

"कसम भगवान की साहब" बिंदिया अपने सर पर हाथ रख कर बोली "बस यही एक बात थी जो मैं आपसे छुपा रही थी और मैं क्या, कोई भी होती तो छुपाती. और कोई बात नही है"

उसके बाद ख़ान कुच्छ देर और बिंदिया से इधर उधर के सवाल पुछ्ता रहा पर कुच्छ ऐसा हाथ नही लगा जिससे मदद मिलती.

"ठीक है तुम जाओ" उसने आख़िर अपनी डाइयरी बंद करते हुए कहा

"आप किसी से ये बात कहेंगे तो नही ना?" बिंदिया ने भारी आँखों से ख़ान को देखते हुए कहा.

ख़ान ने नही में सर हिलाया.

"वादा?" बिंदिया ने पुछा

"पठान की ज़ुबान" ख़ान मुस्कुराते हुए बोला.

बिंदिया उठकर खड़ी हुई. बहते हुए उसने अपना पल्लू ऐसे ही कंधे पर रखा हुआ था जो उसके उठते ही फिसल कर नीचे गिर पड़ा.

ट्रॅन्स्परेंट ब्लाउस में उसकी खड़ी चूचियाँ एक बार फिर ख़ान की नज़रों के सामने आ गयी. उसने 2 पल के लिए बिंदिया की चूचियो की तरफ घूरा और जब बिंदिया ने अपना पल्लू सीधा कर लिया तो दोनो की नज़रें मिली.

बिंदिया को देख कर जाने क्यूँ ख़ान को ऐसा लगा के वो जान भुजकर फिर उसको अपनी चूचियाँ दिखा रही थी. उसका दिल किया के उठकर बिंदिया को वहीं झुका ले पर फिर अपने उपेर काबू कर लिया.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --31

gataank se aage........................

Bindiya ko uski baat sunkar hairat hui. Uske chehre ke bhaav se pata chal raha tha ke usko poora yakeen tha ke Khan use chodna chahta hai.

"Beth jao" Khan ne dobara kaha toh hairani mein Bindiya phir kursi par beth gayi.

"Apna pallu theek karo" Bindiya ke ab tak neeche gire pallu ki taraf dekhte hue Khan ne ishara kiya. Bindiya ne pallu uthakar phir apne kandhe par rakh liya.

"Jaisa tum soch rahi ho vaisa kuchh nahi hai" Khan bola "Main tum par zor isliye nahi daal raha tha ke main tumhare saath sona chahta hoon. Main sirf apna kaam kar raha hoon. Sirf apni tasalli kar lena chahta hoon ke Thakur Sahab ka khoon Jai ne hi kiya hai"

Bindiya ab tak sambhal chuki thi. Usne ab apna pallu achhe se theek karke apni chhatiyon ko poori tarah dhak liya tha.

"Aur aapko aisa kyun lagta hai ke main kuchh janti hoon jo aapko bata nahi rahi" Vo nazar neechi kiye boli

"Nahi janta" Khan ne jawab diya "Par ek halka sa shak hai"

"Theek hai" Bindiya ne usse nazar milayi "Kahiye kya jaanna chahte hain"

Khan ne diary mein likhna shuru kiya.

"Pehle toh tum ye jaan lo ke tum yahan jo kahogi usmein tumhara naam kahin nahi aayega. Main ye achhi tarah se samajhta hoon ke tum sirf ek naukrani ho aur agar thakuron ko pata chala ke tumne unke khilaff kuchh kaha hai toh tumhein marne mein ghante se zyada nahi lagega. Isliye is baat ki duhaai dene ki zaroorat tumhein nahi hai. Main khud is baat ki tasalli deta hoon ke tumhara naam kahin nahi aayega.

"Aur aapko ye kyun lagta hai ke main khud bhi Thakuron ke khilaff jana chahungi?"

"Kyunki agar tum nahi gayi toh main tumhari izzat poore gaon mein uchhal doonga" Khan ka ab tak ka naraz lehza sakht ho chala.

Thodi der tak dono khamosh rahe.

"Toh shuru karte hain" Khan ne kaha "Thakur se tumhara kya rishta tha?"

"Maalik aur naukar ka" Bindiya ne jawab diya

Khan ek pal ke liye ruka aur apna sawal phir dohraya.

"Thakur se tumhara kya rishta tha?"

"Kaha toh" Bindiya hairat se boli "Maalik aur naukar ka"

Phir ek pal ke liye khamoshi.

"Thakur se tumhara kya rishta tha?" Khan ne phir vahi baat puchhi.

"Maalik aur naukar ka" Is baar Bindiya jhunjhla padi

Khan ke chehre ke bhaav zara bhi nahi badle.

"Thakur se tumhara kya rishta tha?"

"Theek hai theek hai" Bindiya boli "Soyi thi main unke saath. Unki biwi kisi kaam ki nahi thi. Jab unhone ishara kiya toh maine pehle toh mana kiya par phir baad mein unke dabaav daalne par main haan kar di"

Thodi der ke liye phir khamoshi chha gayi. Khan ko jaise apne dono sawalon ka jawab mil gaya tha.

Ab pata tha ke marne se pehle Thakur kiske saath soya tha.

Aur ab samajh aa gaya tha ke kyun Thakur apni jaaydad ka kuchh hissa Bindiya ki beti ke naam kar gaya tha.

Thakur Bindiya ke saath uski purani jhopdi mein daakhil hue. Yahi vo jhopdi thi jahan Bindiya pehle apni pati ke saath aur uske baad Payal aur Chandu ke saath rehti thi.

Jo kabhi uska ghar hua karta tha aaj ek purani ujaad padi jhopdi thi. Andhar aakar Thakur ne jhopdi ka poora darwaza band kiya aur Bindiya ki taraf dekha. Vo ishara samajh gayi aur apni salwar utarne lagi.

Ye har aaye din hota tha. Jis din Thakur mood mein hote, vo Bindiya ko ishara kar dete. Uske baad Bindiya Haweli se kuchh samajh kharidne ke bahane nikalti, phir ek sunsan jagah se Thakur usko apni gaadi mein bithate, aur phir dono yahan aakar apni jism ki garmi nikalte.

Dopahar ke waqt kheton par kaam karne wale saare naukar apne ghar khaane ke liye chale jaate the aur isi waqt Thakur Bindia ke saath sabki nazar bachakar usko yahan le aate.

Din ke waqt yahan kisi ke dekh lene ka khatra hamesha bana rehta tha isliye dono utne hi kape utarte jitne ke zaroori the. Us din bhi Bindiya ne apni salwar utari aur apne saath laayi ek chadar neeche bichha di. Thakur pajama utarkar chadar par niche let gayi.

Bindiya aakar thakur ke bagal mein bethi gayi. Apni baal usne sir ke pichhe jooda banakar baandhe aur thakur ke kurte ka pallu uthakar uper kiya.

Lund poori tarah khada jaise Bindiya ke samman mein salami de raha tha.

Usne dheere se lund ko apne haath mein pakda aur uper se neeche tak sehlani lagi. Thakur chup chap aankhen band kiye lete the. Zyadatar waqt aisa hi hota tha ke vo aaram se let jaate the aur sara kaam Bindiya ko karne dete the. Bindiya ko ye pasand bhi tha. Vo un auraton mein se thi jo bistar par cheezen mard ke bajaay khud apne kaabu mein rakhna chahti hain, sab khud karna chahti hai aur Thakur usko is baat ka poora poora mauka dete the.

Thoda der lund ko yun hi sehlane ke baad Bindiya neeche ko jhuki, apna munh khola aur lund poora apne halak tak andar le liya.

"Aaaahhhhh" Thakur ke munh se aah nikli.

Bindiya ne geela lund apne munh se nikala, haath ek baar uper se neeche tak lund par ragda aur phir apne munh mein lekar choosne lagi.

"Jaisa tu choosti hai na Bindiya, kasam se aaj tak kisi ne nahi choosa" Thakur ne uske baal pakadte hue kaha.

