कामवासना

Horror stories collection. All kind of thriller stories in English and hindi.
007
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Re: कामवासना

Unread post by 007 » 10 Dec 2014 04:49

उसके मुर्दा जिस्म में वह अचानक प्राण बन कर आया था । और खुशियाँ जैसे अचानक उस रात उसकी झोली में आ गिरी थी । जैसे भाग्य की देवी मेहरबान हुयी हो ।
- खाना । वह कमजोर स्वर में बोला - मुझसे खाना भी न खाया गया । मैं भूखा हूँ ।
उसके आँसू निकल आये । अब खाना कहाँ से लाये वो । खाना तो उसने शाम को ही फ़ेंक दिया था । और जीने में ताला लगा था । खाने का कोई उपाय ही न था । वेवशी में वह रोने को हो आयी । और अभी कुछ कहना ही चाहती थी ।
- चल । वह कुछ खोलता हुआ सा बोला - हम दोनों खाना खाते हैं । माँ ने हम दोनों के लिये पराठें बनाये हैं । बहुत सारे ।
दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम । वो भूखा उठाता अवश्य है । पर भूखा सुलाता नहीं । जलचर जीव बसे जल में । उनको जल में भोजन देता । नभचर जीव बसे नभ में । उनको नभ में भोजन देता । कहीं भी कैसी भी कठिन से कठिन स्थिति हो । वो भूखे को भोजन देता है । वो अपने बच्चों को भूखा नहीं देख सकता । भूखा नहीं रहने देता । फ़िर दो प्रेमियों को कैसे रहने देता ?
नीबू के अचार से वो माँ की ममता के स्वादिष्ट पराठें एक दूसरे को अपने हाथ से खिलाने लगे । वो खा रहे थे । और निशब्द रो रहे थे । आँसू जैसे उनके दिल का सारा गम ही धोने में लगे थे ।
- विशाल । वह निराशा से बोली - हमारा क्या होगा ? हम कैसे मिल पायेंगे ।
- तू चिन्ता न कर । वह उसको थपथपा कर बोला - हम यहाँ से भाग जायेंगे । बहुत दूर । फ़िर हमें कोई जुदा न कर पायेगा ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । रात की रानी उसको अकेला देख कर बात करती हुयी बोली ।
- कभी नहीं । वह चंचल मुस्कान से उत्तर देते हुये बोली - कैसे भूल सकती हूँ ।
कहाँ और किस हाल में होगा वह ? उसने टहलते हुये सोचा । उस रात तब उसकी जान में जान आयी । जब दो घन्टे बाद वह सकुशल वापिस उतर कर चला गया । और कहीं कैसी भी गङबङ नहीं हुयी । पर अभी आगे का कुछ पता न था । क्या होगा ? कैसे होगा ? कोई उपाय भी न था । जिससे वह कुछ खोज खबर रख सकती थी ।
उसकी रात ऐसे ही टहलते हुये बीतती थी । उसकी माँ भाभी घर के और लोग उसकी हालत जानते थे । लेकिन शायद कोई कुछ न कर सकता था । सब जैसे अपने अपने दायरों में कैद थे । दायरे । सामाजिक दायरे । जैसे वह छत के दायरे में कैद थी ।

प्यार उसे आज कैसे मोढ पर ले आया था । प्यार से पैदा हुयी तनहाई । जुदाई से पैदा हुयी तङप । विरह से पैदा हुयी कसक । शायद आज उसे वास्तविक प्यार से रूबरू करा रही थी । वास्तविक प्यार । जिसमें लङके को सुन्दर लङकी का खिंचाव नहीं होता । लङकी को उसके पौरुषेय गुणों के प्रति आकर्षण नहीं होता । यह सब तो वह देख ही नहीं पाते थे । सोच ही नहीं पाते थे । वह तो मिलते ही एक दूसरे की बाहों में समा जाते । और एक दूसरे की धङकन सुनते । बस इससे ज्यादा प्यार का मतलब ही उन्हें न पता था ।
