लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

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The Romantic
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Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 02 Nov 2014 13:50


"जिज्जू ! एक बात सच बोलूँ ?"
"क्या?"
"हूँ तमारी साथै आपना प्रेम नि अलग दुनिया वसावा चाहू छु। ज्या आपने एक बीजा नि बाहों माँ घेरी ने पूरी ज़िन्दगी वितावी दयिये। तमे मने आपनी बाहो माँ लाई तमारा प्रेम नि वर्षा करता मारा तन मन ने एटलू भरी दो कि हूँ मरी पण जाऊ तो पण मने दुःख न रहे"
(मैं तुम्हारे साथ अपने प्यार की अलग दुनिया बनाना चाहती हूँ। जहां हम एक दूसरे की बाहों में जकड़े सारी जिन्दगी बिता दें। तुम मुझे अपनी बाहों में लेकर अपने प्रेम की बारिश करते हुए मेरे तन और मन को इतना भर दो कि मैं मर भी जाऊं तो मुझे कोई गम ना हो)
"हाँ मेरी पलक मैंने तुम्हारे रूप में अपनी सिमरन को फिर से पा लिया है अब मैं कभी तुमसे दूर नहीं हो सकूँगा !"
"खाओ मेरी कसम ?"
"मेरी परी, मैं तुम्हारी कसम खाता हूँ अब तुम्हारे सिवा कोई और लड़की मेरी जिन्दगी में नहीं आएगी। मैंने कितने बरसों के बाद तुम्हें फिर से पाया है मेरी सिमरन !" कह कर मैंने उसे फिर से चूम लिया।
मैंने अपने जीवन में दो ही कसमें खाई थी। पहली उस समय जब मैं बचपन में अपने ननिहाल गया था उस समय ऊँट की सवारी करते समय मैं गिर पड़ा था तब मैंने कसम खाई थी कि अब कभी ऊँट की सवारी नहीं करूँगा। दूसरा वचन मैंने अपनी सिमरन को दिया था। मुझे आज भी याद है मैंने सिमरन की कसम खाई थी कि मैं उसे इस जन्म में ही नहीं अगले 100 जन्मों तक भी प्रेम करता रहूँगा। मैं असमंजस की स्थिति में था। पुरुष की प्रवृति उसे किसी भी स्त्री के साथ सम्बन्ध बना लेने को सदैव उकसाती रहती है पर मेरा मन इस समय कह रहा था कि कहीं मैं अपनी सिमरन के साथ धोखा तो नहीं कर रहा हूँ।
"प्रेम अपनी इस सिमरन को भी पूर्ण समर्पिता बना दो आज !"
"नहीं मेरी परी, यह नैतिक और सामाजिक रूप से सही नहीं होगा !"
"क्यों?"
"ओह.. मेरी परी तुम अभी बहुत मासूम और नासमझ हो ! मेरी और तुम्हारी उम्र में बहुत बड़ा अंतर है। तुम्हारा शरीर अभी कमसिन है मैं भूल से भी तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट या दुःख नहीं पहुँचाना चाहता !"
"ओह प्रेम ! क्या तुम नहीं जानते प्रेम अँधा होता है। यह उम्र की सीमा और दूसरे बंधन स्वीकार नहीं करता। इवा ब्राउन और अडोल्फ़ हिटलर, राहब (10) और जेम्स प्रथम, बित्रिश (12) और दांते, जूली (32) और मटूकनाथ, संध्या और शांताराम, करीना और सैफ उम्र में इतना अंतर होने के बाद भी प्रेम कर सकते हैं तो मैं क्यों नहीं कर सकती ?
मिस्र के बादशाह तो लड़की के रजस्वला होने से पहले ही उनका कौमार्य लूट लिया करते थे। इतिहास उठा कर देखो कितने ही उदाहरण मिल जायेंगे जिनमें किशोर होती लड़कियों को कामदेव को समर्पित कर दिया गया था। मैं जानती हूँ यह सब नैतिक और सामाजिक रूप से सही नहीं होगा पर सच बताना क्या यह छद्म नैतिकता नहीं होगी?"
"ओह..." अबोध सी लगने वाली यह यह लड़की तो आज बहुत बड़ी दार्शनिक बातें करने लगी है।
"प्रेम ! क्या सारी उम्र अपनी सिमरन की याद में रोते रहना चाहते हो ?"
सयाने ठीक कहते हैं यह सारी सृष्टि ही काम के अधीन है। संसार की हर सजीव और निर्जीव वस्तु में काम ही समाया है तो भला हम अलग कैसे हो सकते थे। पलक ने अपनी स्कर्ट उतार फैंकी और अब वो मात्र एक पतली से सफ़ेद कच्छी में थी। मैंने भी अपने कपड़े उतार फैंके।
मेरी आँखों के सामने मेरी सिमरन का प्रतिरूप अपनी बाहें फैलाए अपना सर्वस्व लुटाने को तैयार बिस्तर पर बिछा पड़ा था। मेरी आँखें तो उसकी सफ़ेद कच्छी को देख कर फटी की फटी ही रह गई। गोरी और मखमली जाँघों के बीच सफ़ेद रंग की पतली सी कच्छी में किसी पाँव रोटी की तरह फूली हुई पिक्की का उभार बाहर से भी साफ़ दिख रहा था। कच्छी का आगे का भाग रतिरस से पूरा भीगा था।कच्छी उसकी फांकों की झिर्री में इस प्रकार धंसी थी जैसे ज़रा सा मौका मिलते ही वो मोटी मोटी फांकें बाहर निकल आएँगी।
मैंने उसे फिर से अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों और गालों पर अपने चुम्बनों की झड़ी लगा दी। पलक भी मुझे जोर जोर से चूमती हुई सीत्कार करने लगी। अब मैं हौले होले उसके गले और छाती को चूमते हुए नीचे बढ़ने लगा। जैसे ही मैंने उसके पेडू पर चुम्बन लिया उसने मेरा सर अपने हाथों में पकड़ कर अपनी पिक्की की ओर दबा दिया। कच्छी में फसे मांसल गद्देदार उभार पर मैंने जैसे ही अपने होंठ रखे पलक तो जैसे उछल ही पड़ी।
ईईई...ईईईईईई...ईईइ.........
