खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:58

खूनी हवेली की वासना पार्ट --7

गतान्क से आगे........................

उस रात बहुत गर्मी थी. रूपाली ने सोने से पहले नहाने की सोची और बाथरूम में दाखिल हुई. बाथरूम में जाकर कपड़े उतारे तो पता चला के वो टवल लाना भूल गयी थी. उसका बाथरूम उसके कमरे से अट्ष्ड था जिसका दरवाज़ा उसके कमरे में ही खुलता था. कमरा सिर्फ़ उसका था और अंदर से लॉक्ड था इसलिए वो नंगी ही बाथरूम से टवल लेने के लिए बाहर निकली.

टवल बेड पर पड़ा हुआ था. रूपाली ने टवल उठाया और वापिस बाथरूम में जा ही रही थी के उसकी नज़र अपने कमरे में लगे फुल साइज़ मिरर पर पड़ी.

रूपाली उस वक़्त पूरी तरह नंगी थी. जिस्म पर कपड़े के नाम पर एक धागा तक नही था. बॉल खुले हुए थे और उसका कच्चा जिस्म कमरे में जल रही ट्यूब लाइट की रोशनी में चमक सा रहा था. वो बाथरूम में जाती जाती एक पल के लिए रुकी और एक नज़र अपने उपेर डाली.

रूपाली को याद भी नही था के उसने कभी अपने आपको यूँ आईने में पूरी तरह नंगा देखा हो, कम से कम होश संभालने के बाद तो नही. वो बाथरूम में ही जाकर कपड़े उतारती और अक्सर एक टवल लपेटकर बाहर आती थी. कमरे में आकर कपड़े पहेन लेती थी. अगर कपड़े बदलने भी होते तो पूरी तरह से नंगी नही होती थी. पहले सलवार उतारती और नीचे कुच्छ और पहेन्ने के बाद कमीज़ उतारती थी.

आज अपनी 15 साल की ज़िंदगी में पहली बार होश संभालने के बाद वो आईने में अपने आपको नंगी देखने के इरादे से अपने आपको पूरी तरह नंगी देख रही थी.

एक पल के लिए वो खुद को देखकर ही शर्मा गयी. नज़रें शरम से नीचे झूल गयी और वो फिर बाथरूम की और बढ़ी. जाते जाते फिर रुकी, झिझकी, और फिर बाथरूम की तरफ बढ़ी.

और फिर ना जाने क्यूँ वो फिर वापिस आई, टवल फिर बेड पर रखा और अपने आपको एक बार और आईने में देखा.

उसके बाल काफ़ी लंबे थे जो कि बचपन से ही कटे नही थे. बाल पूरे खुलने पर उसकी पूरी कमर को ढक लेते थे. इस वक़्त भी कुच्छ बाल खुलकर उसके कमर पर तो कुच्छ उसके सीने पर गिरे हुए थे.

रूपाली ने अपने बाल सारे के सारे पिछे को किए और खुद पर नज़र डाली.

वो जानती थी के वो देखने में बेहद खूबसूरत है क्यूंकी आए दिन लोग या तो उसको ही कहते थे के वो बहुत सुंदर है या उसके माँ बाप को कहते के आपकी बेटी कितनी सुंदर हो गयी है. मासूम चेहरा, बड़ी बड़ी आँखें और मुलायम छ्होटे छ्होटे होंठ.

नज़र चेहरे से हटी और नीचे छातियो पर गयी.

कोई 3 साल पहले उसके सीने पर उभार आना शुरू हो गया था और अभी कुच्छ महीने पहले ही उसकी माँ ने उसको ब्रा पहेन्ने को कहा था. उसको ब्रा पहेन्ने पर बड़ा अजीब सा लगता था क्यूंकी एक तो उसका दम सा घुटना लगता था और दूसरा बार बार खुजली सी होती रहती थी. उसने एक दो बार पहेन्ने से इनकार भी किया पर माँ को ज़ोर डालने पर पहेनना पड़ा.

रूपाली ने गौर से अपनी छातियो की तरफ देखा.

उसकी छातियाँ दूध की तरह सफेद थी जिनपर लाइट ब्राउन कलर के छ्होटे छ्होटे निपल्स. अपनी छातियो पर नज़र पड़ते ही उसके दिमाग़ में पहला ख्याल कल्लो की चूचियो का आया और उसके दिमाग़ ने जैसे अपने आप ही कंपेर करना शुरू कर दिया. कल्लो की चूचियाँ रूपाली की चूचियो के मुक़ाबले बहुत काली थी. इतनी काली की जो निपल्स रूपाली की चूचियो पर सॉफ नज़र आ रहे हैं वो कल्लो के शरीर पर तो जैसे नज़र ही नही आ रहे थे. पूरी की पूरी छाती काले रंग की थी.

निपल्स का सोचते ही अगला ख्याल ये था के रूपाली के निपल्स बहुत छ्होटे छ्होटे से थे, एक 15 साल की लड़की के निपल्स पर कल्लो के निपल्स तो कितने बड़े बड़े थे. निपल्स ही क्या कल्लो की छातियाँ ही कितनी बड़ी थी. उसकी चूचियो में से रूपाली के बराबर की 3 चूचिया बन जाएँ.

और फिर जैसे अपने आप ही उसके बेकाबू हो रहे दिमाग़ ने अगला नज़ारा उसके माँ के नंगे जिस्म का पेश कर दिया. उसने अपनी माँ को ज़्यादा गौर से नही देखा था, बस एक हल्की सी नज़र ही डाली थी पर जितना देखा था उससे ये पता चल गया था के उसकी माँ की चूचियाँ भी काफ़ी बड़ी बड़ी थी. कल्लो जितनी बड़ी नही पर फिर भी काफ़ी बड़ी और उसकी माँ की छातियाँ भी रूपाली की तरह गोरी थी.

इससे पहले के उसकी सोच और आगे बढ़ती, रूपाली ने फ़ौरन अपने दिमाग़ से अपनी माँ के ख्याल को झटक दिया.

उसकी नज़र चूचियो से होती अपनी टाँगो के बीच पहुँची.

उसने आज तक अपने जिस्म के इस हिस्से को गौर से नही देखा था. गौर से क्या कभी देखा ही नही था. बस नहाते हुए हाथ पर साबुन लेकर अपनी टाँगो के बीच रगड़ लेती और बस. पर आज उसने पहली बार अपनी टाँगो के बीच नज़र डाली. उसकी चूत पर बाल आने शुरू हो गये थे जो उसने कभी काटे नही थे. बाल हल्के हल्के से लंबे थे पर इतने नही जितने के कल्लो के. कल्लो के बालों के बीच तो चूत नज़र ही नही आ रही थी जबकि रूपाली की चूत बॉल होते हुए भी हल्की हल्की दिखाई दे रही थी.

यही सब सोचते सोचते रूपाली को एहसास हुआ के उसकी टाँगो के ठीक बीच उसको कुच्छ गीला गीला महसूस हो रहा था. उसको कुच्छ समझ नही आया के ये क्या था और चेक करने के इरादे से वो अपना हाथ टाँगो के बीच ले गयी.

और जैसे ग़ज़ब हो गया.

हाथ लगते ही जैसे उसी वक़्त उसके जिस्म में एक करेंट सा दौड़ गया हो. उसका अपनी टाँगो के बीच हाथ लगाना उसके शरीर को हिला गया. एक अजीब सी फीलिंग पूरे शरीर में दौड़ गयी. रूपाली का हाथ जहाँ था वही रुक गया और उसने एक गहरी साँस ली.

उसने एक बार फिर अपने हाथ को अपनी चूत पर दबाया और उसके मुँह से आह निकल पड़ी.

और फिर तो जैसे हाथ रुका ही नही. वो बार बार अपना हाथ अपने चूत पर दबाने लगी. जो टाँगें पहले फेली हुई थी वो दोनो सिकुड गयी. वो अब भी आईने के सामने खड़ी थी पर अब अपने आपको नही देख रही थी. दोनो आँखें बंद थी और टाँगें सिकोड रखी थी जिनके बीच उसका हाथ धीरे धीरे उसकी चूत को दबा रहा था और सहला रहा था.

और तभी जैसे आसमान टूट पड़ा.

उसकी टाँगो के बीच से एक अजीब लहर सी उठी जो सीधा उसके दिमाग़ तक पहुँची. रूपाली की दोनो टाँगें काँप गयी, घुटने कमज़ोर पड़ गये, मुँह से आह निकल पड़ी और वो वहीं लड़खडकर नीचे गिर सी पड़ी. टाँगो के बीच उसका हाथ अब बुरी तरह गीला हो चुका था.

इस पूरे काम में मुश्किल से 1 मिनट लगा थे पर इस 1 मिनट में रूपाली ये समझ चुकी थी के उसकी माँ क्यूँ उसके बाप से और कल्लो क्यूँ शंभू काका से अकेले में लिपट रहे थे.

.......................

ख़ान हवेली के उस कमरे में खड़ा था जहाँ खून हुआ था, यानी के ठाकुर का कमरा. उसने घर के लोगों से उसको कमरे में कुच्छ देर अकेला छ्चोड़ देने के लिए कहा था इसलिए उस वक़्त उस कमरे में उसके सिवा और कोई नही था.

"आप कुच्छ लेंगें? चाइ या कुच्छ ठंडा?" पीछे से आवाज़ आई तो ख़ान ने पलटकर देखा.

कमरे के दरवाज़े पर एक लड़की खड़ी थी. ख़ान ने उसकी तरफ गौर से देखा. उमर कोई 20-21 साल, रंग हल्का सांवला, बड़ी बड़ी आँखे, लंबे बालों की बँधी हुई चोटी. देखने में ना तो वो सुंदर थी और ना ही बदसूरत. बस एक आम सी लड़की. उसने एक सलवार कमीज़ पहेन रखा था जो देखने से ही काफ़ी पुराना लग रहा था. उसने उमर और पहनावे को देखकर ख़ान ने अंदाज़ा लगा लिया के वो घर की नौकरानी की बेटी पायल है जो हवेली में ही रहकर काम करती है.

"तुम पायल हो?" उसने लड़की से पुछा

"जी हां" पायल ने कहा

"उस रात जै को तुमने ही देखा था ठाकुर के कमरे में?" ख़ान ने पुचछा

पायल के चेहरे पर एक पल के लए कई भाव आकर चले गये जिनको ख़ान समझ नही सका. पायल ने हाँ में सर हिलाया

"नही फिलहाल मुझे कुच्छ नही चाहिए" उसने कहा तो पायल ने हामी में सर हिलाया और वापिस जाने लगी.