दैहिक वासना ने जैसे उनके प्यार को छुआ भी न था । उस तरफ़ उनकी भावना तक न जाती थी । कभी कोई ख्याल तक न आता ।
उसने उसके वक्षों पर कभी वासना युक्त स्पर्श तक न किया था । उसने कभी वासना से उसके होंठ भी न चूमे थे । उसने कभी जी भर कर उसका चेहरा न देखा था । उसकी आँखों में आँखें न डाली थी । और खुद उसे कभी ऐसी चाहत न हुयी कि वह ऐसा करे । फ़िर उनके बीच किस प्रकार के आकर्षण का चुम्बकत्व था ? जो वे घन्टों एक दूसरे के पास बैठे एक अजीब सा सुख महसूस करते थे । बस एक दूसरे को देखते हुये । एक दूसरे की समीपता का अहसास ।

मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । रात में जागने वाली टिटहरी उससे बोली ।
- हाँ री । वह प्यार से बोली - तू सच कहती है । नहीं भूलूँगी । कभी नहीं ।
क्या अजीब होता है ये प्यार भी । क्या कोई जान पाया । उसने टहलते हुये सोचा । शायद यही होता है प्यार । जो आज उसने इस नजरबन्दी में महसूस किया । प्यार पे जब जब पहरा हुआ है । प्यार और भी गहरा गहरा हुआ है । ये दुनियावी जुल्म उसे प्यार से दूर करने के लिये किया गया था । पर क्या ये पागल दुनियाँ वाले नहीं जानते थे । इससे उसका प्यार और भी गहरा हुआ था । अब तो उसकी समस्त सोच ही सिर्फ़ विशाल पर ही जाकर ठहर गयी थी । सिर्फ़ विशाल पर ।
प्यार तो जैसे दो शरीरों का नहीं । दो रूहों का मिलन होता है । जन्म जन्म से एक दूसरे के लिये प्यासे दो इंसान । सदियों से एक दूसरी की तलाश में भटकते हुये । फ़िर कभी किसी जन्म में जब मिलते हैं । एक दूसरे को पहचान लेते हैं । और एक दूसरे की ओर खिंचने लगते हैं । और एक दूसरे के आकर्षण में जैसे किसी अदृश्य डोर से बँध जाते हैं ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । रात में फ़ैली खामोशी बोली ।
- हाँ । वह शून्य 0 में देखती हुयी बोली - प्यार नहीं भुलाया जा सकता ।
- बेटी । उसकी माँ बोली - आखिर तूने क्या सोचा । ऐसा कब तक चलेगा ।
- माँ ! वह उस उदास रात में छत पर टहलती हुयी भावहीन सी कहीं खोयी खोयी उसको देखते हुये बोली - शायद तुम प्यार को नहीं जानती । प्यार क्या अजीव शै है । इसे सिर्फ़ प्रेमी ही जान सकते हैं । प्यार की कीमत सिर्फ़ प्रेमी ही जान सकते हैं । जिसके दिल में प्यार ही नहीं । वो इसे कभी नहीं समझ सकते । हाँ माँ कभी नहीं समझ सकते ।
प्यार के लिये तो । वह मुँडेर पर हाथ रख कर बोली - अगर जान भी देनी पङे । तो भी प्रेमी खुशी खुशी सूली चढ जाते हैं । प्यार की ये शमा अपने परवाने के लिये जीवन भर जलती ही रहती है । पर..पर तुम दुखी न हो माँ । मुझे तुझसे और अपने बाबुल से कोई शिकायत नहीं । शायद विरहा की जलन में सुलगना हम प्रेमियों की किस्मत में ही लिखा होता है ।
मजबूर सी ठकुराइन यकायक रो पङी । उसने अपनी नाजों पली बेटी को कस कर सीने से लगा लिया । और फ़ूट फ़ूट कर रोने लगी । वह दीवानी सी इस पगली मोहब्बत को चूम रही थी । उसकी फ़ूल सी बेटी के साथ अचानक क्या हुआ था । उसकी किस्मत ने एकाएक कैसा पलटा खाया था ।
