बाली उमर की प्यास compleet

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raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:36

बाली उमर की प्यास पार्ट--21

गतान्क से आगे...............

पर एक से शायद उसको सब्र नही हो रहा था... एक हाथ मेरी कमर के पिछे ले जाकर उसने मेरे कुल्हों पर रखा और नीचे से मुझे अपनी और खींचते हुए उपर से पिछे की और झुका लिया.. अब उसका पिछे वाला हाथ मुझे सहारा देने के लिए मेरी गर्दन पर था और दूसरे हाथ से उसने मेरी दूसरी चूची को किसी निरीह कबूतर की तरह दबोच लिया.....

मैं भी अधमरी सी होकर बड़बड़ाने लगी थी... मुझ पर अब 'प्यार का जादू सिर चढ़ कर बोलने लगा था और मैं संदीप के अलावा इस दुनिया का सब कुच्छ भूल चुकी थी... मीठी मीठी सिसकियाँ लेती हुई मैं आनंदित होकर रह रह कर सिहर सी जा रही थी.... मेरी हर सिसकी के साथ उसको मेरी रज़ामंदी का आभास होता और 'वो' और भी पागलकर जुट जाता....

करीब 5-6 मिनिट तक अपनी अल्हड़ मस्त चूचियो को बारी बारी से चुस्वाते रहने के बाद मैं पिछे झुकी हुई होने के कारण तंग हो गयी और उसके कॉलर पकड़ कर उपर उठने की कोशिश करने लगी... वह शायद मेरी दिक्कत समझ गया और मेरी चूची को मुँह से निकाल कर मुझे सीधी बैठा लिया...

मेरी चूचियो में जैसे खून उतर आया था और दोनो ही चूचिया संदीप के मुखरास (थूक) से सनी हुई थी... मैं मस्त हो चली थी.. मैने शरारत से उसकी आँखों में देखा और बोली," दिल भर गया हो तो मैं कुच्छ बोलूं...?"

उसने एक एक बार मेरी दोनो चूचियो के दानो को अपने होंटो में लेकर 'सीप' किया और फिर नशीले से अंदाज में मेरी ओर देख कर बोला..,"बोलो ना जान!"

मुझे उसके मुँह से ये सब सुन'ना बड़ा अच्च्छा लगा और मैने प्रतिक्रिया में तुरंत आगे होकर उसके होंटो को चूम लिया,"मुझे भी चूसना है....!" मैने कहा....

"क्या?" उसकी समझ में शायद आया नही था....

"ये" मैने लपक कर पॅंट के बाहर अकड़ कर झटके खा रहा उसका 'लिंग' पकड़ लिया...

"ओह्ह.. तुम्हे पता है कि लड़कियाँ इसको चूस्ति भी हैं?" उसने थोडा अचरज से कहा...

"नही... पर मेरा भी कुच्छ चूसने का दिल कर रहा है.. तुम्हारे पास मेरी तरह चूचिया तो हैं नही.. चूसने के लिए.. तो सोचा यही चूस लेती हूँ... आइस्क्रीम की तरह चूसूंगी.. हे हे हे...." मैने कहा और खिलखिला दी...

"आ जाओ.. नीचे घुटने टेक लो..." वा खुश होकर बोला.... मैने तुरंत वैसे ही किया और उसकी जांघों के उपर से हाथ निकाल कर उसकी कमर को पकड़े हुए उसकी दोनो टाँगों के बीच बैठ गयी.... मुझे 'पहले पेपर' वाली घटना याद आ गयी....

"एक मिनिट रूको..."कहकर वह उठा और अपनी पॅंट खींच कर निकाल दी और वापस मुझे अपनी टाँगों के बीच लेकर बैठ गया...

वह सोफे पर सरक कर इस तरह आगे आ गया था कि उसके सिर्फ़ नितंब ही सोफे पर टीके हुए थे... उसका लिंग पॅंट के बंधन से आज़ाद होने के बाद और भी बुरी तरह से फुफ्कारने लगा था... अंडरवेर के बीच वाले छेद से उसने पूरा का पूरा लिंग (उसके घुंघरुओं समेत) बाहर निकाल कर मेरे सामने कर दिया..," लो.. ये तुम्हारा ही है जान.. जी भर कर चूसो!"

मैने शरारत से उसकी आँखों में झाँकते हुए उसके लिंग को जड़ से मुट्ठी में पकड़ा और अपनी जीभ बाहर निकालकर उसके टमतरी सूपदे पर छलक आई एक और बूँद चाट ली.. वह सिहर उठा..,"अयाया.. ऐसे मत करो.. गुदगुदी हो रही है.. मुँह में ले लो...!"

"क्यूँ? मेरी मर्ज़ी है.. मुझे भी गुदगुदी हो रही थी... तुमने छ्चोड़ा था क्या मुझे.." मैं शरारत से बोली..,"अब ये मेरा है.. जैसे जी चाहेगा वैसे चूसूंगी....!"

"ओह्ह.. तो बदला ले रही हो.. ठीक है.. कर दो कत्ल.. कर लो मनमर्ज़ी..!" उसने आँख मार कर कहा.. तो मैं मुस्कुराइ और फिर से उसके लिंग को गौर से देखने लगी.....

"अमुन्ह्ह्ह्ह्ह" मैने उसके सूपदे पर अपने होंटो से इस तरह चुम्मि ली जैसे थोड़ी देर पहले उसके होंटो पर ली थी... उत्तेजना के मारे वह अपने नितंबों को हूल्का सा उपर उठाने पर मजबूर हो गया," इसस्शह"

"क्या हुआ?" मुझे उसकी हालत देख कर मज़ा आ रहा था...

"कुच्छ नही... बहुत ज़्यादा मज़ा आ रहा है.. इसीलिए काबू नही रख पाया....."वह वापस बैठता हुआ बोला....

मैने उसके लिंग को हाथ से पकड़ कर उसके पेट से मिला दिया और लिंग की जड़ में लटक रहे उसके घूंघारूओं को जीभ से जा च्छेदा...

"आअहह.. कैसे सीखा तुमने..? तुम तो ब्लू फिल्मों की तरह तडपा तापड़ा कर चूस रही हो... जल्दी ले लो ना!" उसने अपनी आँखें बंद कर ली और पिछे सोफे पर लुढ़क गया... शायद अब वह मुझसे जवाब सुन'ने की हालत में रहा ही नही था...

उसके पिछे लुढ़क जाने की वजह से अब उसका लिंग किसी तंबू की तरह छत की और तना हुआ था... बड़ा ही प्यारा दृश्या था... शायद जिंदगी भर 'उसको' भुला ना सकूँ... मैं आगे झुकी और अपनी जीभ निकाल कर जड़ से शुरू करके सूपदे तक अपनी जीभ को लहराती हुई ले आई.. और उपर आते ही फिर से सूपदे को वैसा ही एक चुम्मा दिया..... वह फिर से उच्छल पड़ा...,"ऐसे तो तुम मेरी जान ही ले लॉगी... आधे घंटे पहले ही निकाला था.. अब फिर ऐसा लग रहा है कि निकलने वाला है...."

मुझे उसकी नही.. अपनी फिकर थी... मैं खुद भी उसकी गोद में बैठे बैठे 2 बार झाड़ चुकी थी... और मुझे अब शरारत से उसके लिंग को गुदगुदाना अच्च्छा लग रहा था.... मैने एक बार फिर से उसके सूपदे को अपने होंटो से दूर करते हुए उसके लिंग को बीच से अपना मुँह पूरा खोल कर दाँतों के बीच दबोच लिया.. और हल्क हल्क दाँत उसकी मुलायम त्वचा में गाड़ने शुरू कर दिए....

"ऊओ हू हूओ.. आआआहह.. तुम इसको काट कर ले जाओगी क्या? क्यूँ मुझे तडपा रही हो..... जल्दी से चूसना ख़तम करो... बिना चोदे तुम्हे आज जाने नही दूँगा यहाँ से...." उसने पहली बार अश्लील शब्द का इस्तेमाल किया था... उसके मुँह से 'ये शब्द सुनकर मैं निहाल ही हो गयी...

मैने उसके लिंग को छ्चोड़ा और बोली," क्या किए बिना नही जाने दोगे?"

"श.. कुच्छ नही.. ऐसे ही मुँह से निकल गया था... मुझे लग रहा है कि मैं होश में ही नही हूँ आज...."

"नही.. बोलो ना! क्या किए बिना नही जाने दोगे मुझे..."मैं शरारत से मुस्कुराते हुए बोली....

"तुम्हे अच्च्छा लगा क्या? वो बोलना?" उसने मेरे गालों को अपने हाथों में लेकर बोला....

"हाँ..." मैने नज़रें झुका कर कहा और उसके 'पप्पू' जैसे सूपदे को अपने होंटो में दबा कर मुँह के अंदर ही अंदर उस पर जीभ फिराने लगी...

वह मस्त सा हो गया... मुझे जितना आनंदित होता 'वो दिखाई देता.. उतना ही ज़्यादा मज़ा मुझे उसके लिंग को छेड़ने में आ रहा था......

उसने अपने दोनो हाथ अपने कानो पर ले गया...," मर जाउन्गा जान.. आआआः... मुझे ये क्या हो रहा है... मा कसम.. तुझे चोदे बिना नही छ्चोड़ूँगा मैं... आज तेरी चूत 'मार' के रहूँगा... कितने दीनो से सपने देखता था कि किसी की चूत मिले.. और आज मिली तो ऐसी की सोच भी नही सकता था.... तेरी चूत मारूँगा जान.. आज तेरी चूत को अपने लौदे से फाड़ डाअलूँगा.... आआअहहाा... इसस्स्स्स्स्स्शह"

वो जो कुच्छ भी बोल रहा था.. मुझे सुनकर बड़ा मज़ा आ रहा था.... मैं उसके लिंग को अपने मुँह में लेकर उपर नीचे करती हुई चूस रही थी... जब उसका लिंग मेरे मुँह में अंदर घुसता तो उसकी आवाज़ कुच्छ और होती थी और जब बाहर आता तो कुच्छ और.... उसके लिंग को चूस्ते हुए मेरी लपर लपर और पागलों की तरह बड़बड़ा रहे संदीप की सिसकियों से हम दोनो और ज़्यादा मदहोश होते जा रहे थे...

"बस अब बंद करो जान... निकलने ही वाला है मेरा तो..." उसने अपने लिंग को मेरे मुँह से निकालने की कोशिश करते हुए कहा....

"बस दो मिनिट और..." मैने लिंग मुँह से निकाल लिया उसको बराबर से चूमने चाटने लगी......

"ओह्ह्ह... मर जाउन्गा जाअँ.. क्यूँ इतना तडपा रही हो.. मान जाओ ना..." संदीप ने मेरे दोनो कंधे कसकर पकड़ लिए और जैसे अचानक ही उसके हाथ अकड़ से गये... उसके लिंग को चाटने में खोई हुई मुझको अचानक उसकी नशों में उभर सा महसूस हुआ और जब तक मैं समझती.. उसके लिंग से निकल कर कामरस की तीन बौच्चरें मेरी शकल सूरत बिगाड़ चुकी थी.. पहली आकर सीधी मेरी आँख के पास लगी.. जैसे ही हड़बड़ा कर मैं थोड़ी पिछे हटी.. दूसरी मेरे होंटो पर और मेरे उठने से पहले गाढ़े रस की एक बौच्हर मेरी बाईं चूची को गिलगिला कर गयी...

"अफ.." मैने खड़ी होकर अपनी आँख से उसका रस पौंचछते हुए देखा... उसका लिंग अब भी झटके खा रहा था और हर झटके के साथ लगातार धीमी पड़ती हुई पिचकारियाँ निकल रही थी.....

"सॉरी जान... मैने तुम्हे पहले ही बोला था कि छ्चोड़ दो... मेरा निकलने वाला है..." संदीप मायूस होकर बोला....

मैने अपनी जीभ बाहर निकाल कर मेरे होंटो पर लगे उसके रस को चाट लिया और मुस्कुराते हुए बोली," कोई बात नही... पर इसको बैठने मत देना...!" उसके रस की बात कुच्छ अलग ही थी... 'वो' वैसा नही था जैसा मैने स्कूल में चखा था... उसकी अजीब सी गंध ने मुझे उसको जीभ से ही सॉफ करने पर मजबूर कर दिया.... होंटो को अच्छि तरह सॉफ करने के बाद मैं मुस्कुराइ और फिर से उसकी जांघों के बीच बैठ गयी......

संदीप का लिंग अब धीरे धीरे सिकुड़ने लगा था.. जैसे ही मैने उसको अपने कोमल हाथों में लिया; उसमें हुलचल सी हुई और उसका सिकुड़ना वहीं रुक गया..

"ऐसे तो बड़ा मासूम सा लग रहा है.." मैं उसको हाथ में पकड़े उपर नीचे करती हुई संदीप की आँखों में देख कर शरारत से मुस्कुराइ...

"ये सच मासूम ही है अंजू.. आज पहली बार किसी लड़की के हाथों में आया है.. और 'वो' जन्नत तो इसने कभी देखी ही नही है.. जिसके लिए ये फुदकता रहता है..." संदीप ने मेरी चूची को पकड़ कर हूल्का सा हिलाया.. मेरे अरमान थिरक उठे...

"जन्नत? कैसी जन्नत?" मैं जानबूझ कर बोली...

"वोही... लड़की की...."कहकर वो मुस्कुराने लगा...

"लड़की की क्या? ... खुल कर बोलो ना...!" जैसे ही उसने मेरे दानो को छेड़ना शुरू किया.. मैं तड़प उठी... लिंग का आकार फिर से बढ़ने लगा था... मैने पूरा लेने के चक्कर में अपने होन्ट खोले और उसका सारा लिंग 'खा' गयी...

"आअहह... तुमने.. ज़रूर पहले भी ऐसा किया है अंजू.. लगता नही कि तुम पहली बार कर रही हो... आआहह..." संदीप सिसक कर बोला...

मैं रूठ कर खड़ी हो जाना चाहती थी.. पर मेरी 'तालू' को गुदगुदते हुए लगातार भारी होते जा रहे 'लिंग' की मस्तानी अंगड़ाई ने मुझे मजबूर कर दिया कि मैं चुप चाप बैठी अपने मुँह में उसके 'नन्हे मुन्ने' को 'जवान' होता हुआ महसूस करती रहूं... उसका लिंग 'जड़' तक मेरे मुँह में छिपा हुआ था.. और उसके घुंघरू मेरी थोड़ी से सटे हुए लटक रहे थे जिन्हे मैने अपनी हथेली में च्छुपाया हुआ था....

लिंग के आकार में बढ़ते रहने के साथ ही संदीप की सिसकियाँ मेरे कानो में सुनाई देने लगी.. कुच्छ पल बाद ही 'वह' इतना बढ़ गया कि मेरी 'तालू' से आड़ जाने के बाद बड़ा होकर बाहर निकलने लगा.. और उसके घुंघरू मेरी तोड़ी से दूर जाने लगे....

"अंदर ही रखो ना जान... अंदर मज़ा आ रहा है..." संदीप ने तड़प कर मेरे सिर को पिछे से पकड़ लिया...

चाहती तो मैं भी यही थी.. पर क्या करूँ.. उसकी लंबाई के लायक मेरे मुँह में जगह कम होती जा रही थी... मैं अपनी नज़रों को अपनी नाक की नोक पर टिकाए बेबस सी उसको बाहर आते देखती रही.. मोटाई भी इतनी बढ़ गयी थी की मुझे अपने होंटो को.. जितना हो सकती थी.. उतना खोलना पड़ा....

अचानक संदीप को जाने क्या सूझा.. मेरे सिर को पिछे से तो वो पहले ही पकड़े हुए था.. ज़ोर लगाकर मेरे सिर को आगे की तरफ खींच लिया...

"गगग्गगूऊऊऊऊग़गगूऊऊऊऊवन्न्‍न्

णनूूग़गगूऊऊ" मेरे हलक से सिर्फ़ यही आवाज़ निकल पाई... उसके तेज़ी से झटका मारते ही उसका लिंग सीधा जाकर मेरे गले में फँस गया... मेरी आँखें बाहर निकलने को हो गयी.. मैने लचर होकर अपने हाथ उठा कर उसको छ्चोड़ देने का इशारा किया....

"आआआआआहह..... क्या मज़ा था..." संदीप ने कहकर आँखें खोली और मेरी आँखों में पानी देख कर बोला..,"क्या हुआ जान...?"

मैने खड़ी होकर अपने आँसू पौन्छे.. और मेरे थूक में बुरी तरह गीले हो कर टपक से रहे उसके लिंग को देखते हुए मुँह बनाकर बोली..," हुंग! क्या हुआ!.. मेरा दम घुट जाता तो?"

"अर्रे.. ऐसे किसी का दम नही घुट'ता.. पहली बार लिया है ना... इसीलिए अजीब लगा होगा..."संदीप मासूमियत से बोला....,"अच्च्छा सॉरी... चलो ना.. अब सेक्स करें...?"

मेरी चिड़िया भी तब तक तीसरी बार रस उगलने के लिए तैयार हो रही थी...,"नही.. पहले वही बोलो.. जो तब बोल रहे थे..." मैं मचल कर एक बार फिर उसकी गोद में जा चढ़ि... मेरीचूचियो को अपनी आँखों के सामने रसीले संतरों की तरह लटक'ते देख वो एक बार फिर से बावला सा हो गया.. दोनो चूचियो को अपने हाथों में दबोच कर उनके गुलाबी दानों को घूरता हुआ बोला...,"सब कुच्छ बोल दूँगा.. पर काम शुरू होने के बाद..." उसने कहा और मेरे दानो को अपने दाँतों से हौले हौले कुतरने लगा.....

अचानक उसने अपने एक हाथ को आज़ाद करके मेरी सलवार के नाडे को पकड़ लिया.. और चूचियो से मुँह हटा कर बोला," खोल दूं ना?"

"नही!" मैने गुस्से से मुँह बना कर कहा...

"क्यूँ क्या हुआ?" उसके चेहरे का अचानक रंग सा उड़ गया....

"अर्रे सारे 'काम' दूसरे से पूच्छ कर करते हो क्या..? मैं चिड कर बोली और उसकी जांघों के दोनो और घुटने टीका कर उपर उठ गयी.. मेरी छ्होटी सी नाभि उसकी आँखों के ठीक सामने आ गई....

"ओह्ह.. हे हे हे... मैं तो बस ऐसे ही..."उसने थोड़ा झेंप कर बोला और मेरा नाडा अपनी ओर खींच लिया... हुल्की सी 'गाँठ खुलने की आवाज़ हुई और मेरी सलवार ढीली हो गयी.... शुक्रा है उसने मेरी सलवार को उपर ही पकड़ कर ये नही पूचछा..," नीचे खिसक जाने दूँ क्या?"

जैसे ही उसने नाडा खींच कर छ्चोड़ा... मेरी सलवार नीचे सरक कर मेरी जांघों में फँस गयी... बाकी काम पूरा करने में उसने एक सेकेंड भी नही लगाया... झट से मेरी सलवार को खींच कर घुटनो तक नीचे सरका दिया....

मेरी नज़रें संदीप की आँखों पर थी और उसकी आस्चर्य से फटी हुई सी आँखें मेरी जांघों में फाँसी हुई मेरी सफेद कछी पर... योनि के निचले हिस्से के बाहर कछी गीली हो चुकी थी.. और शायद कछी का रंग भी थोड़ा बदला हुआ था...

उसकी आँखें किसी नन्हे बच्चे के समान चमक उठी.. अपने हाथों से उसने मेरे नितंबो को कसकर पकड़ा और थोड़ा झुक कर कछी के उपर से ही एक प्यारा सा चुंबन ले लिया.... "आआअहह" मेरा बदन तृष्णा के मारे जल उठा.. और मैने भावुक होकर उसका सिर पकड़ लिया....

उसने नज़रें उपर करके मेरी नशीली हो चुकी आँखों में झाँका.. शायद कछी को नीचे करने की पर्मिशन ले रहा था.... जैसे ही मैं मुस्कुराइ उसने मेरी कछी में उपर से हाथ डाला और 'अपनी जन्नत' को अपनी नज़रों के सामने नंगी कर लिया.....

"वाआआः..." उसके मुँह से अपने आप ही निकल गया और बेदम सा होकर कुच्छ पल के लिए उसकी आँखों की पुतलियान सिकुड गयी... ठीक वैसे ही जैसे अंधेरे से अचानक प्रकाश में जाने पर सिकुड जाती हैं... उसकी मनचाही मुराद पूरी हो गयी... उसको अपनी मंज़िल का ज्योति बिंदु दिखाई दे गया...

वह आँखें फाडे स्थिर सा होकर मेरी चिड़िया को देखता ही रह गया.... देखता भी क्यूँ नही...? आख़िर उसने पहली बार 'ऐसी' नायाब चीज़ देखी थी जिसके लिए जाने कितने ही विश्वामित्रा स्वर्ग के सिंहासन तक को ठोकर मार देते हैं.... जिसके लिए मर्द 'भूखे' कुत्ते की तरह जीभ लपलपता घूमता रहता है.... 'जो' घर घर में होती है... पर सभ्य समाज में जिसको नाजायज़ तरीके से पाना 'आवरेस्ट' पर चढ़ने से कम नही.....

जिसके लिए दुनिया भर की अदालतों ने एक ही क़ानून बना रखा है... जिसके पास 'योनि' है.. उसकी बात पहले सुनी जाएगी.. उसकी बात पर ही पहले विश्वास किया जाएगा... 'योनि' को अपने साथ हुई ज़बरदस्ती को साबित करने के लिए कोई जखम दिखाने की ज़रूरत नही... सिर्फ़ 'योनि वाली' को एक इशारा करना पड़ेगा और 'भोगने' वाले की 'उम्रकैद' पक्की.... भला सर्वत्र विद्यमान होकर भी दुर्लभ ऐसी चीज़ को बिना तपस्या किया इतनी आसानी से; अपनी मर्ज़ी से; अपनी आँखों के सामने फुदकट्ी हुई देख कर कोई पागल नही होगा तो क्या होगा....

और योनि भी कोई ऐसी वैसी नही... जैसे इंपोर्टेड 'माल' हो... जैसे 'गहरे' सागर की कोई बंद 'सीप' हो जिसके अंदर 'मोती' तो मिलेगा ही मिलेगा.... जैसे तिकोने आकर में कोई माचिस की डिबिया हो.. छ्होटी सी.. पर बड़ी काम की और बड़ी ख़तरनाक... चाहे तो घर के घर जला कर खाक कर दे... चाहे तो अपने प्यार की 'दो' बूँद टपका कर किसी के घर को 'चिराग' से रोशन कर दे....

"ऐसे क्या देख रहे हो?" मैं मचल कर बोली....

"क्कुच्छ नही.... ययएए तो.. बड़ी प्यारी है..." योनि के उपरी हिस्से पर उगे हुए हल्क हल्क बालों को प्यार से सहलाते हुए वह बोला...

"हां.. जो भी है.. जल्दी करो ना !" मैं तड़प कर गहरी साँस लेती हुई बोली....

"म्मैने तो कभी सपने में भी नही सोचा था... इसके होन्ट तो उतने ही प्यारे हैं जीतने तुम्हारे उपर वाले...."

"होन्ट?" मैने तब पहली बार 'योनि' की फांकों को 'होन्ट' कहते किसी को सुना था... मैं थोड़ी नीचे झुक कर देखती हुई बोली...

"हां... ये..." कहते हुए संदीप ने योनि की एक फाँक को अपनी चुटकी में भर लिया... अंजाने में ही उसका अंगूठा मेरी फांकों के बीच च्छूपी हुई 'मदनमानी' (क्लाइटॉरिस) को छू गया और मैं आनंद से उच्छल पड़ी...,"क्या करते हो?"

"देख रहा हूँ बस!" पागला से गये संदीप ने भोलेपन से इस तरह कहा मानो चार आने में ही एक बार और 'हेमा मालिनी' को देखना चाहता हो...

समझ नही आया ना! दरअसल मेरी दादी बताती थी... मेरे जनम के कुच्छ टाइम पहले तक गाँव में एक डिब्बे वाला पिक्चर दिखाने आता था... उसको सब 12 मन की धोबन कहा करते.... पिक्चर देखने वाले बच्चों से 'वो' चार आने लेता और एक सुराख में आँख लगाने को कहता... 'बच्चे' के आँख लगाने पर वो बाहर एक पहियाँ सा घूमता और अंदर अलग अलग हीरो हेरोइनो के फोटो चलते नज़र आते... बच्चे उसको बड़े चाव से देखते थे... दादी बताती थी कि एक बार तुम्हारे पापा ने उस 'सुराख' से आँखें चिपकाई तो हटाने का नाम ही ना लिया... मशीन वाले ने काई बार उनको हटने के लिए कहा पर वो अपनी आँख वहीं गड़ाए बार बार यही कहते रहे...,"देख रहा हूँ ना! अभी हेमा मालिनी नही आई है..."

कुच्छ ऐसी ही हालत संदीप की थी.. मैं वासना की अग्नि में तड़प रही थी.. और 'वो' बार बार एक ही रट लगाए हुए था...,"बस एक बार और.. थोड़ी सी देख रहा हूँ..."

