खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:24

खूनी हवेली की वासना पार्ट --37

गतान्क से आगे........................

"साउंड्स रीज़नबल" जै ने सहमति जताई "चड्ढा मान गया?"

"हां" ख़ान बोला "पर एक शर्त पर"

"कैसी शर्त?"

"देखो सरकारी वकील होने के नाते वो तुमसे फीस नही माँग सकता पर उसकी शर्त है के अगर तुम बेगुनाह साबित होकर रिहा हो गये, तो मोटी फीस देनी पड़ेगी"

"कितनी?" जै बोला

"मैने पैसे की बात नही की पर जितनी भी हो यार" ख़ान बोला "तुम्हारी जान बच जाए इसके लिए भले कितने भी पैसे लगें. या पैसे ज़्यादा प्यारे हैं तुम्हें?"

"बचूँगा ही नही तो पैसे का क्या करूँगा?" जै हस्ता हुआ बोला

"एग्ज़ॅक्ट्ली. तो पैसे की बात हम उससे बाद में करते रहेंगे" जै ने हां में सर हिलाया

"और अब क्यूंकी हमारे पास ज़्यादा वक़्त नही है, तो हमें जो करना है जल्दी करना पड़ेगा"

"ओके"

"देखो तुम्हारे केस में अब तक जो हमें थोड़ी बहुत बढ़त मिली है वो तुम्हारी ही बताई हुई बातों से मिली है और जो तुम बता सकते हो वो कोई और नही बता सकता. ठाकुर का खून हुआ और और ज़ाहिर सी बात है कि किसी घर के आदमी ने ही किया है. तो इस खून की वजह भी कहीं किसी घरेलू मामले में ही च्छूपी है. मैं चाहता हूँ के तुम मुझे अपने दिमाग़ पर ज़ोर डालो और सोचो के वजह मौजूद किस आदमी के पास खून करने की वजह हो सकती

थी. कुच्छ भी, कोई पुराना झगड़ा, कोई क़र्ज़ जिसे चुकाने के लिए दौलत चाहिए हो, वसीयत से बाहर होने का डर, एनितिंग"

"ओके" जै किसी बच्चे की तरह सुन रहा था

"और जैसा की मैने कहा के हमारे पास ज़्यादा वक़्त नही है, ये काम भी तुम्हें जल्दी ही करना पड़ेगा"

"यॅ ओके. आइ कॅन डू दट. मैं हवेली में रहने वाले हर शक्श की रग रग से वाकिफ़ हूँ"

"गुड. तुम मुझे सोचके बताओ और फिलहाल मुझे उस कॉल गर्ल का अड्रेस दो. आज शहर आने की एक वजह उससे मिलना भी था"

"ओके" जै ने अड्रेस बताना शुरू किया और ख़ान ने लिख लिया.

"मैने यहाँ जैल के वॉर्डन से बात कर ली है. अच्छी जान पहचान है मेरी उससे. मैने कह दिया है के जब भी तुम मुझे फोन करना चाहो तो तुम्हें रोका ना जाए"

"ओके" जै खुश होता हुआ बोला

"चलता हूँ मैं" ख़ान उठकर जाने लगा "फोन करना मुझे सोचकर"

जै भी साथ ही उठ खड़ा हुआ. ख़ान ने उससे हाथ मिलाया और शर्मा के साथ दरवाज़े की तरफ बढ़ा.

"एक बात बताओ" वो जाते जाते पलटा "तुमसे जो मिलने आई थी जैल में, वो कामिनी थी ना?"

जै के चेहरे पर एक पल के लिए आसार बदले.

"क्यूँ क्या हुआ? कोई प्राब्लम हो गयी?"

"नही ऐसे ही पुच्छ रहा हूं" ख़ान ने कहा तो जै ने हां में सर हिलाया.

"फिर आई वो तुमसे मिलने?"

"नही उसको भी अपने भाई का डर है" जै ने कहा

वो दोनो फिर दरवाज़े की तरफ बढ़े तो इस बार शर्मा पलटा.

"एक बात बताओ दोस्त" वो जै से बोला "मतलब तुम मौका-ए-वारदात से रंगे हाथ पकड़े गये, खून किसी और ने किया और फस तुम गये क्यूंकी तुम ग़लत टाइम पे वहाँ पहुँच गये, तुम्हारे अपने घरवाले तुम्हारे खिलाफ हैं, सब तुम्हें फाँसी पे टँगे देखना चाहते हैं और एक हमारे ख़ान साहब के सिवा कोई तुम्हें बचना नही चाहता और अब कोई वकील भी तुम्हारे केस नही ले रहा?"

जै ने हां में सर हिलाया.

"इस पर एक शेर याद आया सर. सुनाऊं?" शर्मा बोला

ख़ान ने हैरानी से उसकी तरफ देखा.

"आप भी सुनीएगा, आप ही की सिचुयेशन पे अर्ज़ कर रहा हूँ. तो अर्ज़ किया है."

झोली में झाँत नही,

सराय में डेरा,

कुत्तो ने गांद मेरी,

और बंदरों ने घेरा,

के हम भी मारेंगे, हम भी मारेंगे

उसके शेर पे ख़ान ज़ोर से हस पड़ा और जै की शकल देखने लायक हो गयी.

तकरीबन एक घंटे बाद ख़ान और शर्मा जै के बताए हुए अड्रेस पर पहुँचे.

"घर तो मस्त बनाया है सर" शर्मा सामने बने बंगलो को देखते हुए बोला.

"ठाकुर जैसे और जाने कितने रईसो का पैसा लगा हुआ है यहाँ" कहकर ख़ान हस्ने लगा.

"कहिए" घंटी बजाने पर एक नौकर बाहर आया और ख़ान को पोलीस यूनिफॉर्म में देख कर फ़ौरन ऐसे बोला जैसे रोज़ की बात हो "मेडम की अभी तबीयत ठीक नही है. बाद में फोन करके आना"

ख़ान और शर्मा ने हैरत से एक दूसरे का मुँह देखा.

"आए साले" शर्मा जल्दी से बोले "दरवाज़ा खोल वरना तेरी मेडम के साथ साथ तेरी तबीयत भी खराब हो जाएगी"

"कहा ना कल आना" नौकर फिर बोला तो इस बार ख़ान भड़क पड़ा

"सुन ओये. या तू दरवाज़ा खोल वरना मैं अंदर घुसकर ......"

वो बात पूरी करता इससे पहले ही नौकर दरवाज़ा खोल चुका था.

उसके पिछे चलते दोनो घर के अंदर आए.

"बैठिए" नौकर ने उनको बैठने का इशारा किया. वो दोनो बैठे ही थे के अंदर से एक तकरीबन 40 साल की औरत बाहर आई. उसकी शकल देख कर कोई भी कह सकता था के वो 40 की थी पर जिस्म ऐसा के 20 साल की लड़की भी शर्मा जाए.

वो औरत चलती हुई ड्रॉयिंग रूम में आई और ख़ान और शर्मा को ऐसे देखने लगी जैसे याद करने की कोशिश कर रही हो.

"नही हम पहले कभी मिले नही" ख़ान ने उसकी शकल देख कर समझते हुए कहा

"तो फिर माफ़ कीजिएगा मेरी तबीयत कुच्छ आज ठीक....." वो कह ही रही ही के ख़ान बीच में बोल पड़ा

"हां बताया आपके नौकर ने पर हम उस काम से नही आए"

"तो किस काम से आए हैं?" वो औरत वहीं एक कुर्सी पर बैठते हुए बोली

"हम तेज को ढूँढ रहे हैं. ठाकुर तेजविंदर सिंग"

नाम सुनते ही उस औरत का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा. ख़ान को उसे देख कर पूरा यकीन हो चला था के अगर वो पोलीस वाला ना होता तो उस वक़्त धक्के देकर बाहर निकाल दिया जाता.

"और आपको ऐसा क्यूँ लगता है के वो कुत्ता आपको यहाँ मिलेगा?" रेखा गुस्से में बोली

"कुत्ता?" शर्मा फिर बीच में बोला "नही कुत्ता नही, तेज एक आदमी का नाम है"

"चुप रहो" ख़ान ने उसको इशारा किया "देखिए हमको यही बताया गया था के तेज अपना ज़्यादातर वक़्त आपके यहाँ गुज़ारता है"

"है नही था" रेखा बोली "अब अगर वो कमीना यहाँ आया भी तो उसके टुकड़े घर से बाहर जाएँगे"

"ह्म्‍म्म्मम" ख़ान हैरत से बोला "और इतनी नफ़रत की वजह?"

"कोई वजह नही." रेखा गुस्से में लाल होती बोली "बस हमारे यहाँ वहशी कुत्तो का यही हाल करते हैं"

"वहशी कुत्ता, वाउ" ख़ान ने कहा "काफ़ी हैरानी हुई मुझे. मुझे तो लगा था के आपका बहुत बड़ा आशिक़ था"

"आशिक़?" रेखा ऐसे हसी के ख़ान को समझ नही आया के वो हस रही है या उसकी बात पर हस रही है "आशिक़ होता तो ये ना करता"

और फिर रेखा ने वो किया जिसके लिए ना ख़ान तैय्यार था और ना शर्मा. वो अचानक से खड़ी हुई और अपना नाइट गाउन खोल दिया. गाउन के अंदर उसने नीचे एक पाजामा पहेन रखा था पर उपेर से गाउन के नीचे नंगी थी.

