कायाकल्प - Hindi sex novel

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sexy
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Re: कायाकल्प - Hindi sex novel

Unread post by sexy » 13 Oct 2015 04:31

दरवाजे बंद कर मैंने संध्या का हाथ पकड़ कर उसको हमारे कमरे के अन्दर ले आया। देर भी हो गयी थी, और एक लम्बी यात्रा के कारण थकावट भी थी, इसलिए आज कोई ख़ास प्रोग्राम (मेरा मतलब समागम) नहीं सोचा। लेकिन संध्या से बात करने का मन तो था ही, इसलिए मैंने उससे पूछा,

“आपको घर अच्छा लगा?”

“बहुत अच्छा है” (उसने बहुत पर थोडा जोर देकर कहा), “और आपने बहुत अच्छे तरीके से रखा भी है।“

“थैंक यू! अच्छा, एक बात – कल मैंने एक रिसेप्शन रखा है। मेरे जान पहचान के लोग आयेंगे – ज्यादातर ऑफिस से। आपके पास कल पहनने के लिए कुछ है न?”

इतना तो मुझे मालूम था की संध्या इतने दिनों से सिर्फ साड़ियाँ ही पहन रही है, और वो भी नई। संभव है की उसके पास कुछ न हो। मेरे प्रश्न पर उसका चेहरा उतर गया, और मेरा शक यकीन में बदल गया। उसने उत्तर में सिर्फ न में सर हिलाया।

“कोई बात नहीं, कल हम दोनों शौपिंग करने चलेंगे। ओके? इसी बहाने आपको अपना शहर भी दिखा दूंगा!”

“जी ठीक है!” कोई खास उत्साह नहीं।

“अरे यार! आप भी न! हम लोग आपके लिए नई ड्रेस लेंगे – मिनी मिडी टाइप! अंग-प्रदर्शन करने वाली। लोगो को भी मालूम पड़े, की मेरी बीवी कितनी हॉट है!”

“छी!” उसका मूड अब अच्छा हो गया।

मैं बिस्तर पर बैठ गया और संध्या को भी अपने बगल बैठा कर आलिंगनबद्ध कर लिया।

“आई लव यू!” कह कर मैंने उसकी साड़ी का पल्लू उसके सीने से नीचे ढलका दिया, और एक गहरी, प्रशंसक दृष्टि डाली। मेरी इस हरकत से संध्या की नजर नीचे झुक गयी। मैं कुछ मज़े लेने के लिए अनायास ही उसकी ब्लाउज का सबसे ऊपरी बटन खोलने लगा। ऐसे सेक्स करने का कोई मूड नहीं था – शायद पिछले कुछ दिनों की मसल-मेमोरी (muscle-memory) हो। संध्या के पूरे चेहरे पर शर्म का रंग गहरा गया।

“आपको और आपकी शर्म को देख कर मुझे एक कहानी याद आ जाती है।“

संध्या के होंठो पर एक मद्धिम सी मुस्कान आ जाती है, “कौन सी?”

“आप सुनेंगी?” संध्या ने हामी भरी।

मैंने कहानी शुरू करी:

“बहुत पहले एक राजकुमार हुआ। वह ऐसे तो बहुत ही अच्छा था और प्रजा उसको बहुत चाहती भी थी, लेकिन उसकी एक बात के लिए लोग उससे बहुत ही डरते थे, ख़ासतौर पर लड़कियाँ और औरतें। और वह इसलिए क्योंकि उसकी यौन-शक्ति में बहुत ही बल था। उसको संतुष्ट करने के लिए उसके पास कम से कम 100 रखैलें थीं। फिर भी उसको चैन नहीं आता था। एक रात उसकी एक रखैल उसको संतुष्ट नहीं कर सकी, तो राजकुमार ने उसको भगा दिया। अगले दिन उसने अपने नौकरों को आदेश दिया की पूरा देश ढूंढ कर सबसे सुन्दर स्त्री को लाओ।

इस काम में बहुत महीने लग गए, लेकिन अंततः एक बहुत ही सुन्दर, जवान, लेकिन श्यामवर्ण लड़की मिली। राजकुमार ने उसको देखा तो कहा, ‘यह लड़की वाकई बहुत सुन्दर है। लेकिन इसका रंग इतना श्याम वर्ण क्यों है?’”

