बाली उमर की प्यास compleet

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raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:15

बाली उमर की प्यास पार्ट--7

गतांक से आगे.......................

अगले पूरे दिन मैं अजीब कसंकस में रही; जब मैं अपनी प्यासी योनि की आग बुझाने के लिए हर जगह हाथ पैर मार रही थी तो कोई नसीब ही नही हुआ.. और जब अच्च्छा ख़ासा 'लल्लू' मेरे हाथों में आया तो मैं उसको अपनी योनि में घुस्वाने से डरने लगी.. अब किसी से पूछ्ति भी तो क्या पूछ्ति? दीदी अपनी ससुराल में थी.. किसी और से पूच्छने की हिम्मत हो नही रही थी..

पूरा दिन मेरा दिमाग़ खराब रहा .. और टूवुशन के टाइम बुझे मंन से ही पिंकी के घर चली गयी...

उस दिन मीनू बहुत उदास थी, .. कारण मुझे अच्छि तरह पता था.. तरुण की नाराज़गी ने उसको परेशान कर रखा था.. 2 दिन से उसने मीनू के साथ बात तक नही की थी...

"वो.. तरुण तुम्हे कहाँ तक छ्चोड़ कर आया था कल?" मीनू ने मुझसे पूछा.. पिंकी साथ ही बैठी थी.. तरुण अभी आया नही था...

"मेरे घर तक.. और कहाँ छ्चोड़ कर आता?" मैने उसकी और देख कर कहा और उसका बुझा हुआ चेहरा देख बरबस ही मेरे होंटो पर मुस्कान तेर गयी...

"इतना खुश क्यूँ हो रही है? इसमें हँसने वाली बात क्या है?" मीनू ने चिड कर कहा....

"अरे दीदी.. मैं आपकी बात पर थोड़े ही हँसी हूँ.. मैं तो बस यूँही..." मैं कहा और फिर मुस्कुरा दी...

"पिंकी.. पानी लाना उपर से...." मीनू ने कहा...

"जी, दीदी.. अभी लाई.. " कहकर पिंकी उपर चल दी...

"थोड़ा गरम करके लाना.. मेरा गला खराब है.." मीनू ने कहा और पिंकी के उपर जाते ही मुझे घूर कर बोली लगी," ज़्यादा दाँत निकालने की ज़रूरत नही है... मुझे तुम्हारे बारे में सब कुच्छ पता है.."

"अच्च्छा!" मैने खड़ी होकर अंगड़ाई सी ली और अपने भरे भरे यौवन का जलवा उसको दिखा कर फिर मुस्कुराने लगी.. मैं कुच्छ बोल कर उसको 'ठंडी' करने ही वाली थी कि अचानक तरुण आ गया.. मैं मंन की बात मंन में ही रखे मुस्कुरकर तरुण की और देखने लगी..

मीनू ने अपना सिर झुका लिया और मुँह पर कपड़ा लपेट कर किताब में देखने लगी... तरुण मेरी और देख कर मुस्कुराया और आँख मार दी.. मैं हंस पड़ी...

तरुण चारपाई पर जा बैठता. उसने रज़ाई अपने पैरों पर डाली और मुझे आँखों ही आँखों में उसी चारपाई पर बैठने का इशारा कर दिया...

वहाँ हर रोज पिंकी बैठी थी और मैं उसके सामने दूसरी चारपाई पर.. शायद तरुण मीनू को जलाने के लिए ऐसा कर रहा था.. मैं भी कहाँ पिछे रहने वाली थी.. मैने एक नज़र मीनू की और देखा और 'धुमम' से तरुण के साथ चारपाई पर बैठी और उसकी रज़ाई को ही दूसरी तरफ से अपनी टाँगों पर खींच लिया....

मैने मीनू की और तिर्छि नज़रों से देखा... वह हम दोनो को ही घूर रही थी... पर तरुण ने उसकी और ध्यान नही दिया....

तभी पिंकी नीचे आ गयी," नमस्ते भैया!" कहकर उसने मीनू को पानी का गिलास पकड़ाया.. मीनू ने पानी ज्यों का त्यों चारपाई के नीचे रख दिया....

पिंकी हमारे पास आई और हंसकर मुझसे बोली," ये तो मेरी सीट है..!"

"कोई बात नही पिंकी.. तुम यहाँ बैठ जाओ" तरुण ने उस जगह की और इशारा किया जहाँ पहले दिन से ही मैं बैठती थी....

"मैं तो ऐसे ही बता रही थी भैया.. यहाँ से तो और भी अच्छि तरह दिखाई देगा...." पिंकी ने हंसकर कहा और बैठ गयी....

उस दिन तरुण ने हमें आधा घंटा ही पढ़ाया और हमें कुच्छ याद करने को दे दिया..," मेरा कल एग्ज़ॅम है.. मुझे अपनी तैयारी करनी है.. मैं थोड़ी देर और यहाँ हूँ.. फिर मुझे जाना है.. तब तक कुच्छ पूच्छना हो तो पूच्छ लेना..." तरुण ने कहा और अपनी किताब खोल कर बैठ गया...

2 मिनिट भी नही हुए होंगे.. अचानक मुझे अपने तलवों के पास तरुण का अंगूठा मंडराता हुआ महसूस हुआ.. मैने नज़रें उठाकर तरुण को देखा.. वह मुस्कुराने लगा.. उसी पल मेरा ध्यान मीनू पर गया.. वह तरुण को ही देखे जा रही थी.. पर मेरे उसकी और देखने पर उसने अपना चेहरा झुका लिया..

मैने भी नज़रें किताब में झुका ली.. पर मेरा ध्यान तरुण के अंगूठे पर ही था.. अब वह लगातार मेरे तख़नों के पास अपना अंगूठा सताए हुए उसको आगे पिछे करके मुझे छेड़ रहा था...

अचानक रज़ाई के अंदर ही धीरे धीरे उसने अपनी टाँग लंबी कर दी.. मैने पिंकी को देखा और अपनी किताब थोड़ी उपर उठा ली....उसका पैर मेरी जांघों पर आकर टिक गया...

मेरी योनि फुदकने लगी.. मुझ पर सुरूर सा छाने लगा और मैने भी रज़ाई के अंदर अपनी टांगे सीधी करके उसका पैर मेरी दोनो जांघों के बीच ले लिया... चोरी चोरी मिल रहे इस आनंद में पागल सी होकर मैने उसके पैर को अपनी जांघों में कसकर भींच लिया...

तरुण भी तैयार था.. शायद उसकी मंशा भी यही थी.. वह मुझे साथ लेकर निकलने से पहले ही मुझे पूरी तरह गरम कर लेना चाहता होगा.. उसने अपने पैर का पंजा सीधा किया और सलवार के उपर से ही मेरी कछी के किनारों को अपने अंगूठे से कुरेदने लगा.. योनि के इतने करीब 'घुसपैठिए' अंगूठे को महसूस करके मेरी साँसें तेज हो गयी.. बस 2 इंच का फासला ही तो बचा होगा मुश्किल से... मेरी योनि और उसके अंगूठे में...

मीनू और पिंकी के पास होने के कारण ही शायद हल्की छेड़ छाड से ही मिल रहे आनंद में दोगुनी कसक थी... मैं अपनी किताब को एक तरफ रख कर उसमें देखने लगी और मैने अपने घुटने मोड़ कर रज़ाई को उँचा कर लिया.. अब रज़ाई के अंदर शैतानी कर रहे तरुण के पैरों की हुलचल बाहर से दिखयी देनी बंद हो गयी...

अचानक तरुण ने अंगूठा सीधा मेरी योनि के उपर रख दिया.. मैं हड़बड़ा सी गयी... योनि की फांकों के ठीक बीचों बीच उसका अंगूठा था और धीरे धीरे वो उसको उपर नीचे कर रहा था....

मैं तड़प उठी... इतना मज़ा तो मुझे जिंदगी में उस दिन से पहले कभी आया ही नही था.. शायद इसीलिए कहते हैं.. 'चोरी चोरी प्यार में है जो मज़ा' .. 2 चार बार अंगूठे के उपर नीचे होने से ही मेरी योनि छलक उठी.. योनिरस से मेरी कछि भी 'वहाँ' से पूरी तरह गीली हो गयी.... मुझे अपनी साँसों पर काबू पाना मुश्किल हो रहा था.. मुझे लग रहा था कि मेरे चेहरे के भावों से कम से कम मीनू तो मेरी हालत समझ ही गयी होगी...

'पर जो होगा देखा जाएगा' के अंदाज में मैने अपना हाथ धीरे से अंदर किया और सलवार के उपर से ही अपनी कछी का किनारा पकड़ कर उसको अपनी योनि के उपर से हटा लिया.....

मेरा इरादा सिर्फ़ तरुण के अंगूठे को 'वहाँ' और अच्छि तरह महसूस करना था.. पर शायद तरुण ग़लत समझ गया.. योनि के उपर अब कछी की दीवार को ना पाकर मेरी योनि का लिसलिसपन उसको अंगूठे से महसूस होने लगा.. कुच्छ देर वह अपने अंगूठे से मेरी फांकों को अलग अलग करने की कोशिश करता रहा.. मेरी हालत खराब होती जा रही थी.. आवेश में मैं कभी अपनी जांघों को खोल देती और कभी भींच लेती... अचानक उसने मेरी योनि पर अंगूठे का दबाव एक दम बढ़ा दिया....

इसके साथ ही मैं हड़बड़ा कर उच्छल सी पड़ी... और मेरी किताब छितक कर नीचे जा गिरी... मेरी सलवार का कुच्छ हिस्सा मेरी योनि में ही फँसा रह गया..

"क्या हुआ अंजू!" पिंकी ने अचानक सिर उठा कर पूचछा....

"हां.. नही.. कुच्छ नही.. झपकी सी आ गयी थी" मैने बात संभालने की कोशिश की...

घबराकर तरुण ने अपना पैर वापस खींच लिया... पर इस सारे तमाशे से हमारी रज़ाई में जो हुलचल हुई.. उस'से शायद मीनू को विश्वास हो गया कि अंदर ही अंदर कुच्छ 'घोटाला' हो रहा है...

अचानक मीनू ने 2-4 सिसकी सी ली और पिंकी के उठकर उसके पास जाते ही उसने फुट फुट कर रोना शुरू कर दिया...

"क्या हुआ दीदी?" पिंकी ने मीनू के चेहरे को अपने हाथों में लेकर पूचछा....

"कुच्छ नही.. ..तू पढ़ ले..." मीनू ने उसको कहा और रोती रही...