"सुनो" ख़ान ने कहा तो वो रुक कर पलटी

"तुम्हे याद है के उस रात कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था या बंद था?" ख़ान ने पुछा तो पायल ने चौंक कर चेहरा उपर उठाया

"जी?" वो बोली

"अर्रे उस रात जब ठाकुर साहब का खून हुआ था, तब ये दरवाज़ा खुला था या बंद था?"

"जी पहले बंद था पर बाद में आधा खुला हुआ था" पायल सहम कर बोली.

ख़ान ने एक पल के लिए उससे और पुच्छना चाहा पर रुक गया. वो इस लड़की से बाद में आराम से बैठ कर बात करना चाहता था, इस तरह से नही क्यूंकी इसी लड़की ने ठाकुर साहब को आखरी बार ज़िंदा देखा था और इसने ही ठाकुर ही उन्हें सबसे पहले मुर्दा देखा था, जै के बाद.

"कितना खुला हुआ था?" उसने पुछा

"जी?" पायल ने फिर सवालिया नज़रों से उसकी तरफ देखा

"अर्रे कितना खुला हुआ था दरवाज़ा? आधा, पूरा या थोड़ा सा?"

"जी तकरीबन आधा खुला हुआ था" पायल बोली

"जितना उस रात दरवाज़ा खुला था उतना ही खोल दो और जाओ" उसने पायल से कहा.

हवेली काफ़ी पुरानी बनी हुई थी पर दरवाज़े सब नये थे यानी के पुराने 2 किवाड़ वाले दरवाज़ो को हटाकर सिंगल पेन डोर थे जिनपर मॉडर्न लॉकिंग सिस्टम था. टाला लगाने की ज़रूरत नही थी. दरवाज़े में ही इनबिल्ट लॉक था .

पायल ने दरवाज़े को तकरीबन आधा खोल दिया और चली गयी.

ख़ान ने एक बार फिर कमरे में नज़र फिराई. कमरा वैसा ही था जैसा के एक अमीर ठाकुर का होना चाहिए था. एक बड़ा सा कमरा जिसके बीचे बीच एक बड़ा सा बिस्तर लगा हुआ था. कमरे में चारो तरफ महेंगे रेशमी पर्दे लगे हुए थे. बिस्तर इतना बड़ा था के उसपर 10 लोग आराम से सो सकते थे. एक तरफ एक सोफा सेट रखा हुआ था जिसके सामने एक छ्होटी सी टेबल थी. सामने दीवार पर एक बड़ा सा फ्लॅट स्क्रीन टीवी लगा हुआ था. पूरे कमरे में एक नीले रंग का मखमली कालीन बिच्छा हुआ था.

ख़ान उस जगह पर पहुँचा जहाँ उस रात ठाकुर की लाश पड़ी हुई थी. नीले रंग पर खून के धब्बे नज़र तो आ रहे थे पर लाल रंग दिखाई नही दे रहा था. उसने हवेली में हिदायत की थी के बिना पोलीस की पर्मिशन के कमरे में कुच्छ भी बदला ना जाए और ना ही कोई चीज़ हटाई जाए. इसी वजह से वो कालीन अब तक कमरे से हटाया नही गया था.

जिस जगह पर ठाकुर की लाश पड़ी थी वो कमरे के दरवाज़े के काफ़ी करीब थी. भूषण के दिए स्टेट्मेंट में ये कहा गया था के वो हवेली के दरवाज़े पर था और उसके पास ही सरिता देवी अपनी व्हील चेर पर बैठी थी. ख़ान ने जिस जगह पर लाश पड़ी थी वहाँ खड़े होकर कमरे के बाहर देखा. बिल्कुल सामने ड्रॉयिंग हॉल था और नज़र सीधी हवेली के गेट पर पड़ी. ड्रॉयिंग हॉल काफ़ी बड़ा था और ये काफ़ी मुश्किल था के गेट से ठाकुर के कमरे के अंदर कुच्छ नज़र आता पर अगर खून हुआ था और दरवाज़ा आधा खुला था, तो ये नामुमकिन भी नही था के हवेली के दरवाज़े पर खड़े शख़्श को कुच्छ दिखाई या सुनाई ना दे.

कमरे के एक कोने पर एक खिड़की थी जो हवेली के पिच्छले हिस्से की तरफ खुलती थी. रूपाली के दिए स्टेट्मेंट में ये लिखा गया था के वो उस रात कपड़े उतारने के लिए यहाँ आई थी और उसने ठाकुर को अपने कमरे में ज़िंदा देखा था. खिड़की उस वक़्त खुली हुई थी.

जो एक बात ख़ान के ज़हन में सबसे ज़्यादा खटक रही थी. पहली तो ये के उसको अच्छी तरह से याद था खून की रात जब वो इस कमरे में आया तो ये खिड़की अंदर से बंद थी जो उसकी इस थियरी को नाकाम करती थी के क़ातिल खून करके इस खिड़की से निकल गया.

"आर यू डन?" पीछे से आवाज़ आई तो ख़ान ने पलटकर देखा. दरवाज़े पर ठाकुर का बड़ा बेटा पुरुषोत्तम खड़ा था.

"यस आइ आम डन" ख़ान ने कहा

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --7

gataank se aage........................

Us raat bahut garmi thi. Rupali ne sone se pehle nahane ki sochi aur bathroom mein daakhil hui. Bathroom mein jaakar kapde utaare toh pata chala ke vo towel lana bhool gayi thi. Uska bathroom uske kamre se attched tha jiska darwaza uske kamre mein hi khulta tha. Kamra sirf uska tha aur andar se locked tha isliye vo nangi hi bathroom se towel lene ke liye bahar nikli.

Towel bed par pada hua tha. Rupali ne towel uthaya aur vaapis bathroom mein jaa hi rahi thi ke uski nazar apne kamre mein lage full size mirror par padi.

Rupali us waqt poori tarah nangi thi. Jism par kapde ke naam par ek dhaga tak nahi tha. Baal khule hue the aur uska kachcha jism kamre mein jal rahi tube light ki roshni mein chamak sa raha tha. Vo bathroom mein jaati jaati ek pal ke liye ruko aur ek nazar apne uper daali.

Rupali ko yaad bh nahi tha ke usne kabhi apne aapko yun aaine mein poori tarah nanga dekha ho, kam se kam hosh sambhalne ke baad toh nahi. Vo bathroom mein hi jaakar kapde utarti aur aksar ek towel lapetkar bahar aati thi. Kamre mein aakar kapde pehen leti thi. Agar kapde badalne bhi hote toh poori tarah se nangi nahi hoti thi. Pehle salwar utarti aur neeche kuchh aur pehenne ke baad kameez utarti thi.

Aaj apni 15 saal ki zindagi mein pehli baar hosh sambhalne ke baad vo aaine mein apne aapko nangi dekhne ke irade se apne aapko poori tarah nangi dekh rahi thi.

Ek pal ke liye vo khud ko dekhkar hi sharma gayi. Nazren sharam se neeche jhul gayi aur vo phir bathroom ki aur badhi. Jaate jaate phir ruki, jhijhki, aur phir bathroom ki taraf badhi.

Aur phir na jaane kyun vo phir vaapis aayi, towel phir bed par rakha aur apne aapko ek baar aur aaine mein dekha.

Uske baal kaafi lambe the jo ki bachpan se hi kate nahi the. Baal poore khulne par uski poori kamar ko dhak lete the. Is waqt bhi kuchh baal khulkar uske kamar par toh kuchh uske seene par gire hue the.

Rupali ne apne baal saare ke saare pichhe ko kiye aur khud par nazar daali.

Vo jaanti thi ke vo dekhne mein behad khoobsurat hai kyunki aaye din log ya toh usko hi kehte the ke vo bahut sundar hai ya uske maan baap ko kehte ke aapki beti kitni sundar ho gayi hai. Masoom chehra, badi badi aankhen aur mulayam chhote chhote honth.

Nazar chehre se hati aur neeche chhatiyon par gayi.

Koi 3 saal pehle uske seene par ubhaar aana shuru ho gaya tha aur abhi kuchh mahine pehle hi uski maan ne usko bra pehenne ko kaha tha. Usko bra pehenne par bada ajeeb sa lagta tha kyunki ek toh uska dam sa ghutna lagte tha aur doosra baar baar khujli si hoti rehti thi. Usne ek do baar pehenne se inkaar bhi kiya par maan ko zor daalne par pehenna pada.

Rupali ne gaur se apni chhatiyon ki taraf dekha.

Uski chhatiyan doodh ki tarah safed thi jinpar light brown color ke chhote chhote nipples. Apni chhatiyon par nazar padte hi uske dimag mein pehla khyaal Kallo ki chhatiyon ka aaya aur uske dimag ne jaise apne aap hi compare karna shuru kar diya. Kallo ki chhatiyan Rupali ki chhatiyon ke mukable bahut kaali thi. Itni kaali ki jo nipples Rupali ki chhatiyon par saaf nazar aa rahe hain vo Kallo ke shareer par toh jaise nazar hi nahi aa rahe the. Poori ki poori chhati kaale rang ki thi.

Nipples ka sochte hi agla khyaal ye tha ke Rupali ke nipples bahut chhote chhote se the, ek 15 saal ki ladki ke nipples par Kallo ke nipples toh kitne bade bade the. Nipples hi kya Kallo ki chhatiyan hi kitni badi thi. Uski chhaityon mein se Rupali ke barabar ki 3 chhatiyan ban jaayen.

Aur phir jaise apne aap hi uske bekabu ho rahe dimag ne agla nazara uske maan ke nange jism ka pesh kar diya. Usne apni maan ko zyada gaur se nahi dekha tha, bas ek halki si nazar hi daali thi par jitna dekha tha usse ye pata chal gaya tha ke uski maan ki chhatiyan bhi kaafi badi badi thi. Kallo jitni badi nahi par phir bhi kaafi badi aur uski maan ki chhatiyan bhi Rupali ki tarah gori thi.

Isse pehle ke uski soch aur aage badhti, Rupali ne fauran apne dimag se apni maan ke khyaal ko jhatak diya.

Uski nazar chhatiyon se hoti apni taango ke beech pahunchi.