अब मैंने कमर पर अटकी उस कच्छी को दोनों हाथों में पकड़ा और नीचे खिसकाना चालू किया। पलक ने अपने नितम्ब थोड़े से ऊपर उठा दिए। मैंने उसकी कच्छी को केले के छिलके की तरह उसकी जांघों से नीचे करते हुए निकाल फेंका।
उफ्फ्फ्फफफ्फ्फ्फ़.........
अनछुई, अधखिली कलि जैसे खिलने को बेताब (आतुर) हो। हल्के रेशमी, घुंघराले, मुलायम बालों से ढका शहद का भरा दौना हो जैसे। दो ढाई इंच के चीरे के बीच गुलाब की पंखुड़ियों जैसी कलिकाएँ आपस में ऐसे चिपकी थी कि मुझे तो लगा जैसे ये पंखुड़ियाँ पी (मूतने) करते समय भी बड़ी मुश्किल से खुलती होंगी। दोनों फांकों के बीच की रेखा तो ऐसे लग रही थी जैसे दो ऊंची पहाड़ियों के बीच कोई पतली सी नदी बह रही हो।
मैं झट से उसकी जाँघों के बीच आ गया और उसकी जाँघों को दोनों हाथों से चौड़ा कर के उसकी पिक्की पर अपने होंठ लगा दिए। मैं उसके रेशमी मुलायम घुंघराले बालों के बीच नव बालिग़, कमसिन कोमल त्वचा और कोमल अंकुर को सूंघने लगा। पलक ने आँखें बंद करके जोर से सित्कार भरी। उसकी जांघें अपने आप कस गई और कमर थोड़ा सा ऊपर उठ गई। मेरे नथुनों में उसकी कुंवारी कमसिन पिक्की की खुशबू भर गई। मैंने पहले तो उस रस में डूबी फांकों को चूमा और फिर जीभ से चाटा। फिर अपनी जीभ को नुकीला कर के उसकी फांकों के बीच लगा कर एक लस्कारा लगाया और फिर उसे पूरा मुँह में भर कर जोर से चूसा।
पलक ने मेरा सिर अपने हाथों में कस कर अपनी जाँघों के बीच दबा लिया। वो तो जैसे छटपटाने ही लगी थी। पिक्की के दोनों होंठ रक्त संचार बढ़ने के कारण फूल से गए थे। मैं उन फांकों को कभी मुँह में भर कर चूसता कभी दांतों से दबा देता। कभी जीभ से उसके किसमिस के दाने की तरह फूले भगांकुर को सहला देता। दांतों के गड़ाव से उसे थोड़ा सा दर्द भी होता और आनंद की उमड़ती लहर से तो वो जैसे पछाड़ ही खाने लगी थी। उसके चीरे के ऊपर थिरकती मेरी जीभ जब उसकी फुनगी (मदनमणि) से टकराती तो पलक तो उछल ही पड़ती।
"ओह... जीजू हु मरी जायिश... आह ... ओह.. छोड़ो मने..... या .....ईईईईईईईईई ... मरी पी निकली जाशे... ईईईई," (ओह ... जीजू मैं मर जाऊँगी ... आह ... ओह... छोड़ो मुझे ... या..... ईईईईईईईईई ... मेरा पी निकल जाएगा.... ईईईईईईईईइ)
मैं जानता था कि अब कुछ पलों के बाद मेरे मुँह में मधु की बूँदें टपकने वाली हैं। मैं उसे कहना चाहता था ‘चिंता मत करो’ पर कैसे बोलता। मैं उसकी पिक्की से अपना मुँह हटा कर अपने आप को उस मधु से वंचित नहीं करना चाहता था। मैंने उसे चूसना चालू रखा। वो पहले तो छटपटाई, उसका शरीर हिचकोले खाते हुए कुछ अकड़ा और फिर मेरा मुँह एक मीठे गाढ़े चिपचिपे नमकीन और लिजलिजे रस से भर गया। मैं तो इस कुंवारी देह की प्रथम रसधार का एक कतरा भी नहीं छोड़ सकता था, मैंने उसकी अंतिम बूँद तक चूस ली।
पलक तो आह ... उम्म्म .... करती बिलबिलाती ही रह गई। कुछ झटके से खाने के बाद वो कुछ शांत पड़ गई।
अब मैं अपने होंठों पर जीभ फिराता ऊपर की ओर आ गया। पलक ने झट से मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया और जोर जोर से चूमने लगी। मैंने अब फिर से उसकी पिक्की को सहलाना चालू कर दिया तो उसने भी पहली बार मेरे लण्ड को अपने हाथों में पकड़ लिया। कोमल अँगुलियों का स्पर्श पाते ही वह तो झटके से खाने लगा। कुंवारी चूत की खुशबू पाते ही मेरे पप्पू ने नाग की तरह अपना फन उठा लिया।
"जीजू ... ऊऊउ... आह ...... ऊईईईई ..."