Aur jo Bindiya jo shuru hui toh ruki nahi. Uska sirf lagatar uper neeche hota raha aur haath neeche se kabhi lund ko ragadta toh kabhi Thakur ke tatton ko sehlata. Kbahi vo lund ko apne halat tak andar leke choosti toh kabhi jeebh nikalkar chaatne lagti.

"Bas bas" Bhaari hoti saanson ke beech thakur ne kaha "Aaaja ab"

Bindiya ne apne khul chuke baalon ko ek baar phir sar ke pichhe bandha aur apni kameez ka pallu uthakar Thakur ke uper aakar beth gayi. Khada lund sidha choot par aa laga par andar ghusne ki bajaay phisalkar side ho gaya.

Bindiya ne haath niche ghusaya, lund ko pakadkar apni choot par phir rakha aur dheere se niche beth gayi.

"Aaaahhhhh Bindiya. Pakki raand hai tu" Thakur ne kameez ke uper se hi uski chhatiyan pakad li.

"Bolte rahiye maalik" Bindiya ne kaha. Jab thakur usko is tarah bistar par gaaliyan dete toh use bahut maza aata tha.

"Randi hai tu ... saali chhinal ... jaane kitne lund kha chuki hai aaj tak par choot aaj bhi 16 saal ki ladki jaisi tight hai ......."

Aur phir us jhopdi mein gaaliyon aur wasna ka ek toofan sa uth gaya. Bindiya ne apne dono haath thakur ke sar ke paas niche rakhe aur jhuk kar lund choot mein andar bahar karne lagi.

Thakur ka ek haath uski chhatiyan daba raha tha jabki doosra dheere se niche uski gaand par gaya aur thakur ki ek anguli uski gaand ke andar ghus gayi.

Bindiya uper niche hoti rahi, thakur ki anguli uski gaand mein andar bahar hoti rahi.

"Raand saali behenchod, chhinal, bas itna hi dam hai teri choot mein ... poora andar le ... haan aise hi ....."

Agle 15 min tak Thakur ki aisi aawazon se jhopdi goonj si uthi

Khan betha hua Bindiya ki taraf aise dekh raha tha jaise usne kisi billi ko chhinke se doodh churate pakad liya ho.

"Kabki baat hai ye?" Usne Bindiya se puchha

"Maalik ke marne se ek din pehle ki" Bindiya boli

"Kya ye roz ka khel tha kya?"

"Thakur sahab ki marzi par tha. Kabhi kabhi toh kayi din tak roz hi hota tha aur kabhi kabhi hafto kuchh nahi" Bindiya nazar jhukaye bethi thi.

"Toh unke marne wale din phir se soyi thi tum unke saath?"

Bindiya ne inkaar mein gardan hilayi.

"Matlab ye aakhri baar tha?"

Bindiya ne haan mein sar hilaya.

"Hmmmmm" Khan ne kuchh paresha sa hote hue kaha.

"Aur kuchh jaanti ho aisa jo mujhe bata sako?" Khan bola

"Kasam bhagwan ki sahab" Bindiya apne sar par haath rakh kar boli "Bas yahi ek baat thi jo main aapse chhupa rahi thi aur main kya, koi bhi hoti toh chhupati. Aur koi baat nahi hai"

Uske baad Khan kuchh der aur Bindiya se idhar udhar ke sawal puchhta raha par kuchh aisa haath nahi laga jisse madad milti.

"Theek hai tum jao" Usne aakhir apni diary band karte hue kaha

"Aap kisi se ye baat kahenge toh nahi na?" Bindiya ne aankhon bhari aankhon se Khan ko dekhte hue kaha.

Khan ne nahi mein sar hilaya.

"Wada?" Bindiya ne puchha

"Pathan ki zubaan" Khan muskurate hue bola.

Bindiya uthkar khadi hui. Behte hue usne apna pallu aise hi kandhe par rakha hua tha jo uske uthte hi phisal kar niche gir pada.

Transparent blouse mein uski khadi chhatiyan ek baar phir Khan ki nazron ke saamne aa gayi. Usne 2 pal ke liye Bindiya ki chhatiyon ki taraf ghoora aur jab Bindiya ne apna pallu sidha kar liya toh dono ki nazren mili.

Bindiya ko dekh kar jaane kyun Khan ko aisa laga ke vo jaan bhujhkar phir usko apni chhatiyan dikha rahi thi. Uska dil kiya ke uthkar Bindiya ko vahin jhuka le par phir apne uper kaabu kar liya.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:20

खूनी हवेली की वासना पार्ट --32

गतान्क से आगे........................

बिंदिया एक पल के लिए खड़ी रही, जैसे ख़ान से किसी हरकत की उम्मीद कर रही हो पर जब कुच्छ ना हुआ तो दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गयी.

"हेलो डॉक्टर. साहब" थोड़ी देर बाद ख़ान ने डॉक्टर. अस्थाना का नंबर मिलाया.

"कहिए ख़ान साहब" अस्थाना की आवाज़ आई "कैसे याद किया?"

"एक सवाल था दिमाग़ में" ख़ान बोला "आपके हिसाब से ठाकुर के जिस्म पर जो औरत के निशान आपको मिले थे वो कितने पुराने हो सकते हैं?"

"ये बताना तो ऑलमोस्ट इंपॉसिबल है" अस्थाना बोला

"और ऐसे निशान कितने दिन तक पुराने हो सकते हैं?"

"अगर ये मान लिया जाए के ठाकुर साहब हफ़्तो तक नही नहाते थे तो हफ़्ता भर पुराने भी हो सकते हैं"

"और अगर नहाए हों तो" ख़ान ने पुछा

"अगर नहाए हों तो शरीर से धुल जाने चाहिए पर एक बार नहाने के बाद बच भी सकते हैं"

"ह्म्‍म्म" ख़ान सोचते हुए बोला "थॅंक्स डॉक्टर."

डॉक्टर से बात के बाद उसने फोन रखा ही था के उसका मोबाइल फिर बज उठा. कॉल अननोन नंबर से थी.

"हेलो" ख़ान ने कॉल रिसीव की.

"हाई" दूसरी तरफ से एक लड़की की आवाज़ आई जिसे ख़ान फ़ौरन पहचान गया.

किरण, किरण .... कम्बख़्त किरण ... उसने दिल ही दिल में सोचा.

"फोन मत रखना प्लीज़" ख़ान फोन रखने ही लगा था के दूसरी तरफ से किरण ने कहा "बात करनी है कुच्छ तुमसे"

ख़ान फोन पकड़े चुप खड़ा रहा.

"थॅंक्स" किरण बोली

"कहो" ख़ान ठंडी आवाज़ में बोला

"काम था कुच्छ" किरण ने कहा

" अच्छी तरह जानता हूँ के क्या काम है तुम्हें" ख़ान मज़ाक सा उड़ाता हुआ बोला "तुम एक जर्नलिस्ट हो और मैं इस वक़्त एक बड़े मर्डर केस के बिल्कुल बीच खड़ा हूँ. कहानी चाहिए तुम्हें"

कुच्छ देर तक किरण कुच्छ नही बोली.

"कहानी तो मुझे पता है और अगर कुच्छ और जानना चाहती तो पुच्छने के लिए बहुत लोग हैं. मैं सिर्फ़ इस कहानी का तुम्हारा पहलू जानना चाहती हूँ"

"क्यूँ?"

"ऐसे ही" किरण चोर आवाज़ में बोली

"ऐसे ही नही" ख़ान का गुस्सा धीरे धीरे बढ़ने लगा "तुम मेरा पहलू इसलिए जानना चाहती हो ताकि अपनी कहानी में मिर्च मसाला लगा सको"

"मिर्च मसाला?"

"हां मिर्च मसाला. क्या दिखाना चाहती हो? यही के एक निकम्मा इनस्पेक्टर बस बैठा देखता रहा जबकि एक मासूम को फाँसी पर चढ़ा दिया गया? या ये दिखाना चाहती हो के मैं कितना नकारा हूँ? दोबारा फोन मत करना मुझे"

और ख़ान ने फोन पटक दिया.