Usne aaj tak apne jism ke is hisse ko gaur se nahi dekha tha. Gaur se kya kabhi dekha hi nahi tha. Bas nahate hue haath par saabun lekar apni taango ke beech ragad leti aur bas. Par aaj usne pehli baar apni taango ke beech nazar daali. Uski choot par baal aane shuru ho gaye the jo usne kabhi kaate nahi the. Baal halke halke se lambe the par itne nahi jitne ke Kallo ke. Kallo ke baalon ke beech toh choot nazar hi nahi aa rahi thi jabki Rupali ki choot baal hote hue bhi halki halki dikhai de rahi thi.

Yahi sab sochte sochte Rupali ko ehsaas hua ke uske taango ke theek beech usko kuchh geela geela mehsoos ho raha tha. Usko kuchh samajh nahi aaya ke ye kya tha aur check karne ke iraade se vo apna haath taango ke beech le gayi.

Aur jaise gazab ho gaya.

Haath lagate hi jaise usi waqt uske jism mein ek current sa daud gaya ho. Uska apni taango ke beech haath lagana uske shareer ko hila gaya. Ek ajeeb si feeling poore shareer mein daud gayi. Rupali ka haath jahan tha vahi ruk gaya aur usne ek gehri saans li.

Usne ek baar phir apne haath ko apni choot par dabaya aur uske munh se aah nikal padi.

Aur phir toh jaise haath ruka hi nahi. Vo baar baar apna haath apne choot par dabane lagi. Jo taangen pehle pheli hui thi vo dono sikud gayi. Vo ab bhi aaine ke saamne khadi thi par ab apne aapk nahi dekh rahi thi. Dono aankhen band thi aur taangen sikod rakhi thi jinke beech uska haath dheere dheere uski choot ko daba raha tha aur sehla raha tha.

Aur tabhi jaise aasmaan toot pada.

Uski taango ke beech se ek ajeeb lehar si uthi jo sidha uske dimaag tak pahunchi. Rupali ki dono taangen kaanp gayi, ghutne kamzor pad gaye, munh se aah nikal padi aur vo vahin ladkhadakar neeche gir si padi. Taango ke beech uska haath ab buri tarah geela ho chuka tha.

Is poore kaam mein mushkil se 1 min laga the par is 1 min mein Rupali ye samajh chuki thi ke uske maan kyun uske baap se aur Kallo kyun Shambhu Kaka se akele mein lipat rahe the.

Khan haweli ke us kamre mein khada tha jahan khoon hua tha, yaani ke Thakur ka kamra. Usne ghar ke logon se usko kamre mein kuchh der akela chhod dene ke liye kaha tha isliye us waqt us kamre mein uske siwa aur koi nahi tha.

"Aap kuchh lengen? Chaai ya kuchh thanda?" Pichhe se aawaz aayi toh Khan ne palatkar dekha.

Kamre ke darwaze par ek ladki khadi thi. Khan ne uski taraf gaur se dekha. Umar koi 20-21 saal, rang halka saanwla, badi badi aannkhen, lambe baalon ki bandhi hui choti. Dekhne mein na toh vo sundar thi aur na hi badsurat. Bas ek aam si ladki. Usne ek salwar kameez pehen rakha tha jo dekhne se hi kaafi purana lag raha tha. Usne umar aur pehnave ko dekhkar Khan ne andaza laga liya ke vo ghar ki naukrani ki beti Payal hai jo haweli mein hi rehkar kaam karti hai.

"Tum Payal ho?" Usne ladki se puchha

"Ji haan" Payal ne kaha

"Us raat Jai ko tumne hi dekha tha Thakur ke kamre mein?" Khan ne puchha

Payal ke chehre par ek pal ke lie kai bhaav aakar chale gaye jinko Khan samajh nahi saka. Payal ne haan mein sar hilaya

"Nahi filhal mujhe kuchh nahi chahiye" Usne kaha toh Payal ne haami mein sar hilaya aur vaapis jaane lagi.

"Suno" Khan ne kaha to vo ruk kar palti

"Tumehin yaad hai ke us raat kamre ka darwaza khula hua tha ya band tha?" Khan ne puchha toh Payal ne chaunk kar chehra upar uthaya

"Ji?" Vo boli

"Arrey us raat jab Thakur sahab ka khoon hua tha, tab ye darwaza khula tha ya band tha?"

"Ji pehle band tha par baad mein aadha khula hua tha" Payal seham kar boli.

Khan ne ek pal ke liye usse aur puchhna chaha par ruk gaya. Vo is ladki se baad mein aaram se bethkar baat karna chahta tha, is tarah se nahi kyunki isi ladki ne Thakur Sahab ko aakhri baar zinda dekha tha aur isne hi Thakur hi unhen sabse pehle murda dekha tha, Jai ke baad.

"Kitna khula hua tha?" Usne puchha

"Ji?" Payal ne phir sawaliya nazron se uski taraf dekha

"Arrey kitna khula hua tha darwaza? Aadha, poora ya thoda sa?"

"Ji takreeban aadha khula hua tha" Payal boli

"Jitna us raat darwaza khula tha utna hi khol do aur jaao" Usne Payal se kaha.

Haweli kaafi purani bani hui thi par darwaze sab naye the yaani ke purane 2 kiwaad wale darwazo ko hatakar single pane door the jinpar modern locking system tha. Taala lagane ki zaroorat nahi thi. Darwaze mein hi inbuilt lock tha .

Payal ne darwaze ko takreeban aadha khol diya aur chali gayi.

Khan ne ek baar phir kamre mein nazar phirayi. Kamra vaisa hi tha jaisa ke ek ameer thakur ka hona chahiye tha. Ek bada sa kamra jiske beeche beech ek bada sa bistar laga hua tha. Kamre mein chaaro taraf mehenge reshmi parde lage hue the. Bitar itna bada tha ke uspar 10 log aaram se so sakte the. Ek taraf ek sofa set rakha hua tha jiske saamne ek chhoti si table thi. Saamne deewar par ek bada sa flat screen TV laga hua tha. Poore kamre mein ek neele rang ka makhmali kaaleen bichha hua tha.

Khan us jagah par pahuncha jahan us raat Thakur ki laash padi hui thi. Neele rang par khoon ke dhabbe nazar toh aa rahe the par laal rang dikhai nahi de raha tha. Usne haweli mein hidayat ki thi ke bina police ki permission ke kamre mein kuchh bhi badla na jaaye aur na hi koi cheez hatayi jaaye. Isi vajah se vo kaaleen ab tak kamre se hataya nahi gaya tha.

Jis jagah par Thakur ki laash padi thi vo kamre ke darwaze ke kaafi kareeb thi. Bhushan ke diye statement mein ye kaha gaya tha ke vo haweli ke darwaze par tha aur uske paas hi Sarita Devi apni wheel chair par bethi thi. Khan ne jis jagah par laash padi thi vahan khade hokar kamre ke bahar dekha. Bilkul saamne drawing hall tha aur nazar sidhi haweli ke gate par padi. Drawing hall kaafi bada tha aur ye kaafi mushkil tha ke gate se thakur ke kamre ke andar kuchh nazar aata par agar khoon hua tha aur darwaza aadha khula tha, toh ye namumkin bhi nahi tha ke haweli ke darwaze par khade shakhsh ko kuchh dikhai ya sunai na de.

Kamre ke ek kone par ek khidki thi jo haweli ke pichhle hisse ki taraf khulti thi. Rupali ke diye statement mein ye likha gaya tha ke vo us raat kapde utarne ke liye yahan aayi thi aur usne thakur ko apne kamre mein zinda dekha tha. Khidki us waqt khuli hui thi.

Jo ek baat Khan ke zehan mein sabse zyada khatak rahi thi. Pehli toh ye ke usko achhi tarah se yaad tha khoon ki raat jab vo is kamre mein aaya toh ye khidki andar se band thi jo uski is theory ko nakam karti thi ke qatil khoon karke is khidki se nikal gaya.

"Are you done?" Pichhe se aawaz aayi toh Khan ne palatkar dekha. Darwaze par thakur ka bada beta Purushottam khada tha.

"Yes i am done" Khan ne kaha

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:58

खूनी हवेली की वासना पार्ट --8

गतान्क से आगे........................

"मुझे समझ नही आता के जब जै रंगे हाथ पकड़ा ही गया है तो इस सब की क्या ज़रूरत है?" पुरुषोत्तम ने पुछा

"मैं सिर्फ़ अपनी तसल्ली करना चाहता हूँ ठाकुर साहब" ख़ान ने कहा "आइ जस्ट वाना मेक शुवर दट दा पर्सन हू किल्ड युवर फादर ईज़ इनडीड गेटिंग पनिश्ड फॉर इट आंड नोट रोमिंग अराउंड फ्री"

"आइ अप्रीशियेट इट" पुरुषोत्तम ने कहा "यू हॅव अवर फुल को-ऑपरेशन"

"तो फिर मैं चाहूँगा के मैं हवेली के हर मेंबर से एक बार बात करूँ. यू माइट फाइंड इट अफेन्सिव बट आइ अश्यूर इट इट्स जस्ट आ फॉरमॅलिटी, जस्ट फॉर पेपर वर्क" ख़ान ने कहा

"मैं सबसे कह दूँगा के आपके हर सवाल का जवाब आपको दिया जाए" पुरुषोत्तम ने कहा

"थॅंक्स आ लॉट" ख़ान ने कहा "आइ विल टेक यौर लीव नाउ"

कहकर ख़ान हवेली से निकल ही रहा था के पिछे से पुरुषोत्तम की आवाज़ आई

"क्या अब हम कमरे में चीज़ें बदल सकते हैं? यू सी आइ आम रियली नोट कंफर्टबल विथ लीविंग माइ फादर'स ब्लड ऑन दट रग"

"जी ज़ुरूर" ख़ान ने कहा "आप वो कालीन अब हटा सकते हैं"

हवेली से बाहर जाते ख़ान की नज़र ड्रॉयिंग रूम में बैठी लड़की पर पड़ी. वो बेहद खूबसूरत थी और इसी वजह से ख़ान की नज़र जैसे उसपर अटक कर रह गयी. ख़ान जानता था के वो ठाकुर की बेटी कामिनी है. दिल ही दिल में खूबसूरती की तारीफ़ करता ख़ान हवेली से बाहर आ गया.