ऐसा नही था कि संदीप की हालत खराब ना हुई हो... योनि को देखते देखते ही उसकी साँसें उपर नीचे होने लगी थी.. उसके गाल उत्तेजना के मारे लाल होते जा रहे थे... नथुने फूले हुए थे.. पर वह जाने उसमें क्या ढूँढ रहा था... मैं उत्तेजना के चरम पर आ चुकी थी.. सहसा उसने दोनो हाथों से मेरी चिड़िया की फांकों को फैला दिया.. और मेरी योनि का चीरा करीब एक इंच चौड़ा हो गया.... खूनी रंग का मेरी योनि का अंदर का चिकना भाग देख कर तो वो मानो होश ही खो बैठा.. अंदर च्छूपी हुई हल्क भूरे रंग की 'दो' पत्तियाँ अब उसकी आँखों के सामने आ गयी.. उसने दोनो पट्टियों को चुटकियों में लिया और मेरी योनि की 'तितली' बना' दिया.. पट्टियों को बाहर की ओर मेरी योनि की फांकों पर चिपका कर... इसके साथ ही उसने अपनी एक उंगली 'पट्टियों' के बीच रखी और बोला...,"यही है ना...."

"हां हां.. यही है.. तुम जल्दि क्यूँ नही करते... कोई आ जाएगा तो?" मैं नाराज़ सी होकर बोली....

मेरी नाराज़गी से वह अचानक इतना डरा कि मेरी बात को आदेश मान कर 'सर्र्ररर' से उंगली अंदर कर दी... मैं हुल्की सी उचक कर सिसक पड़ी," आआहह....!"

बहुत ज़्यादा चिकनी होने के कारण एक ही झटके में मेरी योनि ने उंगली को बिना किसी परेशानी के पूरी निगल लिया... वह सहम कर मेरी और देखने लगा.. जैसे मेरी प्रतिक्रिया जान'ना चाहता हो.....

"उसको कब डालोगे...?" मैने तड़प कर कहा.....

"डालता हूँ.. थोड़ी देर उंगली से कर लूँ.. मेरे दोस्त कहते हैं कि पहले ऐसे ही करना चाहिए.. नही तो बहुत दर्द होता है....!" वह उंगली को बाहर निकाल कर फिर से अंदर फिसलता हुआ बोला.....

मैं झल्ला उठी.. अजीब नमूना हाथ लगा था उस दिन, पहली बार... मैं 'उसको' अंदर घुस्वाने के लिए तड़प रही थी और वो मुझे डराने पर तुला हुआ था," होने दो... फटेगी तो मेरी फटेगी ना... तुम्हारी क्यूँ...." मैं 'फट रही है' कहना चाहती थी... पर मंन में ही दबा गया... बहुत सेन्सिटिव केस था ना...

"अच्च्छा अच्छा.. ठीक है.. करता हूँ..." उसने सकपका कर अपनी उंगली बाहर निकाल ली.. और फिर से मेरी आँखों में देखने लगा," कैसे करूँ?"

"मुझे नीचे पटक कर घुसा दो... तुम तो बिल्कुल लल्लू हो!" मेरे मुँह से गुस्से और बेकरारी में निकल ही गया...

"सॉरी.. मैने कभी पहले किया नही है..." संदीप पर पड़ी डाँट का असर मुझे उसके टँटानाए हुए 'लिंग' पर भी सॉफ दिखाई दिया... 'वो' थोड़ा मुरझा सा गया... मुझे अपनी ग़लती पर गहरा अफ़सोस हुआ...,"सॉरी.. ऐसे ही गुस्से में निकल गया..." मैने उसके लिंग को पूचकार कर फिर से 'कुतुबमीनार' की तरह सीधा टाँग दिया..,"अच्च्छा.. एक मिनिट...!"

जैसे ही मैने कहा...मुझे प्यार से सोफे पर लिटाने की कोशिश कर रहा संदीप वहीं का वहीं रुक गया,"बोलो!"

मुझे ढोलू का मुझे अपनी गोद में लेकर लिंग पर बिठाना 'याद' आ गया.. मैने नीचे उतरी और मुड़कर जैसे ही अपनी सलवार और कच्च्ची को टाँगों से निकालने के लिए झुकी.. संदीप ने लपक कर मेरे नितंबों को पकड़ लिया,"ऐसे ठीक रहेगा अंजू.. यहाँ से बहुत अच्च्ची दिखाई देती है...!"

"क्या? मैने सलवार को निकाल कर सोफे पर डाला और उसकी तरफ सीधी खड़ी होकर पूचछा....

"ये.." वा मेरी योनि को मुथि में दबोच कर बोला...,"टेबल पर झुक जाओ.. तुम्हारी 'इस' का सुराख पिछे आ जाता है...!" वा खुश होकर बोला....

"ठीक है.. ये लो..."मैने कहा और टेबल पर सीधे हाथ रख कर मूड गयी...

"ऐसे नही.. पिछे से थोडा उपर हो जाओ.."वह नितंबों के बीच मेरी योनि पर हाथ रख कर उसको उपर उठाने की कोशिश करने लगा....

"और उपर कैसे होउ..? मेरी टांगे तो पहले ही सीधी हैं....."मैने कहा और मेरे दिमाग़ में कुच्छ आया..,"अच्च्छा.. ये लो.." मैने टेबल पर कोहनियाँ टीका ली....

"हां.. ऐसे!" वह खुश होकर बोला... और सोफे पर बैठ कर मेरे नितंबों पर हाथ फेरने लगा....

"अब करो ना...." मैने कसमसा कर अपने कूल्हे मटकाए....

"हां हां..." कहकर वो खड़ा हो गया और आगे होकर मेरे नितंबों के बीचों बीच उसके लिंग के स्वागत में खुशी के आंशु टपका रही योनि पर अपने लिंग का सूपड़ा रख दिया......

योनि और लिंग तो आख़िर एक दूसरे के लिए ही बने होते हैं... मेरी योनि जैसे अंदर ही अंदर दाहक रही थी.. जैसे ही उसको सूपड़ा अपने द्वार पर महसूस हुआ.. 'वो' बहक गयी.. और उसमें से टॅप टॅप करके प्रेमरस की बारिश सी होने लगी....,"आ.. कर दो ना संदीई...." मेरा बुरा हाल था... मुझे पता ही नही था की मैं कहा हूँ.. मेरा पूरा बदन मदहोशी से अकड़ सा गया था....

"हां... मैं अब धक्का लगाउन्गा... दर्द हो तो बता देना.... ठीक है..?" वो मुझे तड़पने में कोई कसर नही छ्चोड़ रहा था... उसका सूपड़ा अब भी मेरी योनि को चीरने से पहले इजाज़त माँग रहा था...

"जल्दी करो ना...." मैने कहा ही था कि उसने दबाव बढ़ा दिया... पर सूपड़ा तो अंदर नही गया.. उल्टा मैं पूरी ही थोड़ी आगे सरक गयी...

अपनी कोहनियों को वापस पिछे टीका कर मैं फिर से तैयार हुई..,"लो.. अब की बार करो..."

उसने फिर धक्का लगाया.. और मैं फिर से उसके दबाव को ना झेल पाने के कारण आगे सरक गयी...

"तुम आगे क्यूँ जा रही हो?" वा वापस सूपड़ा मेरी योनि पर टिकाते हुए बोला....

मैं तंग आकर सीधी खड़ी हो गयी...,"तुम सोफे पर बैठो.. मैं करती हूँ.." मैं बदहवास सी हालत में जल्दी जल्दी बोली....

"क्या?" वा समझ नही पाया और मेरी तरफ टुकूर टुकूर देखने लगा....

"तुम बैठो ना जल्दी.. मैं अपने आप घुसा लूँगी..." मैने उसका धक्का देकर सोफे पर धकेल दिया....

"ठीक है.. तुम खुद ही कर लो..."उसने किसी अच्छे बच्चे की तरह कहा और हाथ में पकड़ा हुआ अपना लिंग सीधा उपर की और तान कर बैठ गया.......

क्रमशः....................

Gataank se aage...............

Par ek se shayad usko sabra nahi ho raha tha... Ek hath meri kamar ke pichhe le jakar usne mere kulhon par rakha aur neeche se mujhe apni aur kheenchte huye upar se pichhe ki aur jhuka liya.. ab uska pichhe wala hath mujhe sahara dene ke liye meri gardan par tha aur dusre hath se usne meri dusri chhati ko kisi nireeh kabootar ki tarah daboch liya.....

Main bhi adhmari si hokar badbadane lagi thi... Mujh par ab 'pyar ka jaadu sir chadh kar bolne laga tha aur main Sandeep ke alawa iss duniya ka sab kuchh bhool chuki thi... Meethi meethi siskiyan leti huyi main aanandit hokar rah rah kar sihar si ja rahi thi.... Meri har siski ke sath usko meri rajamandi ka aabhas hota aur 'wo' aur bhi paglakar jut jata....

Kareeb 5-6 minute tak apni alhad mast chhatiyon ko bari bari se chuswate rahne ke baad main pichhe jhuki huyi hone ke karan tang ho gayi aur uske collar pakad kar upar uthne ki koshish karne lagi... Wah shayad meri dikkat samajh gaya aur meri chhatiyon ko munh se nikal kar mujhe seedhi baitha liya...

Meri chhatiyon mein jaise khoon utar aaya tha aur dono hi chhatiyan Sandeep ke mukhras (thook) se sani huyi thi... Main mast ho chali thi.. maine shararat se uski aankhon mein dekha aur boli," Dil bhar gaya ho toh main kuchh bolun...?"

Usne ek ek baar meri dono chhatiyon ke daano ko apne honton mein lekar 'sip' kiya aur fir nasheele se andaj mein meri aur dekh kar bola..,"Bolo na Jaan!"

Mujhe uske munh se ye sab sun'na bada achchha laga aur maine pratikriya mein turant aage hokar uske honton ko choom liya,"Mujhe bhi choosna hai....!" Maine kaha....

"Kya?" Uski samajh mein shayad aaya nahi tha....

"Ye" Maine lapak kar pant ke bahar akad kar jhatke kha raha uska 'ling' pakad liya...

"Ohh.. tumhe pata hai ki ladkiyan isko choosti bhi hain?" Usne thoda achraj se kaha...

"Nahi... par mera bhi kuchh choosne ka dil kar raha hai.. tumhare paas meri tarah chhatiyan toh hain nahi.. choosne ke liye.. toh socha yahi choos leti hoon... icecream ki tarah choosoongi.. he he he...." Maine kaha aur khilkhila di...

"Aa jao.. neeche ghutne take lo..." wah khush hokar bola.... Maine turant waise hi kiya aur uski jaanghon ke upar se hath nikal kar uski kamar ko pakde huye uski dono taangon ke beech baith gayi.... Mujhe 'pahle paper' wali ghatna yaad aa gayi....

"Ek minute ruko..."Kahkar wah utha aur apni pant kheench kar nikal di aur wapas mujhe apni taangon ke beech lekar baith gaya...

Wah sofe par sarak kar iss tarah aage aa gaya tha ki uske sirf nitamb hi sofe par tike huye the... uska ling pant ke bandhan se aazad hone ke baad aur bhi buri tarah se fufkaarne laga tha... underwear ke beech waale chhed se usne poora ka poora ling (uske ghunghruon samet) bahar nikal kar mere saamne kar diya..," Lo.. ye tumhara hi hai jaan.. ji bhar kar chooso!"

Maine shararat se uski aankhon mein jhante huye uske ling ko jad se mutthi mein pakda aur apni jeebh bahar nikalkar uske tamatari supade par chhalak aayi ek aur boond chat li.. wah sihar utha..,"aaaah.. aise mat karo.. gudgudi ho rahi hai.. munh mein le lo...!"

"Kyun? Meri marzi hai.. mujhe bhi gudgudi ho rahi thi... tumne chhoda tha kya mujhe.." Main shararat se boli..,"Ab ye mera hai.. jaise ji chahega waise choosoongi....!"

"Ohh.. toh badla le rahi ho.. theek hai.. kar do katl.. kar lo manmarzi..!" Usne aankh maar kar kaha.. toh main muskurayi aur fir se uske ling ko gour se dekhne lagi.....

"amunhhhhha" Maine uske supade par apne honton se iss tarah chummi li jaise thodi der pahle uske honton par li thi... uttejna ke maare wah apne nitambon ko hulka sa upar uthane par majboor ho gaya," issshhhhhhhhhhhhhhhhhhhhh"

"Kya hua?" Mujhe uski halat dekh kar maja aa raha tha...

"Kuchh nahi... bahut jyada maja aa raha hai.. isiliye kaabu nahi rakh paya....."Wah wapas baithta hua bola....

Maine uske ling ko hath se pakad kar uske pate se mila diya aur ling ki jad mein latak rahe uske ghungharuon ko jeebh se ja chheda...

"aaahhh.. kaise seekha tumne..? tum toh blue filmon ki tarah tadpa tapda kar choos rahi ho... jaldi le lo na!" Usne apni aankhein band kar li aur pichhe sofe par ludhak gaya... shayad ab wah mujhse jawab sun'ne ki halat mein raha hi nahi tha...

Uske pichhe ludhak jane ki wajah se ab uska ling kisi tambu ki tarah chhat ki aur tana hua tha... bada hi pyara drishya tha... shayad jindagi bhar 'usko' bhula na sakoon... main aage jhuki aur apni jeebh nikal kar jad se shuru karke supade tak apni jeebh ko lahrati huyi le aayi.. aur upar aate hi fir se supade ko waisa hi ek chumma diya..... Wah fir se uchhal pada...,"Aise toh tum meri jaan hi le logi... aadhe ghante pahle hi nikala tha.. ab fir aisa lag raha hai ki nikalne wala hai...."

Mujhe uski nahi.. apni fikar thi... main khud bhi uski god mein baithe baithe 2 baar jhad chuki thi... aur mujhe ab shararat se uske ling ko gudgudana achchha lag raha tha.... Maine ek baar fir se uske supade ko apne honton se door karte huye uske ling ko beech se apna munh poora khol kar daanton ke beech daboch liya.. aur hulke hulke daant uski mulayam twacha mein gadane shuru kar diye....

"Ooo hoo hooo.. aaaaaahh.. tum isko kaat kar le jaogi kya? kyun mujhe tadpa rahi ho..... jaldi se chusna khatam karo... bina chode tumhe aaj jane nahi doonga yahan se...." Usne pahli baar ashleel shabd ka istemaal kiya tha... uske munh se 'ye shabd sunkar main nihal hi ho gayi...

Maine uske ling ko chhoda aur boli," Kya kiye bina nahi jaane doge?"

"Ohh.. kuchh nahi.. aise hi munh se nikal gaya tha... mujhe lag raha hai ki main hosh mein hi nahi hoon aaj...."

"Nahi.. bolo na! kya kiye bina nahi jane doge mujhe..."Main shararat se muskurate huye boli....

"Tumhe achchha laga kya? wo bolna?" Usne mere gaalon ko apne hathon mein lekar bola....

"Haan..." Maine najrein jhuka kar kaha aur uske 'pappu' jaise supade ko apne honton mein daba kar munh ke andar hi andar uss par jeebh firane lagi...

Wah mast sa ho gaya... mujhe jitna aanandit hota 'wo dikhayi deta.. utna hi jyada maja mujhe uske ling ko chhedne mein aa raha tha......

Usne apne dono hath apne kaano par le gaya...," Mar jaaaunga jaan.. aaaaah... mujhe ye kya ho raha hai... maa kasam.. tujhe chode bina nahi chhodunga main... aaj teri choot 'maar' ke rahoonga... kitne dino se sapne dekhta tha ki kisi ki choot mile.. aur aaj mili toh aisi ki soch bhi nahi sakta tha.... teri choot maarunga jaan.. aaj teri choot ko apne loude se faad daaalunga.... aaaaahhhhhaaaa... isssssssshhh"

Wo jo kuchh bhi bol raha tha.. mujhe sunkar bada maja aa raha tha.... Main uske ling ko apne munh mein lekar upar neeche karti huyi choos rahi thi... jab uska ling mere munh mein andar ghusta toh uski aawaj kuchh aur hoti thi aur jab bahar aata toh kuchh aur.... Uske ling ko chooste huye meri lapar lapar aur pagalon ki tarah badbada rahe Sandeep ki siskiyon se hum dono aur jyada madhosh hote ja rahe the...

"Bus ab band karo jaan... nikalne hi wala hai mera toh..." Usne apne ling ko mere munh se nikalne ki koshish karte huye kaha....

"Bus do minute aur..." Maine ling munh se nikal liya usko barabar se choomne chaatne lagi......

"Ohhh... mar jaaunga jaaan.. kyun itna tadpa rahi ho.. maan jao na..." Sandeep ne mere dono kandhe kaskar pakad liye aur jaise achanak hi uske hath akad se gaye... Uske ling ko chatne mein khoyi huyi mujhko achanak uski nashon mein ubhar sa mahsoos hua aur jab tak main samajhti.. uske ling se nikal kar kaamras ki teen bouchharein meri shakal soorat bigad chuki thi.. pahli aakar seedhi meri aankh ke paas lagi.. jaise hi hadbada kar main thodi pichhe hati.. dusri mere honton par aur mere uthne se pahle gaadhe ras ki ek bouchhar meri bayin chhati ko gilgila kar gayi...

"Uff.." Maine khadi hokar apni aankh se uska ras pounchhte huye dekha... uska ling ab bhi jhatke kha raha tha aur har jhatke ke sath lagataar dheemi padti huyi pichkariyan nikal rahi thi.....

"Sorry jaan... maine tumhe pahle hi bola tha ki chhod do... mera nikalne wala hai..." Sandeep mayoos hokar bola....

Maine apni jeebh bahar nikal kar mere honton par lage uske ras ko chaat liya aur muskurate huye boli," Koyi baat nahi... par isko baithne mat dena...!" Uske ras ki baat kuchh alag hi thi... 'wo' waisa nahi tha jaisa maine school mein chakha tha... uski ajeeb si gandh ne mujhe usko jeebh se hi saaf karne par majboor kar diya.... honton ko achchhi tarah saaf karne ke baad main muskurayi aur fir se uski jaanghon ke beech baith gayi......

Sandeep ka ling ab dheere dheere sikudne laga tha.. Jaise hi maine usko apne komal hathon mein liya; usmein hulchal si huyi aur uska sikudna wahin ruk gaya..

"Aise toh bada masoom sa lag raha hai.." Main usko hath mein pakde upar neeche karti huyi Sandeep ki aankhon mein dekh kar shararat se muskurayi...

"Ye sach masoom hi hai Anju.. Aaj pahli baar kisi ladki ke hathon mein aaya hai.. aur 'wo' jannat toh isne kabhi dekhi hi nahi hai.. jiske liye ye fudakta rahta hai..." Sandeep ne meri chhati ko pakad kar hulka sa hilaya.. mere armaan thirak uthe...

"Jannat? kaisi jannat?" Main jaanboojh kar boli...

"Wohi... ladki ki...."Kahkar wo muskurane laga...

"Ladki ki kya? ... khul kar bolo na...!" Jaise hi usne mere daano ko chhedna shuru kiya.. main tadap uthi... Ling ka aakar fir se badhne laga tha... maine poora lene ke chakkar mein apne hont khole aur uska sara ling 'kha' gayi...

"Aaahhh... Tumne.. jaroor pahle bhi aisa kiya hai Anju.. lagta nahi ki tum pahli baar kar rahi ho... aaaahhh..." Sandeep sisak kar bola...

Main rooth kar khadi ho jana chahti thi.. par meri 'talu' ko gudgudate huye lagataar bhari hote ja rahe 'ling' ki mastaani angdayi ne mujhe majboor kar diya ki main chup chap baithi apne munh mein uske 'nanhe munne' ko 'jawaan' hota hua mahsoos karti rahoon... Uska ling 'jad' tak mere munh mein chhipa hua tha.. aur uske ghungharoo meri thodi se satey huye latak rahe the jinhe maine apni hatheli mein chhupaya hua tha....

Ling ke aakar mein badhte rahne ke sath hi Sandeep ki siskiyan mere kaano mein sunayi dene lagi.. kuchh pal baad hi 'wah' itna badh gaya ki meri 'talu' se ad jane ke baad bada hokar bahar nikalne laga.. aur uske ghunghroo meri thodi se door jane lage....

"Andar hi rakho na jaan... andar maja aa raha hai..." Sandeep ne tadap kar mere sir ko pichhe se pakad liya...

Chahti toh main bhi yahi thi.. par kya karoon.. uski lambayi ke layak mere munh mein jagah kam hoti ja rahi thi... Main apni najron ko apni naak ki nok par tikaye bebas si usko bahar aate dekhti rahi.. Motayi bhi itni badh gayi thi ki mujhe apne honton ko.. jitna ho sakti thi.. utna kholna pada....

Achanak Sandeep ko jane kya soojha.. Mere sir ko pichhe se toh wo pahle hi pakde huye tha.. Jor lagakar mere sir ko aage ki taraf kheench liya...

"gggggoooooooooogggooooooooooonnnnnoooogggoooooo" Mere halak se sirf yahi aawaj nikal payi... Uske tezi se jhatka maarte hi uska ling seedha jakar mere gale mein fans gaya... meri aankhein bahar nikalne ko ho gayi.. maine lachar hokar apne hath utha kar usko chhod dene ka ishara kiya....

"aaaaaaaaaahhhhhhhh..... kya maja tha..." Sandeep ne kahkar aankhein kholi aur meri aankhon mein pani dekh kar bola..,"kya hua jaan...?"

Maine khadi hokar apne aansoo pounchhe.. aur mere thook mein buri tarah geele ho kar tapak se rahe uske ling ko dekhte huye munh banakar boli..," hunh! kya hua!.. mera dum ghut jata toh?"

"arrey.. aise kisi ka dum nahi ghut'ta.. pahli baar liya hai na... isiliye ajeeb laga hoga..."Sandeep masoomiyat se bola....,"Achchha sorry... Chalo na.. ab sex karein...?"

Meri chidiya bhi tab tak teesri baar ras ugalne ke liye taiyaar ho rahi thi...,"Nahi.. pahle wahi bolo.. jo tab bol rahe the..." Main machal kar ek baar fir uski god mein ja chadhi... meri chhatiyon ko apni aankhon ke saamne rasiley santron ki tarah latak'te dekh wo ek baar fir se bawla sa ho gaya.. dono chhatiyon ko apne hathon mein daboch kar unke gulabi daanon ko ghoorta hua bola...,"Sab kuchh bol doonga.. par kaam shuru hone ke baad..." Usne kaha aur mere daano ko apne daanton se houle houle kutarne laga.....

Achanak usne apne ek hath ko aajad karke meri salwar ke naade ko pakad liya.. aur chhatiyon se munh hata kar bola," khol doon na?"

"Nahi!" Maine gusse se munh bana kar kaha...

"Kyun kya hua?" Uske chehre ka achanak rang sa ud gaya....

"Arrey sare 'kaam' dusre se poochh kar karte ho kya..? Main chid kar boli aur uski janghon ke dono aur ghutne tika kar upar uth gayi.. Meri chhoti si nabhi uski aankhon ke theek saamne aa gai....

"Ohh.. he he he... Main toh bus aise hi..."Usne thoda jhenp kar bola aur mera nada apni aur kheench liya... hulki si 'gaanth khulne ki aawaj huyi aur meri salwar dheeli ho gayi.... Shukra hai usne meri salwar ko upar hi pakad kar ye nahi poochha..," Neeche Khisak jane doon kya?"

Jaise hi usne nada kheench kar chhoda... meri salwar neeche sarak kar meri janghon mein fans gayi... Baki kaam poora karne mein usne ek second bhi nahi lagaya... Jhat se meri salwar ko kheench kar ghutno tak neeche sarka diya....

Meri najrein Sandeep ki aankhon par thi aur uski aascharya se fati huyi si aankhein meri jaanghon mein fansi huyi meri safed kachchhi par... yoni ke neehle hisse ke bahar kachchhi geeli ho chuki thi.. aur shayad kachchhi ka rang bhi thoda badla hua tha...

Uski aankhein kisi nanhe bachche ke samaan chamak uthi.. apne hathon se usne mere nitamon ko kaskar pakda aur thoda jhuk kar kachchhi ke upar se hi ek pyara sa chumban le liya.... "aaaaahhhhh" Mera badan trishna ke maare jal utha.. aur maine bhawuk hokar uska sir pakad liya....

Usne najrein upar karke meri nasheeli ho chuki aankhon mein jhanaka.. Shayad kachchhi ko neeche karne ki permission le raha tha.... Jaise hi main muskurayi usne meri kachchhi mein upar se hath dala aur 'apni jannat' ko apni najron ke saamne nangi kar liya.....

"Waaaaah..." Uske munh se apne aap hi nikal gaya aur bedam sa hokar kuchh pal ke liye uski aankhon ki putliyan sikud gayi... theek waise hi jaise andhere se achanak prakash mein jane par sikud jati hain... Uski manchahi muraad poori ho gayi... Usko apni manzil ka jyoti bindu dikhayi de gaya...

Wah aankhein faade sthir sa hokar meri chidiya ko dekhta hi rah gaya.... Dekhta bhi kyun nahi...? Aakhir usne pahli baar 'aisi' nayab cheej dekhi thi jiske liye jane kitne hi vishvamitra swarg ke sinhasan tak ko thokar maar dete hain.... Jiske liye mard 'bhookhe' kutte ki tarah jeebh laplapata ghoomta rahta hai.... 'Jo' ghar ghar mein hoti hai... par sabhya samaj mein jisko najayaj tareeke se pana 'avrest' par chadhne se kum nahi.....

Jiske liye duniya bhar ki adaalaton ne ek hi kanoon bana rakha hai... Jiske paas 'yoni' hai.. uski baat pahle suni jayegi.. uski baat par hi pahle vishvas kiya jayega... 'yoni' ko apne sath huyi jabardasti ko sabit karne ke liye koyi jakham dikhane ki jarurat nahi... sirf 'yoni wali' ko ek ishara karna padega aur 'bhogne' wale ki 'umrakaid' pakki.... Bhala sarvatra vidyamaan hokar bhi durlabh aisi cheej ko bina tapasya kiya itni aasani se; apni marzi se; apni aankhon ke saamne fudakti huyi dekh kar koyi pagal nahi hoga toh kya hoga....