ख़ान को एक पल के लिए समझ नही आया के क्या करे. देखे या नज़र घुमा ले. और देखे तो क्या वो देखे जो सामने है या वो देखे जो रेखा दिखाना चाह रही थी.

"कितने बड़े बड़े हैं" शर्मा की आवाज़ आई तो ख़ान का ध्यास सा टूटा और पहली बार उसको वो दिखाई दिया जो रेखा दिखना चाह रही थी.

उसकी चूचियो पर, पेट पर, कंधो पर नीले और रंग के लाल निशान सॉफ दिखाई दे रहे थे.

"साले ने जानवर की तरह मारा था मुझे, ऐसे कि निशान आज तक गये नही जबकि उस बात को हफ़्तो हो गये" वो अपना गाउन फिर से बंद करते हुए बोली

"आपने पोलीस में रिपोर्ट नही लिखाई?" ख़ान ने पुछा

"हां ज़रूर" रेखा ने इस अनडाआज़ में कहा के ख़ान ने फिर इस बात को आगे नही बढ़ाया.

"इस पेपर में मेरा फोन नंबर लिखा हुआ है. अगर वो यहाँ आए या आपसे मिलने की कोशिश करे तो प्लीज़ मुझे फोन कीजिएगा. मोबाइल नंबर है मेरा"

"वो अभी नही आएगा" रेखा बोली "जब तक के उसके चाचा के लड़के को फाँसी नही लग जाती तब तक गायब रहेगा. जब उसके करम की सज़ा उसका चचेरा भाई उठा लेगा और बात ख़तम हो जाएगी, तब आएगा वो"

"उसके करम की सज़ा?" ख़ान ने हैरानी से पुछा

"अर्रे उसने मारा है अपने बाप को. काब्से इस ताक में बैठा था. कई बार बोला मुझे के अपने बाप को एक दिन मैं ही मारूँगा और मौका मिला तो कर भी दिया. और फाँसी लग रही है किसी और को"

उसी शाम वादे के मुताबिल जै ने ख़ान को फोन कर दिया.

"सर बहुत सोचा मैने पर हर किसी को इतना करीब से जानता नही. जितना मैं जानता था उनके बारे मैं आपको ऑलरेडी बता चुका हूँ"

"ओके" ख़ान ने अपना पेन और डाइयरी उठाई. एक पल के लिए उसने जै से ठकुराइन के आक्सिडेंट और पुरुषॉटटम के ठाकुर से बात ना करने के बारे में पुछा पर फिर अपना इरादा बदल दिया.

"बस एक इंसान और है जिसके बारे में मैं आपको बता सकता हूँ." जै बोला

"कौन?"

"कामिनी"

"कामिनी? उसके बारे में क्या?"

"मुझे लगता नही के ये केस से कोई ताल्लुक रखने वाली बात है पर उसका किसी लड़के से चक्कर था या फिर है शायद"

"कौन?" ख़ान ने फ़ौरन पुछा

"ये तो पता नही"

"कभी बात है ये?"

"हाल फिलहाल की बात है सर. और जहाँ तक मेरा ख्याल है चाचा ठाकुर को ये बात पता चल गयी थी जिसको लेकर हवेली में काफ़ी हंगामा भी हुआ था."

"ओके आंड तुम्हें ये बात कैसे पता?"

"कैसी बात कर रहे हो सर. भले हवेली में रहता नही पर हवेली की सारी खबर रखता हूँ मैं. और वैसे भी ऐसी बातें कहाँ च्छुपति हैं"

"यप" ख़ान ने कहा

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --37

gataank se aage........................

"Sounds reasonable" Jai ne sehmati jatayi "Chaddha maan gaya?"

"Haan" Khan bola "Par ek shart par"

"Kaisi shart?"

"Dekho sarkari vakeel hone ke naate vo tumse fees nahi maang sakta par uski shart hai ke agar tum begunah saabit hokar riha ho gaye, toh moti fees deni padegi"

"Kitni?" Jai bola

"Maine paise ki baat nahi ki par jitni bhi ho yaar" Khan bola "Tumhari jaan bach jaaye iske liye bhale kitne bhi paise lagen. Ya paise zyada pyaare hain tumhen?"

"Bachunga hi nahi toh paise ka kya karunga?" Jai hasta hua bola

"Exactly. Toh paise ki baat ham usse baad mein karte rahenge" Jai ne haan mein sar hilaya

"Aur ab kyunki hamare paas zyada waqt nahi hai, toh hamen jo karna hai jaldi karna padega"

"Ok"

"Dekho tumhare case mein ab tak jo hamen thodi bahut badhat mili hai vo tumhari hi batayi hui baaton se mili hai aur jo tum bata sakte ho vo koi aur nahi bata sakta. Thakur ka khoon hua aur aur zaahir si baat hai ki kisi ghar ke aadmi ne hi kiya hai. Toh is khoon ki vajah bhi kahin kisi gharelu maamle mein hi chhupi hai. Main chahta hoon ke tum mujhe apne dimag par zor daalo aur socho ke vajah maujood kis aadmi ke paas khoon karne ki vajah ho sakti

thi. Kuchh bhi, koi purana jhagda, koi karz jise chukane ke liye daulat chahiye ho, vaseeyat se bahar hone ka darr, anything"

"Ok" Jai kisi bachche ki tarah sun raha tha

"Aur jaisa ki maine kaha ke hamare paas zyada waqt nahi hai, ye kaam bhi tumhein jaldi hi karna padega"

"Yeah ok. I can do that. Main haweli mein rehne wale har shaksh ki rag rag se vaakif hoon"

"Good. Tum mujhe sochke batao aur filhal mujhe us call girl ka address do. Aaj shehar aane ki ek vajah usse milna bhi tha"

"oK" Jai ne address batana shuru kiya aur Khan ne likh liya.

"Maine yahan Jail ke warden se baat kar li hai. Achhi jaan pehchan hai meri usse. Maine keh diya hai ke jab bhi tum mujhe phone karna chaho toh tumhein roka na jaaye"

"Ok" Jai khush hota hua bola

"Chalta hoon main" Khan uthkar jaane laga "Phone karna mujhe sochkar"

Jai bhi saath hi uth khada hua. Khan ne usse haath milaya aur Sharma ke saath darwaze ki taraf badha.

"Ek baat batao" Vo jaate jaate palta "Tumse jo milne aayi thi jail mein, vo Kamini thi na?"

Jai ke chehre par ek pal ke liye aasar badle.

"Kyun kya hua? Koi problem ho gayi?"

"Nahi aise hi puchh raha hoon" Khan ne kaha toh Jai ne haan mein sar hilaya.

"Phir aayi vo tumse milne?"

"Nahi usko bhi apne bhai ka darr hai" Jai ne kaha

Vo dono phir darwaze ki taraf badhe toh is baar Sharma palta.

"Ek baat batao dost" Vo Jai se bola "Matlab tum mauka-e-vardaat se range haath pakde gaye, khoon kisi aur ne kiya aur phas tum gaye kyunki tum galat time pe vahan pahunch gaye, tumhare apne gharwale tumhare khilaff hain, sab tumhein phaansi pe tange dekhna chahte hain aur ek hamare Khan sahab ke siwa koi tumhein bachana nahi chahta aur ab koi vakeel bhi tumhare case nahi le raha?"

Jai ne haan mein sar hilaya.

"Is par ek sher yaad aaya sir. Sunaoon?" Sharma bola

Khan ne hairani se uski taraf dekha.

"Aap bhi suniyega, aap hi ki situation pe arz kar raha hoon. Toh arz kiya hai."

Jholi mein jhaant nahi,

Saraay mein dera,

Kutto ne gaand meri,

aur bandaron ne ghera,

ke ham bhi marenge, ham bhi marenge

Uske sher pe Khan zor se has pada aur Jai ki shakal dekhne laayak ho gayi.

Takreeban ek ghante baad Khan aur Sharma Jai ke bataay hue address par pahunche.

"Ghar toh mast banaya hai sir" Sharma saamne bane Bungalow ko dekhte hue bola.

"Thakur jaise aur jaane kitne raiso ka paisa laga hua hai yahan" Kehkar Khan hasne laga.

"Kahiye" Ghanti bajane par ek naukar bahar aaya aur Khan ko police uniform mein dekh kar fauran aise bola jaise roz ki baat ho "Madam ki abhi tabiat theek nahi hai. Baad mein phone karke aana"

Khan aur Sharma ne hairat se ek doosre ka munh dekha.

"Aey saale" Sharma jaldi se bole "Darwaza khol varna teri madam ke saath saath teri tabiat bhi kharab ho jayegi"

"Kaha na kal aana" Naukar phir bola toh is baar Khan bhadak pada

"Sun oye. Ya tu darwaza khol varna main andar ghuskar ......"

Vo baat poori karta isse pehle hi naukar darwaza khol chuka tha.

