गर्ल'स स्कूल compleet

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rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:20

गर्ल्स स्कूल पार्ट --30

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा गर्ल्स स्कूल पार्ट 31 लेकर आपके लिए हाजिर हूँ दोस्तो जैसा कि आप जानते है ये कहानी कुछ ज़्यादा ही लंबी हो गयी है इसलिए प्रत्येक किरदार के साथ कहानी को लेकर चलना पड़ता है जैसे दिशा शमशेर वाणी को हम नही भूल सकते इसलिए इस पार्ट मैं इन्ही तीनों की कहानी है दोस्तो जिन दोस्तो ने इस कहानी के इस पार्ट को पहली बार पढ़ा है उनकी समझ मैं ये कहानी नही आएगी इसलिए आप इस कहानी को पहले पार्ट से पढ़े

तब आप इस कहानी का पूरा मज़ा उठा पाएँगे आप पूरी कहानी मेरे ब्लॉग -कामुक-कहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर पढ़ सकते है अगर आपको लिंक मिलने मैं कोई समस्या हो तो आप बेहिचक मुझे मेल कर सकते हैं अब आप कहानी पढ़ें

"दीदी, हम शहर कब जाएँगे? आपको जीजू की याद नही आती?" वाणी ने चारपाई पर चुपचाप लेटी दिशा के पास फर्श पर पसरते हुए कहा....

"जब वो लेने आएँगे तभी तो चलेंगे.. कल से उनका फोन भी नही मिल रहा.." दिशा ने वाणी की तरफ करवट लेते हुए उसकी मोटी मोटी मासूम सी आँखों में देखकर कहा...

"एक बात पूछू दीदी...?" वाणी ने उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया..

"हूंम्म्मम.." शमशेर की याद आते ही दिशा की जवानी ने अंगड़ाई सी ली.. कितने दिन हो गये थे... उसकी आगोश में समाए!"

"आपको जीजू बहुत याद आते हैं ना..." वाणी की आवाज़ में शरारत और

सहानुभूति का मिश्रण था...

"धात.. इसमें याद करने वाली क्या बात है... आज कल में वो आने वाले ही होंगे... (फिर कुच्छ रुक कर) मुझसे ज़्यादा तो तू ही उनको याद करती रहती है... केयी बार मैने देखा है.. तू गुम्सुम सी रहती है..."दिशा ने हालाँकि शमशेर वाली बात मज़ाक में कही थी.. पर वाणी के गुम्सुम रहने वाली बात मज़ाक नही थी.. दिशा ने केयी बार उसकी आँखों में वो सूनापन महसूस किया था जो किसी नवयौवना में मर्द की प्यास के रूप में उसके अंग अंग से परिलक्षित होता है..

वाणी दिशा की इश्स बात पर दाँत निकाल कर हँसने लगी," तुम जल रही हो दीदी! तुम्हारी कसम दीदी! अब में कभी जीजू को उस नज़र से नही देखती..."

दिशा अब तक गंभीर हो चुकी थी," वो तो मैं जानती हूँ वाणी.. पर तुम बदल गयी हो.. अगर वो शमशेर नही है तो कोई तो ज़रूर है.. कौन है वो.. मुझे बता दे......"

वाणी बात को सुनते ही इश्स तरह सकपकाई जैसे उसकी चोरी पकड़ी गयी हो.. चेहरे का रंग ऊड गया.. नज़रें नीची हो गयी और उसके हाथ दिशा का हाथ छ्चोड़ कर अपने सीने पर आकर टिक गये मानो दिल में गहरे जाकर बस गयी तस्वीर को दुनिया से

छिपाने की कोशिश कर रहे हों... फिर कुच्छ संभाल कर बोली," ना.. नही दीदी.. तुम ऐसा क्यूँ कह रही हो..? ऐसा तो कुच्छ भी नही है दीदी..." और उठ कर जाने को हुई..

दिशा ने उसका हाथ पकड़ लिया," कहाँ जा रही हो... मेरे पास बैठो.. यहाँ!"

और वाणी दिशा से नज़रें चुराते हुए चारपाई पर बैठ गयी...

"देख वाणी... मुझसे आज तक तेरी कोई बात छिपि नही रही है.. और तू किसी से छिपा सकती भी नही है.. ये तेरी मोटी मोटी आँखें सब कह देती हैं... तू कितनी भोली है वाणी; तू खुद नही जानती.... अब बता भी दे.. वो कौन है..!"

"दीदी.. तुम भी ना..!" वाणी चेहरा घूमते हुए दिशा की छातियो से चिपक कर अपनी शरम दूर करने की कोशिश करने लगी..," वो.." तभी दरवाजे पर हुई आवाज़ ने दोनो को चौंका दिया...

वाणी ने जैसे ही चेहरा घुमा.. दरवाजे पर खड़े शख्स को देखकर साँस उपर की उपर और नीचे की नीचे रह गयी.. चेहरे का रंग एक बार फिर ऊड गया.. और चारपाई पर जड़ सी होकर बैठी रही..

दिशा संभली और मुस्कुराते हुए उठ कर खड़ी हो गयी," मनु! ... तुम?????"

अमित और मनु अंदर आ गये..," नमस्ते दीदी!"

जिसके लिए वाणी का दिल धड़कता था, जिसका सूनापन दिशा को उसकी आँखों में महसूस होता था.. उसको यूँ अचानक सामने पाकर वाणी को मानो साँप सूंघ गया, उसकी हालत काटो तो खून नही वाली हो गयी.. दिल में अचानक एक पल के लिए अंजानी लहर सी उठी, आँखें खिल उठी, शरीर में योवन ने अंगड़ाई ली... और अगले ही पल शर्मकार अंदर भाग गयी.. मनु भी उसको सीधे देखने से कतरा रहा था पर तिर्छि निगाहों ने वाणी की उसके लिए कसक को भाँप लिया...

"अंदर आओ ना.. वही क्यूँ खड़े रह गये.." दिशा ने वाणी को अंदर भागते देख हड़बड़ाहट में अमित को प्रशंसूचक नज़रों से देखा..

"दीदी! ये मेरा दोस्त है.. अमित! मेरे साथ ही पढ़ता है.. और अमित... ये हैं दिशा दीदी.. वाणी की बड़ी बेहन!" वाणी का नाम बोलते हुए बड़ी मुश्किल से ज़ुबान ने मनु का साथ दिया....

"ओह्ह अच्च्छा.." कहकर दिशा उन्न दोनो को अंदर ले गयी..," बैठो!... वाणी! ज़रा पानी तो लेकर आओ!"

वाणी पर्दे की ओट में खड़ी होकर अपने यार की सूरत का दीदार कर रही थी.. "कितना प्यारा है.. क्या ये मेरे लिए यहाँ आया है.." मन्त्र मुग्ध सी वाणी का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़क रहा था..खून में जैसे हज़ारों चीटियाँ रेंगने लगी हों.. वाणी ने अपने आवेग को दबाने के लिए अपनी मखमली गोरी टाँगों को एक दूसरी से कसकर भींच लिया..

दिशा की आवाज़ ने उसके दिव्य-स्वपन को भंग कर दिया..," हां दीदी...... एक मिनिट इधर आना!"

"क्या है? तुम भी ना बस!" कहते हुए दिशा उन्न दोनो की और मुश्कुराइ और अंदर वाले कमरे में चली गयी...

"क्या है....?"

"श दीदी...... मैं बाहर नही आउन्गि..!" वाणी ने दिशा से नज़रें चुराते हुए कहा...

"क्यूँ.. क्यूँ नही आएगी बाहर.." दिशा ने उसी स्वर में वाणी से कहा तो वाणी ने उसके होंटो पर अपने हाथों से ताला जड़ दिया..," चुप दीदी!"

दिशा की बात बाहर बैठे मनु के कानो तक पहुँची और वो विचलित हो गया.. 'क्या वाणी मेरे सामने नही आना चाहती' दोस्तों आपका दोस्त राज शर्मा जानता है अपना मनु कितना शर्मीला है

बुद्धू को इतना भी मालूम नही था की इसी को तो प्यार कहते हैं...

दिशा दोनो के लिए बाहर पानी देकर वापस अंदर चली गयी...," क्या बात है वाणी? बता ना.. क्यूँ नही आ रही बाहर?"

"मेरे कपड़े देखो ना दीदी.. कितते गंदे हैं.. और फिर बाथरूम भी बाहर वाले कमरे के साथ है.. मैं बगैर नहाए....." वाणी की मासूम आँखों में लज्जा आ विराजी थी...

"ओहूऊओ.. कहाँ से गंदे हैं कपड़े.. बताना ज़रा.. और अभी नहाई तो थी योगा से आते ही.. मैं भी तो ऐसे ही कपड़ों में हूँ...

"वो बात नही है दीदी..." वाणी अपने हाथों को मसल रही थी.. अधीरता से!"

"तो फिर बात क्या है च्छुटकी! जब मनु शहर में हमारे घर आया था तो तूने उसको कितना तंग किया था.. कितनी खिल्ली उड़ाई थी.. अब इतना शर्मा रही हो.. आख़िर बात क्या है...?"

अब वाणी दिशा को कैसे बताती जो उसके बाद हो चुका है.. मनु उसको निर्वस्त्रा अपनी बाहों में उठा चुका है.. भले ही मजबूरी में ही सही.... वो उसको दिल दे चुकी है.. अंजाने में ही सही!"

तुझे मेरी कसम है वाणी.. अभी चाय बना और लेकर बाहर आजा.. ऐसे अच्च्छा नही लगता च्छुटकी.. वो दोनो अकेले बैठे है.. चल जल्दी कर!"

"डीडीिईईई! वाणी बनावटी गुस्से में अपने पैर पटकती रह गयी... मनु को वो अच्च्ची नही लगी तो!' मनु के ख़यालों में खोई वाणी चाय बनाने लगी.....

"यहाँ.. यूँ.. अचानक!" दिशा ने चारपाई पर बैठते हुए बातों की शुरुआत की...

"वाणी को इतना रूखा ववहार करते देख मनु का दिल उतर चुका था..," बस यूँही दीदी.. रेवाडी गये थे किसी काम से! इधर से निकले तो ध्यान आया कि आप यहीं हो.. ववो मानसी ने बोला था.. वाणी से मिलकर आने के लिए.."

"पता नही कैसे स्वाभाव हो गया है इसका.. अब देख लो.. तुम्हे देखते ही अंदर भाग गयी..."

मनु को कुच्छ ना सूझा.. दिल में टीस सी लिए सिर नीचे झुका लिया...

वाणी जब चाय लेकर बाहर आई तो उसका चेहरा देखने लायक था.. गोरे गालों पर लाली ने अपने पाँव पसार लिए थे.. नीचे वाला रसीला होंठ दाँतों के नीचे दबाया हुआ था.. गोल गोल छातियाँ तेज़ी से उपर नीचे हो रही थी.. ध्यान से देखने पर सॉफ झलक रहा था की वो काँप रही है... बड़ी मुश्किल से एक एक कदम नाप कर आ रही वाणी का धैर्य टेबल के पास आते ही जवाब दे गया और ट्रे उलट कर टेबल पर धुमम से आ गिरी..," ओओयीईइ मम्मी!"

चाय के छींटे वहाँ बैठे तीनो के कपड़ों पर जा लगे...

वो दोनो हड़बड़कर खड़े हो गये.. दिशा आस्चर्य से वाणी को देख रही थी पर कुच्छ बोल ना पाई.. वाणी ने वहीं खड़े होकर रोना शुरू कर दिया...

दिशा अजीब नज़रों से वाणी को देख रही थी की आख़िर ये हो क्या रहा है.. मनु का मंन हुआ की जैसे आगे हाथ बढ़ा कर वाणी के गालों पर आ लुढ़के आँसुओं को पौछ दे.. पर वा हिम्मत ना कर पाया.. अचानक अमित की आवाज़ से मनु को होश आया.," कोई बात नही! आप रो क्यूँ रही हैं.."

"आख़िर आज तुम्हे क्या हो गया है वाणी? .. चल कोई बात नही.." फिर दोनो के कपड़ों पर गिरी चाय को देखते हुए बोली.. "इन्न पर तो धब्बा बन जाएगा..तुम दोनो शर्ट निकाल दो.. मैं पानी से निकाल देती हूँ..."

अमित को झट से शर्ट निकालते देख शरमाते सकुचाते मनु ने भी वैसा ही किया...

"कोई बात नही वाणी.. अब रो क्यूँ रही है? जा और चाय बना दे.. और अब की बार तू लेकर मत आना" दिशा ने वाणी को दुलारते हुए कहा..

वाणी ने बड़े ही भोलेपन से सिर हिलाया.. उसकी मासूमियत पर तीनो खिल खिला कर हंस पड़े.. दिशा दोनो शर्ट उठा कर बाहर निकल गयी...

वाणी के चाय बना'ने के लिए अंदर जाते ही अमित ने मनु का हाथ पकड़ कर ज़ोर से दबाया," भाई! इश्स गाँव में तो एक से एक बढ़कर हसीनायें हैं.. बड़ा मीठा पानी लगता है यहाँ का.. अब तक तीन देखी हैं.. सब एक से बढ़कर एक!.. और सच में यार.. तूने तो क्या तीर मारा है निशाने पर.. सब कुच्छ तो है वाणी में.. नज़ाकत, कयामत, खूबसूरती और.. हाए.. क्या क्या नही है.. माफ़ करना यार पर मेरे दिल में पाप आ गया है...! "

"नही यार! वाणी मेरी किस्मत में नही है...! ये मुझे पसंद नही करती..." मनु ने उतरे हुए चेहरे से कहा...

"ठीक उसी वक़्त वाणी ने अपने कान उन्न दोनो की फुसफुसाहट में लगाए थे.. ये जान'ने के लिए की कहीं उसकी हँसी तो नही कर रहे वो...

"अबे क्या कह रहा है तू.. तुझे देखकर इसकी हालत पतली हो गयी है और तू कह रहा है कि तुझे पसंद नही करती..." अमित ने अपने अनुभव से ये बात कही!

"नही यार.. तूने देखा नही कैसे मुझे देखकर अंदर भाग गयी थी.. और मेरे सामने आने तक से मना कर रही थी.. वो तो इसकी बेहन..." मनु अपना दुखड़ा उसके आगे रोने लगा.

"यार! तू है तो पूरा लल्लू और चल पड़ा मोहब्बत करने.. वो तुझसे चिढ़ती नही बल्कि शरमाती है.. और लड़की तभी शरमाती है जब उसके दिल में कुच्छ हो.. समझा..!" अमित की आवाज़ समझते हुए कुच्छ और तेज हो गयी थी.. शब्द वाणी के कानो में मिशरी से भी मीठा रस उत्पन्न कर रहे थे....

"नही यार.. वाणी ऐसी नही है.. वो तो इतनी बेबाक और भोली है की अगर उसके दिल में कुच्छ होता तो डंके की चोट पर कह देती.. ऐसा कुच्छ नही है यार!"

"हे भगवान! तुझे भी इश्स लंगूर को ही अंगूर देना था... अबे भोलेनाथ! वो बेबाक तब तक रही होगी जब तक उसको पता नही होगा की प्यार किस चिड़िया का नाम है.. अब उसका व्यवहार तेरे सामने बदल गया है तो इसका एक ही मतलब है.. उसको तुमसे प्यार हो गया है.. अब ज़रा हिम्मत कर और उसके अकेला होने का फ़ायदा उठा.. बोल दे वहीं जाकर अपने दिल की बात.. अगर इकरार ना करे तो मेरा नाम बदल देना.." अमित ने उसके कंधे पर हाथ मारा..

वाणी ने ये सब सुनकर दीवार से सॅटकर अपने दिल पर दोनो हाथ रख लिए.. उसके उभार इतनी तेज़ी से उपर नीचे हो रहे थे कि उसको स्वयं पर काबू करना मुश्किल हो रहा था.. उसको डर लग रहा था कहीं सच में ही मनु अंदर ना आ जाए.. अगर ऐसा हो गया तो वो तो मर ही जाएगी.. खुशी के मारे! वाणी आँखें बंद करके होनी के होने का इंतज़ार करने लगी...

"नही यार! मुझमें हिम्मत नही है उसका यूँ सामना करने की.. अगर इनकार कर दिया तो मैं तो जी ही नही पाऊँगा...." मनु ने अपने हाथ उठा दिए..

वाणी को अहसास ही नही था की चाय दोबारा बन कर कब की पतीले से बाहर आ गयी है... मनु की बात सुनकर वह मायूस सी हो गयी.. अब वह खुद तो उसके पास नही जा सकती ना.... इजहारे-इश्क़ की खातिर!

"ठीक है.. तू नही जाता तो मैं ही जाकर बोल देता हूँ सब कुच्छ.." मनु उसको रोकने की कोशिश करता.. इश्स'से पहले ही अमित किचेन के दरवाजे तक पहुँच गया था..

"ऊऊऊईीईईईईईई"

वाणी की चीख इतनी जोरदार थी कि एक बार तो अमित भी सहम गया.. वाणी अमित के लिए तैयार नही थी...

वाणी की चीख सुनकर दिशा बिना एक पल भी गँवाए खड़े पाँव अंदर दौड़ी.. अमित को हक्का बक्का किचेन में खड़े देख जब तक दिशा कुच्छ समझ पाती वाणी खिलखिला कर हंस पड़ी," दीदी.. चाय!"

"क्या हुआ?"

"निकल गयी...!" हंसते हुए ही वाणी ने जवाब दिया....

"तू क्या है वाणी.. अब दिशा भी हंस रही थी.. लगता है इन्न बेचारों की किस्मत में हमारे घर की चाय है ही नही.. चल बाहर जाकर कपड़े पानी में से निकाल दे..."