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उस दिन के बाद अगले कुच्छ वीक्स तक रूपाली अजीब उलझन से गुज़री. दिन में बार बार उसके शरीर में अजीब सी फीलिंग होती जिसके बाद वो फ़ौरन कहीं अकेले में जाती और अपनी टांगी के बीच हाथ लगाती. एक अजीब सा नशा और मज़ा जिस्म में दौड़ जाता, फिर बढ़ता जाता और अचानक उसकी टाँगो के बीच सब गीला हो जाता.

जहाँ रूपाली को ये करने में बहुत मज़ा आता था वहीं मज़ा ख़तम होने के बाद फिर से वही गिल्ट फीलिंग दिमाग़ पर सवार हो जाती. उसको लगता के वो कितनी गंदी हो गयी है के ऐसे गंदे गंदे काम कर रही है. अगर किसी को पता चल गया तो? इसी डर से वो उस दिन के बाद ना तो फिर से अपने माँ बाप को देखने की हिम्मत जुटा पाई और ना ही शंभू काका और कल्लो को देखने की.

कुच्छ हफ़्तो बाद एक दिन उसके भाई की तबीयत काफ़ी खराब हो गयी. तेज़ बुखार था और मम्मी कुच्छ दिन से उसको अपने पास ही सुला रही थी. उस रात रूपाली भी अपने मम्मी पापा के कमरे में ही बैठी थी. उसका भाई सो चुका था और वो मम्मी पापा के साथ बैठी एक मूवी देख रही थी. मूवी देखते देखते वो वहीं बिस्तर पर लेट गयी और पता ही ना चला के कब आँख लग गयी.

उसको किसी ने हिलाया तो रूपाली की नींद टूटी. पापा उसको बिस्तर के बीच से उठाकर एक तरफ लिटा रहे थे.

"पापा" उसने नींद में कहा

"सो जाओ बेटा" पापा ने कहा और उसको थोड़ा साइड करके लिटा दिया.

आँखें बंद करने से पहले रूपाली ने देखा के बिस्तर के एक तरफ उसके भाई लेटा था, फिर वो और उसके साइड में पापा खुद लेटे हुए थे. उसने फिर से आँख बंद कर ली और सो गयी.

किसी के बात करने की आवाज़ सुनकर उसकी कच्ची नींद फिर से खुल गयी. उसने आँखें खोल कर देखा तो वो अब भी मम्मी पापा के कमरे में ही सो रही थी. कमरे में नाइट बल्ब जल रहा था और लाल रंग की हल्की सी रोशनी फेली हुई थी. मम्मी पापा कुच्छ बात कर रहे थे. रूपाली ने फिर आँख बंद करके सोने की कोशिश की पर अपने माँ बाप की बातें उसके कानो में पड़ने लगी.

"रूपाली को उसके कमरे में ही सुला आते ना" मम्मी कह रही थी

"नींद खराब हो जाती उसकी. सोने दो यहीं" पापा ने कहा

"तो आज रात ना करो फिर. जवान बेटी बगल में सो रही है कुच्छ तो शरम करो" मम्मी ने हल्के से हस्ते हुए कहा.

"अर्रे तो मैं कौन सा सब कुच्छ करने को कह रहा हो. बस ज़रा मुझे ठंडा कर दो वरना नींद नही आ रही" पापा की आवाज़ आई

"खुद तो आप ठंडे हो लोगे" मम्मी ने कहा "और मैं?"

"अर्रे तुम खुद ही तो कह रही हो के तुम्हारा महीना चल रहा है" पापा बोले तो रूपाली समझ गयी के वो किस बारे में बात कर रहे हैं.

जब उसके पीरियड्स शुरू हुए थे तो मम्मी ने समझाया था के ये हर औरत को हर महीने होता है. रूपाली ने बच्पने में पुछ लिया था के क्या उन्हें भी होता है और मम्मी ने हस्ते हुए कहा था के हां उन्हें भी हर महीने ऐसा ही होता है. पर मम्मी के पीरियड्स से पापा को क्या मतलब?

"वैसे अगर तुम चाहो तो कर तो मैं अब भी कर सकता हूँ" पापा बोले "थोड़े बहुत खून से ना तो मुझे कभी घबराहट हुई और ना ही डर लगा"

"छियैयियी" मम्मी ने कहा "बिल्कुल भी नही"

रूपाली फ़ौरन समझ गयी के पापा क्या करने की बात कर रहे थे. वो खेल जो उसने कुच्छ टाइम पहले देखा था आज रात फिर वही होना था.

रूपाली के दिमाग़ ने चिल्ला कर कहा के वो फ़ौरन अपने माँ बाप को बता दे के वो जाग रही है ताकि वो रुक जाएँ. उसने अपनी आँखें बंद कर रखी थी पर जानती थी पापा उसके बिल्कुल बगल में लेटे हुए थे और जो कुच्छ भी होता वो सब देखने वाली थी. वो इसके लिए अभी तैइय्यार नही थी. उसने अब तक अपने आपको उस दिन मम्मी पापा के कमरे में झाँकने के लिए माफ़ नही किया था और अब फिर से? नही ये नही हो सकता. वो ऐसा नही कर सकती.

सोचते हुए रूपाली ने अपनी आँखें खोली. कमरे में बस नाम बराबर की रोशनी थी इसलिए अगर उसकी आँखें खुली भी होती तो उसके माँ बाप को पता ना चलता. रूपाली ने कुच्छ कहने के लिए मुँह खोला ही था के सामने नज़र पड़ते ही उसकी ज़ुबान अटक गयी.

पापा अब भी बिस्तर पर उसके साइड में लेती हुए थे और मम्मी सामने शीसे के सामने खड़ी अपने बॉल बाँध रही थी. उनकी पीठ रूपाली की तरफ थी और हल्की सी रोशनी में रूपाली को पता चल गया के उन्होने सिर्फ़ एक पेटिकट पहेन रखा था. ना तो जिस्म पर सारी थी और ना ही ब्लाउस.

रूपाली समझ गयी के काफ़ी देर हो चुकी थी. उसको समझ नही आया के अब जबकि उसकी माँ कमरे में आधी नंगी खड़ी है तो वो कैसे ये एलान करे के वो जाग रही है.

तभी उसकी माँ पलटी और रूपाली के दिमाग़ ने जैसे काम करना बंद कर दिया.

उसकी माँ उपेर से पूरी नंगी थी. नाभि से थोड़ा सा नीचे पेटिकट बँधा हुआ था और उसके उपेर कुच्छ नही. रोशनी बहुत कम थी इसलिए रूपाली को सॉफ कुच्छ भी नही दिख रहा था पर उस हल्की सी रोशनी में उसकी नज़र अपनी माँ की चूचियो पर अटक गयी.

उसकी माँ की चूचियाँ काफ़ी बड़ी बड़ी थी और अपने ही वज़न से हल्की सी ढालाक कर नीचे को हो रखी थी. रूपाली को इससे पहला को वो दिन याद आया जब उसने अपनी माँ को नंगी देखा था. उस दिन मम्मी दीवार से सटी खड़ी थी इसलिए वो उन बड़ी बड़ी चूचियो को बस साइड से ही देख पाई थी पर आज सामने से देख रही थी. कमरे में अंधेरा होने की वजह से बस चूचियो की जैसे आउटलाइन ही नज़र आ रही थी.

रूपाली को एक पल के लिए अंधेरे का अफ़सोस हुआ और उसको लगा के काश रोशनी होती तो वो अच्छे से अपनी माँ को देख पाती.

और अगले ही पल वो शरम से पानी पानी हो गयी. उसके दिमाग़ ने उसको धिक्कारा के अपनी माँ के बारे में ऐसा सोच रही है.

मम्मी धीरे धीरे चलती बेड के नज़दीक आई. वो बेड के पास पापा के पैरों की तरफ आकर खड़ी हो गयी और धीरे से अपने हाथ उठाकर अपनी दोनो चूचिया अपने हाथ में पकड़ ली.

और धीरे धीरे दोनो चूचियाँ दबाने लगी.

रूपाली को ये बड़ा अजीब और अच्छा भी लगा. वो गौर से अपनी माँ को देखने लगी.

"अर्रे वहाँ क्या खड़ी हो. जल्दी यहाँ आओ ना" पापा की आवाज़ आई तो

रूपाली को एहसास हुआ के पापा उसके बिल्कुल बगल में लेटे हुए हैं. वो और पापा दोनो ही सीधे अपनी कमर पर आस पास लेटे हुए थे. रूपाली ने बिना अपनी गर्दन हिलाए अपनी नज़र घुमाई और पापा की तरफ देखा.

पापा भी कमर के उपेर बिल्कुल नंगे थे और उन्होने नीचे सिर्फ़ पाजामा पहेन रखा था. रूपाली ने देखा के उनके अपनी लड़कों वाली चीज़ को धीरे धीरे पाजामे के उपेर से रगड़ रहे थे और पाजामा वहाँ से उपेर को उठा हुआ था. वो जानती थी के ऐसा क्यूँ है. उस दिन भी उसने देखा था के पापा का एकदम टाइट हो रखा था और अब भी शायद पाजामे के अंदर ऐसे ही टाइट है जिसकी वजह से पाजामा उपेर है.

"क्या हमेशा लड़कों का ऐसा ही रहता है?" उसने सोचा "अगर हां तो आज से पहले पापा के पाजामे में ऐसा उठा हुआ क्यूँ नही दिखा?"

अगले ही पल रूपाली को उसके दिल ने फिर धिक्कारा के अपने पापा के बारे में ऐसा सोच रही है.

"रूपाली सो गयी ना?" उसकी माँ ने कहा तो पापा और मम्मी दोनो ने एक साथ रूपाली की तरफ देखा.

रूपाली ने फ़ौरन अपनी आँखें बंद कर ली.

"हां सो गयी वो" पापा बोले "अब उसको छ्चोड़ो और मेरे छ्होटे भाई को सुलाओ ताकि उसके बाद मैं भी आराम से सो सकूँ"

"छ्होटा भाई" रूपाली ने आँखें बंद किए हुए सोचा.

थोड़ी देर तक वो ऐसे ही चुप चाप आँखें बंद किए लेटी रही. आवाज़ और बेड के हिलने से उसको अंदाज़ा हो गया के मम्मी भी बेड पर आ चुकी हैं. थोड़ी देर तक बेड पर यूँ ही कभी किसी के हिलने की और कभी कपड़ो की आवाज़ होती रही.

"क्या आज भी पापा ऐसे ही मम्मी के पिछे से कर रहे हैं?" रूपाली ने सोचा

थोड़ी देर बाद आवाज़ आनी बंद हो गयी और सब खामोश सा हो गया.

