मायाजाल

Horror stories collection. All kind of thriller stories in English and hindi.
007
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Re: मायाजाल

Unread post by 007 » 10 Dec 2014 03:05

वह क्या और किसका दृश्य है । यह तक समझ में नहीं आ रहा था । स्क्रीन पर एक मिनट देखना मुश्किल हो रहा था । और वह बेबकूफ़ इस तन्मयता से देख रहा था । मानों कैटरीना कैफ़ सेक्सी डांस कर रही हो ।
वह समझ गयी । यदि वह एक घण्टा भी वहाँ बैठी रहती । तो भी प्रसून उसकी तरफ़ ध्यान देने वाला नहीं था । सो यदि उसे मौके का फ़ायदा उठाना था । तो उसे ही कुछ करना था । उसने बैचेनी से पहलू बदला ।
और बोली - एक्सक्यूज मी । प्रसून जी ! मैं आपको डिस्टर्ब तो नहीं कर रही । ऐसा हो तो मैं फ़िर चली जाऊँ । एक्चुअली मुझे जस्सी के बारे में बङी फ़िक्र है । उसकी कुछ जिज्ञासा सी थी । प्लीज डोंट माइण्ड ।
वह मानों सोते से जागा । और तुरन्त उसकी तरफ़ आकर्षित सा हुआ । वास्तव में यह उसकी असभ्यता थी । एक महिला उसके पास बैठी थी । और वह उसे उपेक्षित कर रहा था ।
- नो नो । वह अफ़सोस सा करता हुआ बोला - इनफ़ेक्ट गलती मेरी ही थी । असल में जो मैं देख रहा था । वह बीच में था । इसलिये मैं आपको कंपनी नहीं दे पा रहा था । पर चलो । अब वह कम्पलीट हो गया । हाँ आप बोलिये ना ।
करमकौर की बाँछे खिल गयी । इसी पल का तो उसे इन्तजार था । और समय उसके पास बिलकुल नहीं था । कभी भी राजवीर आ सकती थी । जस्सी गगन आ सकती थी । कोई और भी आ सकता था । समय कभी रुकता नहीं । किसी का इन्तजार नहीं करता । और तब समय का लाभ न उठाने वाले बेबकूफ़ ही होते हैं । और वह बेबकूफ़ नहीं होना चाहती थी । कभी नहीं ।
उसने अन्दर ही अन्दर चुपके से अपने गोद के बच्चे को चुटकी भरी । जिससे पीङित हुआ सा वह रोने लगा । तब वह उसे चुप कराने लगी । और फ़िर उसने वही किया । जिसके लिये उसने यह किया ।
प्रसून को अनदेखा सा करते हुये उसने अपना विशाल स्तन खोला । और बच्चे को हिलाते डुलाते हुये वह अपने नग्न गोल स्तन की झलक देर तक उसे दिखाती रही । और फ़िर बच्चे को स्तनपान कराने लगी ।
संभवत हर स्त्री को ऐसा ही लगता है कि उसकी कामुक भाव भंगिमा उस पुरुष के सामने पहली ही बार घटित हो रही है । जिसकी वह अभिसारी नायिका बनने हेतु बेताब है । और वह अपनी ऐसी काम अदा से उसे घायल करके ही छोङेगी । तब पुरुष को उसका प्रणय प्रस्ताव मजबूरन स्वीकार करना ही होगा ।
उसकी ऐसी चेष्टा ने प्रसून को उन तमाम योग स्त्रियों की याद दिला दी । जो पहले कभी उसके अनुभव में आयी थीं

। वह अच्छी तरह जानता था । यदि उसने देखा नहीं । उसे अनदेखा करता रहा । तो वह बराबर प्रयास करती रहेगी । और व्यर्थ का समय खराब करेगी । औरत की नस नस से वाकिफ़ उस सबल योगी ने आश्चर्य और प्रशंसा के मिश्रित भावों से तब तक उसके स्तन से निगाह नहीं हटाई । जब तक उसने प्रसून को निगाह मिलाकर ऐसा करते देख नहीं लिया । तब उसके चेहरे पर संतुष्टि के भाव आये । और नारीत्व सौन्दर्य का गरिमा बोध भी ।

काफ़ी सुन्दर हैं आप । वह मधुर स्वर में उसे और भी संतुष्ट करता हुआ बोला - ईश्वर ने आपको फ़ुरसत से बनाया है । और सब कुछ भरपूर रूप से दिया है ।
- थैंक्स । वह शर्माकर बोली - पर हीरे की परख सिर्फ़ जौहरी ही जानता है । वही उसकी सही कीमत भी समझता है । आई थिंक । औरत को हरेक कोई नहीं समझ सकता । वह काँच के समान नाजुक होती है । यू नो ।
वास्तव में करम कौर का अपने आप से नियन्त्रण हट गया । उसे अपने भीतर अजीव सी चिपचिपाहट महसूस हुयी । वह पिघलती हुयी सी बहने लगी । क्या पुरुष था । अनोखा और कल्पना से परे । अभी उसने उँगली से भी नहीं छुआ था । और वह भावित होकर पहाङी दरार से फ़ूटते वेगवान झरने की तरह बह गयी थी । ओह गाड ! कोई योग पुरुष ऐसा भी हो सकता है । यदि कोई उसे मुँहजवानी बताता । तो उसे कभी विश्वास ही नहीं होता । पर स्वयँ के अनुभव को भला वह कैसे नकार सकती थी । अब उसे यह बहाना भी नहीं सूझ रहा था कि वह प्रसून से क्या और कैसे बात करे ।
- मैंने वो । तब अनुभवी योगी स्वयँ ही उसकी मनोदशा जानकर बोला - वो ..राजवीर जी द्वारा शूट किये जस्सी जी के वीडियो क्लिप देखे । बट मुझे ताज्जुब इस बात का है कि अकार्डिंग टू राजबीर जी सेम ऐसा ही अनुभव आपको भी हुआ । ये बङी ही अजीव बात है । और वह यानी जस्सी जी इसको आधा अधूरा ही बता पाती है । जबकि आप पूरा और ज्यों का त्यों बताती हैं । वैसे वह सब मैं सुन चुका हूँ । पर प्लीज आप कुछ और न समझें । तो मुझे फ़िर से एक बार बतायें ।
करम कौर के मानों सब अरमानों पर पानी फ़िर गया । वह सिर्फ़ और सिर्फ़ अभी वही सब चाहती थी । जो गगन बता रही थी । पर एकदम ऐसा वह कह भी कैसे सकती थी । तब उसने भी गगन की तरह नमक मिर्च लगाकर उस मैटर का पूरा पूरा फ़ायदा उठाने का निश्चय किया ।
उसने एक निगाह आसपास डाली । अभी कोई नहीं था । वासना वैसे भी मनुष्य को अंधा ही कर देती है । तब यदि कोई होता भी है । तो भी नजर नहीं आता । उसे ख्याल आया । उस चक्रवात में वह एकदम नंगी भाग रही थी । और मूसलाधार पानी बरस रहा था । यहाँ वह स्वयँ खुल जाना चाहती थी । उसके प्यार की बारिश में नहाना चाहती थी । और खुद को वैसा ही आजाद महसूस करना चाहती थी । एक पूर्ण पुरुष को पाने के लिये औरत का भावनात्मक और देहात्मक पूर्ण नग्न होना आवश्यक ही है । तभी वह रीझता है । उसने अपने बच्चे को घुमाया । और दूसरा स्तन भी खोल लिया । अब उसके दोनों उरोज उसके सामने थे । और वह ऐसा प्रदर्शित कर रही थी । जैसे इस तरफ़ उसका ध्यान ही नहीं है । उसे नहीं पता था । गगन और जस्सी भी उसी तरह उसको छिपकर देख रहीं है । जैसे वह उनको सुन रही थी । पर प्रसून एकदम शान्त था । और उसके बोलने की प्रतीक्षा कर रहा था ।
- अरे प्रसून जी ! वह आँखें चौङी करके बोली - अभी क्या बोलूँ । एक तो मेरे को शर्म सी आती है । आप भी सोचोगे कि ये लेडी कैसे बोल रही है । पर डाक्टर से कुछ भी छुपाना नहीं चाहिये । जिस तरह एक अच्छी सफ़ल समर्पित प्रेमिका को प्रेमी के सामने शर्म छोङकर नंगा होना ही पङता है । उसी तरह रोग ठीक कराना हो । तो डाक्टर के सामने भी नंगा होना ही पङता है । आप समझ रहे हो ना । मैं क्या कह रही हूँ । सो प्लीज । मैं आपको कोई बात संकेत में ना बताकर ज्यों की त्यों बताती हूँ ।