1 मिनिट बाद ही फोन दोबारा बजा और लाख ना चाहते हुए भी ख़ान ने दोबारा फोन उठा ही लिया.

"तो तुम भी मानते हो के जै मासूम है और ग़लत आदमी को इस केस में फसाया जा रहा है?" कॉल रिसीव करते ही उससे पहले किरण बोल पड़ी.

"मैं भी से मतलब?" ख़ान अपना गुस्सा भूलकर बोला

"मेरा भी यही मानना है" किरण बोली

"क्यूँ?"

"अपनी वजह है मेरे पास" किरण ने कहा

"तो मुझसे क्या चाहती हो फिर?" ख़ान का गुस्सा जैसे फिर चढ़ने लगा.

थोड़ी देर के लिए फोन पर खामोशी च्छा गयी.

"हेलो" ख़ान को आवाज़ ना आई तो उसने फोन चेक किया के कॉल डिसकनेक्ट तो नही हो गयी.

"मैं जै से मिली थी" किरण बोली "उसने बताया के तुम भी यही मानते हो के वो बेकसूर है और उसकी मदद कर रहे हो तो मैने सोचा के मैं भी साथ दूं"

"जै जै जै जै जै ... ख़ान के दिमाग़ में जैसे घंटियाँ बजने लगी. मेरे पीठ पिछे और किस किस से बात की है साले ने?"

"देखो ये हमारे आपस की बात नही है. अगर हम मिलकर काम करें तो एक बेगुनाह की जान बचा सकते हैं"

"और किसने कहा के मुझे तुम्हारी मदद चाहिए?" ख़ान बोला

"किसी ने नही कहा पर शायद तुम ये भूल रहे हो के तुम अकेले जै के तरफ खड़े हो तो मैने सोचा के एक से भले दो"

"और तुम ऐसा क्यूँ कर रही हो?"

"ये नही कहूँगी के मेरा लालच नही है इसमें" किरण बोली "अगर हम उसको बेगुनाह साबित कर दें तो मुझे एक अच्छी कहानी मिल जाएगी"

"और तुम्हारा एक मशहूर रिपोर्टर होने का सपना पूरा हो जाएगा. जानता था मैं के अपने मतलब की ही बात करोगी तुम"

किरण एक पल के लिए कुच्छ कहने लगी पर फिर चुप हो गयी.

"मेरी छ्चोड़ो" उसने जैसे पलटकर वार किया "तुम क्यूँ इतना मरे जा रहे हो जै को बेकसूर साबित करने के लिए. क्या लगता है तुम्हारा?"

"कुच्छ नही लगता" ख़ान बोला "यू सी दुनिया में ज़रा सी इंसानियत अब भी बाकी है इसलिए कुच्छ लोग अब भी कभी कभी अच्छे काम कर लेते हैं वरना यहाँ तो ऐसे लोग भरे पड़े हैं जिनको अपने मतलब के सिवा और कुच्छ नज़र नही आता"

"मेरी तरफ इशारा कर रहे हो?" अब किरण का गुस्सा भी सॉफ ज़ाहिर हो रहा था

"ओह यू गॉट दट? वेरी स्मार्ट. हां तुम्हारी ही बात कर रहा हूँ" ख़ान दाँत पीसता हुआ बोला

"इंसानियत?" अब दोनो बात कम कर रहे थे और एक दूसरे पर कीचड़ ज़्यादा उच्छल रहे थे "यू नो दट वर्ड साउंड्स फन्नी कमिंग फ्रॉम ए मॅन हू किल्ड हिज़ जूनियर ऑफीसर. तब कहाँ गयी थी तुम्हारी इंसानियत जब उस सब-इनस्पेक्टर को गोली मारी थी तुमने?"

और यहाँ जैसे किरण हद से आगे निकल गयी. जिस बात का ज़िक्र ख़ान करना नही चाह रहा था उसने खुद छेड़ दी.

"दट वाज़ अन आक्सिडेंट" ख़ान चिल्ला उठा "एक एनकाउंटर के दौरान क्रॉस फाइरिंग में वो बीच में आ गया और गोली उसको लग गयी"

"ओह्ह्ह आक्सिडेंट" किरण भी चिल्ला ही रही थी "किसी की जान चली गयी और तुम्हारे लिए आक्सिडेंट? 2 साल का बच्चा था उसका जो आज अनाथ है तुम्हारी वजह से. तब कहाँ गयी थी तुम्हारी इंसानियत? वो तो बेचारा सिर्फ़ तुम्हारा साथ दे रहा था"

"वो मेरा साथ नही दे रहा था, हीरो बनने की कोशिश कर रहा था. बिना मुझे कोई इशारा किए ठीक उस तरफ भागा जिस तरफ मैं गोलियाँ चला रहा था"

"यआः राइट" किरण बोली "यू नो व्हाट, तुम्हें फोन करना मेरी ग़लती थी, तुम्हारे जैसे लोगों के मुँह लगना अपने आप में एक पाप है"

और किरण ने फोन पटक दिया पर 1 मिनिट बाद दोनो फिर फोन पर थे. कॉल इस बार ख़ान ने की थी.

"मेरी इंसानियत पर इल्ज़ाम लगाया है तो सुनती जाओ" ख़ान बोला "अपना शहर का मकान बेच डाला था मैने और जितना पैसा मिला सारा उस सब-इनस्पेक्टर की बीवी को दे आया था ताकि उसके बच्चे को एक बेहतर फ्यूचर मिल सके. और ज़रा अपने गिरेबान में झाँको. बिना कुच्छ जाने मुझ पर जो तुमने अख़बारो में कीचड़ उच्छाला था, वो कहाँ तक जस्टिफाइड था?"

"ओह तो अब हम मेरी बात कर रहे हैं?" किरण भी पिछे हटने वालो में से नही थी "और मिस्टर. इंसानियत, तब कहाँ थे तुम जब मैं समान बाँधे तुम्हारा इंतेज़ार कर रही थी और तुम नही आए? बोलो."

और सालों बात दोनो के बीच फिर वही बात उठ गयी जिसके लेकर दोनो मुद्दत तक अंदर ही अंदर जलते तो रहे, पर एक दूसरे से शिकवा ना कर सके थे.

"तुम्हें तो जैसे पता ही नही, है ना?" ख़ान गुर्राया

"पता है" किरण बोली "जानती हूँ के तुम कहीं मुँह च्छुपाए बैठे थे, डरे हुए थे कि लड़की को अपने साथ भगा के ले गये तो उसका बाप तुम्हारा क्या करेगा. इतना डर लग रहा था तो मुझसे कह देते. मैं कहीं और भाग जाती, कम से कम मेरी ज़बरदस्ती शादी तो नही करा दी जाती."

ख़ान एक पल के लिए चुप हो गया.

"तुम्हारी वजह से, सिर्फ़ तुम्हारी वजह से मुन्ना मैं एक ऐसे इंसान के बिस्तर पर सोती रही जो कहीं से भी मेरे लायक नही था " किरण रो पड़ी "अगर तुमने मुझे भगा कर नही ले जाना था तो झूठ क्यूँ बोला मुझसे? मैं समान बाँधे तुम्हारा इंतेज़ार कर रही थी. अगर पता होता तो तुम्हारा इंतेज़ार करने के बजाय कहीं जाकर च्छूप जाती"

ख़ान फिर भी चुप रहा. किरण गुस्से में उसको फिर उसी नाम से बुला गयी थी जो वो उसे प्यार से बुलाती थी, मुन्ना... शॉर्ट फॉर मुनव्वर. किरण को कभी उसका नाम पसंद नही था.

"आज एक तलाक़-शुदा औरत की ज़िंदगी जी रही हूँ मैं, सिर्फ़ तुम्हारी वजह से" किरण के सिसकने की आवाज़ आई.

ख़ान चौंक पड़ा. उसको नही मालूम था के किरण तलाक़ ले चुकी थी.