मैं अचानक उठ खड़ा हुआ। पलक को बड़ी हैरानी हो रही थी। वो तो सोच रही थी कि अभी मैं अपने पप्पू को उसकी पिक्की में डाल दूंगा। पर मैं भला ऐसा कैसे कर सकता था?
"ओह... जीजू ... अब क्या हुआ ?" पलक ने आश्चर्य से से मेरी ओर देखा।
आप भी नहीं समझे ना ? ओह ... आप भी सोच रहे होंगे यह प्रेम भी निरा गाउदी है क्यों नहीं इसकी कुलबुलाती चूत में अपना लण्ड डाल रहा?
मैं दरअसल निरोध (कंडोम) लगा लेना चाहता था। मैं अपनी इस परी के साथ कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था। मैं तो गलती से भी उसे किसी झंझट में नहीं डाल सकता था।
"एक मिनट रुको म... मैं... वो निरोध लगा लेता हूँ !"
"नहीं जीजू ... ओह... छोड़ो निरोध के झंझट को ... अब मुझे अपने प्रेमरस में डुबो दो ..."
"मेरी परी मैं कोई जोखिम नहीं लेना चाहता !"
"केवू जोखिम?"
"मैं तुम्हें किसी मुसीबत में नहीं डालना चाहता, कहीं कुछ गड़बड़ ना हो जाए?"
"ओह... कुछ नहीं होगा ... तुमने मुझे बताया तो था आजकल पिल्स भी आती हैं?"
"पर वो ...?" मैं फिर भी थोड़ा झिझक रहा था।
"प्रेम मैं तुम्हारे प्रेम की प्रथम वर्षा अपने अन्दर महसूस करना चाहती हूँ !" पलक ने अपनी बाहें मेरी ओर फैला दी। मैंने उसे एक बार बताया था कि प्रथम मिलन में कोई भी पुरुष अपना वीर्य स्त्री की कोख में ही डालना पसंद करता है। यह नैसर्गिक होता है। शायद उसे यही बात याद आ गई थी।
मैंने पास पड़ी मेज पर रखी क्रीम की डब्बी उठाई और पलक की जाँघों के बीच आ गया। मैंने अपनी अंगुली पर ढेर सारी क्रीम लगा कर पलक की पिक्की की फांकों और छेद पर लगा दी। उसकी पिक्की में तो फिर से कामरस की बाढ़ आ गई थी। मैंने अपनी एक अंगुली उसके कुंवारे छेद में भी डाल कर हौले होले अन्दर बाहर की। छेद बहुत संकरा सा लग रहा था और अन्दर से पूरा गीला था। पलक का सारा शरीर एक अनोखे रोमांच के कारण झनझना रहा था। मैंने उसकी फांकों को भी सहलाया और उन पर भी क्रीम रगड़ने लगा। उसके चीरे के दोनों ओर की फांकें तो कटार की तरह इतनी पैनी और तीखी थी कि मुझे लगा कहीं मेरी अंगुली ही ना कट जाए। उत्तेजना के मरे उसकी पिक्की पर उगे बाल भी खड़े हो गए। पिक्की पर हाथ फिराने और कलिकाओं को मसलने से उसे गुदगुदी और रोमांच सा हो रहा था।
रेशम की तरह कोमल और मक्खन की तरह चिकना अहसास मेरी अँगुलियों पर महसूस हो रहा था। जैसे ही मेरी अंगुली का पोर उस रतिद्वार के अन्दर जाता उसकी पिक्की संकोचन करती और उसकी कुंवारी पिक्की का कसाव मेरी अंगुली पर महसूस होता। पलक जोर जोर से सीत्कार करने लगी थी और अपने पैरों को पटकने लगी थी। उसके होंठ थरथरा रहे थे, वो कुछ बोलना चाहती थी पर ऐसी स्थिति में जुबान साथ नहीं देती, हाँ, शरीर के दूसरे सारे अंग जरुर थिरकने लग जाते हैं।
उसकी सिसकी पूरे कमरे में गूंजने लगी थी और पिक्की तो इतनी लिसलिसी हो गई थी कि अब तो मुझे विश्वास हो चला था कि मेरे पप्पू को अन्दर जाने में जरा भी दिक्कत नहीं होगी।
"ओह... जीजू ... आह.... कुछ करो ... मुझे पता नहीं कुछ हो रहा है ... आह्ह्ह्हहह्ह्ह्ह !"
मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ ! अब प्रेम मिलन का सही वक़्त आ गया था।

कहानी जारी रहेगी !
प्रेम गुरु नहीं बस प्रेम

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Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 02 Nov 2014 13:51


रेशम की तरह कोमल और मक्खन की तरह चिकना अहसास मेरी अँगुलियों पर महसूस हो रहा था। जैसे ही मेरी अंगुली का पोर उस रतिद्वार के अन्दर जाता उसकी पिक्की संकोचन करती और उसकी कुंवारी पिक्की का कसाव मेरी अंगुली पर महसूस होता। पलक जोर जोर से सीत्कार करने लगी थी और अपने पैरों को पटकने लगी थी। उसके होंठ थरथरा रहे थे, वो कुछ बोलना चाहती थी पर ऐसी स्थिति में जुबान साथ नहीं देती, हाँ, शरीर के दूसरे सारे अंग जरुर थिरकने लग जाते हैं।
उसकी सिसकी पूरे कमरे में गूंजने लगी थी और पिक्की तो इतनी लिसलिसी हो गई थी कि अब तो मुझे विश्वास हो चला था कि मेरे पप्पू को अन्दर जाने में जरा भी दिक्कत नहीं होगी।
"ओह... जीजू ... आह.... कुछ करो ... मुझे पता नहीं कुछ हो रहा है ... आह्ह्ह्हहह्ह्ह्ह !"
मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओ ! अब प्रेम मिलन का सही वक़्त आ गया था।
अब मैंने अपने पप्पू पर भी क्रीम लगा ली। फिर मैंने उसकी कलिकाओं को थोड़ा सा चौड़ा किया। किसी तरबूज की गिरी की तरह अन्दर से लाल और कामरस से सराबोर पिक्की तो ऐसे लग रही थी जैसे किसी मस्त मोरनी ने अपनी चोंच खोल दी हो। मुझे तो लगा उसकी पुस्सी (पिक्की) अभी म्याऊं बोल देगी। मेरे होंठों पर इसी ख्याल से मुस्कराहट दौड़ गई।
मैंने अपने लण्ड को उसके छेद पर लगा दिया। पलक ने आँखें बंद कर लीं और अपनी जाँघों को किसी किताब के पन्नो की तरह चौड़ा कर दिया। उसका शरीर थोड़ा कांपने लगा था। यह कोई नई बात नहीं थी ऐसा प्रथम सम्भोग में अक्सर डर, कौतुक और रोमांच के कारण होता ही है। अक्षतयौवना संवेदना की देवी होती है और फिर पलक तो जैसे किसी परी लोक से उतरी अप्सरा ही थी। अपनी कोमल जाँघों पर किसी पुरुष के काम अंग का यह पहला स्पर्श पाकर पलक के रोमांच, भय और उन्माद अपने चरम बिन्दु पर जा पहुँचा।
"मेरी परी बस थोड़ा सा काँटा चुभने जितना दर्द होगा ... क्या तुम सह लोगी?"
"जीजू ... मैं तुम्हारे लिए सब सहन कर लूँगी, अब देरी मत करो ... आह ..."
मैंने उसके ऊपर आते हुए उसे अपनी बाहों में भर लिया और अपने घुटनों को थोड़ा सा मोड़ कर अपनी जांघें उसकी कमर और नितम्बों के दोनों ओर जमा लीं। फिर मैंने उसके होंठों को अपने मुँह में भर लिया। उसने अपनी जीभ मेरे मुँह में डाल दी। फिर मैंने अपनी कमर को थोड़ा सा ऊपर उठाते हुए एक हाथ से अपने बेकाबू होते लण्ड को पकड़ कर उसके चीरे पर फिराया। पिक्की तो अन्दर से पूरी गीली और फिसलन भरी सुरंग की तरह लग रही थी। मैंने 4-5 बार अपने लण्ड को उस पर घिसा और फिर हौले से दबाव बनाया। उसका छेद बहुत ही छोटा और कसा हुआ था। मुझे डर था अगर मैंने जोर से झटका लगाया तो उसकी झिली तो फटेगी ही पर साथ में दरार के नीचे की त्वचा भी फट जायेगी। पलक के दिल की धड़कन और तेज़ साँसें मैं अच्छी तरह महसूस कर रहा था।
लण्ड को ठीक से छेद पर लगाने के बाद मैंने दूसरा हाथ उसके सर के नीचे लगा लिया और अपनी जाँघों को उसके कूल्हों के दोनों ओर कस लिया। फिर हौले से एक धक्का लगाया। हालांकि छेद बहुत नाज़ुक और कसा हुआ था पर मेरे खूंटे जैसे खड़े लण्ड को अन्दर जाने से भला कैसे रोक पाता। फिसलन भरी स्वर्ग गुफा का द्वार चौड़ा करता और उसकी नाज़ुक झिल्ली को रोंदता हुआ आधा लण्ड अन्दर चला गया।
दर्द के मारे पलक छटपटाने सी लगी। उसकी जीभ मेरे मुँह में दबी थी वो तो गूं गूं करती ही रह गई। जाल में फंसी किसी हिरनी की तरह जितना छूटने का प्रयास किया या कसमसाई लण्ड उसकी पिक्की में और अन्दर तक चला गया। उसने मेरी पीठ पर हल्के मुक्के से भी लगाए और मुझे परे हटाने का भी प्रयास किया। मुझे उसकी पिक्की के अन्दर कुछ गर्माहट सी महसूस हुई। ओह ... जरुर यह झिल्ली फटने के कारण निकला खून होगा। पलक की आँखों से आंसू निकलने लगे थे।
कुछ क्षणों के बाद मैंने अपने मुँह से उसकी जीभ निकाल दी और उसके होंठों और पलकों को चूमते पुचकारते हुए कहा,"बस मेरी परी ... अब तुम्हें बिलकुल भी दर्द नहीं होगा ... बस जो होना था हो गया ..."
"ओह.... हटो परे ... ऊँट कहीं के ....... उईइमाआ .... मैं दर्द के मारे मर जाऊँगी..आह ..."
"मेरी परी ... बस अब कोई दर्द नहीं होगा ..." मैंने उसे पुचकारते हुए कहा।
"ओह ... तुम तो पूरे कसाई हो.. ओह ... इसे बाहर निकालो, मुझे बहुत दर्द हो रहा है।" उसने मुझे परे हटाने का प्रयास किया।
"मेरी परी बस अब थोड़ी देर में यह दर्द ख़त्म हो जायेगा, उसके बाद तो बस आनन्द ही आनन्द है।"
"हटो परे झूठे कहीं के ... दर्द के मारे मेरी जान निकल रही है !"
मैं जानता था उसे कुछ दर्द तो जरुर हो रहा है पर साथ में उसे अपने इस समर्पण पर ख़ुशी भी हो रही है। बस 2-3 मिनट के बाद यह अपने आप सामान्य हो जायेगी। बस मुझे उसे थोड़ा बातों में लगाये रखना है।
"मेरी परी ! मेरी सिमरन ! मेरी प्रियतमा तुम कितनी प्यारी हो !"