Aur yoni bhi koyi aisi vaisi nahi... jaise imported 'maal' ho... jaise 'gahre' sagar ki koyi band 'seep' ho jiske andar 'moti' toh milega hi milega.... Jaise tikone aakar mein koyi machis ki dibiya ho.. chhoti si.. par badi kaam ki aur badi khatarnaak... chahe toh ghar ke ghar jala kar khak kar de... chahe toh apne pyar ki 'do' boond tapka kar kisi ke ghar ko 'chirag' se roshan kar de....

"Aise kya dekh rahe ho?" Main machal kar boli....

"kkuchh nahi.... yyye toh.. badi pyari hai..." Yoni ke upari hisse par uge huye hulke hulke baalon ko pyar se sahlate huye wah bola...

"Haan.. jo bhi hai.. jaldi karo na !" Main tadap kar gahri saans leti huyi boli....

"MMaine toh kabhi sapne mein bhi nahi socha tha... iske hont toh utne hi pyare hain jitne tumhare upar wale...."

"Hont?" Maine tab pahli baar 'yoni' ki faankon ko 'hont' kahte kisi ko suna tha... main thodi neeche jhuk kar dekhti huyi boli...

"Haan... ye..." Kahte huye Sandeep ne yoni ki ek faank ko apni chutki mein bhar liya... anjane mein hi uska angootha meri faankon ke beech chhupi huyi 'madanmani' (clitoris) ko chhoo gaya aur main aanand se uchhal padi...,"kya karte ho?"

"Dekh raha hoon bus!" Pagla se gaye Sandeep ne bholepan se iss tarah kaha mano char aane mein hi ek baar aur 'Hema malini' ko dekhna chahta ho...

Samajh nahi aaya na! Darasal meri dadi batati thi... mere janam ke kuchh time pahle tak gaanv mein ek dibbe wala picture dikhane aata tha... usko sab 12 man ki dhoban kaha karte.... picture dekhne wale bachchon se 'wo' char aane leta aur ek suraakh mein aankh lagane ko kahta... 'bachche' ke aankh lagane par wo bahar ek pahiyan sa ghumata aur andar alag alag hero heroino ke foto chalte nazar aate... bachche usko bade chav se dekhte the... dadi batati thi ki ek baar tumhare papa ne uss 'surakh' se aankhein chipkayi toh hatane ka naam hi na liya... Machine wale ne kayi baar unko hatne ke liye kaha par wo apni aankh wahin gadaye baar baar yahi kahte rahe...,"Dekh raha hoon na! abhi hema malini nahi aayi hai..."

Kuchh aisi hi halat Sandeep ki thi.. Main wasna ki agni mein tadap rahi thi.. aur 'wo' baar baar ek hi rat lagaye huye tha...,"Bus ek baaar aur.. thodi si dekh raha hoon..."

Aisa nahi tha ki Sandeep ki halat kharaab na huyi ho... Yoni ko dekhte dekhte hi uski saansein upar neeche hone lagi thi.. Uske gaal uttejana ke maare laal hote ja rahe the... nathune foole huye the.. par wah jane usmein kya dhoondh raha tha... Main uttejana ke charam par aa chuki thi.. Sahsa usne dono hathon se meri chidiya ki faankon ko faila diya.. aur meri yoni ka cheera kareeb ek inch chouda ho gaya.... Khooni rang ka meri yoni ka andar ka chikna bhag dekh kar toh wo mano hosh hi kho baitha.. andar chhupi huyi hulke bhoore rang ki 'do' pattiyan ab uski aankhon ke saamne aa gayi.. usne dono pattiyon ko chutkiyon mein liya aur meri yoni ki 'titli' bana' diya.. pattiyon ko bahar ki aur meri yoni ki faankon par chipka kar... iske sath hi usne apni ek ungali 'pattiyon' ke beech rakhi aur bola...,"Yahi hai na...."

"Haan haan.. yahi hai.. tum jaldiu kyun nahi karte... koyi aa jayega toh?" Main naraj si hokar boli....

Meri narajgi se wah achanak itna dara ki meri baat ko aadesh maan kar 'sarrrrr' se ungali andar kar di... Main hulki si uchak kar sisak padi," aaaahhhh....!"

Bahut jyada chikni hone ke karan ek hi jhatke mein meri yoni ne ungali ko bina kisi pareshani ke poori nigal liya... wah saham kar meri aur dekhne laga.. jaise meri pratikriya jaan'na chahta ho.....

"Usko kab daaloge...?" Maine tadap kar kaha.....

"Daalta hoon.. thodi der ungali se kar loon.. mere dost kahte hain ki pahle aise hi karna chahiye.. nahi toh bahut dard hota hai....!" Wah ungali ko bahar nikal kar fir se andar fislata hua bola.....

Main jhalla uthi.. ajeeb namoona hath laga tha uss din, pahli baar... main 'usko' andar ghuswane ke liye tadap rahi thi aur wo mujhe darane par tula hua tha," Hone do... fategi toh meri fategi na... tumhari kyun...." Main 'fat rahi hai' kahna chahti thi... par mann mein hi daba gaya... bahut sensitive case tha na...

"Achchha achha.. theek hai.. karta hoon..." Usne sakpaka kar apni ungali bahar nikal li.. aur fir se meri aankhon mein dekhne laga," Kaise karoon?"

"Mujhe neeche patak kar ghusa do... tum toh bilkul lalloo ho!" Mere munh se gusse aur bekarari mein nikal hi gaya...

"Sorry.. maine kabhi pahle kiya nahi hai..." Sandeep par padi daant ka asar mujhe uske tantanaye huye 'ling' par bhi saaf dikhayi diya... 'wo' thoda murjha sa gaya... mujhe apni galati par gahra afsos hua...,"Sorry.. aise hi gusse mein nikal gaya..." Maine uske ling ko puchkaar kar fir se 'kutubminaar' ki tarah seedha taang diya..,"Achchha.. ek minute...!"

Jaise hi maine kaha...Mujhe pyar se sofe par litane ki koshish kar raha Sandeep wahin ka wahin ruk gaya,"Bolo!"

Mujhe Dholu ka mujhe apni god mein lekar ling par bithana 'yaad' aa gaya.. Maine neeche utari aur mudkar jaise hi apni salwar aur kachchhi ko taangon se nikalne ke liye jhuki.. Sandeep ne lapak kar mere nitambon ko pakad liya,"aise theek rahega Anju.. yahan se bahut achchhi dikhayi deti hai...!"

"Kya? Maine salwar ko nikal kar sofe par daala aur uski taraf seedhi khadi hokar poochha....

"Ye.." Wah meri yoni ko muthi mein daboch kar bola...,"Table par jhuk jaao.. tumhari 'iss' ka surakh pichhe aa jata hai...!" Wah khush hokar bola....

"Theek hai.. ye lo..."Maine kaha aur table par seedhe hath rakh kar mud gayi...

"Aise nahi.. pichhe se thoda upar ho jao.."Wah nitambon ke beech meri yoni par hath rakh kar usko upar uthane ki koshish karne laga....

"Aur upar kaise houn..? meri taange toh pahle hi seedhi hain....."Maine kaha aur mere dimag mein kuchh aaya..,"Achchha.. ye lo.." Maine table par kohniyan tika li....

"Haan.. aise!" Wah khush hokar bola... aur sofe par baith kar mere nitambon par hath ferne laga....

"Ab karo na...." Maine kasmasa kar apne kulhe matkaye....

"Haan haan..." Kahkar wo khada ho gaya aur aage hokar mere nitambon ke beechon beech uske ling ke swagat mein khushi ke aanshu tapka rahi yoni par apne ling ka supada rakh diya......

Yoni aur ling toh aakhir ek dusre ke liye hi bane hote hain... Meri yoni jaise andar hi andar dahak rahi thi.. jaise hi usko supada apne dwar par mahsoos hua.. 'wo' bahak gayi.. aur usmein se tap tap karke premras ki barish si hone lagi....,"Aah.. kar do na Sandeeee...." Mera bura haal tha... mujhe pata hi nahi tha ki main kaha hoon.. mera poora badan madhoshi se akad sa gaya tha....

"Haan... main ab dhakka lagaaunga... dard ho toh bata dena.... theek hai..?" Wo mujhe tadpane mein koyi kasar nahi chhod raha tha... uska supada ab bhi meri yoni ko cheerne se pahle ijajat maang raha tha...

"Jaldi karo na...." Maine kaha hi tha ki usne dabav badha diya... par supada toh andar nahi gaya.. ulta main poori hi thodi aage sarak gayi...

Apni kohniyon ko wapas pichhe tika kar main fir se taiyaar huyi..,"Lo.. ab ki baar karo..."

Usne fir dhakka lagaya.. aur main fir se uske dabav ko na jhel pane ke karan aage sarak gayi...

"Tum aage kyun ja rahi ho?" Wah wapas supada meri yoni par tikate huye bola....

Main tang aakar seedhi khadi ho gayi...,"Tum sofe par baitho.. main karti hoon.." Main badhawas si halat mein jaldi jaldi boli....

"Kya?" Wah samajh nahi paya aur meri taraf tukur tukur dekhne laga....

"Tum baitho na jaldi.. main apne aap ghusa loongi..." Maine uska dhakka dekar sofe par dhakel diya....

"Theek hai.. tum khud hi kar lo..."Usne kisi achchhe bachche ki tarah kaha aur hath mein pakda hua apna ling seedha upar ki aur taan kar baith gaya.......

kramshah....................

raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:37

बाली उमर की प्यास पार्ट--22

गतान्क से आगे................

"हां.. ऐसे..." मैने उसको किसी टीचर की तरह से हिदायत दी और एक बार फिर उसकी जांघों के दोनो ओर घुटने जमा कर बैठ गयी...

"मैं नीचे बैठूँगी.. तुम अपना 'ये' 'वहाँ' लगा देना..." मैने कहने के साथ ही अपने नितंबों को नीचे झुकाना शुरू कर दिया.... वह तिरच्छा होकर झुका और 'निशाना सेट करने लगा....

"यहाँ क्या हाईईईईईई..." मैं वापस उपर उठी.. थोड़ा नीचे करो नीचे..!" उसने तो अपना लिंग सीधा मेरे दाने पर टीका दिया था... मानो कोई नया सुराख करने की तैयारी में हो... मैने उसके होंटो को चूमा और फिर से नीचे बैठने लगी....

"बुद्धू...!" पीछे घुसाओगे क्या?" मैं तड़प कर बोली और अपनी योनि के साथ ही उसके लिंग का 'चार्ज' भी अपने ही हाथों में ले लिया... मैं जान गयी थी.. इसके भरोसे तो हो गयी 'गंगा' पार....

मैने उसका लिंग पकड़ा और अपनी योनि में दो चार बार घिसा कर जैसे ही छेद पर टीकाया.. वो अजीब से ढंग से बड़बड़ाया,"ऊऊऊऊऊऊऊऊऊऊओ"

"क्या हुआ?" मैने रुक कर उसकी आँखों में झाँका....

"कुच्छ नही... इसस्स्स्स्स्सस्स... मज़ा आ रहा है...!" उसने कहा और मेरे नितंबों को कसकर पकड़ लिया.....

"मैं मुस्कुराइ और छेद पर रखे सूपदे की तरफ से निसचिंत होकर उस पर धीरे धीरे बैठने लगी... पर मंज़िल उतनी आसान नही थी.. जितनी मुझे लग रही थी.. जैसे ही मेरी योनि का दबाव सूपदे पर बढ़ा.. मुझे योनि की फांकों में अत्यधिक दबाव महसूस होने लगा.. ऐसा लगा जैसे अगर और नीचे हुई तो ये फट जाएगी.. मैं वापस थोड़ी सी उपर उठ गयी..

"क्या हुआ?" संदीप ने आखें खोल कर पूचछा....

"डर हो रहा है...!" मैने बुरा सा मुँह बना लिया...

"खुद करोगी तो दर्द महसूस होगा ही.. मुझे तुम करने नही देती..."संदीप ने शिकायती लहजे में कहा....

"नही.. अब की बार पक्का करती हूँ..." लिंग को अंदर लेने के लिए तड़प रही मेरी योनि दर्द को एक पल में ही भूल गयी.. और फिर से उसके लिए अंदर ही अंदर फुदकने सी लगी...

"एक दम बैठ जाओ..!" संदीप ने हिदायत दी...

और में जोश में उसका कहा मान गयी.. जैसे ही मैने 'भगवान' का नाम लेकर अपनी योनि को इस बार लिंग पर ढीला छ्चोड़ा.. 'फ़च्छ' की आवाज़ के साथ 'उसका' आगे का 'लट्तू' मेरे अंदर घुस गया...

लाख कोशिश करने पर भी मेरी चीख निकले बिना ना रह सकी... गनीमत हुआ कि ज़्यादा तेज नही निकली... पर दर्द असहनीय था... मैने तुरंत उठने की कोशिश की पर जाने क्या सोचकर संदीप ने मुझे वहीं कस कर पकड़ लिया......

"आ.. क्या करते हो.. छ्चोड़ो मुझे.. बहुत दर्द हो रहा है..." मैं हड़बड़कर बोली...

"कुच्छ नही होगा जान.. जो होना था.. हो चुका... बस दो मिनिट... अभी सब ठीक हो जाएगा..." संदीप ने कहा और कसकर मुझे कुल्हों से पकड़े हुए मेरी चूचियो को चूसने लगा.....

"आ.. क्या कर रहे हो.. मैं मरी जा रही हूँ.. आगे रास्ता नही है.. मुझसे नही होगा...."

"मेरे दोस्त कहते हैं कि चूचियो चूसने से इसका दर्द कम हो जाता है...." उसने हटकर कहा और फिर से मेरे एक दाने को मुँह में ले लिया....

चूचियो में गुनगुनी सी गुदगुदी तो ज़रूर हुई थी.. पर मुझे नही लग रहा था कि मेरी योनि से `करीब 1.5 फीट उपर लटकी चूचियो को चूसने से वहाँ कुच्छ राहत मिलेगी... मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी योनि फैली ना हो; बुल्की फट ही गयी हो... मैने नीचे झुक कर देखा... उसका सारा का सारा लिंग तो बाहर ही था अभी.. सिर्फ़ लट्तू जाने से इतना दर्द हुआ है तो पूरा जाने में कितना दर्द होगा' सोच कर ही मैं तड़प उठी......,"मुझे नही होगा संदीप .. प्लीज़.. छ्चोड़ दो मुझे...."

"होगा कैसे नही.. जान.. देखो.. बस दो मिनिट.." उसने कहा और एक हाथ से मुझे पकड़े हुए वह नीचे की ओर दबाता हुआ दूसरे हाथ से मेरे बायें घुटने को धीरे धीरे दूर सरकाने लगा...

"आ.. क्या कर रहे हो.. मैं मर जाउन्गि ना...!" मैने छट-पटाते हुए कहा....

"कुच्छ नही होगा जान.. बस हो गया.. और दर्द नही होगा... एक मिनिट... बस.. बस.. एक मिनिट...." वह कहता गया और अपनी मनमर्ज़ी करता गया.....

मैं तब तक अपने हाथों से अपने आपको उसकी पकड़ से मुक्त करने की कोशिश करती रही जब तक कि वह खुद ही रुक नही गया....

"और मत करो ना संदीप.. तुम्हारी कसम.. बहुत दर्द हो रहा है....!"

"तुम्हारी कसम जान.. 2 मिनिट से ज़्यादा दर्द नही होगा अब..." कहते हुए उसने अपने दोनो हाथों से मुझे कसकर पकड़ा और मुझे लेकर सोफे से उठ गया....

"ययए.. ये क्या कर रहे हो...!" मैं सचमुच दर्द को भूल चुकी थी और सोच कर हैरान थी कि वो ऐसे खड़ा क्यूँ हुआ.. पर अगले ही पल मेरी सब समझ आ गया... सोफे की तरफ घूम कर वह आराम से मेरे साथ ही नीचे आता हुआ मुझे कमर के बल सोफे पर लिटा कर रुक गया...

मैने कोहनिया टीका कर उपर उठी... उसका लिंग अभी भी आधा बाहर था..," और मत करना प्लीज़.. मैने तो सोचा था कि सारा हो गया..."

"अरे सारा ही चला गया था जान.. ये तो खड़ा होने की वजह से निकल गया था.. कहते हुए उसने जैसे ही अपना लिंग अंदर धकेला.. मेरी योनि की तंग दीवारों में उठी आनंद की लहरों से मेरा पूरा बदन ही मदहोश होता चला गया...,"आआआआआहह" मैने पूरे आनंद के साथ एक लंबी सिसकी ली और मदोन्नमत होकर उसका सिर अपनी छाती पर झुका लिया....

"हो गया जान... आइ लव यू... तुमने कर ही दिया.... अया... बहुत मज़ा आ रहा है...."सच में ही मैं आनंद की उस प्रकस्ता पर थी कि सब कुच्छ भूल कर मेरा तन मंन वासना की रंगीन गलियों में खो सा गया था......

इस बार वह अपने 'मूसल' जैसे लिंग को जड़ तक मेरी योनि की फांकों से चिपका कर रुक गया....,"कैसा लग रहा है जान?"

मैने तड़प कर अपने बॉल नोच डाले.. मेरी आँखें तो पहले से ही पथराई हुई थी..... आनंद के जिस शिखर पर मैं खुद को उस वक़्त महसूस कर रही थी.. कुँवारी लड़की शायद ही उसके बारे में कल्पना भी कर सके.... अजीब सी हालत थी.. मैं बोलना चाहती थी.. पर मेरी ज़ुबान मेरी सिसकियों को शब्दों में ढालने में नाकाम थी... "अया... आआआयईीईईईईई... ऊऊहह मुऊम्म्म्ममय्ययी' जैसी ध्वनियाँ उसके धक्का लगाना बंद करते ही खामोश हो गयी... तड़प और बेकरारी से मैने अपने बालों को नोच डाला था... उसका ये विराम असहनीय था....

वह फिर भी मेरे जवाब की प्रतीक्षा करता रहा तो मुझसे रुका ना गया... पगलाई हुई सी कोहनियाँ टीका कर उपर उठी और आनन फानन में ही अपने नितंबों को उठा उठा कर पटाकने लगी... मेरे नितंबों की थिरकन के कारण अंदर बाहर हो रहे लिंग का हूल्का सा अहसास भी मुझे मरूभूमि में प्यासी के लिए सावन आने जैसा था.....

"आ.. आ...आ... आ.." मैं झल्लाई हुई अपने नितंबों को आगे पिछे करते हुए लिंग को खुद ही अंदर बाहर करती रही... जब तक कि वह मेरी मंशा को नही समझा और पूरे जोश के साथ मेरी जांघों के बीच बैठ कर सतसट धक्के लगाने लगा.....

वह सिसकने के साथ ही हाँफ भी रहा था.. पर मुझे खुद ही नही पता था कि मैं सिसक रही हूँ.. या बिलख रही हूँ... अपने ही मुँह से निकल रही अजीबोगरीब आधी आधूरी आहें मेरे ही कानों को बेगानी सी लग रही थी.....

वह धक्के लगाता जा रहा था और में पागलों की तरह कुच्छ का कुच्छ बड़बड़ाती जा रही थी..... उसने कयि बार आसन बदले.. कभी पंजों के बल बैठ जाता कभी घुटनो के बल... कभी मेरी चूचियो पर लेट कर धक्के लगाता और कभी मेरे घुटनों के नीचे से हाथ निकाल कर सोफे पर रख कर... हर आसन ने उस दिन मुझे नया जीवन दिया.. नया आनंद....

"ओह... आआहह.. मैं गया... मैं गया..." मेरे कानों को उसके तेज धक्के लगाते हुए आख़िर में कुच्छ इस तरह की आवाज़ें सुनी और 5-10 सेकेंड के बाद ही वो मेरी छाती पर पसर गया.... उस 'एक' पल के आनंद को में शब्दों में बयान नही कर सकती... मुझे भी ऐसा ही लगा था जैसे मैं गयी.. मैं गयी.. और गयी....

पर गये कहाँ.. हम दोनो तो एक दूसरे के इतने पास आ गये थे कि शरीर के साथ ही दिलों के बीच की दूरी भी कहीं खो गयी....

"आइ लव यू जान!" कुच्छ देर बाद जब संदीप में मेरी चूचियो पर एक प्यार भरा चुंबन देकर कहा तब ही शायद मैं उस अलौकिक दुनिया से वापस लौट कर आई थी..,"आ.. क्या हुआ.... हो गया क्या?" मैने कसमसा कर पूचछा....

"हां.. अंदर ही हो गया...."

"क्य्ाआ?" मैं उसके नीचे पड़ी हुई भी उच्छल सी पड़ी...,"अंदर निकाल दिया?"

"मुझे कुच्छ याद ही नही रहा... एक बार ध्यान आया था.. पर बाहर निकालने का मंन ही नही किया... उसके बाद तो कुच्छ याद ही नही...."वा मेरे उपर से अलग होता हुआ मायूसी से बोला....

"ययए.. क्या किया तुमने... अब मेरा क्या होगा...?" मैं बैठ कर नीचे झुकी और अपनी योनि में से बाहर टपक रहे उसके और मेरे प्रेमरस के मिश्रण को देखती हुई रोने लगी.....

संदीप को भी उस वक़्त कुच्छ सूझा ही नही.. शायद वह अपनी ग़लती पर शर्मिंदा था...

अचानक दरवाजे पर हुई 'खटखट' ने हम दोनो के होश ही उड़ा दिए... मैं बाकी सब कुच्छ भूल कर कांपति हुई अपने कपड़े ढूँढने लगी.....

"संदीप... ढोलू भैया... ...... चाची....." पिंकी की आवाज़ थी.... मेरे साथ ही संदीप के भी होश उड़ गये.... पर हम दोनो में से कोई कुच्छ नही बोला.....

"कौन है अंदर.... दरवाजा खोलो ना...." पिंकी की तीखी आवाज़ एक बार फिर मेरे कानों में पड़ी.....

"जल्दी करो..... और वहाँ अलमारी में छिप जाओ..."संदीप अपनी ज़िप बंद करता हुआ मेरे कानो में फुसफुसाया......

मैने हड़बड़ाहट में सलवार पहनी और अपनी कच्च्ची, ब्रा और कमीज़ को उठाकर अलमारी की ओर भागी.... संदीप के हाँफने की आवाज़ें मुझे अलमारी के अंदर भी सुनाई दे रही थी....

"हाआँ... क्या है..?" शायद संदीप ने दरवाजा खोल कर पूचछा होगा....

"इतनी देर क्यूँ लगा दी... ? क्या कर रहे थे...?" पिंकी की आवाज़ मुझे कमरे के अंदर से ही आती प्रतीत हो रही थी.....

"ववो.. हां.. कुच्छ नही... सो रहा था....."संदीप अब भी हूल्का हूल्का हाँफ रहा था.. जैसे कोई क्रॉस कंट्री रेस करके आया हो....

"तुम तो पसीने में भीगे हुए हो... कोई सपना देख रहे थे क्या? " कहने के साथ ही मुझे पिंकी की खनखनती हुई हँसी सुनाई दी......

"आहाआँ... वो.. एक.. बुरा सपना था...!" संदीप की साँसे अब तक संयमित हो चुकी थी.....

"वो.. मीनू ने शिखा दीदी की 'पॉल.साइन्स' की बुक मँगवाई है.....!" पिंकी ने कहा....

"पर.. वो तो... मुझे कैसे मिलेगी... ? कल आ जाएगी.. तब ले लेना ना!" संदीप हड़बड़ा कर बोला....

"मीनू ने दीदी के पास फोन किया है.. वो कह रही थी कि बड़ी अलमारी के बीच वाले खाने में रखी है... तुम देख तो लो!" पिंकी की ये बात सुनकर तो मेरी साँसें उपर की उपर और नीचे की नीचे रह गयी.... शायद संदीप का भी ऐसा ही हाल हुआ होगा....,"वववो.. नही... वहाँ तो एक भी किताब नही है... इसमें तो सिर्फ़ कपड़े हैं.... हां.. कपड़े हैं सिर्फ़"

"अरे.. देख तो लो एक बार..." पिंकी ने कहा.... और अगले ही पल उसकी गुर्राती हुई आवाज़ आई..," तुम सुधरे नही हो ना!"

"म्‍मैइने क्या किया है...? तुम उधर क्यूँ जा रही हो...?" संदीप की आवाज़ से ही पता लग रहा था कि मामला बिगड़ने वाला है... पिंकी शायद अलमारी की ओर ही आ रही होगी.....

"ठीक है... मैं बाहर खड़ी होती हूँ... तुम देख कर दे दो..." पिंकी ने गुस्से से कहा और शायद बाहर निकल गयी.....

तभी अलमारी का दरवाजा थोड़ा सा खोला और भय से काँपते हुए मैने संदीप की ओर देखा.. उसने आँखों की आँखों में मुझे चुप रहने का इशारा किया और उपर वाले खाने में किताब ढूँढने लगा....

होनी को कुच्छ और ही मंजूर था.. अचानक उपर से मेरे उपर कुच्छ आकर गिरा और मैं ज़ोर से चीखी,"

ओईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईईई मुम्मय्यययी!"

जब तक मुझे मेरी ग़लती का अहसास होता.. पिंकी भाग कर अलमारी के सामने आ चुकी थी.. संदीप असमन्झस में खड़ा कभी दयनीय चेहरा बनाकर पिंकी की ओर और कभी गुस्से से मेरी ओर देखने लगा...