कहानी सुनाते-सुनाते मैंने संध्या की ब्लाउज के सारे बटन खोल दिया, और उसके पट अलग कर उसके सुन्दर स्तनों को मुक्त भी कर दिया। संध्या के झुके हुए चेहरे पर शरम वाली मुस्कान आ गयी थी और उसके उसके स्तनों और निप्पल के इर्द-गिर्द लालिमा भी आ चली थी। मैंने कहानी आगे जारी रखी,

“इस बात पर एक चतुर नौकर बोला, ‘राजकुमार, वह इसलिए क्योंकि यह लड़की काम-देवी है। इसके अन्दर कामाग्नि इतनी धधकती है की उसकी तपन से इसका रंग इतना गहरा हो गया है।‘ राजकुमार इस बात से दंग रह गया। उसने पूछा, ‘अगर यह बात सच है तो मुझे इन रखैलों की ज़रुरत ही नहीं! है न?’ नौकर ने सहमती दिखाई।

इस बात पर राजकुमार ने तुरंत ही उस लड़की से ब्याह कर लिया और बाकी सभी औरतों की छुट्टी कर दी। और अब दोनों सुहाग-सेज पर आ कर बैठ गए। राजकुमार बिना देरी किये अपनी पत्नी से सम्भोग करना चाहता था। उसने शीघ्र ही राजकुमारी के कपड़े उतार दिए।“

इतना कहते हुए मैंने भी संध्या की ब्लाउज उतार कर अलग कर दी, और उसको खड़ा कर के साथ ही साथ साड़ी भी उतार दी।

“राजकुमारी ने नंगा होते ही राजकुमार को अपने आकर्षण और यौन-दक्षता से मस्त कर दिया। अगले तीस दिन और तीस रात तक पूरे राजमहल में उन दोनों की कामुक और आनंद भरी आहें सुनाई देती रहीं। राजकुमारी ने राजकुमार को पूरी तरह से तृप्त कर दिया। और जब दोनों राजकुमार के महल से बाहर निकले, तो दोनों पूरी तरह से निर्वस्त्र, राजकुमार अपने हाथ-पैर पर घोडा बना हुआ था और राजकुमारी उसकी सवारी कर रही थी। राजकुमार ऐसे ही घोडा बने हुए उसको अपने सिंहासन तक ले गया। राजकुमारी वहां जा कर खुद तो सिंहासन पर विराजमान हो गयी, लेकिन राजकुमार उसके पैरों के पास ही बैठा रहा।“

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Re: कायाकल्प - Hindi sex novel

Unread post by sexy » 13 Oct 2015 04:31

इस समय तक संध्या पूर्ण निर्वस्त्र हो गयी थी और मैं उसकी योनि को अपनी उंगली से सहला रहा था। संध्या ने सहज प्रतिक्रिया दिखा कर अपनी दोनों टांगों को सिमटा लिया था और मेरी उंगली उसकी टांगो के शिकंजे में फंसे हुए ही उसकी योनि को सहला रही थी। मैंने उसके होंठों को गहराई से कुछ देर चूमा, तब जा कर उसकी पकड़ थोड़ी ढीली पड़ी। मैंने फिर उसकी पूरी योनि को अपनी मध्यमा उंगली से सहलाया। संध्या अब भारी साँसे भर रही थी और उसकी टाँगे भी कांप रही थीं। फिर भी मैंने उसको बैठने नहीं दिया और उसकी योनि को सहलाता रहा। उसकी योनि से अब काम-रस की भारी वर्षा होने लग गई।

मैंने कहा, “तो डार्लिंग, इस कहानी से हमें क्या शिक्षा मिलती है?”

“हंह?”

“इस कहानी से क्या शिक्षा मिलती है?”

“आआअह्ह्ह्ह…. आप… आह्हह.. आप बहुत बदमाश हैं! आह!”