"जानना चाहती हो के मैं उस शाम क्यूँ नही आया था?" आख़िर में वो बोला "क्यूंकी तुम्हारे बाप ने मुझे मार मार कर हॉस्पिटल पहुँचा दिया था. जिस वक़्त तुम फेरे ले रही थी उस वक़्त मैं हॉस्पिटल में अपनी ज़िंदगी के लिए लड़ रहा था"

अब किरण चुप थी.

"और सुनोगी? मैं इस लिए नही आ पाया क्यूंकी मेरी माँ मेरी गोद में दम तोड़ रही थी. मैं इसलिए नही आ पाया क्यूंकी मैं अपनी माँ को दफ़ना रहा था जिसे तुम्हारे बाप के आदमियों ने इतना मारा था के वो बेचारी कभी होश में वापिस आई ही नही. और किसलिए मरी वो? इसलिए के तुम हार मानकर किसी और से शादी कर लो? एक महीने भी मेरे लिए लड़कर इंतेज़ार ना कर सको?"

किरण कुच्छ नही बोली.

"और इतनी कमज़ोर निकली तुम के बाप के डर से शादी तो की ही साथ मेरे घर का पता भी थमा दिया? बहुत हिम्मत की बातें करती थी ना तुम? कहाँ गयी थी तुम्हारी हिम्मत तब? क्यूँ अपने बाप के सामने घुटने टेक दिए? क्यूँ नही कर सकी मेरा इंतेज़ार? इंतेज़ार तो छ्चोड़ो, क्या ये भी जानने की कोशिश की थी के मैं आया क्यूँ नही? या के मैं ज़िंदा भी हूँ या मर गया?

गुस्से में ख़ान ने फिर फोन पटक दिया. इस बार ना उसने वापिस फोन किया और ना किरण ने.

वो वहीं सर पकड़े बैठा रहा. धीरे धीरे रात का अंधेरा फेल रहा था.

रेडियो पर एक पुरानी ग़ज़ल की आवाज़ गूँज रही थी.

दिल के धड़कने का सबब याद आया,

वो तेरी याद थी अब याद आया.

तेरा भूला हुआ मोहब्बत का वादा,

मार जाएँगे अगर अब याद आया.

बैठके तन्हाई में अक्सर,

हम बहुत रोए जब तू याद आया.

हाल-ए-दिल हम भी सुनते मगर,

जब तू रुखसत हुई तब याद आया.

अगले ही दिन ख़ान जै से मिलने जैल गया.

"क्या हुआ?" जै ने ख़ान को अपनी तरफ घूरते देखा तो पुछा.

"डू यू रीयलाइज़ दट आइ आम प्रेटी मच दा ओन्ली वन स्टॅंडिंग बिट्वीन यू आंड ए डेत सेंटेन्स?" ख़ान ने सवाल किया

"यआः आइ नो दट"

"देन वाइ दा फक डू यू वॉंट टू पिस मी ऑफ? यू गॉट ए डेत विश ओर सम्तिंग?" ख़ान गुस्से में अपना हाथ टेबल पर मारता हुआ बोला.

"आए" वहीं बाज़ू में खड़े एक हवलदार ने कहा "ये गुस्सा जाके अपने घर में दिखाने का"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --32

gataank se aage........................

Bindiya ek pal ke liye khadi rahi, jaise Khan se kisi harkat ki ummeed kar rahi ho par jab kuchh na hua toh darwaza khol kar bahar nikal gayi.

"Hello Dr. Sahab" Thodi der baad Khan ne Dr. Asthana ka number milaya.

"Kahiye Khan Sahab" Asthana ki aawaz aayi "Kaise yaad kiya?"

"Ek sawal tha dimag mein" Khan bola "Aapke hisab se Thakur ke jism par jo aurat ke nishan aapko mile the vo kitne purane ho sakte hain?"

"Ye bata toh almost impossible hai" Asthana bola

"Aur aise nishan kitne din tak purane ho sakte hain?"

"Agar ye maan liya jaaye ke Thakur Sahab hafto tak nahi nahate the toh hafta bhar purane bhi ho sakte hain"

"aur agar nahaye hon to" Khan ne puchha

"Agar nahaye hon toh shareer se dhul jaane chahiye par ek baar nahane ke baad bach bhi sakte hain"

"Hmmm" Khan sochte hue bola "Thanks Dr."

Doctor se baat ke baad usne phone rakha hi tha ke uska mobile phir baj utha. Call unknown number se thi.

"Hello" Khan ne call receive ki.

"Hi" Doosri taraf se ek ladki ki aawaz aayi jise Khan fauran pehchan gaya.

Kiran, Kiran .... Kambakht Kiran ... Usne dil hi dil mein socha.

"Phone mat rakhna pls" Khan phone rakhne hi laga tha ke doosri taraf se Kiran ne kaha "Baat karni hai kuchh tumse"

Khan phone pakde chup khada raha.

"Thanks" Kiran boli

"Kaho" Khan thandi aawaz mein bola

"Kaam tha kuchh" Kiran ne kaha

"Acchi tarah janta hoon ke kya kaam hai tumhein" Khan mazak sa udata hua bola "Tum ek journalist ho aur main is waqt ek bade murder case ke bilkul beech khada hoon. Kahani chahiye tumhein"

Kuchh der tak Kiran kuchh nahi boli.

"Kahani toh mujhe pata hai aur agar kuchh aur jaanna chahti toh puchhne ke liye bahut log hain. Main sirf is kahani ka tumhara pehlu jaanna chahti hoon"

"Kyun?"

"Aise hi" Kiran chor aawaz mein boli

"Aise hi nahi" Khan ka gussa dheere dheere badhne laga "Tum mera pehlu isliye jaanna chahti ho taaki apni kahani mein mirch masala laga sako"

"Mirch masala?"

"Haan mirch masala. Kya dikhana chahti ho? Yahi ke ek nikamma inspector bas betha dekhta raha jabki ek masoom ko phaansi par chadha diya gaya? Ya ye dikhana chahti ho ke main kitna nakara hoon? Dobara phone mat karna mujhe"

Aur Khan ne phone patak diya.

1 minute baad hi phone dobara baja aur lakh na chahte hue bhi Khan ne dobara phone utha hi liya.

"Toh tum bhi maante ho ke Jai masoom hai aur galat aadmi ko is case mein phasaya ja raha hai?" Call receive karte hi usse pehle Kiran bol padi.

"Main bhi se matlab?" Khan apna gussa bhoolkar bola

"Mera bhi yahi maanna hai" Kiran boli

"Kyun?"

"Apni vajah hai mere paas" Kiran ne kaha

"Toh mujhse kya chahti ho phir?" khan ka gussa jaise phir chadhne laga.

Thodi der ke liye phone par khamishi chha gayi.

"Hello" Khan ko aawaz na aayi toh usne phone check kiya ke call disconnect toh nahi ho gayi.

"Main Jai se mili thi" Kiran boli "Usne bataya ke tum bhi yahi maante ho ke vo bekasoor hai aur uski madad kar rahe ho toh maine socha ke main bhi saath doon"

"JAI JAI JAI JAI JAI ... Khan ke dimag mein jaise ghantiyan bajne lagi. Mere peeth pichhe aur kis kis se baat ki hai saale ne?"

"Dekho ye hamare aapas ki baat nahi hai. Agar ham milkar kaam karen toh ek begunah ki jaan bacha sakte hain"

"Aur kisne kaha ke mujhe tumhari madad chahiye?" Khan bola

"Kisi ne nahi kaha par shayad tum ye bhool rahe ho ke tum akele Jai ke taraf khade ho toh maine socha ke ek se bhale do"

"Aur tum aisa kyun kar rahi ho?"

"Ye nahi kahungi ke mera lalach nahi hai ismein" Kiran boli "Agar ham usko begunah saabit kar den toh mujhe ek achhi kahani mil jayegi"

"Aur tumhara ek mashhoor reporter hone ka sapna poora ho jaayega. Janta tha main ke apne matlab ki hi baat karogi tum"

Kiran ek pal ke liye kuchh kehne lagi par phir chup ho gayi.