Uske pichhe chalte dono ghar ke andar aaye.

"Bethiye" Naukar ne uko bethne ka ishara kiya. Vo dono bethe hi the ke andar se ek takreeban 40 saal ki aurat bahar aayi. Uski shakal dekh kar koi bhi keh sakta tha ke vo 40 ki thi par jism aisa ke 20 saal ki ladki bhi sharma jaaye.

Vo aurat chalti hui drawing room mein aayi aur Khan aur Sharma ko aise dekhne lagi jaise yaad karne ki koshish kar rahi ho.

"Nahi ham pehle kabhi mile nahi" Khan ne uski shakal dekh kar samajhte hue kaha

"Toh phir maaf kijiyega meri tabiat kuchh aaj theek....." Vo keh hi rahi hi ke Khan beech mein bol pada

"Haan bataya aapke naukar ne par ham us kaam se nahi aaye"

"Toh kis kaam se aaye hain?" Vo aurat vahin ek kursi par bethte hue boli

"Ham Tej ko dhoondh rahe hain. Thakur Tejvinder Singh"

Naam sunte hi us aurat ka chehra gusse se laal ho utha. Khan ko use dekh kar poora yakeen ho chala tha ke agar vo police wala na hota toh us waqt dhakke dekar bahar nikal diya jaata.

"Aur aapko aisa kyun lagta hai ke vo kutta aapko yahan milega?" Rekha gusse mein boli

"Kutta?" Sharma phir beech mein bola "Nahi kutta nahi, Tej ek aadmi ka naam hai"

"Chup raho" Khan ne usko ishara kiya "Dekhiye hamko yahi bataya gaya tha ke Tej apna zyadatar waqt aapke yahan guzarta hai"

"Hai nahi tha" Rekha boli "Ab agar vo kamina yahan aaya bhi toh uske tukde ghar se bahar jaayenge"

"Hmmmmm" Khan hairat se bola "Aur itni nafrat ki vajah?"

"Koi vajah nahi." Rekha gusse mein laal hoti boli "Bas hamare yahan vehshi kutto ka yahi haal karte hain"

"Vehshi kutta, wow" Khan ne kaha "Kaafi hairani hui mujhe. Mujhe toh laga tha ke aapka bahut bada aashiq tha"

"Aashiq?" Rekha aise hasi ke Khan ko samjh nahi aaya ke vo has rahi hai ya uski baat par has rahi hai "Aashiq hota toh ye na karta"

Aur phir Rekha ne vo kiya jiske liye na Khan taiyyar tha aur na sharma. Vo achanak se khadi hui aur apna night gown khol diya. Gown ke andar usne neeche ek pajama pehen rakha tha par uper se gown ke neeche nangi thi.

Khan ko ek pal ke liye samajh nahi aaya ke kya kare. Dekhe ya nazar ghuma le. Aur dekhe toh kya vo dekhe jo saamne hai ya vo dekhe jo Rekha dikhana chah rahi thi.

"Kitne bade bade hain" Sharma ki aawaz aayi toh Khan ka dhyaas sa toota aur pehli baar usko vo dikhai diya jo Rekha dikhana chah rahi thi.

Uski chhatiyon par, pet par, kandho par neele aur rang ke laal nishan saaf dikhai de rahe the.

"Saale ne janwar ki tarah mara tha mujhe, aise ki nishan aaj tak gaye nahi jabki us baat ko hafto ho gaye" vo apna gown phir se band karte hue boli

"Aapne police mein report nahi likhayi?" Khan ne puchha

"Haan zaroor" Rekha ne is andaaaz mein kaha ke Khan ne phir is baat ko aage nahi badhaya.

"Is paper mein mera phone number likha hua hai. Agar vo yahan aaye ya aapse milne ki koshish kare toh please mujhe phone kijiyega. Mobile number hai mera"

"Vo abhi nahi aayega" Rekha boli "Jab tak ke uske chacha ke ladke ko phaansi nahi lag jaati tab tak gayab rahega. Jab uske karam ki saza uska chachera bhai utha lega aur baat khatam ho jaayegi, tab aayega vo"

"Uske karam ki saza?" Khan ne hairani se puchha

"Arrey usne mara hai apne baap ko. Kabse is taak mein betha tha. Kai baar bola mujhe ke apne baap ko ek din main hi marunga aur mauka mila toh kar bhi diya. Aur phaansi lag rahi hai kisi aur ko"

Usi shaam wade ke mutaabil Jai ne Khan ko phone kar diya.

"Sar bahut socha maine par har kisi ko itna kareeb se janta nahi. Jitna main janta tha unke baare main aapko already bata chuka hoon"

"oK" Khan ne apna pen aur diary uthayi. Ek pal ke liye usne Jai se Thakurain ke accident aur Purushottm ke thakur se baat na karne ke baare mein puchha par phir apna irada badal diya.

"Bas ek insaan aur hai jiske baare mein main aapko bata sakta hoon." Jai bola

"Kaun?"

"Kamini"

"Kamini? Uske baare mein kya?"

"Mujhe lagta nahi ke ye case se koi taalluk rakhne wali baat hai par uska kisi ladke se chakkar tha ya phir hai shayad"

"Kaun?" Khan ne fauran puchha

"Ye toh pata nahi"

"Kabhi baat hai ye?"

"Haal filhal ki baat hai sir. Aurjahan tak mera khyaal hai Chacha Thakur ko ye baat pata chal gayi thi jisko lekar haweli mein kaafi hungama bhi hua tha."

"Ok and tumhein ye baat kaise pata?"

"Kaisi baat kar rahe ho sir. Bhale haweli mein rehta nahi par haweli ki saari khabar rakhta hoon main. Aur vaise bhi aisi baaten kahan chhupti hain"

"Yup" Khan ne kaha

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:25

खूनी हवेली की वासना पार्ट --38

गतान्क से आगे........................

जै से उसने 2 मिनट और इधर उधर की बात की और फिर फोन रख दिया. फोन रख कर उसने एक बार फिर अपनी डाइयरी उठाई और उन लोगों के नाम देखने शुरू किए जिनके सामने कोई इन्फर्मेशन नही थी.

1. सरिता देवी - मोटिव है बदला उस पति से जिसने उन्हें सीढ़ियों से धक्का दिया और ज़िंदगी भर के लिए एक कुर्सी पर बैठा दिया

सवाल - 15 साल पुरानी बात का बदला लेने के लिए अब तक इंतेज़ार क्यूँ जबकि वो सिर्फ़ ठाकुर की चाइ में ज़हर मिलाके कभी भी उसका काम तमाम कर सकती थी.

क्या व्हील चेर पर बैठी बुद्धि कमज़ोर औरत क्या ऐसा कर सकती है?

ठाकुर ने इसको सीढ़ियों से धक्का दिया तो ये बात जै को कैसे नही पता?

2. भूषण - कोई मोटिव नही. एक बुड्ढ़ा जो सारी ज़िंदगी हवेली में ही काम करता रहा. ये अपनी ही मालिक को क्यूँ मारेगा जिसकी गाड़ी चलाकर ये रोज़ी रोटी कमाता था. इसका तो देखा जाए तो नुकसान हुआ. पता नही ठाकुर के बेटे इसको नौकरी पर रखें या ना रखें.

सवाल - कोई नही

3. तेज - सॉलिड वजह है. वसीयत से बाहर हो जाने का डर, बाप से कभी बनी नही, अययाशी की आदत जिससे इसके बाप को सख़्त नफ़रत थी. गौर तलब बात है के ये अपने बाप की जान लेना भी चाहता था.

सवाल - कोई नही क्यूंकी इस पर तो सॉफ तौर पे शक ही शक है.

4. पुरुषोत्तम - वजह ही वजह. माँ का लाड़ला जो अपनी माँ को बहुत चाहता है, बाप से नफ़रत करता है और पिछे कई सालों से बाप से बात तक नही की. दौलत का डर इसको भी हो सकता था क्यूंकी जिस बाप से ये बात नही करता वो इसको वसीयत से निकाल बाहर कर सकता था.

सवाल - कोई सवाल नही. पूरी तरह से शक के घेरे में है.

5. इंदर -- वजह हो सकती है पर अभी तक सामने कुच्छ नही आया है. इसके बारे में पता करना है.

ख़ान ने अपना फोन उठाया और किरण को मिलाया.

"कैसी हो?" ख़ान ने कहा

"बस तुम्हें फोन करने ही वाली थी" दूसरी तरफ से किरण की आवाज़ आई "वैसे अच्छा हुआ के तुमने फोन कर दिया"

"क्यूँ?" ख़ान ने पुछा

"वरना मुझे तो लगने लगा था के मैं ही तुम्हें फोन करती रहती हूँ. तुम करते ही नही"

"यॅ राइट. अच्छा सुनो, इससे पहले के मैं भूल जाऊं, एक काम कर सकती हो?

"क्या?" किरण ने पुछा

"रूपाली का भाई, इंदर, ये शहर में ही कहीं रहता है और कोई बिज़्नेस है इसका. देखो इसके बारे में क्या पता कर सकती हो?"