भय और शर्मिंदगी से थर थर काँप रही मैं नीचे वाले खाने के कोने में चिपकी हुई बड़ी मुश्किल से नज़रे उठा कर संदीप की और देखती हुई बोली..,"वववो.. चूहा....!"

पिंकी के चेहरे पर मेरे और संदीप के लिए ग्लानि के सपस्ट भाव झलक रहे थे.. अचानक उसने झपट्टा मार कर संदीप के हाथ से किताब छ्चीनी और बाहर भाग गयी......

"ययए... ये क्या किया तुमने?" संदीप गुस्से से दाँत पीसता हुआ चिल्लाया.....

"ववो.... वो.. उपर से चूहा कूद गया था.... मेरे उपर...!" मुझे अहसास था कि मैने क्या कर दिया है.. अब मैं संदीप से भी नज़रें नही मिला पा रही थी... चुपचाप बाहर निकली और अपना कमीज़ पहन कर खड़ी खड़ी रोने लगी.....

"तुम्हे शायद अंदाज़ा भी नही होगा कि तुमने क्या कर दिया... अब बात शिखा तक जाए बिना नही रहेगी... एक चूहे से डरकर.. तुमने ये.... शिट!.. निकलों यहाँ से जल्दी..." संदीप ने मुँह फेर कर कहा और अपने ही हाथों से अपना चेहरा नोचने लगा......

मेरी कुच्छ बोलने की हिम्मत ही ना हुई... खुद ही अपने आँसू पौन्छे और अपनी ब्रा और पॅंटी को अपनी सलवार में टाँग ली .....फिर शॉल औधी और बे-आबरू सी होकर उसके घर से निकल गयी....

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मैं वहाँ से सीधी मीनू के घर ही गयी... पिंकी का चेहरा तमतमाया हुआ था और मीनू उस'से पूच्छ रही थी..,"बता ना क्या हुआ?"

मैं चुपचाप जाकर चारपाई पर बैठ गयी... मुझे भी इतनी चुप देख कर मीनू ने पूच्छ ही लिया...,"हद हो गयी.. छ्होटा सा काम करवाया था.. आते ही मुँह फूला कर बैठ गयी.. और अब तुझे क्या हो गया...? तुम दोनो की लड़ाई हुई है क्या?"

"नही दीदी.." मैने उस'से नज़रें मिलाए बिना ही सूना सा जवाब दिया और फिर पिंकी की और देख कर बोली," एक मिनिट बाहर आ जा पिंकी... तुझसे कुच्छ बात करनी है...!"

पिंकी ने मुझे घूर कर देखा.. पर कुच्छ बोली नही.. आँखों ही आँखों में मुझे गाली सी देकर वो फिर से एक तरफ देखने लगी.....

"सुन तो एक..." मैने इतना ही कहा था की पिंकी गुस्से में धधकति हुई बोली..,"मुझसे बात करने की ज़रूरत नही है तुझे... समझी..?"

"ऐसा क्या हो गया...? जब तू यहाँ से गयी थी तब तो सब ठीक था... तुम बाहर मिले हो क्या कहीं... रास्ते में...?" मीनू आशंकित होकर बोली....

अब जवाब तो दोनो के ही पास था... पर बोलती भी तो क्या बोलती.... मैने मीनू की बात को अनसुना कर दिया और एक बार फिर धीमी लरजती हुई आवाज़ में बोली,"पिंकी प्लज़्ज़्ज़.. एक बार मेरी बात सुन ले... फिर चाहे कुच्छ भी बोल देना.. किसी को भी...!"

पिंकी ने इस बार भी मेरी बात को अनसुना कर दिया....

मीनू को शायद अहसास हो गया की मामला कुच्छ ज़्यादा ही पर्सनल है....,"ठीक है.. तुम अपना झगड़ा निपताओ.. मैं उपर जाकर आती हूँ...."

मीनू के जाते ही मैं अपनी सोची हुई बात पर आ गयी..," तुझे पता है पिंकी..? सोनू का फोन ढोलू के पास है...!"

पिंकी की आँखों में हुल्के से आस्चर्य के भाव आए.. पर जितनी जल्दी आए थे.. उतनी ही जल्दी वो गायब भी हो गये.....

"मेरी बात तो सुन ले एक बार..." मैं जाकर जैसे ही उसके सामने बैठी.. उसने अपना मुँह फेर लिया... पर मामला अब थोड़ा सा शांत लगा.. शायद वह सोनू के मोबाइल के बारे में जान'ने को उत्सुक हो गयी थी...

"वो मैं उसको मोबाइल लौटने गयी थी... वो वहाँ ज़बरदस्ती करने लगा...!" मैने उल्टी तरफ से कहानी सुननी शुरू कर दी...

"कौनसा मोबाइल..? तेरे पास कहाँ से आया...?" पिंकी की बात में गुस्सा कम और उत्सुकता ज़्यादा होना ये बात साबित कर रहा था कि उसको बात सुन'ने में दिलचस्पी है....

"तू पूरी बात सुनेगी, तभी बताउन्गि ना... मेरी तरफ मुँह तो कर ले...!" मैने प्यार से उसके गालों पर हाथ लगा कर उसका चेहरा अपनी तरफ घुमा दिया... मेरी आँखों से आँखें मिलते ही उसने नज़रें झुका ली...,"बता!"

"वो उस दिन हम शिखा दीदी से मिलने गये थे ना... तो तुझे याद है मुझे ढोलू ने दूसरे कमरे में बुलाया था....?" मैने कहा...

"हां... तो?" उसने उपर... मेरी आँखों में देख कर पूचछा....

"वो.. भी ऐसे ही बकवास कर रहा था.. संदीप की तरह.. पर मैने सॉफ इनकार कर दिया... तुझे तो पता ही है 'वो' कैसा है....! उसने मुझे डरा धमका कर मेरे हाथ में एक मोबाइल पकड़ा दिया... कहने लगा मुझे तुमसे कुच्छ ज़रूरी बात करनी हैं... मैं डर गयी थी.. इसीलिए मैने अपने पास फोन छिपा लिया था.... आज 'उस' इनस्पेक्टर का नंबर. इस पर आया तो मैं डर गयी.. ज़रूर उसने 'सोनू' का नंबर. ही ट्राइ किया होगा....!" मैने कहा.....

"पर 'सोनू' का फोन ढोलू के पास कैसे आया... ?" पिंकी दिमाग़ लगाने की कोशिश करती हुई बोली....

"वही तो..! मैं बहुत डर गयी थी....! इसीलिए यहाँ से सीधी ढोलू को वो फोन वापस देने गयी थी... 'वो' तो मिला नही.. मैने संदीप को फोन देकर सब कुच्छ बता दिया.... मेरे डरे हुए होने का फ़ायडा उठाकर संदीप ने मुझे वहीं पकड़ लिया... मैने उसको मना किया तो कहने लगा कि 'वो' तुम्हे और गाँव वालों को बता देगा कि सोनू का फोन मेरे पास है...!"

"कमीना.. कुत्ता...!" पिंकी ने हमेशा उसकी ज़ुबान पर चढ़ि रहने वाली दो गालियाँ संदीप को दी और फिर बोली," फिर...?"

"फिर क्या?" मैने कहकर सिर झुका लिया....

"क्य्ाआ? उसने तुम्हारे साथ 'वो' कर दिया?" मेरे चेहरे के भावों को पढ़ती हुई पिंकी आस्चर्य से बोली....

"छ्चोड़ ना अब..?" मैं उसका ध्यान हटाने के इरादे से बोली..," अच्च्छा ही हुआ.. तू वहाँ चली गयी.. तुझे भी उसकी असलियत पता चल गयी... शायद मैं अपने आप 'ये' भी बात नही कह पाती.. और 'वो' भी की सोनू का मोबाइल ढोलू के पास है...." मैने अपने आप को सॉफ सॉफ बचाने की कोशिश की...

"चल... दीदी को बताते हैं...!" पिंकी ने कहा....

"प्लीज़... संदीप वाली बात मत बताना...!" मैने उसको मनाने की कोशिश की....

"क्या नंबर. था वो.." अचानक मीनू को दरवाजे की आड़ से हमारे सामने आते देख हम दोनो उच्छल पड़े... शायद उसने सब कुच्छ सुन लिया था...!

"मैने तात्कालिक शर्म से अपना सिर झुका लिया.. पर मीनू ने संदीप के बारे में कोई सवाल नही पूचछा....

"क्या नंबर. था..? बताती क्यूँ नही...?" मीनू आकर मेरे हाथ पर हाथ रख कर बोली...

"मुझे नंबर. नही पता दीदी.. पर उस पर इनस्पेक्टर की कॉल आई थी...." मैने कहा...

"अब कहाँ है फोन?" मीनू ने पूचछा...

"वो..वो मैं वापस दे आई....!" मैने कहा....

"एक मिनिट में आती हूँ..." मीनू ने कहा और उपर भाग गयी... कुच्छ देर बाद वापस आकर बोली..," सोनू वाला नंबर. तो बंद पड़ा है....

"हां दीदी.. फिर तो पक्का वही नंबर. है... मैने यहाँ से जाने से पहले ही उसको ऑफ किया था.... पर... आपको उस नंबर. का कैसे पता.....?" मैने पूचछा....

"ववो..." मीनू ने एक बार पिंकी की ओर देखा और फिर थोड़ी देर चुप रह कर बोलने लगी...,"तरुण ने मुझे 'वो' नंबर. दे रखा था.. एक आध बार उसके पास घर से फोने करने के लिए... 'वो' अक्सर सोनू के साथ ही रहता था ना.... उसी ने बताया था कि 'ये' सोनू का स्पेशल नंबर. है... उस नंबर. का किसी और को नही पता.....!"

"स्पेशल मतलब...?" मैने उत्सुकता से पूचछा....

"पता नही.. 2 नंबर. होंगे उसके पास.. शायद.. पर 'वो' नंबर. किसी और के पास नही था.. तरुण कहता था....!" मीनू बोली...

"पर उसने सोनू का नंबर. क्यूँ दिया... उसके पास तो अपना मोबाइल था ना...!" मैने कहा....

"पहले नही था... उसने बाद में लिया था अपना!" मीनू ने जवाब दिया.....

"ओह्ह.. अच्च्छा..!" मैने सिर हिलाते हुए कुच्छ सोचा और फिर बोली," पर सोनू का नंबर. ढोलू के पास कैसे आया..? और सोनू कहाँ है...?"

"अब क्या पता..! मेरी तो कुच्छ समझ में नही आ रहा... ... ववो इनस्पेक्टर के पास फोन करें?" मीनू बोली...

"रहने दो दीदी.. बार बार फोन करना अच्च्छा नही लगता.. कल 'वो' स्कूल में आएँगे तो हम बता देंगे...!" पिंकी ने हमारी बातों में हस्तक्षेप किया...

"ठीक है... तुम बता देना.. एक ही बात है..." मीनू के चेहरे पर बोलते हुए मायूसी सी झलक आई.. फिर अचानक कुच्छ सोच कर बोली," तू उपर जा ना पिंकी.. थोड़ी देर..!"

पिंकी ने तुरंत अपना चेहरा फूला लिया,"मैं कहीं नही जाउन्गि दीदी... मुझे पता है तुम क्या बात करने वाले हो...!"

"क्या बात? अर्रे.. ऐसी कुच्छ बात नही है.. तू जा ना एक बार!" मीनू चिड कर बोली...

"नही.. मैं नही जाउन्गि..." पिंकी भी आड़कर बैठ गयी...

मेरे दिमाग़ में भी काफ़ी देर से एक बात घूम रही थी.. मैने 2 पल रुक कर सोचा कि पिंकी के सामने कहूँ या नही... फिर मैने कह ही दिया..,"दीदी!"

"हां..." मीनू पिंकी को घूरते हुए मुझसे बोली....

"ववो... वो आप बता रहे थे कि...." मैं बीच में ही रुक कर पिंकी की ओर देखने लगी.....

"तू थोड़ी देर रुक जा.... देखती हूँ ये कब तक हमारे पास बैठी रहती है.. हम बाद में बात करेंगे...!" मीनू पिंकी को घूरते हुए बोली....

पिंकी खड़ी होकर गुस्से से पैर पटक'ने लगी..,"मुझे नही पता.. दोनो अकेले अकेले गंदी बातें करते हो और मुझे इस तरह भगा देते हो जैसे मैं गंदी हूँ... आने दो मम्मी को.. आज दोनो की पोले खोलूँगी... कर लो बात..." पिंकी ने कहते हुए अपनी मोटी मोटी आँखों में आँसू भर लिए और उपर जाने लगी...

मीनू ने भाग कर उसको सीढ़ियों के पास ही पकड़ लिया...,"सुन तो.. ऐसी बात नही है मेरे पिंकू... आजा... आ ना!" मीनू उसको वापस खींच लाई और अपनी गोद में बिठा लिया....

"है क्यूँ नही ऐसी बात...? आप हमेशा मेरे साथ ऐसा ही करते हो.. मैं भी तो अंजू की उमर की हूँ.. मुझे सब बातों का पता है... तुम दोनो से समझदार हूँ मैं!" उसकी गोद में बैठी हुई पिंकी मीनू की आँखों में आँखें डाल कर बोली...

"अच्च्छा ठीक है.. बैठी रह.. बस!" मीनू ने उसके गालों से आँसू सॉफ किए और फिर मेरी और देख कर बोली," संदीप ने ऐसे कैसे ज़बरदस्ती कर ली... तूने उसको कुच्छ भी नही कहा....?"

मैने तुरंत अपनी नज़रें झुका ली... मुझे लग नही रहा था कि जिस तरह से पिंकी को मैने कुच्छ भी कह दिया था.. उन्न बातों पर मीनू को विश्वास हुआ होगा... पिंकी साथ ना बैठी होती तो शायद मैं मीनू को थोड़ा सा सच भी बता देती.. पर पिंकी के सामने... तो सच बोलने का मतलब खुद को उसकी नज़रों से गिराना ही था...

"चल छ्चोड़.. अब तो हो ही गया.. पर तूने ध्यान तो रखा होगा ना?" मीनू मेरी असमन्झस को जान कर बोली...

"किस बात का दीदी..?" मैने पूचछा....

"वो.. तेरी एम.सी. कब की है...?" मीनू ने पूचछा.....

"एम.सी. क्या दीदी?" मैं समझ नही पाई....

"अरे तेरी 'डेट्स' कब आती हैं...?" उसने दोहराया....

"ववो.. वो तो कोई 10 दिन हो गये... क्यूँ?" मैने पूचछा....

"ले... तू तो गयी फिर... वो... तू समझ रही है ना.. मैं क्या पूच्छना चाहती हूँ..?" मीनू झल्ला कर बोली...

"नही... "मैने जल्दी जल्दी में कह दिया.. तभी उसकी बात शायद मेरी समझ में आ गयी," हाआँ... इसीलिए तो मैं आपसे ये पूच्छ रही थी कि....!" कह कर मैं फिर चुप हो गयी....

"क्या? ... बोल ना!"

"ववो.. आप बता रहे थे ना... कि 'गोलियाँ' आती हैं....!" मैने नज़रें चुराते हुए कहा....

"हे भगवान... अंदर ही?" मीनू गुस्से से बोली..," इतनी तो अकल होनी चाहिए थी ना.. हद कर दी यार...!"

मैं जवाब देती भी तो क्या देती.. हद तो अब पार कर ही चुकी थी मैं... कुच्छ देर वहाँ सन्नाटा छाया रहा.. फिर मुझे बोलना ही पड़ा..,"वो.. वो गोली मिल जाएगी ना?"

पिंकी मामले की नज़ाकत को भाँप कर मीनू की गोद से हटी और एक तरफ बैठ कर हम दोनो के चेहरों को देखने लगी...

"वो तो 24 घंटे के अंदर लेनी होती है.... और 'वो' अब मिलेगी कहाँ से...?" मीनू झल्ला उठी थी... शायद 'वो' दिल से मेरी चिंता कर रही थी....

"आप ले आना ना.. कल शहर से...!" मैने अनुनय से उसकी आँखों में देखा...

"मैं... तू पागल हो गयी है क्या?.. मैं जाकर ये बोलूँगी कि मुझे 'इपिल्ल' दे दो... मैं कहीं से भी शादी शुदा लगती हूँ क्या?.. ना.. मेरे बस का नही है.. जाकर ऐसे बोलना....!" मीनू ने सॉफ सॉफ कह दिया.. फिर मेरे चेहरे के रुनवासे भाव पढ़ कर बोली," मैं... मैं तो सिर्फ़ इतना कर सकती हूँ कि किसी सहेली को बोल दूँगी.. अगर किसी ने लाकर दे दी तो मैं ले आउन्गि...."

"ये.. 'इपिल्ल' क्या होती है दीदी?" पिंकी हमारी एक एक बात को पी रही थी....

"कुच्छ नही... गोली होती है एक.. उस'से 'बच्चा' होने का भय नही रहता.. अब ज़्यादा मत पूच्छना..." मीनू के कहा और चिंतित सी होकर बड़बड़ाती हुई उपर चली गयी....

मेरी आँखों के सामने अंधेरा सा छाता जा रहा था.... समझ में आ नही रहा था कि क्या करूँ और क्या नही.. मेरा वेहम इतना बढ़ गया कि पेट में 'पानी' हिलने की भी आवाज़ होती तो लगता जैसे 'बच्चा' बन रहा है... अब कल गोली आने का भी पक्का चान्स नही था... 24 घंटे के अंदर नही मिली तो मैं क्या करूँगी....' सोचते हुए मैने अपना माथा पकड़ा और सुबकने लगी...

"रो मत अंजू... उस 'कुत्ते कामीने' को मैं छ्चोड़ूँगी नही!" पिंकी ने मुझे सांत्वना देते हुए कहा....

"उस'से क्या होगा पिंकी...!" मैं सुबक्ते हुए ही बोली और अचानक सिर उठा कर बोली..," मैं संदीप को ही बोल दूँ तो?... वही लाकर देगा अब गोली भी.....!"

"ना...! उस'से अब कभी बात मत करना...." पिंकी ने गुस्सा उगलते हुए कहा..," इस'से अच्च्छा तो आप 'हॅरी' को बोल दो...!"

"हॅरी?... हॅरी कौन..?" मुझे ध्यान ही नही आया कि 'वो' किस हॅरी की बात कर रही है....

"अरे.. 'वो.. हरीश...! उसका यही काम है... क्या पता उसके पास 'इपिल्ल' भी मिल जाए..." पिंकी ने कहा....

"वो.. जिसने स्कूल में कॅंप लगवाया था डॉक्टर. मलिक का...?" मैने ठीक ही अंदाज़ा लगाया था.....

"हां... उसका 'दवाइयों' का ही काम है... चल उसके पास चलते हैं... उसके पास नही होगी तो भी कहीं से 'आज' ही मंगवा देगा.....

"पर... पर अगर उसने किसी को बोल दिया तो?" मैने अपने डर की वजह उसको बताई....

"ऐसे कैसे बोल देगा? हम मना कर देंगे तो... चल.. अभी चलते हैं.. दीदी को बोल कर...!" पिंकी ने कहा और खड़ी हो गयी.....

"पर... फिर भी.. तुम्हारा वहाँ जाना ठीक नही है... क्या सोचेगा 'वो'? ये गोली कोई सिरदर्द बुखार की थोड़े ही है जो 'वो' तुम्हे दे देगा और किसी को बताना भूल जाएगा...!" मीनू को हमसे जिरह करते करीब 15 मिनिट हो चुके थे...

"नही बताएगा ना 'वो' दीदी.. मुझे पता है!" पिंकी ज़ोर देकर बोली....

"अच्च्छा... क्या पता है तुझे? ज़रा हमें भी बता दे...! 'तू' जानती नही इन्न लड़कों की फ़ितरत को... इन्हे तो बस एक बहाना चाहिए.. लड़की की कमज़ोरी मिली नही की सीधे 'घटीयपन' पर आ जाते हैं... भूल गयी तरुण को....?" मीनू ज़रा तीखे तेवर में बोली....

"पर.. दीदी... अंजू को दवाई भी तो चाहिए ना.. ! और किसी को बोल भी नही सकते...!" पिंकी की आवाज़ थोड़ी धीमी हो गयी...

"अच्च्छा.. एक काम करना.. उसके पास तुम'मे से एक ही जाना... अंजू.. तू ही चली जाना.. ये घर के बाहर खड़ी हो जाएगी... ठीक है...?" मीनू ने आख़िरकार हथियार डाल ही दिए....

मुझसे पहले ही पिंकी ने जवाब दे दिया..," हां.. ठीक है.. चल अंजू.. जल्दी!" पिंकी ने कहा और मुझे नीचे खींच लाई....

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हम 15 मिनिट में ही उस घर के पास पहुँच गये जहाँ हॅरी किराए के मकान में रहता था.. हमें दूर से ही हॅरी घर के बाहर ही दोस्तों के साथ बैठा दिखाई दे गया....

"अफ.. इसके साथ तो गाँव के और भी लड़के हैं... अब क्या करें...?" मैं चलते चलते धीरे से फुसफुसाई....

"सीधी चल.. थोड़ी आगे चलकर वापस आ जाएँगे... क्या पता तब तक चलें जायें..." पिंकी ने कहा और हम सीधे उनसे आगे निकल गये....

"ओये हॅरी.. देख.. तेरी गुलबो! आज उस तरफ का चाँद इधर कैसे निकल आया... हा हा हा... और उसके साथ रस-मलाई भी है.. हाए क्या मस्त कूल्हे हैं यार...!" उनसे आगे निकलते ही मेरे कानो में किसी लड़के के ये बोल पड़े... मेरी समझ में नही आया था कि 'उसने' गुलबो किसको कहा और रस-मलाई किसको... पर मुझे विश्वास था; 'वो' ज़रूर मेरे ही कुल्हों की तारीफ़ में आहें भर रहा होगा...

"ये लड़के कितने 'बकवास' होते हैं.. है ना अंजू!" शायद पिंकी ने भी ज़रूर 'वो' कॉमेंट सुना होगा....

"हां.." मैने मरी सी आवाज़ में उसकी बात का समर्थन किया... 'ये' यहाँ से नही गये तो...?" मैने पूचछा....

"क्या करें..?" पिंकी ने कुच्छ सोचते हुए बोला..," हां.. एक आइडिया है...!"

"क्या?" मैने उत्सुकता से पूचछा....

"हम 'उसको जाकर बोलते हैं कि बुखार की दवाई चाहिए... 'वो' लेने अंदर जाएगा तो हम उसको बोल देंगे....!" पिंकी ने खड़े होकर कहा...

"हां.. ये सही है....!" मैं उसका आइडिया सुनकर खुश हो गयी....

"चल.. चलते हैं....." पिंकी ने कहा और हम 'वापस' मूड गये....

हमें वापस उनकी तरफ आते देख सब लड़कों की आँखें अचानक चील कौओं जैसी खिल गयी... जैसे हमारे 'माँस' को खाने के लिए व्याकुल हो उठे हों... पर क्या करते.. हॅरी के बिना उस दिन गुज़रा तो था नही... हम जाकर लड़कों के सामने खड़े हो गये....

हम दोनो में से जब लगभग 10 सेकेंड तक आवाज़ नही निकली तो 'लड़कों' में दबे सुर में 'खीर खीर' शुरू हो गयी... मैने हड़बड़ा कर पिंकी के मुँह की ओर देखा... पिंकी तुरंत बोल पड़ी..,"वो.. बुखार की टॅबलेट मिल जाएगी क्या?"

"किसको हो गया...?" हॅरी ने अपनी चेर से खड़े होकर बड़े 'प्याआअर' से पूचछा...

"ववो.. मुझे ही..." पिंकी ने अचकचा कर झूठ बोला....

"हां.. हां.. क्यूँ नही....एक मिनिट.. मैं अभी लाया..." कहते हुए हॅरी ने मानो अपनी सारी विनम्रता को ही 'पिंकी' पर निचोड़ दिया... और जाने लगा...

"नही नही.. मैं साथ ही आ रही हूँ...!" पिंकी ने कहा और उसके पिछे हो ली... मैं ये सोचकर वहीं खड़ी रही कि मीनू ने एक को ही जाने को कहा था....

"तेरी तो लाइफ बन गयी प्यारे! जल्दी आजा.. पार्टी हो गयी आज तो.." मेरे पास खड़े लड़कों में से एक ने कहा और इस तरह सीटी बजाने लगा जैसे......

"कल्लूऊओ बेटा...."लड़कों में से एक ने कहा... मैं उनसे थोड़ी दूर हटकर अपना मुँह फेर कर खड़ी हो गयी थी...

"साले तेरी मा की... तरीके से मैं तेरा चाचा लगता हूँ.. .. देख भाल कर बोला कर.. नही तो मार लूँगा यहीं उल्टा डाल के... मेरा तो पहले ही काबू में नही है.. 'ऐसा 'पीस' देख के... साला इंडिया में क़ानून नही होना चाहिए था.. हे हे..!" एक की आवाज़ मुझे सुनाई दी.. मुझे ऐसे जुमले सुन'ने की आदत थी.. मैं समझ गयी थी कि किस 'पीस' की बात हो रही है...

"आबे वही तो मैं बोल रहा हूँ... 'साले' तू 'खरबूजे' तो देख एक बार... 'स्विफ्ट' के पिच्छवाड़े की 'तरह' मस्त 'गोलाई' है... इष्ह..."