"Meri chhodo" Usne jaise palatkar vaar kiya "Tum kyun itna mare ja rahe ho Jai ko bekasoor saabit karne ke liye. Kya lagta hai tumhara?"

"Kuchh nahi lagta" Khan bola "You see duniya mein zara si insaniyat ab bhi baaki hai isliye kuchh log ab bhi kabhi kabhi achhe kaam kar lete hain varna yahan to aise log bhare pade hain jinko apne matlab ke siwa aur kuchh nazar nahi aata"

"Meri taraf ishara kar rahe ho?" Ab Kiran ka gussa bhi saaf zahir ho raha tha

"Oh you got that? Very smart. Haan tumhari hi baat kar raha hoon" Khan daant peesta hua bola

"Insaniyat?" Ab dono baat kam kar rahe the aur ek doosre par kichad zyada uchhal rahe the "yOU know that word sounds funny coming from a man who killed his junior officer. Tab kahan gayi thi tumhari insaniyat jab us sub-inspector ko goli maari thi tumne?"

Aur yahan jaise Kiran had se aage nikal gayi. Jis baaat ka zikr Khan karna nahi chah raha tha usne khud chhed di.

"That was an accident" Khan chilla utha "Ek encounter ke dauran cross firing mein vo beech mein aa gaya aur goli usko lag gayi"

"Ohhh accident" Kiran bhi chilla hi rahi th "Kisi ki jaan chali gayi aur tumhare liye accident? 2 saal ka bachcha tha uska jo aaj anath hai tumhari vajah se. Tab kahan gayi thi tumhari insaniyat? Vo toh bechara sirf tumhara saath de raha tha"

"Vo mera saath nahi de raha tha, hero banne ki koshish kar raha tha. Bina mujhe koi ishara kiye theek us taraf bhaga jis taraf main goliyan chala raha tha"

"Yeah right" Kiran boli "You know what, tumhein phone karna meri galti thi, tumhare jaise logon ke munh lagna apne aap mein ek paap hai"

Aur Kiran ne phone patak diya par 1 minute baad dono phir phone par the. Call is baar Khan ne ki thi.

"Meir insaaniyat par ilzaam lagaya hai toh sunti jao" Khan bola "Apna shehar ka makaan bech dala tha maine aur jitna paisa mila sara us sub-inspector ki biwi ko de aaya tha taaki uske bachche ko ek behtar future mil sake. Aur zara apne girebaan mein jhaanko. Bina kuchh jaane mujh par jo tumne akhbaaro mein kichad uchhala tha, vo kahan tak justified tha?"

"Oh toh ab ham meri baat kar rahe hain?" Kiran bhi pichhe hatne walo mein se nahi thi "Aur Mr. Insaniyat, tab kahan the tum jab main saman baandhe tumhara intezaar kar rahi thi aur tum nahi aaye? Bolo."

Aur saalon baat dono ke beech phir vahi baat uth gayi jiske lekar dono muddat rak andar hi andar jalte toh rahe, par ek doosre se shikva na kar sake the.

"Tumhein to jaise pata hi nahi, hai na?" Khan gurraya

"Pata hai" KIran boli "Jaanti hoon ke tum kahin munh chhupaye bethe the, dare hue ke ladki ko apne saath bhaga ke le gaye toh uska baap tumhara kya karega. Itna darr lag raha tha toh mujhse keh dete. Main kahin aur bhaag jaati, kam se kam meri zabardasti shaadi toh nahi kara di jaati."

Khan ek pal kel liye chup ho gaya.

"Tumhari vajah se, sirf tumhari vajah se Munna main ek aise insaan ke bistar par soti rahi jo kahin se bhi mere layak nahi tha " Kiran ro padi "Agar tumne mujhe bhaga kar nahi le jana tha toh jhooth kyun bola mujhse? Main saman baandhe tumhara intezaar kar rahi thi. Agar pata hota toh tumhara intezaar karne ke bajay kahin jakar chhup jaati"

Khan phir bhi chup raha. Kiran gusse mein usko phir usi naam se bula gayi thi jo vo use pyaar se bulati thi, Munna... short for Munawwar. Kiran ko kabhi uska naam pasand nahi tha.

"Aaj ek talak-shuda aurat ki zindagi ji rahi hoon main, sirf tumhari vajah se" Kiran ke sisakne ki aawaz aayi.

Khan chaunk pada. Usko nahi malum tha ke Kiran talak le chuki thi.

"Janna chahti ho ke main us shaam kyun nahi aaya tha?" Aakhir mein vo bola "Kyunki tumhare baap ne mujhe maar maar kar hospital pahuncha diya tha. Jis waqt tum phere le rahi thi us waqt main hospital mein apni zindagi ke liye lad raha tha"

Ab Kiran chup thi.

"Aur sunogi? Main is liye nahi aa paya kyunki meri maan mere god mein dam tod rahi thi. Main isliye nahi aa paya kyunki main apni maan ko dafna raha tha jise tumhare baap ke aadmiyon ne itna mara tha ke vo bechari kabhi hosh mein vapis aayi hi nahi. Aur kisliye mari vo? Isliye ke tum haar maankar kisi aur se shaadi kar lo? Ek mahine bhi mere liye ladkar intezaar na kar sako?"

Kiran kuchh nahi boli.

"Aur itni kamzor nikli tum ke baap ke darr se shaadi toh ki hi saath mere ghar ka pata bhi thama diya? Bahut himmat ki baaten karti thi na tum? Kahan gayi thi tumhari himmat tab? Kyun apne baap ke saamne ghutne tek diye? Kyun nahi kar saki mera intezaar? Intezaar toh chhodo, kya ye bhi jaanne ki koshish ki thi ke main aaya kyun nahi? Ya ke main zinda bhi hoon ya mar gaya?

Gusse mein Khan ne phir phone patak diya. Is baar na usne vaapis phone kiya aur na Kiran ne.

Vo vahin sar pakde betha raha. Dheere dheere raat ka andhera phel raha tha.

Radio par ek purani gazal ki aawaz goonj rahi thi.

Dil ke dhadakne ka sabab yaad aaya,

vo teri yaad thi ab yaad aaya.

Tera bhula hua mohabbat ka wada,

mar jayenge agar ab yaad aaya.

Bethke tanhai mein aksar,

ham bahut roye jab tu yaad aaya.

Haal-e-dil ham bhi sunate magar,

Jab tu rukhsat hui tab yaad aaya.

Age hi din Khan Jai se milne Jail gaya.

"Kya hua?" Jai ne Khan ko apni taraf ghoorte dekha toh puchha.

"Do you realise that i am pretty much the only one standing between you and a death sentence?" Khan ne sawal kiya

"Yeah i know that"

"Then why the fuck do you want to piss me off? You got a death wish or something?" Khan gusse mein apna haath table apr maarta hua bola.

"Aey" Vahin baazu mein khade ek hawaldar ne kaha "Ye gussa jaake apne ghar mein dikhane ka"

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:21

खूनी हवेली की वासना पार्ट --33

गतान्क से आगे........................

ख़ान सिविल ड्रेस में था. उसने जेब से अपना आइडी कार्ड निकाला.

"अगर तो 1 मिनिट के अंदर अंदर यहाँ से दफ़ा नही हुआ तो जो डंडा तेरे हाथ में है वो तेरे पिच्छवाड़े में होगा"

हवलदार को जब एहसास हुआ के वो एक पोलीस इनस्पेक्टर से बात कर रहा है तो फ़ौरन सल्यूट की पोज़िशन में आ गया.

"सॉरी सर" और इससे पहले के ख़ान कुच्छ कहता, हवलदार चलता बना,

"वाउ!" जै ख़ान की हरकत देखकर बोला "आप तो सीरियस्ली काफ़ी गुस्से में हो. ऐसा क्या कर दिया मैने?"

"किसी रिपोर्टर से बात की तुमने?"

"मैने कई रिपोर्टर्स से बात की है" जै बोला

"एक लड़की ... यहाँ जैल में आई थी तुमसे मिलने को"

"ओह" जै बोला "किरण नाम था शायद"

"हां वही" ख़ान ने घूरते हुए कहा "क्या बात की?"