"शक है इस्पे?" किरण ने पुछा

"आक्च्युयली तो सबसे कम शक इसी पर है. मेरे ख्याल से ये बस वहाँ बेहन से मिलने ही गया था और उसी रात ठाकुर का खून हो गया. पर फिर भी, मैं पता करना चाहता हूँ"

"ओके सर" किरण बोली "गुलाम के लिए कोई और हुकुम?"

"नही बस इतना ही फिलहाल" ख़ान ने कहा "और मैं आपको 10 मिनट में दोबारा फोन करता हूँ"

ख़ान ने फोन रख दिया और फिर वापिस अपनी लिस्ट की तरफ देखा.

6. कुलदीप

इस बार उसने फोन शर्मा को मिलाया. शर्मा की नींद में डूबी हुई आवाज़ आई.

"हां सर"

"इतनी जल्दी सो भी गये?" ख़ान ने पुछा "चलो में कल बात करता हूँ. आराम करो"

"नही बताइए. अब तो आँख खुल ही गयी" शर्मा बोला

"कुलदीप के बारे में क्या बता सकते हो?"

"क्या सर. इतनी रात को आपको ये सब सूझ रहा है. सो जाओ"

"बताओगे?" ख़ान ने ज़िद भरी आवाज़ में कहा

"ज़्यादा कुच्छ नही सर" शर्मा बोला "वो बहुत छ्होटा था जब उसको लंडन भेज दिया गया था. उस वक़्त पुरुषोत्तम भी लंडन में ही था इसलिए वो अपने भाई के साथ रहा. बाद में पुरुषोत्तम वापिस आ गया पर कुलदीप पढ़ाई पूरी करने के लिए वहीं रुका रहा. आजकल छुट्टियो में आया हुआ है"

"और कुच्छ?" ख़ान ने पुछा "नही सर, इससे ज़्यादा कुच्छ नही"

"ओके सो जाओ" कहते हुए ख़ान ने फोन रख दिया.

अब भी लिस्ट में कई नाम थे जिनके बारे में ख़ान को अब भी पता करना था. और कई सवाल थे जिनके जवाब अब भी गुम थे.

उस रात उसको फोन किस लड़की ने किया था जिसके कहने पर वो हवेली आया था.

ठाकुर के साथ मरने की रात सोई कौन थी? क्या बिंदिया ही थी या कोई और भी हो सकती थी?

अगर बिंदिया नही थी तो क्या वो औरत जिसने फोन किया और क्या सोने वाली औरत एक ही थी?

ख़ान ने एक झटके में अपनी डाइयरी को बंद किया और एक तरफ फेंक दिया. सोच सोच कर उसके सर में दर्द होने लगा था.

तभी फोन एक बार फिर बज उठा. नंबर शर्मा का था.

"तुम तो सो रहे थे?"

"ख़ान ने सवाल किया"

"हां पर आपने जगाया तो आँख खुल गयी. एक बात ध्यान आई जो शायद आपको पता ना हो तो मैने सोचा के आपको बताऊं"

"हां कहो" ख़ान बोला

"आपको पता है के ठाकुर की बहू रूपाली पर रेप अटेंप्ट हो चुका है?"

"अच्छा? कब?"

"बचपन में, जब वो शायद 16-17 की थी"

"किसने किया था?"

"उनके घर के नौकर ने"

"फिर?"

"फिर वो चिल्लाई और उसका बाप वहाँ आ गया. उसने नौकर को वहीं गोली मार दी. उनके घर की एक नौकरानी भी थी जो इसमें मिली हुई थी. रूपाली के बाप ने उस नौकरानी को भी गोली मारी पर वो बच गयी"

"और ये सब तुम्हें कैसे पता?"

"पोलीस वाला हूँ सर. ऐसी बातें तो मुझे पता होगी ही. वैसे भी जब ये हुआ था तो काफ़ी उड़ी थी ये बात"

"ओके" ख़ान सुनता रहा

"लोग तो कहते थे के रेप नही हुआ था, रूपाली खुद ही लगी हुई थी बुड्ढे नौकर के साथ. बाप बीच में आ गया तो उसे लगा के रेप हो रहा है इसलिए उसने नौकर को गोली मार दी"

"इसलिए उसको सब लूस कॅरक्टर समझते हैं?"

"हां" शर्मा हस्ता हुआ बोला

दरवाज़े पर दस्तक हुई तो ख़ान की आँख खुली. घड़ी की तरफ देखा तो सुबह के 6 बजे रहे थे.

"इतनी सुबह किस मनहूस को मुसीबत आ गयी?" ख़ान दिल ही दिल में बोला और उठकर दरवाज़े की तरफ बढ़ा. दरवाज़े पर फिर दस्तक हुई.

"आ रहा हूँ"वो चिढ़ता हुआ बोला और जाकर दरवाज़ा खोला. बाहर शर्मा खड़ा था.

"तुम? इतनी सुबह?"

"हां सर. आप यकीन नही करोगे के क्या देख कर आ रहा हूँ" कहता हुआ शर्मा बिना ख़ान के बुलाने का इंतेज़ार करता हुआ अंदर आ गया.

ख़ान ने उसपर एक नज़र डाली. शर्मा ने एक ढीली सी टी-शर्ट, एक खाकी रंग की हाफ रंग और नीचे पोलीस वाले पी.टी. शूज पहेन रखे थे.

"दौड़ने जा रहे हो या दौड़के आ रहे हो?" उसने पुछ और किचेन की तरफ बढ़ा.

"सर सुबह निकला तो दौड़ने ही था पर कुच्छ ऐसा दिख गया के आज दौड़ना कॅन्सल" शर्मा उतावला होते हुए बोला. वो जैसे ख़ान को कोई बात बताने को मरा जा रहा था.

"ऐसा क्या देख लिया" ख़ान ने स्टोव पर चाइ चढ़ाते हुए बोला.

शर्मा ने बताना शुरू किया.

शर्मा की पुरानी आदत थी के वो हर सुबह कम से कम 5 किलोमीटर दौड़ कर आता था. मोटे पेट से उसको सख़्त नफ़रत थी इसलिए वो पूरी कोशिश करता था के किसी भी हाल में उसका पेट ना निकले और इसी के चलते, बचपन से ही उसको रोज़ाना सुबह दौड़ने की आदत थी.

उस दिन भी सुबह वो हर रोज़ की तरह घर से निकला और दौड़ता हुआ गाओं से बाहर खेतों की तरफ आ गया. सुबह की हल्की हल्की लाली आसमान पर फेल रही थी पर अंधेरा पूरी तरह हटा नही था. ख़ान दौड़ता हुआ आदत के मुताबकी नहर की तरफ चला जहाँ पहुँच कर वो थोड़ी देर रुकता था और फिर गाओं की तरफ दौड़ना शुरू कर देता था. पर आज कुच्छ ऐसा हुआ जो पहले कभी भी नही हुआ था.

कुच्छ आगे बढ़ने पर खेतों के बीचे बनी कच्ची पगडंडी पर ख़ान को अपने आगे एक साया चलता हुआ महसूस हुआ. सुबह की हल्की रोशनी में वो साया सॉफ नज़र नही आ रहा था पर इतना पता चल गया था के कोई बंदा ही है जो उसकी तरफ सुबह सुबह दौड़ रहा है.

"कमाल है" शर्मा ने दिल ही दिल में सोचा "मेरी तरह और ये शौक किसे चढ़ गया"

वो अभी सोच ही रहा था के अचानक उसको एहसास हुआ के वो साया अकेला नही है. उससे थोड़ा सा आगे एक लड़की एक पेड़ के पिछे खड़ी थी जो उस साए को देखते ही पेड़ के पिछे से निकल कर उस आदमी की तरफ बढ़ी.

"एक मिनट एक मिनट" ख़ान ने शर्मा को टोका "इतनी सुबह सुबह गाओं से बाहर खेतों में एक लड़की? जहाँ तक मैने सुना है के गाओं से कोई भी लड़की अंधेरा होने के बाद या सुबह को रोशनी फेल जाने तक गाओं से बाहर नही निकलती?"

"इसी बात की तो हैरानी मुझे भी हुई सर. अब आयेज सुनिए" कहकर शर्मा आगे बताने लगा.

अचानक उस लड़की के यूँ आ जाने से शर्मा अपनी जगह रुक कर खड़ा हो गया. वो उनसे ख़ासी दूरी पर था और हल्का हल्का अंधेरा अब भी फेला हुआ था जिससे वो आदमी और लड़की शर्मा को नही देख सकते थे पर फिर भी वो कुच्छ सोच कर सड़क के किनारे होकर च्छूप सा गया.

"च्छूपे क्यूँ?" ख़ान ने फिर पुछा

"अर्रे सर इतनी सुबह अंधेरे में लड़का लड़की गाओं से बाहर मिले तो क्या लगता आपको?"

"के उन दोनो का चक्कर चल रहा है" ख़ान ने कहा

"हां तो मुझे भी यही लगा और मैं देखना चाहता था के कौन है लड़का लड़की इसलिए ज़रा च्छूप कर देखने लगा ताकि वो मुझे देख कर घबराए नही"

"कौन थे वो दोनो?" ख़ान ने फ़ौरन पुछा. जिस तरह से शर्मा बता रहा था उससे सॉफ ज़ाहिर था के लड़का लड़की कोई ऐसे थे जिनको ख़ान जानता था.