"ठीक है दीदी.." और वाणी उच्छलते हुए बाहर निकल गयी.. उसने जो कुच्छ भी सुना था, उसके बाद उसके पैर ज़मीन पर टिक ही नही सकते थे..'मनु भी उस'से उतना ही प्यार करता है जितना वो खुद उस'से करती है...

बाहर जाकर उसने मनु की शर्ट को अपने हाथों में पकड़ा और आँखे. बंद करके मनु को छूने का अहसास लेने लगी... कितना मीठा होता है प्यार!

शाम के 3 बज गये थे... ये लगभग वही समय था जब राका निशा को हिसार थाने से लाकर बस-स्टॅंड पर छ्चोड़कर निकलने ही वाला था.....

"अब हम चलते हैं दीदी!" मनु ने खाना खाने के बाद दिशा से कहा.. हालाँकि वाणी सारा दिन उसके सामने ही बैठी बातें करती रही थी.. पर प्यार के इज़हार के लिए

जो अकेलापन चाहिए होता है वो उन्न दोनो को नही मिला.. वाणी के अद्वित्या सुंदर चेहरे और सादे कपड़ों में भी दमक रहे उसके यौवन को जी भर कर देखने के बाद भी चलने की कहते हुए मनु का गला भर आया....

"कुच्छ देर में मम्मी पापा आने वाले हैं खेतीं से.. मिलकर चले जाना.." वाणी ने बिना नज़रें मिलाए अपनी खातिर थोड़ी देर और रुकने की गुज़ारिश की.. हाल दोनो का ही खराब था..

"नही वाणी.. अब तो हूमें चलना ही चाहिए.." अमित समझ गया था की इन्न दोनो से होना जाना कुच्छ नही है.. फिर बेवजह टाइम बर्बाद करने का क्या फ़ायदा...

"चलो! ठीक है फिर.. हम भी आज कल में आ ही रहे हैं भिवानी.. फिर मिलते हैं.." दिशा उनको दरवाजे तक छ्चोड़ने के लिए खड़ी होकर उनके साथ चल दी... वाणी अपने यार को जाते देख निकल रहे आँसुओं को पर्दे में ही रखने के लिए वही बैठी रही....

फिर वही हुआ.. आज का दिन शायद भगवान ने प्यार करने वालों को मिलने के लिए ही बनाया था.. जैसे ही मनु ने बाहर कदम रखा.. काली घटाओं ने उसको वहीं रखने के लिए अपनी जी जान लगा दी.. पल भर में ही बादलों के रूप में आसमान पर छाये कामदेव ने उनकी जुदाई पर अपने क्रोध का इज़हार कर दिया और पूरा आँगन बहते नाले में तब्दील हो गया..

तीनो ने मुश्किल से वापस भागकर अपने आपको भीगने से बचाया...," उफ़फ्फ़.. इसको भी अभी शुरू होना था.." मनु ने बनावटी पस्चाताप प्रकट किया..

"कोई बात नही.. इसी बहाने कुच्छ देर और रुक जाओ.. मामा मामी भी आने ही वाले होंगे..." दिशा नेउनको फिर से कुर्सी ऑफर करते हुए कहा...

वाणी के चेहरे की रहस्यमयी मुस्कान को दिशा अब भी समझ नही पाई.. लग रहा था जैसे उसी के आदेश से वर्षा हुई है.. और अब ये रुकने वाली नही है.. जब तक वाणी ना चाहे..

मनु फिर से रह रह कर वाणी को देखने लगा.. और वाणी तो दिशा के पिछे बैठकर उसको एकटक देखे जा रही थी.....

अमित को अपनी नायिका की याद हो आई," दीदी! ये बाहर स्कूल के पास नीले से रंग का जो मकान है.. वो किसका है?"

"क्यूँ..? स्कूल की प्रिन्सिपल मॅ'म का है!"

"नही बस ऐसे ही... हम वहीं पूच्छने गये थे.. वहाँ एक सुंदर सी लड़की थी.. उसको पता ही ना था.. " अमित ने आख़िर बात बना ही ली...

"कौन?.... गौरी?"

"हां! बहुत गोरी थी दीदी.. बिल्कुल आप की तरह.. बहुत सुन्दर भी है.." अमित के दिल से आवाज़ निकली थी.. बहुत मीठी आवाज़..

"अरे उसका नाम है गौरी..!" दिशा ने हंसते हुए कहा.." हां वो सच में ही बहुत सुन्दर है.. पर वो तो हमें अच्छि तरह जानती है.. यहाँ आती भी है अक्सर...

"क्या सच्ची?" अमित अपनी खुशी को दिल में दबाकर नही रख पाया...

"बात क्या है आख़िर.." दिशा ने शरारती लहजे में पूचछा.. अभी बात करती हूँ.. हमें पहचाना क्यूँ नही.. कहकर दिशा अपना मोबाइल उठा लाई...," अरे इसमें तो नेटवर्क ही नही है.. मैं भी कहूँ.. उनका फोन नही आया कल से..

"ये लो ना दीदी.. इस'से बात करो.." अमित ने अपना फोने निकाल कर दिशा को दे दिया...

बात करने के बाद दिशा को पता चला.. गौरी से तो किसी ने कुच्छ पूचछा ही नही.. खैर बात आई गयी हो गयी पर इसी बहाने अमित के सेल में गौरी का नंबर. आ गया!

समय के साथ साथ बारिश कम होने की बजाय और ज़्यादा बढ़ती गयी और अंतत: ये तय हो गया की मनु और अमित आज नही जा रहे हैं..

"दीदी! मैं बारिश में नहा लूँ..." वाणी ने चारपाई पर बैठी दिशा के कंधे पर अपनी ठोडी रखकर मनु से आँखें चार करते हुए पूछा... आज वो अपनी खुशी को छुपा नही पा रही थी..उसको रातों को सपने में तंग करने वाला आज रात को उसके घर में ही होगा.. सच में यह बहुत रोमांचित करने वाला था.. फिर अब तो वाणी को पता भी लग चुका था की जिसके लिए उसका दिल धड़क'ता है.. वो भी उसके लिए तड़प'ता है. वाणी की खुशी का कोई छ्होर नही था.. चुलबुली सी हसीना आज अपने पूरे शबाब पर थी...

खुद इश्स दौर से गुजर चुकी दिशा के लिए भी आज उसका व्यवहार समझ से परे था.. वजह सिर्फ़ एक ही थी.. जो सवाल दिशा वाणी से मनु के आने से ठीक पहले पूच्छ रही थी.. उसका जवाब मनु ही था.. और ये बात दिशा अब तक जान ही नही पाई थी...," तू मानेगी थोड़ा.. तुझे जो करना है बस करना ही है.. मेरा दिमाग़ तो मत खा तू!" दिशा ने बनावटी गुस्सा'सा दिखाते हुए उसको मस्ती करने की हरी झंडी दे दी...

फिर क्या था... आँगन में सलवार कमीज़ पहने हाथों को फैलाए खड़ी वाणी का शबाब सारी हदें तोड़कर मनु तो मनु, अमित को भी मदहोश करने लगा. स्वर्ग से उतरी अप्सरा के समान बूँदों में दमक रही वाणी के अंगों की अर्धपारदर्शी झलक ने दोनो को बीन्ध सा दिया.. प्रशन्न मुद्रा में अपना चेहरा उपर किए खड़ी वाणी मानो भगवान को उसके दिल की आवाज़ सुन'ने के लिए धन्यवाद दे रही थी.. प्रण वेला का इंतज़ार और ना हो पाने की तड़प उसकी उच्छल कूद के साथ ही लरज रहे अंगगों से सॉफ झलक रही थी.. वाणी के यौवन फलों का उफान बारिश में तार हो चुके कपड़ों के उपर से ही मनु को आमंत्रित कर रहा था.. आकर उस'से लिपट जाने के लिए.. उसकी मादक गंध को करीब से; बहुत करीब से महसूस करने के लिए.. मनु की नज़र उसके चेहरे पर पड़ी बूँद पर एक पल को ठहरती और फिर उस बूँद का पिच्छा करती हुई वाणी के अंगों की गहराइयों में जाकर खो जाती.. आज कहाँ कहाँ मनु की नज़र कल्पना शक्ति से कहाँ कहाँ नही गयी.. मनु की आँखों के सामने वाणी के निर्वस्त्रा शरीर का मनमोहक नज़ारा तेर गया.. वाणी के अंग अंग को देखने का सौभाग्या नियती ने ही उसे दिया था.. और आज बारिश में खड़ी मोर की तरह नाच रही वाणी को देखने का सौभाग्य भी नियती ने ही उसको दिया है.. अपने अयेगन को काबू में रखने की चेस्टा में मनु ने अपनी टाँग के उपर टाँग चढ़ा ली.. पर चाह कर भी वो एक पल के लिए भी अपनी नज़रें वाणी से ना हटा पाया...

"दिशा बड़ी देर से मनु की मानो स्थिति समझने की कोशिश में लगी हुई थी.. दरअसल अपनी छुट'की को इश्स तरह किसी लड़के द्वारा यूँ आँखें फाड़ कर देखा जाना दिशा से गवारा नही हो रहा था.. कमरे में चुप्पी च्छाई हुई थी.. अमित ने शर्माकर अपनी नज़रें झुका ली थी पर जैसे मनु तो वाणी के सम्मोहन में इश्स कदर डूब गया था की पलकें झपकना ही भूल गया..

सहसा दिशा का ध्यान रह रह कर तिर्छि निगाहों से मनु की ओर झाँक रही वाणी की ओर गया.. ऐसा करते हुए दिशा को कतई विस्वास नही हुआ की वाणी वही है जिसको वो अभी तक छुटकी ही कह कर बुलाती है.. बल्कि वाणी के रूप में उसको एक ऐसी अद्वितीया सुंदरी दिखाई दी जो सत्रह बसंत पूरे करने के बाद अपने साजन को रिझाने के लिए मदहोश कर देने वाली अदाओं से अपने प्रेमपाश में बाँधने की सफल कोशिश कर रही है..

"ओह माइ गॉड.. मैं अभी तक नही समझी थी..." वाणी को एक नारी की द्रस्टी से देखते ही सारा माजरा दिशा की समझ में आ गया.. दिन में हुई एक एक गड़बड़ी का कारण समझने में उसको किंचित भी देरी ना हुई...

दिशा के मुँह से निकली बात सबके कानो में पड़ी," तीनो खास तौर पर वाणी और मनु बुरी तरह सकपका गये..

"क्क्या हुआ दीदी!" मनु ने स्वपनलोक से वापस आते हुए दिशा से सवाल किया..

वाणी भी थोड़ी सकुचकर घर की दहलीज पर आकर खड़ी हो गयी..

"आआ.. कुच्छ नही! मैं चाय बनाकर लाती हूँ.. और देवी जी! तुम्हारा स्नान पूरा हो गया होतो अंदर आकर कपड़े बदल लो.. ठंड लग जाएगी.. फिर कौन साफ करेगा तुम्हारा नाक!" दिशा ने हंसते हुए कहा और किचन में चली गयी...

"दीदी..." इठलाती हुई वाणी उसके पिछे ही भाग ली...

बाहर बैठे मनु और अमित ने एक दूसरे की आँखों में देखा और अमित बोल पड़ा..," मैने कुच्छ नही देखा भाई.... पर एक बात सच है भाई.. अगर ये तुझसे प्यार करती है तो तू धन्य हो गया.. जिंदगी सफल हो गयी तरी तो.. लाइफ बन गयी यार!"

"चुप कर ना यार! तू तो बिकुल भी शरमाता नही है... " मनु ने उसको मंद बोलने का इशारा करते हुए कहा..

"अरे.. शरमायें मेरे दुश्मन! जब भाभी जी इतनी बिंदास हैं तो हमें काहे का डर!"

"अमित के मुँह से वाणी के लिए भाभी जी शब्द मनु को इतना अच्च्छा लगा की अगर 'लड़का' नहींहोता तो उसके होंठ ही चूम लेता.... लेकिन वो उस'से हाथ मिलकर ही रह गया..

उधर किचन में दिशा ने वाणी को टटोलना शुरू किया..," वाणी तू कुच्छ बता रही थी..."

"क्या दीदी?" शरारत पूर्ण ढंग से वाणी ने दिशा के शरीर से चिपकते हुए कहा...

"वही कौन है वो.... जिसका सूनापन मैं छुट्टिया शुरू होने के समय से ही तुम्हारी आँखों में महसूस कर रही हूँ...

"क्क्क.. कोई भी तो नही दीदी! वैसे ही.. बस.. आपको यूँही लग रहा होगा.. (फिर आँखें फाड़ कर)... देखो ना.. कहाँ है सूनापन!" वाणी ने बात को टालने की कोशिश करते हुए कहा...

"वही तो मैं भी ढूँढ रही हूँ.. आज जाने कहाँ गायब हो गया वो... ऐसा लगता है तुम्हारे मंन की कोई बहुत बड़ी मुराद पूरी हो गयी हो.."

"चाय बन गयी दीदी..लाओ में दे आती हूँ..!" वाणी ने बात को टाल ने की कोशिश करते हुए कहाँ...

"हां हां.. दिन में भी तुम दो बार चाय पीला चुकी हो बेचारों को.. तुम जल्दी से कपड़े बदल लो..."

जैसे ही वाणी बाहर निकलने लगी.. दिशा ने उसको टोका..," च्छुटकी!"

"हां दीदी?" वाणी ने पलट'ते हुए पूचछा..

"अगर वो लड़का मनु है.. तो मैं बहुत खुश हूँ.. "

ये सुनते ही वाणी हक्की बक्की रह गयी.. उसके दोनो हाथ उसके चेहरे पर झलक आई शरम की लाली को च्छुपाने के लिए अपने आप उपर आ गये! एक पल को उसका दिल किया की ज़मीन पर बैठकर, मनु के आने से खिल चुके अपने अंग अंग को दीदी से छुपा ले.. फिर उसको दीदी के सीने में ही खुद को छिपाना उचित लगा.. 2 कदम आगे बढ़कर वो दिशा से लिपट गयी," आइ लव यू दीदी!"

"बस बस.. अब दीदी को मस्का मत लगा.. अब तो तू किसी और से ही प्यार करती है.. जा जाकर अपने मनपसंद कपड़े पहन ले! सारी गीली कर दी मैं भी..."

वाणी दिशा के गालों का एक जोरदार चुंबन लेकर बाथरूम में भाग गयी....

दिशा ट्रे लेकर बाहर निकली ही थी की पड़ोस में रहने वाले एक ताउ ने आवाज़ लगाई..," दिशा.. ए दिशा!"

अंदर दहलीज पर खड़ी होकर दिशा ने जवाब दिया," हां मामा जी!"

"बेटी.. वो दौलटराम के यहाँ से तुम्हारी मामी का फोने आया था.. वो बारिश की वजह से उनके घर में रुके हुए हैं.. बारिश बंद होने पर ही आएँगे.. तुम खाना वाना खा लेना टाइम से... अगर बारिश ना रुकी तो वो कल सुबह ही आएँगे.."

"अच्च्छा मामा जी...!" दौलत राम का घर खेतों में ही था..

"कोई दिक्कत हो तो आवाज़ लगा लेना बेटी..." कहकर वो चला गया....

बात सुनकर मनु का दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा.. आख़िर ये हो क्या रहा है आज.... हे राम!

दिशा के सामने बड़ी विकट समस्या आन खड़ी हुई.. मामा मामी आ गये तो ठीक है पर अगर.....

इनको रात को सुलाएँगे कहाँ.. दो जवान लड़कों को.. अपने साथ घर में??? ऐसा नही था की दिशा को किसी तरह का उनसे डर था.. पर समाज???? कल को अगर गाओं वालों को ये पता चलेगा की रात को दो जवान लड़के अकेली लड़कियों के साथ सोए हैं तो.. ना जी ना! उपर भी तो शास्त्री जी रहते हैं.. उनसे पूचछा जा सकता है.. हां! यही उचित है... सोचती हुई दिशा अंदर वाले कमरे में गयी.. जहाँ दिशा कपड़े बदल रही थी.. दिशा ने धीरे से वाणी को कहा," वो.. सर मान जाएँगे क्या.. इनको सुलाने के लिए.. अपने साथ.."

सुनकर वाणी का मूड ऑफ हो गया.. वो तो सोच रही थी की रात भर अपने मनु को निहरेगी जाग कर," पता नही दीदी.. पर क्या इनको अच्च्छा लगेगा.. ऐसे!"

"अच्च्छा तो मुझे भी नही लग रहा.. पर क्या करूँ.. मामा मामी को ये सब अच्च्छा नही लगेगा की वो रात भर हमारे साथ रहें.. अकेले में!"

"पर दीदी.. आपकी तो शादी हो गयी है ना.. आपको कोई क्या कहेगा? और मैं तो आपके साथ हूँ ना!" वाणी ने मासूमियत भरा तर्क दिया...

"शादी हो गयी है मतलब..?" दिशा उसका भाव समझ नही पाई...

"मतलब क्या? ... वही" कहकर वाणी शर्मा गयी!

"तू कब तक बच्चों जैसी बातें करती रहेगी.. तुझे क्या लगता है.. शादी हो गयी तो किसी के साथ भी रहने का पर्मिट मिल जाता है क्या?" दिशा ने सवाल के बदले सवाल ही किया...

"मैं वो थोड़े ही कह रही हूँ.. मैं तो.... जब आपकी शादी ही हो चुकी है तो आपके बारे में ये कौन सोचेगा... उल्टा सीधा!"

"बस तू अब फालतू मत बोल... तू क्या समझती है, शादी के बाद क्या औरतें ग़लत नही होती... बस तू मेरा दिमाग़ मत खा और कपड़े बाद में बदलना.. पहले सर से पूच्छ कर आ...."