- हे प्रभु ! उसने दुआ के हाथ उठाये - मेरी बेटी पर दया करना । दया करना प्रभु । इसके जीवन की गाङी कैसे चलेगी ।

छुक..छुक..छुक का मधुर संगीत गुनगुनाती रेल मानों प्यार की पटरी पर दौङते हुये मंजिल की ओर जाने लगी । किसी बुरे ख्वाव की तरह दुखद अतीत जैसे पीछे छूट रहा था । उसने खिङकी से बाहर झाँका ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । ट्रेन के साथ साथ तेजी से पीछे छूटते हुये पेङ बोले ।
- हाँ हाँ नहीं भूलूँगी । वह शोख निगाहों से बोली - कभी नहीं ।
जिन्दगी का सफ़र भी जैसे रेल की तरह उमृ की पटरी पर दौङ रहा है । गाङी दौङने लगी थी । किसी समाज समूह की तरह अलग अलग मंजिलों के मुसाफ़िर अपनी जगह पर बोगी में बैठ गये थे । रोमा के सामने ही एक युवा प्रेमी लङका खिङकी से बाहर झांकता हुआ अपने मोबायल पर बजते गीत भाव में बहता हुआ अपनी प्रेमिका की याद में खोया हुआ था - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । प्यार क्या शै है मियाँ.. प्यार की कीमत जानो । प्यार कर ले कोई उसे । तो गनीमत जानो । ये दुनियाँ प्यार के किस्से । ये दुनियाँ प्यार के किस्से । मुझे जब भी सुनाती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है ।
- बेटी । उसकी माँ बोली - जिद्दी ठाकुर ने फ़ैसला किया है । तुझे शहर के मकान में रखेंगे । तू वहीं रह कर अपनी पढाई करेगी । आखिर तुझे कब तक यूँ कैद में रखें । मुझे दुख है । भगवान ने जाने क्या तेरी किस्मत में लिखा है ।
- माँ । वह भावहीन स्वर में बोली - हम प्रेमियों की किस्मत भगवान नहीं लिखते । प्रेमी स्वयं अपनी किस्मत लिखते हैं । प्रेमियों की जिन्दगी के प्रेम गृन्थ के हर पन्ने पर सिर्फ़ प्रेम लिखा होता है । एक दूसरे के लिये मर मिटने का प्रेम ।
वह ठाकुर की पत्नी थी । लेकिन उससे ज्यादा उसकी माँ थी । अपनी पगली दीवानी लङकी के लिये वह क्या करे ।
जिससे उसे सुख हो । शायद वह किसी तरह भी न सोच पा रही थी ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । खिङकी से नजर आते गाँव बोले ।
- तुम ठीक कहते हो । वह प्यार से बोली - नहीं भूलूँगी ।
न चाहते हुये भी उस विरहा गीत के मधुर बोल फ़िर उसे खींचने लगे । किस प्रेमी के दिल की तङप थी यह - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । कभी खुशबू भरे खत को सिरहाने रख कर सोती थी । कभी यादों में बिस्तर से लिपट कर खूब रोती थी । कभी आँचल भिगोती थी । कभी तकिया भिगोती थी । कभी तकिया भिगोती थी । ये उसकी सादगी है जो । ये उसकी सादगी है जो । हमें अब भी रुलाती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है ।
जुदाई में याद की तङप से और भी तङपाते मधुर गीत ने डिब्बे में एक सन्नाटा सा कर दिया था । हरेक को जैसे अपना प्रेमी याद आ रहा था । लङके के चेहरे पर प्रेम उदासी फ़ैली हुयी थी । ठीक सामने बैठी सुन्दर जवान लङकी रोमा तक में उसकी कोई दिलचस्पी न थी । उसने उसे एक निगाह तक न देखा था । और अपनी प्रेमिका की विरह याद में खोया वह लगातार खिङकी से बाहर ही देख रहा था । पता नहीं इसकी प्रेमिका कहाँ थी ? उसने सोचा । और पता नहीं उसका प्रेमी कहाँ था ?