"बताओ ना क्या हो गया?" पिंकी वहीं खड़ी रही तो मुझे लगा कि मुझे भी उठ जाना चाहिए... मैने अपनी सलवार ठीक की और रज़ाई हटाकर उसके पास चली गयी," ये.. अचानक क्या हुआ आपको दीदी...?"

"कुच्छ नही.. मैं ठीक हूँ.." मेरे पूछ्ते ही मीनू ने हुल्‍के से गुस्से में कहा और अपने आँसू पौंच्छ कर चुप हो गयी....

मेरी दोबारा तरुण की रज़ाई में बैठने की हिम्मत नही हुई.. मैं पिंकी के पास ही जा बैठी...

"क्या हुआ अंजू? वहीं बैठ लो ना.." पिंकी ने भोलेपन से मेरी और देखा...

"नही.. अब कौनसा पढ़ा रहे हैं...?" मैने अपने चेहरे के भावों को पकड़े जाने से बचाने की कोशिश करते हुए जवाब दिया.....

मेरे अलग बैठने से शायद मीनू के ज़ख़्मों पर कुच्छ मरहम लगा.. थोड़ी ही देर बाद वो अचानक धीरे से बोल पड़ी," मेरे वहाँ तिल नही है!"

तरुण ने घूम कर उसको देखा.. समझ तो मैं भी गयी थी कि 'तिल' कहाँ नही है.. पर भोली पिंकी ना समझने के बावजूद मामले में कूद पड़ी..," क्या? कहाँ 'तिल' नही है दीदी...?"

मीनू ने भी पूरी तैयारी के बाद ही बोला था..," अरे 'तिल' नही.. 'दिल'.. मैं तो इस कागज के टुकड़े में से पढ़कर बोल रही थी.. जाने कहाँ से मेरी किताब में आ गया... पता नही.. ऐसा ही कुच्छ लिखा हुआ है.. 'देखना' " उसने कहा और कागज का वो टुकड़ा तरुण की और बढ़ा दिया...

तरुण ने कुच्छ देर उस कागज को देखा और फिर अपनी मुट्ठी में दबा लिया...

"दिखाना भैया!" पिंकी ने हाथ बढ़ाया...

"यूँही लिखी हुई किसी लाइन का आधा भाग लग रहा है....तू अपनी पढ़ाई कर ले.." तरुण ने कहकर पिंकी को टरका दिया....

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तरुण ने थोड़ी देर बाद उसी कागज पर दूसरी तरफ चुपके से कुच्छ लिखा और रज़ाई की साइड से चुपचाप मेरी और बढ़ा दिया... मैने उसी तरफ च्छुपाकर उसको पढ़ा.. 'प्यार करना है क्या?' उस पर लिखा हुआ था.. मैने कागज को पलट कर देखा.. दूसरी और लिखा हुआ था.... 'मेरे वहाँ 'तिल' नही है..'

दिल तो बहुत था योनि की खुजली मिटा डालने का.. पर 'मा' बन'ने को कैसे तैयार होती... मैने तरुण की ओर देखा और 'ना' में अपना सिर हिला दिया......

वह अपना सा मुँह लेकर मुझे घूर्ने लगा.. उसके बाद मैने उस'से नज़रें ही नही मिलाई....

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हमें चाइ पिलाकर चाची जाने ही वाली थी कि तरुण के दिमाग़ में जाने क्या आया," आओ मीनू.. थोड़ी देर तुम्हे पढ़ा दूं...! फिर मैं जाउन्गा...."

मीनू का चेहरा अचानक खिल उठा.. उसने झट से अपनी किताब उठाई और तरुण के पास जा बैठी...

मैं और पिंकी दूसरी चारपाइयों पर लेट गये.. थोड़ी ही देर बाद पिंकी के खर्राटे भी सुनाई देने लगे... पर मैं भला कैसे सोती?

पर आज मैने पहले ही एक दिमाग़ का काम कर लिया.. मैने दूसरी और तकिया लगा लिया और उनकी और करवट लेकर लेट गयी अपनी रज़ाई को मैने शुरू से ही इस तरह थोड़ा उपर उठाए रखा कि मुझे उनकी पूरी चारपाई दिखाई देती रहे....

आज मीनू कुच्छ ज़्यादा ही बेसब्र दिखाई दे रही थी.. कुच्छ 15 मिनिट ही हुए होंगे की जैसे ही तरुण ने पन्ना पलटने के लिए अपना हाथ रज़ाई से बाहर निकाला; मीनू ने पकड़ लिया.. मैं समझ गयी.. अब होगा खेल शुरू !

तरुण बिना कुच्छ बोले मीनू के चेहरे की और देखने लगा.. कुच्छ देर मीनू भी उसको ऐसे ही देखती रही.. अचानक उसकी आँखों से आँसू लुढ़क गये.. सच बता रही हूँ.. मीनू का मासूम और बेबस सा चेहरा देख मेरी भी आँखें नम हो गयी थी....

तरुण ने एक बार हमारी चारपाइयों की ओर देखा और अपना हाथ छुड़ा कर मीनू का चेहरा अपने दोनो हाथों में ले लिया.. मीनू अपने चेहरे को उसके हाथों में छुपा कर सुबकने लगी...

"ऐसे क्यूँ कर रही है पागल? इनमें से कोई उठ जाएगी.." तरुण ने उसके आँसुओं को पोन्छ्ते हुए धीरे से फुसफुसाया...

मीनू के मुँह से निकलने वाली आवाज़ भरी और भरभराई हुई सी थी..," तुम्हारी नाराज़गी मुझसे सहन नही होती तरुण.. मैं मर जाउन्गि.. तुम मुझे यूँ क्यूँ तडपा रहे हो.. तुम्हे पता है ना की मैं तुमसे कितना प्यार करती हूँ..."

मीनू की आँखों से आँसू नही थम रहे थे.. मैने भी अपनी आँखों से आँसू पौच्छे.. मुझे दिखाई देना बंद हो गया था.. मेरे आँसुओं के कारण...!

"मे कहाँ तड़पता हूँ तुम्हे? तुम्हारे बारे में कुच्छ भी सुन लेता हूँ तो मुझसे सहन ही नही होता.. मैं पागल हूँ थोड़ा सा.. पर ये पागलपन भी तो तुम्हारे कारण ही है जान.." तरुण ने थोड़ा आगे सरक कर मीनू को अपनी तरफ खींच लिया... मीनू ने आगे झुक कर तरुण की छाती पर अपने गाल टीका दिए..

उसका चेहरा मेरी ही और था.. अब उसके चेहरे पर प्रायपत सुकून झलक रहा था.. ऐसे ही झुके हुए उसने तरुण से कहा," तुम्हे अंजलि मुझसे भी अच्छि लगती है ना?"

"ये क्या बोल रही है पागल? मुझे इस'से क्या मतलब? मुझे तो तुमसे ज़्यादा प्यारा इस पूरी दुनिया में कोई नही लगता.. तुम सोच भी नही सकती कि मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ..." साला मगरमच्च्छ की औलाद.. बोलते हुए रोने की आक्टिंग करने लगा.....

मीनू ने तुरंत अपना चेहरा उपर किया और आँखें बंद करके तरुण के गालों पर अपने होन्ट रख दिए..," पर तुम कह रहे थे ना.. कि अंजू मुझसे तो सुंदर ही है.." तरुण को किस करके सीधी होते मीनू बोली...

"वो तो मैं तुम्हे जलाने के लिए बोल रहा था... तुमसे इसका क्या मुक़ाबला?" दिल तो कर रहा था कि रज़ाई फैंक कर उसके सामने खड़ी होकर पूच्छू.. कि 'अब बोल' .. पर मुझे तिल वाली रामायण भी देखनी थी.... इसीलिए दाँत पीस कर रह गयी...

"अब तक तो मुझे भी यही लग रहा था कि तुम मुझे जला रहे हो.. पर तब मुझे लगा कि तुम और अंजू एक दूसरे को रज़ाई के अंदर छेड़ रहे हो.. तब मुझसे सहन नही हुआ और मैं रोने लगी..." मीनू ने अपने चेहरे को फिर से उसकी छाती पर टीका दिया...

तरुण उसकी कमर में हाथ फेरता हुआ बोला,"छ्चोड़ो ना... पर तुमने मुझे परसों क्यूँ नही बताया कि तुम्हारे वहाँ 'तिल' नही है.. परसों ही मामला ख़तम हो जाता.."

"मुझे क्या पता था कि तिल है कि नही.. कल मैने..." मीनू ने कहा और अचानक शर्मा गयी...

"कल क्या? बोलो ना मीनू..." तरुण ने आगे पूचछा...

मीनू सीधी हुई और शरारत से उसकी आँखों में घूरती हुई बोली," बेशरम! बस बता दिया ना कि तिल नही है.. मेरी बात पर विस्वास नही है क्या?"

"बिना देखे कैसे होगा.. देख कर ही विश्वास हो सकता है कि 'तिल' है कि नही.." तरुण ने कहा और शरारत से मुस्कुराने लगा...

मीनू का चेहरा अचानक लाल हो गया..उसने तरुण से नज़रें चुराई, मिलाई और फिर चुरा कर बोली," देखो.. देखो.. तुम फिर लड़ाई वाला काम कर रहे हो.. मैने वैसे भी कल शाम से खाना नही खाया है.. !"

"लड़ाई वाला काम तो तुम कर रही हो मीनू.. जब तक देखूँगा नही.. मुझे विश्वास कैसे होगा? बोलो! ऐसे ही विश्वास करना होता तो लड़ाई होती ही क्यूँ? मैं परसों ही ना मान जाता तुम्हारी बात...." तरुण ने अपनी ज़िद पर आड़े रहकर कहा...

"तुम मुझे फिर से रुला कर जाओगे.. है ना?" मीनू के चेहरे का रंग उड़ सा गया...

तरुण ने दोनो के पैरों पर रखी रज़ाई उठाकर खुद औध ली और उसको खोल कर मीनू की तरफ हाथ बढ़ा कर बोला," आओ.. यहाँ आ जाओ मेरी जान!"

"नही!" मीनू ने नज़रें झुका ली और अपने होन्ट बाहर निकाल लिए...

"आओ ना.. क्या इतना भी नही कर सकती अब?" तरुण ने बेकरार होकर कहा...

"रूको.. पहले मैं उपर वाला दरवाजा बंद करके आती हूँ.." कहकर मीनू उठी और उपर वाले दरवाजे के साथ बाहर वाला भी बंद कर दिया.. फिर तरुण के पास आकर कहा," जल्दी छ्चोड़ दोगे ना?"

"आओ ना!" तरुण ने मीनू को पकड़ कर खींच लिया... मीनू हल्की हल्की शरमाई हुई उसकी गोद में जा गिरी....