"पर तुम्हें मेरी कहाँ परवाह है?"
"तुम ऐसा क्यों बोलती हो?"
"ऐसे तो मुझे अपनी प्रेतात्मा कहते हो और मेरी जरा भी परवाह नहीं है तुम्हें?"
मेरी हंसी निकल गई। मैंने कहा,"प्रेतात्मा नहीं प्रियतमा !"
"हाँ.. हाँ.. वही.. पर देखो तुम कितने दिनों बाद आये हो?""
"पर आ तो गया ना?"
"ऐ .... जीजू ... सच बताना क्या तुम सच में मुझे सिमरन की तरह प्रेम करते हो?"
"हाँ मेरी परी मेरे दिल को चीर कर देखो वो तुम्हारे नाम से धड़कता दिखाई देगा !"
"छट गधेड़ा !" कह कर उसने मेरे होंठों पर एक चुम्बन ले लिया।
"परी, अब तो दर्द नहीं हो रहा ना?"
"मारो तो ऐ वखते जिव ज निकली गयो हतो" (मेरी तो उस समय जान ही निकल गई थी)
"ओह... अब तो जान वापस आ गई ना?"
मेरा लण्ड अन्दर समायोजित हो चुका था और अन्दर ठुमके लगा रहा था। पलक भी अब सामान्य हो गई थी। लगता था उसका दर्द कम हो रहा था। अब मैंने फिर से उसके उरोजों को मसलना और चूमना चालू कर दिया। उसने भी अपनी जांघें पूरी खोल दी थी और हौले होले अपने नितम्बों को हिलाना भी चालू कर दिया था। अब मैंने हौले होले अपने लण्ड को थोड़ा अन्दर-बाहर करना चालू कर दिया था। उसकी फांकें चौड़ी जरूर हो गई थी पर अभी भी मेरे लण्ड के चारों ओर कसी हुई ही लग रही थी।
"पलक, तुम बहुत खूबसूरत हो !"
"जीजू... तमे मने भूली तो नहीं जशोने?" (जीजू ... तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे ना ?)
"नहीं मेरी परी मैं तो तुम्हें अगले 100 जन्मों तक भी नहीं भूल पाऊँगा !"
"ईईईईईईईई ...... ओह तुम रुक क्यों गए करो ना ?"
मैं जानता था कि अब उसका दर्द ख़त्म हो गया है और वो अब किनारे पर ना रह कर आनन्द के सागर में डूब जाना चाहती है। मैंने हौले होले अपने धक्कों की गति बढ़ानी चालू कर दी। पलक भी अब अपने नितम्ब उचका कर मेरा साथ देने लगी थी। मैं उसके गालों, होंठों, पलकों, गले और कानों को चूमता जा रहा था। हर धक्के के साथ उसकी मीठी सीत्कार दुबारा निकलने लगी थी।
अब तो पलक थोड़ी चुलबुली सी हो गई थी। जैसे ही मैं धक्का लगाने के लिए अपने लण्ड को थोड़ा सा बाहर निकालता वो थोड़ा सा ऊपर हो जाती। मैंने अपना एक हाथ उसके मखमली नितम्बों पर फिराना भी चालू कर दिया। मुझे उसके नितम्बों की दरार में भी गीलेपन का अहसास हुआ। हे भगवान् ! यह तो मिक्की का ही प्रतिरूप लगती है। मैंने अपनी अंगुली उसके नितम्बों की खाई में फिरानी चालू कर दी।
"आह ... जीजू .... मुझे कुछ हो रहा है ... आआआ ... ईईईईईईईईईईई ... ओह... जरा जोर से मसलो मुझे !" उसका बदन कुछ अकड़ने सा लगा था। मैं जानता था वह अब अपने आनन्द के शिखर पर पहुँचाने वाली है। मैंने अपने धक्के थोड़े से बढ़ा दिए और फिर से उसे चूमना चालू कर दिया। उसके कुंवारे बदन की महक तो मुझे मतवाला ही बना रही थी। उसने मुझे जोर से अपनी बाहों में कस लिया। वो प्रकृति से कितनी देर लड़ती, आखिर उसका कामरज छूट गया। मुझे अपने लण्ड के चारों और गीलेपन का अहसास और भी ज्यादा रोमांचित करने लगा।
कुछ क्षणों के बाद वो ढीली पड़ती चली गई। पर उसने अपनी आँखें नहीं खोली। मैंने उसकी बंद पलकों को एक बार फिर चूम लिया।
"जीजू एक बात पूछूं ?"
"क्या ...?"
"वो ... वो ... नितम्बों पर चपत लगाने से क्या उनका आकार भी बढ़ जाता है?"
मैं तो उसके इस भोलेपन पर मर ही मिटा। अब मैं उसे क्या समझाता कि यह तो चुदक्कड़ औरतों को संतुष्ट करने के लिए किया जाता है। ऐसी लण्डखोर औरतों को संभोग के दौरान बिना मार और गालियाँ खाए मज़ा ही नहीं आता। उन्हें जब तक तोड़ा मरोड़ा और मसला ना जाए मज़ा ही नहीं आता।
पर मैं पलक का दिल नहीं दुखाना चाहता था मैंने कहा,"हाँ ऐसा होता है पर तुम क्यों पूछ रही हो?"
"ओह ... जीजू मेरे नितम्बों पर भी चपत लगाओ ना ...?"
मेरी हंसी निकलते निकलते बची। मैंने उसे कहा कि उसके लिए तुम्हें चौपाया बनाना होगा या फिर तुम्हें ऊपर आना होगा !"