फ़िर वह सचमुच ही ज्यों का त्यों उस चक्रवाती तूफ़ान का वर्णन । और उसमें खुद के भागने की बात । उस टार्जन लुक युवा लङके को देखने की बात । और दरिया में अपने डूबने तक बताती चली गयी । बस उसने अपनी नग्नता की स्थिति में खामखाह का मिर्च मसाला जोङा था । जो प्रसून को स्पष्ट ही बनाबटी लगा । और एकदम झूठा लगा । पर करमकौर को इसकी कोई परवाह नहीं थी । उसे झूठा सच्चा कुछ भी लगे । उसे अपनी तरफ़ आकर्षित करना ही उसका एकमात्र लक्ष्य था ।
- सोचिये प्रसून जी सोचिये । वह होठ दबाकर रोमांचित हुयी सी बोली - मैं बेचारी यह सोच सोचकर मरी जा रही हूँ । यदि बह नाविक मछुआरा मेरी पुकार सुन लेता । और मेरे पास आता । तब वह मेरे साथ क्या बिहेव करता । ध्यान रहे । मैं बिना कपङों में थी ।
- बही । प्रसून उसकी भावनाओं को मनो सन्तुष्टि देने के ख्याल से बोला - वही करता । जो ऐसी स्थिति में एक पुरुष एक खूबसूरत भरपूर जवान स्त्री के साथ करता है । वैसे मैं उसकी नहीं जानता । पर मैं तो निश्चय ही यही करता ।
तब करमकौर के गाल शर्म से लाल हो उठे । उसे पहली बार लज्जा सी आ गयी । उसे पहली बार मानों ख्याल आया । वह अभी भी नग्न सी ही है । और तब उसने नकली हङबङाहट के साथ अपने स्तनों को कुर्ती के अन्दर कर लिया । प्रसून ने चेहरे पर आती रहस्यमय मुस्कराहट को फ़ौरन रोका । और बहुत हल्का सा सामान्य मुस्कराया ।

आसान नहीं होता । ऐसी परिस्थितियों में ठीक से काम करना । सबको सब कुछ समझा पाना भी आसान नहीं है । किसी विदेशी फ़्री सेक्स धरती की तरह पंजाब में भी काम भावना की लहरें सी बह रही थीं । और सबसे बङी बात थी कि वह इस केस में एकदम से कोई प्रभाव भी नहीं छोङ सकता था । कोई झूठे तन्त्र मन्त्र का दिखावा करने से तो उसे वैसे ही नफ़रत थी । फ़िर वह दामाद की तरह इस घर में कब तक ठहरा रह सकता था । जबकि निजी तौर पर उसकी भारी दिलचस्पी इस केस में थी ।
जस्सी उसे खुद को आकर्षित करती थी । गगन कौर बस उसके साथ सेक्स करने के ख्वाव देखती रहती थी । करम कौर तो बस मौका मिलते ही उस पर टूट पङना चाहती थी । हाँ राजवीर बेकरारी से उस पल के इन्तजार में थी । जब प्रसून इस रहस्य पर से कोई परदा उठायेगा । या कहेगा । तुम्हारी लाङली अब ठीक हो गयी । और जाने किस अज्ञात भावना से उसको ऐसी ही उम्मीद भी थी ।
सिर्फ़ बराङ साहब के लिये उसे लगा था कि वह कोई फ़ालतू का बखेङा खङा कर सकते है । और उसके काम में विघ्न पैदा कर सकते है । उन्होंने एक जवान बेटी का पिता होने के नाते प्रसून को संदेह की नजर से देखा भी था । पर यह क्षणिक भावना ही साबित हुयी थी । प्रसून की किसी को भी सम्मोहित कर देने वाली जादुई पर्सनालिटी से अगले दो मिनट में ही वह खुद को उसके आगे बौना महसूस करने लगा । उसकी अमीरी का रौब पल भर में चूर चूर हो गया । जब उसे इस लङके की हस्ती पता लगी ।
वैसे भी व्यक्ति का व्यक्तित्व उसके बताने से नहीं स्वयँ उसकी आभा से झलकता है । जब उसे पता लगा । प्रसून कीट बैज्ञानिक है । और उसका एक पाँव रूस में तो दूसरा योरोप में अक्सर रहता है । जब उसने औपचारिकता वश ही अपने शेयर बिजनेस और रिसर्च वर्क के बारे में बहुत संक्षिप्त सा परिचय दिया । तो बराङ साहब को हिसाब लगाना मुश्किल हो गया । इसकी आमदनी कितनी हो सकती है ।
उसने उसकी आलीशन कोठी और वैभव पर एक मामूली सी निगाह डालना भी उचित नहीं समझा था । उसने उसकी आलीशान बेटी को भरपूर देखना तो दूर अभी देखने की ही कोई कोशिश नहीं की । जबकि वह दस बार उसके सामने आ चुकी थी । यह सब अनुभव किसी इंसान के प्रति होना बराङ की जिन्दगी में पहला वाकया था ।
बह कुछ ही देर पहले आया था । और औपचारिक रूप से भावहीन हल्लो बोलकर अपने पास से एक मैगजीन निकालकर उसे पढने लगा था । क्योंकि अभी बातचीत शुरू नहीं हुयी थी । और राजवीर उसके स्वागत में नाश्ता आदि इन्तजाम में लगी हुयी थी । और ये सब घोर अहंकारी बराङ साहब के जीवन में पहली बार हो रहा था । जब वह अपने ही घर में अपने तमाम रौब दाब के बाबजूद भी उस लङके के आगे खुद को बेहद छोटा महसूस कर रहा था । और उससे कोई बातचीत कर पाने में उसकी खुद की जबान ही अटक जाती थी । शब्द बाहर नहीं आते थे । मगर प्रसून को जैसे उसकी उपस्थिति का अहसास तक नहीं था ।
और फ़िर वही हुआ । अहंकारी बराङ तब तक उससे बात करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया । जब तक चाय नाश्ता आ जाने पर प्रसून सबके बैठ जाने पर स्वयँ ही उनकी और आकर्षित नहीं हुआ । और बातचीत शुरू हुयी । उसकी शिष्टता शालीनता और मामूली से मामूली गतिविधि से स्वाभाविक ही झलकता राजसी अन्दाज देखकर दोनों पति पत्नी मानों आकाश में उङने लगे । और मानवीय स्वभाव वश सुन्दर जस्सी के साथ उसकी सुन्दर जोङी की कल्पना करने लगे ।