रज़ाई से बाहर अब सिर्फ़ दोनो के चेहरे दिखाई दे रहे थे.. तरुण ने इस तरह मीनू को अपनी गोद में बिठा लिया था कि मीनू की कमर तरुण की छाती से पूरी तरह चिपकी हुई होगी.. और उसके सुडौल नितंब ठीक तरुण की जांघों के बीच रखे होंगे... मैं समझ नही पा रही थी.. मीनू को खुद पर इतना काबू कैसे है.. हालाँकि आँखें उसकी भी बंद हो गयी थी.. पर मैं उसकी जगह होती तो नज़ारा ही दूसरा होता...

तरुण ने उसकी गर्दन पर अपने होन्ट रख दिए.. मीनू सिसक उठी...

"कब तक मुझे यूँ तड़पावगी जान?" तरुण ने हौले से उसके कानों में साँस छ्चोड़ी...

"अया.. जब तक.. मेरी पढ़ाई पूरी नही हो जाती.. और घर वाले हमारी शादी के लिए तैयार नही हो जाते... या फिर... हम घर छ्चोड़ कर भाग नही जाते..." मीनू ने सिसकते हुए कहा...

मीनू की इस बात ने मेरे दिल में प्यार करते ही 'मा' बन जाने के डर को और भी पुख़्ता कर दिया....

"पर तब तक तो मैं मर ही जाउन्गा..!" तरुण ने उसको अपनी और खींच लिया...

मीनू का चेहरा चमक उठा..," नही मरोगे जान.. मैं तुम्हे मरने नही दूँगी.." मीनू ने कहा और अपनी गर्दन घुमा कर उसके होंटो को चूम लिया..

तरुण ने अपना हाथ बाहर निकाला और उसके गालों को अपने हाथ से पकड़ लिया.. मीनू की आँखें बंद थी.. तरुण ने अपने होन्ट खोले और मीनू के होंटो को दबा कर चूसने लगा... ऐसा करते हुए उनकी रज़ाई मेरी तरफ से नीचे खिसक गयी...

तरुण काफ़ी देर तक उसके होंटो को चूस्ता रहा.. उसका दूसरा हाथ मीनू के पेट पर था और वो रह रह कर मीनू को पिछे खींच कर अपनी जांघों के उपर चढ़ाने का प्रयास कर रहा था.. पता नही अंजाने में या जान बूझ कर.. मीनू रह रह कर अपने नितंबों को आगे खिसका रही थी....

तरुण ने जब मीनू के होंटो को छ्चोड़ा तो उसकी साँसे बुरी तरह उखड़ी हुई थी.. हाँफती हुई मीनू अपने आप को छुड़ा कर उसके सामने जा बैठी," तुम बहुत गंदे हो.. एक बार की कह कर.... मुश्किल से ही छ्चोड़ते हो.. आज के बाद कभी तुम्हारी बातों में नही आउन्गि..."

मीनू की नज़रें ये सब बोलते हुए लज़ाई हुई थी... उसके चेहरे की मुस्कान और लज्जा के कारण उसके गालों पर चढ़ा हुआ गुलाबी रंग ये बता रहा था कि अच्च्छा तो उसको भी बहुत लग रहा था... पर शायद मेरी तरह वह भी मा बन'ने से डर रही होगी.....

" देखो.. मैं मज़ाक नही कर रहा.. पर 'तिल' तो तुम्हे दिखाना ही पड़ेगा...!" तरुण ने अपने होंटो पर जीभ फेरते हुए कहा.. शायद मीनू के रसीले गुलाबी होंटो की मिठास अभी तक तरुण के होंटो पर बनी हुई थी.....

"तुम तो पागल हो.. मैं कैसे दिखाउन्गि तुम्हे 'वहाँ' .. मुझे बहुत शर्म आ रही है.. कल खुद देखते हुए भी मैं शर्मिंदा हो गयी थी..." मीनू ने प्यार से दुतकार कर तरुण को कहा....

"पर तुम खुद कैसे देख सकती हो.. अच्छि तरह...!" तरुण ने तर्क दिया...

"वो.. वो मैने.. शीशे में देखा था.." मीनू ने कहते ही अपना चेहरा अपने हाथों में छिपा लिया...

"पर क्या तुम.. मेरे दिल की शांति के लिए इतना भी नही कर सकती..." तरुण ने उसके हाथ पकड़ कर चेहरे से हटा दिए..

लज़ाई हुई मीनू ने अपने सिर को बिल्कुल नीचे झुका लिया," नही.. बता तो दिया... मुझे शर्म आ रही है...!"

"ये तो तुम बहाना बनाने वाली बात कर रही हो.. मुझसे भी शरमाओगी क्या? मैने तुम्हारी मर्ज़ी के बगैर कुच्छ किया है क्या आज तक... मैं आख़िरी बार पूच्छ रहा हूं मीनू.. दिखा रही हो की नही..?" तरुण थोड़ा तैश में आ गया....

मीनू के चेहरे से मजबूरी और उदासी झलकने लगी," पर.. तुम समझते क्यूँ नही.. मुझे शर्म आ रही है जान!"

"आने दो.. शर्म का क्या है? ये तो आती जाती रहती है... पर इस बार अगर मैं चला गया तो वापस नही आउन्गा... सोच लो!" तरुण ने उसको फिर से छ्चोड़ देने की धमकी दी....

मायूस मीनू को आख़िरकार हार मान'नि ही पड़ी," पर.. वादा करो की तुम और कुच्छ नही करोगे.. बोलो!"

"हां.. वादा रहा.. देखने के बाद जो तुम्हारी मर्ज़ी होगी वही करूँगा..." तरुण की आँखें चमक उठी.. पर शर्म के मारे मीनू अपनी नज़रें नही उठा पा रही थी....

"ठीक है.." मीनू ने शर्मा कर और मुँह बना कर कहा और लेट कर अपने चेहरे पर तकिया रख लिया..

उसकी नज़ाकत देख कर मुझे भी उस पर तरस आ रहा था.. पर तरुण को इस बात से कोई मतलब नही था शायद.. मीनू के आत्मसमर्पण करते ही तरुण के जैसे मुँह मैं पानी उतर आया," अब ऐसे क्यूँ लेट गयी.. शरमाना छ्चोड़ दो..!"

"मुझे नही पता.. जो कुच्छ देखना है देख लो.." मीनू ने अपना चेहरा ढके हुए ही कहा....," उपर से कोई आ जाए तो दरवाजा खोल कर भागने से पहले मुझे ढक देना.. मैं सो रही हूँ..." मीनू ने शायद अपनी झिझक च्चिपाने के लिए ही ऐसा बोला होगा.. वरना ऐसी हालत में कोई सो सकता है भला...

तरुण ने उसकी बात का कोई जवाब नही दिया.. उसको तो जैसे अलादीन का चिराग मिल गया था.. थोडा आगे होकर उसने मीनू की टाँगों को सीधा करके उनके बीच बैठ गया.. मुझे मीनू का कंपकँपता हुआ बदन सॉफ दिख रहा था...

अगले ही पल तरुण मीनू की कमीज़ उपर करके उसके समीज़ को उसकी सलवार से बाहर खींचने लगा.. शायद शर्म के मारे मीनू दोहरी सी होकर अपनी टाँगों को मोड़ने की कोशिश करने लगी.. पर तरुण ने उसकी टाँगों को अपनी कोहनियों के नीचे दबा लिया....

"इसको क्यूँ निकाल रहे हो? जल्दी करो ना.." मीनू ने सिसकते हुए प्रार्थना करी...

"रूको भी.. अब तुम चुप हो जाओ.. मुझे अपने हिसाब से देखने दो..." तरुण ने कहा और उसका समीज़ बाहर निकाल कर उसकी कमीज़ के साथ ही उसकी छातियो तक उपर चढ़ा दिया... लेती हुई होने के कारण मैं सब कुच्छ तो नही देख पाई.. पर मीनू का पाते भी मेरी तरह ही चिकना गोरा और बहुत ही कमसिन था.. चर्बी तो जैसे वहाँ थी ही नही.. रह रह कर वो उचक रही थी..

अचानक तरुण उस पर झुक गया और शायद उसकी नाभि पर अपने होन्ट रख दिए... मुझे महसूस हुआ जैसे उसके होन्ट मेरे ही बदन पर आकर टिक गये हों.. मैने अपना हाथ अपनी सलवार में घुसा लिया...

मीनू सिसक उठी," तुम देखने के बहाने अपना मतलब निकाल रहे हो.. जल्दी करो ना प्लीज़!"

"थोड़ा मतलब भी निकल जाने दो जान.. ऐसा मौका तुम मुझे दोबारा तो देने से रही... क्या करूँ.. तुम्हारा हर अंग इतना प्यारा है कि दिल करता है कि आगे बढ़ूँ ही ना.. तुम्हारा जो कुच्छ भी देखता हूँ.. उसी पर दिल आ जाता है...." तरुण ने अपना सिर उठाकर मुस्कुराते हुए कहा और फिर से झुकते हुए अपनी जीभ निकाल कर मीनू के पेट को यहाँ वहाँ चाटने लगा...

"ऊओ.. उम्म्म.. अयाया..." मीनू रह रह कर होने वाली गुदगुदी से उच्छलती रही और आँहें भारती रही... पर कुच्छ बोली नही...

अचानक तरुण ने मीनू का नाडा पकड़ कर खींच लिया और इसके साथ ही एक बार फिर मीनू ने अपनी टाँगों को मोड़ने की कोशिश की.. पर ज़्यादा कुच्छ वह कर नही पाई.. तरुण की दोनों कोहानियाँ उसकी जांघों पर थी.. वह मचल कर रह गयी," प्लीज़.. जल्दी देख लो.. मुझे बहुत शर्म आ रही है..." कहकर उसने अपनी टाँगें ढीली छ्चोड़ दी...

तरुण ने एक बार फिर उसकी बातों पर कोई ध्यान नही दिया..और उसकी सलवार उपर से नीचे सरका दी.. सलवार के नीचे होते ही मुझे मीनू की सफेद कछि और उसके नीचे उसकी गौरी गुदज जांघें थोड़ी सी नंगी दिखाई देने लगी...

तरुण उसकी जांघों के बीच इस तरह ललचाया हुआ देख रहा था जैसे उसने पहली बार किसी लड़की को इस तरह देखा हो.. उसकी आँखें कामुकता के मारे फैल सी गयी... तभी एक बार फिर मीनू की तड़पति हुई आवाज़ मेरे कानो तक आई," अब निकाल लो इसको भी.. जल्दी देख लो ना..."