तभी कोई तीसरी आवाज़ मुझे सुनाई दी...," छ्चोड़ो ना यार.. हॅरी का तो लगता है आज 'काम' बन गया... अकेली गयी है.... मुझे तो पक्का...." तभी 'वो' एकद्ूम चुप हो गया.... मुझे हॅरी की आवाज़ सुनाई दी...,"चाबी पड़ी होगी यहाँ... देखना..."

मैने पलट कर देखा.. पिंकी उसके पिछे ही थोड़ी दूर खड़ी थी.... हॅरी ने चाबी उठाई और वापस चल दिया... इस बार मैं भी वहाँ खड़ी ना रह सकी.... मैं भी पिंकी के साथ हो ली....

क्रमशः.........................................

Gataank se aage................

"Haan.. aise..." Maine usko kisi teacher ki tarah se hidayat di aur ek baar fir uski jaanghon ke dono aur ghutne jama kar baith gayi...

"Main neeche baithungi.. tum apna 'ye' 'wahan' laga dena..." Maine kahne ke sath hi apne nitambon ko neeche jhukana shuru kar diya.... wah tirchha hokar jhuka aur 'nishana set karne laga....

"Yahan kya haiiiiiii..." Main wapas upar uthi.. thoda neeche karo neeche..!" Usne toh apna ling seedha mere daane par tika diya tha... mano koyi naya surakh karne ki taiyari mein ho... maine uske honton ko chooma aur fir se neeche baithne lagi....

"Buddhu...!" Pichhe ghusaoge kya?" Main tadap kar boli aur apni yoni ke sath hi uske ling ka 'charge' bhi apne hi haathon mein le liya... main jaan gayi thi.. iske bharose toh ho gayi 'ganga' paar....

Maine uska ling pakda aur apni yoni mein do char baar ghisa kar jaise hi chhed par tikaya.. wo ajeeb se dhang se badbadaya,"

ooooooooooooooooooooo"

"Kya hua?" Maine ruk kar uski aankhon mein jhanka....

"Kuchh nahi... isssssssss... maja aa raha hai...!" Usne kaha aur mere nitambon ko kaskar pakad liya.....

"Main muskurayi aur chhed par rakhe supade ki taraf se nischint hokar uss par dheere dheere baithne lagi... par manjil utni aasan nahi thi.. jitni mujhe lag rahi thi.. Jaise hi meri yoni ka dabav supade par badha.. mujhe yoni ki faankon mein atyadhik dabav mahsoos hone laga.. aisa laga jaise agar aur neeche huyi toh ye fat jayegi.. main wapas thodi si upar uth gayi..

"Kya hua?" Sandeep ne aakhein khol kar poochha....

"Dar ho raha hai...!" Maine bura sa munh bana liya...

"Khud karogi toh dard mahsoos hoga hi.. mujhe tum karne nahi deti..."Sandeep ne shikayati lahje mein kaha....

"Nahi.. ab ki baar pakka karti hoon..." Ling ko andar lene ke liye tadap rahi meri yoni dard ko ek pal mein hi bhool gayi.. aur fir se uske liye andar hi andar fudakne si lagi...

"Ek dum baith jao..!" Sandeep ne hidayat di...

Aur mein josh mein uska kaha maan gayi.. jaise hi maine 'bhagwan' ka naam lekar apni yoni ko iss baar ling par dheela chhoda.. 'fachch' ki aawaj ke sath 'uska' aage ka 'lattoo' mere andar ghus gaya...

Lakh koshish karne par bhi meri cheekh nikle bina na rah saki... ganimat hua ki jyada tej nahi nikli... Par dard asahneey tha... maine turant uthne ki koshish ki par jane kya sochkar Sandeep ne mujhe wahin kas kar pakad liya......

"aah.. kya karte ho.. chhodo mujhe.. bahut dard ho raha hai..." Main hadbadakar boli...

"Kuchh nahi hoga jaan.. jo hona tha.. ho chuka... bus do minute... abhi sab theek ho jayega..." Sandeep ne kaha aur kaskar mujhe kulhon se pakde huye meri chhatiyon ko choosne laga.....

"aah.. kya kar rahe ho.. main mari ja rahi hoon.. aage raasta nahi hai.. mujhse nahi hoga...."

"Mere dost kahte hain ki chhatiyan choosne se iska dard kum ho jata hai...." Usne hatkar kaha aur fir se mere ek daane ko munh mein le liya....

Chhatiyon mein gunguni si gudgudi toh jaroor huyi thi.. par mujhe nahi lag raha tha ki meri yoni se `kareeb 1.5 feet upar latki chhatiyon ko choosne se wahan kuchh rahat milegi... Mujhe aisa lag raha tha jaise meri yoni faili na ho; bulki fat hi gayi ho... Maine neeche jhuk kar dekha... uska sara ka sara ling toh bahar hi tha abhi.. sirf lattoo jane se itna dard hua hai toh poora jane mein kitna dard hoga' soch kar hi main tadap uthi......,"Mujhe nahi hoga Sandeep .. plz.. chhod do mujhe...."

"Hoga kaise nahi.. jaan.. dekho.. bus do minute.." Usne kaha aur ek hath se mujhe pakde huye wah neeche ki aur dabata hua dusre hath se mere bayein ghutne ko dheere dheere door sarkane laga...

"Aah.. kya kar rahe ho.. main mar jaaungi na...!" Maine chhatpatate huye kaha....

"Kuchh nahi hoga jaan.. bus ho gaya.. aur dard nahi hoga... ek minute... bus.. bus.. ek minute...." Wah kahta gaya aur apni manmarzi karta gaya.....

Main tab tak apne hathon se apne aapko uski pakad se mukt karne ki koshish karti rahi jab tak ki wah khud hi ruk nahi gaya....

"Aur mat karo na Sandeep.. tumhari kasam.. bahut dard ho raha hai....!"

"tumhari kasam jaan.. 2 minute se jyada dard nahi hoga ab..." Kahte huye usne apne dono hathon se mujhe kaskar pakda aur mujhe lekar sofe se uth gaya....

"Yye.. ye kya kar rahe ho...!" Main sachmuch dard ko bhool chuki thi aur soch kar hairan thi ki wo aise khada kyun hua.. par agle hi pal meri sab samajh aa gaya... sofe ki taraf ghoom kar wah aaram se mere sath hi neeche aata hua mujhe kamar ke bal sofe par lita kar ruk gaya...

Maine kohniya tika kar upar uthi... Uska ling abhi bhi aadha bahar tha..," Aur mat karna pls.. maine toh socha tha ki sara ho gaya..."

"arey sara hi chala gaya tha jaan.. ye toh khada hone ki wajah se nikal gaya tha.. kahte huye usne jaise hi apna ling andar dhakela.. meri yoni ki tang deewaron mein uthi aanand ki lahron se mera poora badan hi madhosh hota chala gaya...,"aaaaaaaaaahhhhhhhhhhh" Maine poore aanand ke sath ek lambi siski li aur madonnamat hokar uska sir apni chhati par jhuka liya....

"Ho gaya jaan... I love you... tumne kar hi diya.... aaah... bahut maja aa raha hai...."Sach mein hi main aanand ki uss prakastha par thi ki sab kuchh bhool kar mera tan mann wasna ki rangeen galiyon mein kho sa gaya tha......

Iss baar wah apne 'moosal' jaise ling ko jad tak meri yoni ki faankon se chipka kar ruk gaya....,"Kaisa lag raha hai jaan?"

Maine tadap kar apne baal noch daale.. meri aankhein toh pahle se hi pathrayi huyi thi..... Aanand ke jis shikhar par main khud ko uss waqt mahsoos kar rahi thi.. kunwari ladki shayad hi uske baare mein kalpana bhi kar sake.... Ajeeb si halat thi.. Main bolna chahti thi.. par meri juban meri siskiyon ko shabdon mein dhalne mein nakaam thi... "aaah... aaaaayyiiiiiiiii... oooohhhhh muummmmmyyyy' jaisi dhwaniyan uske dhakka lagana band karte hi khamosh ho gayi... Tadap aur bekarari se maine apne baalon ko noch dala tha... uska ye viram asahneey tha....

Wah fir bhi mere jawaab ki prateeksha karta raha toh mujhse ruka na gaya... paglayi huyi si kohniyan tika kar upar uthi aur aanan faanan mein hi apne nitambon ko utha utha kar patakne lagi... Mere nitambon ki thirakan ke karan andar bahar ho rahe ling ka hulka sa ahsaas bhi mujhe marubhumi mein pyasi ke liye sawan aane jaisa tha.....

"aah.. aah...aah... aah.." Main jhallayi huyi apne nitambon ko aage pichhe karte huye ling ko khud hi andar bahar karti rahi... jab tak ki wah meri mansha ko nahi samjha aur poore josh ke sath meri jaanghon ke beech baith kar satasat dhakke lagane laga.....

Wah sisakne ke sath hi haanf bhi raha tha.. par mujhe khud hi nahi pata tha ki main sisak rahi hoon.. ya bilakh rahi hoon... apne hi munh se nikal rahi ajeebogareeb aadhi aadhoori aahein mere hi kaanon ko begaani si lag rahi thi.....

Wah dhakke lagata ja raha tha aur mein paaglon ki tarah kuchh ka kuchh badbadati ja rahi thi..... usne kayi baar aasan badle.. kabhi panjon ke bal baith jata kabhi ghutno ke bal... kabhi meri chhatiyon par late kar dhakke lagata aur kabhi mere ghutnon ke neeche se hath nikal kar sofe par rakh kar... Har aasan ne uss din mujhe naya jeewan diya.. naya aanand....

"ohhhhh... aaaahhhh.. main gaya... main gaya..." Mere kaanon ko uske tej dhakke lagate huye aakhir mein kuchh iss tarah ki aawajein suni aur 5-10 second ke baad hi wo meri chhati par pasar gaya.... Uss 'ek' pal ke anand ko mein shabdon mein bayan nahi kar sakti... mujhe bhi aisa hi laga tha jaise main gayi.. main gayi.. aur Gayi....

Par gaye kahan.. hum dono toh ek dusre ke itne paas aa gaye the ki shareer ke sath hi dilon ke beech ki doori bhi kahin kho gayi....

"I love you jaan!" Kuchh der baad jab Sandeep mein meri chhatiyon par ek pyar bhara chumban dekar kaha tab hi shayad main uss aloukik duniya se wapas lout kar aayi thi..,"aa.. kya hua.... ho gaya kya?" Maine kasmasa kar poochha....

"Haan.. andar hi ho gaya...."

"Kyaaaa?" Main uske neeche padi huyi bhi uchhal si padi...,"Andar nikal diya?"

"Mujhe kuchh yaad hi nahi raha... ek baar dhyan aaya tha.. par bahar nikalne ka mann hi nahi kiya... uske baad toh kuchh yaad hi nahi...."Wah mere upar se alag hota hua mayoosi se bola....

"Yye.. kya kiya tumne... ab mera kya hoga...?" Main baith kar neeche jhuki aur apni yoni mein se bahar tapak rahe uske aur mere premras ke mishran ko dekhti huyi rone lagi.....

Sandeep ko bhi uss waqt kuchh soojha hi nahi.. shayad wah apni galati par sharminda tha...

Achanak Darwaje par huyi 'khatkhat' ne hum dono ke hosh hi uda diye... Main baki sab kuchh bhool kar kaanpti huyi apne kapde dhoondhne lagi.....

"Sandeep... Dholu bhaiya... ...... chachi....." Pinky ki aawaj thi.... Mere sath hi Sandeep ke bhi hosh udd gaye.... par hum dono mein se koyi kuchh nahi bola.....

"Koun hai andar.... darwaja kholo na...." Pinky ki teekhi aawaj ek baar fir mere kaanon mein padi.....

"Jaldi karo..... aur wahan almari mein chhip jao..."Sandeep apni zip band karta hua mere kaano mein fusfusaya......

Maine hadbadahat mein salwar pahni aur apni kachchhi, bra aur kameej ko uthakar almari ki aur bhagi.... Sandeep ke haanfne ki aawajein mujhe almari ke andar bhi sunayi de rahi thi....

"Haaan... kya hai..?" Shayad Sandeep ne darwaja khol kar poochha hoga....

"Itni der kyun laga di... ? kya kar rahe the...?" Pinky ki aawaj mujhe kamre ke andar se hi aati prateet ho rahi thi.....

"Wwo.. haan.. kuchh nahi... So raha tha....."Sandeep ab bhi hulka hulka haanf raha tha.. jaise koyi cross country race karke aaya ho....

"Tum toh pasine mein bheege huye ho... koyi sapna dekh rahe the kya? " kahne ke sath hi mujhe Pinky ki khankhanati huyi hansi sunayi di......

"aahaaan... wo.. ek.. bura sapna tha...!" Sandeep ki saanse ab tak sanyamit ho chuki thi.....

"Wo.. Meenu ne Shikha didi ki 'Pol.Science' ki book mangwayi hai.....!" Pinky ne kaha....

"Par.. wo toh... mujhe kaise milegi... ? kal aa jayegi.. tab le lena na!" Sandeep hadbada kar bola....

"Meenu ne didi ke paas fone kiya hai.. wo kah rahi thi ki badi almari ke beech wale khane mein rakhi hai... tum dekh toh lo!" Pinky ki ye baat sunkar toh meri saansein upar ki upar aur neeche ki neeche rah gayi.... Shayad Sandeep ka bhi aisa hi haal hua hoga....,"Wwwo.. nahi... wahan toh ek bhi kitab nahi hai... ismein toh sirf kapde hain.... haan.. kapde hain sirf"

"Arey.. dekh toh lo ek baar..." Pinky ne kaha.... aur agle hi pal uski gurrati huyi aawaj aayi..," Tum sudhre nahi ho na!"

"Mmaine kya kiya hai...? tum udhar kyun ja rahi ho...?" Sandeep ki aawaj se hi pata lag raha tha ki maamla bigadne wala hai... Pinky shayad almari ki aur hi aa rahi hogi.....

"theek hai... Main bahar khadi hoti hoon... tum dekh kar de do..." Pinky ne gusse se kaha aur shayad bahar nikal gayi.....

Tabhi almari ka darwaja thoda sa khola aur bhay se kaanpte huye maine Sandeep ki aur dekha.. Usne aankhon ki aankhon mein mujhe chup rahne ka ishara kiya aur upar wale khane mein kitab dhoondhne laga....

Honi ko kuchh aur hi manjoor tha.. Achanak upar se mere upar kuchh aakar gira air main jor se cheekhi,"oyiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiiii mummyyyyy!"

Jab tak mujhe meri galati ka ahsaas hota.. Pinky bhag kar almari ke saamne aa chuki thi.. Sandeep asamanjhas mein khada kabhi dayneey chehra banakar Pinky ki aur aur kabhi gusse se meri aur dekhne laga...

Bhay aur sharmindagi se thar thar kaanp rahi main neeche wale khane ke kone mein chipki huyi badi mushkil se najre utha kar Sandeep ki aur dekhti huyi boli..,"Wwwo.. chooha....!"

Pinky ke chehre par mere aur Sandeep ke liye glani ke sapast bhav jhalak rahe the.. Achanak usne jhapatta maar kar Sandeep ke hath se kitab chheeni aur bahar bhag gayi......

"Yye... ye kya kiya tumne?" Sandeep gusse se daant peesta hua chillaya.....

"Wwo.... wo.. upar se chooha kood gaya tha.... mere upar...!" Mujhe ahsaas tha ki maine kya kar diya hai.. ab main Sandeep se bhi najrein nahi mila pa rahi thi... chupchap bahar nikali aur apna kameej pahan kar khadi khadi rone lagi.....

"Tumhe shayad andaja bhi nahi hoga ki tumne kya kar diya... ab baat shikha tak jaye bina nahi rahegi... Ek choohe se darkar.. tumne ye.... shit!.. niklon yahan se jaldi..." Sandeep ne munh fer kar kaha aur apne hi hathon se apna chehra nochne laga......

Meri kuchh bolne ki himmat hi na huyi... Khud hi apne aansoo pounchhe aur apni bra aur panty ko apni salwar mein taang li .....fir shawl audhi aur be-aabru si hokar uske ghar se nikal gayi....

--------------------------------

Main wahan se seedhi Meenu ke ghar hi gayi... Pinky ka chehra tamtamaya hua tha aur Meenu uss'se poochh rahi thi..,"Bata na kya hua?"

Main chupchap jakar charpayi par baith gayi... Mujhe bhi itni chup dekh kar Meenu ne poochh hi liya...,"Had ho gayi.. Chhota sa kaam karwaya tha.. aate hi munh fula kar baith gayi.. aur ab tujhe kya ho gaya...? Tum dono ki ladayi huyi hai kya?"

"Nahi didi.." Maine uss'se najrein milaye bina hi soona sa jawaab diya aur fir Pinky ki aur dekh kar boli," Ek minute bahar aa ja Pinky... Tujhse kuchh baat karni hai...!"

Pinky ne mujhe ghoor kar dekha.. par kuchh boli nahi.. aankhon hi aankhon mein mujhe gali si dekar wo fir se ek taraf dekhne lagi.....

"Sun toh ek..." Maine itna hi kaha tha ki Pinky gusse mein dhadhakti huyi boli..,"Mujhse baat karne ki jarurat nahi hai tujhe... Samajhi..?"

"aisa kya ho gaya...? Jab tu yahan se gayi thi tab toh sab theek tha... tum bahar mile ho kya kahin... Raste mein...?" Meenu aashankit hokar boli....

Ab jawab toh dono ke hi paas tha... par bolti bhi toh kya bolti.... Maine Meenu ki baat ko ansuna kar diya aur ek baar fir dheemi larajti huyi aawaj mein boli,"Pinky plzzz.. ek baar meri baat sun le... fir chahe kuchh bhi bol dena.. kisi ko bhi...!"

Pinky ne iss baar bhi meri baat ko ansuna kar diya....

Meenu ko shayad ahsaas ho gaya ki maamla kuchh jyada hi personal hai....,"Theek hai.. tum apna jhagda niptaao.. main upar jakar aati hoon...."

Meenu ke jate hi Main apni sochi huyi baat par aa gayi..," Tujhe pata hai Pinky..? Sonu ka fone Dholu ke paas hai...!"

Pinky ki aankhon mein hulke se aascharya ke bhav aaye.. par jitni jaldi aaye the.. utni hi jaldi wo gayab bhi ho gaye.....

"Meri baat toh sun le ek baar..." Main jakar jaise hi uske saamne baithi.. usne apna munh fer liya... par maamla ab thoda sa shant laga.. Shayad wah Sonu ke mobile ke baare mein jaan'ne ko utsuk ho gayi thi...

"Wo main usko mobile loutane gayi thi... wo wahan jabardasti karne laga...!" Maine ulti taraf se kahani sunani shuru kaar di...

"Kounsa mobile..? Tere paas kahan se aaya...?" Pinky ki baat mein gussa kum aur utsukta jyada hona ye baat sabit kar raha tha ki usko baat sun'ne mein dilchaspi hai....

"Tu poori baat sunegi, tabhi bataaungi na... meri taraf munh toh kar le...!" Maine pyar se uske gaalon par hath laga kar uska chehra apni taraf ghuma diya... Meri aankhon se aankhein milte hi usne najrein jhuka li...,"Bata!"

"Wo uss din hum Shikha didi se milne gaye the na... toh tujhe yaad hai mujhe dholu ne dusre kamre mein bulaya tha....?" Maine kaha...

"Haan... toh?" Usne upar... meri aankhon mein dekh kar poochha....

"Wo.. bhi aise hi bakwas kar raha tha.. Sandeep ki tarah.. par maine saaf inkaar kar diya... Tujhe toh pata hi hai 'wo' kaisa hai....! Usne mujhe dara dhamka kar mere hath mein ek mobile pakda diya... kahne laga mujhe tumse kuchh jaroori baat karni hain... Main darr gayi thi.. isiliye maine apne paas fone chhipa liya tha.... Aaj 'uss' inspector ka no. iss par aaya toh main darr gayi.. Jaroor usne 'Sonu' ka no. hi try kiya hoga....!" Maine kaha.....

"Par 'Sonu' ka phone Dholu ke paas kaise aaya... ?" Pinky dimag lagane ki koshish karti huyi boli....

"Wahi toh..! main bahut darr gayi thi....! Isiliye yahan se seedhi dholu ko wo fone wapas dene gayi thi... 'wo' toh mila nahi.. maine Sandeep ko fone dekar sab kuchh bata diya.... Mere dare huye hone ka faayda uthakar Sandeep ne mujhe wahin pakad liya... Maine usko mana kiya toh kahne laga ki 'wo' tumhe aur gaanv walon ko bata dega ki Sonu ka fone mere paas hai...!"

"Kamina.. kutta...!" Pinky ne hamesha uski juban par chadhi rahne wali do gaaliyan Sandeep ko di aur fir boli," Fir...?"

"Fir kya?" Maine kahkar sir jhuka liya....

"Kyaaaa? Usne tumhare sath 'wo' kar diya?" Mere chehre ke bhavon ko padhti huyi Pinky aascharya se boli....

"Chhod na ab..?" Main uska dhyan hatane ke iraade se boli..," Achchha hi hua.. tu wahan chali gayi.. tujhe bhi uski asliyat pata chal gayi... shayad main apne aap 'ye' bhi baat nahi kah paati.. aur 'wo' bhi ki Sonu ka mobile Dholu ke paas hai...." Maine apne aap ko saaf saaf bachane ki koshish ki...

"Chal... didi ko batate hain...!" Pinky ne kaha....

"Pls... Sandeep wali baat mat batana...!" Maine usko manane ki koshish ki....

"Kya no. tha wo.." Achanak Meenu ko darwaje ki aad se hamare saamne aate dekh hum dono uchhal pade... Shayad usne sab kuchh sun liya tha...!

"Maine taatkalik sharm se apna sir jhuka liya.. Par Meenu ne Sandeep ke baare mein koyi sawaal nahi poochha....

"Kya no. tha..? batati kyun nahi...?" Meenu aakar mere hath par hath rakh kar boli...

"Mujhe no. nahi pata didi.. par uss par inspector ki call aayi thi...." Maine kaha...

"Ab kahan hai fone?" Meenu ne poochha...

"Wo..wo main wapas de aayi....!" Maine kaha....

"Ek minute mein aati hoon..." Meenu ne kaha aur upar bhag gayi... kuchh der baad wapas aakar boli..," Sonu wala no. toh band pada hai....

"Haan didi.. fir toh pakka wahi no. hai... Maine yahan se jane se pahle hi usko off kiya tha.... Par... aapko uss no. ka kaise pata.....?" Maine poochha....

"Wwo..." Meenu ne ek baar Pinky ki aur dekha aur fir thodi der chup rah kar bolne lagi...,"Tarun ne mujhe 'wo' no. de rakha tha.. ek aadh baar uske paas ghar se fone karne ke liye... 'wo' aksar Sonu ke sath hi rahta tha na.... usi ne bataya tha ki 'ye' sonu ka special no. hai... Uss no. ka kisi aur ko nahi pata.....!"

"Special matlab...?" Maine utsukta se poochha....

"Pata nahi.. 2 no. honge uske paas.. shayad.. par 'wo' no. kisi aur ke paas nahi tha.. Tarun kahta tha....!" Meenu boli...

"Par usne Sonu ka no. kyun diya... uske paas toh apna mobile tha na...!" Maine kaha....

"Pahle nahi tha... Usne baad mein liya tha apna!" Meenu ne jawaab diya.....

"Ohh.. achchha..!" Maine sir hilate huye kuchh socha aur fir boli," Par Sonu ka no. Dholu ke paas kaise aaya..? aur Sonu kahan hai...?"

"Ab kya pata..! Meri toh kuchh samajh mein nahi aa raha... Man... wwo inspector ke paas fone karein?" Meenu boli...

"Rahne do didi.. baar baar fone karna achchha nahi lagta.. Kal 'wo' School mein aayenge toh hum bata denge...!" Pinky ne hamari baaton mein hastakshep kiya...

"Theek hai... tum bata dena.. ek hi baat hai..." Meenu ke chehre par bolte huye mayoosi si jhalak aayi.. fir achanak kuchh soch kar boli," Tu upar ja na Pinky.. thodi der..!"

Pinky ne turant apna chehra fula liya,"Main kahin nahi jaaungi didi... mujhe pata hai tum kya baat karne waale ho...!"

"Kya baat? arrey.. aisi kuchh baat nahi hai.. tu ja na ek baar!" Meenu chid kar boli...

"Nahi.. Main nahi jaaungi..." Pinky bhi adkar baith gayi...

Mere dimag mein bhi kafi der se ek baat ghoom rahi thi.. Maine 2 pal ruk kar socha ki Pinky ke saamne kahoon ya nahi... fir maine kah hi diya..,"Didi!"

"Haan..." Meenu Pinky ko ghoorte huye mujhse boli....

"Wwo... wo aap bata rahe the ki...." Main beech mein hi ruk kar Pinky ki aur dekhne lagi.....

"Tu thodi der ruk ja.... dekhti hoon ye kab tak hamare paas baithi rahti hai.. hum baad mein baat karenge...!" Meenu Pinky ko ghoorte huye boli....

Pinky khadi hokar gusse se pair patak'ne lagi..,"Mujhe nahi pata.. dono akele akele gandi baatein karte ho aur mujhe iss tarah bhaga dete ho jaise main gandi hoon... aane do mummy ko.. aaj dono ki pole kholoongi... kar lo baat..." Pinky ne kahte huye apni moti moti aankhon mein aansu bhar liye aur upar jane lagi...

Meenu ne bhag kar usko seedhiyon ke paas hi pakad liya...,"Sun toh.. aisi baat nahi hai mere pinku... aaja... aa na!" Meenu usko wapas kheench layi aur apni god mein bitha liya....