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Re: मायाजाल

Unread post by 007 » 10 Dec 2014 03:06

यहाँ तक तो सामान्य बात थी । दोनों को बेहद खुशी इस बात की हुयी थी कि जबसे तीन चार दिन से वह उनके घर रुका था । जस्सी एकदम नार्मल हो गयी थी । उसे रात या दिन में कोई अज्ञात बाधा नहीं हुयी थी । उनकी फ़ूल सी बच्ची बिलकुल ठीक सी हो गयी लगती थी । जबकि उसका इलाज करने आये उस जादूगर ने किसी पूजा रचा के नाम पर एक अगरबत्ती भी नहीं सुलगाई थी । मुँह से ॐ टायप या किसी गुरु या भगवान या ग्रन्थ का ना नाम लिया था । ना कोई पन्ना खोला था । जिसकी वे आम कल्पना कर रहे थे । उससे भी बङी हैरत उन्हें इस बात की थी कि वे उसके सामान में किसी तान्त्रिकी मान्त्रिकी हड्डियाँ माला गुटके आदि की अपेक्षा कर रहे थे । जबकि उसके पास एक उच्च शिक्षित और उच्च पदाधिकारी वाला ही सामान था । कुछ भी हो । उसने उनकी बेटी को बिना किसी तामझाम के जादुई तरीके से ठीक किया था । यही उनके लिये बहुत बङी राहत थी ।
और जो उनके लिये सबसे बङी राहत थी । दरअसल वही प्रसून के लिये सबसे बङी आफ़त थी । वह चाह रहा था कि बाधा हो । और फ़ुल्ली अटैक हो । जो वह उसका कोई सिरा सूत्र पकङ सके । अगर वह वीडियो क्लिप ना होते । तो खुद वह मानने को तैयार नहीं होता । जस्सी किसी गम्भीर भाव से पीङित है । यह बाधा उसके आने से क्यों नहीं हो रही थी । यह वह भली प्रकार जानता था । दरअसल उसके ध्यानी शरीर से निकलने वाली योग तरंगे ऐसे किसी बाह्य तरंग को पहुँचने से पहले ही नष्ट कर देती थी ।
अब तक बस वह इतने ही निर्णय पर पहुँचा था । ये किसी तरह की सामान्य प्रेत बाधा नहीं थी । नींद में चलने का रोग भी नहीं था । उसके दिमाग में किसी तरह की कोई ऐसी मेमोरी भी उसे नहीं मिली थी । जो ऐसे अटैक का कारण हो सकती थी । और तब बहुत बार सोचने के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि जस्सी के कारण शरीर में कोई ऐसा संस्कार जमा है । जो उसके पूर्व जन्म से संबन्धित है । और जब वह किसी विशेष बिन्दु पर पहुँचकर उस संस्कार से जुङती है । तब उसके साथ वो चक्रवाती घटना घटित होती है । और वो विशेष बिन्दु कुछ भी हो सकता है । उसी तरह का कोई दृश्य । कोई सोच । कोई चीज । कोई भावना । कोई इंसान आदि कुछ भी । ये पेशेंट की तरफ़ का एक पक्ष था । और इसमें कोई चिन्ता जैसी बात कम से कम उसके लिये नहीं थी । वह थोङे प्रयास से योग द्वारा जस्सी को उस कारण संस्कार से जोङकर उस कारण को ही जला देता । और जस्सी हमेशा के लिये मुक्त होकर ठीक हो जाती ।
और तब उसे इसके दूसरे पक्ष दूसरी संभावना का ख्याल आया । और उसके बारे में सोचते ही वह काँप गया । अगर वह बात थी । तो सिर्फ़ खतरनाक ही नहीं । बेहद खतरनाक थी । कम से कम इतनी खतरनाक कि उसे भी एक युद्ध सा लङना पङता । और उस युद्ध का अंजाम कुछ भी हो सकता है । स्वयँ उसकी मौत । या फ़िर जस्सी की भी ।
उसने ड्राइव करते हुये बगल में बैठी उस अप्सरा को देखा । जो ऐसी किसी भी सोच से बेपरवाह सी अधमुँदी आँखों से कहीं खोयी हुयी थी । और तब ही प्रसून को पहली बार अहसास हुआ कि उसने किसी प्रेमिका की भांति अपना सिर उसके कन्धे से टिका रखा था । वह उससे एकदम सटकर बैठी थी । और उसका मरमरी गोरा हाथ उसकी गोद में रखा हुआ था । कमाल था । वह अपनी भावनाओं में इस कदर खो गया था कि उसे एक जवानी की गरमाहट भी महसूस नहीं हुयी थी ।
सङक पर काफ़ी अंधेरा फ़ैल गया था । वह बिना किसी उद्देश्य के जस्सी के साथ ड्राइव पर था । बराङ दम्पत्ति ने उसके जेंटलमेनी नेचर और उससे जस्सी की शादी की कल्पना करके उसे खुली छूट दे रखी थी । और स्वयं जस्सी भी किसी प्रेमिका की भांति अधिकतर उसके आसपास ही रहती थी । बस दोनों की सोच में भिन्नता थी । प्रसून उस अज्ञात रहस्य की खोज में उसके नजदीक था । जबकि जस्सी और बराङ दम्पत्ति उसे लङका लङकी का प्रेम आकर्षण समझते हुये मुग्ध हो रहे थे ।
उसका ध्यान फ़िर से दूसरे पक्ष पर गया । और वो दूसरा पक्ष ये था कि किसी अज्ञात भूमि से यह संस्कार आ रहा हो । जिसमें कनेक्टविटी उल्टी यानी उधर से होती हो । और ऐसा सम्पर्क होते ही जस्सी के साथ वह चक्रवाती घटना होती हो । और शायद इसीलिये उसके पास इसका कोई रिकार्ड नहीं था । तब ये दिमाग की मेमोरी का मामला नहीं था । यह किसी ऊँचे नीचे लोक से जुङा मामला था । जो करोंङों इंसानी ग्रन्थियों में से किसी एक से जुङता हो । तब ये बहुत कठिन बात थी । और यही वो बात थी कि प्रसून की पूरी पूरी दिलचस्पी इस केस में थी । जब किसी जीवित इंसान को कहीं अज्ञात भूमि में बैठा हुआ कोई शख्स प्रभावित कर रहा हो । वह क्यों प्रभावित कर रहा है । क्या चाहता है ? उसके इरादे क्या हैं ? ऐसे अनेक प्रश्न उसके दिमाग में तैर रहे थे । और इसके लिये उसे फ़िर से एक बार सूदूर अंतरिक्ष के किसी अज्ञात से लोक में जाना पङ सकता था । पर कहाँ । ये अभी उसे खुद भी पता नहीं था ।