कुच्छ देर बाद वाणी नीचे आई," दीदी! उपर तो ताला लगा हुआ है! सर शायद दिन में कहीं गये होंगे और बारिश की वजह से बाहर ही रुक गये होंगे..."

दिशा सोच में पड़ गयी.. "अब क्या करें?.. चल कोई बात नही.. तू कपड़े बदल ले.. मैं सोचती हूँ तब तक कुच्छ!"

rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:21

गर्ल्स स्कूल पार्ट --31

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा गर्ल्स स्कूल पार्ट 31 लेकर आपके लिए हाजिर हूँ दोस्तो जैसा कि आप जानते है ये कहानी कुछ ज़्यादा ही लंबी हो गयी है इसलिए प्रत्येक किरदार के साथ कहानी को लेकर चलना पड़ता है जैसे दिशा , गौरी और वाणी को हम नही भूल सकते इसलिए इस पार्ट मैं इन्ही तीनो की कहानी है दोस्तो जिन दोस्तो ने इस कहानी के इस पार्ट को पहली बार पढ़ा है उनकी समझ मैं ये कहानी नही आएगी इसलिए आप इस कहानी को पहले पार्ट से पढ़े

तब आप इस कहानी का पूरा मज़ा उठा पाएँगे आप पूरी कहानी मेरे ब्लॉग -कामुक-कहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर पढ़ सकते है अगर आपको लिंक मिलने मैं कोई समस्या हो तो आप बेहिचक मुझे मेल कर सकते हैं अब आप कहानी पढ़ें

काफ़ी देर तक सोच विचार करने के बाद दिशा को एक बात सूझी.. क्यूँ ना दोनो बहने चल कर प्रिन्सिपल मेडम के घर सो जायें.. दोनो को खाना खिला कर सुलाने के बाद चलने में क्या हर्ज़ है.. सुबह सुबह आ जाएँगे वापस..

दिशा आकर चुप चाप बैठे मनु और अमित के पास बैठ गयी," तुम दोनो चुप कैसे हो गये? मैं खाना बनती हूँ.. तब तक तुम टीवी देख लो.." दिशा के चेहरे पर चिंता की लकीरें सॉफ दिखाई देने लगी थी...

"नही.. कुच्छ नही दीदी! वो... हम सोच रहे थे की हमें चलना चाहिए.. सारा आधे घंटे का तो रास्ता है.. पहुँच जाएँगे आराम से!" मनु ने उठ'ते हुए कहा..

मनु की बात सुनकर दिशा शर्मिंदा सी हो गयी.. उसको लगा उन्न दोनो ने उनकी बातें सुन ली हैं," अरे नही नही... अब तो देर भी काफ़ी हो चुकी है.. फिर यहाँ रुकने में क्या बुराई है.. तुम आराम से टीवी देखो.. मैं खाना बना लेती हूँ...!" कह कर दिशा उठी ही थी की वाणी ने एक नये अवतार में कमरे के अंदर प्रवेश किया...

निसचीत तौर पर वाणी का वो नया अवतार ही था.. क्रीम कलर का मखमली लोवर और खुली सी उसी कपड़े की बनी टी-शर्ट पहन कर वो बाहर निकली तो मनु की साँस बीच में ही अटक गयी.. पल भर के लिए उपर से नीचे तक वाणी का कातिलाना अंदाज देखकर ही मनु के माथे पर पसीना छलक आया.. वह वापस वहीं का वहीं बैठ गया और अपने संवेगो को काबू करने की कोशिश करने लगा.. लोवर घुटनो तक उसकी मांसल चिकनी जांघों से चिपका हुआ था.. वाणी की जांघें केले का चिकना तना मालूम हो रही थी.. टी-शर्ट छ्होटी होने के कारण वाणी के पुस्त क़ातिल नितंबों को पूरा ढक नही पा रही थी, जिस'से उनकी मोटाई के बीचों बीच अनंत खाई स्पस्ट द्रिस्तिगोचर हो रही थी.. बिना बाजू की टी-शर्ट के नीचे शायद वाणी ने कुच्छ भी नही पहना हुआ था.. संतरे के आकर में सीधे तने हुए दोनो फलों के बीचों बीच महसूस हो रहे पैनी नोक वाले दाने इश्स बात का ज्वलंत सबूत थे... वाणी प्रणय की देवी बनकर प्रकट हुई थी.... सच में.. आज

कयामत आने से कोई रोक नही सकता था....

मनु को अपनी और इश्स तरह घूरता देखकर वाणी पानी पानी हो गयी और अंदर टीवी चलकर सोफे पर बैठ गयी...

"तुम दोनो भी अंदर जाकर टी.वी. देख लो.. बस में अभी खाना बना देती हूँ..." कहकर दिशा किचन में चली गयी..

"मनु!" दिशा ने अंदर जा रहे मनु को किचन से आवाज़ लगाई तो मनु को लगा उसका चोरी चोरी लार टपकाना पकड़ा गया.. थूक अंदर गटक'ते हुए मनु ने वापस मूड कर कहा," ज्जई.... दीदी!"

"एक बार फोन देना!"

"ओह्ह्ह.. ये लो!" मनु ने राहत की साँस ली और फोन दिशा को पकड़ा कर अंदर चला गया..

दिशा ने गौरी के पास फोन मिलाया..

उधर से मीठी सी आवाज़ आई.. यक़ीनन गौरी ही थी..

"गौरी.. मैं बोल रही हूँ.. दिशा!"

"हां.. दिशा.. ये आज नये नये नंबर. से फोन कैसे मिला रही हो.. जीजा जी आ गये हैं क्या?"

"नही यार.. दरअसल वो वाणी की सहेली के भैया बारिश की वजह से वापस नही जा पाए.. उनके ही फोन से फोन कर रही हूँ..."

"अच्च्छा.. और सुना.. केयी दीनो से तू आई नही हमारे घर..?"

"इन्न बातों को छ्चोड़ यार.. ये बता आज हमारे घर आ सकती है क्या?" दिशा ने मतलब की बात पर आते हुए कहा..

"उम्म्म.. आज? ..... क्या हुआ...?"

"कुच्छ नही यार.. वो मैने बताया ना.. 2 लड़के आए हुए हैं और मामा मामी शायद आज ना आ पायें... तो कुच्छ अजीब सा लग रहा है.. हम दोनो बहनो को.. सोचा 2 से भले तीन!"

"कौन? वही जो सुबह बाइक पर आए थे...? गौरी के मंन में उस नौजवान की तस्वीर उभर आई जो बेबाकी से उस'से बात कर रहा था....

"तू इन्न बातों को छ्चोड़ यार.. बोल आ सकती है या नही?" दिशा को खाना भी बनाना था...

"हुम्म आ सकती हूँ.. अगर तू मुझे लेने आ जाए तो.. बारिश हो रही है.. और अंधेरा भी हो गया है.. ऐसे में अकेली आने में डर लगेगा..!"

"पर.. मैं भी अकेली कैसे आउन्गि..?..... चल

ठीक है.. मैं आती हूँ.. उनमें से किसी एक को लेकर.."

"ओके! मैं तुम्हे तैयार मिलूँगी... पर मम्मी को मत बताना तुम दोनो अकेली हो..."

"ठीक है.. मगर क्यूँ...?"

"तू सब समझती है यार.. मम्मी क्या सोचेगी?"

"चल ठीक है.. मैं आ रही हूँ!" कहकर दिशा ने फोन काट दिया...

अंदर आकर दिशा ने मनु से कहा," मनु! एक बार तुम्हे मेरे साथ चलना पड़ेगा.. गौरी के घर..."

"गौरी का नाम सुन'ते ही अमित बिना कोई पल गँवाए खड़ा हो गया," मैं हूँ ना दीदी.. मैं चलता हूँ!"

दिशा उसकी बात सुनकर हंस पड़ी," ठीक है.. तुम चलो!" और एक छतरी उठा कर दोनो बाहर निकल गये...

कुच्छ पलों तक कमरे में टी.वी. की आवाज़ गूँजती रही.. अचानक वाणी ने टी.वी. मूट कर दिया..," इतना क्यूँ भाव खा रहे हो..? बोल नही सकते...

मनु का ध्यान तो पहले ही वाणी पर टीका हुआ था.. गला सॉफ करके बोला," क्या नही बोल सकता.. क्या बोलूं?

"क्या बोलू का क्या मतलब... बस बोलो.. कुच्छ भी!" वाणी ने उसकी नज़रों को खुद में भटक'ते हुए देखा तो इतराते हुए उसके स्वर में नारिसूलभ पैनापन आ गया..

"कुच्छ भी क्या बोलूं.. मुझे बोलना ही नही आता." मनु ने सच ही कहा था.. बोलना आता होता तो कब का बोल ही ना देता!

वाणी बात करते हुए अपने लंबे बालों को पिछे बाँधने लगी.. ऐसा करने से उसके उभारों में आगे की और कामुक उभर आ गया.. वाणी जानती थी.. मनु की नज़र कहाँ है.. आख़िरकार पहल वाणी को ही करनी पड़ी," मैने किचन से तुम दोनो की बातें सुनी थी..."

"का...कैसी बातें?"

"वही जो अमित कह रहा था.. की अगर तुझमें हिम्मत नही है तो मैं जाकर बोल देता हूँ वाणी को!"

मनु बिना बोले ये अंदाज़ा लगाने की कोशिश करता रहा की वाणी ने सिर्फ़ इतना ही सुना है या और भी कुच्छ...

मनु को चुप बैठे देख वाणी को ही एक बार फिर बोलना पड़ा," क्या तुम'मे सच में ही हिम्मत नही है..?"

"किस बात की हिम्मत..?"

"मुझसे बोलने की... और क्या?"

"क्या बोलने की..!" मनु के दिल में आ रहा था की जैसे अभी बोल दे.. होंठो से... होंठो को ही.. कानो को नही!

खीज उठी वाणी ने सोफे पर रखा तकिया उठाया और मनु की तरफ फैंक दिया.. मनु ने तकिया लपक लिया....

"बोल दो ना प्लीज़..." वाणी सामने से उठकर उसके साथ वाले सोफे पर जा बैठी..

" तुम बहुत प्यारी हो वाणी... तुम्हारे जैसी मैने आज तक सपने में भी नही देखी!" मनु ने उसका हाथ अपने हाथ में लेने की कोशिश की तो वाणी शर्मकार वहाँ से उठ गयी.. और वापस पहले वाली जगह पर जाकर अपनी आँखें बंद कर ली...

"अब बोल रहा हूँ तो कोई सुन नही रहा.." कितनी हिम्मत करके मनु ने अपने दिल के अरमानों को ज़ुबान दी थी...

"फिर बोलते रहना था ना.. तुम तो मुझे छू रहे थे.." वाणी के शब्दों में हया का मिश्रण था..

"तुम्हे मेरा छूना बुरा लगा वाणी!" मनु उठकर वाणी के पास घुटने टेक कर बैठ गया.. और फिर से उसका हाथ पकड़ लिया..

वाणी की आँखें बंद हो गयी.. उसके शरीर में मीठी सी हुलचल सी हुई.. उसके अरमानों ने अंगड़ाई सी ली..," नही.. मुझे डर लग रहा है.." वाणी का शरीर भारी सा होकर उसके काबू से बाहर होता जा रहा था.. लग रहा था.. जैसे बदन अभी टूट कर मनु के आगोश में जा गिरेगा!

"डर???? ... मुझसे..." मनु उसके हाथ को अपने हाथ से सहलाने लगा..

"नही.. खुद से.. कहीं बहक ना जाऊं.." वाणी ने अपना शरीर ढीला छ्चोड़ कर नियती के हवाले कर दिया था... अपने मनु के हवाले!

"मैने सपने मैं भी नही सोचा था...." मनु की बात अधूरी ही रह गयी.. बाहर दरवाजा खुलने की आवाज़ के साथ ही वाणी ने अपना हाथ वापस खींच लिया और मनु संभालने की कोशिश करता हुआ वापस अपने स्थान पर जा बैठा.........

तीनो जब अंदर आए तो गौरी का चेहरा तमतमाया हुआ था.. हमेशा रहने वाली मधुर मुस्कान उसके चेहरे से गायब थी.. वो आई और दिशा के साथ सीधे किचन में चली गयी.

"क्या हुआ गौरी? तुम्हारा मूड अचानक खराब क्यूँ हो गया?" दिशा ने चुप चाप आकर आलू छील'ने में लग गयी गौरी की और हैरानी से देखती हुई बोली..

"कुच्छ नही हुआ.." गौरी रोनी सूरत बना कर काम में लगी रही...

"कुच्छ तो ज़रूर हुआ है.. घर से चली तब तो तू बहुत खुश थी.. अचानक तेरे बारह कैसे बज गये.." दिशा ने उसका चाकू वाला हाथ पकड़ लिया," यहाँ आकर खुश नही है क्या?"

"ऐसा कुच्छ नही है दिशा.. बस यूँ ही.. कुच्छ याद आ गया था!.. मैं ठीक हूँ!" गौरी ने अपने आपको सामान्य बना'ने की कोशिश करते हुए कहा...

तभी वाणी वहाँ आ धमकी.. उसके चेहरे से बेकरारी और प्यार की खुमारी पहचान'ना मुश्किल नही था," मैं भी हेल्प करती हूँ.. मनु को भूख लगी है.. जल्दी खाना तैयार करते हैं..."

"अच्च्छाा.. मनु को भूख लगी है.. बाकी किसी को नही!" दिशा ने चटकारे लेते हुए कहा...

वाणी किचन में बैठ कर आता गूँथ रही दिशा के पीछे से उसके गले में बाहें डाल कर लगभग उस पर बैठ ही गयी," नही दीदी.. उसने बोला है ऐसा.. की उसको भूख लगी है.."

"ठीक है ठीक है.. तू ऐसे मत लटका कर.. पता है तू कितनी भारी होती जा रही है.." दिशा का इशारा उसके वजन की और नही.. बल्कि आकर में बढ़ते जा रहे 'संतरों' की और था..

"उम्म्म 46 किलो की ही तो हूँ.." कहते हुए वाणी ने दिशा के उपर अपना वजन और बढ़ा दिया...

"ये अमित करता क्या है?" चुपचाप बैठी गौरी आख़िरकार अमित के प्रति अपनी उत्सुकता दर्शा ही बैठी..

"मैं पूच्छ कर आती हूँ..." कहकर वाणी अंदर भाग गयी...," अमित.. आप करते क्या हो.. दीदी पूच्छ रही हैं..."

"कुच्छ नही करता.. बस ऐश करता हूँ.." अमित ने शरारती मुस्कान फैंकते हुए कहा...

"अरे.. खुशख़बरी देना तो में भूल ही गया था.. हम दोनो का आइआइटी में सेलेक्षन हो गया है.. पिच्छले महीने ही रिज़ल्ट आ गया था.." मनु को अचानक याद आया...

"ये कोई खुशख़बरी हुई.. आइटीआइ तो हमारे गाओं का कल्लू भी करता है.." वाणी ने

जीभ निकाल कर मनु को चिड़ाते हुए कहा....

"पागल वो आइटीआइ है.. मैं आइआइटी की बात कर रहा हूँ.. आइआइटी की.. समझी.."

"सब पता है जी.. ज़्यादा भाव मत खाओ.. मेरा भी सेलेक्षन हो जाएगा आइआइटी में.. एक बार 12थ हो जाने दो.. और तुमसे अच्च्छा रॅंक भी आएगा.." कहकर वाणी वापस किचन में भाग गयी...

"यार ये गौरी तो बहुत गरम माल है.. दिल कर रहा है..आज रात में इसका रेप कर दूं?" अमित ने मनु के कान में फुसफुसाया..

"तुझे.. हर समय यही बातें सूझती हैं क्या?" मनु ने उसको मज़ाक में झिड़का.

"हां भाई.. हम तो ऐसी ही बातें सोच ते हैं.. हम ऐसे आशिक़ नही हैं जो अपने प्यार को सीने में च्छुपाए तड़प्ते रहें.. और मौका मिलने पर भी गँवा

दें.. ये 21वी सदी है दोस्त.. गन्ना उखाड़ो और खेत से बाहर.. समझा.. खैर मेरी छ्चोड़.. अपनी सुना.. तुझे अकेला छ्चोड़ कर गया था.. कुच्छ शुरू किया या नही.." अमित ने मनु को मॉडर्न प्यार का पुराण पढ़ाते हुए पूचछा...

"मैं तेरे जैसा बेशर्म नही हूँ.. प्यार की कदर करना जानता हूँ..." मनु अब

भी अपने विचारों पर कायम था..

" करता रह भाई.. और तब तक करते रहना जब तक वो तुझसे उम्मीद छ्चोड़ कर किसी दूसरे को ना पसंद करने लगे... फिर हिलाना अपना घंटा" दरअसल अमित उसको उकसाना चाह रहा था... अपने जिगरी दोस्त का अंदर ही अंदर कुढना उस'से देखा नही जा रहा था..

" देखते हैं.. अंजाम-ए-इश्क़ क्या होता है.." और मनु मुस्कुराता हुआ आँखें बंद करके अकेले में वाणी के साथ बिताए सुखद पलों को याद करने लगा..

"तुझे पता है मैने गौरी को क्या किया..?" अमित ने मनु को हिलाया..

"क्या किया.. कब?" मनु ने आँखें खोलते हुए उत्सुकता से पूचछा..

"जब हम वापस आ रहे थे तो उसने अंधेरे में मेरे पेट में घूसा मारा

था.. मैने उसकी वो दबा दी..." मनु ने मुस्कुराते हुए कहा...," सच में यार ऐसा लगा मानो पिघल ही जाउन्गा.. बहुत गरम चीज़ है यार.."