"अर्रे पूरी बात तो सुनिए" शर्मा ने फिर बताना शुरू किया.

शर्मा चुप चाप खड़ा उस लड़के और लड़की को देखता रहा. इतनी दूर से हल्के अंधेरे में नज़र नही आ रहा था के कौन हैं पर लड़की ने एक सलवार कमीज़ और लड़के ने हाफ पेंट, टीशर्ट और स्पोर्ट्स शूज पहने हुए थे.

वो दोनो खड़े हुए कोई बात कर रहे थे और उनके बात करने के तरीके से सॉफ ज़ाहिर था के वो बात कम, बहस ज़्यादा कर रहे थे.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --38

gataank se aage........................

Jai se usne 2 min aur idhar udhar ki baat ki aur phir phone rakh diya. Phone rakh kar usne ek baar phir apni diary uthayi aur un logon ke naam dekhne shuru kiye jine saamne koi information nahi thi.

1. Sarita Devi - Motive hai badla us pati se jisne unhen sidhiyon se dhakka diya aur zindagi bhar ke liye ek kursi par betha diya

Sawal - 15 saal purani baat ka badla lene ke liye ab tak intezaar kyun jabki Vo sirf thakur ki chaai mein zahar milake kabhi bhi uska kaam tamam kar sakti thi.

Kya wheel chair par bethi buddhi kamzor aurat kya aisa kar sakti hai?

Thakur ne isko sidhiyon se dhakka diya toh ye baat Jai ko kaise nahi pata?

2. Bhushan - Koi motive nahi. Ek buddha jo saari zindagi haweli mein hi kaam karta raha. Ye apni hi maalik ko kyun marega jiski gaadi chalakar ye rozi roti kamata tha. Iska toh dekha jaaye toh nuksaan hua. Pata nahi Thakur ke bete isko naukri par rakhen ya na rakhen.

Sawal - Koi Nahi

3. Tej - Solid vajah hai. Vaseeyat se bahar ho jaane ka darr, baap se kabhi bani nahi, ayyashi ki aadat jisse iske baap ko sakht nafrat thi. Gaur talab baat hai ke ye apne baap ki jaan lena bhi chahta tha.

Sawal - Koi nahi kyunki is par toh saaf taur pe shak hi shak hai.

4. Purushottam - Vajah hi vajah. Maan ka laadla jo apni maan ko bahut chahta hai, baap se nafrat karta hai aur pichhe kai saalon se baap se baat tak nahi ki. Daulat ka darr isko bhi ho sakta tha kyunki jis baap se ye baat nahi karta vo isko vaseeyat se nikal bahar kar sakta tha.

Sawal - Koi sawl nahi. Poori tarah se shak ke ghere mein hai.

5. Inder -- Vajah ho sakti hai par abhi tak saamne kuchh nahi aaya hai. Iske baare mein pata karna hai.

Khan ne apna phone uthaya aur Kiran ko milaya.

"Kaisi ho?" Khan ne kaha

"Bas tumhein phone karne hi wali thi" Doosri taraf se Kiran ki aawaz aayi "Vaise achha hua ke tumne phone kar diya"

"Kyun?" Khan ne puchha

"Varna mujhe toh lagne laga tha ke main hi tumhein phone karti rehti hoon. Tum karte hi nahi"

"Yeah right. Achha suno, isse pehle ke main bhool jaaoon, ek kaam kar sakti ho?

"Kya?" Kiran ne puchha

"Rupali ka bhai, Inder, ye shehar mein hi kahin rehta hai aur koi business hai iska. Dekho iske baare mein kya pata kar sakti ho?"

"Shak hai ispe?" Kiran ne puchha

"Actually toh sabse kam shak isi par hai. Mere khyaal se ye bas vahan behan se milne hi gaya tha aur usi raat Thakur ka khoon ho gaya. Par phir bhi, main pata karna chahta hoon"

"Ok sir" Kiran boli "Ghulam ke liye koi aur hukum?"

"Nahi bas itna hi filhal" Khan ne kaha "Aur main aapko 10 min mein dobara phone karta hoon"

Khan ne phone rakh diya aur phir vaapis apni list ki taraf dekha.

6. Kuldeep

Is baar usne phone Sharma ko milaya. Sharma ki neend mein doobi hui aawaz aayi.

"Haan sir"

"Itni jaldi so bhi gaye?" Khan ne puchha "Chalo mein kal baat karta hoon. Aaram karo"

"Nahi bataiye. Ab toh aankh khul hi gayi" Sharma bola

"Kuldeep ke baare mein kya bata sakte ho?"

"Kya sir. Itni raat ko aapko ye sab soojh raha hai. So jao"

"Bataoge?" Khan ne zid bhari aawaz mein kaha

"Zyada kuchh nahi sir" Sharma bola "vo bahut chhota tha jab usko london bhej diya gaya tha. Us waqt Purushottam bhi london mein hi tha isliye vo apne bhai ke saath raha. Baad mein Purushottam vaapis aa gaya par Kuldeep padhai poori karne ke liye vahin ruka raha. Aajkal chhuttiyon mein aaya hua hai"

"Aur kuchh?" Khan ne puchha "Nahi sir, isse zyada kuchh nahi"

"Ok so jao" Kehte hue Khan ne phone rakh diya.

Ab bhi list mein kai naam the jinke baare mein Khan ko ab bhi pata karna tha. Aur kai sawal the jinke jawab ab bhi gum the.

Us raat usko phone kis ladki ne kiya tha jiske kehne par vo haweli aaya tha.

Thakur ke saath marne ki raat soyi kaun thi? Kya Bindiya hi thi ya koi aur bhi ho sakti thi?

Agar Bindiya nahi thi toh kya vo aurat jisne phone kiya aur kya sone wali aurat ek hi thi?

Khan ne ek jhatke mein apni diary ko band kiya aur ek taraf phenk diya. Soch soch kar uske sar mein dard hone laga tha.

Tabhi phone ek baar phir baj utha. Number Sharama ka tha.

"Tum toh so rahe the?"

"Khan ne sawal kiya"

"Haan par aapne jagaya toh aankh khul gayi. Ek baat dhyaan aayi jo shayad aapko pata na ho toh maine socha ke aapko bataoon"

"Haan kaho" Khan bola

"Aapko pata hai ke Thakur ki bahu Rupali par rape attempt ho chuka hai?"

"Achha? Kab?"

"Bachpan mein, jab vo shayad 16-17 ki thi"

"Kisne kiya tha?"

"Unke ghar ke naukar ne"

"Phir?"

"Phir vo chillayi aur uska baap vahan aa gaya. Usne naukar ko vahin goli maar di. Unke ghar ki ek naukrani bhi thi jo ismein mili hui thi. Rupali ke baap ne us naukrani ko bhi goli maari par vo bach gayi"

"Aur ye sab tumhein kaise pata?"

"Policewala hoon sir. Aisi baaten toh mujhe pata hoga hi. Vaise bhi jab ye hua tha toh kaafi udi thi ye baat"

"Ok" Khan sunta raha

"Log toh kehte the ke rape nahi hua tha, Rupali khud hi lagi hui thi buddhe naukar ke saath. Baap beech mein aa gaya toh use laga ke rape ho raha hai isliye usne naukar ko goli maar di"

"Isliye usko sab loose character samajhte hain?"

"Haan" Sharma hasta hua bola

Darwaze par dastak hui toh Khan ki aankh khuli. Ghadi ki taraf dekha toh subah ke 6 baje rahe the.

"Itni subah kis manhoos ko museebat aa gayi?" Khan dil hi dil mein bola aur uthkar darwaze ki taraf badha. Darwaze par phir dastak hui.

"Aa raha hoon"vo chidhta hua bola aur jakar darwaza khola. Bahar Sharma khada tha.

"Tum? Itni subah?"

"Haan sir. Aap yakeen nahi karoge ke kya dekh kar aa raha hoon" Kehta hua Sharma bina Khan ke bulane ka intezaar karta hua andar aa gaya.

Khan ne uspar ek nazar daali. Sharma ne ek dheeli si T-Shirt, ek khaaki rang ki half rang aur neeche police wale P.T. shoes pahen rakhe the.

"Daudne ja rahe ho ya daudke aa rahe ho?" Usne puchh aur kitche ki taraf badha.

"Sir subah nikla toh daudne hi tha par kuchh aisa dikh gaya ke aaj daudna cancel" Sharma utawla hote hue bola. Vo jaise Khan ko koi baat batane ko mara ja raha tha.

"Aisa kya dekh liya" Khan ne stove par chaai chadhate hue bola.

Sharma ne batana shuru kiya.

Sharma ki purani aadat thi ke vo har subah kam se kam 5 kilometre daud kar aata tha. Mote pet se usko sakht nafrat thi isliye vo poori koshish karta tha ke kisi bhi haal mein uska pet na nikle aur isi ke chalte, bachpan se hi usko rozana subah daudne ki aadat thi.