रहस्यमय अस्तित्व का मालिक अंधेरा पूरे यौवन पर था । प्रथ्वी के इस हिस्से पर उसका साम्राज्य कायम हो चुका था । इस अंधेरे शान्त शीतल माहौल में जस्सी के दिल में प्रेम भावनाओं का संचार हो रहा था । वह रह रहकर कंपित सी होती प्रसून के शरीर पर हाथ फ़िरा रही थी । और प्रसून की कोहनी से अपने स्तन को दबा रही थी । ये अंधेरा उसे फ़िर से सब कुछ वही बा होश पाने को उकसा रहा था । जो चिकन वाली के अनुसार प्रसून ने उसके साथ बेहोश किया था ।
जबकि प्रसून के दिलोदिमाग में इस अंधेरे को लेकर बार बार एक ही बात आ रही थी । जस्सी को ज्यादातर अटैक रात यानी अंधेरे में ही होते थे । और स्वयँ उसके सामने वाला अटैक भी अंधेरे में ही हुआ था । या कहना चाहिये । उसकी बहुतेरी कोशिश से किसी तुक्के के समान तीर निशाने पर जा लगा था । बस उसी तुक्के की उसे दोबारा तलाश थी । बो प्वाइंट जिससे जस्सी अज्ञात भूमि से जुङती थी । वो सूत्र । वो सिरा । जो कहीं न कहीं उसे शायद उसके गुजरे अतीत से जोङ देता था । वो क्या था ?
और तब उसे उस टार्जन लुक नाविक मछुआरे का ध्यान आया । जिसे जस्सी दरिया में डूबने से पहले पुकारती थी । क्या वह उसका पूर्व जन्म का प्रेमी था । क्या मन में सेक्स भावना उठने पर उसे वह अटैक होता था । या प्रेमी की अचेतन में दवी याद की वजह से । प्रेमी । एक तरह से अभी वह भी उसका प्रेमी था ।
उसने गाङी साइड में लेकर रोक दी । और कार के स्टीरियो में कार से ही लेकर शकीरा की सीडी प्ले कर दी । बहुत हल्की आवाज में गूँजती शकीरा की मादक सेक्सी आवाज जस्सी के दिल में चाहत की हिलोरें सी पैदा करने लगी । प्रसून उसकी तरफ़ सरक आया । और उसने सिगरेट सुलगा ली । ऐसा लग रहा था । वह कुछ टाइम शान्ति से सुस्ताने के मूड में हो । उसने गाङी की सीट को भी पीछे सरका दिया था । और फ़ैला दिया था । जस्सी को मानों ये भगवान ने वरदान दिया हो । वह उसकी गोद में लेट गयी । और उसके हाथ अपने सीने पर रख लिये । प्रसून हौले हौले उसके स्तनों को सहलाने लगा । वह अन्दर ब्रा नहीं पहने थी । उसके रेशमी वस्त्र के ऊपर से फ़िसलन भरा सा हाथ जस्सी के बदन में काम तरंगे तेजी से फ़ैला रहा था । एक समझदार प्रेमिका की भांति इसी बीच उसने अपनी शर्ट के दो बटन खोल दिये । तब उसका अभिप्राय समझकर प्रसून ने उसकी शर्ट के अन्दर हाथ डाल दिया ।
- आपको ! वह मादकता से भरपूर लरजते स्वर में बोली - मेरे ये अच्छे लगते हैं ।
- अगर ना कहूँ । वह उसका स्तन मसलता हुआ बोला - तो यह एकदम झूठ होगा । ये एक दूध पीते बच्चे से लेकर शक्तिशाली देवताओं को भी आकर्षित करते हैं । और सर्वाधिक प्रिय होते हैं । ये एक सम्पूर्ण नारी का सौन्दर्य आधार है । खुद नारी इनको मनोहर रूप में पाकर स्वयँ को गौरवान्वित महसूस करती है । ये किसी नारी की खूबसूरती के सबसे महत्वपूर्ण बिन्दुओं में से एक हैं ।
- आप जादूगर हो प्रसून जी ! वह उसकी छाती पर हाथ फ़िराती हुयी बोली - आपकी बातों में जादू है । व्यक्तित्व में जादू है । आपकी निगाहों में जादू है । आप एक पूर्ण पुरुष हो । कोई भी लङकी आपको देखने के बाद सिर्फ़ आपको ही पाने की तमन्ना करेगी । वह अपने आपको आप पर कुरवान कर देगी । प्लीज आपने मुझे इनके बारे में बताया । ये सबकी पसन्द होते हैं । पर वो ?
प्रसून ने फ़ौरन अपनी मुस्कराहट को निकलने से रोका । एक लङका । एक लङकी । एक पुरुष । एक स्त्री । एक आदमी । एक औरत । जब अपनी तमाम सामाजिक बेङियों मर्यादाओं को हटाकर जवां तन्हाई के एकान्तमय सामीप्य में होते हैं । तब वे सिर्फ़ प्रेमी होते हैं । इसके अलावा कुछ नहीं होते । उसके पूछते ही प्रसून को किसी विदेशी लेखक की यह महत्वपूर्ण सूक्ति याद हो आयी - यह कोई ऐसी चीज नहीं । जिसको यूज न करने से इस पर सोने की फ़सल उगने लगेगी ।
पर वह अपनी शिष्टता के चलते इस पर कोई कमेंट नहीं कर पाया । जस्सी की बङी बङी आँखों में चाहत भरे मौन आमन्त्रण के साथ हल्की सी शरारत चंचलता झलक रही थी । जैसे ही प्रसून का हाथ सामान्य होकर उसके शरीर से अलग ठहर जाता । वह फ़िर से उसे थामकर अपने सीने से लगा लेती ।
- मुझे ये वो का तो पता नहीं । वह उसके रेशमी बालों में उँगलिया घुमाता हुआ बोला - पर ये सच है । मुझे तुम बहुत अच्छी लगती हो । सच तुम हो भी बहुत अच्छी । एक पूर्ण प्रेमिका ।
जस्सी फ़ौरन उठकर बैठ गयी । उसके अधरों मे तेज कंपकंपाहट हो रही थी । उसका सारा शरीर कंपित हो रहा था । तेज भावावेश में उसने अपने होंठ प्रसून के होठों से चिपका दिये । बस यही तो वह योगी चाहता था । उसका अब तक का सारा प्रयास इसी के लिये था । उसकी तरफ़ से काम गति का बहना । यही बात यही पहल । वो अपनी तरफ़ से भी कर सकता था । पर वो काम गति की विपरीत धारा होती । तब वह सिर्फ़ समर्पण की मुद्रा में हो जाती । बहाव उसकी तरफ़ से ही होना जरूरी था । क्रिया एक ही थी । खेल एक ही था । पात्र भी एक ही थे । पर घटना में बहुत अन्तर था । उसके परिणामों में बहुत अन्तर था । अब वह किसी उन्मुक्त नदी की तरह बाँध तोङती हुयी बहने लगी थी ।