“ये शिक्षा मिलती है?” कहते हुए मैंने अपनी उंगली जोर से उसकी योनि के अन्दर घुसा दी।

“आआह्ह्ह!” संध्या चिहुँक गयी।

“आआह्ह्ह!” वह अपने उन्माद के चरम पर पहुँच रही थी। यह बात मुझे भी समझ आ रही थी इसलिए मैंने अब उसके भगनासे को भी अपने अंगूठे से छेड़ना शुरू कर दिया। संध्या के दोनों हाथ मेरे दोनों कन्धों को पकडे हुए थे, उसकी आँखें बंद थीं और मुँह से कामुक आवाजें निकल रही थीं। मेरी उंगली के अन्दर बाहर आने जाने से वह उचक भी रही थी। कामाग्नि के कारण संध्या के चेहरे पर पसीने की बूंदे चमकने लगी – उसकी साँसे छोटी, गहरी और धौंकनी जैसी चलने लगी।

“आह्ह्ह!” मैंने उसको कमर से पकड़ कर अपनी गोद में बैठा लिया, लेकिन उसकी योनि का मर्दन जारी रखा। संध्या का पूरा शरीर कामोत्तेजना में कांप रहा था।

“उई माँ!” कह कर संध्या का शरीर ऐंठ सा गया, और कराह की आवाज़ के साथ वह स्खलित हो गयी। संध्या का पूरा शरीर ढीला पड़ गया – सर पीछे के तरफ ढलक गया और बाहें मेरे कन्धों से सरक कर निढाल गिर गयीं। योनि रस से मेरे जांघ पर पजामे का कपड़ा पूरी तरह से गीला हो गया। संध्या अपने होंठ काट रही थी और अपनी साँसों को संयत करने, और अभी-अभी संपन्न हुए कन्मोनामाद सुख से वापस बहाल होने का प्रयास कर रही थी। जैसे-जैसे उसकी साँसे वापस आई, वैसे-वैसे वह शांत होने लगी – उसने अपनी भाषा में बहुत धीरे-धीरे कुछ कहा, जो मुझे समझ नहीं आया।

“ओ माँ! मैं तो मर गई!”

“आप हमारी बातों में माँ को क्यों लाती हैं – हमारे बीच का मामला है, हम ही सुलझा लेंगे? और….. अगर उन्होंने आपको ऐसे लुटते हुए देखा तो डर जाएँगी!” मैंने आँख मारते हुए चुटकी ली।

“धत्त!” संध्या ने तुरंत प्रतिकार किया, लेकिन उसको लगा की शायद कोई गलती हो गयी, “सॉरी!” फिर उसको अपनी नग्नावस्था का आभास हुआ – मेरी बांहों में ढलक कर लेटने के कारण उसके स्तन आगे की ओर उठ गए। उसने झट से अपने हाथ से अपने स्तनों को ढक लिया – इस तथ्य के बावजूद की मैं अब तक उसके हर अंग-प्रत्यंग को देख, छू, चूम और प्यार कर चुका हूँ। फिर उसको अपने नितम्बों पर गीलेपन का आभास हुआ।

“अरे! आपका पजामा तो गीला हो गया। आई ऍम सॉरी!” कह कर वह मेरी गोद से उठने लगी।

“सॉरी? लेकिन मैं तो बहुत ख़ुश हूँ!” मेरा अर्थ समझ कर संध्या पुनः शर्मा गई। उठने के बाद उसने देखा की मेरे लिंग ने मेरे पजामे में बड़ा सा तम्बू बनाया हुआ है।

“मैं इसको उतार दूं?” उसने पूछा, और मेरे हाँ कहने से पहले ही मेरे पजामे का नाड़ा ढीला करने लगी। मैंने भी अपने नितम्ब को थोडा सा उठा कर पजामा उतारने में उसकी मदद करी। पजामा उतारने के बाद उसने एक बार मेरी तरफ देखा, और फिर मेरा अंडरवियर भी उतारने लगी। मंद मंद मुस्कुराते हुए उसने फिर मेरे कुरते को भी उतार दिया। मुझे पूर्णतया निर्वस्त्र करने का उसका यह पहला अनुभव था।

“इसका…. क्या करें?” संध्या ने आँख से मेरे पूरी तरह से तने हुए लिंग की तरफ इशारा किया।

“अभी नहीं… अभी सो जाते हैं। कल करते हैं?”

“ठीक है!”