तरुण ने मेरी पलक झपकने से पहले ही उसकी बात का अक्षरष पालन किया... वह कछि को उपर से नीचे सरका चुका था..," थोड़ी उपर उठो!" कहकर उसने मीनू के नितंबों के नीचे हाथ दिए और सलवार समेत उसकी कछि को नीचे खींच लिया....

तरुण की हालत देखते ही बन रही थी... अचानक उसके मुँह से लार टपाक कर मीनू की जांघों के बीच जा गिरी.. मेरे ख़याल से उसकी योनि पर ही गिरी होगी जाकर...

"मीनू.. मुझे नही पता था कि चूत इतनी प्यारी है तुम्हारी.. देखो ना.. कैसे फुदक रही है.. छ्होटी सी मछ्लि की तरह.. सच कहूँ.. तुम मेरे साथ बहुत बुरा कर रही हो.. अपने सबसे कीमती अंग से मुझको इतनी दूर रख कर... जी करता है कि...."

"देख लिया... अब मुझे छ्चोड़ो.." मीनू अपनी सलवार को उपर करने के लिए अपने हाथ नीचे लाई तो तरुण ने उनको वहीं दबोच लिया," ऐसे थोड़े ही दिखाई देगा.. यहाँ से तो बस उपर की ही दिख रही है..."

तरुण उसकी टाँगों के बीच से निकला और बोला," उपर टाँगें करो.. इसकी 'पपोती' अच्छि तरह तभी दिखाई देंगी..."

"क्या है ये?" मीनू ने कहा तो मुझे उसकी बातों में विरोध नही लगा.. बस शर्म ही लग रही थी बस! तरुण ने उसकी जांघें उपर उठाई तो उसने कोई विरोध ना किया...

मीनू की जांघें उपर होते ही उसकी योनि की सुंदरता देख कर मेरे मुँह से भी पानी टपकने लगा.. और मेरी योनि से भी..! तरुण झूठ नही बोल रहा था.. उसकी योनि की फाँकें मेरी योनि की फांकों से पतली थी.. पर बहुत ही प्यारी प्यारी थी... एक दम गौरी... हुल्के हुल्के काले बालों में भी उसका रसीलापन और नज़ाकत मुझे दूर से ही दिखाई दे रही थी... पतली पतली फांकों के बीच लंबी सी दरार ऐसे लग रही थी जैसे पहले कभी खुली ही ना हो.. पेशाब करने के लिए भी नही.. दोनो फाँकें आपस में चिपकी हुई सी थी...

अचानक तरुण ने उसकी सलवार और कछि को घुटनो से नीचे करके जांघों को और पिछे धकेल कर खोल दिया.. इसके साथ ही मीनू की योनि और उपर उठ गयी और उसकी दरार ने भी हल्का सा मुँह खोल दिया.. इसके साथ ही उसके गोल मटोल नितंबों की कसावट भी देखते ही बन रही थी... तरुण योनि की फांकों पर अपनी उंगली फेरने लगा...

"मैं मर जाउन्गि तरुण.. प्लीज़.. ऐसा ....मत करना.. प्लीज़.." मीनू हान्फ्ते हुए रुक रुक कर अपनी बात कह रही थी....

"कुच्छ नही कर रहा जान.. मैं तो बस छ्छू कर देख रहा हूं... तुमने तो मुझे पागल सा कर दिया है... सच.. एक बात मान लोगि...?" तरुण ने रिक्वेस्ट की...

"तिल नही है ना जान!" मीनू तड़प कर बोली....

"हां.. नही है.. आइ लव यू जान.. आज के बाद मैं तुमसे कभी भी लड़ाई नही करूँगा.. ना ही तुम पर शक करूँगा.. तुम्हारी कसम!" तरुण ने कहा..

"सच!!!" मीनू एक पल को सब कुच्छ भूल कर तकिये से मुँह हटा कर बोली.. फिर तरुण को अपनी आँखों में देखते पाकर शर्मा गयी...

"हां.. जान.. प्लीज़ एक बात मान लो..." तरुण ने प्यार से कहा...

"कियेययाया? मीनू सिसकते हुए बोली.. उसने एक बार फिर अपना मुँह छिपा लिया था...

"एक बार इसको अपने होंटो से चाट लूँ क्या?" तरुण ने अपनी मंशा जाहिर की....

अब तक शायद मीनू की जवान हसरतें भी शायद बेकाबू हो चुकी थी," मुझे हमेशा इसी तरह प्यार करोगे ना जान!" मीनू ने पहली बार नंगी होने के बाद तरुण से नज़रें मिलाई....

तरुण उसकी जांघों को छ्चोड़ कर उपर गया और मीनू के होंटो को चूम लिया," तुम्हारी कसम जान.. तुमसे दूर होने की बात तो मैं सोच भी नही सकता..." तरुण ने कहा और नीचे आ गया...

मैं ये देख कर हैरान रह गयी कि मीनू ने इस बार अपनी जांघें अपने आप ही उपर उठा दी....

तरुण थोड़ा और पिछे आकर उसकी योनि पर झुक गया... योनि के होंटो पर तरुण के होंटो को महसूस करते ही मीनू उच्छल पड़ी,"आअहह..."

"कैसा लग रहा है जान?" तरुण ने पूचछा...

"तुम कर लो..!" मीनू ने सिसकते हुए इतना ही कहा...

"बताओ ना.. कैसा लग रहा है.." तरुण ने फिर पूचछा...

क्रमशः ..................

raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:15

Agle poore din main ajeeb kasamkas mein rahi; Jab main apni pyasi yoni ki aag bujhane ke liye har jagah hath pair maar rahi thi toh koyi naseeb hi nahi hua.. aur jab achchha khasa 'lallu' mere hathon mein aaya toh main usko apni yoni mein ghuswane se darne lagi.. Ab kisi se poochhti bhi toh kya poochhti? Didi apni sasural mein thi.. kisi aur se poochhne ki himmat ho nahi rahi thi..

Poora din mera dimag kharab raha .. aur tuition ke time bujhe mann se hi pinki ke ghar chali gayi...

Uss din Meenu bahut udaas thi, .. karan mujhe achchhi tarah pata tha.. Tarun ki narajgi ne usko pareshan kar rakha tha.. 2 din se usne Meenu ke sath baat tak nahi ki thi...

"Wo.. Tarun tumhe kahan tak chhod kar aaya tha kal?" Meenu ne mujhse poochha.. Pinki sath hi baithi thi.. Tarun abhi aaya nahi tha...

"Mere ghar tak.. aur kahan chhod kar aata?" Maine uski aur dekh kar kaha aur uska bujha hua chehra dekh barbas hi mere honton par muskaan tair gayi...

"Itna khush kyun ho rahi hai? Ismein hansne wali baat kya hai?" Meenu ne chid kar kaha....

"Arey didi.. main aapki baat par thode hi hansi hoon.. main toh bus yunhi..." Main kaha aur fir muskura di...

"Pinki.. pani lana upar se...." Meenu ne kaha...

"Ji, didi.. abhi layi.. " Kahkar Pinki upar chal di...

"Thoda garam karke lana.. mera gala kharab hai.." Meenu ne kaha aur Pinki ke upar jate hi mujhe ghoor kar boli lagi," Jyada daant nikalne ki jarurat nahi hai... Mujhe tumhare baare mein sab kuchh pata hai.."

"Achchha!" Maine khadi hokar angdayi si li aur apne bhare bhare youvan ka jalwa usko dikha kar fir muskurane lagi.. main kuchh bol kar usko 'thandi' karne hi wali thi ki achanak Tarun aa gaya.. Main mann ki baat mann mein hi rakhe muskurakar Tarun ki aur dekhne lagi..

Meenu ne apna sir jhuka liya aur munh par kapda lapet kar kitab mein dekhne lagi... Tarun meri aur dekh kar muskuraya aur aankh maar di.. Main hans padi...

Tarun charpayi par ja baithta. Usne rajayi apne pairon par daali aur mujhe aankhon hi aankhon mein usi charpayi par baithne ka ishara kar diya...

wahan har roj Pinki baithi thi aur main uske saamne dusri charpayi par.. Shayad Tarun Meenu ko jalane ke liye aisa kar raha tha.. Main bhi kahan pichhe rahne wali thi.. Maine ek nazar Meenu ki aur dekha aur 'Dhumm' se Tarun ke sath charpayi par baithi aur uski rajayi ko hi dusri taraf se apni taangon par kheench liya....

Maine Meenu ki aur tirchhi najron se dekha... wah hum dono ko hi ghoor rahi thi... Par Tarun ne uski aur dhyan nahi diya....

Tabhi Pinki neeche aa gayi," Namastey bhaiya!" kahkar usne Meenu ko pani ka gilas pakdaya.. Meenu ne pani jyon ka tyon charpayi ke neeche rakh diya....

Pinki hamare paas aayi aur hanskar mujhse boli," Ye toh meri seat hai..!"

"Koyi baat nahi Pinki.. tum yahan baith jao" Tarun ne uss jagah ki aur ishara kiya jahan pahle din se hi main baithti thi....

"Main toh aise hi bata rahi thi bhaiya.. yahan se toh aur bhi achchhi tarah dikhayi dega...." Pinki ne hanskar kaha aur baith gayi....

Uss din Tarun ne hamein aadha ghanta hi padhaya aur hamein kuchh yaad karne ko de diya..," Mera kal exam hai.. mujhe apni taiyari karni hai.. Main thodi der aur yahan hoon.. fir mujhe jana hai.. tab tak kuchh poochhna ho toh poochh lena..." Tarun ne kaha aur apni kitab khol kar baith gaya...

2 minute bhi nahi huye honge.. Achanak mujhe apne talwon ke paas Tarun ka angootha mandrata hua mahsoos hua.. Maine najarein uthakar Tarun ko dekha.. wah muskurane laga.. Usi pal mera dhyan Meenu par gaya.. wah Tarun ko hi dekhe ja rahi thi.. par mere uski aur dekhne par usne apna chehra jhuka liya..

Maine bhi najarein kitab mein jhuka li.. par mera dhyan Tarun ke angoothe par hi tha.. ab wah lagataar mere takhnon ke paas apna angootha sataye huye usko aage pichhe karke mujhe chhed raha tha...

Achanak rajayi ke andar hi dheere dheere usne apni taang lambi kar di.. Maine Pinki ko dekha aur apni kitab thodi upar utha li....uska pair meri jaanghon par aakar tik gaya...

Meri yoni fudakne lagi.. mujh par suroor sa chhane laga aur maine bhi rajayi ke andar apni taange seedhi karke Uska pair meri dono janghon ke beech le liya... chori chori mil rahe iss aanand mein pagal si hokar maine uske pair ko apni jaanghon mein kaskar bheench liya...