योगी के सधे संतुलित संगीतमय हाथ उसके बदन पर घूमने लगे । उसका योग शरीरी काम व्यवहार जस्सी को मानों अनन्त आकाश में उङाकर बादलों के बीच ले गया । वह खुली सङक की परवाह किये बिना जोर से कराह रही थी । सीत्कारें भर रही थी । प्रसून उसके स्तनों को बेतरह मसल रहा था । उसके मोटे होठों में दबे उसके सुर्ख रसीले अधर उत्तेजना से फ़ङफ़ङा रहे थे । वह काँटे में फ़ँसी मछली की तरह तङफ़ रही थी । पर उसकी मजबूत पकङ से छूट नहीं पा रही थी । और वह छूटना भी नहीं चाहती थी । उसकी संकरीली संकुचित दरार यौवन रस से पूर्णतः नहा गयी थी । उसमें किसी प्यासी झील के समान तूफ़ान सा मचल रहा था । इस तूफ़ान को परास्त कर देने वाले किसी साहसी नाविक की उसे तीवृ जरूरत हो रही थी । वह मानों आधी रोती हुयी सी सिर्फ़ प्रसून ..ओ प्रसून..क्विक..किल मी.. डियर ही मुश्किल से कह पा रही थी ।
पर योगी ने अभी वीणा के तार सिर्फ़ छेङे भर थे । उसके संगीत का सा रे गा मा अभी शुरू ही हुआ था । उसका शरीर ही किसी यन्त्र की तरह क्रियाशील हो रहा था । पर आंतरिक रूप से वह एकदम शान्त था । और अपने केन्द्र में निर्विकार भाव से स्थित था ।
जिन्दगी का क्या पता । जस्सी उसे आगे कभी मिले ना मिले । इसलिये जब उसने खेल शुरू कर ही दिया था । तो उसे इन लम्हों को जस्सी की जिन्दगी के लिये यादगार तोहफ़ा बना देना था । एक ऐसा तोहफ़ा । जो सिर्फ़ कोई सशक्त योगी ही दे सकता था । कोई बलिष्ठ इंसान भी कभी नहीं ।
- मैं मर.. जाऊँगी । वह अस्फ़ुट स्वर में बोली - मैं मर रही हूँ । प्लीज..बचा लो मुझे । मैं बहुत ..प्यासी हूँ ।
क्या चाहती है । एक लङकी ऐसे क्षणों में । क्या चाहती है । सदियों से भटकती । प्यासी औरत ऐसे क्षणों में । वह अच्छी तरह से जानता था । और तब उसके यन्त्र शरीर से कोमल भावनाओं वाला प्रेमी उतर गया । और एक पूर्ण खिलाङी पुरुष आवरित हुआ । उसने जस्सी को किसी खिलौने की भांति हाथों में उठाकर सीट पर सही स्थिति में बलपूर्वक झुकाया । और झटके से उसकी जींस नीचे कर दी । एक कठोरता । एक निर्दयता । एक वहशीपना । उसके स्वभाव में भर गया । उसने जस्सी की गुलाबी चड्ढी इस अन्दाज में उतार फ़ेंकी । मानों कोई बच्चा डौल पर गुस्सा कर रहा हो । और तब आसमानी झूले की भांति हवा में ऊपर नीचे होती जस्सी ने उसका कठोर स्पर्श अपने विशाल नितम्बों पर महसूस किया । वह आनन्द से कराह उठी । एक तप्त लोहा सा उसके अन्दर समा गया । वह किसी क्रोधित हुये बालक के समान उसे खिलौना गुङिया की तरह तोङे डाल रहा था । बार बार उसके अंग तोङ रहा था । और फ़िर फ़िर जोङ रहा था । एक दहकती मोटी सलाख सा अहसास उसके नारीत्व को तपा रहा था । उस तपन से सहमी सी भयभीत सी वह बार बार बरखा सी बरस रही थी । सब मर्यादायें तोङकर बह रही थी । पर वह किसी क्रोधित नाग की तरह फ़ुफ़कारते हुये दंश पर दंश दिये जा रहा था । और कोई रहम करने को तैयार नहीं था । एक बार । दो बार । तीन बार ।..पांच बार ।
तव वह वास्तविक रो पङी । हाथ जोङ गयी । अब नहीं । और नहीं । बस । मुझ पर रहम करो । मैं तुम्हारी दासी हूँ । प्लीज नार्मल हो जाईये ।
वास्तव में वह पूर्णतया शान्त था । सामान्य था । निर्लेप था । निर्लिप्त था । योगस्थ था । जिसे वह मानवी भला कैसे समझ सकती थी । योग पुरुष का अंगीकार । एक साधारण लङकी कैसे कर सकती थी । उसकी क्षमता बहुत सीमित थी । ये अप्सराओं योग स्त्रियों का मामला था । वे ही इसको आत्मसात कर सकती थी । वह जान बूझकर अपनी मर्दानगी उस कोमल बाला पर नहीं दिखा रहा था । ये उसके योग शरीर की सहज सामान्य क्रिया थी । जिसे वह दो मिनट के साबुन के झाग से बने बुलबुले के समान वासना क्षमता रखने वाली वह मानुष देही जस्सी भला कैसे बरदाश्त कर पाती । तब उसने प्रयत्न करके खुद को सामान्य किया । और तब जस्सी को उसके प्यार में भीगने की अनुभूति होने लगी । भीषण गर्मी के तेज से दहकती जमीन पर जब वह झूमते बादलों के समान बरसा । तब उसका अंग अंग तृप्ति से भर उठा । वह भयभीत बालक के समान उससे चिपक गयी । उसकी आंतरिक मांसपेशियों ने इस अलौकिक प्रेमी के पुरुषत्व को पूरी भावना से एकाकार होकर जकङ लिया । भींच लिया । मानों किसी कीमत पर । और कभी भी जुदा नहीं होना चाहती थी ।
यह जस्सी के लिये एक यादगार मिलन था । पर प्रसून के लिये एक सामान्य शरीरी आचरण । यह मिलन जस्सी के दिलोदिमाग पर अमिट होकर लिख गया था । पर उसके लिये ये एक सिगरेट पीने जैसा भर था ।
उसने एक सिगरेट सुलगाई । उसका ये प्रयास एकदम बेकार रहा था । कोई एक घण्टे तक निढाल जस्सी उसकी गोद में निर्वस्त्र पङी रही । पर कहीं कोई बाधा नहीं हुयी । कोई क्रिया नहीं हुयी । उसके तुक्के का तीर कहीं अंधेरे में व्यर्थ जा गिरा था ।
अंधेरा और गहरा उठा था । उसने रिस्टवाच में समय देखा । और गाङी स्टार्ट कर घर की तरफ़ मोङ दी । ये प्रयोग बेकार भी था । और कारगर भी था । अब वह 99% स्योर था । जस्सी की बाधा का कामभावना से कोई सम्बन्ध न था । वह बात कुछ और ही थी । फ़िर वह और बात आखिर क्या थी ? आखिर क्यों थी ?
क्या पता क्यों थी ।