" 'वो'? .... क्या मतलब.." मनु ने चौकते हुए पूचछा..

"अरे अब हिन्दी में बुलवाएगा क्या?.. 'वो' मतलब उसकी गा....."

"बस बस... तू तो बहुत ही जालिम चीज़ है यार..." टीवी का वॉल्यूम बढ़ाते हुए मनु ने चेहरा उसकी और घुमा लिया...," पर उसने पहले घूँसा क्यूँ मारा..."

"मैने हौले से उसके कान में कह दिया था कुच्छ..." मनु ने कुच्छ को रहस्या ही रखा..

"कुच्छ क्या.. पूरी बता ना!" मनु उत्तेजित सा होने लगा था.. जान ना पहचान.. पहली ही मुलाकात में गान्ड पकड़ ली...

अमित ने गर्व से अपने कॉलर उपर करते हुए कहा.. "हम तो बंदे ही ऐसे हैं भाई.. फ़ैसला ऑन दा स्पॉट..."

"तू बता ना.. कहा क्या था तूने.." मनु जान'ने के लिए तड़प रहा था..

"बस यही की तुमसे ज़्यादा सेक्सी लड़की मैने आज तक नही देखी.." अमित ने बता ही दिया..

"दिशा ने नही सुना...?" मनु उसको आँखें फाड़ कर देख रहा था..

"नही.. दिशा अलग च्छतरी लेकर चल रही थी.. मैं जान बूझ कर उसकी च्छतरी में आया था... धीरे से कहा था.. उसके कान में"

"साले.. पर तेरी इतनी हिम्मत कैसे हो गयी..?" मनु हैरत में था.. अब तक..

"तभी तो कह रहा हूँ.. अपना गुरु बना ले.. सब कुच्छ सीखा दूँगा.. वो मुझे देखकर मुस्कुराइ थी... और बंदे के लिए इतना काफ़ी था.. उसका हाल-ए-दिल जान'ने के लिए.. वो प्यार की मारी हुई लड़की है जानी.. और हमसे अच्च्छा प्यार आख़िर कौन दे सकता है.. बहुत गरम छ्होरी है यार.. जान भी दे दूँगा.. 'उसकी' लेने के लिए.....

दोनो के बीच काम शस्त्रा पर जिरह जारी थी की दिशा, वाणी, और गौरी खाना लेकर अंदर आ गये...," चलो.. टेबल आगे खेंच लो.. खाना खाते हैं..."

और पाँचों आमने सामने बैठ गये.. वाणी 'अपने' मनु के सामने बैठी थी.. पर गौरी जानबूझ कर वाणी और मनु के बीच अमित के सामने ना बैठकर मनु के पास वाली सीट पर बैठ गयी.. दिशा अमित के सामने थी..

"अब पूच्छ लो दीदी.. इन्न दोनो का आइआइटी में सेलेक्षन हो गया है.." वाणी ने रोटी उठाकर अपनी प्लेट में रखते हुए गौरी से कहा...

"कॉनग्रेटबोथ ऑफ योउ!" दिशा ने दोनो की और मुश्कूराते हुए बधाई दी...

"थॅंक्स.. तुम बधाई नही दोगि गौरी जी!" अमित गौरी के अब तक लाल चेहरे को देखकर मुस्कुराया...

"कॉनग्रेट्स मनु!" गौरी की बधाई मनु तक ही सीमित रही...

"और मुझे...?" अमित ने गौरी की प्लेट से रोटी उठा ली..

एक बार तो गौरी ने अपनी रोटी वापस छ्चीन'ने की कोशिश की पर जब दोनो की आँखें चार हुई तो वो शर्मा गयी...अपने गोरे गालों को पिचकाते हुए दूसरी रोटी उठाते हुए बोली..," भीखरियों को कैसी मुबारकबाद...!"

दिशा ने गौरी की बात पर आसचर्या से उसकी और देखा," तुम्हारा 36 का आँकड़ा कैसे बन गया...?"

"36 का नही.. हमारा 69 का आँकड़ा है..." अमित सच में ही बेबाक और बिंदास था..

गौरी ने किसी अश्लील किताब में '69' पोज़िशन के बारे में पढ़ा था.. बात सुनते ही उसके गाल लाल हो गये.. जांघों के बीच पनिया सी गयी और चेहरे की हालत तो देखते ही बनती थी.. बड़ी मुश्किल से खाने का नीवाला गले के नीचे उतरा..

" '69' का आकड़ा...?" दिशा और वाणी दोनो एक साथ बोल पड़ी..,"वो क्या होता है..?"

"क्कुच्छ नही.. मैं भीखारी हूँ ना... '69' का आकड़ा देने लेने वालों के......"

"खाना खाने दे ना यार.. " मनु को डर था.. अमित का कोई भरोसा नही.. कब क्या बोल दे...!"

"कोई खाने देगा तब ना...." अमित का इशारा गौरी की और था...

"हां हां.. रोटी तो मेरी उठा ही ली..तुम्हे अपने हाथ से खिलवँगी अब..." गौरी तब तक संभाल चुकी थी और फिर से मैदान में थी...

"सच.. मैं धन्य हो जवँगा.. अगर एक बार खाली चखा भी दी तो.." अमित पिछे हटने वालों में से नही था...

दिशा और वाणी दोनो इश्स मीठी झड़प का आनंद ले रहे थे.. वो समझ नही पाई थी की रह रह कर अमित बात को कहाँ लेकर जा रहा है..

"ये ले....!" अमित की हर बात का मतलब समझ रही गौरी के लिए वहाँ बैठना सहन नही हो रहा था... वह उठकर जाने लगी तो वाणी ने उसका हाथ पकड़ लिया..," बैठो ना दीदी.. ऐसे मज़ाक में भी कोई रोता है...!"

दिशा के और कहने पर बड़ी मुश्किल से गौरी वापस वही बैठ गयी...

"अगर तुम्हे मेरी बात से बुरा लगा है तो.... सॉरी" अमित ने उसका हाथ ही तो पकड़ लिया..

गौरी की हालत बिन जल मच्चली की तरह होती जा रही थी.... हाथ छुड़ाने की हल्की सी कोशिश के बाद उसके चेहरे पर प्यारी सी मुस्कान तेर गयी," अच्च्छा बाबा! अब हाथ तो छ्चोड़ दो.. खाना तो खाने दो!"..

"ये लो.. मैने कौनसा जीवन भर के लिए पकड़ा है.." अमित ने उसके हाथ को ज़ोर से दबाया और छ्चोड़ दिया...

अमित की इश्स बात पर सभी ज़ोर ज़ोर से हंस पड़े....

सकपकाई हुई गौरी ने फिर अमित पर ताना मारा," जीवन भर के लिए कोई बेवकूफ़ ही अपना हाथ तुम्हे सौपेगी..." बहस अब गरम होती जा रही थी.. पर अमित एकदम ठंडा था.. कूल मॅन!

" और तुम्हे वो लेवेल अचीव करने के लिए काई जनम लग जाएँगे... इतनी बेवकूफ़ होने तक की कोई तुम्हारा हाथ पकड़ने की सोचे... जीवन भर के लिए...! तुम्हारा तो चेहरा देखते ही मैं समझ गया था... " अमित को पता था.. उसकी आख़िरी लाइन गजब का असर करेगी.. किसी भी लड़की पर..

"क्या समझ गये थे.. मेरा चेहरा देखते ही..." गौरी ने खाना छ्चोड़ कर उस'से पूचछा.. उसके स्वर में नर्मी थी.. इश्स बार.

"कुच्छ नही.. खाना खा लो!" कहते ही अमित अपना खाना ख़तम करके उठ गया.....

"तुम अंदर बेड पर सोना पसंद करोगे या तुम्हारी भी बाहर चारपाई डालूं.. बारिश थम गयी है.. बाहर बहुत अच्छि हवा चल रही है..." दिशा ने बर्तन सॉफ करके अंदर आते ही मनु और अमित से सवाल किया...

"हां.." मनु आगे बोलने ही वाला था की अमित ने उसका हाथ दबा दिया,"हम अंदर ही सो जाएँगे.. मेरी तबीयत कुच्छ ढीली सी है..!"

मनु कुच्छ ना बोला.. उसने सच में ही अमित को अपना लवगुरु मान लिया था...

"जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.. हम लड़कियाँ तो बाहर मज़े से सोएंगी..."दिशा ने अपनी राय जाहिर की..

"हम भी यहीं सो जाते हैं ना दीदी... अभी तो बहुत बातें भी करेंगे.. अमित और गौरी दी की लड़ाई भी देखनी है..!" वाणी की आखरी लाइन से शरारत भले ही झलक रही हो.. पर उसकी आँखों के भाव मनु से वियोग ना सह सकने की तड़प बयान कर रहे थे...

"तुझे पता भी है.. 11:30 हो गये हैं.. सुबह उठ कर ही बातें करना अब.. देख लो गौरी.. कितने मज़े ले रहे हैं लोग.. तुम दोनो की लड़ाई के!"

गौरी भले ही उपर से अमित से चिडने का दिखावा कर रही हो.. पर अमित ने उसके पहले असफल प्यार की याद ताज़ा करा दी थी.. कुच्छ पलों के दरमियाँ ही उसको अमित में अपनापन सा झलकने लगा था.. नौकझौंक भी तो अपनो में ही होती है.. फिर अमित की आँखों में उसको अपने लिए काफ़ी आकर्षण देखा था.. सुंदर सजीला तो वो था ही.. हाज़िर जवाबी भी कमाल की थी.. और बेबाकी के तो क्या कहने.. गौरी उसकी उस बात को कैसे भूल सकती थी जो उसने उसके कानो में कही थी," तुम बड़ी सेक्सी हो..!" और फिर जहाँ पर उसने हाथ मारा था.. उसकी तो जान ही निकल गयी होती.. उस सुखद अनुभूति को याद करके रह रह कर उसकी जांघों के बीच उफान आ रहा था..," पर दिशा.. मुझे लगता है हमें भी अंदर ही सो जाना चाहिए.. रात को बारिश फिर आ सकती है.. बेवजह नींद खराब होगी.."

"ठीक है.. फिर बरामदे में डाल लेते हैं... ठीक है?" दिशा ऊँच नीच को समझती थी..

अब इश्स बात को काटने के लिए गौरी क्या तर्क लाती...," ठीक है.. पर कुच्छ देर तक तो टी.वी. देख ही लेते हैं..."

"जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.. मैं तो सोने जा रही हूँ.. जब नींद आए तब आकर सो जाना.. बिस्तेर लगा देती हूँ" कहकर दिशा बाहर निकल गयी....

मनु और अमित बेड पर जाकर पसार गये.. वाणी की खुशी का कोई ठिकाना नही था.. अब वो कम से कम कुच्छ समय और मनु का प्यारा चेहरा देख सकती है.. वो सामने वाले सोफे पर जाकर बैठ गयी.. टी.वी. देखना तो एक बहाना था.. रह रह कर उनकी नज़रें मिलती और दिल झंझणा उठते.. आँखों ही आँखों में वो बातें भी हो रही थी.. जिस डर में दिशा ने चारपाई बाहर डाली थी!

"अब बताओ.. तुमने ऐसा क्यूँ बोला था!" गौरी ने अमित को फिर ललकारा.. वजह सिर्फ़ एक ही

थी.. उस'से बातें करने में गौरी को मज़ा आ रहा था...

"क्या बोला था?" अमित ने ऐसा नाटक किया मानो वा सब कुच्छ भूल चुका हो..

"यही की तुम्हारा हाथ पकड़ने के लिए मुझ जैसी लड़की को काई जनम लग जाएँगे..!" गौरी की आँखों में एक आग्रह सा था.. की कड़वा जवाब ना दे.. वो इश्स जुंग को ख़तम करके एक नयी शुरुआत करना चाहती थी.

"मैने ऐसा तो नही बोला?" अमित भी और ज़्यादा बात बढ़ाने के मूड में नही था..

"जो कुच्छ भी बोला था.. पर मतलब तो यही था ना?"

मनु और वाणी को उनकी बहस से अब कोई मतलब नही था.. वो तो अब एक दूसरे में ही खोए हुए थे....

"कुच्छ भी कहो.. पर सच वो था जो मैने तुमसे रास्ते में कहा था.. वो भी तुम्हे बुरा लगा...!" अमित ने करवट लेकर उसकी और चेहरा कर लिया...

"गौरी एक पल के लिए शर्मा सी गयी.. अपने गुलाबी होंठों पर जीभ घुमाई और फिर नज़रें मिलते हुए बोली," पर तुमने हाथ क्यूँ मारा.?"

"कहाँ?" अमित शरारती ढंग से मुस्कुराया..

"तुम सब जानते हो?"

"तुमने भी तो घूँसा मारा था!"

"पर मैने तो पेट में मारा था.. हूल्का सा!" गौरी ने उस पल को याद करके अपनी टाँगें भींच ली... जब अमित ने मजबूती से उसके शरीर के सबसे मस्त हिस्से को एक पल के लिए मजबूती से जाकड़ लिया था..

"आगे पीछे में क्या फ़र्क़ है..?"

"अच्च्छा जी.. कुच्छ फ़र्क़ ही नही है..!" गौरी ने उस'से नज़रें मिलाई पर लज्जावाश तुरंत ही नज़रें हटा ली.. उसके शारीरिक हाव भाव से अमित को पता चल चुका था की वो क्या चाहती है...

"बहुत हो गया.. अब दोस्ती कर लेते हैं.." अमित ने अपना हाथ लेटे लेटे ही उसकी ओर फैला दिया..

"दोस्ती का मतलब समझते हो..?" गौरी की बेकरारी बढ़ती जा रही थी..

"हां.. लड़कियों के मामले में.. गन्ना उखाड़ो और खेत से बाहर!"

"मतलब?" गौरी सच में ही इश्स देसी मुहावरे का मतलब समझ नही पाई...

"कुच्छ नही बस ऐसे ही बोल दिया.. जाओ अब सोने दो!" अमित जान'ता था.. अब वो बात को बीच में नही छ्चोड़ेगी...

"सच में नींद आ रही है क्या?" गौरी का अच्च्छा सा नही लगा..," क्या मैं बहुत बोरिंग हूँ?"

"मैने बताया तो था.. तुम कैसी हो?"

"अब आ भी जाओ.. वाणी.. सुबह उठना भी है.." बाहर से दिशा की आवाज़ आई..

गौरी मायूस होकर उठ गयी.. जाने कैसी ऊटपटांग बातें करती रही.. क्यूँ नही कह पाई अपने दिल की बात.. की.. उसको अमित बहुत अच्च्छा लगा...

बाहर निकलते हुए अचानक वह कुच्छ सोच कर वापस मूडी और अपना हाथ बढ़ा दिया..," दोस्ती?"

अमित ने लपक कर उसका हाथ पकड़ लिया..,"पक्की!"

"एक बात कहूँ?.. मुझे वो बात बुरी नही लगी थी.." कहते हुए गौरी की आँखें लज्जावाश अपने आप ही झुक गयी..

"कौनसी बात?" अमित ने अंजान बनते हुए कहा..

"वही.. जो तुमने रास्ते में कही थी.. और तुम भी वैसे ही हो!" कहकर गौरी ने अपना हाथ झटक लिया और बाहर भाग गयी.. शर्माकर!

वाणी ने अपनी आँखें बंद करके सोने की आक्टिंग कर ली.. उसको पता था.. की सोती हुई 'छुटकी' को दीदी कभी तंग नही करेगी.. वरना उसका मनु से दूर होना तय था.. रात भर के लिए....

"वाणी.. जल्दी बाहर आ जाओ.. सोना नही है क्या?" दिशा ने एक बार फिर पुकारा..

"ये तो सोफे पर ही पसारकार सो गयी.." मनु ने अपनी आवाज़ तेज़ रखी ताकि उसकी झूठ पकड़ी ना जाए..

"ये भी ना.." दिशा उठकर अंदर आ गयी," वाणी.. वाणी!.. उठ रही है या पानी डालूं?" दिशा ने वाणी को पकड़ कर हिलाया..

पर वाणी तो प्रेमसागर में डुबकी लगा रही थी.. पानी की कैसी धमकी.. वो हिली तक नही..

"दिशा को जाने क्यूँ अहसास था की ये नौटंकी हो सकती है.. और जब उसने पेट पर पसरे हाथ को उठाकर गुदगुदी की तो सच सामने आ गया.. वाणी से गुदगुदी सहन नही होती थी.. वह खिलखिलकर अपने को हँसने से ना रोक पाई.. फिर आँखें खोल कर मिन्नत सी की..," सोने दो ना दीदी.. प्लीज़.. मैं यहीं सो जवँगी.. सोफे पर ही.."

अगर मनु अकेला होता तो शायद एक पल के लिए वह अपनी जान को उसकी जान के साथ ही छ्चोड़ भी देती.. पर अमित भी तो साथ था..," नही! चलो बाहर.." आँखें दिखाते हुए दिशा ने वाणी को डाँट लगाई..

मायूस वाणी उठी और रुनवासी सी होकर पैर पटकती कमरे से बाहर जाकर चारपाई पर पसर गयी.. जाने क्या अरमान थे जो खाक हो गये...

"लाइट ऑफ कर दूँ...?" दिशा ने मनु की और देखते हुए कहा..

बेचारे मनु की तो बत्ती गुल हो ही चुकी थी.. जवाब अमित ने दिया..," हां कर दो!"

और अंदर की लाइट ऑफ हो गयी.....

करीब आधा घंटा बाद....

वाणी रो धोकर सो चुकी थी.. दिशा भी गहरी नींद में थी.. पर अमित, मनु और गौरी... तीनो की आँखों से नींद गायब थी.. किस्मत से मिले इश्स मौके को कोई गँवाना नही चाहता था..