Us din bhi subah vo har roz ki tarah ghar se nikla aur daudta hua gaon se bahar kheton ki taraf aa gaya. Subah ki halki halki laali aasman par phel rahi thi par andhera poori tarah hata nahi tha. Khan daudta hua aadat ke mutaabki nehar ki taraf chala jahan pahunch kar vo thodi der rukta tha aur phir gaon ki taraf daudna shuru kar deta tha. Par aaj kuchh aisa hua jo pehle kabhi bhi nahi hua tha.

Kuchh aage badhne par kheton ke beeche bani kachchi pagdandi par Khan ko apne aage ek saya chalta hua mehsoos hua. Subah ki halki roshni mein vo saya saaf nazar nahi aa raha tha par itna pata chal gaya tha ke koi banda hi hai jo uski taraf subah subah daud raha hai.

"Kamal hai" Sharma ne dil hi dil mein socha "Meri tarah aur ye shauk kise chadh gaya"

Vo abhi soch hi raha tha ke achanak usko ehsaas hua ke vo saya akela nahi hai. Usse thoda sa aage ek ladki ek ped ke pichhe khadi thi jo us saaye ko dekhte hi ped ke pichhe se nikal kar us aadmi ki taraf badhi.

"Ek min ek min" Khan ne sharma ko toka "Itni subah subah gaon se bahar kheton mein ek ladki? Jahan tak maine suna hai ke gaon se koi bhi ladki andhera hone ke baad ya subah ko roshni phel jaane tak gaon se bahar nahi nikalti?"

"Isi baat ki toh harirani mujhe bhi hui sir. Ab aage suniye" Kehkar Sharma aage batane laga.

Achanak us ladki ke yun aa jaane se Sharma apni jagah ruk kar khada ho gaya. Vo unse khaasi doori par tha aur halka halka andhera ab bhi phela hua tha jisse vo aadmi aur ladki Sharma ko nahi dekh sakte the par phir bhi vo kuchh soch kar sadak ke kinare hokar chhup sa gaya.

"Chhupe kyun?" Khan ne phir puchha

"Arrey sir itni subah andhere mein ladka ladki gaon se bahar mile toh kya lagta aapko?"

"Ke un dono ka chakkar chal raha hai" Khan ne kaha

"Haan toh mujhe bhi yahi laga aur main dekhna chahta tha ke kaun hai ladka ladki isliye zara chhup kar dekhne laga taaki vo mujhe dekh kar ghabraye nahi"

"Kaun the vo dono?" Khan ne fauran puchha. Jis tarah se Sharma bata raha tha usse saaf zaahir tha ke ladka ladki koi aise the jinko Khan janta tha.

"Arrey poori baat toh suniye" Sharma ne phir batana shuru kiya.

Sharma chup chap khada us ladke aur ladki ko dekhta raha. Itni door se halke andhere mein nazar nahi aa raha tha ke kaun hain par ladki ne ek salwar kameez aur ladke ne half pent, tshirt aur sports shoes pehne hue the.

Vo dono khade hue koi baat kar rahe the aur unke baat karne ke tarike se saaf zaahir tha ke vo baat kam, behas zyada kar rahe the.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:26

खूनी हवेली की वासना पार्ट --39

गतान्क से आगे........................

कुच्छ देर तक दोनो यूँ ही बात करते रहे जिसका एक शब्द भी शर्मा को सुनाई नही पड़ा. फिर उस लड़के ने लड़की को कहा जिस बात पर लड़की पावं पटकती चल दी और लड़के ने फ़ौरन उसका हाथ पकड़कर अपनी तरफ खींचा और अपने गले लगा लिया.

और तब शर्मा को उन दोनो की शकलें नज़र आई और उसके पैरों के नीचे से जैसे ज़मीन खिसक गयी.

"कौन थे दोनो?" ख़ान ने भी फ़ौरन पुछा

"लड़की तो पायल थी सिर, बिंदिया के बेटी" ख़ान ने कहा

"और लड़का?"

"सुनते रहो" शर्मा मुस्कुराता हुआ बोला और कहानी आगे बताने लगा.

वो लड़का पायल को कुच्छ देर तक यूँ ही अपनी बाहों में लिए खड़ा रहा. फिर वो दोनो रास्ते से हट कर खेतों के अंदर की तरफ चल पड़े. शर्मा अच्छी तरह जानता था के यूँ मुँह अंधेरे सुबह सुबह खेतों के अंदर वो दोनो क्या करने वाले थे इसलिए वो भी चुप चाप उनके पिछे चल दिया.

कुच्छ दूर आगे जाकर झाड़ियों के बीच वो दोनो रुक गये और उनसे थोड़े से फ़ासले पर एक पेड़ के पिछे छुपा शर्मा दोनो को देखने लगा.

पायल ने अपनी चुन्नी अपने गले से निकाली और नीचे ज़मीन पर बिच्छा दी. इसपर लड़के ने उसको कुच्छ कहा और चुन्नी फिर से उठा कर समेत कर एक तरफ रख दी और और फिर से पायल को अपनी तरफ खींच लिया.

कुच्छ देर वो यूँ ही खड़े रहे. शर्मा को लगा के वो अब भी बस गले लगे हुए हैं पर फिर थोड़ी देर ध्यान से देखने पर पता चला के वो एक दूसरे के होंठ चूम रहे थे. लड़के का एक हाथ लड़की की छाती पर था जिन्हें वो हल्के हल्के से दबा रहा था और पायल को चूम रहा था.

कुच्छ देर तक ऐसा करने के बाद उसने पायल को अपने से अलग किया और उसकी कमीज़ उपेर उठाने लगा.

पायल ने फ़ौरन इनकार किया और जिस तरह से उसने इशारा करते हुए उससे शर्मा समझ गया के वो कह रही थी के इतने खुल्ले में कपड़े उतारना ठीक नही, कोई भी आ सकता है. लड़के को उसकी बात शायद समझ आ गयी इसलिए उसने भी ज़्यादा ज़िद नही की पर ऐसा कुच्छ कहा जिससे पायल शरमाती हुई फिर उसके करीब आ गयी और अपने सीने पर से हाथ हटा लिए.

वो लड़का फिर से उसके करीब आया और इस बात कमीज़ उतारने के बजाय उठाकर पायल की चूचियो के उपेर कर दी और झुक कर उन्हें चूसने लगा.

"हाए री किस्मेत" शर्मा ने दिल ही दिल में सोचा "सुबह सुबह दूध लेने तो सब जाते हैं पर ऐसा दूध सबके नसीब में कहाँ"

कुच्छ देर तक पायल की चूचियो को चूसने के बाद वो लड़का हटा तो पायल ने फ़ौरन अपनी कमीज़ नीचे कर ली. लड़के ने मुस्कुराते हुए अपनी हाफ पेंट की ज़िप खोली और अपना लंड बाहर निकाला.

शर्मा को अब भी उनकी बातें सुनाई नही दे रही थी पर इतना समझ आ गया था के लड़का पायल को लंड चूसने को कह रहा था और वो मना कर रही थी.

थोड़ी देर तक वो लड़का उसको मनाने की कोशिश करता रहा पर वो नही मानी. फिर पायल ने आस पास चारो तरफ एक नज़र घुमाई और अपनी सलवार का नाडा खोलने लगी.

उसकी कमीज़ अब उपेर उठी हुई नही थी इसलिए जब उसने सलवार खोलकर थोड़ी सी नीचे सर्काई तो शर्मा को नज़र कुच्छ नही आया. पायल के पीठ उसकी तरफ थी इसलिए वो पिछे से देख कर सिर्फ़ अंदाज़ा ही लगा पा रहा था के वो अपनी सलवार थोड़ी सी नीचे सरका कर उसको पकड़े खड़ी है ताकि पूरी नीचे ना गिर जाए.

वो लड़का खड़े खड़े ही पायल के बिल्कुल नज़दीक आया. कद में वो उससे लंबा था इसलिए ज़रा सा झुका और पायल से सॅट गया. पायल ने भी अपनी बाहें लड़के के गले में डाल दी और लड़के ने उसको कमर से पकड़ कर हिलाना शुरू कर दिया.

वो दोनो ऐसे खड़े थे जैसे एक दूसरे से गले मिल रहे हों बस फरक सिर्फ़ इतना था के लड़के ने अपने घुटने मोड हुए थे ताकि अपना कद पायल के कद से मिला सके और दोनो लगातार हिल रहे थे.

पायल के पीठ शर्मा की तरफ थी और उसे ये समझ नही आ रहा था के वो लड़का पायल को चोद रहा था या यूँ ही उपेर उपेर से लंड उसकी चूत पर रगड़ रहा था.

इतनी देर से शर्मा ने देखा सब था पर पायल के नंगे शरीर की एक झलक भी उसको नही मिली थी. वो दिल ही दिल में सोच रहा था के भगवान कुच्छ तो दिखा दे और जैसे उसके दिल की बात सुन ली गयी. लड़के ने अपने हाथ पायल की कमर से नीच को सरकाए, उसके कमीज़ के पल्लू को पिछे से पकड़ कर उपेर उठाया और पायल की गांद शर्मा की आँखों के आगे नंगी हो गयी.