"आअहह मेरी जान" पापा की आवाज़ आई.

रूपाली ने हिम्मत करके आँखें फिर खोली और कुच्छ पल के लिए समझने की कोशिश करने लगी के कमरे में हो क्या रहा है.

उसके पापा अब भी वैसे ही उसके बगल में लेटे हुए थे. मम्मी उनके पैरों के बीच बैठी हुई थी और आगे को झुकी हुई थी. उनके बॉल उनके चेहरे पर बिखर कर पापा के पेट पर गिरे हुए थे.

पापा के पेट पर नज़र पड़ते ही रूपाली समझ गयी के पापा ने पाजामा सरकाकर घुटनो तक कर रखा है.

उसकी माँ का सर उपेर नीचे हो रहा था और रूपाली समझ नही पा रही थी के माँ कर क्या रही है.

"ये बाल काट लो यहाँ से" कहते हुए उसकी माँ ने अपना सर उठाया.

अंधेरे में रूपाली ने देखा के उन्होने हाथ में एक डंडे जैसी चीज़ पकड़ रखी थी जो रूपाली अच्छी तरह जानती थी के क्या है. मम्मी उसको हाथ में पकड़ कर उपेर नीचे कर रही थी.

"क्यूँ तुम्हें मेरे बालों से क्या तकलीफ़ है?" पापा ने कहा

"अर्रे मैं मुँह में नही ले पाती ढंग से" मम्मी बोली "बाल मुँह में आते हैं तो अजीब सा लगता है"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --8

gataank se aage........................

"Mujhe samajh nahi aata ke jab Jai range haath pakda hi gaya hai toh is sab ki kya zaroorat hai?" Purushottam ne puchha

"Main sirf apni tasalli karna chahta hoon thakur sahab" Khan ne kaha "I just wanna make sure that the person who killed your father is indeed getting punished for it and not roaming around free"

"I appreciate it" Purushottam ne kaha "You have our full co-operation"

"Toh phir main chahunga ke main haweli ke har member se ek baar baat karun. You might find it offensive but i assure it its just a formality, just for paper work" Khan ne kaha

"Main sabse keh doonga ke aapke har sawal ka jawab aapko diya jaaye" Purushottam ne kaha

"Thnx a lot" Khan ne kaha "I will take your leave now"

Kehkar Khan haweli se nikal hi raha tha ke pichhe se purushottam ki aawaz aayi

"Kya ab ham Kamre mein cheezen badal sakte hain? You see i am really not comfortable with leaving my father's blood on that rug"

"Ji zuroor" Khan ne kaha "Ap vo kaaleen ab hata sakte hain"

Haweli se bahar jaate Khan ki nazar drawing room mein bethi ladki par padi. Vo behad khoobsurat thi aur isi vajah se Khan ki nazar jaise uspar atak kar reh gayi. Khan janta tha ke vo Thakur ki bethi Kamini hai. Dil hi dil mein khoobsurati ki taareef karta Khan haweli se bahar aa gaya.

Us din ke baad agle kuchh weeks tak Rupali ajeeb uljhan se guzri. Din mein baar baar uske shareer mein ajeeb si feeling hoti jiske baad vo fauran kahin akele mein jaati aur apni taangi ke beech haath lagati. Ek ajeeb sa nasha aur maza jism mein daud jata, phir badhta jaata aur achanak uski taango ke beech sab geela ho jaata.

Jahan Rupali ko ye karne mein bahut maza aata tha vahin maza khatam hone ke baad phir se vahi guilt feeling dimag par sawar ho jaati. Usko lagta ke vo kitni gandi ho gayi hai ke aise gande gande kaam kar rahi hai. Agar kisi ko pata chal gaya toh? Isi darr se vo us din ke baad na toh phir se apne maan baap ko dekhne ki himmat juta paayi aur na hi Shambhu Kaka aur Kallo ko dekhne ki.

Kuchh hafto baad ek din uske bhai ki tabiat kaafi kharab ho gayi. Tez bukhar tha aur Mummy kuchh din se usko apne paas hi sula rahi thi. Us raat Rupali bhi apne mummy papa ke kamre mein hi bethi thi. Uska bhai so chuka tha aur vo mummy papa ke saath bethi ek movie dekh rahi thi. Movie dekhte dekhte vo vahin bistar par let gayi aur pata hi na chala ke kab aankh lag gayi.

Usko kisi ne hilaya toh Rupali ki neend tooti. Papa usko bistar ke beech se uthakar ek taraf lita rahe the.

"Papa" Usne neend mein kaha

"So jao beta" Papa ne kaha aur usko thoda side karke lita diya.

Aankhen band karne se pehle Rupali ne dekha ke bistar ke ek taraf uske bhai leta tha, phir vo aur uske side mein Papa khud lete hue the. Usne phir se aankh band kar li aur so gayi.

Kisi ke baat karne ki aawaz sunkar uski kachchi neend phir se khul gayi. Usne aankhen khol kar dekha toh vo ab bhi Mummy Papa ke kamre mein hi so rahi thi. Kamre mein night bulb jal raha tha aur laal rang ki halki si roshni pheli hui thi. Mummy papa kuchh baat kar rahe the. Rupali ne phir aankh band karke sone ki koshish ki par apne maan baap ki baaten uske kaano mein padne lagi.

"Rupali ko uske kamre mein hi sula aate na" Mummy keh rahi thi

"Neend kharab ho jaati uski. Sone do yahin" Papa ne kaha

"Toh aaj raat na karo phir. Jawan beti bagal mein so rahi hai kuchh toh sharam karo" Mummy ne halke se haste hue kaha.

"Arre toh main kaun sa sab kuchh karne ko keh raha ho. Bas zara mujhe thanda kar do varna neend nahi aa rahi" Papa ki aawaz aayi

"Khud toh aap thande ho loge" Mummy ne kaha "Aur main?"

"Arrey tum khud hi toh keh rahi ho ke tumhara mahina chal raha hai" Papa bole toh Rupali samajh gayi ke vo kis baare mein baat kar rahe hain.

Jab uske periods shuru hue the toh Mummy ne samjhaya tha ke ye har aurat ko har mahine hota hai. Rupali ne bachpane mein puchha liya tha ke kya unhen bhi hota hai aur Mummy ne haste hue kaha tha ke haan unhen bhi har mahine aisa hi hota hai. Par Mummy ke periods se Papa ko kya matlab?

"Vaise agar tum chaho toh kar toh main ab bhi kar sakta hoon" Papa bole "Thode bahut khoon se na toh mujhe kabhi ghabrahat hui aur na hi darr laga"

"Chhhhiiii" Mummy ne kaha "Bilkul bhi nahi"

Rupali fauran samajh gayi ke Papa kya karne ki baat kar rahe the. Vo khel jo usne kuchh time pehle dekha tha aaj raat phir vahi hona tha.

Rupali ke dimaag ne chilla kar kaha ke vo fauran apne maan baap ko bata de ke vo jaag rahi hai taaki vo ruk jaayen. Usne apni aankhen band kar rakhi thi par jaanti thi Papa uske bilkul bagal mein lete hue the aur jo kuchh bhi hota vo sab dekhne wali thi. Vo iske liye abhi taiyyar nahi thi. Usne ab tak apne aapko us din mummy papa ke kamre mein jhaankne ke liye maaf nahi kiya tha aur ab phir se? Nahi ye nahi ho sakta. Vo aisa nahi kar sakti.

Sochte hue Rupali ne apni aankhen kholi. Kamre mein bas naam barabar ki roshni thi isliye agar uski aankhen khuli bhi hoti toh uske maan baap ko pata na chalta. Rupali ne kuchh kehne ke liye munh khola hi tha ke saamne nazar padte hi uski zubaan atak gayi.

Papa ab bhi bistar par uske side mein lete hue the aur Mummy saamne sheese ke saamne khadi apne baal baandh rahi thi. Uni peeth Rupali ki taraf thi aur halki si rohsni mein Rupali ko pata chal gaya ke unhone sirf ek petticot pehen rakha tha. Na toh jism par saree thi aur na hi blouse.

Rupali samajh gayi ke kaafi der ho chuki thi. Usko samajh nahi aaya ke ab jabki uski maan kamre mein aadhi nangi khadi hai toh vo kaise ye elaan kare ke vo jaag rahi hai.

Tabhi uski maan palti aur Rupali ke dimaag ne jaise kaam karna band kar diya.

Uski maan uper se poori nangi thi. Naabhi se thoda sa neeche petticot bandha hua tha aur uske uper kuchh nahi. Roshni bahut kam thi isliye Rupali ko saaf kuchh bhi nahi dikh raha tha par us halki si roshni mein uski nazar apni maan ki chhatiyon par atak gayi.

Uski maan ki chhatiyan kaafi badi badi thi aur apne hi vazan se halki si dhalak kar neeche ko ho rakhi thi. Rupali ko isse pehla ko vo din yaad aaya jab usne apni maan ko nangi dekha tha. Us din Mummy deewar se sati khadi thi isliye vo un badi badi chhatiyon ko bas side se hi dekh paayi thi par aaj saamne se dekh rahi thi. Kamre mein andhera hone ki vajah se bas chhatiyon ki jaise outline hi nazar aa rahi thi.

Rupali ko ek pal ke liye andhere ka afsos hua aur usko laga ke kaash roshni hoti toh vo achhe se apni maan ko dekh paati.

Aur agle hi pal vo sharam se pani pani ho gayi. Uske dimag ne usko dhikkara ke apni maan ke baare mein aisa soch rahi hai.

Mummy dheere dheere chalti bed ke nazdeek aayi. Vo bed ke paas papa ke pairon ki taraf aakar khadi ho gayi aur dheere se apne haath uthakar apni dono chhatiyan apne haath mein pakad li.

Aur dheere dheere dono chhatiyan dabane lagi.

Rupali ko ye bada ajeeb aur achha bhi laga. Vo gaur se apni maan ko dekhne lagi.

"Arrey vahan kya khadi ho. Jaldi yahan aao na" Papa ki aawaz aayi toh

Rupali ko ehsaas hua ke Papa uske bilkul bagal mein lete hue hain. Vo aur Papa dono hi sidhe apni kamar par aas paas lete hue the. Rupali ne bina apni gardan hilaye apni nazar ghumayi aur Papa ki taraf dekha.