"तूने अंदर सोने को क्यूँ कहा.. कम से कम बात तो करते ही रहते..!" मनु को अमित पर गुस्सा आ रहा था..

"थोड़ी देर में अपने आप पता चल जाएगा.. जागता रह.. बस एक काम करना.. कोई भी अगर अब अंदर आए तो हम में से एक बाहर चला जाएगा.. बाकी अपनी अपनी किस्मत..!" अमित ने गुरुमन्तरा मनु को दिया..

"कोई आए मतलब..? तुझे कोई भ्रम है क्या प्यारे!" हालाँकि मनु को उसकी ये आस बहुत प्यारी लगी थी..

"भ्रम नही है बेटा.. पूरा यकीन है.. मैने तो गौरी को इशारा भी किया था.. पता नही समझी की नही.. अगर कोई नही भी आया तो मैं पक्का बाहर जाउन्गा.. तू बता देना.. वाणी को अंदर भेजना हो तो..!" अमित की इश्स बात ने मनु को चौकने पर विवश कर दिया...

"मतलब.. तू.. ?"

"हां.. बिल्कुल ठीक समझा... मैं और गौरी.. अकेले..! तू क्या समझता है.. इतनी मेहनत में यूँही बेकार होने दूँगा... कभी नही..

बस एक बात याद रखना.. अगर गौरी यहाँ आ जाए तो नींद की आक्टिंग किए रहना.. और जब में उसको पूरी तरह तैयार कर दूँ तो एकदम से उठकर बाहर चले जाना.. फिर बाहर चाहे अपनी किस्मत पे रोना या वाणी के साथ सोना.." कहकर अमित मुस्कुराया..

"आइ कान'ट बिलीव यार.. वो नही आएगी.. हाँ अगर राज शर्मा ये कहता तो मैं ज़रूर मान लेता" मनु की पॅंट जांघों पर से बुरी तरह टाइट हो गयी थी..

"तो मैं कब शर्त लगा रहा हूँ.. आ गयी तो ठीक वरना मैं बाहर जाकर उसको जगा लूँगा"

इंतज़ार करते करते जाने कब मनु गहरी नींद में खो गया; पता ही ना चला..

अचानक अंधेरे कमरे के बाहर मद्धयम प्रकाश में एक साया सा उभरा

अमित दम साध कर ये अंदाज़ा लगाने में जुट गया की आख़िर किसकी किस्मत चमकी है.....

अचानक बाहर की लाइट ऑफ हो गयी.. और जो कुच्छ थोड़ा बहुत नज़र आ रहा था वो भी बंद हो गया.. घुपप अंधेरा!

अमित दीवार की और लेटा था.. अब किसी को मालूम नही था की जो साया उनको दिखाई दिया था.. उसने कमरे में प्रवेश किया भी या नही.. मनु गहरी नींद में खो चुका था पर अमित को यकीन था की आने वाली गौरी ही है.. और वो पूरी तरह तैयार था...

पैर दबा कर चलने की हुई हुल्की सी आहट से अमित को अहसास हुआ की दोनो में से एक अंदर आ चुकी है..

अचानक अमित के पैरों पर कोमल हाथ के स्पर्श ने उसके खून को एकदम से गरम कर दिया.. एक पल को उसके दिल में ख़याल आया की उठ कर गौरी को लपक ले.. पर वा जल्दबाज़ी नही करना चाहता था.. सो चुपचाप लेटा रहा..

गौरी का हाथ धीरे धीरे बिना ज़्यादा हुलचल किए उपर की और आता जा रहा था और इसके साथ ही अमित के साँसों में से उसके उबाल चुके खून की गर्मी बढ़ती जा रही थी..

अचानक गौरी ने अपना हाथ वापस खींच लिया और खड़ी हो गयी.. फिर धीरे से फुसफुसाई.. "मनु!"

अमित का दिमाग़ ठनका.. तो क्या ये वाणी है??? पर ऐसा कैसे हो सकता है.. दोनो को हमारी पोज़िशन का पता था.. वह बोलने ही वाला था की अचानक वही फुसफुसाहट अमित के लिए उभरी..," अमित!"

अमित फिर भी कुच्छ ना बोला.. क्या पता जो कोई भी है.. पहले यकीन कर लेना चाहती होगी की दूसरा जाग तो नही रहा.. ये सोचकर अमित ने चुप्पी ही साधे रहना ठीक समझा.. या फिर क्या पता अमित के मॅन में पाप आ गया हो.. गौरी जैसी तो कोईमिल भी जाए.. पर वाणी जैसी तो कोई दूसरी हो ही नही सकती.. भले ही एक दिन के लिए ही क्यूँ ना हो.. भगवान जाने! पर अमित ने निस्चय कर लिया की वो अपनी सोने की आक्टिंग जारी रखेगा और एक बार झड़ने के बाद ही कुच्छ सोचेगा....

जब साए को यकीन हो गया की दोनो सो रहे हैं तो अमित को भी यकीन हो गया की वो गौरी ही है.. पर फिर भी उसको ये देखने में मज़ा आ रहा था की गौरी को सेक्स ज्ञान कितना है और वो क्या क्या करती है...

गौरी आकर अमित के पैरों के पास धीरे से बैठ गयी.. फिर से उसने उसी तरह अपने हाथों को पैरों पर उपर की तरफ चलना शुरू कर दिया.. घुटनों के पास अपना हाथ लाकर गौरी ने हुल्के हुल्के अपने हाथों का दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया.. अमित ने अब भी कोई हुलचल नही दिखाई.. हालाँकि उसकी साँसें ना चाहते हुए भी तेज़ होती जा रही थी..

कुच्छ सोच कर गौरी ने अमित के घुटनो से थोड़ी उपर चट'की काट ली.. पर जीन्स पहने होने की वजह से अमित को ज़्यादा दर्द नही हुआ इसीलिए वह सोते रहने का नाटक करने में कामयाब रहा...

गौरी अपना हाथ थोड़ी उपर और ले गयी.. अब उसका हाथ अमित की पॅंट के सख्ती से उभरे हुए हिस्से पर रखा था.. जब उसने उसको हल्क से सहलाना शुरू किया तो अमित को खुद पर काबू रख पाना मुश्किल हो गया.. उसको लगा की या तो अब पॅंट फट जाएगी या फिर उसका लंड टूट जाएगा..

खैर जल्दी ही उसको इश्स असमन्झस से छुटकारा मिल गया... 'चिर्र्ररर' की आवाज़ के साथ थोड़ी थोड़ी करके गौरी ने उसकी जीप खोल दी.. जीप खुलते ही उसका लंड फंफनता हुआ अंडरवेर के कपड़े में लिपटा खुद ही अपना रास्ता बना कर बाहर निकल आया...

गौरी भी इतनी पागल तो नही थी की उसके लंड की बेकरारी और उसकी लगातार तेज़ हो रही साँसों के बाद भी उसको नींद में ही समझे.. लंड को अपने हाथ में दबाए वह बिस्तेर पर अमित की बराबर में सीधी लेट गयी और उसकी मादक साँसों के अपने चेहरे पर इतनी करीब से इनायत बक्शने से अमित का रोम रोम खिल उठा.. अब वह इश्स बात के लिए तड़प रहा था की कब गौरी उसके लंड को उसके अंडरवेर से निजात दिलाकर सीधे अपने कोमल हाथों में उसको पकड़ेगी....

"आइ लव यू अमित!" अमित के कानो में मस्ती भारी फुसफुसाहट हुई.. अब इसमें कोई शक नही था की सोते हुए पर कहर बरपाने वाली और कोई नही.. बुल्की गौरी ही थी.. फिर भी जितना मज़ा अमित को अब आ रहा था.. इतना उसको जाग कर भी नही मिलता.. इसीलिए उसने गौरी की बात का कोई उत्तर नही दिया..

"मुझे पता है.. तुम जाग रहे हो.. प्लीज़ बाहर आ जाओ.. बाथरूम में.." अमित के कान में इतनी धीरे से बोला गया की कहीं मनु ना जाग जाए.. पर अमित को डर थोड़े ही था.. वह सोया पड़ा रहा.. हर लम्हें को अपनी साँसों में समाने की कोशिश करता हुआ..

कोई जवाब ना मिलने पर गौरी ने अपनी जीभ निकाल और अमित के कान के अंदर डाल कर घुमाने लगी.. उफफफफ्फ़.. हालाँकि अमित का ये पहला सेक्स नही था पर उसको लगा की वो इतना हूल्का हो गया है की अभी आसमान में ही उड़ जाएगा.. अमित हद से ज़्यादा बेचैन हो गया.. ये लंड को आज़ाद क्यूँ नही करती.. उसको भी तो खुलकर मज़े लेने का अधिकार है..

आख़िरकार भगवान ने उसकी सुन ली.. या यूँ कहें की गौरी ने... गौरी उठ बैठी और अंडरवेर में से उस बेमिसाल हथियार को बाहर निकालने का रास्ता खोजने लगी.. गौरी की उंगलियों ने इशारा सा दिया और 6" लंड 'फुक्कक' की आवाज़ के साथ अंडरवेर से बाहर.. अंडरवेर के अंदर कितना रह गया ये अंदाज़ा गौरी लगा नही पाई.. उसके लिए इतना काफ़ी भी था..

कोमल उंगलियाँ कुच्छ पलों तक लंड पर लहराती हुई उसकी मोटाई का जायज़ा लेती रही.. अमित पसीने से तरृ हो गया.. उसको अहसास हो गया की दुनिया का सबसे मुस्किल काम उस वक़्त अपने जज्बातों को काबू में रखना है.. गौरी को अहसास था की वो जाग चुका है और वो मूर्ख खुद को धोखे में रखता हुआ निढाल पड़े रहने की कोशिश करता रहा..

लंड के सूपदे पर उंगलियों की हुलचल ने तो उसका दम ही उखाड़ दिया.. लंड गौरी के छ्होटे हाथों में पूरा नही समा रहा था.. पर सारा दोष उसके हाथों के साइज़ को भी नही दे सकते.. वो फूल कर मोटा ही इतना हो गया था...

कुच्छ देर बाद उंगलियाँ नीचे सरक गयी और सूपदे को किसी गीले मुलायम फंदे ने कस लिया.. ओह माइ गॉड! ये तो गौरी के होन्ट थे..

"ऊऊऊऊष्ह!" इश्स हरकत ने अमित का व्रत आख़िरकार तोड़ ही दिया और वो सिसकारी भर बैठा... लगातार धीरे धीरे उपर से आधे तक लंड का रसमयी होंटो ने नाप लेना शुरू किया तो अमित की सिसकारियाँ अविचल शुरू हो गयी...

"ओह.. माइ गॉड.. क्या चीज़ हो तूमम्म.. थॅंक्स जान.. धीरे करो.. मैं मार जवँगा.. सहन नही.." अमित की आवाज़ जब ऊँची होने लगी तो गौरी के दूसरे हाथ ने उसका मुँह बंद कर दिया..

"आवाज़ मत करो जान.. मनु उठ जाएगा...

अमित का दिल किया की मनु को उठाकर बाहर भेज दे और खुलकर अपनी मर्दानगी पर गौरी को नचाए.. पर उसको डर था की कहीं मनु के जाग जाने पर गौरी हिचक कर चली ना जाए या खुलकर साथ ना दे.. उसने कम से कम एक बार तो ऐसे ही जन्नत की सैर करते रहने का मॅन पक्का कर लिया..

गौरी ने अपने रसीले होंठो से अमित के होंठों को क़ैद कर लिया.. उम्म्म्ममम.. इतने नरम होंठ आज तक कभी अमित ने चखे नही थे..

अमित ने गौरी का चेहरा दोनो हाथो में पकड़ा और कम से कम हुलचल करने की कोशिश करता हुआ अपने और गौरी के तूफान को भड़काता रहा..

करीब 5 मिनिट बाद गौरी ने अमित के कानो में फुसफुसाया.. बाहर आ जाओ ना प्लीज़.. बाथरूम में.."

"नही.. यहीं ठीक है जान.. मनु की नींद गहरी है.. नही खुलेगी.. एक बार यहीं कर लो.. मैं इस्सको बीच में छ्चोड़ना नही चाहता.. और अमित ने अपने हाथों में कपड़ों में क़ैद गौरी की गोलाइयों को भर लिया.....

"ओके. बस एक मिनिट.. मैं कपड़े निकाल कर आती हूँ.. तुम भी तब तक.. कहकर गौरी उठी और दबे पाँव कमरे से बाहर निकल गयी...

कुच्छ ही मिनिट बाद जब गौरी वापस आई तो वो चादर में लिपटी हुई थी.. अगर चादर नही भी होती तो कोई फ़र्क़ नही पड़ना था.. क्यूंकी कमरे में घुपप अंधेरा पसरा हुआ था..

तब तक अमित भी अपनी जान के आदेशानुसर बिल्कुल नंगा हो चुका था.. आते ही गौरी खून की प्यासी जोंक की तरह अमित के नंगे बदन से चिपक गयी.... दो जवान जिस्म नंगे टकराए तो जोश का सैलाब सा दोनो में उमड़ पड़ा.. अमित ने पलक झपकते ही गौरी की चूचियों को हाथों में लपकते हुए उन्न पर बने बड़े अनारदानो से रस निकालने की कोशिश करने लगा.. गौरी भी बहक चुकी थी.. अब उस'से एक पल का भी इंतजार नही हो रहा था....

मैं तुम्हे अपने अंदर लेना चाहती हूँ अमित.. प्लीज़!"

अमित तो कब से यही माला रट रहा था..,"उपर आ जाओ!"

"नही.. मनु जाग जाएगा.. बाथरूम में चलो ना प्लीज़....." धीरे से गौरी उसके कान में फुसफुसाई....

"ठीक है.. चलो.. कहकर अमित ने गौरी को छ्चोड़ दिया..

गौरी उठकर धीरे धीरे चलती हुई बाथरूम में चली गयी.. अमित उसके पिछे पिछे....

अमित ने गौरी को अपनी बाहों मैं भर लिया उसने एक हाथ से बाथरूम की लाइट ऑन कर दी जब लाइट की चमक उसकी आंखों पर पड़ी तो उसने अपनी बंद आँखें खोल दी अमित ने देखा वह तो एक सपना था लकिन सपना कितना प्यारा था अब अमित ने फ़िर से अपनी आँखे बंद कर ली और जल्दी ही वह सपने मैं खो गया

rajaarkey
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Re: गर्ल'स स्कूल

Unread post by rajaarkey » 12 Dec 2014 03:22

गर्ल्स स्कूल--32

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा आपके लिए गर्ल्स स्कूल पार्ट 32 लेकर आपके सामने हाजिर हूँ दोस्तो जिन दोस्तो ने इस कहानी के इस पार्ट को पहली बार पढ़ा है उनकी समझ मैं ये कहानी नही आएगी इसलिए आप इस कहानी को पहले पार्ट से पढ़े

तब आप इस कहानी का पूरा मज़ा उठा पाएँगे आप पूरी कहानी मेरे ब्लॉग -कामुक-कहानियाँब्लॉगस्पॉटडॉटकॉम पर पढ़ सकते है अगर आपको लिंक मिलने मैं कोई समस्या हो तो आप बेहिचक मुझे मेल कर सकते हैं अब आप कहानी पढ़ें.दोस्तो जैसा की मैं पहले पार्ट मैं बता चुका हूँ अमित गोरी को सपने मैं चोदने के लिए बाथरूम मैं ले जाता है ओर जैसे लाइट जलता है उसकी नींद खुल जाती है अब आगे की कहानी

रात के करीब 11:30 बज चुके थे.. आसमान में फैली सावनी घटायें अपनी ज़िद छ्चोड़ने को कतयि तैयार नही दिखाई दे रही थी.. ऐसे में बूँदों का च्चामच्छां संगीत तड़पति जवान धड़कानों को कैसे ना भड़काने पर मजबूर करता.. वाणी के सपने भी अब मनु-मिलाप से ही जुड़े हुए थे.. सो रही वाणी को अहसास हुआ जैसे किसी ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा हो.. मनु के अलावा और हो ही कौन सकता था.. वाणी अपने में ही सिमट गयी.. मनु का हाथ उसके सिर से फिसल कर उसके माथे पर आया और उसने वाणी की शरमाई कुम्हलाई आँखों को अपने हाथ से ढक दिया.. बंद आँखों में हज़ारों सपने जीवंत हो उठे.. होंठों पर मुस्कान तेर उठी.. धड़कने तेज होना शुरू हो गयी..

अचानक मनु झुका और वाणी के सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियों जैसे होंठों की नज़ाकत को अपने तड़प रहे होंठों से इज़्ज़त बक्श दी.. होंठों से होंठों का मिलन इतनी सुखद अनुभूति देने वाला था की वाणी के हाथ अपने आप ही उपर उठ कर मनु के सिर को बलों से पकड़ कर अपनी सहमति और समर्पण प्रकट करने विवश हो गये.. हाथ कुच्छ ना आने पर वाणी बेचैन हो गयी और हड़बड़कर जाग गयी.. क्या ये सिर्फ़ सपना था.. नही.. कैसे हो सकता है.. अगर ऐसा था तो फिर कैसे उसके होंठों में अब तक चुंबन की मिठास कायम थी.. उसकी मांसल चूचियों में कसाव का कारण क्या था..

वाणी ने अपनी आँखें खोली और अपने दाई तरफ चारपाइयों पर निसचिंत होकर सो रही दिशा और गौरी को देखा.. दबे पाँव उठी और बिना चप्पल पहने ही अंदर कमरे के दरवाजे के पास जाकर खड़ी हो गयी.... अंधेरे के कारण कुच्छ भी दिखाई ना दिया..