"ओके ... पर मैं ऊपर कैसे आऊँ?"
"रुको ... मैं करता हूँ !" कह कर मैंने उसे अपनी बाहों में भर लिया और हम दोनों ने फिर एक पलटी खाई। अब पलक मेरे ऊपर थी। उसने एक जोर की सांस ली। उसे अपने ऊपर पड़े मेरे भार से मुक्ति मिल गई थी। अब वो मेरे ऊपर झुक गई और मैंने उसके छोटी छोटी अम्बियों (कैरी) को अपने मुँह में भर लिया। अब मैंने उसके नितम्बों पर हाथ फिराना चालू कर दिया और हौले होले चपत लगानी चालू कर दी। पलक फिर से सीत्कार करने लगी थी शायद नितम्बों पर चपत लगाने से वो जरुर चुनमुनाहट लगे होंगे। मैं बीच बीच में उसके नितम्बों की खाई में उस दूसरे छेद पर भी अंगुली फिराने लगा था।
हमें कोई 15-20 मिनट तो हो ही गए थे। पलक कभी कभी थोड़ा सा ऊपर होती और फिर एक हलके झटके के साथ अपनी कमर और नितम्बों को नीचे करती। उसकी कमर की थिरकन को देख कर तो यह कतई नहीं खा जा सकता था कि वो पहली बार चुद रही है।
अब मुझे लगने लगा था मेरा अब तक किसी तरह रुका झरना किसी भी समय फूट सकता है। मैं उसे अपने नीचे लेकर 5-7 धक्के तसल्ली से लगा कर अपना कामरस निकलना चाहता था। पलक भी शायद थक गई थी। वो मेरे ऊपर लेट सी गई तो मैंने फिर से उसे अपने नीचे कर लिया। पर हम दोनों ने ध्यान रखा कि मेरा रामपुरी उसके खरबूजे के अन्दर ही फंसा रहे।
मेरा मन तो कर रहा था कि उसे अपनी बाहों में जोर से भींच कर 5-7 धक्के दनादन लगा कर अपना रस निकाल दूं पर मैंने अपने ऊपर संयम रखा और अंतिम धक्के धीरे धीरे लगाते हुए उसे चूमता रहा। वो भी अब दुबारा आह... उन्ह.. करने लगी थी। शायद दुबारा झड़ने के कगार पर थी।
"मेरी ... सिमरन.... मेरी परी ... आह ..."
मेरे धक्कों की गति और उखड़ती साँसों का उसे भी अंदाज़ा तो हो ही गया था। उसने मुझे अपनी बाहों में जकड़ लिया और मेरी कमर के दोनों और अपनी जांघें कस ली।
"आह... जीजू .................उईईईईईईईई,"
"मेरी प .... परीईईईईईईईईईईइ ..............."
मेरे मुँह से भी भी गुर्र... गुर्र की आवाजें निकालने लगी और मैंने उसे जोर से अपनी बाहों में भींच लिया। और उसके साथ ही मेरा भी कुलबुलाता लावा फूट पड़ा ................
जैसे किसी प्यासी तपती धरती को रिमझिम बारिश की पहली फुहार मिल जाए हम दोनों का तन मन एक दूसरे के प्रेम रस में भीग गया। सदियों से जमी देह मानो धरती की तरह हिचकोले खाने लगी थी। आज तो पता नहीं मेरे लण्ड ने कितनी ही पिचकारियाँ छोड़ी होंगी। पलक ने तो अपनी पिक्की के अन्दर इतना संकोचन किया जैसे वो मेरे वीर्य की एक एक बूँद को अन्दर चूस लेगी। और फिर एक लम्बी सांस लेते हुए किसी पर कटी चिड़िया की तरह पलक निढाल हो कर ढीली पड़ गई।
मैं 2-3 मिनट उसके ऊपर ही पड़ा रहा। फिर हौले से उसके ऊपर से उठाते हुए अपना हाथ बढ़ा कर पास पड़े कोट की जेब से वही लाल रुमाल निकाला जो मेरे और सिमरन के प्रेम रस से सराबोर था। मैंने पलक की पिक्की से निकलते कामरस और वीर्य को उसी रुमाल से पोंछ लिया और एक बार उसे अपने होंठों से लगा कर चूम लिया। मुझे लगा इसे देख कर सिमरन की आत्मा को जरुर सुखद अहसास होगा। पलक आश्चर्य से मेरी ओर देख रही थी। मुझे तो लगा वो अभी सिमरन की तरह बोल पड़ेगी ‘हटो परे गंदे कहीं के !’
हम दोनों उठ खड़े हुए। उसके नितम्बों के नीचे बिस्तर पर भी 5-6 इंच जितनी जगह गीली हो गई थी। मैं उसे बाथरूम में ले जाना चाहता था। पर उससे तो चला ही नहीं जा रहा था। मैं जानता था उसकी जाँघों के बीच दर्द हो रहा होगा पर वो किसी तरह उसे सहन कर रही थी। वो चलते चलते लड़खड़ा सी रही थी। मैंने उसे अपनी गोद में उठा लिया।
बाथरूम में हमने अपने अंगों को धोया और फिर कपड़े पहन कर वापस कमरे में आ गए। मैं जैसे ही बेड पर बैठा पलक फिर से मेरी गोद में आकर बैठ गई और फिर उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी। मैंने एक बार फिर से उसके होंठों को चूम लिया।

कहानी जारी रहेगी !