"ख़ास कुच्छ नही. उसने मुझसे एक दो सवाल किए और मैने यही कहा के मैं बेकसूर हूँ. फिर उसने आपका नाम लिया तो मैने कहा के आप मेरी मदद कर रहे हैं"

ख़ान चुप चाप जै को ऐसे देख रहा था जैसे अभी कच्चा चबा जाएगा.

"व्हाट?" जै ने हाथ फैलाते हुए सवाल किया

"अगली बार बिना मुझसे पुछे किसी से इस तरह की कोई बात की तो कसम है मुझे अपनी मरी हुई माँ की जै, फाँसी के फंदे तक तुम्हें मैं खुद छ्चोड़के आऊंगा"

ख़ान की बात सुनकर जै चौंक पड़ा और खामोशी से उसको देखता रहा.

"वो कह रही थी के वो मदद करना चाहती है इसलिए मैने सोचा ........"

"सोचने का काम मुझपे छ्चोड़ दो. तुम यहाँ बैठके सिर्फ़ एक काम करो, दुआ. दुआ करो के मैं तुम्हें बचा लूँ. समझे?"

जै फिर वैसे ही खामोशी से देखता रहा जैसे कोई बच्चा चोरी पकड़े जाने पर देखता है.

"देखो जै" ख़ान अपना गुस्सा ठंडा करता हुआ बोला "पहली बात तो ये के वो एक रिपोर्टर है और वो सिर्फ़ एक कहानी ढूँढ रही है. उसको कोई फरक नही पड़ता के तुम जियो या मरो. वो बस अपना मतलब देखेगी. दूसरा ये एक प्रेस में इस बात को उड़ाके तुम्हें कोई फ़ायदा नही होगा जैसा की तुम सोच रहे हो. सिर्फ़ आग को हवा मिलेगी और तुम्हें जल्दी से जल्दी निपटाने की कोशिश की जाएगी. बस ये जान लो तुम"

जै ने हां में गर्दन हिलाई.

"और वैसे भी, तुम्हारे मामले मैं तो मुझे ये लग रहा है के मैं कोई प्राइवेट डीटेक्टिव हूँ, एक पुलिस वाला नही"

"क्यूँ?"

"यार मैं खुल्ले तरीके से इसमें इन्वेस्टिगेट नही कर सकता. अगर बात ये फेली के मैं ओफ्फिसीयाली इसमें इन्वेस्टिगेट कर रहा हूँ तो मुझे कहीं और किसी केस पर लगा दिया जाएगा और फिर गये तुम"

जै ने समझते हुए हामी भरी.

"इतना जान लो के और केसस में पब्लिसिटी शायद अक्क्यूस्ड के फेवर में जाती है पर यहाँ नही. क्यूंकी यहाँ हर कोई बिक जाएगा ठाकुर ख़ानदान के हाथों. पोलीस से लेके प्रेस तक, सब. जब तक सब इस खुश फहमी में हैं के तुम्हें ही कातिल समझ लिया गया है तब तक कोई ज़्यादा शोर नही मचाएगा. बस खामोशी से फ़ैसले का इंतेज़ार करेंगे."

"ये यू आर राइट" जै बोला

"तो मेरे भाई, सब मुझपे छ्चोड़ दो और भरोसा रखो. मुझसे जो बन सकेगा मैं करूँगा और कर भी रहा हूँ. झूठी तसल्ली और वादे नही करूँगा के तुम्हें 100% बचा लूँगा पर ये तो मान ही लो के अगर मैं कुच्छ नही कर पाया, तो कोई और भी कुच्छ नही कर सकता था."

जब ख़ान जै से मिलकर वापिस अपने घर पहुँचा तो दरवाज़े की तरफ बढ़ते कदम अचानक रुक गये.

उसके घर के बाहर एक कार खड़ी थी और घर के दरवाज़े के पास आँगन में घर की दीवार से टेक लगाए किरण बैठी थी.

"तुम?" ख़ान इतना ही कह सका

"हां काफ़ी देर से तुम्हारा इंतेज़ार कर रही थी" किरण खड़ी होते हुए बोली

"क्यूँ?"

"3 घंटे से यहाँ अकेली बैठी हूँ. अंदर बुलाकर कम से कम एक ग्लास पानी तो पिला ही सकते हो. बहुत प्यास लगी है"

ख़ान ने चुप चाप लॉक खोला और अंदर आया.

"बैठो" उसने किरण को इशारा किया.

आज वो सालों बाद किरण से आमने सामने बात कर रहा था. आखरी बार जब उसने किरण से अकेले में बात की थी वो तब था जब वो भागने का प्लान बना रहे थे, और उसके बाद आज. सारा गुस्सा, दिल में भरी कुढन, किरण को भला बुरा कहने की सारी ख्वाहिशें जैसे पल में हवा हो चुकी थी.

उसने किरण को एक ग्लास में पानी लाकर दिया.

"और?" पानी का ग्लास खाली हो गया तो उसने पुछा

किरण ने इनकार में सर हिलाया.

"कुच्छ खाया है?" ख़ान ने पुछा और बिना जवाब का इंतेज़ार किए फ्रिड्ज खोलकर कुच्छ खाने को ढूँढने लगा.

उसको देख कर किरण हस पड़ी.

"आदत गयी नही तुम्हारी? पहले भी दिन में 10 बार मुझसे पुछ्ते थे के मैने कुच्छ खाया के नही"

"वो इसलिए क्यूंकी तुम कुच्छ खाती नही थी" ख़ान ने फ्रिड्ज से वो दलिया निकाला जो उसने सुबह बनाया था "खाने के नाम पर बस एक आपल खाया करती थी"

किरण मुस्कुरा पड़ी

"हां. मैं और मेरा डाइयेटिंग का भूत. क्या कर रहे हो?" वो ख़ान को स्टोव ऑन करते हुए देख कर बोली.

"कुच्छ खाने को गरम कर रहा हूँ"

"क्या?"

"दलिया"

"दलिया?" किरण ने हैरानी से पुचछा

"अकेला रहता हूँ....खाना बनाना नही आता मुझे. एक दो चीज़ें ही हैं जो बना लेता हूँ और दलिया उनमें से एक है" वो दलिया गरम करता हुआ बोला

उसने कई बार मन ही मन में सोचा था के अगर कभी किरण से मिला तो क्या करेगा. कभी ख्याल में उसको थप्पड़ मार रहा था, कभी गालियाँ दे रहा था और कभी कभी तो गोली भी मार दी थी. पर आज वो जब यूँ सामने आ खड़ी हुई तो उसके लिए दलिया गरम कर रहा था.

और यही हाल शायद किरण का भी था. जिस लड़की ने उसपर कभी अख़बार में इतना कीचड़ उछाला था, जो उसकी नौकरी खा जाने पर तुली थी, जिसके हर कोशिश ये थी के ख़ान जैल जाए आज उसके सामने फिर वही लड़की बनी बैठी थी जिसकी एक मुस्कुराहट पर ख़ान अपनी जान देने को तैय्यार रहता था.

"खा लो" वो दलिया एक प्लेट में डालकर लाया और किरण के सामने टेबल पर रख दिया.

"और तुम?"

"आदत तुम्हारी भी गयी नही" ख़ान उससे नज़र अब भी नज़र बचा रहा था "अपने खाने से पहले मेरे खाने का सोच रही हो"

किरण ने मुस्कुरा कर प्लेट उसकी तरफ खिसकाई.

"तुम भी खा लो" वो बोली

"नही मैने आते हुए रास्ते में खा लिया था" ख़ान ने कहा. अब तक दोनो एक दूसरे से ऐसे नज़र चुरा कर बात कर रहे थे जैसे अपनी अपनी कोई चोरी पकड़े जाने का डर हो.

"एक और पुरानी आदत. झूठ बोलना के मैं खा चुका हूँ. एक स्पून और ले आओ और खा लो"

"नही तुम खाओ. मैने सच में खा लिया" ख़ान एक ग्लास में पानी डालता हुआ बोला और एक नज़र किरण पर डाली.