दरवाजे पर उभर आए साए को देख कर अमित की बाँछे खिल गयी.. उसने अपनी आँखें एक पल को भी झपकाई नही थी.. दिल-ए-गुलजार गौरी के आने की उम्मीद में...

वाणी को काफ़ी देर तक वहीं खड़ी देख कर अमित उसको गौरी समझ कर खुद को रोक नही पाया," आ जाओ ना.. जाने मॅन.. और कितना तदपाओगि.."

बात धीरे से ही कही थी.. मगर वाणी को हर अक्सर सपस्ट सुनाई दिया.. वो सकपका गयी.. आवाज़ अमित की थी.. मनु तो इतना बेशर्म हो ही नही सकता की अपने दिल के अरमानो को यूँ सीधे शब्दों में डाल कर बोल सके.. तो क्या????

पकड़ी जाने की ज़िल्लत सी महसूस करते हुए वाणी उल्टे पाँव दौड़ गयी और वापस अपनी चारपाई पर जाकर चादर ओढ़ ली...

अमित को पक्का यकीन था की आने वाली और कोई नही बुल्की गौरी ही है जो उसको बताने आई है की वो भी उसके लिए अब तक जाग रही है.. ये निमंत्रण नही तो और क्या है? अमित का रोम रोम खुशी से पागल हो उठा..," मनु.. देखा मैने कहा था ना.. गौरी ज़रूर आएगी...!"

"मनु!.... मनु? अबे ये सोने की रात नही है.. उठ"

मनु आँखें मलते हुए उठ बैठा..," क्या हुआ?"

"गौरी आई थी यार.. वापस भाग गयी.. अगर तू नही होता तो.. आज पक्का.."

"क्या??? सच...!"

"और नही तो क्या.. मैने कोई सपना देखा था.. अरे एक पल के लिए भी पलकें नही झपकाई.. मुझे विस्वास था.. मैने उसकी आँखों में वो सब देख लिया था.. उसकी आँखों में प्यार की तड़प थी.. वासना की महक उसके बदन से आ रही थी.... यार एक काम करेगा..???"

"क्या?" मनु की नींद खुल गयी थी..

"तू बाहर चला जा यार.. मुझे यकीन है.. वो तेरी वजह से ही अंदर नही आई.. वरना.....!!! मुझे यकीन है.. वो फिर आएगी!"

"पर यार रात में अब बाहर कैसे जाऊं... बारिश भी हो रही है.. अभी भी..!"

"प्लीज़ यार.. मान जा.. तू उपर चला जा घंटे भर के लिए.. उपर बरामदा भी है.. " अमित ने मनु की और अनुनय की द्रिस्ति से देखा...

"ठीक है यार.. चला जाता हूँ.. पर मुझे डर लग रहा है.. अगर दिशा दीदी जाग गयी तो मुँह दिखाने के लायक नही

रहूँगा मैं.. देख लेना..!" मनु बेड से नीचे चप्पल ढ़हूँढने लगा..

"नही जागेगी यार.. मैं तेरा अहसान भूल नही पाउन्गा...

मनु एक पल के लिए वाणी की चारपाई के पास रुका.. मुँह पर चादर नही होने के कारण उसको हल्क अंधेरे में पहचान'ने में मनु को कोई दिक्कत ना हुई..

वाणी ने भी मनु को देख लिया था.. अब आँखें बंद करके अपनी सदाबहार मुस्कान को चेहरे पर ले आई थी.. वो समझ रही थी की मनु उसको देखकर ही बाहर आया है.. ऐसे में प्यार की तड़प से भरे अपने दिल को काबू में रख पाना उसके बस का कहाँ था..

मनु ने वाणी का चेहरा गौर से देखा.. सोने का नाटक कर रही वाणी के चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश करता हुआ मनु दोनो पर नज़र डालने के बाद उसके पास बैठने को हुआ.. पर उसको पता था की गौरी जाग रही है.. मन मसोस कर अपनी हसरत को दिल में दबाया और टहलते हुए उपर चला गया..

वाणी सोच में पड़ गयी.. क्या मनु उसको उपर आने का इशारा करके गया है... या फिर यूँ ही... बाथरूम तो बरामदे के साथ ही है.. फिर उपर जाने का मतलब इसके अलावा और क्या हो सकता है... मुझे उपर जाना चाहिए या नही.. कहीं किसी ने देख लिया तो.. कहीं दीदी जाग गयी तो..

वाणी अभी तक इसी उधेड़बुन में थी की अमित को कमरे से बाहर आते देख वह चौंक गयी.. अधखुली आँखों से वो ये देखने में जुट गयी की आख़िर ये सब हो क्या रहा है...?

अमित दरवाजे पर ही खड़े होकर माहौल का जयजा लिया.. अंधेरे में वो समझ नही पा रहा था की कौन कहाँ लेटा है.. कुच्छ पल उसने वहीं खड़े होकर इश्स बात के लिए इंतज़ार किया की गौरी खुद ही उसको देख कर उठ जाए.. पर गौरी कहाँ उठती.. चोरों की तरह वो दो चार कदम चल कर उनके पास आया..

पहली चारपाई पर जब वह झुका.. वाणी ने अपनी आँखें बंद करके साँस रोक ली..

वहाँ वाणी को देखकर वह दूसरी चारपाई की और चला.. गौरी को वहाँ पाकर वह उसके सिर की तरफ ज़मीन पर बैठ गया.. क्या मस्ती से सोने का नाटक कर रही है.. सोचकर अमित ने माथे पर रखे उसके हाथ को हुल्के से पकड़ा और धीरे से आवाज़ निकाली..," गौरी!"

गौरी नींद में हड़बड़कर उठ बैठी.. गनीमत थी की अमित ने उसके मुँह पर हाथ रख लिया वरना वा चिल्ला ही देती शायद..

"आवाज़ मत निकलना.. दीदी जाग जाएँगी.. अंदर आ जाओ.."

"क्यूँ???" गौरी पर अभी भी नींद की खुमारी च्छाई हुई थी.. उसने 'क्यूँ' कहा और फिर से लेट गयी...

वाणी बड़े गौर से अमित को देख रही थी.. अमित उसके कान के पास अपने होंठ लेकर गया और फुसफुसाया..," अंदर आ जाओ.. सब बताता हूँ.."

अबकी बार ही जैसे असलियत में गौरी की नींद खुली.. उसका एक बार फिर चौंक कर बैठना और अजीबो ग़रीब प्रतिक्रिया देना इसी बात की पुस्ती कर रहा था.. हालाँकि वा भी बहुत ही धीरे बोली थी..," क्या है.. मरवाओगे क्या.? भागो यहाँ से..!"

"प्लीज़ एक बार अंदर आ जाओ.. मुझे बहुत ज़रूरी बात करनी है.. अभी तुम आई तो थी दरवाजे पर.. क्यूँ आक्टिंग कर रही हो.." अमित की दिलेरी देखकर वाणी सच में हैरान थी.. उस बात पर तो उसने मुश्किल से अपनी हँसी रोकी की गौरी दरवाजे पर गयी थी..

"क्या बकवास कर रहे हो.. मैं तो सो रही हूँ.. अभी भाग जाओ अंदर वरना में दिशा को जगा दूँगी ." गौरी ने अपनी शर्ट को ठीक करते हुए कहा...

"मैं नही जाउन्गा.. चाहे किसी को जगा दो.. तुम्हे एक बार अंदर आना ही पड़ेगा.." अमित को यकीन था की गौरी सब नाटक कर रही है..

"प्लीज़.. मुझे नींद आ रही है.. सोने दो ना!" हालाँकि अब तक नींद गौरी की आँखों से कोसो दूर जा चुकी थी...

"प्लीज़ सिर्फ़ एक बार आ जाओ.. मुझे तुमसे कुच्छ कहना है...."

"नही.. यहीं कह लो.. अंदर मनु होगा..!" गौरी लाइन पर आती दिखाई दी...

"मनु अंदर नही है.. और मैं अंदर जा रहा हूँ.. दो मिनिट के अंदर आ जाना.. नही तो मैं वापस आ जाउन्गा.." कहकर बिना गौरी की बात सुने अमित अंदर चला गया...

"अजीब ब्लॅकमेलिंग है!" नींद की खुमारी से निकल कर 'अब क्या होगा?' की सुखद जिगयसा में गौरी ने दोनो तरफ करवट ली; ये सुनिसचीत किया की कोई जाग तो नही रहा है..... और उठकर बाथरूम में चली गयी..

करीब 5 मिनिट बाद चौकसी से दिशा और वाणी पर एक सरसरी नज़र डाल कर गौरी अंदर वाले कमरे के दरवाजे से 2 फीट अंदर जाकर खड़ी हो गयी,"क्या है? जल्दी बोलो...

"ज़रा इधर तो आओ!" बेड पर बेताबी से गौरी के आने की उम्मीद में बैठे अमित की ख़ुसी का ठिकाना ना रहा...

"नाहही.. मैं और अंदर नही आउन्गि!" गौरी को भी तो नखरे आते थे आख़िर.. हर लड़की की तरह..

"सुनो तो... सुनो ना एक बार.. प्लीज़.. यहाँ आओ!" अमित उसको हासिल करने के लिए अधीर हो रहा था...

"क्या है? यहाँ आने से क्या हो जाएगा.... लो आ गयी.. बोलो!" अमित की मंशाओं से अंजान और नादान बन'ने का नाटक करती हुई गौरी बेड के करीब जाकर खड़ी हो गयी...

"बैठो तो सही.. मैं तुम्हे खा तो नही जाउन्गा!" अब दोनो को एक दूसरे का चेहरा कुच्छ कुच्छ दिखाई दे रहा था...

"तुम बता रहे हो या मैं जाउ.. मुझे डर लग रहा है...!" गौरी ने एक कदम आगे बढ़ाते हुए कहा..

"मुझसे? .... मुझसे कैसा डर... बैठो ना प्लीज़!" अमित बेड पर उसकी तरफ सरक आया.. गौरी ने पिछे हट'ने की कोई कोशिश नही की...

"तुमसे नही.. मुझे डर लग रहा है की कहीं दिशा जाग ना जाए..." बीत'ने वाले हर पल के साथ गौरी पिघलती जा रही थी... ,"कहीं मनु ना आ जाए.. वो किसलिए गया है उपर..."

अमित ने आगे बढ़कर उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया," तुम सच में बहुत सेक्सी हो गौरी... तुम जैसी लड़की मैने आज तक नही देखी..!"

"आज तक कितनी लड़कियों को बोली है ये बात..!" गौरी ने अपना हाथ छुड़ाने की आधी अधूरी सी कोशिश की... पर सफल ना हुई...

"सिर्फ़ तीन को.. तुम्हारी कसम.. पर मैं भी क्या करूँ.. तब तक मैने तुम्हे नही देखा था..." अमित ने उसका हाथ दबाते हुए खीँसे निपोरी....

गौरी अमित का जवाब सुनकर हँसे बिना ना रह सकी...,"मैने तुम्हारे जैसा पागल आज तक नही देखा..."

"बैठो ना.. अभी सारी रात पड़ी है.. मेरा पागलपन देखने के लिए..." कहते हुए अमित ने उसका हाथ दबाया तो अपने कपड़े ठीक करती हुई गौरी बेड के कोने पर बैठ गयी..," तुम कुच्छ कह रहे थे.. जल्दी बोलो ना.. मुझे नींद आ रही है.."

"तो यहीं लेट जाओ.. सुबह उठा दूँगा.. दिशा के उठने से पहले!" अमित मुस्कुराया..

"तुम तो सच में ही पागल हो.. मैं यहाँ तुम्हारे साथ सोऊगी.." गौरी ने बन'ने की कोशिश की...

"क्यूँ?.. मुझमें से बदबू आती है क्या?" अमित कौनसा कम था..

"मैं ऐसा नही कह रही..... तुम सब समझ रहे हो..." ज़रूर गौरी इश्स वक़्त तक पसीज चुकी होगी.. अंधेरे की वजह से अमित उसके चेहरे के भाव पढ़ नही पा रहा था...

"समझती तो तुम भी सब कुच्छ हो.. है ना..."

गौरी ने इश्स बात पर सिर झुका लिया.. शायद वो मुस्कुरा रही थी...

"बताओ ना.. सब समझती हो ना...!"अमित धीरे धीरे करके उसके और करीब आता जा रहा था...अब अमित ने उसका दूसरा हाथ भी अपने हाथ में पकड़ लिया..

"तुम बोलो ना .. क्या कह रहे थे.. क्यूँ बुलाया मुझे.." गौरी जानती तो सब कुच्छ थी.... तैयार भी थी.. पर पहल कैसे करती...

"वो तुमने सोने जाते हुए मुझसे हाथ मिलाकर एक बात कही थी.. याद है?" अमित ने उसकी उंगलियों को अपने हाथों में लेकर दबाना शुरू कर दिया था.. गौरी की साँसों में तीव्रता आना स्वाभाविक था...,"क्या?"

"यही की जो कुच्छ मैने रास्ते में किया.. वो तुम्हे बुरा नही लगा था..."

"हां.. उस वक़्त लगा था.. पर बाद में नही...!" गौरी ने अपना चेहरा एक तरफ कर लिया...

"क्क्या मैं एक बार तुम्हे छू सकता हूँ..!" अमित का कहने का तरीका निहायत ही रोमॅंटिक था...

"छ्छू तो रखा है.. और कैसे च्छुओगे..!" गौरी ने अमित द्वारा पकड़े दोनो हाथों की तरफ इशारा करते हुए कहा..

"नही.. ज़रा और करीब से.. ज़रा और मर्दानगी से... ज़रा और दीवानगी से!" अमित ने हाथों को छ्चोड़ कर उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया.. अमित के अंगूठे गौरी के लबों पर जाकर टिक गये...

"वो कैसे?" शर्म और उत्तेजना की अग्नि में तप रही गौरी अपनी सुध बुध खोती जा रही थी.. अब उसकी साँसे सीधे अमित के नथुनो से टकरा रही थी... क्या मादक गंध थी गौरी की...

"ऐसे..." अमित ने कोई ज़बरदस्ती या जल्दबाज़ी नही की... हौले हौले से अपने होंठों को उन्न बेमिसाल होंठों के पास ले गया.. हालाँकि गौरी की नज़रें झुक गयी और वो काँपने सी लगी थी.. पर किसी तरह का प्रतिरोध उसने नही किया.. और अमित ने आँखें बंद करके अपने होंठों से उसकी गरम साँसे अंदर ही दफ़न कर दी.. दोनो के शरीर में अजीब सी लहर उठी.. गौरी की आँखें बंद थी.. हाथ अब तक नीचे ही टीके हुए थे... और वो अपनी तरफ से कोई हरकत नही कर रही थी.. यहाँ तक भी उसके होंठ तक उसने नही हिलाए...

करीब 3-4 मिनिट बाद जब अमित अमृतपान करके हटा तो गौरी का बुरा हाल था.. लंबी लंबी साँसे ले रही थी.. मदमस्त चूचियों के आकर में हूल्का सा उभार आ गया था.. और बदहवास सी नीचे की और देख रही थी..

गौरी के लबों को चूसने से अमित को इतना आनंद आया था की जब हटा तो पागलों की तरह उसके होंठ ही देखता रहा..

गौरी ने ही चुप्पी तोड़ी," छ्छू लिया हो तो मैं जाउ..!"

"अभी कहाँ.... अभी तो पता नही क्या क्या छ्छूना बाकी है.... मैं लाइट जला देता हूँ.. दरवाजा बंद करके....

"लाइट मत जलाओ प्लीज़....!"

"कुच्छ नही होता! एक मिनिट..." कहते हुए अमित ने दरवाजा बंद करके लाइट ऑन कर दी...

"गौरी का सुर्ख लाल हो चुका चेहरा दूधिया रोशनी में नहा गया.. उसकी आँखें झुकी हुई थी.. छ्चातियाँ फेडक रही थी.. दिल के ज़ोर ज़ोर से धड़कने के साथ ही....

अमित आकर उसके सामने बैठ गया और भगवान की दी इस नियामत को सच में ही पागलों की तरह निहारने लगा........

गौरी के अंदर जाने के बाद वाणी खुद को ज़्यादा देर तक रोक नही पाई.. अमित ने किए तरह बेबाक तरीके से गौरी को अंदर आने को कह दिया.. दोनो को एक दूसरे से मिले अभी चाँद घंटे ही तो हुए थे.. फिर वह और मनु तो एक दूसरे के जज्बातों से वाकिफ़ हैं.. वो ही क्यूँ दूर दूर तड़प्ते रहें.. वाणी ने दम साध कर दिशा की साँसों का मुआयना किया.. वो घर में चल रही हलचलों से निसचिंत दूसरी और मुँह करके सो रही थी...

वाणी को अपनी चारपाई पर पड़े दोनो तकियों को तरीके से चारपाई पर लिटाया और उन्न पर चादर ढक दी.. अगर ध्यान से नज़र ना डाली जाए तो यही आभास होता था की कोई सो रहा है..

एक बार फिर उसने अपनी दीदी पर सरसरी नज़र डाली और दो चार कदम सावधानी से बरामदे से बाहर की और रखे.. और सीधा उपर की और रुख़ कर लिया...

"कौन है...?" सीढ़ियों में दिखाई दे रहे मानव धड़ को देख को देख कर मनु चौंक गया..

"मैं हूँ... तुम.... उपर क्या कर रहे हो?" वाणी की कशिश भारी आवाज़ भी उस वक़्त मनु को उत्साहित ना कर पाई...

".. मैं तो बस ऐसे ही आ गया था.. नींद नही आ रही थी.. पर तुम.. तुम कैसे जाग गयी..?"