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Re: लेखक-प्रेम गुरु की सेक्सी कहानियाँ

Unread post by The Romantic » 02 Nov 2014 13:52


मैं जैसे ही बेड पर बैठा पलक फिर से मेरी गोद में आकर बैठ गई और फिर उसने अपनी बाहें मेरे गले में डाल दी। मैंने एक बार फिर से उसके होंठों को चूम लिया।
"जीजू, तुम मुझे भूल तो नहीं जाओगे?"
"नहीं मेरी खूबसूरत परी... मैं तुम्हें कैसे भूल पाऊँगा....?"
क्या पता कोई और मिक्की या सिमरन तुम्हें मिल जाए और मुझे....?" कहते कहते पलक की आँखें भर आई।
"मेरी पलक... अब मेरे इस जीवन में कोई और सिमरन नहीं आएगी..!"
"सच्ची ? खाओ मेरी कसम ?"
"हाँ मेरी परी, मैं तुम्हारी कसम खाता हूँ।"
"नहीं 3 वार सम खाओ !" (नहीं 3 बार कसम खाओ)
"ओह.. तुम तो मुझे मुसलमान ही बना कर छोड़ोगी?"
"छट गधेड़ा..?" हँसते हुए पलक ने मेरे होंटों को मुँह में भर कर जोर से काट खाया।
रात के 2 बज गए थे, मैं होटल लौट आया।
आज मैंने दिन में बहुत सी योजनाएँ बनाई थी। सच कहूँ तो मुझे तो ऐसा लगने लगा था कि जैसे मेरी सिमरन वापस लौट आई है। काश यह संभव हो पाता कि मैं अपनी इस नन्ही परी को अपने आगोश में लिए ही बाकी की सारी जिन्दगी बिता दूँ। पर मैंने आपको बताया था ना कि मेरी किस्मत इतनी सिकंदर नहीं है।
लगभग 3 बजे सुधा (मधुर की भाभी-नंदोईजी नहीं लन्दोइजी वाली) का फ़ोन आया कि मधुर सीढ़ियों से गिर गई है और उसकी कमर में गहरी चोट आई है। मुझे जल्दी से जल्दी जयपुर पहुँचाना होगा।
हे लिंग महादेव ! तू भी मेरी कैसी कैसी परीक्षा लेता है। जयपुर जाने वाली ट्रेन का समय 5:30 का था। पहले तो मैंने सोचा कि अपने जयपुर जाने की बात पलक को अभी ना बताऊँ वहाँ जाकर उसे फ़ोन कर दूँगा पर बाद में मुझे लगा ऐसा करना ठीक नहीं होगा। पलक तो मुझे लुटेरा और छलिया ही समझेगी। मैंने उसे अपने जयपुर जाने की बात फ़ोन पर बता दी। मेरे जाने की बात सुनकर वो रोने लगी। मैं उसके मन की व्यथा अच्छी तरह समझ सकता था।
किसी तरह टिकट का इंतजाम करके मैं लगभग भागते हुए 5:15 बजे स्टेशन पहुंचा। पलक प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी। मुझे देखते ही वो दौड़ कर मेरी ओर आ गई और मेरी बाहों में लिपट गई।
"मैं कहती थी ना मुझे कोई नहीं चाहता? तुम भी मुझे छोड़ कर जा रहे हो ! मैं अगर मर भी गई तो किसी को क्या फर्क पड़ने वाला है !"
"मेरी परी ऐसा मत बोलो ! मैं तुम्हें छोड़ कर नहीं जा रहा हूँ पर मेरी मजबूरी है। अगर मधुर हॉस्पिटल में ना होती तो मैं कभी तुम्हें ऐसे छोड़ कर नहीं जाता।"
"प्रेम तमे पाछा तो आवशो ने ? हूँ तमारा वगर हवे नहीं जीवी शकू ?" (प्रेम तुम वापस आओगे ना? मैं तुम्हारे बिना अब नहीं जी सकूँगी।)
"हाँ पलक मेरी प्रियतमा ... मेरी सिमरन मेरा विश्वास करो, मैं अपनी इस परी के लिए जरुर आऊँगा ...!"
"शु तमे मने तमारी साथै न लाई जाई शको? हवे हूँ ऐ नरक माँ नथी रहेवा मांगती" (क्या तुम मुझे अपने साथ नहीं ले चल सकते? मैं अब उस नरक में नहीं रहना चाहती।)
"ओह.... पलक मैं आ जाऊँगा मेरी परी ! तुम क्यों चिंता करती हो ?"
"पाक्कू आवशो ने ? खाओ मारा सम?" (पक्का आओगे ना? खाओ मेरी कसम।)
"ओह ... पलक ... अच्छा भई तुम्हारी कसम, मैं जल्दी ही वापस तुम्हारे पास आ जाऊँगा।"
"जीजू ! शु सचे माँ देवदूत होय छे ?" (जीजू क्या सच में देवदूत होता है?)
"हाँ जरूर होता है पर केवल तुम जैसी परी के ही सपनों में आता है !"
"प्रेम आज अगर मैं तुमसे कुछ मांगूँ तो मना तो नहीं करोगे ना?"
"पलक तुम मेरी जान भी मांगो तो वो भी तुम्हें दे दूंगा मेरी परी !"
पता नहीं पलक क्या मांगने वाली थी।
"मने ऐ...ऐ.. लाल रुमाल जोवे छे जे.. जे..." (मुझे वो... वो ... लाल रुमाल चाहिए जो..जो)
"ओह ..." मेरे कांपते होंठों से बस यही निकला।
मेरी परी यह तुमने क्या मांग लिया? अगर तुम मेरी जान भी मांगती तो मैं मना नहीं करता। खैर मैंने अपनी जेब से उस लाल रुमाल को (जो मुझे सिमरन ने दिया था) निकाल कर उसे एक बार चूमा और फिर पलक को दे दिया।
"इसे संभाल कर रखना !"