"Hai kyun nahi aisi baat...? aap hamesha mere sath aisa hi karte ho.. Main bhi toh Anju ki umar ki hoon.. mujhe sab baaton ka pata hai... Tum dono se samajhdaar hoon main!" Uski god mein baithi huyi Pinky Meenu ki aankhon mein aankhein daal kar boli...

"Achchha theek hai.. baithi rah.. bus!" Meenu ne uske gaalon se aansoo saaf kiye aur fir meri aur dekh kar boli," Sandeep ne aise kaise jabardasti kar li... tune usko kuchh bhi nahi kaha....?"

Maine turant apni najrein jhuka li... Mujhe lag nahi raha tha ki jis tarah se Pinky ko maine kuchh bhi kah diya tha.. unn baaton par Meenu ko vishvas hua hoga... Pinky sath na baithi hoti toh shayad main Meenu ko thoda sa sach bhi bata deti.. Par Pinky ke saamne... toh sach bolne ka matlab khud ko uski najron se girana hi tha...

"Chal chhod.. ab toh ho hi gaya.. par tune dhyan toh rakha hoga na?" Meenu meri asamanjhas ko jaan kar boli...

"Kis baat ka didi..?" Maine poochha....

"Wo.. Teri M.C. kab ki hai...?" Meenu ne poochha.....

"M.C. kya didi?" Main samajh nahi payi....

"Arey teri 'dates' kab aati hain...?" Usne dohraya....

"Wwo.. wo toh koyi 10 din ho gaye... kyun?" Maine poochha....

"Le... tu toh gayi fir... wo... tu samajh rahi hai na.. main kya poochhna chahti hoon..?" Meenu jhalla kar boli...

"Nahi... "Maine jaldi jaldi mein kah diya.. tabhi uski baat shayad meri samajh mein aa gayi," Haaan... isiliye toh main aapse ye poochh rahi thi ki....!" Kah kar main fir chup ho gayi....

"Kya? ... bol na!"

"WWo.. aap bata rahe the na... ki 'goliyan' aati hain....!" Maine najrein churate huye kaha....

"Hey bhagwaan... Andar hi?" Meenu gusse se boli..," Itni toh akal honi chahiye thi na.. had kar di yaar...!"

Main jawab deti bhi toh kya deti.. had toh ab paar kar hi chuki thi main... kuchh der wahan sannata chhaya raha.. fir mujhe bolna hi pada..,"Wo.. wo goli mil jayegi na?"

Pinky maamle ki najakat ko bhanp kar Meenu ki god se hati aur ek taraf baith kar hum dono ke chehron ko dekhne lagi...

"Wo toh 24 ghante ke andar leni hoti hai.... aur 'wo' ab milegi kahan se...?" Meenu jhalla uthi thi... shayad 'wo' dil se meri chinta kar rahi thi....

"Aap le aana na.. kal shahar se...!" Maine anunay se uski aankhon mein dekha...

"Main... tu pagal ho gayi hai kya?.. main jakar ye bolungi ki mujhe 'ipill' de do... main kahin se bhi shadi shuda lagti hoon kya?.. Na.. mere bus ka nahi hai.. jakar aise bolna....!" Meenu ne saaf saaf kah diya.. fir mere chehre ke runwase bhav padh kar boli," Main... main toh sirf itna kar sakti hoon ki kisi saheli ko bol doongi.. agar kisi ne lakar de di toh main le aaungi...."

"Ye.. 'ipill' kya hoti hai didi?" Pinky hamari ek ek baat ko pi rahi thi....

"Kuchh nahi... goli hoti hai ek.. uss'se 'bachcha' hone ka bhay nahi rahta.. ab jyada mat poochhna..." Meenu ke kaha aur chintit si hokar badbadati huyi upar chali gayi....

Meri aankhon ke saamne andhera sa chhata ja raha tha.... Samajh mein aa nahi raha tha ki kya karoon aur kya nahi.. mera waham itna badh gaya ki pate mein 'pani' hilne ki bhi aawaj hoti toh lagta jaise 'bachcha' ban raha hai... Ab kal goli aane ka bhi pakka chance nahi tha... 24 ghante ke andar nahi mili toh main kya karoongi....' sochte huye maine apna matha pakda aur subakne lagi...

"Ro mat Anju... uss 'kutte kamine' ko main chhodungi nahi!" Pinky ne mujhe santwana dete huye kaha....

"Uss'se kya hoga Pinky...!" Main subakte huye hi boli aur achanak sir utha kar boli..," Main Sandeep ko hi bol doon toh?... wahi lakar dega ab goli bhi.....!"

"Na...! Uss'se ab kabhi baat mat karna...." Pinky ne gussa ugalte huye kaha..," Iss'se achchha toh aap 'Harry' ko bol do...!"

"Harry?... Harry koun..?" Mujhe dhyan hi nahi aaya ki 'wo' kis Harry ki baat kar rahi hai....

"Arey.. 'wo.. Harish...! Uska yahi kaam hai... kya pata uske paas 'ipill' bhi mil jaye..." Pinky ne kaha....

"Wo.. jisne school mein camp lagwaya tha Dr. Malik ka...?" Maine theek hi andaja lagaya tha.....

"Haan... Uska 'dawaayiyon' ka hi kaam hai... Chal uske paas chalte hain... Uske paas nahi hogi toh bhi kahin se 'aaj' hi mangwa dega.....

"Par... par agar usne kisi ko bol diya toh?" Maine apne darr ki wajah usko batayi....

"aise kaise bol dega? Hum mana kar denge toh... chal.. abhi chalte hain.. didi ko bol kar...!" Pinky ne kaha aur khadi ho gayi.....

"Par... fir bhi.. tumhara wahan jana theek nahi hai... kya sochega 'wo'? ye goli koyi sirdard bukhar ki thode hi hai jo 'wo' tumhe de dega aur kisi ko batana bhool jayega...!" Meenu ko humse jirah karte kareeb 15 minute ho chuke the...

"Nahi batayega na 'wo' didi.. mujhe pata hai!" Pinky jor dekar boli....

"achchha... kya pata hai tujhe? jara hamein bhi bata de...! 'tu' janti nahi inn ladkon ki fitrat ko... inhe toh bus ek bahana chahiye.. ladki ki kamjori mili nahi ki seedhe 'ghatiyapan' par aa jate hain... bhool gayi Tarun ko....?" Meenu jara teekhe tewar mein boli....

"Par.. didi... Anju ko dawayi bhi toh chahiye na.. ! aur kisi ko bol bhi nahi sakte...!" Pinky ki aawaj thodi dheemi ho gayi...

"Achchha.. ek kaam karna.. uske paas tum'me se ek hi jana... Anju.. tu hi chali jana.. ye ghar ke bahar khadi ho jayegi... theek hai...?" Meenu ne aakhirkaar hathiyaar daal hi diye....

Mujhse pahle hi Pinky ne jawab de diya..," Haan.. theek hai.. chal Anju.. jaldi!" Pinky ne kaha aur mujhe neeche kheench layi....

----------------------------------------------

Hum 15 minute mein hi uss ghar ke paas pahunch gaye jahan Harry kiraye ke makaan mein rahta tha.. Hamein door se hi Harry ghar ke bahar hi doston ke sath baitha dikhayi de gaya....

"Uff.. iske sath toh gaanv ke aur bhi ladke hain... ab kya karein...?" Main chalte chalte dheere se fusfusayi....

"seedhi chal.. thodi aage chalkar wapas aa jayenge... kya pata tab tak chalein jaayein..." Pinky ne kaha aur hum seedhe unse aage nikal gaye....

"Oye Harry.. Dekh.. Teri Gulabo! aaj uss taraf ka chand idhar kaise nikal aaya... ha ha ha... aur uske sath ras-malayi bhi hai.. haye kya mast kulhe hain yaar...!" Unse aage nikalte hi mere kaano mein kisi ladke ke ye bol padey... meri samajh mein nahi aaya tha ki 'usne' Gulabo kisko kaha aur ras-malayi kisko... par mujhe vishvas tha; 'wo' jaroor mere hi kulhon ki taareef mein aahein bhar raha hoga...

"Ye ladke kitne 'bakwas' hote hain.. hai na Anju!" Shayad Pinky ne bhi jaroor 'wo' comment suna hoga....

"Haan.." Maine mari si aawaj mein uski baat ka samarthan kiya... 'ye' yahan se nahi gaye toh...?" Maine poochha....

"Kya karein..?" Pinky ne kuchh sochte huye bola..," Haan.. ek idea hai...!"

"Kya?" Maine utsukta se poochha....

"Hum 'usko jakar bolte hain ki bukhar ki dawayi chahiye... 'wo' lene andar jayega toh hum usko bol denge....!" Pinky ne khade hokar kaha...

"Haan.. ye sahi hai....!" Main uska idea sunkar khush ho gayi....

"Chal.. chalte hain....." Pinky ne kaha aur hum 'wapas' mud gaye....

Hamein wapas unki taraf aate dekh sab ladkon ki aankhein achanak cheel kouwon jaisi khil gayi... Jaise hamare 'maans' ko khane ke liye vyakul ho uthe hon... par kya karte.. Harry ke bina uss din gujara toh tha nahi... Hum jakar ladkon ke saamne khade ho gaye....

Hum Dono mein se jab lagbhag 10 second tak aawaj nahi nikli toh 'ladkon' mein dabe sur mein 'khir khir' shuru ho gayi... Maine hadbada kar Pinky ke munh ki aur dekha... Pinky turant bol padi..,"Wo.. bukhar ki tablet mil jayegi kya?"

"Kisko ho gaya...?" Harry ne apni chair se khade hokar bade 'pyaaaaar' se poochha...

"Wwo.. Mujhe hi..." Pinky ne achkacha kar jhooth bola....

"Haan.. haan.. kyun nahi....Ek minute.. Main abhi laya..." Kahte huye Harry ne mano apni sari vinamrata ko hi 'Pinky' par nichod diya... aur jane laga...

"Nahi nahi.. main sath hi aa rahi hoon...!" Pinky ne kaha aur uske pichhe ho li... Main ye sochkar wahin khadi rahi ki Meenu ne ek ko hi jane ko kaha tha....

"Teri toh life ban gayi pyare! jaldi aaja.. party ho gayi aaj toh.." Mere paas khade ladkon mein se ek ne kaha aur iss tarah seeti bajane laga jaise......

"Kallooooo beta...."Ladkon mein se ek ne kaha... main unse thodi door hatkar apna munh fer kar khadi ho gayi thi...

"Saale teri maa ki... tareke se main tera chacha lagta hoon.. .. dekh bhal kar bola kar.. nahi toh maar loonga yahin ulta daal ke... mera toh pahle hi kaabu mein nahi hai.. 'aisa 'piece' dekh ke... Sala india mein kanoon nahi hona chahiye tha.. he he..!" Ek ki aawaj mujhe sunayi di.. mujhe aise jumle sun'ne ki aadat thi.. main samajh gayi thi ki kis 'piece' ki baat ho rahi hai...

"Abey wahi toh main bol raha hoon... 'saale' tu 'kharbooje' toh dekh ek baar... 'Swift' ke pichhwade ki 'tarah' mast 'golayi' hai... ishhhhhhhhh..."

Tabhi koyi teesri aawaj mujhe sunayi di...," Chhodo na yaar.. Harry ka toh lagta hai aaj 'kaam' ban gaya... Akeli gayi hai.... Mujhe toh pakka...." Tabhi 'wo' ekdum chup ho gaya.... Mujhe harry ki aawaj sunayi di...,"Chabi padi hogi yahan... dekhna..."

Maine palat kar dekha.. Pinky uske pichhe hi thodi door khadi thi.... Harry ne chabi uthayi aur wapas chal diya... Iss baar main bhi wahan khadi na rah saki.... Main bhi Pinky ke sath ho li....


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:38

बाली उमर की प्यास पार्ट--23

गतान्क से आगे................

" हांजी.. बुखार कैसे हो गया पिंकी? एग्ज़ॅम तुम्हारे वैसे चल रहे हैं.. ध्यान रखा कर ना सेहत का...!" हॅरी पिंकी की आँखों में देख मंद मंद मुस्कान फैंकता हुआ बोला... और दो डिब्बे उतार कर उनमें से गोलियाँ ढूँढने लगा...

"ववो.. बस ऐसे ही...!" पिंकी ने अपनी बात अधूरी छ्चोड़ी और मेरे चेहरे की और देखने लगी.. मैं क्या बोलती?

"ये लो.. अभी के लिए तो ये 3 खुराक दे रहा हूँ... कल दोपहर तक आराम ना लगे तो पेपर के बाद डॉक्टर को ज़रूर दिखा लेना...!" एक पूडिया में दवाई बाँध कर देता हुआ 'वो' बोला....

पिंकी ने चुपचाप दवाई हाथ में पकड़ी और मेरी कोख में कोहनी मार कर मुझे बोलने का इशारा किया... पर पता नही क्यूँ.. मैं उसके शालीन व्यवहार को देख कर इतनी दब गयी कि मेरी ज़ुबान ही ना निकली.... गाँव का डॉक्टर तो एक नंबर. का हरामी था... उसने मेरे साथ उस'से कुच्छ दिन पहले ही इलाज के बहाने बहुत ही कामुक हरकत की थी... मैं सोच रही थी कि ये भी कुच्छ ना कुच्छ तो ज़रूर ऐसा करेगा... आख़िर जब बुड्ढे डॉक्टर ही इलाज के बहाने हाथ सॉफ कर लेते हैं तो 'वो' तो गबरू जवान था.... पर ना.. उसने तो 2 मिनिट से पहले ही गोलियाँ पिंकी के हाथ में पकड़ाई और टेबल के इस तरफ आ गया....

"क्या बात है?" उसके खुद दरवाजे के पास जाने पर भी हम अंदर ही खड़े रहे तो उसने हमारी तरफ अचरज से देखा और वापस आ गया....," बोलो?"

"कककुच्छ नही... ववो... ययए.. तू बोल दे ना!" हकलाती हुई पिंकी अचानक रोनी सूरत बना कर मेरी तरफ देखने लगी....

"ऐसी क्या बात है यार..?" हॅरी मन ही मन हंसता सा हुआ वापस टेबल के उस पार चला गया..,"ओके... बैठो..!"

मैने पिंकी की तरफ एक बार देखा और हॅरी के सामने टेबल के दूसरी तरफ वाली चेर पर बैठ गयी.. मजबूरन पिंकी को भी बैठना पड़ा.....

"कुच्छ बोलॉगी या मुझे खुद ही अंदाज़ा लगाना पड़ेगा...!" हॅरी ने हंसते हुए कहा.. वो अचानक कुच्छ ज़्यादा ही खुश नज़र आने लगा था....

"ववो...." पिंकी बार बार कोशिश करके अपनी ज़ुबान को शब्द देने का प्रयास कर रही थी... पर मैं उसकी हालत समझ सकती थी.. जब मेरे मुँह से ही कुच्छ नही निकल रहा था तो 'वो' बेचारी कैसे बोलती...

"बोल भी दो अब.. तुम ऐसे बैठी रहोगी तो मुझे हार्ट अटॅक आ जाएगा.. सच बोल रहा हूँ.. तुम्हे नही पता मेरा दिमाग़ कहाँ कहाँ घूम रहा है...." हॅरी इस बार नर्वस होकर बोला....

"ववो..." पिंकी काफ़ी देर से टेबल के किनारों को अपने नाखूनो से खुरचे की कोशिश कर रही थी..,"आई... आई पिल....."

"पिंकीईईईईई?" हॅरी के चेहरे से मुस्कान यूँ गयी जैसे गढ़े के सिर से सींग... उसके चेहरे का रंग यूँ बदल गया जैसे 'आइ पिल' 'आइ पिल' ना होकर कोई आटम बॉम्ब हो...," कुच्छ देर जड़वत सा उसके चेहरे को घूरता हुआ हॅरी बोला," ययए क्या कह रही हो पिंकी....?"

"ना ही पिंकी कुच्छ बोली और ना ही मैं... मुझसे तो अपना सिर ही नही उठाया जा रहा था जब तक की अचानक हॅरी ने फफक कर जाने क्या कहानी बनानी शुरू कर दी...

"तुम्हे पता है पिंकी...." हॅरी का चेहरा ऐसा बना हुआ था जैसे अब रोया और अब रोया.... अपनी कही हर लाइन के बाद 'वो' गहरे दुख में डूबी हुई लाबी साँस ले रहा था... कभी कभी बीच में भी... मैं उसके चेहरे की तरफ देखने लगी थी.. पर पिंकी का सिर अब भी झुका हुआ था... हॅरी की आँखें पता नही क्यूँ नम होती जा रही थी..," एक लड़की थी... बहुत प्यारी... जब भी उसको देखता... जितनी बार भी देखा... मुझे उसका चेहरा अपना सा लगता था.... उसकी मुस्कान से भी मुझे उतना ही प्यार था.. जितना उसके गुस्से से.... उसको देख कर ऐसा लगता था जैसे..... रंग बिरंगे चेहरों से सजी इस दुनिया में 'वो' एक अलग ही चेहरा है... एक नन्ही काली जैसा नादान.... एक फूल जैसी मासूम... और.. और एक बच्चे की तरह शैतान.. पर.. उसकी नादानी में; उसकी मासूमियत में.. और.. उसकी शैतानियों में.. जाने क्या बात थी कि जितनी बार भी उसको देखता.. जितनी बार भी उसके बारे में सुनता... उसके लिए मेरा प्यार बढ़ता ही जाता.... पर कभी तरीके से बोल नही पाया.. क्यूंकी..... क्यूंकी मुझे डर लगता था..... डर लगता था कि अगर 'जवाब' में इनकार मिला तो क्या होगा!.... मेरे दोस्त.. हमेशा मुझे कहते थे.. कि मुझे अपने दिल की बात दिल में नही रखनी चाहिए... बोल देनी चाहिए... गुलबो को.. कहीं ऐसा ना हो की फिर देर हो जाए.... पर मुझे विश्वास था.. अपने प्यार पर... अपने सच्चे प्यार पर... मुझे विश्वास था.. कि 'वो' इतनी भी नादान नही हो सकती कि समय से पहले ही रास्ते से भटक जाए... समय से पहले ही....." अचानक हॅरी चुप हो गया और उसने अपनी आँखें बंद कर ली.. आँखें बंद होते ही उनमें से 2 आँसू निकल कर आए और उसके गालों पर ठहर गये.... मैं हैरानी से उसकी और देख रही थी... मेरी समझ में माजरा आ ही नही रहा था...

अचानक पिंकी अपनी चिर परिचित पैनी आवाज़ में बोली," मैने क्या किया है...?"

उसके बोलते ही हॅरी ने आँखें खोल दी.. उसकी आँखें हल्की हल्की लाल हो गयी थी.. बोला तो ऐसा लगा की खून का घूँट भरकर बोला हो," ना! तुमने कहाँ कुच्छ किया है पिंकी... आज कल तो सब जगह ऐसा होता है... तुमने कहाँ ग़लत किया... ग़लत तो मैं था.. ग़लत तो मेरे विचार थे.. तुम्हारे बारे में!"

"ये... ये क्या बोल रहे हो तुम..." पिंकी उत्तेजित होकर खड़ी हो गयी..," तो तुम मेरे बारे में बोल रहे थे... ये सब... मैने कुच्छ नही किया सुन लो.. 'वो तो मुझे.... 'वो' तो किसी ने मँगवाई थी.. देनी है तो दे दो.. वरना अपना काम करो.. !"

"क्य्ाआ? तो क्या सच में तुमने... मतलब..." हॅरी की आँखों में फिर से वही चमक लौट आई.. हां.. थोड़ा शर्मिंदा सा ज़रूर लग रहा था..... बोलते हुए हॅरी को पिंकी ने बीच में ही टोक दिया," म्म..मैं तुम्हारा 'सिर' फोड़ दूँगी हां!" गुस्से से पिंकी ने कहा और जाने उसके दिमाग़ में क्या आया.. वह हँसने लगी....

"सॉरी... एक मिनिट... " हॅरी ने बॅग में से एक बड़ा सा पत्ता निकाला और उसमें से एक छ्होटी सी गोली निकाल कर दे दी..,"ये लो..... सॉरी.. मैं बस यूँही सोच गया था...."

"चल अंजू.." पिंकी ने जैसे उसके हाथ से गोली झटक ली हो..," मेरे बारे में ऐसा सोचता है..." पिंकी बड़बड़ाई और मेरा हाथ पकड़ कर बाहर निकल आई...

"पिंकी... हमने उसको पैसे तो दिए ही नही....." मेरी खुशी का कोई ठिकाना नही था.. मेरी चिंता दूर जो हो गयी थी.....

"हां.. पैसे दूँगी उसको... अगर तेरा काम ना होता तो में 'ये' गोली उसी को खिला कर आती हां!" पिंकी गुस्से से धधकति हुई बोली...

"अरे... इसमें उसकी क्या ग़लती है... तुम ऐसी चीज़ बिना बात सॉफ किए माँगोगी तो कोई भी ये बात सोच लेगा...." मैने उसको समझाने की कोशिश की....

"वो बात नही है यार!" पिंकी का मूड उखड़ा हुआ था....

"तो.. और क्या कह दिया उसने...?" मैं असमन्झस में पड़ गयी....

"अच्च्छा.. तूने सुना नही क्या? क्या प्रेमलीला छेड़ के बैठ गया था अपनी...." पिंकी मेरी तरफ देख कर तरारे से बोली....

"ओह्हो.. फिर उसने तुझे तो कुच्छ नही कहा ना...."

"तुझे नही पता... 'वो' सारी बकवास मेरे बारे में ही कर रहा था... उसने पहले भी मुझे एक दो बार गुलबो कहा है... मैने मना कर दिया था कि मेरा नाम ना बिगाड़े.... !" पिंकी बोली....

"पर... तू उस'से लड़ाई करके आ गयी... उसने किसी को बोल दिया तो...?" मैं आशंका से बोली....

"नही बोलेगा वो!" पिंकी ने आत्मविश्वास से कहा.....

"क्यूँ? तुझे कैसे पता....?"

"इतना भी बुरा नही है... हे हे हे..." पिंकी हँसने लगी.....

"तू उसको इतना कैसे जानती है?" मैने हैरत से पूचछा.. पिंकी शर्तिया तौर पर उन्न लड़कियों में से नही थी जो हर जाने अंजाने लड़के का रेकॉर्ड लेकर घूमती हो.. हरीश के बारे में तो मुझे भी सिर्फ़ इतना ही पता था कि 'वो' अच्च्चे ख़ासे घर का लड़का था.. और करीब 3 साल से हमारे गाँव में किराए पर रह रहा था.. अपने दवाइयों के 'काम' के अलावा समाज सेवा में उसकी काफ़ी रूचि थी, इसीलिए जल्द ही उसको गाँव और बाहर के बहुत से लोग जान'ने लगे थे....

"क्या? मैं 'इतना' क्या जानती हूँ...?" पिंकी ने चलते चलते पूचछा...

"आ..आन.. मेरा मतलब तुझे कैसे इतना विश्वास है कि 'वो' किसी को कुच्छ नही बताएगा....?" मेरा सवाल फ़िज़ूल नही था...

"छ्चोड़.. घर आ गया है.. बाद में बात करेंगे... ले.. ये गोली खा ले अभी... उसकी बकवास मीनू को मत बताना...." पिंकी ने घर में घुसने से ठीक पहले अपने हाथ में संभाल कर रखी हुई गोली मुझे पकड़ा दी......

मैं जल्दी से घर जाकर खा पीकर वापस पिंकी के घर आ गयी और हम दोनो अगले दिन के पेपर की तैयारी करने लगे......

---------------------------

भगवान और 'संदीप' की दया से मेरा चौथा 'पेपर' भी अच्च्छा हो गया.. हालाँकि उसने मुझसे कोई बात नही की थी.. पर मैने आधे टाइम के बाद मौका देख कर खुद ही अधिकार पूर्वक अपनी आन्सर शीट उसकी ओर सरका कर उसकी शीट लगभग छ्चीन ही ली... उसने कोई प्रतिक्रिया नही दी और उतनी ही स्पीड से मेरी शीट में लिखने लगा.. जितनी स्पीड से 'वो' अपना पेपर खींच रहा था....

पेपर के बाद खुशी खुशी हम दोनो जैसे ही एग्ज़ॅमिनेशन रूम से बाहर निकले.. इनस्पेक्टर मानव को सादी वर्दी में ऑफीस के बाहर खड़ा पाकर मैं चौंक गयी..,"आए.. इनस्पेक्टर!" मैने पिंकी के कानो में फुसफुसाया....

"कहाँ?" उसने जैसे ही अपनी नज़रें उठाकर चारों और घुमाई.. उसको मानव दिखाई दे गया...

"क्या करें...? हम इसके पास चलें या नही..?" पिंकी ने असमन्झस में खड़ी होकर मेरी राइ लेने की सोची...

"वो बात नही बतानी क्या? ढोलू वाली...!" मैने कहा ही था की तभी मानव की नज़र हम पर पड़ी.. उसने इशारे से हुमको वहीं रुकने को कह दिया...

कुच्छ देर बाद ही स्कूल खाली हो गया... मेरे मंन में पहले पेपर के बाद ऑफीस में हुई मस्ती की यादें ताज़ा हो गयी... उस दिन भी मैं और पिंकी पेपर के बाद ठीक वहीं खड़े थे.. जहाँ आज!

"इधर आना एक बार..." मानव ने हमें बुलाया और फिर ऑफीस के अंदर झाँक कर बोला,"आओ.. बाहर आ जाओ!"