"मैं भी बस ऐसे ही आ गयी.. जैसे तुम आ गये.. मुझे भी नींद नही आ रही थी! मैं तुम्हे देखने अंदर भी गयी थी.. पर वो अमित अजीब तरीके से मुझे अंदर बुलाने लगा" वाणी अब मनु के करीब आकर बरामदे में खड़ी हो गयी थी.. दो दिलों के बीच अब दो कदम का ही फासला था.. और कोई अड़चन भी नही थी.. दूरियाँ कभी भी जवानी की रो में बह सकती थी.. मिट सकती थी..

"क्या कब आई थी तुम अंदर... तो क्या वो तुम थी..? हे भगवान.."

"क्या हुआ? क्या तुम भी जाग रहे थे.. तब.. जब में दरवाजे पर आई थी.." दिल में जाने कितने अरमान धधक रहे थे.. पर वाणी औपचारिकताओं से आगे बढ़ नही पा रही थी..

"न..नही.. पर मुझे नीचे जाना होगा.. नही तो अनर्थ हो जाएगा...!" मनु को याद आया की दरवाजे पर खड़ी वाणी को अमित ने गौरी समझ लिया था.. कहीं वो उसको जाकर च्छेद ना दे और कोई पंगा ना हो जाए..

वाणी ने कदम बढ़ा रहे मनु के हाथ को अपने दोनो हाथों की हथकड़ी बना कर पकड़ लिया.. उसकी इश्स अदा पर कौन ना कुर्बान ना हो जाए,"क्या अनर्थ हो जाएगा.. मैं इतनी भी मनहूस नही हूँ.." वाणी की आँखों में आज की रात को 'पहली रात' बना देने की बेकरारी को समझना कोई बड़ा काम नही था...

"न..नही.. वो ऐसी बात नही है...तुम नही समझोगी.. मुझे जाने दो.." मनु को लग ही रहा था की आज तो बचना मुश्किल है.. बड़ी किरकिरी होगी..

"क्यूँ नही समझूंगी.. मैं कोई बच्ची हूँ क्या..?" वाणी ने कहते हुए अपनी कातिल मस्तियों की और झुक कर देखा.. सबूत बहुत ही सॉलिड था की वो अब बच्ची नही बल्कि बड़े बड़ों के होश ख़स्ता करने का दम रखती है...

"न्नाही.. दर-असल.. ववो अमित कह रहा था की दरवाजे पर.. गौरी आई थी.. उसके लिए..कहीं वो.... " मनु वाणी की दिलफैंक अदा से अपनी आवाज़ पर काबू सा खो बैठा..

"वो तो गौरी को उठा कर ले भी गया.. अंदर!" वाणी की आँखों में सम्मोहित करने की ताक़त थी.. उसको भी उठा ले जाने का निमंत्रण था..

"उठा ले गया.. मतलब?" मनु को अमित की जानलेवा दिलेरी पर एक पल को यकीन नही हुआ..

"अमित ने उसको बुलाया और वो अंदर चली गयी.. इश्स'से ज़्यादा मुझे कुच्छ नही पता.. मतलब..!" वाणी मनु को इधर उधर ही दिमाग़ को पटकते देख नाराज़ हो गयी.. मुँह फूला लिया और जाकर बारिश में खड़ी हो गयी...

"वहाँ कहाँ जा रही हो.. भीग जाओगी..!" मनु ने बरामदे से ही उसको हल्क से पुकारा...

"भीगने दो.. तुम्हे क्या है? तुम्हे तो बस अमित की पड़ी है.. मैं तो पागल हूँ जो दीदी का डर छ्चोड़ कर बिन बुलाए तुम्हारे पास आ गयी.." नखरे में अपनेपन की मिठास थी.. और बारिश में भीग रहे कुंवारे बदन की प्यास भी..

"तुम तो नाराज़ हो गयी... मैं... हां क्या कह रही थी तुम.. तुम बच्ची नही हो!" मनु भी बाहर निकल कर छत की मुंडेर पर हाथ रखे खड़ी वाणी से एक कदम पिछे खड़ा हो गया.. वाणी की टी-शर्ट भीग कर उसकी कमर से चिपक गयी थी.. हल्क अंधेरे में जैसे वाणी के बदन से प्रकाश फुट रहा हो.. पतली कमर जैसे बहुत ही नाज़ुक रेशे की बनी थी.. कमर से उपर और नीचे की चौड़ाई समान लगती थी.. 34" की होंगी.. पिच्छली गोलाइयों का तो कोई जवाब शायद अब भगवान के पास भी नही होगा.. मानो नारी-अंगों की श्रेष्टा मापने के पैमाने की सुई भी

उनको मापने की कोशिश में टूट जाए.. इतनी गोल.. इतनी मादक.. इतनी चिकनी... इतनी उत्तेजक.. और इतनी शानदार की अगर 'रस' का कोई कवि कल्पना में उनका वर्णन करे तो आप कह उठे.. 'असंभव है..'.... पर्फेक्ट आस.. टू ... टू टच.. टू लीक.. टू लव... टू फक!!!!!

मनु वाणी के इश्स काम रूप को देख कर पागल सा हो उठा.. अंदर वाली 'बात' बाहर निकल आने को फड़कने लगी.. पॅंट में मनु के 'मन' का दम निकालने लगा.. अगर कुच्छ और देर वाणी इसी स्थिति में खड़ी रहती तो 'कुच्छ और' ही हो जाना था..

मनु को अपने पास खड़े होने का अहसास पाकर वाणी पलट गयी,"और नही तो क्या.. दिखाई नही देता.. मैं कोई बच्ची हूँ...?"

उफफफ्फ़.. क्या कयामत ढा गयी थी वाणी पलटने के साथ ही.. मनु का बचा खुचा संयम भी दम तोड़'ने वाला था.. हुल्की रिमझिम बारिश आग में घी डाल रही थी.. मुलायम सा कपड़ा उसके रोम रोम से चिपका हुआ था.. 'रोम-रोम' से.. मनु की नज़र वाणी के योवन की दहलीज से आगे निकल जाने का प्रमाण बने दोनो वक्षों की धारदार गोलाइयों पर जाकर जम सी गयी.. यूँ तो वाणी को बिना कपड़ों के भी मनु देख चुका था.. पर वो सब विवस'ता वश हुआ था.. आज कपड़े के झीने आवरण से ढाकी वाणी का अंग अंग फेडक रहा था.. भीगे हुए उसके गुलाबी होंठों से लेकर चौड़े कुल्हों तक.. गोल लंबी जांघों तक.. और जांघों के बीच उनके मिलन बिंदु पर फुदाक रही चिड़िया तक.. वाणी का क़तरा कतरा छ्छूने लायक था... चूमने लायक

था.. और उन्न पर पागलों की तरह च्छा जाने लायक था.. मंतरा मुग्ध सा मनु कुच्छ भी बोल ना सका.. हुष्ण के मारे आशिक की तरह घूरता ही रहा.. घूरता ही रहा.. घूरता ही रहा...

मनु को मजनू की तरह एकटक उसकी और देखते पाकर वाणी बाहर से शर्मा गयी और अंदर से गद्रा गयी.. वापस पिछे घूम कर वाणी ने अपनी छातियों को देखा.. लग रहा था मानो उन्न पर कपड़ा हो ही ना.. कसमसा रही गोलाइयाँ घुटन सी महसूस कर रही थी.. छातियों के बीच में 'मोती' अपना सिर उठाए खड़े थे.. उनका पैनापन बढ़ गया था.. वाणी अपनी ही 'अनमोल जागीर' को देखकर सिहर सी गयी.. फिर कब से उनको पाने की हसरत लिए मनु का क्या हाल हुआ होगा.. ये समझना वाणी के लिए कोई कठिन काम नही होगा.. काम-कल्पना के सागर में ही मनु को इश्स कदर डूबा देखकर वाणी 'गीली' हो गयी... उसने अपनी जांघों को ज़ोर से भींच लिया.. मानो मनु के कहर से अभी बचना चाह रही हो.. पर ऐसा हो ना सका.. हो कैसे सकता था.. पिच्छवाड़ा पागलपन को और बढ़ा गया.. मनु एक कदम आगे बढ़ा और वाणी के दोनो और से अपने हाथ सीधे करके दीवार पर टीका दिए...," सचमुच! ...... तुम... बच्ची नही रही वाणी.." कहते हुए मनु के होंठ काँप उठे.. शरीर की अकड़न बढ़ गयी.. दोनो के बीच जो झिर्री भर का फासला रह गया था; उसको मनु की बढ़ती 'लंबाई' ने माप लिया..

"आआह.." इश्स 'च्छुअन' से वाणी अंजान नही थी.. महीनों पहले अंजाने में ही सही.. पर वो शमशेर की 'टाँग' से मिलने वाले इश्स अभूतपूर्व अहसास को महसूस कर चुकी थी...

आसमनझास में खड़ी वाणी ने कुच्छ समझ ना आने पर अपने अंगों को इसी हालत

में तड़प्ते रहने के लिए छ्चोड़ दिया.. 'मनु' को महसूस करते रहने के लिए..

"एक बात पूच्छू..?" मनु ने वाणी की मादक 'आह' को सुन'ने पर कहा..

"हूंम्म्म.." वाणी तो जन्नत की सैर कर रही थी.. आधी होश में थी.. आधी मदहोश.. लगातार उसकी 'दरारों' से छ्छू रहे 'मनु' के कारण वा पल पल उत्तेजित होती जा रही थी.. उपर से बरस रहे बादल उसकी हालत को और बिगड़ रहे थे...

"डू यू लव मी?"( दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा ये समझता हूँ ये आशिक भी बिल्कुल पागल होते हेँ अब इस मनु को ही लीजिए अँग्रेज़ी में पूच्छने सेशरम शायद कुच्छ कूम हो जाती होगी.. नही तो हिन्दी में ही ना पूच्छ लेता..)

वाणी कुच्छ ना बोली.. पूछते हुए मनु थोड़ा आगे की और झुका था.. 'रगड़' अति आनंदकरी थी.. शायद इसी 'रगड़ को वह फिर महसूस करना चाहती थी...

"तुमने जवाब नही दिया!" एक बार फिर मनु आगे की और झुका.. इश्स बार कुच्छ ज़्यादा..

वाणी की जांघों का कसाव बढ़ गया.. हूल्का सा खोलने के बावजूद...

"जवाब देना ज़रूरी है क्या?" वाणी ने गर्दन उपर उठाकर अंगड़ाई सी ली.. अंग अंग चटक उठा.. अंग अंग 'हां' कह उठा.. वाणी की कमर मनु की छाती से चिपक गयी...

"हां.. बहुत ज़रूरी है.. तुम नही जानती.. मैं..." मनु ने अपने हाथों से दीवार पर रखी वाणी की हथेलिया दबा ली.. थोड़ा सा और आगे होकर..

और वाणी की आवाज़ निकल ही गयी..,"मैं मर जाउन्गि!" वह अब प्रोक्श चुभन को सहन करने की स्थिति में नही थी...

बारिश की बूँदें मनु के बालों से होकर वाणी के गालों पर टपक रही थी.. जैसे कोई संदेश दे रही हों.. मिलन का.. जैसे वो भी इश्स 'उत्सव' का आनंद उठाने के लिए तरस कर बरस रही हों...

"बुरा लग रहा है क्या?" मनु थोड़ा पिछे हट गया.. कितना नालयक था 'प्रेम-गेम' में.. समझ ही नही पाया.. वाणी ने क्यूँ कहा की वो मर जाएगी...

मनु का पिछे हटना वाणी की जवानी को नागवार गुजरा.. यहाँ तक आने के बाद पिछे हटना.. सच में ही जानलेवा हो सकता था..

तुम..? तुम करते हो हमसे प्यार?" मनु के पिछे हटने से बेकरार वाणी ने अपने को और आगे की और झुका लिया.. प्रेमरस और सावन की फुहारों से वाणी की जांघें तर होकर टपक रही थी...

ये सुनकर मनु के दम तोड़ रहे हौसलों में फिर से जान आ गयी,"हां.. बहुत प्यार करता हूँ.. जब से तुम्हे देखा है.. कुच्छ और देखने का मॅन ही नही करता.. समझ नही आता.. क्या करूँ?"

जज्बातों और अरमानों के भंवर में भी ऐसा चुलबुलापन वाणी ही दिखा सकती थी..,"फिर तो पढ़ाई के 12 बज गये होंगे..!" कहकर वाणी हौले से खिलखिला पड़ी...

वाणी को 'मूड' में पाकर मनु के हौसले बढ़ गये..," आइआइटी हूँ.. समझी!" कहते हुए मनु ने अपना एक हाथ दीवार से उठा कर वाणी के कमसिन पेट पर ला रखा..

वाणी उच्छल पड़ी,"ओई मम्मी.. गुदगुदी होती है.." इसी च्चटपटाहट में मनु का हाथ उपर उठ गया.. वाणी को अपने सन्तरेनुमा अंगों में झंझनाहट सी महसूस हुई.. ये झंझनाहट का असर उसके सुगढ़ नितंबों और उनमें च्चिपी बैठी छ्होटी सी अद्भुत तितली तक अपने आप पहुँच गया.. राम जाने क्या कनेक्षन होता है.. इनमें!

मनुको लगा उस'से कोई ग़लती हो गयी.. आख़िर बिना पर्मिशन के 'नो एंट्री ज़ोन तक जो पहुँच गया था..," सॉरी! वाणी.. मैं वो..!"

"अपने आशिक की इश्स अदा पर वाणी बिना शरारत किए ना रही.. बेकरार तो वो थी ही..," तुम्हारे जितना तो लड़कियाँ भी नही शरमाती...!" कहकर वो पलट कर खड़ी हो गयी..

सच ही तो था.. लड़कियाँ भी कहाँ शरमाती हैं इतना.. वरना जिस वाणी के चेहरे भर की एक झलक पाने को लाखों दीवाने कतार में रहते थे.. वो खुद उसके आगोश में आना चाहती थी.. छ्छूने पर भी कोई शिकायत नही की.. फिर वो इंतजार किस बात का कर रहा था.. मैं होता तो..

बरसात में टपक रही वाणी का अंग अंग जैसे पारदर्शी हो चुका था.. ऐसे में वाणी से ज़्यादा लाल मनु का चेहरा था.. पर मर्दानगी का ढोल अभी भी हकलाए स्वर में पीट रहा था..,"म्म..? मैं कब.. शर्मा रहा हूँ...!"

"और नही तो क्या.. फिर सॉरी किसलिए बोला..?" वाणी को मनु की आँखों से बेताबी टपकती दिखाई दे रही थी..

"व... वो.. ग़लती से वहाँ छ्छू गया था..." मनु वाणी से नज़रें नही मिला पा रहा था...

लज्जा तो वाणी की आँखों में भी थी.. पर इतनी नही की उस लल्लू को प्यार का सबक ना सीखा सके..," तो इसमें क्या है.. लो मैने छ्छू ली.. तुम्हारी!" वाणी ने अपना हाथ उठाकर मनु की छाती पर रख दिया.. मनु का दिल ज़ोर से धड़क रहा था.. वाणी के हाथ की आँच से और तेज़ हो गया.. मनु को लगा.. अब वा अपने छिपे हुए शैतान को मैदान में कूदने से रोक नही पाएगा.. पॅंट की सिलाई उधड़ने वाली थी..

"तुझमें और मुझमें फ़र्क़ है वाणी..."

"क्यूँ क्या फ़र्क़ है? लड़कियों की तो ऐसी ही होती हैं.." नज़रें नज़ाकत से नज़रें झुकाए वाणी ने कहा... वह भी शर्मा गयी थी.. 'उनके' बारे में बोलते हुए...

"हां...... पर..... क्या मैं फिर से छ्छू लूँ?" मनु के मुँह में पानी आ गया.. नज़र भर कर उनको देखते ही...

वाणी के हाथ अनायास ही उपर उठ गये.. और दोनो संतरों को अपने ही हाथों में च्छूपा लिया.. तब जाने कैसे वह बोल गयी थी..,"इनमें क्या है?"

संसार भर का सुरूर इन्ही में तो छिपा हुआ है...

"बोलो ना वाणी.. एक बार और छ्छू लूँ क्या..?" अजीब जोड़ा था.. एक तैयार तो दूजा बीमार... अब वाणी पानी में थी...

वाणी क्या बोलती.. ये भी कोई कहने सुन'ने की बातें होती हैं...

"बोलो ना प्लीज़.. बस एक बार.." मनु ने वाणी को कंधों से पकड़ा और हूल्का सा उसकी और झुक गया..

वाणी को लगा वो अभी टूट कर गिर जाएगी.. मरती क्या ना करती.. जब मनु ने कोई पहल नही की तो अपने हाथ नीचे सरका दिए.. अपने पेट पर.. और नज़रें झुकाए साँसों को काबू करने का जतन करने लगी..

कमसिन उमर की वाणी के दोनो संतरे साँसों की उठापटक के साथ हुल्के हुल्के हिल रहे थे.. उपर.. नीचे... उपर... नीचे.. क्या मस्त नज़ारा था..

आख़िरकार मनु ने शर्म का चोला उतार ही फैंका.. अपना एक हाथ उपर उठाया और वाणी के गले से थोड़ा नीचे रख दिया जहाँ से उनकी जड़ें शुरू होती थी...," अया!"

यकीन मानिए.. ये सिसकी मनु के मुँह से निकली थी.. जितने आनंद की वह कभी कल्पना तक नही कर सकता था.. इतना आनद उसको कपड़ों के उपर से ही वाणी को छूने से मिल गया... वानिकी तो ज़ुबान जैसे जम ही गयी थी... सीने को महसूस हुई इतनी ठंडक को पाकर...