Tarun bhi taiyaar tha.. Shayad uski mansha bhi yahi thi.. Wah mujhe sath lekar nikalne se pahle hi mujhe poori tarah garam kar lena chahta hoga.. usne apne pair ka panja seedha kiya aur salwar ke upar se hi meri kachchhi ke kinaron ko apne angoothe se kuredne laga.. Yoni ke itne kareeb 'ghuspaithiye' angoothe ko mahsoos karke meri saansein tej ho gayi.. bus 2 inch ka faasla hi toh bacha hoga mushkil se... Meri yoni aur uske angoothe mein...

Meenu aur Pinki ke paas hone ke karan hi shayad hulki chhed chhad se hi mil rahe aanand mein doguni kasak thi... Main apni kitab ko ek taraf rakh kar usmein dekhne lagi aur maine apne ghutne mod kar rajayi ko uncha kar liya.. Ab Rajayi ke andar shaitani kar rahe Tarun ke pairon ki hulchal bahar se dikhyi deni band ho gayi...

Achanak Tarun ne angootha seedha meri yoni ke upar rakh diya.. Main hadbada si gayi... Yoni ki faankon ke theek beechon beech uska angootha tha aur dheere dheere wo usko upar neeche kar raha tha....

Main tadap uthi... itna maja toh mujhe jindagi mein uss din se pahle kabhi aaya hi nahi tha.. shayad isiliye kahte hain.. 'chori chori pyar mein hai jo maja' .. 2 char baar angoothe ke upar neeche hone se hi meri yoni chhalak uthi.. Yoniras se meri kachhi bhi 'wahan' se poori tarah geeli ho gayi.... Mujhe apni saanson par kaabu pana mushkil ho raha tha.. mujhe lag raha tha ki mere chehre ke bhawon se kum se kum Meenu toh meri halat samajh hi gayi hogi...

'par jo hoga dekha jayega' ke andaaj mein maine apna hath dheere se andar kiya aur salwar ke upar se hi apni kachchhi ka kinara pakad kar usko apni yoni ke upar se hata liya.....

Mera irada sirf Tarun ke angoothe ko 'wahan' aur achchhi tarah mahsoos karna tha.. par shayad Tarun galat samajh gaya.. yoni ke upar ab kachchhi ki deewar ko na pakar Meri yoni ka lislisapan usko angoothe se mahsoos hone laga.. Kuchh der wah apne angoothe se meri faankon ko alag alag karne ki koshish karta raha.. Meri halat kharab hoti ja rahi thi.. aawesh mein main kabhi apni jaanghon ko khol deti aur kabhi bheench leti... Achanak usne meri yoni par angoothe ka dabav ek dam badha diya....

Iske sath hi main hadbada kar uchhal si padi... aur meri kitab chhitak kar neeche ja giri... Meri salwar ka kuchh hissa meri yoni mein hi fansa rah gaya..

"Kya hua Anju!" Pinki ne achanak sir utha kar poochha....

"haan.. nahi.. kuchh nahi.. jhapki si aa gayi thi" Maine baat sambhalne ki koshish ki...

Ghabrakar Tarun ne apna pair wapas kheench liya... Par iss sare tamashe se hamari rajayi mein jo hulchal huyi.. uss'se shayad Meenu ko vishvas ho gaya ki andar hi andar kuchh 'ghotala' ho raha hai...

Achanak Meenu ne 2-4 siski si li aur pinki ke uthkar uske paas jate hi usne foot foot kar rona shuru kar diya...

"Kya huaa didi?" Pinki ne Meenu ke chehre ko apne hathon mein lekar poochha....

"Kuchh nahi.. ..tu padh le..." Meenu ne usko kaha aur roti rahi...

"Batao na kya ho gaya?" Pinki wahin khadi rahi toh mujhe laga ki mujhe bhi uth jana chahiye... Maine apni salwar theek ki aur rajayi hatakar uske paas chali gayi," Ye.. achanak kya hua aapko didi...?"

"Kuchh nahi.. main theek hoon.." Mere poochhte hi Meenu ne hulke se gusse mein kaha aur apne aansoo pounchh kar chup ho gayi....

Meri dobara Tarun ki rajayi mein baithne ki himmat nahi huyi.. Main Pinki ke paas hi ja baithi...

"Kya hua Anju? Wahin baith lo na.." Pinki ne bholepan se meri aur dekha...

"Nahi.. ab kounsa padha rahe hain...?" Maine apne chehre ke bhavon ko pakde jane se bachane ki koshish karte huye jawab diya.....

Mere alag baithne se shayad Meenu ke jakhmon par kuchh marham laga.. thodi hi der baad wo achanak dheere se bol padi," Mere wahan til nahi hai!"

Tarun ne ghoom kar usko dekha.. Samajh toh main bhi gayi thi ki 'Til' kahan nahi hai.. par bholi Pinki na samajhne ke bawjood maamle mein kood padi..," Kya? kahan 'til' nahi hai didi...?"

Meenu ne bhi poori taiyari ke baad hi bola tha..," Arey 'til' nahi.. 'Dil'.. Main toh iss kagaj ke tukde mein se padhkar bol rahi thi.. jane kahan se meri kitab mein aa gaya... pata nahi.. aisa hi kuchh likha hua hai.. 'Dekhna' " Usne kaha aur kagaj ka wo tukda Tarun ki aur badha diya...

Tarun ne kuchh der uss kagaj ko dekha aur fir apni mutthi mein daba liya...

"Dikhana bhaiya!" Pinki ne hath badhaya...

"yunhi likhi huyi kisi line ka aadha bhag lag raha hai....Tu apni padhayi kar le.." Tarun ne kahkar Pinki ko tarka diya....

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Tarun ne thodi der baad usi kagaj par dusri taraf chupke se kuchh likha aur rajayi ki side se chupchap meri aur badha diya... Maine usi taraf chhupakar usko padha.. 'Pyar karna hai kya?' uss par likha hua tha.. maine kagaj ko palat kar dekha.. dusri aur likha hua tha.... 'Mere wahan 'Til' nahi hai..'

Dil toh bahut tha yoni ki khujali mita daalne ka.. par 'maa' ban'ne ko kaise taiyaar hoti... Maine Tarun ki aur dekha aur 'na' mein apna sir hila diya......

wah apna sa munh lekar mujhe ghoorne laga.. uske baad maine uss'se najarein hi nahi milayi....

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hamein Chai pilakar chachi jane hi wali thi ki Tarun ke dimag mein jane kya aaya," Aao Meenu.. thodi der tumhe padha doon...! fir main jaaunga...."

Meenu ka chehra achanak khil utha.. usne jhat se apni kitab uthayi aur Tarun ke paas ja baithi...

Main aur Pinki dusri charpayiyon par late gaye.. thodi hi der baad Pinki ke kharrate bhi sunayi dene lage... par main bhala kaise soti?

hamein Chai pilakar chachi jane hi wali thi ki Tarun ke dimag mein jane kya aaya," Aao Meenu.. thodi der tumhe padha doon...! fir main jaaunga...."

Meenu ka chehra achanak khil utha.. usne jhat se apni kitab uthayi aur Tarun ke paas ja baithi...

Main aur Pinki dusri charpayiyon par late gaye.. thodi hi der baad Pinki ke kharrate bhi sunayi dene lage... par main bhala kaise soti?

Continue......

Par aaj maine pahle hi ek dimag ka kaam kar liya.. Maine dusri aur takiya laga liya aur unki aur karwat lekar late gayi Apni rajayi ko maine shuru se hi iss tarah thoda upar uthaye rakha ki mujhe unki poori charpayi dikhayi deti rahe....

Aaj Meenu kuchh jyada hi besabra dikhayi de rahi thi.. kuchh 15 minute hi huye honge ki Jaise hi Tarun ne panna palatne ke liye apna hath rajayi se bahar nikala; Meenu ne pakad liya.. Main samajh gayi.. ab hoga khel shuru !

Tarun bina kuchh bole Meenu ke chehre ki aur dekhne laga.. Kuchh der Meenu bhi usko aise hi dekhti rahi.. achanak uski aankhon se aansoo ludhak gaye.. Sach bata rahi hoon.. Meenu ka masoom aur bebas sa chehra dekh meri bhi aankhein nam ho gayi thi....

Tarun ne ek baar hamari charpayiyon ki aur dekha aur apna hath chhuda kar Meenu ka chehra apne dono hathon mein le liya.. Meenu apne chehre ko uske hathon mein chhupa kar subakne lagi...

"Aise kyun kar rahi hai pagal? Inmein se koyi uth jayegi.." Tarun ne uske aansuon ko ponchhte huye dheere se fusfusaya...

Meenu ke munh se nikalne wali aawaj bhari aur bharbharayi huyi si thi..," Tumhari narajgi mujhse sahan nahi hoti Tarun.. Main mar jaaungi.. Tum mujhe yun kyun tadpa rahe ho.. Tumhe pata hai na ki main tumse kitna pyar karti hoon..."

Meenu ki aankhon se aansoo nahi tham rahe the.. Maine bhi apni aankhon se aansoo pouchhe.. Mujhe dikhayi dena band ho gaya tha.. mere aansuon ke karan...!

"Mmain kahan tadpata hoon tumhe? Tumhare baare mein kuchh bhi sun leta hoon toh mujhse sahan hi nahi hota.. Main pagal hoon thoda sa.. par ye pagalpan bhi toh tumhare karan hi hai jaan.." Tarun ne thoda aage sarak kar Meenu ko apni taraf kheench liya... Meenu ne aage jhuk kar Tarun ki chhati par apne gaal tika diye..

Uska chehra meri hi aur tha.. Ab uske chehre par prayapt sukoon jhalak raha tha.. Aise hi jhuke huye usne Tarun se kaha," Tumhe Anjali mujhse bhi achchhi lagti hai na?"

"Ye kya bol rahi hai pagal? Mujhe iss'se kya matlab? Mujhe toh tumse jyada pyara iss poori duniya mein koyi nahi lagta.. Tum soch bhi nahi sakti ki main tumse kitna pyar karta hoon..." Sala magarmachchh ki aulad.. bolte huye rone ki acting karne laga.....

Meenu ne turant apna chehra upar kiya aur aankhein band karke Tarun ke gaalon par apne hont rakh diye..," Par tum kah rahe the na.. ki Anju mujhse toh sunder hi hai.." Tarun ko kiss karke seedhi hote Meenu boli...

"Wo toh main tumhe jalane ke liye bol raha tha... Tumse iska kya muqabla?" Dil toh kar raha tha ki rajayi faink kar uske saamne khadi hokar poochhoon.. ki 'ab bol' .. par mujhe Til wali ramayan bhi dekhni thi.... isiliye daant pees kar rah gayi...