हमारे ऑफीस के दरवाजे तक पहुँचते पहुँचते मेडम के साथ 'वो' सर भी खिसियाए हुए से बाहर निकल आए... हम दोनो ने आस्चर्य से एक दूसरी की आँखों में देखा... '2 दिन से तो ये आ ही नही रहे थे... फिर आज कैसे?'

मेरे हाथ अपने आप ही सर और मेडम को नमस्ते कहने के लिए उठ गये.. पर पिंकी ने सिर्फ़ मानव को नमस्ते की.. 'सर' कह कर....

"हूंम्म... माथुर साहब... अब बोलो!" मानव ने 'सर' को घूर कर देखा....

"अर्रे यार.. जो बात थी.. मैं बता चुका हूँ.. आप क्यूँ खम्खा इस मामले को खींच रहे हो... मैं कोई गैर थोड़े ही हूँ.. आपके शहर का ही रहने वाला हूँ... शाम को बात करते हैं ना साथ बैठ कर.... 'कोठी' पर आ जाना..." सर ने टालते हुए कहा....

"क्यूँ? कोठी पर क्या है? यहाँ क्यूँ नही....!" मानव ने कुटिल मुस्कान उसकी और उच्छली... हम दोनो चुपचाप उनकी बातें सुनते रहे....

"अर्रे इनस्पेक्टर भाई साहब.. कामन सेन्स है.. यहाँ मैं आपकी 'वो' सेवा थोड़े ही कर सकता हूँ जो मेरे अपने घर पर हो जाएगी.. छ्चोड़ो भी अब.. जाने दो लड़कियों को...!" सर ने मानव के कंधे पर थपकी लगाकर कहा...

"तुम्हारे फ़ायडे के लिए ही बोल रहा हूँ.... तुम मुझे यहीं सब कुच्छ बता दो तो अच्च्छा रहेगा.... 'वरना' शाम को थाने में तुम्हे 'वो' इज़्ज़त नही मिलेगी जो यहाँ दे रहा हूँ.. समझ रहे हो ना बात को....!" मानव ने गुर्राते हुए कहा...

"देखो इनस्पेक्टर.. मुझे इस बारे में कुच्छ नही पता.. मुझे जो बोलना था मैं बोल चुका हूँ...." सर भी मानव की टोन देख कर खिज से गये....

मानव ने तुरंत मेरी और देखा..,"हां अंजलि.. क्या बताया था मेडम ने तुम्हे.. अगले दिन...?"

मैने सकपका कर मेडम की ओर देखा और अपना सिर झुका लिया...," ज्जई.. सर.. मेडम ने बताया था कि हमारे जाने के बाद तरुण और 'सोनू' दोनो यहाँ आए थे.... उन्होने सर से अकेले में कुच्छ बात की थी... मेडम कह रही थी कि सर में और उन्न दोनो में 'उस' दिन वाली बात को लेकर कुच्छ समझौता हुआ था...!"

"और उसी दिन तरुण को मार दिया गया.. सोनू गायब हो गया.. है ना...?" मानव ने कन्फर्म किया....

मैने सिर झुकाए हुए ही 'हां' में हिला दिया... तभी मुझे 'सर' की आवाज़ सुनाई देने लगी..,"क्या यार.. तुम 'इस' रंडी की बात पर भरोसा करोगे.. साली कुतिया.. तीन बार तो 'डी.ई.ओ. बन'ने के चक्कर में मेरी कोठी पर 'रात' बिता चुकी है.. एम.पी. साहब के साथ... और ये दोनो... इनको भी कम मत समझना.." मैने नज़रें उठा कर 'सर' को देखा.. वो हमारी ओर देख कर बातों को चबा चबा कर बोल रहा था...," ये दोनो भी पूरे मज़े से........."

सर की बात पूरी नही हो पाई.. मानव का एक झन्नाटेदार थप्पड़ 'सर' के गाल पर पड़ा और उसका सर दीवार से जा टकराया...

सर लड़खदाया और फिर सीधा खड़ा होकर अपने गाल को सहलाने लगा.. उसके साँवली सूरत पर भी 'तीन' उंगलियों के निशान सॉफ दिखाई दे रहे थे.. जैसे वहाँ खून इकट्ठा हो गया हो..," तुम मुझे जानते हो इनस्पेक्टर.. फिर भी..." सर की बाईं आँख 'लाल' हो गयी थी..

"अभी कहाँ... अभी तो मुझे बहुत कुच्छ जान'ना है... शाम को चलकर 'थाने' आ जाना.. वरना... 'ये' सिर्फ़ ट्रैलोर था...." मानव गुर्रा रहा था....

"देखो इनस्पेक्टर साहब!.. मैं बता रहा हूँ... 'वो' इनको छ्चोड़ कर वापस आए थे... उन्होने मुझसे 'ये' कहा था कि '2' और लड़कियों का ऐसे ही पेपर करवाना है... और 'एक' दिन 'इसको.." उसने पिंकी की ओर इशारा करते हुए कहा," इसको पेपर टाइम के बाद रोक कर रखना है.... कैसे भी करके... उसने कहा था कि 'वो' दो लड़कों को और साथ लेकर आएँगे.. और इसका बलात्कार...." कहकर सर अपने गाल को सहलाने लगे...

मानव ने एक गहरी साँस ली..," और.....?"

"और.. उन्होने मुझसे 1 लाख रुपए माँगे थे.. मोबाइल क्लिप दिखा कर 'वो' मुझे ब्लॅकमेल करना चाह रहे थे...." सर ने उगल दिया....

"ओह्ह.. इसीलिए तुमने तरुण को मरवा दिया... और शायद सोनू को भी...!" मानव तमतमाया हुआ था....

"नही इनस्पेक्टर... मुझे इस बात के बारे में कुच्छ नही पता... मैं तो उनको 1 लाख रुपए दे ही देता... मेरे लिए एक लाख रुपैया कोई बड़ी बात नही है..."

"शाम को थाने आ जाना..." मानव ने कहा और हमारी ओर घूम गया..," तुम जाओ अब..."

मैं कुच्छ बोलने ही वाली थी की पिंकी ने मेरा हाथ पकड़ कर खींच लिया... स्कूल के मैं गेट पर जाते ही मैं बोली," वो ढोलू वाली बात भी तो बतानी है...!"

"नही छ्चोड़... मीनू फोन पर ही बता देगी.. मुझे तो इस'से डर लग रहा है... कितना खींच के दिया उसको..." पिंकी हँसने लगी....

"तो.. हमें थोड़े ही कुच्छ कहेंगे...!" मैं बोली...

"क्या पता... उस दिन 'स्कूल' वाली बात पूच्छने लगे तो...?" पिंकी ने मुझे 'बेचारी' सी नज़रों से देखा... तभी मानव ने हमारे पास आकर अपनी बाइक रोक दी..," यहाँ क्यूँ खड़ी हो...?"

हम दोनो सकपका गये.. तभी मेरे मुँह से अचानक निकल गया..," हमे... हमे अकेले जाते हुए डर लग रहा है....!"

मानव हँसने लगा..," आओ.. बैठो.. मैं छ्चोड़ देता हूँ..."

मैने पिंकी की और घबराकर देखा.. उसका पता नही था बाद में क्या का क्या बोलने लग जाए.. पिंकी ने हताशा में मुझे बैठने का इशारा किया... हम दोनो मानव के पिछे बैठे और गाँव की तरफ चल पड़े......

जैसे ही मानव ने गाँव के स्टॅंड पर बाइक रोकी.. पिंकी फटाक से उतर गयी.. सच कहूँ तो मेरा उतरने का मन नही कर रहा था.. उसकी फौलादी पीठ से सटी मेरी एक चूची मुझे 'कल' वाला रंग बिरंगा अहसास करा रही थी.... सारी रात दुखती रही मेरी योनि अब एक बार फिर मचलने लगी थी.. उसका दर्द कम होते ही विरह वेदना से वो एक बार फिर तड़प उठी थी... एक बार में ही उसको 'मूसल' की लत लग गयी थी शायद... अब गुज़ारा होना मुश्किल था...

मुझे दुखी मन से उतरते देख कर मानव ने पूच्छ लिया..," घर यहाँ से ज़्यादा दूर है क्या?"

"नही.. हम चले जाएँगे...!" पिंकी तपाक से बोली... तो मैं कुच्छ बोल ना सकी... और उसके साथ चल पड़ी...

"एक मिनिट...!" मानव की आवाज़ आते ही हम घूम गये..

"एयेए... वो घर पर कौन कौन हैं...?" मानव ने अपने माथे को खुजाते हुए अपनी आँखों की हिचकिचाहट को छिपा लिया...

"पता नही.. सभी होंगे!" पिंकी धीरे से बोली....

"मैं घर ही छ्चोड़ आता हूँ.. आओ बैठो.." मानव के कहते ही मैं बाइक की ओर वापस चल पड़ी....

"नही.. सर.. हम चले जाएँगे...!" पिंकी ने दोहराया....

"एक कप चाय में तुम्हारा दूध ख़तम हो जाएगा क्या?" मानव खिसिया कर हँसने लगा....

पता नही मानव ने क्या सोच कर कहा और पिंकी ने क्या समझा.. पर मुझे तो जवान होने के बाद से ही 'दूध' का एक ही मतलब पता था.. मेरी चूचियो में झंझनाहट सी मच गयी...

पिंकी थोड़ी देर असमन्झस में वहीं खड़ी रही और फिर अपनी नज़रें नीची किए बाइक की और चल पड़ी... मज़ा आ गया!

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"अच्च्छा.. मैं चलता हूँ...!" मानव ने आनमने मंन से घर के अंदर झाँकते हुए कहा..

"नही सर... अब आ ही गये हैं तो चाय पीकर जाइए ना... 'वो' आपको कुच्छ बताना भी है..."घर पहुँचने के बाद पिंकी की आवाज़ में आत्मविश्वास सा आ गया था.....

शायद मानव को तो कहने भर की देर थी.. बाइक तो उसने पहले ही बंद कर रखी थी.. पिंकी के बोलते ही उसने वहीं स्टॅंड लगाया और हल्का हल्का मुस्कुराता हुआ घर के अंदर चला आया... नीचे कोई नही था...

"मम्मी..." पिंकी ने सीढ़ियों की तरफ मुँह करके ज़ोर से आवाज़ लगाई....

"मम्मी पापा नही हैं.. शहर गये हैं... पेपर कैसा हुआ...?" उपर से नीचे आती मीनू की मधुर आवाज़ हमारे कानो में गूँजी... पिंकी ने कोई जवाब नही दिया.. और सीढ़ियों में खड़ी खड़ी मीनू को नीचे उतरते देखती रही...

"वो 'लंबू' आया था क्या स्कूल में.. इन्न्णस्पेक्टोररर्र मानव!" मीनू पर जाने कौनसी मस्ती चढ़ि थी.. 'इनस्पेक्टर' इस तरह बोला जैसे 'ट्रॅक्टर' बोल रही हो... पिंकी की सिट्टी पिटी गुम हो गयी.. उसके मुँह से तो आवाज़ ही ना निकली... और जैसे ही मीनू सीढ़ियों से उतर कर नीचे आई.. उसकी तो हालत ही पतली हो गयी..,"वववू.. ववो.." मीनू ने हकलाते हुए कुच्छ कहने की कोशिश की और बचने का सबसे आसान तरीका उसको 'वापस' उपर भागना लगा...

पर वो जैसे ही तेज़ी से पलटी... मानव ने उसको टोक दिया...,"आ.. सुनो!"

मीनू के कदम वहीं ठिठक गये... अभी अभी नाहकार आई मीनू 'बला' की हसीन कयामत लग रही थी... 'वो' अपने गीले बालों को तौलिए में लपेटे आई थी.. जो अब खिसक कर उसके कंधे पर आ गिरा था... और पानी की बूंदे 'टपक' कर उसके मादक कुल्हों को यहाँ वहाँ से पारदर्शी करती जा रही थी...हल्क सलेटी रंग के 'लोवर' के अंदर उसके मादक कसाव और मस्त गोलाई लिए हुए 'नितंबों' को क़ैद किए हुए उसकी 'पॅंटी' के किनारे बाहर से ही सॉफ नज़र आ रहे थे... अलग से ही दिख रहे उसके कहर धाते नितंबों के बीचों बीच गहरी होती 'खाई' का कटाव थोड़ी डोर जाकर 'अंधेरे' में गुम हो रहा था.... मैने चोर नज़रों से मानव की ओर देखा.. उसकी नज़रें भी वहीं जमी हुई थी...

"ज...जी सर...!" मीनू के पलटते ही उसके 'लब' थिरक उठे... मुझे मीनू उस दिन से पहले कभी इतनी खूबसूरत नही लगी थी... या फिर शायद आज मैं उसको 'मानव' की नज़रों से पढ़ने की कोशिश कर रही थी... बहुत दीनो बाद आज पहली बार मीनू मुझे 'टॉप' में नज़र आई थी... उसकी मद भरी गोल गोल चूचियो से लेकर उसके कमसिन पेट तक 'टॉप' उसके बदन से चिपका हुआ था...उसकी मांसल जांघों के बीच तिकोने आकर में उसका 'योनि' प्रदेश और नीचे की तरफ 'भगवान' की अनुपम कृति...; अबला 'नारी' को मिला ताकतवर 'मानव' को अपनी उंगलियों पर नचाने का 'पासपोर्ट' ; 'उस' लंबवत 'काम चीरे' का हल्का सा अहसास उसके लोवर के बाहर से ही हो रहा था....

काफ़ी देर तक मंत्रमुग्ध सा 'मानव' अधीर होकर मीनू को देखता ही रहा.. पिंकी भी मीनू के पिछे खड़ी इस तमाशे को समझने की कोशिश कर रही थी.... कम से कम 'डरी हुई' तो मीनू को कह ही नही सकते थे... पिंकी शायद ये समझ नही पा रही थी कि 'वो' शरमाई हुई सी क्यूँ है...

मीनू एक बार फिर से थोड़ी तिर्छि होकर बुदबुदाई..," ज्जई...."

"ववो.. इस... इन्न्णस्पेकओर्रर्ररर मानव उर्फ लंबू का एक प्याला चाय पीने का मंन कर रहा है..." बोलते हुए मानव ने ज्यों की त्यों मीनू की नकल उतारी....

"ज्ज.. ज्जई.. नही.. ववो.. मतलब.. मैं....... लाती हूँ....!" बुरी तरह झेंप कर मीनू के बदन में उपर से नीचे तक कंपन सा चालू हो गया था... उसके मदमस्त अंगों में अचानक ही थिरकन पैदा हो गयी थी....

"म्‍मैई लाती हूँ दीदी... " पिंकी ने कहा और मीनू का जवाब सुने बगैर ही उपर भाग गयी... मीनू कंपकँपति आवाज़ में बोलती रह गयी.. ,"सुन तो....!"

"बैठो तो सही यार..!" मानव ने मुस्कुराते हुए कहा...

"ज्जई.." मीनू ने बहूदे तरीके से तौलिया अपनी छातियो पर डाला और मेरे पिछे छिप कर बैठ गयी.. उसके गोरे गालों की रंगत गुलाबी हो चुकी थी....

"मुझे पता नही था तुम मेरे पिछे से मुझे 'इतनी' इज़्ज़त देती हो.. 'लंबू'.. वाह.. क्या नाम दिया है...!" मानव ने हंसते हुए कहा...

"ज्जई.. नही.. ववो तो मैं.. यूँही बोल गयी थी.." मीनू ने मिमियाते हुए इतनी धीरे बोला की शायद ही मानव को उसका जवाब सुना होगा...

"अब मेरा कुसूर भी बता दो.. यूँ नाराज़ होकर छिप कर क्यूँ बैठ गयी हो..!" मानव की आवाज़ में उल्लास था.. कामना थी.. शरारत थी!

मैं मानव का मतलब समझ कर वहाँ से उठने लगी तो मीनू ने मुझे कसकर पकड़ लिया..,"नही.." मीनू की आवाज़ भी उसके काँपते हाथों की तरह लरज रही थी...,"मैं अभी आई.." मीनू ने हड़बड़ाहट में कहा और उपर भाग गयी...

"बड़ी प्यारी है.. है ना!" मानव ने उसके जाने पर कहा तो मैने अचकचा कर उसकी तरफ देखा... ज़ालिम ने मुझ पर तो एक बार भी ध्यान नही धारा..,"आ.. सीसी..कौन.. म्मीनू..? हहान...!" मैं हड़बड़ाहट से बोली और अपनी उंगलियाँ मटकाने लगी...

तभी पिंकी चाय और नमकीन लेकर आ गयी.. आकर मेरे पास खड़ी हुई और झुक कर मेरे कान में बोली..," वो.. स्टूल रख इनके आगे...!"

मैं चारपाई से खड़ी हुई और स्टूल सरका कर मानव के आगे रख दिया.. पिंकी ने चाय और नमकीन उस पर रख दी और मेरे पास आकर बैठ गयी... थोड़ी देर बाद ही मीनू भी नीचे आ गयी.. एक अलग ही पहनावे में.. सलवार कमीज़ थी.. पर 'वो' भी उसने छांट कर ही पहनी लगती थी.. मैने उसको उस दिन से पहले 'वो' सूट डाले नही देखा था.. शायद नया सिलवाया होगा... चुननी से अपनी छातियो अच्छि तरह ढके मीनू नज़रें झुकाए हमारे पास आकर बैठ गयी...

मानव लगातार टकटकी बाँधे मीनू को देख कर मुस्कुरा रहा था.. मैने मीनू के चेहरे की ओर देखा.. अब भी लज्जा से 'लाल' चेहरा रह रह कर तिर्छि नज़रों से मानव की ओर देखने की कोशिश करता और उसको अपनी ही और देखता पाकर वापस झुक जाता... हर बार मीनू थोड़ी सी पिछे भी सरक जाती...

"ववो.. आपको एक और बात बतानी थी सर...!" मुझसे दोनो की आँखों ही आँखों में मजबूत होती जा रही 'प्रेम-डोर' रास ना आई और मैं बोल पड़ी....

"क्या? बोलो!" मानव ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा....

मैं कुच्छ सोच कर बोलती.. इस'से पहले ही मीनू ने बोलना शुरू कर दिया..,"ववो..सर्र..."

बोलती हुई मीनू को मानव ने फिर टोक दिया...,"नही.. लंबू भी अच्च्छा लगता है..!"

उसके बाद तो मीनू बोल ही नही पाई... और मुझे ही बोलना पड़ा..," सोनू का मोबाइल गाँव के एक लड़के के पास है सर..!"

"ढोलू के पास है ना!" मानव का जवाब सुनकर मैं स्तब्ध रह गयी..,"आ.. आपको कैसे पता?"

"और नही तो डिपार्टमेंट क्या हमें घास चराने के पैसे देता है....!" मानव ने अजीब से लहजे में कहा.. पर आगे कुच्छ बोला नही...

"कहीं.. सोनू को उसी ने ना...." मैं मानव को आगे ना बोलते देख कर बोली.. पर उसने मुझे बीच में ही टोक दिया...,"जाँच चल रही है... अभी कुच्छ कहना मुश्किल है.... वैसे... ढोलू भी कल से ही घर से गायब है.. पोलीस आई थी रात को उसको लेने.. पर वह पहले ही गायब हो गया था.. शायद किसी तरह से उसको भनक लग गयी थी....!"

"ओह्ह.. अच्च्छा सर!" मैने भगवान का शुक्रा मनाया मैं कल रात उसके घर नही थी..,"पर... आपको कैसे पता चला ये सब...?"

"और कोई खास बात हो तो बताओ!" मानव ने मेरी बात पर ध्यान नही दिया... मैं मन मसोस कर रह गयी.....," नही.. औ तो कुच्छ नही है...." मैने कहा....

"ठीक है.. अभी चलता हूँ..." मानव ने खड़ा होकर मीनू की ओर देखा...

मीनू चुपचाप खड़ी हो गयी.. जैसे ही मानव दरवाजे तक पहुँचा.. मीनू शरमाते हुए बोली..," सॉरी!"

"ठीक है.. शुक्र है सॉरी तो बोला..." मानव ने मुस्कुरकर कहा और बाहर निकल गया.....

मानव के जाते ही मीनू पिंकी पर पिल पड़ी... पिंकी को चारपाई पर गिराया और तकिये से उसको 'धुन'ना शुरू कर दिया....

"क्यूँ मार रही हो दीदी.... मैने क्या किया है...?" पिंकी हंसते हुए बोली....

मीनू जब हटी तो बुरी तरह हाँफ रही थी... उसके गालों की रंगत अब भी गुलाबी थी और चूचिया तेज़ी से उठ बैठ रही थी...,"मैने क्या किया है..." मीनू उसकी नकल उतार कर बोली..,"बता नही सकती थी कि नीचे मानव आया है....!"

पिंकी ज़ोर ज़ोर से हँसने लगी...,"मानव नही दीदी.. लंबू इन्न्णस्पेक्टोररर्र.. बोलो... हे हे हे...."

"बोलूँगी.. तुझे क्या है... लंबू लंबू लंबू..." मीनू ने कहा और फिर बिना किसी के कुच्छ कहे ही शर्मा कर कंबल में घुस गयी.....

क्रमशः...............

Gtaank se aage...................

" Haanji.. Bukhar kaise ho gaya Pinky? Exam tumhare waise chal rahe hain.. dhyan rakha kar na sehat ka...!" Harry Pinky ki aankhon mein dekh mand mand muskaan fainkta hua bola... aur do dibbe utar kar unmein se goliyan dhoondhne laga...

"wwo.. bus aise hi...!" Pinky ne apni baat adhoori chhodi aur mere chehre ki aur dekhne lagi.. main kya bolti?

"Ye lo.. abhi ke liye toh ye 3 khurak de raha hoon... Kal dopahar tak aaram na lage toh paper ke baad doctor ko jaroor dikha lena...!" Ek pudiya mein dawayi baandh kar deta hua 'wo' bola....

Pinky ne chupchap dawayi hath mein pakadi aur meri kokh mein kohni maar kar mujhe bolne ka ishara kiya... Par pata nahi kyun.. main uske shaleen vyavhaar ko dekh kar itni dab gayi ki meri juban hi na nikli.... Gaanv ka doctor toh ek no. ka harami tha... Usne mere sath uss'se kuchh din pahle hi ilaaj ke bahane bahut hi kamuk harkat ki thi... Main soch rahi thi ki ye bhi kuchh na kuchh toh jaroor aisa karega... Aakhir jab buddhe doctor hi ilaaj ke bahane hath saaf kar lete hain toh 'wo' toh gabru jawaan tha.... par na.. Usne toh 2 minute se pahle hi goliyan Pinky ke hath mein pakadayi aur table ke iss taraf aa gaya....

"Kya baat hai?" Uske khud darwaje ke paas jane par bhi hum andar hi khade rahe toh usne hamari taraf achraj se dekha aur wapas aa gaya....," Bolo?"

"kkkuchh nahi... wwo... yye.. tu bol de na!" Haklati huyi Pinky achanak roni soorat bana kar meri taraf dekhne lagi....

"Aisi kya baat hai yaar..?" Harry man hi man hansta sa hua wapas table ke uss paar chala gaya..,"OK... baitho..!"

Maine Pinky ki taraf ek baar dekha aur Harry ke saamne table ke dusri taraf wali chair par baith gayi.. majbooran Pinky ko bhi baithna pada.....

"Kuchh bologi ya mujhe khud hi andaja lagana padega...!" Harry ne hanste huye kaha.. wo achanak kuchh jyada hi khush najar aane laga tha....

"Wwo...." Pinki baar baar koshish karke apni juban ko shabd dene ka prayas kar rahi thi... par main uski halat samajh sakti thi.. jab mere munh se hi kuchh nahi nikal raha tha toh 'wo' bechari kaise bolti...

"Bol bhi do ab.. tum aise baithi rahogi toh mujhe heart attack aa jayega.. sach bol raha hoon.. tumhe nahi pata mera dimag kahan kahan ghoom raha hai...." Harry iss baar nervous hokar bola....

"Wwo..." Pinky kafi der se table ke kinaron ko apne naakhoono se khurache ki koshish kar rahi thi..,"aayi... aayi pill....."

"Pinkiiieeeeee?" Harry ke chehre se muskaan yun gayi jaise gadhe ke sir se seeng... Uske chehre ka rang yun badal gaya jaise 'i Pill' 'i Pill' na hokar koyi atom bomb ho...," kuchh der jadvat sa uske chehre ko ghoorta hua Harry bola," yye kya kah rahi ho Pinky....?"

"na hi Pinky kuchh boli aur na hi main... mujhse toh apna sir hi nahi uthaya ja raha tha jab tak ki achanak Harry ne fafak kar jane kya kahani banani shuru kar di...