"कैसे आना हुआ?"

"यू नो आइ आम सॉरी अबौट युवर मदर. आइ डिड्न्ट नो"

"इट्स ओके" ख़ान ने कहा

"ऑल दिस टाइम आइ थॉट दट यू रन अवे. पता ही नही था के तुम पर क्या गुज़री. आइ आम रियली सॉरी"

"आइ आम सॉरी टू" ख़ान ने कहा "मुझे समझना चाहिए था के तुम कर भी क्या सकती थी जबके मैं खुद ही कुच्छ नही कर सका"

"और तुम्हारा नाम और पता मैने नही दिया था. नाम तो ऑफ कोर्स डॅड को मेरे सामान की तलाशी लेने के बाद मिल गया था, वो कार्ड्स से जो तुमने मुझे दिए थे. और तुम्हारा अड्रेस उन्होने कॉलेज के प्रिन्सिपल से पुछ्कर कॉलेज रेकॉर्ड्स से निकाला था"

"मैं भागा नही था. तुम्हारे पास आ ही रहा था के तुम्हारे डॅड के आदमी मेरे घर आ पहुँचे और फिर उसके बाद ...." ख़ान बात पूरी नही कर सका.

और तब उसने पहली बार नज़र किरण से मिलाई. दोनो ने एक दूसरे की तरफ देखा और जैसे सारे गीले शिकवे एक पल में ख़तम हो गये.

"हाउ कुड यू हेट हेर सो मच इफ़ यू स्टिल डिड्न्ट लव हर" ख़ान को कहीं पढ़ी एक बात याद आई.

"जै से मिले?" किरण ने पुछा तो ख़ान ने हां में गर्दन हिलाई.

"कोई चान्स?"

"कोशिश कर रहा हूँ उसको बचाने की"

और वो किरण के साथ पूरा केस ऐसे डिसकस करने लगा जैसे वो उसके साथ ही काम कर रही हो. ये ज़िद के किरण की कोई मदद नही चाहिए अंजाने में ही कबकि ख़तम हो चुकी थी.

वो ख़ान की बात गौर से सुनती किसी बच्ची की तरह दलिया खा रही थी. रेडियो अब भी ऑन था और एक गाना धीमी आवाज़ में बज रहा था.

हसीन कितना ज़्यादा हो गया है

जबसे तू और सादा हो गया है

घड़ी भर तेरी आँख में रह कर

पानी भी कितना खुषादा हो गया है

दिल धड़केगा तो तेरे ही नाम पर,

मेरा तुझसे ये वादा हो गया है.

जुदाई का गम तुझे भी रहा है शायद,

के अब तो तू भी आधा हो गया है.

"सच मानो तो मैने जै से वादा तो किया है के मैं उसको बचा लूँगा पर अब तक कोई ख़ास कर नही सका हूँ मैं" ख़ान बोला "बस कुच्छ लोगों से यहाँ वहाँ बात ज़रूर की है पर इसके सिवा और कुच्छ नही"

.............

ख़ान किरण से फोन पर बात कर रहा था. रात के 12 बज रहे थे और वो दोनो पिच्छले 2 घंटे से फोन पर लगे हुए थे. किरण उससे मिलकर वापिस घर चली गयी थी और जाते ही ख़ान को फोन कर दिया था.

"हर बार मैं उससे मिलने जाता हूँ तो वो मुझे उम्मीद भरी नज़र से देखता है के मैं कुच्छ ऐसा कहूँगा या बताऊँगा जिससे उसको लगेगा के वो बच जाएगा. पर अब तक मैं उसके लिए कुच्छ कर नही पाया हूँ"

"ऐसा क्यूँ?" किरण ने पुछा

ख़ान ने एक ठंडी साँस ली और किरण को पूरी बात बताने लगा.

"कम ऑन यार" बात ख़तम होने पर वो बोली "तुम एक पोलीस वाले हो, तुम्हारे हाथ में काफ़ी पवर है"

"और काफ़ी प्रेशर भी है यार. वैसे ही एक बार मेरी नौकरी जाते जाते बची है, फिर से चान्स नही ले सकता"

किरण फ़ौरन समझ गयी के नौकरी जाने की बात ख़ान किस वजह से कह रहा था.

"आइ आम सॉरी यार" वो बोली "मैं पता नही क्यूँ तुम्हें इतना बदनाम कर रही थी, बिना पूरी बात जाने"

"अर्रे नही" ख़ान फ़ौरन बोला "आइ डिड्न्ट मीन दट. इट्स जस्ट दट के मुझे लगता है के मेरे हाथ बँधे हुए हैं"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --33

gataank se aage........................

Khan civil dress mein tha. Usne jeb se apna ID Card nikala.

"Agar toh 1 minute ke andar andar yahan se dafa nahi hua toh jo danda tere haath mein hai vo tere pichhwade mein hoga"

Hawaldar ko jab ehsaas hua ke vo ek police inspector se baat kar raha hai toh fauran salute ki position mein aa gaya.

"Sorry sir" aur isse pehle ke Khan kuchh kehta, hawaldar chalta bana,

"Wow!" Jai Khan ki harkat dekhkar bola "Aap toh seriously kaafi gusse mein ho. Aisa kya kar diya maine?"

"Kisi reporter se baat ki tumne?"

"Maine kai reporters se baat ki hai" Jai bola

"Ek ladki ... yahan jail mein aayi thi tumse milne ko"

"Oh" Jai bola "Kiran naam tha shayad"

"Haan vahi" Khan ne ghoorte hue kaha "Kya baat ki?"

"Khaas kuchh nahi. Usne mujhse ek do sawal kiye aur maine yahi kaha ke main bekasoor hoon. Phir usne aapka naam liya toh maine kaha ke aap meri madad kar rahe hain"

Khan chup chap Jai ko aise dekh raha tha jaise abhi kachcha chaba jayega.

"What?" Jai ne haath phailate hue sawal kiya

"Agli baar bina mujhse puchhe kisi se is tarah ki koi baat ki toh kasam hai mujhe apni mari hui maan ki Jai, phaansi ke phande tak tumhein main khud chhodke aaoonga"

Khan ki baat sunkar Jai chaunk pada aur khamoshi se usko dekhta raha.

"Vo keh rahi thi ke vo madad karna chahati hai isliye maine socha ........"

"Sochne ka kaam mujhpe chhod do. Tum yahan bethkar sirf ek kaam karo, dua. Dua karo ke main tumhein bacha loon. Samjhe?"

Jai phir vaise hi khamoshi se dekhta raha jaise koi bachcha chori pakde jaane par dekhta hai.

"Dekho Jai" Khan apna gussa thanda karta hua bola "Pehli baat to ye ke vo ek reporter hai aur vo sirf ek kahani dhoondh rahi hai. Usko koi farak nahi padta ke tum jiyo ya maro. Vo bas apna matlab dekhegi. Doosra ye ek press mein is baat ko udaake tumhein koi fayda nahi hoga jaisa ki tum soch rahe ho. Sirf aag ko hawa milegi aur tumhein jaldi se jaldi niptane ki koshish ki jayegi. Bas ye jaan lo tum"

Jai ne haan mein gardan hilayi.

"Aur vaise bhi, tumhare maamle main toh mujhe ye lag raha hai ke main koi private detective hoon, ek plicewala nahi"

"Kyun?"

"Yaar main khulle tarike se ismein investigate nahi kar sakta. Agar baat ye pheli ke main officialy ismein investigate kar raha hoon toh mujhe kahin aur kisi case par laga diya jaayega aur phir gaye tum"

Jai ne samajhte hue haami bhari.

"Itna jaan lo ke aur cases mein publicity shayad accused ke favour mein jaati hai par yahan nahi. Kyunki yahan har koi bik jayega Thakur Khandan ke haathon. Police se leke press tak, sab. Jab tak sab is khush fehmi mein hain ke tumhein hi kaatil samajh liya gaya hai tab tak koi zyada shor nahi machayega. Bas khamoshi se faisle ka intezaar karenge."