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । गीत के बोलों में प्रेमियों की रूह बोली ।
- नहीं भूलूँगी । वह गुनगुनाई - मैं नहीं भूल सकती ।
दीन दुनियाँ से बेखबर वह प्रेमी नम आँखों से जैसे रेल के सहारे दौङती अधीर प्रेमिका को ही देख रहा था । दोनों की एक ही बात थी । उसकी कल्पना में प्रेमी था । और उसकी कल्पना में उसकी प्रेमिका - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम ।

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Re: कामवासना

Unread post by 007 » 10 Dec 2014 04:50

चली आती थी मिलने के लिये । मुझे वो बहाने से । गुजरती थी कयामत । दिल पर उसके लौट जाने से । मुझे बेहद सुकूं मिलता । हाँ उसके मुस्काराने से । उतर कर चाँदनी सी जब वह । छत पर मुस्कराती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । खिङकी से नजर आते बच्चे हाथ हिलाकर बोले ।
- ना ना । वह मुस्करा कर बोली - नहीं भाई । कैसे भूलूँगी ।
प्रेमियों को ये दुनियाँ शायद कभी नहीं समझ सकती । डिब्बे में आते जाते लोग अपनी अपनी धुन में खोये हुये थे । जैसे सबको अपनी मंजिल पर पहुँचने का इंतजार हो । शायद उनमें से बहुतों की मंजिल कुछ ही आगे आनी वाली थी । लेकिन उसकी मंजिल तक पहुँचने के लिये गाङी कैसे टेङे मेङे रास्तों पर और जायेगी । उसे पता न था । कुछ भी पता न था । वो अभी भी किसी कैदी की भांति एक जेल से दूसरी जेल में जा रही थी । लेकिन क्या सारे प्रेमियों की कहानी एक ही होती है ? फ़िर क्यों उन दोनों को ये प्रेम गीत अपना ही गीत लग रहा था । हाँ बिलकुल अपना - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना वो मेरा नाम । वो मेरा नाम । वो मेरा नाम गीतों के । बहाने गुनगुनाती थी । मैं रोता था तो वो भी आँसुओं में डूब जाती थी । मैं हँसता था तो मेरे साथ । वो भी मुस्कराती थी । वो भी मुस्कराती थी । अभी तक याद उसकी प्यार के मोती लुटाती है । वो लङकी याद आती है ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । गाङी में चढती हुयी छात्र लङकियाँ बोली ।
- ना भई ना । वह अदा से बोली - कैसे भूलूँगी भला ।
- समय । उसकी माँ बोली - ये क्रूर समय इंसान को बङी से बङी अच्छी बुरी बात भुला देता है । मुझे उम्मीद है बेटी । समय के साथ साथ तू अपना अच्छा बुरा खुद सोच पायेगी । देख बेटी । किसी भी इंसान को उसका मनचाहा हमेशा नहीं मिलता । जिन्दगी के रास्ते बङे टेङे मेङे हैं । उतार चढाव वाले हैं । तू अभी कमसिन है । नादान है । तुझे जिन्दगी की समझ नहीं । उसकी हकीकत से तेरा अभी कोई वास्ता नहीं ।
जिन्दगी की हकीकत । क्या है जिन्दगी की हकीकत ? वह नहीं जानती थी । बस उसे प्यार की हकीकत पता थी । इस प्यार के रोग की सिर्फ़ वह अकेली तो रोगी नहीं थी । ये लङका भी था । जिसे उसी की तरह दीन दुनियाँ से कोई मतलब न रहा था । मतलब था । तो ख्यालों में मचलती अपनी हसीन प्रेमिका से - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । जहाँ मिलते थे दोनों । वो ठिकाना याद आता है । वफ़ा का दिल का चाहत का । फ़साना याद आता है कि उसका ख्वाव में आकर । सताना याद आता है । सताना याद आता है । वो नाजुक नर्म अकेली अब भी । मुझको खुद बुलाती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है । वो लङकी याद आती है ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । रास्ते में आये शहर बोले ।