Papa bhi kamar ke uper bilkul nange the aur unhone neeche sirf pajama pehen rakha tha. Ruapli ne dekha ke unke apni ladkon wali cheez ko dheere dheere pajame ke uper se ragad rahe the aur pajama vahan se uper ko utha hua tha. Vo janti thi ke aisa kyun hai. Us din bhi usne dekha tha ke Papa ka ekdam tight ho rakha tha aur ab bhi shayad pajame ke andar aise hi tight hai jiki vajah se pajama uper hai.

"Kya hamesha ladkon ka aisa hi rehta hai?" Usne socha "Agar haan toh aaj se pehle Papa ke pajame mein aisa utha hua kyun nahi dikha?"

Agle hi pal Rupali ko uske dil ne phir dhikkara ke apne Papa ke baare mein aisa soch rahi hai.

"Rupali so gayi na?" Uski maan ne kaha toh Papa aur Mummy dono ne ek saath Rupali ki taraf dekha.

Rupali ne fauran apni aankhen band kar li.

"Haan so gayi vo" Papa bole "Ab usko chhodo aur mere chhote bhai ko sulao taaki uske baad main bhi aaram se so sakun"

"chhota Bhai" Rupali ne aankhen band kiye hue socha.

Thodi der tak vo aise hi chup chap aankhen band kiye leti rahi. Aawaz aur bed ke hilne se usko andaza ho gaya ke Mummy bhi bed par aa chuki hain. Thodi der tak bed par yun hi kabhi kisi ke hilne ki aur kabhi kapdo ki aawaz hoti rahi.

"Kya aaj bhi Papa aise hi Mummy ke pichhe se kar rahe hain?" Rupali ne socha

Thodi der baad aawaz aani band ho gayi aur sab khamosh sa ho gaya.

"Aaahhh meri jaan" Papa ki aawaz aayi.

Rupali ne himmat karke aankhen phir kholi aur kuchh pal ke liye samajhne ki koshish karne lagi ke kamre mein ho kya raha hai.

Uske Papa ab bhi vaise hi uske bagal mein lete hue the. Mummy unke pairon ke beech baithi hui thi aur aage ko jhuki hui thi. Une baal unke chehre par bikhar kar papa ke pet par gire hue the.

Papa ke pet par nazar padte hi Rupali samajh gayi ke Papa ne pajama sarka ghutno tak kar rakha hai.

Uski maan ka sar uper neeche ho raha tha aur Rupali samajh nahi pa rahi thi ke maan kar kya rahi hai.

"Ye baal kaat lo yahan se" Kehte hue uski maan ne apna sar uthaya.

Andhere mein Rupali ne dekha ke unhone haath mein ek dande jaisi cheez pakad rakhi thi jo Rupali achhi tarah jaanti thi ke kya hai. Mummy usko haath mein pakad kar uper neeche kar rahi thi.

"Kyun tumhein mere baalon se kya takleef hai?" Papa ne kaha

"Arrey main munh mein nahi le paati dhang se" Mummy boli "Baal munh mein aate hain toh ajeeb sa lagta hai"

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:59

खूनी हवेली की वासना पार्ट --9

गतान्क से आगे........................

"रूपाली को जैसा झटका सा लगा. मुँह में? तो क्या मम्मी ने पापा की लड़कों वाली चीज़ मुँह में ले रखी थी? और अगले ही पल उसका शक सही साबित हो गया.

"हां काट लूँगा" कहते हुए पापा ने मम्मी का सर पकड़ा और नीचे को झुकाया. मम्मी ने मुँह खोला और पापा का अपने मुँह में ले लिया.

"छियैयियी मम्मी" रूपाली को जैसे उल्टी सी आ गयी.

उसकी माँ पापा का अपने मुँह में लेकर मुँह में अंदर बाहर कर रही थी. एक हाथ से उन्होने पापा का अपने हाथ में नीचे से पकड़ा हुआ था और धीरे धीरे हिला भी रही थी. जब वो मुँह में लेती तो हाथ नीचे चला जाता और जब मुँह से बाहर निकलती तो हाथ उपेर को आता.

"आउच" पापा ने अचानक कहा "काट क्यूँ रही हो?"

"आप तो बाल काटोगे नही" मम्मी ने अपने मुँह से बाहर निकाला और बोली "तो मैने सोचा के मैं ही काट लूँ"

"ये काटने के लिए नही मेरी जान चूसने के लिए है" पापा बोले और मम्मी ने फिर उनका मुँह में ले लिया

अब रूपाली को समझ आया के मम्मी क्या कर रही थी. वो पापा का चूस रही थी.

"छीयियी मम्मी" रूपाली ने देखते हुए सोचा "ये भी कोई चूसने की चीज़ है?"

उस हल्की सी रोशनी में कुच्छ देर तक यूँ ही मम्मी का सर उपेर नीचे होता रहा. कभी वो मुँह में लेके चूस्ति तो कभी जीभ बाहर निकाल कर चाटने लगती. कर वो रही थी और रूपाली को लग रहा था के जैसे उल्टी उसको आ जाएगी.

"निकलने वाला है मेरा" पापा की साँसें तेज़ हो चली थी "आज मुँह में ही निकाल लो ना प्लीज़"

"बिल्कुल नही" मम्मी ने कहा "चूस्टे हुए तुम्हारा थोड़ा सा भी अगर निकल आता है तो मुझे उबकाई आने लगती है"

"अच्छा ज़रा तेज़ तेज़ करो" पापा ने कहा

"बता देना जब निकलने लगे तो" मम्मी ने कहा और फिर मुँह में लेकर चूसने लगी

अब उनका सर तेज़ी से उपेर नीचे हो रहा था और मुँह के साथ साथ नीचे से हाथ भी उतनी ही तेज़ी से हिल रहा था. वो अब इतनी तेज़ी से चूस रही थी के कमरे में उनके चूसने की आवाज़ उठने लगी थी. रूपाली के साइड में लेटे पापा भी आह आह की आवाज़ कर रहे थे और उनकी साँस तेज़ हो गयी.

"निकल गया" अचानक पापा ने कहा

उनके कहते ही मम्मी ने फ़ौरन मुँह से निकाला और सीधी होकर बैठ गयी. उन्होने अब भी हाथ में पकड़ रखा था और हाथ तेज़ी से उपेर नीचे हो रहा था.

"आअहह" पापा ने आवाज़ की ओर उनका जिस्म जैसे काँपने लगा. क्या हुआ रूपाली को समझ नही आया पर अब जब मम्मी हिला रही थी तो कुच्छ फ़च फ़च की आवाज़ आने लगी.

और फिर रूपाली को लगा के कुच्छ गीला गीला सा आकर उसके हाथ पर गिरा. उसने अपने उंगलियाँ हिलाई तो कोई लिपलिपि सी चीज़ उसके हाथ पर पड़ी थी.

इस पूरे दौरान जो नयी बात हुई वो ये थी के रूपाली को ज़रा भी बुरा नही लगा और ना ही वो गिल्ट फीलिंग आई जिसने उसे काफ़ी दिन से परेशान कर रखा था.

ख़ान इनटेरगेशन रूम में बहा था. सामने कुर्सी पर था जै.

"मैं ज़्यादा बकवास करने वाला आदमी नही हूँ जाई" ख़ान ने कहा "और ना ही ज़्यादा बकवास सुनना पसंद करता हूँ"

जै चुप रहा.

"तो मैं तुमसे भी सीधी सीधी बात ही करता हूँ और उम्मीद करता हूँ के तुम भी मुझे सीधे सीधे ही जवाब दोगे" ख़ान ने बात जारी रखी और सवालिया नज़रों से जै की तरफ देखा.

जै फिर भी नज़रें झुकाए चुप ही रहा.

"देखो जै. तुम्हारे खिलाफ एक ओपन आंड शूट केस है. तुम फिलहाल पोलीस कस्टडी में हो इसलिए जब तक पोलीस सारे सबूत फाइनलाइस करके कोर्ट में केस सब्मिट नही करती तब तक तुम्हारा केस शुरू नही होगा पर उसमें ज़्यादा वक़्त नही लगेगा. कोर्ट में पुरुषोत्तम का वकील एक घंटे में ये साबित कर देगा के खून तुमने किया है और बस फिर हो गया तुम्हारा काम. ठाकुर खानदान का रुतबा और पहुँच काफ़ी आगे तक है इसलिए तुम ये मानकर ही चलो के तुम्हें सीधे फंदे पर ही लटकाया जाएगा. उमर क़ैद की उम्मीद तो करना ही मत.

जै ने नज़र उठाकर ख़ान की तरफ देखा. आँखों में डर सॉफ नज़र आ रहा था.

"तुम्हारे और तुम्हारी मौत के बीचे तुम बस ये मान लो के सिर्फ़ मैं खड़ा हूँ. यहाँ मैने हाथ खड़े किए और वहाँ तुम गये उपेर" ख़ान ने हाथ से आसमान की तरफ इशारा करते हुए कहा

"पर क्यूँ?" जै ने कहा

"क्या मतलब?" ख़ान बोला "क्यूँ क्या?"

"आप क्यूँ खड़े हैं? जै धीरे से बोला

"अजीब एहसान फारमोश हो यार" ख़ान बोला "मैं तुम्हारी जान बचाने की कोशिश कर रहा हूँ और तुम कहते हो के क्यूँ? क्यूँ भाई? मरने का बहुत शौक है?

जै ने फिर कुच्छ नही कहा

"तो सुनो" ख़ान बोला "मैं सिर्फ़ ये इसलिए कर रहा हूँ के तुमसे हमदर्दी है मुझे. फॉर सम रीज़न मेरा दिल कहता है के तुमने खून नही किया. मैं ये नही कहता के मैं बहुत ईमानदार और शरीफ पोलिकवाला हूँ बट फॉर सम पर्सनल रीज़न्स, किसी के साथ ना-इंसाफी होते नही देख सकता मैं. इसलिए तुम्हें बचाने की कोशिश कर रहा हूँ"

जै ने हां में गर्दन हिलाई.

"गुड. तो अब हम बात करें या अब भी मरने की ख्वाहिश है तुम्हारे दिल में? अगर ऐसा है तो बता दो. मेरा पास और भी काम है. जाके वो करूँगा, तुम्हारे साथ टाइम वेस्ट क्यूँ करूँगा"

जै कुच्छ देर खामोश रहा और फिर बोला.