"Ab tak toh mujhe bhi yahi lag raha tha ki tum mujhe jala rahe ho.. par tab mujhe laga ki tum aur Anju ek dusre ko rajayi ke andar chhed rahe ho.. tab mujhse sahan nahi huaa aur main rone lagi..." Meenu ne apne chehre ko fir se uski chhati par tika diya...

Tarun uski kamar mein hath ferta hua bola,"Chhodo na... par tumne mujhe parson kyun nahi bataya ki tumhare wahan 'Til' nahi hai.. Parson hi maamla khatam ho jata.."

"Mujhe kya pata tha ki til hai ki nahi.. kal maine..." Meenu ne kaha aur achanak sharma gayi...

"Kal kya? bolo na Meenu..." Tarun ne aage poochha...

Meenu seedhi huyi aur shararat se uski aankhon mein ghoorti huyi boli," Besharam! bus bata diya na ki til nahi hai.. meri baat par visvas nahi hai kya?"

"Bina dekhe kaise hoga.. Dekh kar hi vishvas ho sakta hai ki 'til' hai ki nahi.." Tarun ne kaha aur shararat se muskurane laga...

Meenu ka chehra achanak laal ho gaya..Usne Tarun se najrein churayi, milayi aur fir chura kar boli," Dekho.. dekho.. tum fir ladayi wala kaam kar rahe ho.. maine waise bhi kal sham se khana nahi khaya hai.. !"

"Ladayi wala kaam toh tum kar rahi ho Meenu.. jab tak dekhoonga nahi.. mujhe vishvas kaise hoga? bolo! aise hi vishvas karna hota toh ladayi hoti hi kyun? main parson hi na maan jata tumhari baat...." Tarun ne apni jid par ade rahkar kaha...

"Tum mujhe fir se rula kar jaoge.. hai na?" Meenu ke chehre ka rang ud sa gaya...

Tarun ne dono ke pairon par rakhi rajayi uthakar khud audh li aur usko khol kar Meenu ki taraf hath badha kar bola," Aao.. yahan aa jao meri jaan!"

"Nahi!" Meenu ne najrein jhuka li aur apne hont bahar nikal liye...

"Aao na.. kya itna bhi nahi kar sakti ab?" Tarun ne bekaraar hokar kaha...

"Ruko.. pahle main upar wala darwaja band karke aati hoon.." Kahkar Meenu uthi aur upar wale darwaje ke sath bahar wala bhi band kar diya.. fir Tarun ke paas aakar kaha," Jaldi chhod doge na?"

"Aao na!" Tarun ne Meenu ko pakad kar kheench liya... Meenu hulki hulki sharmayi huyi uski god mein ja giri....

Rajayi se bahar ab sirf dono ke chehre dikhayi de rahe the.. Tarun ne iss tarah Meenu ko apni god mein bitha liya tha ki Meenu ki kamar Tarun ki chhati se poori tarah chipki huyi hogi.. aur uske sudoul nitamb theek Tarun ki jaanghon ke beech rakhe honge... Main samajh nahi pa rahi thi.. Meenu ko khud par itna kaabu kaise hai.. halanki aankhein uski bhi band ho gayi thi.. par main uski jagah hoti toh najara hi dusra hota...

Tarun ne uski gardan par apne hont rakh diye.. Meenu sisak uthi...

"Kab tak mujhe yun tadpaogi jaan?" Tarun ne houle se uske kaanon mein saans chhodi...

"aaah.. jab tak.. meri padhayi poori nahi ho jati.. aur ghar wale hamari shadi ke liye taiyaar nahi ho jate... ya fir... hum ghar chhod kar bhag nahi jate..." Meenu ne sisakte huye kaha...

Meenu ki iss baat ne mere dil mein pyar karte hi 'maa' ban jane ke darr ko aur bhi pukhta kar diya....

"Par tab tak toh main mar hi jaaunga..!" Tarun ne usko apni aur kheench liya...

Meenu ka chehra chamak utha..," Nahi maroge jaan.. Main tumhe marne nahi doongi.." Meenu ne kaha aur apni gardan ghuma kar uske honton ko choom liya..

Tarun ne apna hath bahar nikala aur uske gaalon ko apne hath se pakad liya.. Meenu ki aankhein band thi.. Tarun ne apne hont khole aur Meenu ke honton ko daba kar choosne laga... aisa karte huye unki rajayi meri taraf se neeche khisak gayi...

Tarun kafi der tak uske honton ko choosta raha.. uska dusra hath Meenu ke pate par tha aur wo rah rah kar meenu ko pichhe kheench kar apni jaanghon ke upar chadhane ka prayas kar raha tha.. pata nahi anjane mein ya jaan boojh kar.. Meenu rah rah kar apne nitambon ko aage khiska rahi thi....

Tarun ne jab Meenu ke honton ko chhoda toh uski saanse buri tarah ukhadi huyi thi.. Haanfti huyi Meenu apne aap ko chhuda kar uske saamne ja baithi," Tum bahut gande ho.. ek baar ki kah kar.... mushkil se hi chhodte ho.. Aaj ke baad kabhi tumhari baaton mein nahi aaungi..."

Meenu ki najrein ye sab bolte huye lajayi huyi thi... Uske chehre ki muskaan aur lajja ke karan uske gaalon par chadha huaa gulabi rang ye bata raha tha ki achchha toh usko bhi bahut lag raha tha... par shayad meri tarah wah bhi maa ban'ne se dar rahi hogi.....

" Dekho.. main majak nahi kar raha.. par 'til' toh tumhe dikhana hi padega...!" Tarun ne apne honton par jeebh ferte huye kaha.. Shayad Meenu ke rasile gulabi honton ki mithas abhi tak Tarun ke honton par bani huyi thi.....

"Tum toh pagal ho.. main kaise dikhaaungi tumhe 'wahan' .. Mujhe bahut sharm aa rahi hai.. kal khud dekhte huye bhi main sharminda ho gayi thi..." Meenu ne pyar se dutkaar kar Tarun ko kaha....

"Par tum khud kaise dekh sakti ho.. achchhi tarah...!" Tarun ne tark diya...

"Wo.. wo maine.. sheeshe mein dekha tha.." Meenu ne kahte hi apna chehra apne hathon mein chhipa liya...

"Par kya tum.. mere dil ki shanti ke liye itna bhi nahi kar sakti..." Tarun ne uske hath pakad kar chehre se hata diye..

Lajayi huyi Meenu ne apne sir ko bilkul neeche jhuka liya," Nahi.. bata toh diya... mujhe sharm aa rahi hai...!"

"Ye toh tum bahana banane wali baat kar rahi ho.. mujhse bhi sharmaogi kya? Maine tumhari marzi ke bagair kuchh kiya hai kya aaj tak... main aakhiri baar poochh raha hoon Meenu.. dikha rahi ho ki nahi..?" Tarun thoda taish mein aa gaya....

Meenu ke chehre se majboori aur udasi jhalakne lagi," Par.. tum samajhte kyun nahi.. mujhe sharm aa rahi hai jaan!"

"Aane do.. sharm ka kya hai? ye toh aati jati rahti hai... par iss baar agar main chala gaya toh wapas nahi aaunga... soch lo!" Tarun ne usko fir se chhod dene ki dhamki di....

Mayoos Meenu ko aakhirkar haar maan'ni hi padi," Par.. wada karo ki tum aur kuchh nahi karoge.. bolo!"

"Haan.. wada raha.. dekhne ke baad jo tumhari marzi hogi wahi karoonga..." Tarun ki aankhein chamak uthi.. par sharm ke maare Meenu apni najrein nahi utha pa rahi thi....

"Theek hai.." Meenu ne sharma kar aur munh bana kar kaha aur late kar apne chehre par takiya rakh liya..

Uski najakat dekh kar mujhe bhi uss par taras aa raha tha.. par Tarun ko iss baat se koyi matlab nahi tha shayad.. Meenu ke aatmsamarpan karte hi Tarun ke jaise munh main pani utar aaya," Ab aise kyun late gayi.. Sharmana chhod do..!"

"Mujhe nahi pata.. jo kuchh dekhna hai dekh lo.." Meenu ne apna chehra dhake huye hi kaha....," upar se Koyi aa jaye toh darwaja khol kar bhagne se pahle mujhe dhak dena.. main so rahi hoon..." Meenu ne shayad apni jhijhak chhipane ke liye hi aisa bola hoga.. warna aisi halat mein koyi so sakta hai bhala...

Tarun ne uski baat ka koyi jawab nahi diya.. Usko toh jaise aladeen ka chirag mil gaya tha.. thoda aage hokar usne Meenu ki taangon ko seedha karke unke beech baith gaya.. Mujhe meenu ka kampkampata hua badan saaf dikh raha tha...

Agle hi pal Tarun Meenu ki kameej upar karke uske sameej ko uski salwar se bahar kheenchne laga.. Shayad sharm ke maare Meenu dohri si hokar apni taangon ko modne ki koshish karne lagi.. par Tarun ne uski taangon ko apni kohniyon ke neeche daba liya....

"Isko kyun nikal rahe ho? jaldi karo na.." Meenu ne sisakte huye prarthna kari...

"Ruko bhi.. ab tum chup ho jao.. mujhe apne hisab se dekhne do..." Tarun ne kaha aur uska sameej bahar nikal kar uski kameej ke sath hi uski chhatiyon tak upar chadha diya... Leti huyi hone ke karan main sab kuchh toh nahi dekh payi.. par Meenu ka pate bhi meri tarah hi chikna gora aur bahut hi kamsin tha.. charbi toh jaise wahan thi hi nahi.. rah rah kar wo uchak rahi thi..

Achanak Tarun uss par jhuk gaya aur shayad uski naabhi par apne hont rakh diye... Mujhe mahsoos hua jaise uske hont mere hi badan par aakar tik gaye hon.. maine apna hath apni salwar mein ghusa liya...

Meenu sisak uthi," Tum dekhne ke bahane apna matlab nikal rahe ho.. jaldi karo na pls!"

"Thoda matlab bhi nikal jane do jaan.. aisa mouka tum mujhe dobara toh dene se rahi... Kya karoon.. tumhara har ang itna pyara hai ki dil karta hai ki aage badhoon hi na.. tumhara jo kuchh bhi dekhta hoon.. usi par dil aa jata hai...." Tarun ne apna sir uthakar muskurate huye kaha aur fir se jhukte huye apni jeebh nikal kar Meenu ke pate ko yahan wahan chatne laga...

"Ooohhh.. ummm.. aaaah..." Meenu rah rah kar hone wali gudgudi se uchhalti rahi aur aanhein bharti rahi... par kuchh boli nahi...