- ओ हो.. नहीं नहीं । वह उस उदास प्रेमी को देखती हुयी बोली - हाँ नहीं भूलूँगी ।
- माँ । वह बोली - मैं कोशिश करूँगी कि सबका साथ निभा सकूँ । तेरा । बाबुल का । अपने राँझे का । देख ना माँ । अगर मैं बेवफ़ाई करूँगी । तो सच्चे प्रेमी बदनाम हो जायेंगे । प्रेमियों के अमर किस्से झूठे हो जायेंगे । फ़िर एक लङका लङकी आपस में प्रेम करना ही छोङ देंगे । सबका प्रेम से विश्वास जो उठ जायेगा । तुम बताओ माँ । क्या गलत कह रही हूँ मैं ? माँ इस दुनियाँ में प्रेम ही सत्य है । बाकी रिश्ते झूठे हैं ।
अगर ये सत्य न होता । उसके दिल ने कहा । तो फ़िर इस दुनियाँ में इतने प्रेम गीत भला क्यों गूँजते । सृष्टि के कण कण में गूँजते प्रेम गीत - तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । तुम ताना तुम । तुम ताना तुम । धीम धीम तन न ना । वो कालिज का जमाना मुझे नश्तर चुभोता है । और उसकी याद का सावन । किताबों को भिगोता है । अकेले में अभी मुझको । यही महसूस होता है कि जैसे आज भी..कि जैसे आज भी । कालिज में पढने रोज जाती है ।
- मितवाऽऽ ..भूलऽऽ न जानाऽऽ । उदास खामोश सूना सूना घर उससे बोला ।
- अरे नहीं । वह प्रेमियों की मन पसन्द तनहाई में विचरती हुयी बोली - नहीं भूल पाऊँगी ।
विरहा की आग ने उस प्रेमिका को जलाते हुये उसकी मोहब्बत को दीवानगी में बदल दिया था । वह पगली हो गयी थी । दीवानी हो गयी थी । समस्त प्रेमियों की आत्मा जैसे उसमें समा गयी थी । अब वह रोमा न रही थी । लैला हो गयी । हीर हो गयी । शीरी । जुलियट हो गयी । ये जुदाई । ये तन्हाई । ये सूनापन उसका साथी था । बङा ही प्यारा साथी । क्योंकि यहाँ उसकी कल्पना में बेरोक टोक उसका प्रेमी उसके साथ था । शायद यही प्रेम है । शायद यही प्रेम है ।
उसने एक बार घूम फ़िर कर पहले से ही देखे हुये अपने उस बाप दादा के घर को देखा । और नल से मुँह धोने बङी ।
तभी मुख्य दरवाजे पर दस्तक हुयी । आश्चर्य से उसने दरवाजा खोला । और फ़िर उसका मुँह खुला का खुला रह गया । दरवाजे पर विशाल खङा था । सूनी सूनी आँखों से उसे ताकता हुआ ।
- तुम । वह भौंचक्का होकर बोली ।
- जिन्दा रहने के लिये । वह बेहद कमजोर स्वर में बोला - तेरी कसम । एक मुलाकात जरूरी है सनम । हाँ रोमा । मैं तेरे साथ ही आया हूँ । उसी ट्रेन से । पर तू अकेली नहीं थी । इसलिये तेरे पास नहीं आया । मुझे पता चल गया था । ठाकुर साहब तुझे शहर भेज रहे हैं । जहाँ तेरा पुश्तैनी मकान है । फ़िर मैं यहाँ आ गया ।
और फ़िर स्वाभाविक ही वे एक दूसरे से लिपट गये । उन्होंने अब तक जो नहीं किया था । वो खुद हुआ । उनके होंठ आपस में चिपक गये । और वे एक दूसरे को सहलाते हुये पागलों की भांति चूमने लगे ।