हम दोनों ने बाथरूम में जा कर मूत्र त्याग किया और अपने गुप्तांगो को पानी से साफ़ किया और वापस बिस्तर पर आ कर नग्न ही लेट गए। संध्या ने अपने आप को मुझसे लिपटा लिया – उसका सर मेरे कंधे पर, एक जांघ मेरी जांघ पर, एक स्तन मेरे सीने से सटा हुआ और एक बाँह मेरे सीने के ऊपर। मैंने संध्या को सहलाते और पुचकारते हुए देर तक प्यार की बातें करता रहा और फिर पूरी तरफ अघा कर सो गया।

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Re: कायाकल्प - Hindi sex novel

Unread post by sexy » 13 Oct 2015 04:31

रात को सोते-सोते हमको काफी देर हो गई, इसलिए सवेरे उठने में भी समय लगा। शॉपिंग मॉल सवेरे 10 बजे तक पूरी तरह से चलने लगते हैं, और चूंकि हमारे पास समय का काफी अभाव था, इसलिए मेरा लक्ष्य यह था की जल्दी से जल्दी सब सामान खरीद लिया जाय। वैसे भी हनीमून के लिए कल सवेरे ही निकलना था (अरे! उसकी टिकट भी बुक करनी है!)। अंडमान द्वीप-समूह चूंकि बीच वाली जगह हैं, इसलिए उसी के मुताबिक़ कपड़े-लत्ते भी लेने होंगे।

खैर, जल्दी से उठ कर और तैयार हो कर हम लोग ठीक 10 बजे ही पास के एक बड़े मॉल पहुँच गए। पूरे माल में हम लोग ही पहले ग्राहक थे। हम लोग सबसे पहले एक पारंपरिक परिधानों वाले शो-रूम में पहुंचे। वहां के मालिक को मैंने अपनी ज़रुरत के बारे में आगाह किया, तो उन्होंने वायदा किया की वो एक घंटे के अन्दर ही कपड़ों को पूरी तरह से नाप के अनुसार नियोज्य करके दे देंगे। अपना काम तो हो गया – संध्या के लिए कोरल-पिंक रंग का और नीले बार्डर वाला शिफॉन का लेहेंगा-चोली खरीदा। शो-रूम के मालिक (जो खुद भी एक ड्रेस-डिज़ाइनर हैं, और महिला भी) ने खुद ही संध्या की नाप ली और अधोवस्त्रों के लिए उसको सुझाव दिया। चोली एक बैक-लेस प्रकार की थी, अतः अन्दर कुछ पहन नहीं सकते थे, इसलिए उन्होंने सिलिकॉन ब्रैस्ट पैड्स दिए, जो त्वचा के रंग के ही होते हैं। उन्होंने ही संध्या के स्तनों की माप भी ली और बताया की हम 32B साइज़ की ब्रा खरीद सकते हैं।

वहां से हम संध्या के लिए अंतर्वस्त्र, बीच-वियर, और नाइटी लेने दूसरे शो-रूम को गए। वहां भी हम लोग पहले ही ग्राहक थे। वहां पर एक ब्रा-फिटर हमारे साथ हो ली – मैंने उनको बताया की संध्या ने पहले कभी भी ब्रा नहीं पहनी है और जाहिर है की उसको उनकी आदत नहीं है, इसलिए ऐसी ब्रा दिखाए, जो आरामदायक हों, और साथ ही सेक्सी भी, क्योंकि यह हमारा हनीमून भी है। साथ ही मैचिंग पैंटीज भी दिखाएँ। वो ब्रा-फिटर पक्की पेशेवर थीं। वो अपना मापक-टेप लेकर आयीं, और संध्या के साथ चेंज-रूम में चली गयी, और मुझे भी साथ आने को बोला। फिटिंग रूम में पहुँच कर उन्होंने संध्या को निर्वस्त्र होने को कहा। संध्या पहले ही इस पूरे अनुभव से अभिप्लुत थी – यह सब कुछ उसने पहली बार ही देखा था, और शॉपिंग इस तरह से भी होती है उसको मालूम ही नहीं था। और अब, उसको एक अज्ञात महिला निर्वस्त्र होने को कह रही थी – मैंने संध्या को माथे पर चूमा, और कपड़े उतारने को कहा। मेरे कहने पर संध्या को थोड़ी स्वान्त्वना मिली और उसने कुछ और हिचकिचाहट के बाद अपना कुर्ता और शलवार उतार दिया।