Achanak Tarun ne Meenu ka nada pakad kar kheench liya aur iske sath hi ek baar fir meenu ne apni taangon ko modne ki koshish ki.. par jyada kuchh wah kar nahi payi.. Tarun ki donon kohaniyan uski jaanghon par thi.. Wah machal kar rah gayi," Plz.. jaldi dekh lo.. Mujhe bahut sharm aa rahi hai..." Kahkar usne apni taangein dheeli chhod di...

Tarun ne ek baar fir uski baaton par koyi dhyan nahi diya..aur uski salwar upar se neeche sarka di.. Salwar ke neeche hote hi mujhe Meenu ki safed kachchhi aur uske neeche uski gouri gudaj jaanghein thodi si nangi dikhayi dene lagi...

Tarun uski jaanghon ke beech iss tarah lalchaya hua dekh raha tha jaise usne pahli baar kisi ladki ko iss tarah dekha ho.. uski aankhein kamukta ke maare fail si gayi... Tabhi ek baar fir Meenu ki tadapti huyi aawaj mere kaano tak aayi," Ab nikal lo isko bhi.. jaldi dekh lo na..."

Tarun ne meri palak jhapakne se pahle hi uski baat ka aksharsh palan kiya... wah kachchhi ko upar se neeche sarka chuka tha..," thodi upar utho!" Kahkar usne Meenu ke nitambon ke neeche hath diye aur salwar samet uski kachchhi ko neeche kheench liya....

Tarun ki halat dekhte hi ban rahi thi... achanak uske munh se laar tapak kar Meenu ki jaanghon ke beech ja giri.. mere khayal se uski yoni par hi giri hogi jakar...

"Meenu.. mujhe nahi pata tha ki choot itni pyari hai tumhari.. dekho na.. kaise fudak rahi hai.. chhoti si machhli ki tarah.. sach kahoon.. tum mere sath bahut bura kar rahi ho.. apne sabse kimati ang se mujhko itni door rakh kar... ji karta hai ki...."

"Dekh liya... ab mujhe chhodo.." Meenu apni salwar ko upar karne ke liye apne hath neeche layi toh Tarun ne unko wahin daboch liya," aise thode hi dikhayi dega.. yahan se toh bus upar ki hi dikh rahi hai..."

Tarun uski taangon ke beech se nikla aur bola," Upar taangein karo.. iski 'papoti' achchhi tarah tabhi dikhayi dengi..."

"Kya hai ye?" Meenu ne kaha toh mujhe uski baaton mein virodh nahi laga.. bus sharm hi lag rahi thi bus! Tarun ne uski jaanghein upar uthayi toh usne koyi virodh na kiya...

Meenu ki jaanghein upar hote hi uski yoni ki sundarta dekh kar mere munh se bhi pani tapakne laga.. aur meri yoni se bhi..! Tarun jhooth nahi bol raha tha.. uski yoni ki faankein meri yoni ki faankon se patli thi.. par bahut hi pyari pyari thi... ek dum gouri... hulke hulke kaale baalon mein bhi uska rasilapan aur najakar mujhe door se hi dikhayi de rahi thi... patli patli faankon ke beech lambi si daraar aise lag rahi thi jaise pahle kabhi khuli hi na ho.. peshab karne ke liye bhi nahi.. dono faankein aapas mein chipki huyi si thi...

Achanak Tarun ne uski salwar aur kachchhi ko ghutno se neeche karke jaanghon ko aur pichhe dhakel kar khol diya.. iske sath hi Meenu ki yoni aur upar uth gayi aur uski daraar ne bhi hulka sa munh khol diya.. Iske sath hi uske gol matol nitambon ki kasawat bhi dekhte hi ban rahi thi... Tarun yoni ki faankon par apni ungali ferne laga...

"Main mar jaaungi Tarun.. pls.. aisa ....mat karna.. pls.." Meenu haanfte huye ruk ruk kar apni baat kah rahi thi....

"Kuchh nahi kar raha jaan.. main toh bus chhoo kar dekh raha hoon... tumne toh mujhe pagal sa kar diya hai... sach.. ek baat maan logi...?" Tarun ne request ki...

"Til nahi hai na jaan!" Meenu tadap kar boli....

"Haan.. nahi hai.. I love you jaan.. aaj ke baad main tumse kabhi bhi ladayi nahi karoonga.. na hi tum par shak karoonga.. tumhari kasam!" Tarun ne kaha..

"Sach!!!" Meenu ek pal ko sab kuchh bhool kar takiye se munh hata kar boli.. fir Tarun ko apni aankhon mein dekhte pakar sharma gayi...

"Haan.. jaan.. pls ek baat maan lo..." Tarun ne pyar se kaha...

"Kyaaaaa? Meenu sisakte huye boli.. usne ek baar fir apna munh chhipa liya tha...

"Ek baar isko apne honton se chaat loon kya?" Tarun ne apni mansha jahir ki....

Ab tak shayad Meenu ki jawaan hasratein bhi shayad bekaabu ho chuki thi," Mujhe hamesha isi tarah pyar karoge na jaan!" Meenu ne pahli baar nangi hone ke baad Tarun se najrein milayi....

Tarun uski jaanghon ko chhod kar upar gaya aur Meenu ke honton ko choom liya," Tumhari kasam jaan.. tumse door hone ki baat toh main soch bhi nahi sakta..." Tarun ne kaha aur neeche aa gaya...

Main ye dekh kar hairan rah gayi ki Meenu ne iss baar apni jaanghein apne aap hi upar utha di....

Tarun thoda aur pichhe aakar uski yoni par jhuk gaya... yoni ke honton par Tarun ke honton ko mahsoos karte hi Meenu uchhal padi,"aaahhh..."

"Kaisa lag raha hai jaan?" Tarun ne poochha...

"Tum kar lo..!" Meenu ne sisakte huye itna hi kaha...

"Batao na.. kaisa lag raha hai.." Tarun ne fir poochha...


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:16

बाली उमर की प्यास पार्ट--8

गतांक से आगे.......................

"आह.. कह तो रही हूँ.. कर लो.. अब और कैसे बताऊं.. बहुत अच्च्छा लग रहा है.. बस!" मीनू ने कहा और शर्मा कर अपने हाथों से अपना चेहरा ढक लिया...

खुश होकर तरुण उसकी योनि पर टूट पड़ा.. अपनी जीभ बाहर निकाल कर उसने योनि के निचले हिस्से पर रखी और उसको लहराता हुआ उपर तक समेट लाया.. मीनू बदहवास हो गयी.. सिसकियाँ और आहें भरते हुए उसने खुद ही अपनी जांघों को पकड़ लिया और तरुण का काम आसान कर दिया...

मेरा बुरा हाल हो चुका था.. उन्होने ध्यान नही दिया होगा.. पर मेरी रज़ाई अब मेरे योनि को मसल्ने के कारण लगातार हिल रही थी...

तरुण ने अपनी एक उंगली मीनू की योनि की फांकों के बीच रख दी और उसकी दोनो 'पपोतियाँ' अपने होंटो में दबाकर चूसने लगा...

मीनू पागल सी हुई जा रही थी.. अब वह तरुण के होंटो को बार बार योनि के मनचाहे हिस्से पर महसूस करने के लिए अपने नितंबों को उपर नीचे हिलाने लगी थी.. ऐसा करते हुए वा अचानक चौंक पड़ी," क्या कर रहे हो?"

"कुच्छ नही.. बस हल्की सी उंगली घुसाई है..." तरुण मुस्कुराता हुआ बोला...

"नही.. बहुत दर्द होगा.. प्लीज़ अंदर मत करना.." मीनू कसमसा कर बोली....

तरुण मुस्कुराता हुआ बोला," अब तक तो नही हुआ ना?"

"नही.. पर तुम अंदर मत डालना प्लीज़..." मीनू ने प्रार्थना सी की...

"मेरी पूरी उंगली तुम्हारी चूत में है.." तरुण हँसने लगा...

"क्या? सच..? " मीनू हैरान होकर जांघों को छ्चोड़ कोहानियों के बल उठ बैठी.. और चौंक कर अपनी योनि में फँसी हुई तरुण की उंगली को देखती हुई बोली," पर मैने तो सुना था कि पहली बार बहुत दर्द होता है.." वह आस्चर्य से आँखें चौड़ी किए अपनी योनि की दरार में अंदर गायब हो चुकी उंगली को देखती रही....

तरुण ने उसकी और देख कर मुस्कुराते हुए उंगली को बाहर खींचा और फिर से अंदर धकेल दिया... अब मीनू उंगली को अंदर जाते देख रही थी.. इसीलिए उच्छल सी पड़ी,"अया..."

"क्या? दर्द हो रहा है या मज़ा आ रहा है...." तरुण ने मुस्कुराते हुए पूचछा...

"आइ.. लव यू जान... आ.. बहुत मज़ा आ रहा हॅयियी..." कहकर मीनू ने आँखें बंद कर ली....

"लेकिन तुमसे ये किसने कहा कि बहुत दर्द होता है...?" तरुण ने उंगली को लगातार अंदर बाहर करते हुए पूचछा....

"छ्चोड़ो ना.. तुम करो ना जान... बहुत.. मज़ा आअ.. रहा है... आयेययीयीयियीयियी आआअह्ह्ह" मीनू की आवाज़ उसके नितंबो के साथ ही थिरक रही थी.... उसने बैठ कर तरुण के होंटो को अपने होंटो में दबोच लिया... तरुण के तो वारे के न्यारे हो गये होंगे... साले कुत्ते के.. ये उंगली वाला मज़ा तो मुझे भी चाहिए.. मैं तड़प उठी...

तरुण उसके होंटो को छ्चोड़ता हुआ बोला," पूरा कर लें क्या?"

"क्या?" मीनू समझ नही पाई.. और ना ही मैं...

"पूरा प्यार... अपना लंड इसके अंदर डाल दूं...!" तरुण ने कहा....

मचलती हुई मीनू उसकी उंगली की स्पीड कम हो जाने से विचलित सी हो गयी..," हां.. कर दो.. ज़्यादा दर्द नही होगा ना?" मीनू प्यार से उसको देखती हुई बोली...

"मैं पागल हूँ क्या? जो ज़्यादा दर्द करूँगा... असली मज़ा तो उसी में आता है.. जब यहाँ से बच्चा निकल सकता है तो उसके अंदर जाने में क्या होगा... और फिर उस मज़े के लिए अगर थोड़ा बहुत दर्द हो भी जाए तो क्या है..? सोच लो!"

मीनू कुच्छ देर सोचने के बाद अपना सिर हिलाती हुई बोली," हां.. कर दो... कर दो जान.. इस'से भी ज़्यादा मज़ा आएगा क्याअ?"