वो आँखें फाडे वो नज़ारा देख रहा था. पायल के पूरे शरीर का बस वो ही हिस्सा था जो नंगा था. उपेर जिस्म पर कमीज़ और जाँघो के नीचे सलवार. नंगी थी तो बस उसकी भरी भरी गांद जिसपर वो लड़का हाथ फिराता हुआ हिल रहा था.

"बस बस बस" ख़ान ने उसको टोका "सुबह सुबह का वक़्त है, उपेर वाले का नाम ले. खुद तो अपनी सुबह पता नही क्या देख के आ रहा है और उपेर से मेरे दिमाग़ में भी वाहियात बातें डाल रहा है"

"अर्रे सर ...." शर्मा के हाथ अब भी फेले हुए थे जिनसे वो पायल की गांद का साइज़ बताना चाह रहा था.

"सब छ्चोड़. ये बता के लड़का कौन था उसके साथ ........" इससे पहले के वो आगे कुच्छ कहता, ख़ान ने बात काट दी.

"गेस करो सर" शर्मा बोला

"एक तो सुबह सुबह मेरी नींद खराब कर दी" ख़ान चाइ स्टोव से उतारता हुआ बोल "अब उपेर से पहेलियाँ बुझा रहा है, सीधे सीधे बता ना"

"कुलदीप सर" शर्मा ने राज़ बताने के से अंदाज़ में कहा.

ख़ान ने हाथ से चाइ का कप गिरते गिरते बचा.

"क्या बात कर रहा है. आर यू शुवर?"

"हां सर" शर्मा बोला "वही था"

"ह्म्‍म्म" ख़ान ने चाइ का एक कप शर्मा के हाथ में दिया और दोनो वहीं चेर पर बैठ गये "दिस ईज़ इंट्रेस्टिंग"

"वो कैसे?"

"इस बात से 2 लोग पूरी तारह शक के घेरे में आ जाते हैं"

"पायल और कुलदीप?"

"हां" शर्मा ने कहा "देख अगर वो दोनो एक दूसरे से सच में प्यार करते हैं और शादी वगेरह का प्लान है तो ज़ाहिर सी बात है के ठाकुर इसके खिलाफ रहा होगा, शायद उसको पता भी चल गया हो जिसके चलते इनमें से एक ने काम कर दिया हो"

'बात तो सही है सर, पर अगर यूँ ही टाइम पास के लिए पायल को बजा रहा हो?"

"तब कहानी थोड़ी सी अलग होगी. वो ज़ाहिर सी बात है के पायल को तो बताएगा नही के टाइम पास कर रहा है. वो तो यही सोचेगी के वो उससे प्यार करता है और दौलत का सपना देखती होगी. जब उसको लगा होगा के ठाकुर बीच

में आ रहा है, तब उसने कर दिया होगा काम"

"पर सर आप ये भी तो सोचो के पायल तो ऑलरेडी वसीयत में शामिल है, वो ऐसा क्यूँ करने लगी" शर्मा ने कहा

"गुड पॉइंट पर ये तब जबकि पायल को पता हो के वो वसीयत में शामिल है. एक काम कर, आज थाने बुला ले उसको. बात करते हैं" ख़ान ने कहा

"कितने बजे तक बुलाऊं?"

"बुला ले 11 बजे के करीब"

"वैसे कमाल की बात है ना सर" जाते जाते शर्मा ने कहा "कल ही आपने मुझे कहा था के इस कुलदीप के बारे में कुच्छ पता लगाऊं और आज ही ये जैसे खुद मेरी झोली में आ गिरा"

"हां सो तो है पर फिर भी नज़र रख इस पर. और एक काम और कर, ठाकुर साहब की बड़े बेटे के बारे में ज़रा कुच्छ पता कर"

"पुरुषोत्तम?"

"हां"

"उस नाल्ले के बारे में क्या पता करना है?"

"नल्ला?" ख़ान ने हैरानी से पुछा

"हां. खड़ा नही होता उसका" शर्मा ने ऐसा कहा जैसे बहुत पेट की बात बता रहा हो.

"उसका खड़ा होता है या नही इससे कोई मतलब नही मुझे. अपनी भैंस या घोड़ी नही चुदवानी मैने उससे. खून की रात वो भी हवेली में ही था और पूरे पूरे चान्स हैं के ये काम उसी ने कर दिया हो"

"एग्ज़ॅक्ट्ली क्या मालूम करना है?" शर्मा ने सर खुजाते हुए पुछा

"पता कर के किससे मिलता है, किनके साथ उतना बैठना है, कहीं क़र्ज़ वगेरह में तो नही फसा हुआ"

"सर अगर वो क़र्ज़ में फसा होता ...." शर्मा ने कहना शुरू किया ही था के बीच में ख़ान ने टोक दिया

"यार तू मेरे कहने पे पता करेगा ज़रा?"

"येस सर" शर्मा ने कहा "वैसे एक बात और कहूँ सर?"

"हां बोल"

"आप एक आदमी को अपने शक के घेरे से निकाल रहे हो"

"किसे" ख़ान ने पुछा

"जै को" शर्मा ने समझाते हुए कहा "ऐसा भी तो हो सकता है के मारा उसने ही हो और हम फ़िज़ूल में भाग दौड़ कर रहे हों"

"हां हो सकता है" ख़ान ने मुस्कुराते हुए कहा "पर फिर ठीक है ना. ऐसा हुआ तो हम एक खूनी को एक खूनी ही साबित करेंगे"

"पर वो तो ऑलरेडी अंदर है सर"

"अर्रे मेरे भाई तू मेरे कहने पे कर दे ये सब. मेरे दिल की तसल्ली हो जाएगी के जै निर्दोष नही था और सज़ा सही आदमी को हुई"

"ओके सर" कहता हुआ शर्मा दरवाज़ा खोल कर बाहर निकल गया.

तैय्यार होकर ख़ान पोलीस स्टेशन जाने के लिए घर से निकल ही रहा था के सेल बजा. मेसेज आया था. उसने सेल उठाकर देखा.

किरण का मेसेज था. उससे उसने आज सुबह से कोई बात नही की थी वरना अब तो ये रुटीन हो गया था के वो सुबह उठते ही सबसे पहले किरण को फोन घुमाता था.

मेसेज में एक शेर था.

"कुच्छ तबीयत ही मिली थी ऐसी,

के सुकून से जीने की सूरत ना हुई,

जिसे चाहा उसको अपना ना सके,

जो मिला उससे मोहब्बत ना हुई"

ख़ान शेर पढ़कर मुस्कुरा उठा. उसने दो पल सोचा और जवाब दिया.

मेरे लब की हसी तेरे होंठो से निकले,

तेरे गम का दायरा मेरी आँखों से निकले.

खुशी तेरे दर से ना जाए कहीं,

दुआ यही हरदम मेरे दिल से निकले.

तेरे आँखों में अश्क़ जो आ जाए कभी,

तो साथ ही खबर मेरे मरने की निकले.

आरज़ू थी के तेरी बाहों में दम निकले,

कसूर तेरा नही, बदनसीब हम निकले.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --39

gataank se aage........................

Kuchh der tak dono yun hi baat karte rahe jiska ek shabd bhi Sharma ko sunai nahi pada. Phir us ladke ne ladki ko kaha jis baat par ladki paon patakti chal di aur ladke ne fauran uska haath pakadkar apni taraf khincha aur apne gale laga liya.

Aur tab Sharma ko un dono ki shaklen nazar aayi aur uske pairon ke neeche se jaise zameen khisak gayi.

"Kaun the dono?" Khan ne bhi fauran puchha

"Ladka toh Payal thi sir, Bindiya ke beti" Khan ne kaha

"Aur ladka?"

"Sunte raho" Sharma muskurata hua bola aur kahani aage batane laga.

Vo ladka Payal ko kuchh der tak yun hi apni baahon mein liye khada raha. Phir vo dono raaste se hat kar kheton ke andar ki taraf chal pade. Sharma achhi tarah jaanta tha ke yun munh andhere subah subah kheton ke andar vo dono kya karne wale the isliye vo bhi chup chap unke pichhe chal diya.

Kuchh door aage jakar jhaadiyon ke beech vo dono ruk gaye aur unse thode se faasle par ek ped ke pichhe chhupa Sharma dono ko dekhne laga.

Payal ne apni chunni apne gale se nikali aur neeche zameen par bichha di. Ispar ladke ne usko kuchh kaha aur chunni phir se utha kar samet kar ek taraf rakh di aur aur phir se Payal ko apni taraf khinch liya.

Kuchh der vo yun hi khade rahe. Sharma ko laga ke vo ab bhi bas gale lage hue hain par phir thodi der dhyaan se dekhne par pata chala ke vo ek doosre ke honth choom rahe the. Ladke ka ek haath ladki ki chhati par tha jinhen vo halke halke se daba raha tha aur Payal ko choom raha tha.

Kuchh der tak aisa karne ke baad usne Payal ko apne se alag kiya aur uski kameez uper uthane laga.