"थोड़ा और नीचे कर लूँ.. अपना हाथ!" मनु ने मनमानी जैसे सीखी ही ना थी..

वाणी ने छिड़ कर हूल्का सा घूँसा उसके पेट में मारा..,"मुझे नही पता.. जो मर्ज़ी कर लो..."

"जो मर्ज़ी!" मनु को ऐसा लगा मानो जन्नत की पॉवेर ऑफ अटयर्नी ही उसको मिल गयी हो...

वाणी के ऐसा कहने के साथ ही मनु का हाथ जैसे वरदान साबित हो रही उन्न बूँदों के साथ ही फिसल कर धक धक कर रहे बायें वक्ष पर आकर जम गया.. अब की बार सिसकी वाणी की ही निकलनी थी.. सो निकली,"आआआः.. मॅन्यूयूयूयुयूवयू"

'बड़ी' होने का अहसास होने के बाद पहली बार किसी ने उन्न फड़कते अंगों के अरमानो की अग्नि को हवा दी थी.. कामग्नी जो पहले ही सुलग रही थी; अब दहकने लगी..

वाणी के दोनो हाथ बिना एक भी पल गँवायें मनु का साथ देने पहुँच गये.. एक हाथ मनु के हाथ के उपर था.. ताकि और कसावट के साथ वो आनंद के अतिरेक में डूब सके.. दूसरा हाथ 'दूसरे' को सांत्वना दे रहा था.. ताकि उसको वहाँ सूनापन महसूस ना हो...

"हाए.. तुम तो कमाल हो वाणी.. कितना मज़ा आ रहा है.. इनको छूने से.." मनु ने यूयेसेस हाथ की जकड़न को कुच्छ और बढ़ाते हुए दूसरा हाथ वाणी की कमर में पहुँचा दिया...

वाणी का सख़्त हो चुका 'दाना' मनु के हाथों में गुदगुदी सी कर रहा था..," सच में वाणी.. मुझे नही पता था.. चूचियाँ छ्छूने में इतनी प्यारी होती हैं..

"छ्हि.. छ्ही.. इनका नाम मत लो.. मुझे शर्म आती है.." क्या बात कही थी वाणी ने.. मनु का खून उबाल खा गया..,"पर मुझे मज़ा आ रहा है.. तुम्हारी चूचियाँ संतरे जैसी हैं.. आकर में भी.. छ्छूने में भी..!"

"धात..!" और शर्मकार वाणी आगे बढ़कर मनु की छाती में दुबक गयी.. और 'संतरे' पिचके नही.. बढ़िया कंपनी की टेन्निस बॉल की तरह मनु के सीने में गड़कर अपनी गर्मी छ्चोड़ने लगे.....

"और छ्छूने दो ना प्लीज़.. इतना मज़ा आ रहा है की बता नही सकता.. तुम लाजवाब हो वाणी.." अपने बदन से शर्माकर लिपटी वाणी कामुक नज़रों से छेड़ता मनु बोला..

"अपने अंगों की इतनी प्रसंशा सुनकर वाणी ने भावुक होकर अपनी नज़रें उठाई और अपने यार की आँखों में देखा.. आँखें सब कह देती हैं.. दोनो एक दूसरे के मंतव्या को समझ गये और होंठों से होंठ जाम की तरह टकरा गये... चियर्स फॉर लव..

दोनो ही जवान थे.. और अब तक प्यार की ऊँचाइयों से अंजान थे.. अब उन्हे सिर्फ़ और सिर्फ़ एक ही चीज़ दिखाई दे रही थी.. एक दूसरे का बदन..

जी भर कर एक दूसरे के मुँह में 'जीभ कबड्डी' खेल कर वो हटे तो हट-ते ही मनु ने वाणी के दिल की बात कह दी,"प्यार करें?"

"कर तो रहे हैं.. और कैसे करें?" वाणी प्यार के इश्स खेल के हर भाग को जानती थी.. अपने कानो से सुन भी चुकी थी और आँखों से देख भी चुकी थी.. उसको वो मंज़र याद आ गया जब शमशेर दिशा में पूरा समा गया था और उसकी बेहन लहूलुहान हो गयी थी.. पर उसने वो पल भी देखा था जब खेल के आख़िरी पलों में उसकी दीदी धक्के मारने में शमशेर पर भी हावी हो गयी थी..

पर वह चाहती थी की मनु सब कुच्छ अपने तरीके से करे.. इसीलिए अंजान बनी रही..

"सिर्फ़ यही नही वाणी.. मैं सब कुच्छ करना चाहता हूँ.. सब कुच्छ.." मनु ने वाणी को अपने साथ मजबूती से बाँध लिया..

"और कैसे करते हैं.. सब कुच्छ.. मुझे नही पता.. पर तुम बता दो.. कर लूँगी.." मनु के सीने से अपने गाल सटाये वाणी सब कुच्छ करने को बेचैन थी....

"ठीक है.. अपने कपड़े उतारो.." अब मनु जल्दबाज़ी मैं दिखाई दे रहा था.....

उधर नीचे भी कामदेव मेहरबान तहे... गौरी के अरमान आज पुर होने जा रहे तहे.. अमित की साँसों की गंध अब तक महसूस कर रही गौरी जाना नही चाह रही थी.. पर लाइट जलने पर रोशन हो चुके कमरे में अमित के साथ वो असहज महसूस कर आयी थी..,"तुमने जवाब नही दिया.. मैं अब जाउ क्या?"

"जाना होता तो उसको रोक ही कौन सकता था.. अमित इश्स बात को जानता था," तुम्हारी मर्ज़ी है.. पर मैं तो लेना चाहता हूँ..."

"क्या?" हालाँकि मतलब वह समझ गयी थी.. उसके चेहरे के भावों और नज़रें झुका कर पूच्छे गये 'क्या' से सॉफ पता चलता था..

"तुम्हे सब पता है.. लड़की के पास एक बेचारे लड़के को देने के लिए 'क्या' होता है.." अमित ने गौरी की जांघपर अपना हाथ रख दिया..

"माहौल फालतू बातों की इजाज़त नही दे रहा था.. अन्यथा गौरी लड़कों को बेचारा कहने पर उस'से भिड़ने को तैयार हो जाती.. नज़रें झुकाए हुए ही उसने जवाब दिया," मुझे डर लग रहा है.."

'ग्रीन सिग्नल!' भला इश्स बात को अमित क्यूँ ना समझता.. जांघों से सरकता हुआ उसका हाथ गौरी की मच्चली के बिल्कुल करीब से होता हुआ उसकी 26" कमर और फिर वहीं जाकर थम गया.. जहाँ लड़की मा बन'ने से पहले इतराती हैं और बाद में घबराती हैं..' कहीं ढीले ना हो जायें...'

प्रतिरोध ना के बराबर ही था.. वहाँ से उसका हाथ हटाकर गौरी ने अपने हाथ में ले लिया..," तुम्हे में सच में अच्छि लगती हूँ क्या?"

"ये भी कोई पूच्छने की बात है.. क्या कभी आईने ने नही बताया?" अमित का हाथ लाख संयम बरतने की कोशिश के बाद भी अपनी जाँघ में उच्छल रहे 'शिकारी' को खुरचने चला गया.. साइज़ गौरी के लिए विस्मयकारी था.. उसकी मच्चली में कुलबुलाहट सी होने लगी..,"धोका तो नही दोगे?"

"अगर मौका नही मिला तो...." अमित का मजाकिया और बेबाक लहज़ा ही अब तक गौरी को वहाँ बैठा रहने पर विवस कर रहा था..

"तुम भी ना.. चलो बताओ क्या लेना चाहते हो.. मुझसे!" गौरी ने शर्मीली मुस्कुराहट के साथ अमित को वापस लाइन पर लाने के लिए सवाल किया...

"नाम बताऊं क्या?"

"नही.. ऐसे ही बता दो.." गौरी झेंप गयी..

"ठीक है.. अपने कपड़े निकाल दो.."

"नही.. पहले लाइट ऑफ!"

"लाइट बंद करने पर क्या फ़ायदा.. अगर देख ही ना पाए.."

"पर मुझे शर्म आ रही है.." गौरी अमित से नज़रें नही मिला पा रही थी..

"ठीक है.. तुम आँखें बंद कर लेना.. शरम भाग जाएगी..

"पर...." गौरी कुच्छ कहना चाह ही रही थी की अमित घुटनो के बल बैठा और उसकी टी-शर्ट नीचे कोनों से पकड़ कर उपर सरका दी.. ट्यूब-लाइट की रोशनी में गौरी के दूधिया कबूतर फड़फने लगे.. उनका आकर इतना मादक था की अमित पूरी शर्ट निकलना ही भूल गया और उसके गले में ही छ्चोड़ कर उसके गोल गोल अनारों को अपने हाथों में दबोच लिया...

"इष्हशह!" गौरी की कामुक सिसकी भी उसके बदन की तरह ही पागल कर देने वाली थी.. अमित के होंठों ने जैसे ही उसकी चूचियों से दूध निकालने की नाकामयाब कोशिश की.. गौरी का अंग अंग लहरा उठा.. वह मदहोश होकर बिस्तेर पर आ गिरी.. "आआआअह प्लस्ससस्स.. शियरट्ट तो.. आआह ...निकालने दो.."

"एक मिनिट!" कहते हुए अमित ने गौरी की चूचियों को चूस्ते हुए ही एक हाथ से उसकी शर्ट निकलवाने में मदद की.. वह इतनी मदहोश हो चुकी थी.. की सिसकिया लेते हुए बड़बड़ाने लगी,"आआह.. मुझे भी कुच्छ लेना है.."

नेकी और पूच्छ पूच्छ.. पलक झपकते ही अमित ने अपनी पॅंट अंडरवेर के साथ ही उतार फैंकी.. गौरी के लिए उसका ख़तनाक खिलौना तैयार खड़ा था.. तनटनाता हुआ..,"ये लो मेरी जान!" और घुटनो के बल होते हुए अमित ने अपना 'शेरू' गौरी के हाथों में पकड़ा दिया..

"यहाँ नही.. वहाँ.." गौरी का हाथ उसकी लोवर के उपर से ही मानो कुच्छ ढूँढ सा रहा था..

"जल्दी है क्या..?"

"हां.. दिशा और वाणी में से कोई उठ गयी तो.."

"ठीक है.. पूरा मज़ा फिर कभी.. पूरी जिंदगी पड़ी है.. चलो.. उल्टी लेट जाओ.."

"उल्टी क्यूँ.. ऐसे ही ठीक नही है क्या?"

"या तो तुम इनस्टरक्टर बन जाओ.. या फिर मेरी बात मान लो.." अमित ने धोंस सी दिखाई..

"ठीक है.. " गौरी ने कहा और अपनी छातियों के नीचे तकिया रखकर उल्टी होकर लेट गयी....

अमित ने एक पल भी ना लगाया और उसका लोवर और पॅंटी नीचे खींच कर नितंबों को आवरण हीन कर दिया...

"ओह माइ गॉड!... म्‍म्म्मममममहा!" गौर के गोरे गोरे मोटे मस्त नितंबों की सुंदरता और सुगधा देख कर अमित यही कह पाया.. "क्या माल हो यार तुम भी.."

दोनो फांकों के बीच की दरार अच्छि ख़ासी चौड़ी लग रही थी.. पर जब अमित ने उंगली घुसाने की कोशिश की तो अहसास हुआ.. कितनी टाइट है.. गहरी भी.. अमित ने फांको को अलग करके जहाँ तक अमित की नज़र गयी.. सब कुच्छ कोरा और गोरा था..

अमित ने बेड पर पड़ा तकिया उठाया और गौरी को अपने नितंब उपर उठाने का इशारा किया.. ज्यों ही गौरी उपर को हुई.. अमित ने तकिया उसके नीचे सेट कर दिया.. नितंबों की उँचाई और बढ़ गयी.. दरार और फैल गयी.. दरार के बीचों बीच दूधिया सफेद रंग की हल्के बालों वाली मच्चली मुस्कुरा रही थी.. अमित ने उपर से ही उसका दाना ढ़हूँढने की कोशिश की तो गौरी अंदर तक हिल गयी.. इतना आनंद उसको अपनी उंगली से कभी नही आया था..," प्लीज़ जल्दी करो.. मैं 2 बार तो पहले ही हो चुकी हूँ.."

"हूंम्म.. वो तो दिख ही रहा है.. रस से सनी अपनी उंगली बाहर निकालकर देखते हुए अमित ने फिदा हो चुकी नज़रों से उसको देखा.. बड़ी मादक गंध थी..

अमित ने उसकी टाँगों को थोड़ा दूर करके योनि चिद्रा को देखकर कहा..," तो पहली बार है.. नही?"

"क्या मतलब?" गौरी ने सच में उसका मतलब नही समझा..

"सेक्स.. और क्या?"

बात सुनकर गौरी को धक्का सा लगा.. अचानक पलटी खाकर बैठ गयी और अपने हर अंग को च्छुपाने की कोशिश करती हुई रोना सा मुँह बना लिया..

"क्या हुआ?"

"तो क्या तुम मुझे..." गौरी सच में रोने लगी...

"सॉरी जानू.. आइ वाज़ जस्ट जोकिंग.. मज़ाक कर रहा था यार.."

"नही.. मुझे नही करना.."

"प्लीज़ गौरी.. ऐसा मत करो.. छ्होटे से मज़ाक से ही रूठह गयी. तुम्हे तो पता है.. मेरी मज़ाक करने की आदत है.. रियली सॉरी यार.. प्लीज़" अमित ने उसको अपनी बाहों में भर लिया.. बड़ी मुश्किल से गौरी शांत हुई..

गौरी वापस उसी हालत में लेटने लगी तो अमित ने एकद्ूम शरीफों की तरह कहा," यहाँ से और उपर उठ जाओ ना.. प्लीज़.. घुटने बेड पर रख कर.. हां हां.. ऐसे ही.. अपना चेहरा बेड पर ही रखो.. यस यस ऐसे ही.. थॅंक यू!"

किसी ने सच ही कहा है..

"बिस्तेर पर तो रानी ही राजा होती है.. और राजा उसका सेवक" जाने कितनी ही सभ्यता एक ही घुड़की से अमित के बोल में आ गयी थी..

अमित ने जब इश्स अवस्था में गौरी के पिच्छवाड़े को देखा तो पागलपन में कोई कमी ना रही.. अमित ने एक से बढ़कर एक को देखा था पर गौरी के आगे तो सब पानी भरती ही लगी..

अमित के होंठ गौरी की चूत से खेलने लगे.. गौरी भी इश्स 'टच' से बदहवास सी सिसकिया ले लेकर अपने आपको ज़्यादा से ज़्यादा खोलने में लगी थी..

जी भर कर अमित ने रसास्वादन किया... चूत फूल कर और भी स्वदिस्त और सुंदर हो गयी थी...

ज़्यादा देर किस भी लिहाज से अब ठीक नही थी..

अमित ने उसके पिछे पोज़िशन ली और लंड का सूपड़ा गौरी की चिकनी चूत के मुंहने पर लगा दिया..," थोड़ा दर्द होगा.. एक बार.. सहन कर लेना प्लीज़.."

गौरी इश्स बात को समझती थी.. उसने अपना मुँह तकिये में दबा लिया और 'काम' कर्ण का इशारा किया..

'चिरर्र' की आवाज़ के साथ ही गौरी के गौरांग का श्री गणेश हो गया.. खून नही आया पर हालत खून ख़राबे से बदतर थी.. लंड कुच्छ दूरी तय करके जैसे जाम सा हो गया.. तकिये के अंदर से गौरी की घुटि हुई सी चीखें रह रह कर अमित को अभियान रोक देने पर विवश कर रही थी..

"चलो हो गया" की अनुभूति अमित को गौरी के उस अंदाज से हुई जब उसने तकिये से मुँह उठाकर एक लंबी साँस ली.. लंड भी तक तक गौरी की जड़ों तक 2-4 बार हो आया था.. अब गौरी के चेहरे पर असीम सुख और आनंद के भाव थे.. गौरी ने अपनी टाँगों को और ज़्यादा खोल दिया..

कसी हुई योनि में अब उसका लंड सररर सररर की आवाज़ के साथ अंदर बाहर हो रहा था.. अमित को करीब 15 मिनिट हो चुके थे बिना रुके बिना थके लगे हुए.. पर गौरी इश्स दौरान 2 बार स्वर्ग लोक हो आई थी..

अंत में जब अमित को अहसास हुआ की अब टिकना मुश्किल है तो उसने ढकधक धक्कों की गति तेज़ कर दी.. गौरी तीसरी बार 'आ' गयी..

गौरी की इश्स बार की लुंबी साँस के साथ ही अमित ने अपना हथियार बाहर खींच लिया.. अच्च्छा ही किया वरना सब कुच्छ अंदर ही हो जाता.. जस्न का जोश जारी था.. गाढ़े वीरया की पिचकारी पसारकार उल्टी लेट चुकी गौरी के नितंबों को निहाल करने लगी...

गौरी को जैसे इसी बात का इंतजार था.. झट से उठी और अपने को सॉफ करके कपड़े पहनती हुई बोली... "अगली बार देखूँगी तुमको.." कहते हुए अमित के होंठों का एक करारा चुंबन लिया और कपड़े पहेनकर चुपके से बाहर निकली.. और अपनी खाट पर जाकर इश्स प्रथम अनुभव की मिठास को अपने मॅन में महसूस करने लगी...

अंदर बैठा अमित खुद ब खुद मुस्कुरा रहा था,"क्या गन्ना था.. कसम से!"

पर उसका तो यही तराना था.. गन्ना उखाड़ो और खेत से बाहर!