"पूछिए क्या पुच्छना है"

जै की उमर कोई 35 के आस पास होगी. देखने में वो पक्का ठाकुर लगता था. लंबा कद, चौड़ा सीना, गाथा हुआ शरीर, गोरा रंग, तीखे नैन नक्श, चेहरे पर पूरा रौब. पर उस वक़्त वो अपनी उमर से 10 साल बड़ा और कई हफ़्तो का बीमार लग रहा था.

"गुड" ख़ान हाथ मलते हुए बोला "वैसे तो इस सवाल का जवाब क्वाइट ऑब्वियस है पर फिर भी मैं पुछ ही लेता हूँ. ठाकुर साहब को तुमने मारा?"

जै ने इनकार में गर्दन हिलाई

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान ने कहा "तुम मौका-ए-वारदात से रंगे हाथ पकड़े गये थे. तुम्हारे आने से 10 मिनट पहले ठाकुर साहब को ज़िंदा देखा गया था. फिर तुम आए और ठाकुर साहब मारे गये. इस बीच उनके कमरे में कोई नही गया इस बात के गवाह कई लोग हैं. मतलब ठाकुर साहब को लोगों ने ज़िंदा देखा, फिर तुम कमरे में गये और ठाकुर साहब मुर्दा.

"उनको मेरे आने से पहले ही किसी ने मार दिया था. जब मैं कमरे में दाखिल हुआ तो वो ज़मीन पर पड़े हुए थे. मैने सिर्फ़ उनको सहारा देकर उठाने की कोशिश कर रहा था क्यूंकी मुझे लगा के वो गिर गये हैं जिसकी वजह से उनको चोट लगी और खून निकल रहा था. मुझे क्या पता था के वो मरे पड़े थे. मैं उनको उठाने की कोशिश कर ही रहा था के तभी वो मनहूस नौकरानी आ गयी"

ख़ान ने सामने पड़ी एक फाइल उठाई

"ये बात तो मैं तुम्हारे स्टेट्मेंट में ऑलरेडी पढ़ चुका हूँ. जो एक बात तुम्हारे सॅट्मेंट में नही थी वो ये थी के इतनी रात को तुम वहाँ करने क्या गये थे?"

"चाचा जी ने बुलाया था" जै बोला

"ठाकुर साहब ने?" ख़ान फाइल वापिस बंद करते हुए बोला

"हां" जै बोला "उन्होने मुझे फोन करके फ़ौरन आने को कहा था जिसकी वजह से मैं उस मनहूस घड़ी में हवेली जा पहुँचा"

"क्यूँ बुलाया था?" ख़ान ने कहा

"पता नही. फोन पर बताया नही उन्होने. बस आने को कहा था"

ख़ान कुच्छ देर तक मुस्कुराते हुए जै को देखता रहा

"सही जा रहे हो दोस्त. पहले जब तुमसे पुछा गया था के तुम हवेली क्यूँ पहुँचे तो तुमने बताया नही क्यूंकी उस वक़्त तुम सच च्छूपा रहे थे. अब आराम से बैठके 2 दिन तक अच्छे से सोचकर मुझे ये कहानी सुना रहे हो?"

"नही" जै ने फ़ौरन जवाब दिया "यही सच है. आप चाहें तो मेरे फोन रेकॉर्ड्स चेक कर सकते हैं. उस रात मेरे मोबाइल पर हवेली से फोन आया"

"वो तो मैं चेक करूँगा ही जै पर तुम मुझे ये बताओ के जब तुमसे ये पहले पुछा गया था के तुम हवेली में क्या कर रहे थे तो तुम चुप क्यूँ रहे. तब क्यूँ नही बताया के ठाकुर साहब ने बुलाया था?"

"मैं कहता भी तो कौन मानता ख़ान साहब" जै ने बोला "उस वक़्त मैं डर गया था. मेरे अपने ही मेरे खिलाफ खड़े थे. हर कोई मुझे खूनी कह रहा था, अपने ही चाहा का खूनी. उस वक़्त सब कुच्छ इतना अचानक हुआ के मुझे समझ ही नही आया के किस बात का क्या जवाब दूँ"

ख़ान हल्के से हसा.

"कमाल हैं यार. तुम्हें इतना समझ आ गया के तुम सबको ये बता दो के तुमने खून नही किया और जब तुम वहाँ पहुँचे तो खून ऑलरेडी हो चुका था पर तुम्हें ये समझ नही आया के तुम सबको ये बता दो के ठाकुर साहब ने ही तुम्हें उस रात हवेली में बुलाया था? ह्म्‍म्म्मम?

"अब आप जो चाहे कह लें" जै बोला "सच यही है"

"चलो मान लेते हैं तुम्हारी बात" ख़ान आगे को झुका "वैसे तुम्हारी शकल देखकर लग नही रहा के अपने चाचा के मारने का ज़रा भी अफ़सोस है तुम्हें"

"जिस इंसान से मैं पिच्छले 10 साल में सिर्फ़ कोर्ट में ही मिला, कभी जिससे सीधे मुँह बात नही हुई, जिसके साथ मैं कोर्ट में केस लड़ रहा हूँ उसके मरने पर क्या अफ़सोस हो सकता है ख़ान साहब?" जै बोला

"बात तो सही कह रहे हो" ख़ान ने कहा "वैसे ये कोर्ट केस प्रॉपर्टी को लेकर ही है ना?"

"हाँ" जै बोला "मेरे पिता और चाचा जी जायदाद में बराबर के हिस्सेदार थे तो इस हिसाब से मेरा आधी प्रॉपर्टी पर हक़ बनता है पर मुझे मिला क्या? एक शहर में मकान और थोड़ी सी ज़मीन."

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान ने गर्दन हिलाई

"आप ये सोचिए ना ख़ान साहब. मैं उनके साथ कोर्ट में केस लड़ रहा था जिसके जीतने पर मैं प्रॉपर्टी से और हिस्सा ले सकता था. उनको मारके मुझे क्या मिलता, मिलता तो उनसे केस जीतकर. उनके मरने से तो बल्कि मुझे नुकसान हुआ. अब प्रॉपर्टी जाने कितने हिस्सो में बट जाएगी. पहले जहाँ मैं सिर्फ़ एक चाचा जी से केस लड़ रहा था, अब उनके 3 बेटों से लडूँगा"

"बात तो सही कह रहे हो" ख़ान बोला "ये पॉइंट यूज़ कर सकते हैं हम तुम्हारे फेवर में कोर्ट में बट फॉर नाउ, इट ब्रिंग्स उस टू अनदर पॉइंट. तुम्हारे साथ ऐसा सलूक क्यूँ हुआ?"

"मतलब?" जै ने सवालिया नज़र से ख़ान की तरफ देखा.

"मतलब के जहाँ तक मुझे पता है, तुम्हारे माँ बाप काफ़ी पहले मर गये थे, जब तुम काफ़ी छ्होटे थे. उसके बाद ठाकुर साहब ने पाल पोसकर तुम्हें बड़ा किया और एक दिन अचानक हवेली से निकाल दिया. क्यूँ?"

"क्यूंकी मैने प्रॉपर्टी में हिस्सा माँगा था" जै बोला

"कॅरी ऑन ... बोलते रहो" ख़ान ने इशारा किया

"जब तक मैं उनके टुकड़ो पर पलता रहा तब तक सब ठीक था. कोई प्राब्लम नही, कोई इश्यू नही पर जिस दिन मैने उनसे प्रॉपर्टी में अपने हिस्से की बात की उसी दिन मुझे लात मारकर निकाल दिया गया" जै ने कहा

"उमर क्या है तुम्हारी?" ख़ान ने अचानक पुछा

"जी?" जै अचानक उठे इस सवाल से चौंक पड़ा

"एज... हाउ ओल्ड आर यू?" ख़ान ने सवाल दोहराया

"33. क्यूँ?" जै ने पुछा

"ह्म्‍म्म्मम" ख़ान ने दोबारा फाइल खोली "इसमें 35 लिखी है. खैर. अब तुम 33 के हो और ये कॅब्की बात है, जब तुम्हें निकाल दिया गया था?"

"कोई 10 साल पहले की" जै जे जवाब दिया

"यानी तब तुम 23 के थे. डोंट यू थिंक यू वर ए लील यंग टू अस्क फॉर युवर शेर इन दा प्रॉपर्टी?"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --9

gataank se aage........................

Rupali ko jaisa jhatka sa laga. Munh mein? Toh kya Mummy ne papa ki ladkon wali cheez munh mein le rakhi thi? Aur agle hi pal uska shak sahi saabit ho gaya.

"Haan kaat loonga" Kehte hue papa ne mummy ka sar pakda aur neeche ko jhukaya. Mummy ne munh khola aur papa ka apne munh mein le liya.

"Chhhhiiii Mummy" Rupali ko jaise ulti si aa gayi.

Uski maan papa ka apne munh mein lekar munh mein andar bahar kar rahi thi. Ek haath se unhone papa ka apne haath mein neeche se pakda hua tha aur dheere dheere hila bhi rahi thi. Jab vo munh mein leti toh haath neeche chala jaata aur jab munh se bahar nikalti toh haath uper ko aata.

"Ouch" Papa ne achanak kaha "Kaat kyun rahi ho?"

"Aap toh baal kaatoge nahi" Mummy ne apne munh se bahar nikala aur boli "Toh main socha ke main hi kaat loon"

"Ye kaatne ke liye nahi meri jaan choosne ke liye hai" Papa bole aur mummy ne phir unka munh mein le liye

Ab Rupali ko samajh aaya ke Mummy kya kar rahi thi. Vo papa ka choos rahi thi.

"Chhiii Mummy" Rupali ne dekhte hue socha "Ye bhi koi choosne ki cheez hai?"

Us halki si roshni mein kuchh der tak yun hi Mummy ka sar uper neeche hota raha. Kabhi vo munh mein leke choosti toh kabhi jeebh bahar nikal kar chaatne lagti. Kar vo rahi thi aur Rupali ko lag raha tha ke jaise ulti usko aa jayegi.

"Nikalne wala hai mera" Papa ki saansen tez ho chali thi "Aaj munh mein hi nikal lo na please"

"Bilkul nahi" Mummy ne kaha "Chooste hue tumhara thoda sa bhi agar nikal aata hai to mujhe ubkaai aane lagti hai"

"Achha zara tez tez karo" Papa ne kaha

"Bata dena jab nikalne lage toh" Mummy ne kaha aur phir munh mein lekar choosne lagi

Ab unka sar tezi se uper neeche ho raha tha aur munh ke saath saath neeche se haath bhi utni hi tezi se hil raha tha. Vo ab itni tezi se choos rahi thi ke kamre mein unke choosne ki aawaz uthne lagi thi. Rupali ke side mein lete Papa bhi aah aah ki aawaz kar rahe the aur unki saans tez ho gayi.