007
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Re: मायाजाल

Unread post by 007 » 10 Dec 2014 03:07

दूसरे दिन सुबह आठ बजे का समय था । प्रसून बराङ साहब की कोठी की सबसे ऊपरी छत पर था । उसकी उँगलियों में जलती हुयी सिगरेट फ़ँसी हुयी थी । जिससे निकलती धुँये की लकीरें सी ऊपर आसमान में किसी अज्ञात सफ़र पर जा रही थी । स्वयँ बराङ उसके आसपास टहल रहा था । और जस्सी की बीमारी के बारे में कम । उससे जस्सी की शादी को लेकर ज्यादा फ़िक्रमन्द था । उसके कहने पर राजवीर ने जस्सी और उसके एकान्त साथ के बारे में कुरेद कुरेदकर पूछते हुये उसका रुख जानने की कोशिश की थी । जिस पर जस्सी सिर्फ़ शर्माकर रह गयी थी । और.. मुझे कुछ नहीं पता..उन्हीं से पूछो ना ..कहकर भाग गयी थी । तब राजवीर के दिल में मीठी मीठी गुदगुदी सी हुयी । उन्हीं से पूछो ना..ये उन्हीं वर्ड कुछ न बताता हुआ भी सब कुछ बता गया । ओ रब्ब ! तेनूं लख लख शुक्र है । क्या राजकुमार भेजा था । उसकी कुङी के लिये । जैसी परी सी छोरी । वैसा ही सुन्दर वो राजकुमार ।
उसने बराङ साहब से उसी की शरारत के अन्दाज में बोला । बोलती है - उन्हीं से पूछो ना..। तब वे दोनों भरपूर हँस भी नहीं सके । हँसना चाहते थे । पर सिर्फ़ खुशी के आँसू ही निकले । पहली बार बराङ जैसे अभिमानी ने जाना । जिन्दगी में माधुर्य रस क्या होता है । पहली बार उसे लगा । वह एक जवान बेटी का बाप है । और वह आँसू भरी आँखों वाला बबुला ख्यालों में ही बङे लाङ से अपनी लाङो को उसके प्रियतम की डोली में बैठाकर खुद भावपूर्ण विदाई कर रहा था । ऐसे कितने ही अग्रिम मधुर दृश्य उन सरदार पति पत्नी की आँखों के सामने तैर गये ।
और अब वह बिना देरी किये इस मामले में प्रसून से बात करने वाला था । पर प्रसून के सामने उसके पास आते ही उसके सारे भाव एकदम साबुन के झाग की तरह बैठ गये । प्रसून भावहीन सा सिर्फ़ विचार मग्न था । तब शादी वाली बात कहने की वह हिम्मत नहीं कर पाया । और बात को शुरू करने के लिये जस्सी की स्थिति के बारे में पूछने लगा । जिसके बारे में उसने संक्षिप्त में इतना ही कहा - बराङ साहव ! मैं अपनी जान की कीमत पर भी जस्सी को ठीक करके रहूँगा । चाहे इस बाधा की जङ आकाश से लेकर पाताल तक क्यों न फ़ैली हो ।
वह मोटी अक्ल का सरदार इस बात का कोई अर्थ निकाल पाता । तब तक जस्सी नहाकर ऊपर आ गयी । ये देखते ही वह उन्हें एकान्त देने के लिये वह वहाँ से नीचे चला गया । छत पर टहलते हुये से प्रसून की निगाह बाहर कहीं निकलते सतीश पर पङी । उसके यहाँ आने का कारण सतीश ही था ।
जब जस्सी के घर में हुयी कानाफ़ूसी टायप बातें उसके भी कानों में आयी । तब उसने जस्सी की बात का कोई पता न होने का बहाना सा करते हुये..हमारी तरफ़ के लोग आज के जमाने में भी एक ऐसे अदभुत योगी को जानते हैं । उसके बारे में ऐसा सुना है । वैसा सुना है । जैसी अकारण सी सामान्य चर्चा की तरह बात की । जिसे बराङ दम्पत्ति खास राजवीर ने पूरी दिलचस्पी से ध्यान से सुना । और वे भी जस्सी को अलग रखते हुये उससे प्रसून के बारे में अधिक से अधिक पूछने लगे । और आखिर में उन्होंने जानना चाहा कि क्या वह जरूरत होने पर उसे बुला भी सकता है । या सिर्फ़ मुँह जबानी ही उसके बारे में जानता है ।
वास्तव में यू पी की मानसिकता वाला सतीश एक तीर से दो शिकार कर रहा था । वह बखूबी जानता था कि प्रसून को बुलाने का मतलब था । उसको कम से कम पचास हजार की इनकम होना । जो उसको योगी के खोजने के लिये मिलनी थी । दूसरे वह अपने घर मुफ़्त में घूमने जाता । तीसरा उनका काम सफ़ल हो जाता । तो न सिर्फ़ बराङ दम्पत्ति बल्कि इस पंजाबी क्षेत्र में उसका रौब गालिब हो जाना था । और खुद उसकी नजर में ये बेबकूफ़ सरदार उसे झुककर सलाम करने वाले थे । हर चालाक आदमी की तरह उसने भी ऐसे ही ढेरों प्लान यकायक सोच लिये थे । जिसे उसके यूपी में बहती गंगा में हाथ धोना कहा जाता था । पर वह सिर्फ़ हाथ धोकर नहीं रह जाना चाहता । पूरा का पूरा स्नान ही कर लेना चाहता था ।
लेकिन जब बराङ दम्पत्ति ने यकायक उससे बुलाने के बारे में कहा । तो मानों उसके हाथों से तोते ही उङ गये । वह जो कल्पना कर रहा था कि प्रसून को थोङी ही कोशिश से खोज लायेगा । अब उसे एकदम फ़ालतू की बात लगी । क्योंकि वह उसे सीधे सीधे नहीं जानता था । उसने किसी से सुना था । उस किसी ने भी किसी से सुना था । और उस किसी ने भी किसी और से बस सुना भर था । उसे जानता कोई भी न था ।
तब फ़िर किसी ने किसी को फ़ोन किया । उस किसी ने और किसी को फ़ोन किया । पूरे दो दिन सतीश दिन भर बैठा हुआ अपने किसी को फ़ोन मिलाता रहा । वह आगे अपने किसी को मिलाता रहा । तब सैकङों बार की बातचीत के बाद उसे बहुत दूर के किसी से प्रसून की कोठी का बस लैंडलाइन नम्बर ही हासिल हुआ । और उस पर भी जिस सख्त पर आंसरिग मशीन की तरह मधुर ध्वनि की लेडी आवाज सुनाई दी । उसने तो मानों उसके सब अरमानों पर पानी ही फ़ेर दिया ।