- ये घर । रोमा बिस्तर ठीक करती हुयी उसे आराम से बैठाकर बोली - हमारी पुरानी जायदाद है । जिसका इस्तेमाल अब हमारे कारोबार के सामान आदि रखने के लिये गोदाम के रूप में किया जाता है । इसकी बन्द घर जैसी बनाबट भी किसी गोदाम के समान ही है । और इसमें सबसे अच्छी बात है । वह कमरे में एक निगाह डालकर बोली - यह तलघर । इसमें तुम आराम से छुप कर रह सकते हो । भले ही हमारे घर के लोग कभी कभी आते जाते बने रहे ।
पर दीवानों को ये सब कहाँ सुनायी देता है । वह तो अपलक उसे ही देखा जा रहा था । अपनी माशूका को । जिसे आज बहुत दिनों बाद देखने का मौका मिला था । बहुत दिनों बाद छूने का मौका मिला था । रोमा को छोङने आये
लोग उनके ट्रांसपोर्ट कारोबार आफ़िस चले गये थे । और शायद ही आज लौटते । रात को कोई नौकर भले ही आ जाता ।
शाम के चार बज चुके थे । उसने पूरी तरह से सुहागिन का श्रंगार किया था । और दरवाजा ठीक से लाक करके आराम से उसके पास तलघर में बैठी थी । आज उसने एक फ़ैसला किया था । पूरी सुहागिन होने का । आज वह अपना सर्वस्व उसे अर्पित कर देना चाहती थी । जिसकी विशाल को कोई ख्वाहिश न थी । पर उसको थी । और जाने कब से थी । क्या पता कल क्या हो जाये ? फ़िर उसके पास उन दोनों के मधुर मिलन की यादें तो थी । उसके मांग में सजी सिन्दूर की मोटी रेखा । माथे पर दमकती बिन्दियाँ । होंठों पर चमकती लाली । और हाथों में खनकते कंगन । उस एकदम नयी नवेली दुलहिन के लिये जैसे विवाह गीत गा रहे थे । वह खामोश तलघर उनके मधुर मिलन के इन क्षणों को यादगार बनाने के लिये जैसे बैचेन हो रहा था ।
उफ़ ! आज कितने मुद्दत के बाद यह समय आया था । जब वह अपने राँझे के सीने पर सर रख कर लेटी थी । और समय जैसे ठहर गया था । काफ़ी देर हो चुकी थी । और वह विशाल की तरफ़ से किसी पहल का इंतजार कर रही थी । पर वह उसकी पीठ सहलाता हुआ खामोश छत को देख रहा था । जैसे शून्य 0 में देख रहा हो । आखिरकार उसकी सांकेतिक चेष्टाओं से वह प्रभावित होने लगा । और उसने रोमा के ब्लाउज पर हाथ रखा ।
और तभी खट की आवाज से दोनों चौंक गये । उन्होंने घूमकर आवाज की दिशा में देखा । तलघर की सीङियों पर उसका बाप ठाकुर जोरावर सिंह एक आदमी के साथ खङा था । उसकी पत्थर सी सख्त आँखों में क्रूरता की पराकाष्ठा झलक रही थी । उसके हाथ में रिवाल्वर चमक रहा था । एक पल को रोमा के होश उङ गये । पर दूसरे ही पल उसके चेहरे पर दृढता चमक उठी ।
- तूने वचन भंग किया बेटी । वह भावहीन खुरदुरे स्वर में बोला - अब मैं मजबूर हुआ । अब दोष न दियो मुझे ।
वह बिस्तर से उठकर खङी हो गयी । और सूनी आँखों से उस प्यार के दुश्मन जल्लाद को देखने लगी । जिसके साथी के चेहरे पर हैरत नाच रही थी । यकायक उसे कुछ न सूझा । क्या करे । क्या न करे । रहम की भीख माँगे । या बेटी बाबुल से प्यार माँगे । कैसे और क्या माँगे । उस पत्थर दिल इंसान में कहीं कोई गुंजाइश ही नजर न आती थी ।