"Tumhe pata hai Pinky...." Harry ka chehra aisa bana hua tha jaise ab roya aur ab roya.... Apni kahi har line ke baad 'wo' gahre dukh mein doobi huyi labi saans le raha tha... kabhi kabhi beech mein bhi... Main uske chehre ki taraf dekhne lagi thi.. par Pinky ka sir ab bhi jhuka hua tha... Harry ki aankhein pata nahi kyun nam hoti ja rahi thi..," Ek ladki thi... bahut pyari... Jab bhi usko dekhta... jitni baar bhi dekha... mujhe uska chehra apna sa lagta tha.... Uski muskaan se bhi mujhe utna hi pyar tha.. jitna uske gusse se.... usko dekh kar aisa lagta tha jaise..... rang birange chehron se saji iss duniya mein 'wo' ek alag hi chehra hai... Ek nanhi kali jaisa nadan.... ek phool jaisi masoom... aur.. aur ek bachche ki tarah shaitan.. Par.. uski nadani mein; uski masoomiyat mein.. aur.. uski shaitaaniyon mein.. jane kya baat thi ki jitni baar bhi usko dekhta.. Jitni baar bhi uske baare mein sunta... uske liye mera pyar badhta hi jata.... par kabhi tareeke se bol nahi paya.. kyunki..... kyunki mujhe darr lagta tha..... darr lagta tha ki agar 'jawaab' mein inkaar mila toh kya hoga!.... Mere dost.. hamesha mujhe kahte the.. ki mujhe apne dil ki baat dil mein nahi rakhni chahiye... bol deni chahiye... gulabo ko.. kahin aisa na ho ki fir der ho jaye.... Par mujhe vishvas tha.. apne pyar par... apne sachche pyar par... Mujhe vishvas tha.. ki 'wo' itni bhi nadan nahi ho sakti ki samay se pahle hi raaste se bhatak jaye... Samay se pahle hi....." Achanak Harry chup ho gaya aur usne apni aankhein band kar li.. Aankhein band hote hi unmein se 2 aansoo nikal kar aaye aur uske gaalon par thahar gaye.... Main hairani se uski aur dekh rahi thi... meri samajh mein maajra aa hi nahi raha tha...

Achanak Pinky apni chir parichit painy aawaj mein boli," Maine kya kiya hai...?"

Uske bolte hi Harry ne aankhein khol di.. Uski aankhein hulki hulki laal ho gayi thi.. bola toh aisa laga ki khoon ka ghoont bharkar bola ho," Na! tumne kahan kuchh kiya hai Pinky... aaj kal toh sab jagah aisa hota hai... tumne kahan galat kiya... galat toh main tha.. galat toh mere vichar the.. tumhare baare mein!"

"Ye... ye kya bol rahe ho tum..." Pinky uttejit hokar khadi ho gayi..," Toh tum mere baare mein bol rahe the... ye sab... Maine kuchh nahi kiya sun lo.. 'wo toh mujhe.... 'wo' toh kisi ne mangwayi thi.. deni hai toh de do.. warna apna kaam karo.. !"

"Kyaaaa? toh kya sach mein tumne... matlab..." Harry ki aankhon mein fir se wahi chamak lout aayi.. haan.. thoda sharminda sa jaroor lag raha tha..... Bolte huye harry ko Pinky ne beech mein hi tok diya," Mm..main tumhara 'sir' fod doongi haan!" Gusse se Pinky ne kaha aur jane uske dimag mein kya aaya.. wah hansne lagi....

"Sorry... Ek minute... " Harry ne bag mein se ek bada sa patta nikala aur usmein se ek chhoti si goli nikal kar de di..,"Ye lo..... Sorry.. main bus yunhi soch gaya tha...."

"Chal Anju.." Pinky ne jaise uske hath se goli jhatak li ho..," Mere baare mein aisa sochta hai..." Pinky badbadayi aur mera hath pakad kar bahar nikal aayi...

"Pinky... humne usko paise toh diye hi nahi....." Meri khushi ka koyi thikana nahi tha.. meri chinta door jo ho gayi thi.....

"Haan.. paise doongi usko... agar tera kaam na hota toh mein 'ye' goli usi ko khila kar aati haan!" Pinky gusse se dhadhakti huyi boli...

"Arey... ismein uski kya galati hai... tum aisi cheej bina baat saaf kiye maangogi toh koyi bhi ye baat soch lega...." Maine usko samjhane ki koshish ki....

"Woh baat nahi hai yaar!" Pinky ka mood ukhda hua tha....

"Toh.. aur kya kah diya usne...?" Main asamanjhas mein pad gayi....

"achchha.. tune suna nahi kya? kya Premleela chhed ke baith gaya tha apni...." Pinky meri taraf dekh kar tarare se boli....

"Ohho.. fir usne tujhe toh kuchh nahi kaha na...."

"Tujhe nahi pata... 'wo' sari bakwas mere baare mein hi kar raha tha... Usne pahle bhi mujhe ek do baar gulabo kaha hai... maine mana kar diya tha ki mera naam na bigaade.... !" Pinky boli....

"Par... tu uss'se ladayi karke aa gayi... usne kisi ko bol diya toh...?" Main aashanka se boli....

"Nahi bolega wo!" Pinky ne aatmvishvas se kaha.....

"Kyun? tujhe kaise pata....?"

"Itna bhi bura nahi hai... he he he..." Pinky hansne lagi.....

"Tu usko itna kaise jaanti hai?" Maine hairat se poochha.. Pinky shartiya tour par unn ladkiyon mein se nahi thi jo har jane anjane ladke ka record lekar ghoomti ho.. Harish ke baare mein toh mujhe bhi sirf itna hi pata tha ki 'wo' achchhe khase ghar ka ladka tha.. aur kareeb 3 saal se hamare gaanv mein kiraye par rah raha tha.. Apne dawayiyon ke 'kaam' ke alawa samaj sewa mein uski kafi ruchi thi, isiliye jald hi usko gaanv aur bahar ke bahut se log jaan'ne lage the....

"Kya? main 'itna' kya jaanti hoon...?" Pinky ne chalte chalte poochha...

"aa..aan.. mera matlab tujhe kaise itna vishvas hai ki 'wo' kisi ko kuchh nahi batayega....?" Mera sawaal fizool nahi tha...

"Chhod.. ghar aa gaya hai.. baad mein baat karenge... le.. ye goli kha le abhi... uski bakwas Meenu ko mat batana...." Pinky ne ghar mein ghusne se theek pahle apne hath mein sambhal kar rakhi huyi goli mujhe pakda di......

Main jaldi se ghar jakar kha peekar wapas Pinky ke ghar aa gayi aur hum dono agle din ke paper ki taiyari karne lage......

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Bhagwan aur 'Sandeep' ki daya se mera choutha 'paper' bhi achchha ho gaya.. Halanki usne mujhse koyi baat nahi ki thi.. par maine aadhe time ke baad mouka dekh kar khud hi adhikaar poorvak apni answer sheet uski aur sarka kar uski sheet lagbhag chheen hi li... usne koyi pratikriya nahi di aur utni hi speed se meri sheet mein likhne laga.. jitni speed se 'wo' apna paper kheench raha tha....

Paper ke baad khushi khushi hum dono jaise hi examination room se bahar nikle.. Inspector Manav ko sadi vardi mein office ke bahar khada pakar main chounk gayi..,"aey.. Inspector!" Maine Pinky ke kaano mein fusfusaya....

"Kahan?" Usne jaise hi apni najrein uthakar charon aur ghumayi.. usko manav dikhayi de gaya...

"Kya karein...? Hum iske paas chalein ya nahi..?" Pinky ne asamanjhas mein khadi hokar meri rai lene ki sochi...

"Wo baat nahi batani kya? Dholu wali...!" Maine kaha hi tha ki tabhi Manav ki nazar hum par padi.. usne ishare se humko wahin rukne ko kah diya...

Kuchh der baad hi school khali ho gaya... mere mann mein pahle paper ke baad office mein huyi masti ki yaadein taza ho gayi... Uss din bhi main aur Pinky paper ke baad theek wahin khade the.. jahan aaj!

"Idhar aana ek baar..." Manav ne hamein bulaya aur fir office ke andar jhank kar bola,"Aao.. bahar aa jao!"

Hamare office ke darwaje tak pahunchte pahunchte Madam ke sath 'wo' Sir bhi khisiyaye huye se bahar nikal aaye... Hum dono ne aascharya se ek doosri ki aankhon mein dekha... '2 din se toh ye aa hi nahi rahe the... fir aaj kaise?'

Mere hath apne aap hi Sir aur madam ko namastey kahne ke liye uth gaye.. par Pinky ne sirf Manav ko namastey ki.. 'Sir' kah kar....

"Hummm... Mathur sahab... Ab bolo!" Manav ne 'sir' ko ghoor kar dekha....

"Arrey yaar.. jo baat thi.. main bata chuka hoon.. aap kyun khamkha iss maamle ko kheench rahe ho... main koyi gair thode hi hoon.. aapke shahar ka hi rahne wala hoon... Sham ko baat karte hain na sath baith kar.... 'kothi' par aa jana..." Sir ne taalte huye kaha....

"Kyun? kothi par kya hai? yahan kyun nahi....!" Manav ne kutil muskaan uski aur uchhali... hum dono chupchap unki baatein sunte rahe....

"Arrey inspector bhai sahab.. common sense hai.. yahan main aapki 'wo' sewa thode hi kar sakta hoon jo mere apne ghar par ho jayegi.. chhodo bhi ab.. jaane do ladkiyon ko...!" Sir ne Manav ke kandhe par thapki lagakar kaha...

"Tumhare faayde ke liye hi bol raha hoon.... tum mujhe yahin sab kuchh bata do toh achchha rahega.... 'warna' Sham ko thaane mein tumhe 'wo' ijjat nahi milegi jo yahan de raha hoon.. samajh rahe ho na baat ko....!" Manav ne gurrate huye kaha...

"Dekho inspector.. mujhe iss bare mein kuchh nahi pata.. mujhe jo bolna tha main bol chuka hoon...." Sir bhi Manav ki tone dekh kar khij se gaye....

Manav ne turant meri aur dekha..,"Haan Anjali.. Kya bataya tha madam ne tumhe.. agle din...?"

Maine sakpaka kar madam ki aur dekha aur apna sir jhuka liya...," Jji.. Sir.. Madam ne bataya tha ki hamare jane ke baad Tarun aur 'Sonu' dono yahan aaye the.... Unhone Sir se akele mein kuchh baat ki thi... Madam kah rahi thi ki Sir mein aur unn dono mein 'uss' din wali baat ko lekar kuchh samjhouta hua tha...!"

"Aur usi din Tarun ko maar diya gaya.. Sonu gayab ho gaya.. hai na...?" Manav ne confirm kiya....

Maine sir jhukaye huye hi 'haan' mein hila diya... Tabhi mujhe 'Sir' ki aawaj sunayi dene lagi..,"kya yaar.. tum 'iss' randi ki baat par bharosa karoge.. sali kutiya.. teen baar toh 'D.E.O. ban'ne ke chakkar mein meri kothi par 'raat' bita chuki hai.. M.P. Sahab ke sath... aur ye dono... inko bhi kam mat samajhna.." Maine najrein utha kar 'Sir' ko dekha.. wo hamari aur dekh kar baaton ko chaba chaba kar bol raha tha...," Ye dono bhi poore maje se........."

Sir ki baat poori nahi ho payi.. Manav ka ek jhannatedaar thappad 'Sir' ke gaal par pada aur uska sir deewar se ja takraya...

Sir ladkhadaya aur fir seedha khada hokar apne gaal ko sahlane laga.. Uske sanwli soorat par bhi 'teen' ungaliyon ke nishan saaf dikhayi de rahe the.. jaise wahan khoon ikattha ho gaya ho..," Tum mujhe jaante ho inspector.. fir bhi..." Sir ki baayin aankh 'laal' ho gayi thi..

"Abhi kahan... abhi toh mujhe bahut kuchh jaan'na hai... Sham ko chalkar 'thane' aa jana.. warna... 'ye' sirf trailor tha...." Manav gurra raha tha....

"Dekho inspector sahab!.. main bata raha hoon... 'wo' inko chhod kar wapas aaye the... Unhone mujhse 'ye' kaha tha ki '2' aur ladkiyon ka aise hi paper karwana hai... aur 'ek' din 'isko.." Usne Pinky ki aur ishara karte huye kaha," isko paper time ke baad rok kar rakhna hai.... kaise bhi karke... usne kaha tha ki 'wo' do ladkon ko aur sath lekar aayenge.. aur iska balat...." Kahkar Sir apne gaal ko sahlane lage...

Manav ne ek gahri saans li..," aur.....?"

"Aur.. unhone mujhse 1 lakh rupaiye maange the.. Mobile clip dikha kar 'wo' mujhe blackmail karna chah rahe the...." Sir ne ugal diya....

"Ohh.. isiliye tumne Tarun ko marwa diya... aur shayad Sonu ko bhi...!" Manav tamtamaya hua tha....

"Nahi inspector... Mujhe iss baat ke baare mein kuchh nahi pata... Main toh unko 1 lakh rupaiye de hi deta... Mere liye ek lakh rupaiya koyi badi baat nahi hai..."

"Sham ko thane aa jana..." Manav ne kaha aur hamari aur ghoom gaya..," Tum jao ab..."

Main kuchh bolne hi wali thi ki Pinky ne mera hath pakad kar kheench liya... School ke main gate par jate hi main boli," Wo dholu wali baat bhi toh batani hai...!"

"Nahi chhod... Meenu fone par hi bata degi.. mujhe toh iss'se darr lag raha hai... kitna kheench ke diya usko..." Pinky hansne lagi....

"toh.. hamein thode hi kuchh kahenge...!" Main boli...

"Kya pata... uss din 'school' wali baat poochhne lage toh...?" Pinky ne mujhe 'bechari' si najron se dekha... Tabhi Manav ne hamare paas aakar apni bike rok di..," Yahan kyun khadi ho...?"

Hum dono sakpaka gaye.. tabhi mere munh se achanak nikal gaya..," Humein... humein akele jate huye darr lag raha hai....!"

Manav hansne laga..," aao.. baitho.. main chhod deta hoon..."

Maine Pinky ki aur ghabrakar dekha.. uska pata nahi tha baad mein kya ka kya bolne lag jaye.. Pinky ne hatasha mein mujhe baithne ka ishara kiya... Hum dono Manav ke pichhe baithe aur gaanv ki taraf chal pade......

Jaise hi Manav ne Gaanv ke stand par bike roki.. Pinky fatak se utar gayi.. Sach kahoon toh mera utarne ka man nahi kar raha tha.. Uski fouladi peeth se sati meri ek chhati mujhe 'kal' wala rang biranga ahsaas kara rahi thi.... Sari raat dukhti rahi meri yoni ab ek baar fir machalne lagi thi.. Uska dard kum hote hi virah vedna se wo ek baar fir tadap uthi thi... Ek baar mein hi usko 'moosal' ki lat lag gayi thi shayad... ab gujara hona mushkil tha...

Mujhe dukhi man se utarte dekh kar Manav ne poochh liya..," Ghar yahan se jyada door hai kya?"

"Nahi.. hum chale jayenge...!" Pinky tapak se boli... toh main kuchh bol na saki... aur uske sath chal padi...

"ek minute...!" Manav ki aawaj aate hi hum ghoom gaye..

"aaa... wo ghar par koun koun hain...?" Manav ne apne mathe ko khujate huye apni aankhon ki hichkichahat ko chhipa liya...

"Pata nahi.. Sabhi honge!" Pinky dheere se boli....

"Main ghar hi chhod aata hoon.. aao baitho.." Manav ke kahte hi main bike ki aur wapas chal padi....

"Nahi.. Ssir.. hum chale jayenge...!" Pinky ne dohraya....

"Ek cup chay mein tumhara doodh khatam ho jayega kya?" Manav khisiya kar hansne laga....

Pata nahi Manav ne kya soch kar kaha aur Pinky ne kya samjha.. par mujhe toh jawan hone ke baad se hi 'doodh' ka ek hi matlab pata tha.. Meri chhatiyon mein jhanjhanahat si mach gayi...

Pinky thodi der asamanjhas mein wahin khadi rahi aur fir apni najrein neechi kiye bike ki aur chal padi... Maza aa gaya!

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"Achchha.. main chalta hoon...!" Manav ne anmane mann se ghar ke andar jhankte huye kaha..

"Nahi Sir... ab aa hi gaye hain toh chay peekar jaayiye na... 'wo' aapko kuchh batana bhi hai..."Ghar Pahunchne ke baad Pinky ki aawaj mein aatmvishvas sa aa gaya tha.....

Shayad Manav ko toh kahne bhar ki der thi.. bike toh usne pahle hi band kar rakhi thi.. Pinky ke bolte hi usne wahin stand lagaya aur hulka hulka muskurata hua ghar ke andar chala aaya... Neeche koyi nahi tha...

"Mummy..." Pinky ne seedhiyon ki taraf munh karke jor se aawaj lagayi....

"Mummy papa nahi hain.. Shahar gaye hain... paper kaisa hua...?" Upar se Neeche aati Meenu ki madhur aawaj hamare kaano mein goonji... Pinky ne koyi jawab nahi diya.. aur Seedhiyon mein khadi khadi Meenu ko neeche utarte dekhti rahi...

"Wo 'lambu' aaya tha kya school mein.. Innnspectorrrr Manav!" Meenu par jane kounsi masti chadhi thi.. 'Inspector' iss tarah bola jaise 'tractor' bol rahi ho... Pinky ki sitti pitti gum ho gayi.. uske munh se toh aawaj hi na nikli... aur jaise hi Meenu seedhiyon se utar kar neeche aayi.. Uski toh halat hi patli ho gayi..,"wwwoo.. wwo.." Meenu ne haklate huye kuchh kahne ki koshish ki aur bachne ka sabse aasan tareeka usko 'wapas' upar bhagna laga...

Par wo jaise hi tezi se palti... Manav ne usko tok diya...,"aa.. Suno!"

Meenu ke kadam wahin thithak gaye... Abhi abhi nahakar aayi Meenu 'bala' ki haseen kayamat lag rahi thi... 'Wo' apne geele baalon ko touliye mein lapete aayi thi.. jo ab khisak kar uske kandhe par aa gira tha... Aur pani ki boonde 'tapak' kar uske madak kulhon ko yahan wahan se paardarshi karti ja rahi thi...Hulke saleti rang ke 'lower' ke andar uske madak kasav aur mast golayi liye huye 'nitambon' ko kaid kiye huye uski 'panty' ke kinare bahar se hi saaf nazar aa rahe the... Alag se hi dikh rahe uske kahar dhate nitambon ke beechon beech gahri hoti 'khayi' ka kataav thodi door jakar 'andhere' mein gum ho raha tha.... Maine chor najron se Manav ki aur dekha.. uski najrein bhi wahin jami huyi thi...

"j...ji sir...!" Meenu ke palate hi uske 'lab' thirak uthe... Mujhe Meenu uss din se pahle kabhi itni khoobsoorat nahi lagi thi... ya fir shayad aaj main usko 'manav' ki najron se padhne ki koshish kar rahi thi... Bahut dino baad aaj pahli baar Meenu mujhe 'top' mein najar aayi thi... Uski mad bhari gol gol chhatiyon se lekar uske kamsin pate tak 'top' uske badan se chipka hua tha...uski maansal jaanghon ke beech tikone aakar mein uska 'yoni' pradesh aur neeche ki taraf 'bhagwan' ki anupam kriti...; abla 'nari' ko mila takatwar 'manav' ko apni ungaliyon par nachane ka 'paasport' ; 'uss' lambwat 'kaam cheere' ka hulka sa ahsaas uske lower ke bahar se hi ho raha tha....

Kafi der tak mantramugdh sa 'Manav' adheer hokar Meenu ko dekhta hi raha.. Pinky bhi Meenu ke pichhe khadi iss tamashe ko samajhne ki koshish kar rahi thi.... Kum se kum 'dari huyi' toh Meenu ko kah hi nahi sakte the... Pinky shayad ye samajh nahi pa rahi thi ki 'wo' sharmayi huyi si kyun hai...

Meenu ek baar fir se thodi tirchhi hokar budbudayi..," jji...."

"wwo.. Iss... Innnspecorrrrrr Manav urf Lambu ka ek pyala chay peene ka mann kar raha hai..." Bolte huye Manav ne jyon ki tyon Meenu ki nakal utaari....

"jj.. jji.. nahi.. wwo.. matlab.. main....... lati hoon....!" Buri tarah jhenp kar Meenu ke badan mein upar se neeche tak kampan sa chalu ho gaya tha... Uske madmast angon mein achanak hi thirkan paida ho gayi thi....

"Mmain lati hoon didi... " Pinky ne kaha aur Meenu ka jawab sune bagair hi upar bhag gayi... Meenu kampkampati aawaj mein bolti rah gayi.. ,"Sun toh....!"

"Baitho toh sahi yaar..!" Manav ne muskurate huye kaha...

"Jji.." Meenu ne behude tareeke se touliya apni chhatiyon par dala aur mere pichhe chhip kar baith gayi.. Uske gore gaalon ki rangat gulabi ho chuki thi....

"Mujhe pata nahi tha tum mere pichhe se mujhe 'itni' ijjat deti ho.. 'lambu'.. wah.. kya naam diya hai...!" Manav ne hanste huye kaha...

"Jji.. nahi.. wwo toh main.. yunhi bol gayi thi.." Meenu ne mimiyate huye itni dheere bola ki shayad hi Manav ko uska jawaab suna hoga...

"AB mera kusoor bhi bata do.. yun naraj hokar chhip kar kyun baith gayi ho..!" Manav ki aawaj mein ullaas tha.. kaamna thi.. shararat thi!

Main Manav ka prayay samajh kar wahan se uthne lagi toh Meenu ne mujhe kaskar pakad liya..,"nahi.." Meenu ki aawaj bhi uske kaanpte haathon ki tarah laraj rahi thi...,"Main abhi aayi.." Meenu ne hadbadahat mein kaha aur upar bhag gayi...

"Badi pyari hai.. hai na!" Manav ne uske jaane par kaha toh maine achkacha kar uski taraf dekha... Zalim ne mujh par toh ek baar bhi dhyan nahi dhara..,"aa.. kk..koun.. Mmeenu..? hhaan...!" Main hadbadahat se boli aur apni ungaliyan matkane lagi...

Tabhi Pinky chay aur namkeen lekar aa gayi.. Aakar mere paas khadi huyi aur jhuk kar mere kaan mein boli..," Wo.. stool rakha inke aage...!"

Main charpayi se khadi huyi aur Stool sarka kar Manav ke aage rakh diya.. Pinky ne chay aur namkeen uss par rakh di aur mere paas aakar baith gayi... Thodi der baad hi Meenu bhi neeche aa gayi.. ek alag hi pahnawe mein.. Salwar kameej thi.. par 'wo' bhi usne chhant kar hi pahni lagti thi.. maine usko uss din se pahle 'wo' suit daale nahi dekha tha.. shayad naya silwaya hoga... Chunni se apni chhatiyan achchhi tarah dhake Meenu najrein jhukaye hamare paas aakar baith gayi...

Manav lagataar taktaki baandhe Meenu ko dekh kar muskura raha tha.. Maine Meenu ke chehre ki aur dekha.. ab bhi lajja se 'laal' chehra rah rah kar tirchhi najron se Manav ki aur dekhne ki koshish karta aur usko apni hi aur dekhta pakar wapas jhuk jata... Har baar Meenu thodi si pichhe bhi sarak jati...

"Wwo.. Aapko ek aur baat batani thi Sir...!" Mujhse dono ki aankhon hi aankhon mein majboot hoti ja rahi 'premdor' raas na aayi aur main bol padi....

"Kya? Bolo!" Manav ne chay ki chuski lete huye kaha....

Main kuchh soch kar bolti.. iss'se pahle hi Meenu ne bolna shuru kar diya..,"wwo..Sirr..."

Bolti huyi Meenu ko Manav ne fir tok diya...,"Nahi.. Lambu bhi achchha lagta hai..!"

Uske baad toh Meenu bol hi nahi payi... Aur mujhe hi bolna pada..," Sonu ka mobile gaanv ke ek ladke ke paas hai Sir..!"

"Dholu ke paas hai na!" Manav ka jawab sunkar main stabdh rah gayi..,"aa.. aapko kaise pata?"

"Aur nahi toh department kya hamein ghas charane ke paise deta hai....!" Manav ne ajeeb se lahje mein kaha.. par aage kuchh bola nahi...

"Kahin.. Sonu ko usi ne na...." Main Manav ko aage na bolte dekh kar boli.. par Usne mujhe beech mein hi tok diya...,"Jaanch chal rahi hai... Abhi kuchh kahna mushkil hai.... Waise... Dholu bhi kal se hi ghar se gayab hai.. Police aayi thi raat ko usko lene.. par wah pahle hi gayab ho gaya tha.. shayad kisi tarah se usko bhanak lag gayi thi....!"

"Ohh.. achchha Sir!" Maine bhagwan ka shukra manaya main kal raat uske ghar nahi thi..,"Par... aapko kaise pata chala ye sab...?"

"Aur koyi khas baat ho toh batao!" Manav ne meri baat par dhyan nahi diya... Main man masos kar rah gayi.....," Nahi.. au toh kuchh nahi hai...." Maine kaha....

"theek hai.. abhi chalta hoon..." Manav ne khada hokar Meenu ki aur dekha...

Meenu chupchap khadi ho gayi.. jaise hi Manav darwaje tak pahuncha.. Meenu sharmate huye boli..," Sorry!"

"Theek hai.. shukra hai Sorry toh bola..." Manav ne muskurakar kaha aur bahar nikal gaya.....

Manav ke jate hi Meenu Pinky par pl padi... Pinky ko charpayi par giraya aur takiye se usko 'dhun'na shuru kar diya....

"Kyun maar rahi ho didi.... Maine kya kiya hai...?" Pinky hanste huye boli....

Meenu jab hati toh buri tarah haanf rahi thi... Uske gaalon ki rangat ab bhi gulabi thi aur chhatiyan tezi se uth baith rahi thi...,"Maine kya kiya hai..." Meenu uski nakal utaar kar boli..,"Bata nahi sakti thi ki neeche Manav aaya hai....!"

Pinky zor zor se hansne lagi...,"Manav nahi didi.. Lambu Innnspectorrrr.. bolo... he he he...."

"Boloongi.. tujhe kya hai... lambu lambu lambu..." Meenu ne kaha aur fir bina kisi ke kuchh kahe hi sharma kar kambal mein ghus gayi.....

kramshah...............