"Nikal gaya" Achanak Papa ne kaha

Unke kehte hi Mummy ne fauran munh se nikala aur sidhi hokar beth gayi. Unhone ab bhi haath mein pakad rakha tha aur haath tezi se uper neeche ho raha tha.

"Aaahhhhh" Papa ne aawaz ki aur unka jism jaise kaanpne laga. Kya hua Ruapki ko samajh nahi aaya par ab jab Mummy hila rahi thi toh kuchh phach phach ki aawaz aane lagi.

Aur phir Rupali ko laga ke kuchh geela geela sa aakar uske haath par gira. Usne apne ungliyan hilayi toh koi liplipi si cheez uske haath par padi thi.

Is poore dauran jo nayi baat hui vo ye thi ke Rupali ko zara bhi bura nahi laga aur na hi vo guilt feeling aayi jisne use kaafi din se pareshaan kar rakha tha.

Khan interrogation room mein beha tha. Saamne kursi par tha Jai.

"Main zyada bakwaas karne wala aadmi nahi hoon Jai" Khan ne kaha "Aur na hi zyada bakwaas sunna pasand karta hoon"

Jai chup raha.

"Toh main tumse bhi sidhi sidhi baat hi karta hoon aur ummeed karta hoon ke tum bhi mujhe sidhe sidhe hi jawab doge" Khan ne baat jaari rakhi aur sawaliya nazaron se Jai ki taraf dekha.

Jai phir bhi nazren jhukaye chup hi raha.

"Dekho Jai. Tumhare khilaf ek open and shut case hai. Tum filhal police custody mein ho isliye jab tak police saare saboot finalise karke court mein case submit nahi karti tab tak tumhara case shuru nahi hoga par usmein zyada waqt nahi lagega. Court mein Purushottam ka wakeel ek ghante mein ye saabit kar dega ke khoon tumne kiya hai aur bas phir ho gaya tumhara kaam. Thakur khandaan ka rutba aur pahunch kaafi aage tak hai isliye tum ye maankar hi chalo ke tumhein sidhe phande par hi latkaya jaayega. Umar qaid ki ummeed toh karna hi mat.

Jai ne nazar uthakar Khan ki taraf dekha. Aankhon mein darr saaf nazar aa raha tha.

"Tumhare aur tumhari maut ke beeche tum bas ye maan lo ke sirf main khada hoon. Yahan maine haath khade kiye aur vahan tum gaye uper" Khan ne haath se aasman ki taraf ishara karte hue kaha

"Par kyun?" Jai ne kaha

"Kya matlab?" Khan bola "Kyun kya?"

"Aap kyun khade hain? Jai dheere se bola

"Ajeeb ehsaan faramosh ho yaar" Khan bola "Main tumhari jaan bachane ki koshish kar raha hoon aur tum kehte ho ke kyun? Kyun bhai? Marne ka bahut shauk hai?

Jai ne phir kuchh nahi kaha

"Toh suno" Khan bola "Main sirf ye isliye kar raha hoon ke tumse hamdardi hai mujhe. For some reason mera dil kehta hai ke tumne khoon nahi kiya. Main ye nahi kehta ke main bahut imandaar aur shareef policewala hoon but for some personal reasons, kisi ke saath na-insafi hote nahi dekh sakta main. Isliye tumhein bachane ki koshish kar raha hoon"

Jai ne haan mein gardan hilayi.

"Good. Toh ab ham baat karen ya ab bhi marne ki khwahish hai tumhare dil mein? Agar aisa hai toh bata do. Mera paas aur bhi kaam hai. Jaake vo karunga, tumhare saath time waste kyun karunga"

Jai kuchh der khamosh raha aur phir bola.

"Puchhiye kya puchhna hai"

Jai ki umar koi 35 ke aas paas hogi. Dekhne mein vo pakka thakur lagta tha. Lamba kad, chauda seena, gatha hua shareer, Gora rang, teekhe nain naksh, chehre par poora raub. Par us waqt vo apni umar se 10 saal bada aur kai hafto ka beemar lag raha tha.

"Good" Khan haath malte hue bola "Vaise toh is sawal ka jawab quite obvious hai par phir bhi main puchh hi leta hoon. Thakur sahab ko tumne mara?"

Jai ne inkaar mein gardan hilayi

"Hmmmm" Khan ne kaha "Tum mauka-e-vaardat se range haath pakde gaye the. Tumhare aane se 10 min pehle thakur sahab ko zinda dekha gaya tha. Phir tum aaye aur thakur sahab maare gaye. Is beech unke kamre mein koi nahi gaya is baat ke gawah kai log hain. Matlab thakur sahab ko logon ne zinda dekha, phir tum kamre mein gaye aur thakur sahab murda.

"Unko mere aane se pehle hi kisi ne maar diya tha. Jab main kamre mein daakhil hua toh vo zameen par pade hue the. Maine sirf unko sahara dekar uthane ki koshish kar raha tha kyunki mujhe laga ke vo gir gaye hain jiski vajah se unko chot lagi aur khoon nikal raha tha. Mujhe kya pata tha ke vo mare pade the. Main unko uthane ki koshish kar hi raha tha ke tabhi vo manhoos naukrani aa gayi"

Khan ne saamne padi ek file uthaye

"Ye baat toh main tumhare statement mein already padh chuka hoon. Jo ek baat tumhare satement mein nahi thi vo ye thi ke itni raat ko tum vahan karne kya gaye the?"

"Chacha ji ne bulaya tha" Jai bola

"Thakur sahab ne?" Khan file vaapis band karte hue bola

"Haan" Jai bola "Unhone mujhe phone karke fauran aane ko kaha tha jiski vajah se main us manhoos ghadi mein haweli ja pahuncha"

"Kyun bulaya tha?" Khan ne kaha

"Pata nahi. Phone par bataya nahi unhone. Bas aane ko kaha tha"

Khan kuchh der tak muskurate hue Jai ko dekhta raha

"Sahi ja rahe ho dost. Pehle jab tumse puchha gaya tha ke tum haweli kyun pahunche toh tumne bataya nahi kyunki us waqt tum sach chhupa rahe the. Ab aaram se bethke 2 din tak achhe se sochkar mujhe ye kahani suna rahe ho?"

"Nahi" Jai ne fauran jawab diya "Yahi sach hai. Aap chahen toh mere phone records check kar sakte hain. Us raat mere mobile par haweli se phone aaya"

"Vo toh main check karunga hi Jai par tum mujhe ye batao ke jab tumse ye pehle puchha gaya tha ke tum haweli mein kya kar rahe the toh tum chup kyun rahe. Tab kyun nahi bataya ke Thakur sahab ne bulaya tha?"

"Main kehta bhi toh kaun manta Khan Sahab" Jai ne bola "Us waqt main darr gaya tha. Mere apne hi mere khilaff khade the. Har koi mujhe khooni keh raha tha, apne hi chaha ka khooni. Us waqt sab kuchh itna achanak hua ke mujhe samajh hi nahi aaya ke kis baat ka kya jawab doon"

Khan halke se hasa.

"Kamal hain yaar. Tumhen itna samajh aa gaya ke tum sabko ye bata do ke tumne khoon nahi kiya aur jab tum vahan pahunche toh khoon already ho chuka tha par tumhein ye samajh nahi aaya ke tum sabko ye bata do ke Thakur sahab ne hi tumhein us raat haweli mein bulaya tha? Hmmmmm?

"Ab aap jo chahe keh lein" Jai bola "Sach yahi hai"

"Chalo maan lete hain tumhari baat" Khan aage ko jhuka "Vaise tumhari shakal dekhkar lag nahi raha ke apne chacha ke marne ka zara bhi afsos hai tumhein"

"Jis insaan se main pichhle 10 saal mein sirf court mein hi mila, kabhi jisse sidhe munh baat nahi hui, jiske saath main court mein case lad raha hoon uske marne par kya afsos ho sakta hai Khan Sahab?" Jai bola

"Baat toh sahi keh rahe ho" Khan ne kaha "Vaise ye court case property ko lekar hi hai na?"

"Haan" Jai bola "Mere pita aur Chacha ji jaaydad mein barabar ke hissedar the toh is hisab se mera aadhi property par haq banta hai par mujhe mila kya? Ek shehar mein makaan aur thodi si zameen."

"Hmmmm" Khan ne gardan hilayi

"Aap ye sochiye na Khan sahab. Main unke saath court mein case lad raha tha jiske jeetne par main property se aur hissa le sakta tha. Unko maarke mujhe kya milta, milta toh unse case jeetkar. Unke marne se toh balki mujhe nuksaan hua. Ab property jaane kitne hisso mein bat jaayegi. Pehle jahan main sirf ek chacha ji se case lad raha tha, ab unke 3 beton se ladunga"

"Baat to sahi keh rahe ho" Khan bola "Ye point use kar sakte hain ham tumhare favor mein court mein but for now, it brings us to another point. Tumhare saath aisa salook kyun hua?"

"Matlab?" Jai ne sawaliya nazar se khan ki taraf dekha.

"Matlab ke jahan tak mujhe pata hai, tumhare maan baap kaafi pehle mar gaye the, jab tum kaafi chhote the. Uske baad thakur sahab ne paal poskar tumhein bada kiya aur ek din achanak haweli se nikal diya. Kyun?"

"Kyunki maine property mein hissa maanga tha" Jai bola

"carry on ... bolte raho" Khan ne ishara kiya

"Jab tak main unke tukdo par palta raha tab tak sab theek tha. Koi problem nahi, koi issue nahi par jis din maine unse property mein apne hisse ki baat ki usi din mujhe laat markar nikal diya gaya" Jai ne kaha

"Umar kya hai tumhari?" Khan ne achanak puchha

"Ji?" Jai achanak uthe is sawal se chaunk pada

"Age... how old r u?" Khan ne sawal dohraya

"33. Kyun?" Jai ne puchha

"Hmmmmm" Khan ne dobara file kholi "Ismein 35 likhi hai. Khair. Ab tum 33 ke ho aur ye kabki baat hai, jab tumhein nikal diya gaya tha?"

"Koi 10 saal pehle ki" Jai je jawab diya

"Yaani tab tum 23 ke the. Dont you think you were a lil young to ask for your share in the property?"

kramashah........................................