"Yea you are right" Jai bola

"To mere bhai, sab mujhpe chhod do aur bharosa rakho. Mujhse jo ban sakega main karunga aur kar bhi raha hoon. Jhoothi tasalli aur wade nahi karunga ke tumhein 100% bacha loonga par ye toh maan hi lo ke agar main kuchh nahi kar paya, toh koi aur bhi kuchh nahi kar sakta tha."

Jab Khan Jai se milkar vaapis apne ghar pahuncha toh darwaze ki taraf badhte kadam achanak ruk gaye.

Uske ghar ke bahar ek car khadi thi aur ghar ke darwaze ke paas aangan mein ghar ki deewar se tek lagaye Kiran bethi thi.

"Tum?" Khan itna hi keh saka

"Haan kaafi der se tumhara intezaar kar rahi thi" Kiran khadi hote hue boli

"Kyun?"

"3 ghante se yahan akeli bethi hoon. Andar bulakar kam se kam ek glass pani toh pila hi sakte ho. Bahut pyaas lagi hai"

Khan ne chup chap lock khola aur andar aaya.

"Betho" Usne Kiran ko ishara kiya.

Aaj vo saalon baad Kiran se aamne saamne baat kar raha tha. Aakhri baar jab usne Kiran se akele mein baat ki thi vo tab tha jab vo bhaagne ka plan bana rahe the, aur uske baad aaj. Sara gussa, dil mein bhari kudhan, Kiran ko bhala bura kehne ki saari khwahishen jaise pal mein hawa ho chuki thi.

Usne Kiran ko ek glass mein pani lakar diya.

"Aur?" Pani ka glass khali ho gaya toh usne puchha

Kiran ne inkaar mein sar hilaya.

"Kuchh khaya hai?" Khan ne puchha aur bina jawab ka intezaar kiye fridge kholkar kuchh khaane ko dhoondhne laga.

Usko dekh kar Kiran has padi.

"Aadat gayi nahi tumhari? Pehle bhi din mein 10 baar mujhse puchhte the ke maine kuchh khaya ke nahi"

"Vo isliye kyunki tum kuchh khaati nahi thi" Khan ne fridge se vo dalia nikala jo usne subah banaya tha "Khaane ke naam par bas ek apple khaaya karti thi"

Kiran muskura padi

"Haan. Main aur mera dieting ka bhoot. Kya kar rahe ho?" Vo Khan ko stove on karte hue dekh kar boli.

"Kuchh khaane ko garam kar raha hoon"

"Kya?"

"Dalia"

"Dalia?" Kiran ne hairani se puchha

"Akela rehta hoon....khana banana nahi aata mujhe. Ek do cheezen hi hain jo bana leta hoon aur dalia unmein se ek hai" Vo dalia garam karta hua bola

Usne kai baar man hi man mein socha tha ke agar kabhi Kiran se mila toh kya karega. Kabhi khyaal mein usko thappad maar raha tha, kabhi gaaliyan de raha tha aur kabhi kabhi toh goli bhi maar di thi. Par aaj vo jab yun saamne aa khadi hui toh uske liye dalia garam kar raha tha.

Aur yahi haal shayad Kiran ka bhi tha. Jis ladki ne uspar kabhi akhbaar mein itna kichad uchhala tha, jo uski naukri kha jaane par tuli thi, jiske har koshish ye thi ke Khan jail jaaye aaj uske saamne phir vahi ladki bani bethi thi jiski ek muskurahat par Khan apni jaan dene ko taiyyar rehta tha.

"Kha lo" Vo dalia ek plate mein daalkar laya aur Kiran ke saamne table par rakh diya.

"Aur tum?"

"Aadat tumhari bhi gayi nahi" Khan usse nazar ab bhi nazar bacha raha tha "Apne khane se pehle mere khane ka soch rahi ho"

Kiran ne muskura kar plate uski taraf khiskayi.

"Tum bhi kha lo" Vo boli

"Nahi maine aate hue raste mein kha liya tha" Khan ne kaha. Ab tak dono ek doosre se aise nazar chura kar baat kar rahe the jaise apni apni koi chori pakde jaane ka dar ho.

"Ek aur purani aadat. Jhooth bolna ke main kha chuka hoon. Ek spoon aur le aao aur kha lo"

"Nahi tum khaao. Maine sach mein kha liya" Khan ek glass mein pani dalta hua bola aur ek nazar Kiran par daali.

"Kaise aana hua?"

"You know i am sorry about your mother. I didnt know"

"Its ok" Khan ne kaha

"All this time i thought that u ran away. Pata hi nahi tha ke tum par kya guzri. I am really sorry"

"I am sorry too" Khan ne kaha "Mujhe samajhna chahiye tha ke tum kar bhi kya sakti thi jabke main khud hi kuchh nahi kar saka"

"Aur tumhara naam aur pata maine nahi diya tha. Naam toh of course dad ko mere saaman ki talashi lene ke baad mil gaya tha, vo cards se jo tumne mujhe diye the. Aur tumhara address unhone college ke principal se puchhkar college records se nikala tha"

"Main bhaga nahi tha. Tumhare paas aa hi raha tha ke tumhare Dad ke aadmi mere ghar aa pahunche aur phir uske baad ...." Khan baat poori nahi kar saka.

Aur tab usne pehli baar nazar Kiran se milayi. Dono ne ek doosre ki taraf dekha aur jaise saare gile shikve ek pal mein khatam ho gaye.

"How could you hate her so much if you still didnt love her" Khan ko kahin padhi ek baat yaad aayi.

"Jai se mile?" Kiran ne puchha toh Khan ne haan mein gardan hilayi.

"Koi chance?"

"Koshish kar raha hoon usko bachane ki"

Aur vo Kiran ke saath poora case aise discuss karne laga jaise vo uske saath hi kaam kar rahi ho. Ye zid ke Kiran ki koi madad nahi chahiye anjane mein hi kabki khatam ho chuki thi.

Vo Khan ki baat gaur se sunti kisi bachchi ki tarah dalia kha rahi thi. Radio ab bhi on tha aur ek gaana dheemi aawaz mein baj raha tha.

Haseen kitna zyada ho gaya hai

jabse tu aur saada ho gaya hai

Ghadi bhar teri aankh mein reh kar

Pani bhi kitna khushada ho gaya hai

Dil dhadkega toh tere hi naam par,

Mera tujhse ye wada ho gaya hai.

Judai ka gham tujhe bhi raha hai shayad,

Ke ab to tu bhi aadha ho gaya hai.

"Sach mano toh maine Jai se wada toh kiya hai ke main usko bacha loonga par ab tak koi khaas kar nahi saka hoon main" Khan bola "Bas kuchh logon se yahan vahan baat zaroor ki hai par iske siwa aur kuchh nahi"

Khan Kiran se phone par baat kar rahi tha. Raat ke 12 baj rahe the aur vo dono pichhle 2 ghante se phone par lage hue the. Kiran usse milkar vaapis ghar chali gayi thi aur jaate hi Khan ko phone kar diya tha.

"Har baar main usse milne jata hoon toh vo mujhe ummeed bhari nazar se dekhta hai ke main kuchh aisa kahunga ya bataoonga jisse usko lagega ke vo bach jayega. Par ab tak main uske liye kuchh kar nahi paya hoon"

"Aisa kyun?" Kiran ne puchha

Khan ne ek thandi saans li aur Kiran ko poori baat batane laga.

"Come on yaar" Baat khatam hone par vo boli "Tum ek police wale ho, tumhare haath mein kaafi power hai"

"Aur kaafi pressure bhi hai yaar. Vaise hi ek baar meri naukri jaate jaate bachi hai, phir se chance nahi le sakta"

Kiran fauran samajh gayi ke naukri jaane ki baat Khan kis vajah se keh raha tha.

"I am sorry yaar" Vo boli "Main pata nahi kyun tumhein itna badnaam kar rahi thi, bina poori baat jaane"

"Arrey nahi" Khan fauran bola "I didnt mean that. Its just that ke mujhe lagta hai ke mere haath bandhe hue hain"

kramashah........................................