दूसरी तरफ़ से अल्ला बेबी बोल रही थी । उसने बहुत संक्षेप में बिना कुछ सुने कहा - सर ! अभी घर पर नहीं है । सिक्स मन्थ बाद आयेंगे । तब आप फ़ोन करना । कहकर उसने बिना कुछ सुने फ़ोन काट दिया ।
सतीश की समस्त आशा ही खत्म हो गयी । अभिमानी बराङ को खामखाह ही यूँ लगा । भरे बाजार उसकी बेइज्जती हुयी हो ।
पर राजवीर समझदार थी । उसने दो तीन बार स्वयँ प्रयास किया । तब कहीं फ़ोन उठा । तब अल्ला बेबी से उसकी बात हुयी । प्रोफ़ेशनल लोगों से बात करने का तरीका समझ आया । तब बात बनी ।
उसने बिना किसी भूमिका के कहा - देखिये । प्लीज ये एक जिन्दगी मौत का सवाल समझो । मैं आपसे प्रसून जी का नम्बर नहीं माँग रही । कोई अन्य रिकवेस्ट नहीं कर रही । पर कोई बहुत इम्पोर्टेंट बात आने पर आप उनको डायरेक्ट कान्टेक्ट कर सकती हो । ये तो मैं जानती हूँ । तब यदि आप कहें । तो मैं अपनी बात कहूँ ।
दरअसल सतीश और राजवीर को दूसरी तरफ़ से बोलने वाली कोई युवा लेडी मालूम हो रही थी । जबकि वह महज 13 वर्ष की अल्ला बेबी थी । जो बङी दक्षता से एक कुशल सेक्रेटरी की तरह ऐसी बातों को डील करती थी । और बहुत भावुक दिल भी थी । बस उसकी आवाज एकदम सपाट और भाव रहित थी । उसने राजवीर के स्वर में दर्द महसूस किया । तो स्वतः ही उसकी आवाज अतिरिक्त मधुरता से भर उठी ।
- कहिये । वह नमृ होकर बोली - मैं आपकी हेल्प करने की पूरी पूरी कोशिश करूँगी ।
- देखिये । राजवीर बोली - मैं बहुत संक्षिप्त में बात कहूँगी । आपका कीमती समय खराब नहीं करूँगी । मेरे पास अदृश्य बाधा पीङा के अपनी बेटी के कुछ वीडियो क्लिप्स हैं । आप अपना ई मेल मुझे बता दें । मैं वे क्लिप्स और खास प्वाइंट आपको लिखकर भेज दूँगी । प्लीज आप उन्हें नजर अन्दाज न करना । और किसी की जिन्दगी मौत का सवाल जानकर देखना । और फ़िर आपको मेरी बात सही लगे । खुद विश्वास आये ।

तो ये बात आप अपने सर तक पहुँचा देना । मेरा मतलब मेरे मेल का मैटर आप उन्हें ई मेल कर देना । बाकी मेरी बेटी के भाग्य में जो होगा । जिन्दगी या मौत । ये फ़ैसला तो रब्ब के हाथ ही होता है । कहते कहते राजवीर कुछ भावुक सी हो गयी थी । और उसने सुबकते हुये फ़ोन स्वयँ ही रख दिया था ।
काश ! वह देख पाती । दूसरी तरफ़ उस भावुक लङकी की नीली आँखों में आँसू झिलमिला उठे थे । उसने न सिर्फ़ अपना ई मेल बताया था । बल्कि अगले चार घण्टे में तीन बार क्लिप्स की उत्सुकता में मेल चेक किया था । तब चार घण्टे बाद उसे 14 वीडियो क्लिप मेल से मिले । और एक दो क्लिप देखकर ही वह मामले की गम्भीरता और प्रसून के लिये उसका महत्व समझ गयी । उसने न सिर्फ़ तुरन्त प्रसून को ज्यों का त्यों वह मेल भेजा । बल्कि वह तुरन्त देखे । इस हेतु उसे साथ के साथ फ़ोन भी किया । और फ़िर वो फ़ोन जिस पर हजार कोशिश के बाद लोगों की बात मुश्किल से हो पाती थी । अगले चार सेकेण्ड में पहली बार में ही उसकी बात हुयी । प्रसून इस ईसाई लङकी की समझदारी का बेहद कायल था । जहाँ उसमें बच्चों सा भोलापन भी था । वहीं गजब की समझदारी भी थी ।
उस समय वह विदेश में था । और संयोगवश अभी अभी ही काम से फ़्री हुआ था । और भी डबल संयोगवश उस समय वह नेट पर ही बैठा था । जब उसे अल्ला बेबी का फ़ोन पहुँचा । बेबी ने बङे भावुक स्वर में रिकवेस्ट की थी - प्लीज सर । अभी देखें । बात खास है ।
ओ के डियर कहकर वह क्लिप देखने लगा था । और सबसे पहले तो जस्सी को देखकर ही चौंक गया था । क्या बला की सुन्दरी थी । नेचुरल ब्यूटी । सुन्दरता की देवी । वीनस की प्रतिमा । उसने अपने आपको कंट्रोल किया । और क्लिप को गम्भीरता से देखने लगा । उसने अल्ला बेबी को मन ही मन लाख थेंक्स बोला । और 14 क्लिप देखने में टाइम खराब न करते हुये तुरन्त नम्बर डायल किया ।
राजवीर पर तो मानों भगवान स्वयं ही मेहरवान हुआ था । क्लिप भेजने के महज 50 मिनट बाद उसके फ़ोन की घण्टी बज उठी थी । और तब तो वह एकदम से उछल ही पङी । जब दूसरी तरफ़ से उसे बहुत मधुर और संतुलित स्वर सुनाई दिया - हल्लो ! मैं प्रसून बोल रहा हूँ ।
और फ़िर सीधा ही वह यहाँ आ गया था । उसने महसूस किया था । जस्सी सिगरेट को पसन्द नहीं करती थी । पर बोलती कुछ नहीं थी । उसने सिगरेट नीचे उछाल दी । क्या गजब लग रही थी वह । उसके गीले से लम्बे बाल कन्धों पर लहरा रहे थे । बिना किसी मेकअप के वह गजब ढा रही थी । और सबसे बङी बात प्रसून को उसमें प्रेमिका नजर आ रही थी ।
वह उससे नजरें चुरा रहीं थी । और चोरी चोरी कनखियों से उसे देख रही थी । संभवत कल के अभिसारी क्षण उसे