"आने तो हु मारी पासे कोई खजाना नि जेम दिल थी लगावी ने राखीश ?" (इसे तो मैं अपने पास किसी अनमोल खजाने की तरह अपने ह्रदय से लगा कर रखूँगी।)
पलक ने उसे अपनी मुट्ठी में इस प्रकार बंद कर लिया जैसे कोई बच्चा अपनी मनचाही चीज के खो जाने या छिन जाने के भय से छुपा लेता है। गाड़ी का सिग्नल हो गया था। हालांकि यह सार्वजनिक जगह पर यह अभद्रता थी पर मैंने पलक के गालों पर एक चुम्बन ले ही लिया और फिर बिना उसकी ओर देखे डिब्बे में चढ़ गया।
खिड़की से मैंने देखा था पलक उस रुमाल से अपनी आँखों को ढके अभी भी वहीं खड़ी थी।
दोस्तों ! जिन्दगी बड़ी बेरहम होती है। मधुर के इलाज़ के चक्कर में मैं पलक से ज्यादा संपर्क नहीं कर पाया। बस उसे दिलासा देता रहा मैं आऊँगा। पहले तो मैंने नवम्बर में आने का कहा और बाद में दिसंबर में। लेकिन मैं नहीं जा पाया। बाद में मैंने अपना जन्म दिन (11 जनवरी) उसके साथ ही मनाने की बात कही। पलक तो मुझे झूठा ही कहती रही थी। उसने मुझे इशारा भी किया था कि वो किसी मुसीबत में है, अगर मैं इस बार भी नहीं आया तो फिर वो मुझे कभी नहीं मिलेगी।
मैं जानता था पलक बहुत जल्दी गुस्सा होती है पर जल्दी ही मान भी जाती है। मैं अपनी परी को मना लूँगा।
मैं 11 जनवरी को भी नहीं जा पाया तो मैंने फरवरी में आने वाले वेलेंटाइन डे पर जरुर आने को बोल दिया। उसके बाद तो उसके मेल और फ़ोन आने बंद हो गए। अब तो जब भी फ़ोन मिलाता, यही उत्तर मिलता यह नंबर मौजूद नहीं है।
पता नहीं क्या बात थी ? कहीं पलक को कुछ हो तो नहीं गया?
वो किस मुसीबत की बात कर रही थी?
हे भगवान् उसे कुछ हो ना गया हो ?
मेरा दिल इसी आशंका से डूबने लगा था। वैसे अहमदाबाद में मेरी अच्छी जानकारी थी पर पलक के सम्बन्ध में मैं किसी से कैसे पूछ सकता था।
अचानक मुझे याद आया उसने अपनी एक सहेली सुहाना के साथ अपनी एक फोटो भेजी थी। ओह ... सुहाना से पता किया जा सकता था। मैं अहमदाबाद आ गया। सुहाना को खोजना कोई मुश्किल काम नहीं था। पलक ने बताया था कि वो दोनों कस्तूरबा गांधी कॉलेज में एक साथ पढ़ती हैं। यह वही लड़की थी जिसका जिक्र मैंने अपनी कहानी,"उन्ह आंटी मत कहो" में किया था।
फिर सुहाना ने जो बताया मेरे तो पैरों से जमीन ही खिसक गई। उसने बताया कि पलक ने मेरा बहुत इंतज़ार किया। वो बहुत रोती रहती थी। उसने बताया कि उसके पेट में बहुत दर्द सा रहता है और उसे चक्कर से आते रहते थे। उसने किसी लेडी डॉक्टर को भी दिखाया था उसने बतया कि अपनी मम्मी को साथ लेकर आना। वो बहुत डरी सहमी सी रहने लगी थी। उसने बताया था कि उस दिन उसके बाबा ने उसे बहुत मारा था। घर वाले तो कहते हैं कि उसे रात को बहुत जोर से पेट दर्द हुआ था और अस्पताल ले जाने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया था। पर मुझे लगता है उसने कुछ खा लिया था।
"ओह ... मेरी परी ! तुमने ऐसा क्यों किया?" मेरी आँखें छलछला उठी। पर मेरे पास तो अब वो रुमाल भी नहीं था जिनसे मैं अपने आँसू पोंछ सकता।
पलक ने मुझे अपनी कसम दी थी और मैंने उससे दुबारा मिलने का वादा भी किया था पर मैं वो वादा नहीं निभा पाया। लगता है मैं तो बस इतने दिनों मृग-मरीचिका में फसा था और हर कमसिन और नटखट लड़की में सिमरन को ही खोज रहा था।
मैंने अपने जीवन में दो ही कसमें खाई थी अब मैं यह तीसरी कसम खाता हूँ आज के बाद किसी नादान, नटखट, चुलबुली, अबोध, परी जैसी मासूम लड़की से प्रेम नहीं करूँगा और ना ही कोई कहानी लिखूँगा।
किसी के मिलन से बढ़कर उसकी जुदाई अधिक कष्टकारक होती है। मेरी पलक तुम्हारी यादें तो मुझे नस्तर की तरह हमेशा चुभती ही रहेंगी। मेरी सिमरन ! तुम्हारे प्रेम में बुझी मेरी यह आत्मा तो मृत्यु पर्यंत तुम्हारी याद में रोती और तड़फती रहेगी :

जिन्दगी टूट कर बिखर गई तेरी राहों में
मैं कैसे चल सकता था तेरा साया बनकर

अलविदा मेरे प्यारे पाठको .......

प्रेम गुरु नहीं बस प्रेम