- पापा । फ़िर स्वतः ही उसके मुँह से निकला - वचन भंग हुआ । उसके लिये । मैं माफ़ी चाहती हूँ आपसे । पर ये मेरा प्यार है ।.. मैं क्या करूँ । हम दोनों एक दूजे के बिना नहीं रह सकते ।.. नहीं रह सकते बाबुल । अगर मारना ही है । तो उसको मारने से पहले मुझे मारना होगा । हम साथ जीयेंगे । साथ मरेंगे । और ये उस लङकी की आवाज है । जिसकी रगों में आपके ही खानदानी ठाकुर घराने का खून दौङ रहा है । हमारे जिस्म मर जायेंगे । पर हमारी मोहब्बत कभी नहीं मरेगी ।..पापा मैं तो आपकी बेटी ही हूँ । वह भर्रायी आवाज में बोली - आपने ही मुझे जन्म दिया बाबुल । आपकी ही गोद में खेलकर बङी हुयी हूँ । आप ही मार भी दोगे । तो क्या दुख । कैसा दुख ।
वाकई आज ये एक कमजोर लङकी की आवाज नहीं थी । ये मोहब्बत की बुलन्द आवाज थी । उसकी आवाज उस जालिम की आवाज को भी कमजोर कर रही थी । उसमें एक चट्टानी मजबूती थी । उसमें ठाकुरों के खून की गर्मी थी । जोरावर का रिवाल्वर वाला हाथ कांप कर रह गया ।
इतना सस्ता भी नहीं होता । दो इंसानों का जीवन । मारने का ख्याल करना अलग बात है । और मारना अलग बात । क्रोध में अँधा होकर क्या करने जा रहा था वह ? उसने सोचा । आखिर क्या गलती की उसकी मासूम बेटी ने ? जोरावर ये क्या अनर्थ करने जा रहा है तू । उसका कलेजा कांप कर रह गया । अन्दर ही अन्दर वह कमजोर पङने लगा ।
खुद ब खुद उसके दिमाग में उसके नन्हें बचपन की रील चलने लगी । जब वह अपनी फ़ूल सी बेटी को एक कंकङ चुभना भी बरदाश्त नहीं कर सकता था । वह अपनी ही गलती से गिर जाती थी । और वह आग बबूला होकर तमाम नौकरों को कोङे मारता था । आखिर मेरी बेटी गिरी तो गिरी क्यों । क्यों ? उसके मुँह से निकली बात आधी रात को भी पूरी की जाती । उसकी एक मुस्कान के लिये वह हीरे मोती लुटा डालता । कितने ख्वाव थे उसके । उसको अपने हाथों डोली में विदा करने के मधुर ख्यालों में वह कितनी बार रोया । और आज । आज क्या हो गया उसे ? अगर उसकी बेटी ने अपने सपनों का राजकुमार खुद चुना था । तो इसमें कौन सा आसमान टूट गया था । नहीं । वह ऐसा कभी नहीं कर सकता कि अपनी ही राजकुमारी को अपने ही हाथों से मार डाले ।
- हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह । उसके दिमाग में ठाकुरों के सख्त चेहरे अट्टाहास कर उठे - तेरी बेटी ने खानदान की नाक कटवा दी । एक गङरिया ही मिला तुझे दामाद बनाने को । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह । एक पाल लङका । हा ..हा..हा ठाकुरों ! तुम्हारी औरतें बाँझ हो गयी । अब ठाकुरों की बेटियाँ ऐसी जातियों में शादियाँ करेगी । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह । तेरी गर्दन नीची कर दी । इस नीच वैश्या लङकी ने । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह ।..अरे नहीं नहीं । ठाकुर जोरावर सिंह नहीं ।.. जोरावर गङरिया । जोरावर गङरिया ।. जोरावर पाल । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह ।. जोरावर पाल । हा ..हा..हा ठाकुर जोरावर सिंह ।