बारबार याद आते थे । तब तुरन्त ही उसके गोरे गुलाबी गालों पर शर्म की लाली सी दौङ जाती थी । पर एक लङकी की परेशानी शायद वह समझ नहीं पा रहा था । उसे कल के मिलन की वजह से चलने में खास परेशानी थी । इसलिये वह बहुत धीरे धीरे संभलकर चल रही थी । और खास ध्यान रख रही थी कि उसकी चाल का बदला्व किसी के नोटिस में ना आये । पर इसके बाद भी वह अभी भी प्रसून द्वारा उसे बाँहों में लेकर चूमने की प्रेममयी कल्पना कर रही थी ।
वह जानता था । संसार ही कल्पनाओं में जीता है । पर सबकी कल्पनायें उनकी अपनी भावनाओं के अनुसार अलग अलग होती है । बराङ दम्पत्ति उसको जमाई बनाने की कल्पना में खोये हुये थे । जस्सी अपनी कल्पना में उसकी महबूबा बनी हुयी थी । और उसकी कल्पना सिर्फ़ उस रहस्य के लिये भटक रही थी । जिसके अदृश्य तार जस्सी से जुङ रहे थे । ऐसे आखिर वह कब तक वहाँ रुका रह सकता था । मगर दूसरे उसने ये भी तय कर लिया था । चाहे जो हो जाये । इस रहस्य का पता लगाकर ही जायेगा । खेल को खत्म करके ही जायेगा ।
उसने देखा । बालों को हौले हौले सुखाती हुयी जस्सी उसके एकदम करीब आने से बच रही थी । और बारबार करीब भी आ रही थी । इकरार भी । इंकार भी । इजहार भी । मनुहार भी । सभी एक साथ । एक ही समय में । अजीव होती हैं । ये लङकियाँ भी । उसने सोचा । और फ़िर शरारत के अन्दाज में बोला - नाराज हो मुझसे । कल की वजह से ।
- ब्रेकफ़ास्ट ! वह तिरछी निगाहों से परे देखती हुयी बोली - ब्रेकफ़ास्ट कर लीजिये । अब नीचे चलिये ।
कहकर वह तेजी से सीङियाँ उतरती चली गयीं । हठात प्रसून उसके गोल आकर्षक नितम्बों में पङते हुये बल देखता रहा । वह बार बार इस लङकी के प्रति क्यों आकर्षित हो रहा था - उसके चेहरे को ओक में भर लूँ । ज़िंदगी को इस तरह पिया जाएगा ।
वह जानता था । बराङ साहब उससे बात करने के खास इच्छुक थे । पर अभी तक ऐसा कोई संयोग नहीं बन पाया था । वह जानता था । वे क्या बात करेंगे । और फ़िर वह क्या जबाब देगा । जो भी हो सज्जनता यही कहती थी कि उनके दिल की बात भी सुनना चाहिये । उसे महत्व भी देना चाहिये । सो वह नाश्ते पर उनके सामने बैठा था । सामने ही जस्सी और उसके बगल में राजवीर बैठी थी ।
- देखिये प्रसून जी ! बराङ बोला - धर्म और अलौकिक बातों के प्रति मेरी सोच कुछ अलग ही है । वैसे मैं भी और सिखों की तरह गुरुद्वारा जाता हूँ । दिल में कहीं न कहीं उस परम्परा का सम्मान भी करता हूँ । पर जाने क्यों मुझे लगता है । ये मन्दिर मस्जिद गुरुद्वारा चर्च जाना महज एक सामाजिक गतिविधि सी बनकर रह गया है । जिस तरह इंसान मेले नुमायश देखने जाता है । और कहीं भी धर्मस्थल देखकर अपनी जाति धर्म से मिले संस्कारवश उसे मत्था टेकता है । तो कोई अलग बात नहीं । मैं भी ऐसा करता हूँ । पर जाने क्यों मैं दिली तौर पर नास्तिक ही हूँ । और नास्तिक होने में ही सुख पाता हूँ । फ़िर जाने क्यों मुझे ऐसा भी लगता है कि मैं धर्म को नहीं मानता । इसलिये बहुत बङा बेबकूफ़ हूँ । मगर दूसरे ही पल मुझे अहसास होता है कि मैं इस प्रचलित परम्परागत धर्म को कट्टरता से मान रहा होता । तो शायद उससे भी बङा बेबकूफ़ होता । मैं दोनों ही तरफ़ से खुद को बेबकूफ़ सा महसूस करता हूँ ।
तभी जस्सी शरारत से बोली - डैडी ! 1 बार 1 सरदार था.. आगे बोलूँ क्या ?
अभी प्रसून इस बात को ठीक से समझ नहीं पाया था कि राजवीर जस्सी की पीठ में धौल मारती हुयी जोर से हँसी । वह पानी का घूँट मुँह में भरे हुये थी । जो उसकी हँसी के साथ फ़व्वारे के रूप में सीधा बराङ साहब के ऊपर गिरा । फ़िर वे दोनों माँ बेटी ठहाका मारते हुये हँसने लगी । बराङ भी मुक्त भाव से हँसा । पर वह नहीं हँसा ।