"तुम बस देखती जाओ जान... बस अपनी आँखें बंद करके सीधी लेट जाओ... फिर देखो मैं तुम्हे कहाँ का कहाँ ले जाता हूँ...." तरुण बोला.....

मीनू निसचिंत होकर आँखें बंद करके लेट गयी.. तरुण ने अपनी जेब से मोबाइल निकाला और दनादन उसके फोटो खींचने लगा... मेरी समझ में नही आया वो ऐसा कर क्यूँ रहा है... उसने मीनू की योनि का क्लोज़ उप लिया... फिर उसकी जांघों और योनि का लिया... और फिर थोड़ा नीचे करके शायद उसकी नंगी जांघों से लेकर उसके चेहरे तक का फोटो ले लिया....

"अब जल्दी करो ना जान...!" मीनू ने कहा और अपने नितंबो को कसमसा कर उपर उठा लिया...

"बस एक मिनिट...." तरुण ने कहा और अपनी पॅंट उतार कर मोबाइल वापस उसकी जेब में रख दिया.... उसका लिंग उसके कछे को फाड़ कर बाहर आने वाला था... पर उसने खुद ही निकाल लिया... उसने झट से मीनू की जांघों को उपर उठाया अपना लिंग योनि के ठीक बीचों बीच रख दिया.. लिंग को योनि पर रखे जाते ही मीनू तड़प उठी.. उसका डर अभी तक निकला नही था... उसने बाहें फलकर चारपाई को कसकर पकड़ लिया," प्लीज़.. आराम से जान!"

पता नही तरुण ने उसकी बात सुनी या नही सुनी.. पर सो रही पिंकी ने मीनू की चीख ज़रूर सुन ली... वह हड़बड़ा कर उठ बैठी और अगले ही पल वो उनकी चारपाई के पास थी... आस्चर्य से उसकी आँखें फटी की फटी रह गयी.. अपने मुँह पर हाथ रखे वह अजीब सी नज़रों से उनको देखने लगी....

अचानक पिंकी के जाग जाने से भौंचाक्क मीनू को जैसे ही अपनी हालत का ख़याल आया.. उसने धक्का देकर तरुण को पिछे धकेला... मीनू के रस में सना तँटनया हुआ तरुण का लिंग बाहर आकर झूलने लगा...

मैं दम साधे कुच्छ और तमाशा देखने के चक्कर में चुप चाप पड़ी रही.....

मीनू ने तुरंत अपनी सलवार उपर कर ली और तरुण ने अपना लिंग अंदर... सारा मामला समझ में आने पर पिंकी ज़्यादा देर वहाँ खड़ी ना रह सकी.. मीनू और तरुण को घूर कर वह पलटी और अपने पैर पटकती हुई वापस अपनी रज़ाई में घुस गयी...

तरुण यूँ रंगे हाथ पकड़े जाने पर भी कुच्छ खास शर्मिंदा नही था पर मीनू की तो हालत ही खराब हो गयी... उसने दीवार का सहारा लेकर अपने घुटने मॉड़े और उनमें सिर देकर फुट फुट कर रोना शुरू कर दिया...

"अब ऐसे मत करो प्लीज़.. वरना अंजू भी जाग गयी तो बात घर से बाहर निकल जाएगी... चुप हो जाओ.. पिंकी को समझा दो कि किसी से इस बात का जिकर ना करे.. वरना हम दोनो पर मुसीबत आ जाएगी" तरुण मीनू के पास बैठ कर धीरे से बोला....

"अब क्या बोलूं मैं? क्या सम्झाउ उसको? समझने को रह ही क्या गया है.. ? मैं तो इसको मुँह दिखाने लायक भी नही रही... मैने मना किया था ना?.. मना किया था ना मैने? क्यूँ नही कंट्रोल हुआ तुमसे..? देख लिया 'तिल'? " मीनू रो रो कर पागल सी हुई जा रही थी.. ," अब मैं क्या करूँ?"

"प्लीज़ मीनू.. सांभलो अपने आपको! वो कोई बच्ची नही है.. सब समझती है.. उसको भी पता होगा कि लड़के लड़की में ये सब होता है! एक मिनिट... प्लीज़ चुप हो जाओ.. मैं उस'से बात करता हूँ" तरुण ने कहते हुए मीनू के सिर पर हाथ फेरा तो उसकी सिसकियो में कुच्छ कमी आई....

तरुण मीनू के पास से उठा और पिंकी की चारपाई के पास आ गया..," पिंकी!" तरुण ने रज़ाई उसके सिर से हटाते हुए प्यार से उसका नाम पुकारा.. पर पिंकी ने रज़ाई वापस खींच ली.. उसने कोई जवाब नही दिया...

"पिंकी.. सुन तो एक बार...!" इस बार तरुण ने रज़ाई हटाकर जैसे ही उसका हाथ पकड़ा.. वह उठ बैठी.. उसने तरुण से नज़रें मिलाने की बजाय अपना चेहरा एक तरफ ही रखा और गरजने लगी," मुझे.. मुझे हाथ लगाने की ज़रूरत नही है.. समझे!"

"पिंकी.. हम एक दूसरे से प्यार करते हैं.. इसीलिए वो सब कर रहे थे.. तुम्हे शायद नही पता इस प्यार में कितना मज़ा आता है.. तुम चाहो तो मैं तुम्हारे साथ भी... सच पिंकी.. इस'से ज़्यादा मज़ा दुनिया में किसी चीज़ में नही आता.." तरुण बाज नही आ रहा था...

"चुप हो जा कामीने!" पिंकी गुस्से से दाँत पीसती हुई बोली....

"समझने की कोशिश करो यार.. प्यार तो सभी करते हैं..!" तरुण ने इस बार और भी धीमा बोलते हुए उसके गालों को छूने की कोशिश की तो पिंकी का 'वो' रूप देख कर मैं भी सहम गयी..

"आए.. यार बोलना अपनी बेहन को.. और प्यार भी उसी से करना.. समझे.. मुझे हाथ लगाने की ज़रूरत नही है.. मुझे मेरी दीदी की तरह भोली मत समझना! कामीने कुत्ते.. मैं तुम्हे कितना अच्च्छा समझती थी.. 'भैया' कहती थी तुम्हे.. मम्मी तुमसे कितना प्यार करती थी.. और तुम क्या निकले? थू !" पिंकी मामले की नज़ाकत को समझते हुए धीरे बोल रही थी.. पर उसकी आँखों में देखने से ऐसा लगता था जैसे वो आँखें नही; जलते हुए अंगारे हों... उसकी उंगली सीधी तरुण की ओर तनी हुई थी और आख़िरी बात कह कर उसने तरुण के चेहरे की और थूक दिया..

तरुण की शकल देखने लायक हो गयी थी.. पर वो सच में ही एक नंबर. का कमीना निकला.. उल्टा चोर कोतवाल को साबित करने की कोशिश करने लगा," मुझे क्यूँ भासन दे रही है? तेरी बेहन से पूच्छ ना वो मुझे क्या मानती है.. कल की लौंडिया है, अपनी औकात में रह.. लगता है किसी से टांका नही भिड़ा अभी तक.. नही तो तुझे भी पता चल जाता इस 'प्यार' की खुजली क्या होती है...

गुस्से में तमतमयी हुई पिंकी ने चारपाई से उठने की कोशिश की पर तरुण ने उसको उठने ही नही दिया.. पिंकी को चारपाई पर ही दबोच कर वो उसके पास बैठ गया और ज़बरदस्ती उसकी चूचियो को मसल्ने लगा.. पिंकी घिघिया उठी.. वह अपने हाथों और लातों को बेबस होकर इधर उधर मारने लगी.. पर वह उसके शिकंजे से छ्छूटने में कामयाब ना हुई...

तरुण कुच्छ देर उसके अंगों को यूँही मसलता रहा.. बेबस होकर पिंकी रोने लगी.. अचानक पिछे से मीनू आई और तरुण का गिरेबान पकड़ कर उसको पिछे खींच लिया," छ्चोड़ दो मेरी बेहन को...!"

जैसे ही पिंकी तरुण के शिकंजे से आज़ाद हुई.. घायल शेरनी की तरह वो उस पर टूट पड़ी.. मैं देख कर हैरान थी.. पिंकी तरुण की छाती पर सवार थी और तरुण नीचे पड़ा पड़ा अपने चेहरे को उसके थप्पाड़ों से बचने की कोशिश करता रहा....

जी भर कर उसकी ठुकाई करने के बाद जब पिंकी हाँफती हुई अलग हुई तो ही तरुण को खड़ा होने का मौका मिल पाया... पिंकी के थप्पाड़ों की बौच्हर से उसका चेहरा लाल पड़ा हुआ था.. और गालों पर जगह जगह पिंकी के नाखुनो के निशान बने हुए थे....

"कुत्ते, कामीने.. निकल जा यहाँ से... हरररम जादा!" पता नही पिंकी अब तक कैसे अपने आप पर काबू किए हुए थी.. शायद मीनू की मर्ज़ी से हो रहे 'ग़लत काम' को तो उसने बर्दास्त कर भी लिया था.... पर उसके बदन पर तरुण के नापाक हाथ लगते ही तो वह चंडी का रूप धारण कर बैठी...

जी भर कर मार खाने के बाद तरुण की पिंकी की और देखने की हिम्मत तक नही हो रही थी... खिसियया हुआ सा वह दरवाजे के पास जाकर मीनू को घूर कर बोला,"कल कॉलेज में मिलता हूँ तेरे से.. तेरे नंगे फोटो खींच लिए हैं मैने.... और आज बता रहा हूँ.. इसको चार चार लड़कों से नही चुदवाया तो मेरा नाम भी तरुण नही...."

इस'से पहले कि पिंकी फिर से उस पर हमला करती.. वह दरवाजा खोल कर बाहर निकल गया...

मीनू फिर से अपनी चारपाई पर जाकर अंदर ही अंदर सुबकने लगी... अपने साँस उतार कर पिंकी उसके पास गयी और उस'से लिपट कर बोली," दीदी.. आप रोवो मत.. भूल जाओ सब कुच्छ... आपकी कसम मैं किसी को कुच्छ नही बताउन्गि.. और ना ही आपको कुच्छ कहूँगी इस बारे में... चुप हो जाओ ना दीदी.."

सुनकर मीनू का रोना और भी तेज हो गया.. और उसने अपनी छ्होटी, पर समझदारी में उस'से कहीं बड़ी बेहन को सीने से लगा लिया... पिंकी ने प्यार से उसके गालों को सहलाया और उसी के साथ लेट गयी.....

क्रमशः ..................