“शी इस सो ब्यूटीफुल, सर!” संध्या के रूप का अवलोकन और आंकलन करते हुए उसने कहा।

“थैंक यू सो मच! शी इस इन्डीड! एंड, आई ऍम इन लव विद हर!” मुझे समझ नहीं आया की और क्या कहा जाए।

“श्योर! नाउ सर, प्लीज़ सिट एंड वेट! लेट अस सरप्राइज यू!” उसने मुस्कुराते हुए कहा। उन दोनों को कुछ देर लगने वाली थी, इसलिए मैंने ब्रा-फिटर को बीच-वियर, और स्विम-वियर भी चुनने को कह दिया और अपने लिए भी कुछ सामान लेने चला गया। कोई डेढ़-दो घंटे के बाद हमारे पास तीन बैग भर कर सामान हो गया।

ब्रा-फिटर ने बिल का भुगतान लेटे हुए मुझसे फुसफुसा कर कहा, “सर, यू आर अ वेरी लकी मैन टू हैव अ गर्ल लाइक योर वाइफ! एंड, यू आर गोइंग टू बी अ वेरी वेरी हैप्पी मैन ऑन योर हनीमून!”

‘ऐसा क्या खरीद लिया!?’ मैने सोचा।

अगली दुकान में मैंने संध्या के लिए कुछ जीन्स, स्कर्ट, हाफ-पैन्ट्स, और टी-शर्ट खरीदीं। उसने मुझे ऐसी फ़िज़ूल-खर्ची के लिए बहुत मना किया, लेकिन मेरे लिए यह पहला मौका था जब मैं किसी अपने को किसी भी तरह का उपहार दे पाया, इसलिए मैं रुकना नहीं चाहता था। अगला पड़ाव जूते खरीदने के लिए था – संध्या के लिए एक जोड़ी सैंडल, स्पोर्ट-शूज, और स्लिपर्स खरीदीं। हमने खाना खाया, संध्या की लहँगा-चोली ली, और वापस घर आ गए।

घर आते ही सबसे पहले पोर्ट-ब्लेयर जाने का टिकट लिया। सामान पैक करने के लिए कुछ तैयारी नहीं करनी थी – ज्यादातर सामान नया था और तुरंत ही पैक किया जा सकता है। मैंने अपना डिजिटल कैमरा और पर्सनल लैपटॉप भी बाहर ही रख लिया, और फिर अपने रिसेप्शन के इवेंट आर्गेनाइजर से बात की। उसने बताया की सब पूरी तरह नियत रूप से चल रहा है और शाम को बहुत अच्छा रिसेप्शन होगा।

हमारा रिसेप्शन बिलकुल मॉडर्न समारोह था। बहुत ज्यादा लोग नहीं बुलाये गए थे – बस मेरे सोसाइटी के कुछ परिवार, देवरामनी दंपत्ति, मेरे ऑफिस के ज्यादातर सहकर्मी, मेरे बॉस और उसका परिवार आये थे। संध्या के लिए यह रिसेप्शन वाली संकल्पना ही पूरी तरह से नई थी – वह हाँलाकि नर्वस थी, लेकिन सारे लोग उससे इतने प्यार, अदब और प्रशंसा से मिल रहे थे की धीरे-धीरे वह समारोह का आनंद उठाने लगी। हमेशा की तरह वह आज भी बेहद सुन्दर लग रही थी। एक अप्रत्याशित बात हुई – मेरी दो भूतपूर्व प्रेमिकाएँ भी बिना बुलाए आ गईं, लेकिन अच्छी बात यह, की उन्होंने कोई बखेड़ा नहीं खड़ा किया। उलटे, वो दोनों मेरे लिए बहुत ख़ुश थीं – दोनों ने ही संध्या को गाल पर चूमा, शादी की बधाइयाँ और उपहार भी दिए! मुझे भी बधाइयाँ मिली और दोनों ने ही मुझको बताया की मेरी बीवी बहुत सुन्दर है! अब यह दिखावा था, या सचमुच की ख़ुशी, कह नहीं सकता।