Payal ne fauran inkaar kiya aur jis tarah se usne ishara karte hue usse Sharma samajh gaya ke vo keh rahi thi ke itne khulle mein kapde utarna thek nahi, koi bhi aa sakta hai. Ladke ko uski baat shayad samajh aa gayi isliye usne bhi zyada zid nahi ki par aisa kuchh kaha jisse Payal sharmati hui phir uske kareeb aa gayi aur apne seene par se haath hata liye.

Vo ladka phir se uske kareeb aaya aur is baat kameez utarne ke bajaay uthakar Payal ki chhatiyon ke uper kar di aur jhuk kar unhen choosne laga.

"Haaye ri kismet" Sharma ne dil hi dil mein socha "Suabh subah doodh lene toh sab jaate hain par aisa doodh sabke naseeb mein kahan"

Kuchh der tak Payal ki chhatiyon ko choosne ke baad vo ladka hata toh Payal ne fauran apni kameez neeche kar li. Ladke ne muskurate hue apni half pent ki zip kholi aur apna lund bahar nikala.

Sharma ko ab bhi unki baaten sunai nahi de rahi thi par itna samajh aa gaya tha ke ladka Payal ko lund choosne ko keh raha tha aur vo mana kar rahi thi.

Thodi der tak vo ladka usko manane ki koshish karta raha par vo nahi maani. Phir Payal ne aas paas chaaro taraf ek nazar ghumayi aur apni salwar ka nada kholne lagi.

Uski kameez ab uper uthi hui nahi thi isliye jab usne salwar kholkar thodi si neeche sarkayi toh Sharma ko nazar kuchh nahi aaya. Payal ke peeth uski taraf thi isliye vo pichhe se dekh kar sirf andaza hi laga pa raha tha ke vo apni salwar thodi si neeche sarka kar usko pakde khadi hai taaki poori neeche na gir jaaye.

Vo ladka khade khade hi Payal ke bilkul nazdeek aaya. Kad mein vo usse lamba tha isliye zara sa jhuka aur Payal se sat gaya. Payal ne bhi apni baahen ladke ke gale mein daal di aur ladke ne usko kamar se pakad kar hilna shuru kar diya.

Vo dono aise khade the jaise ek doosre se gale mil rahe hon bas farak sirf itna tha ke ladke ne apne ghutne mode hue the taaki apna kad Payal ke kad se mila sake aur dono lagaatar hil rahe the.

Payal ke peeth Sharma ki taraf thi aur use ye samaj nahi aa raha tha ke vo ladka Payal ko chod raha tha ya yun hi uper uper se lund uski choot par ragad raha tha.

Itni der se Sharma ne dekha sab tha par Payal ke nange shareer ki ek jhalak bhi usko nahi mili thi. Vo dil hi dil mein soch raha tha ke bhagwan kuchh toh dikha de aur jaise uske dil ki baat sun li gayi. Ladke ne apne haath Payal ki kamar se neech ko sarkaye, uske kameez ke pallu ko pichhe se pakad kar uper uthaya aur Payal ki gaand Sharma ki aankhon ke aage nangi ho gayi.

Vo aankhen phaade vo nazara dekh raha tha. Payal ke poore shareer ka bas vo hi hissa tha jo nanga tha. Uper jism par kameez aur jhaaanghon ke neeche salwar. Nangi thi toh bas uski bhari bhari gaand jispar vo ladka haath phirata hua hil raha tha.

"Bas bas bas" Khan ne usko toka "Subah subah ka waqt hai, uper wale ka naam le. Khud toh apni subah pata nahi kya dekh ke aa raha hai aur uper se mere dimag mein bhi vaahiyat baaten daal raha hai"

"Arrey sir ...." Sharma ke haath ab bhi phele hue the jinse vo Payal ki gaand ka size batana chah raha tha.

"Sab chhod. Ye bata ke ladka kaun tha uske saath ........" Isse pehle ke vo aage kuchh kehta, Khan ne baat kaat di.

"Guess karo sir" Sharma bola

"Ek toh subah subah meri neend kharab kar di" Khan chaai stove se utarta hua bol "Ab uper se paheliyan bujha raha hai, sidhe sidhe bata na"

"Kuldeep Sir" Sharma ne raaz batane ke se andaz mein kaha.

Khan ne haath se chaai ka cup girte girte bacha.

"Kya baat kar raha hai. Are you sure?"

"Haan Sir" Sharma bola "Vahi tha"

"Hmmm" Khan ne chaai ka ek cup Sharma ke haath mein diya aur dono vahin chair par beth gaye "This is interesting"

"Vo kaise?"

"Is baat se 2 log poori tarha shak ke ghere mein aa jaate hain"

"Payal aur Kuldeep?"

"Haan" Sharma ne kaha "Dekh agar vo dono ek doosre se sach mein pyaar karte hain aur shaadi vagerah ka plan hai toh zaahir si baat hai ke Thakur iske khilaff raha hoga, shayad usko pata bhi chal gaya ho jiske chalte inmein se ek ne kaam kar diya ho"

'Baat toh sahi hai sir, par agar yun hi time pass ke liye Payal ko baja raha ho?"

"Tab kahani thodi si alag hogi. Vo zaahir si baat hai ke Payal ko toh batayega nahi ke time pass kar raha hai. Vo toh yahi sochegi ke vo usse pyaar karta hai aur dault ka sapna dekhti hogi. Jab usko laga hoga ke thakur beech

mein aa raha hai, tab usne kar diya hoga kaam"

"Par Sir aap ye bhi toh socho ke Payal toh already vaseeyat mein shaamil hai, vo aisa kyun karne lagi" Sharma ne kaha

"Good point par ye tab jabki Payal ko pata ho ke vo vaseeyat mein shaamil hai. Ek kaam kar, aaj thaane bula le usko. Baat karte hain" Khan ne kaha

"Kitne baje tak bulaoon?"

"Bula le 11 baje ke kareeb"

"Waise kamal ki baat hai na sir" Jaate jaate Sharma ne kaha "Kal hi aapne mujhe kaha tha ke is Kuldeep ke baare mein kuchh pata lagaoon aur aaj hi ye jaise khud meri jholi mein aa gira"

"Haan so to hai par phir bhi nazar rakh is par. Aur ek kaam aur kar, Thakur sahab ki bade bete ke baare mein zara kuchh pata kar"

"Purushottam?"

"Haan"

"Us nalle ke baare mein kya pata karna hai?"

"Nalla?" Khan ne hairani se puchha

"Haan. Khada nahi hota uska" Sharma ne aisa kaha jaise bahut pate ki baat bata raha ho.

"Uska khada hota hai ya nahi isse koi matlab nahi mujhe. Apni bhains ya ghodi nahi chudwani maine usse. Khoon ki raat vo bhi haweli mein hi tha aur poore poore chance hain ke ye kaam usi ne kar diya ho"

"Exactly kya malum karna hai?" Sharma ne sar khujate hue puchha

"Pata kar ke kisse milta hai, kinke saath uthna bethna hai, kahin karz vagerah mein toh nahi phasa hua"

"Sir agar vo karz mein phasa hota ...." Sharma ne kehna shuru kiya hi tha ke beech mein Khan ne tok diya

"Yaar tu mere kehne pe pata karega zara?"

"Yes sir" Sharma ne kaha "Vaise ek baat aur kahun sir?"

"Haan bol"

"Aap ek aadmi ko apne shak ke ghere se nikal rahe ho"

"Kise" Khan ne puchha

"Jai ko" Sharma ne samjhate hue kaha "Aisa bhi toh ho sakta hai ke mara usne hi ho aur ham fizool mein bhaag daud kar rahe hon"

"Haan ho sakta hai" Khan ne muskurate hue kaha "Par phir theek hai na. Aisa hua toh ham ek khooni ko ek khooni hi saabit karenge"

"Par vo toh already andar hai sir"

"Arrey mere bhai tu mere kehne pe kar de ye sab. Mere dil ki tasalli ho jayegi ke Jai nirdosh nahi tha aur saza sahi aadmi ko hui"

"Ok Sir" Kehta hua Sharma darwaza khol kar bahar nikal gaya.

Taiyyar hokar Khan police station jaane ke liye ghar se nikal hi raha tha ke cell baja. Message aaya tha. Usne cell uthakar dekha.

Kiran ka message tha. Usse usne aaj subah se koi baat nahi ki thi varna ab toh ye routine ho gaya tha ke vo subah uthte hi sabse pehle Kiran ko phone ghumata tha.

Message mein ek sher tha.

"Kuchh tabiat hi mili thi aisi,

ke sukoon se jeene ki soorat na hui,

Jise chaha usko apna na sake,

Jo mila usse mohabbat na hui"

Khan sher padhkar muskura utha. Usne do pal socha aur jawab diya.

Mere lab ki hasi tere hontho se nikle,

Tere gham ka dayra meri aankhon se nikle.

Khushi tere dar se na jaaye kahin,

dua yahi hardam mere dil se nikle.

Tere aankhon mein ashq jo aa jaaye kabhi,

To saath hi khabar mere marne ki nikle.

Aarzoo thi ke teri baahon mein dam nikle,

Kasoor tera nahi, badnaseeb ham nikle.

kramashah........................................