बाली उमर की प्यास compleet

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raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:39

बाली उमर की प्यास पार्ट--24

गतान्क से आगे................

जब तक चाचा चाची नही आ गये, पिंकी ने उसको चिदाना नही छ्चोड़ा.. कुच्छ देर बाद मैं भी पिंकी के साथ ही मीनू को बातों ही बातों में तंग करने लगी थी.. पर चाचा चाची के बाद हमें शांत हो जाना पड़ा.. मीनू के चेहरे से ऐसा लग रहा था जैसे मानव का नाम ले ले कर उसको तंग किया जाना उसको अच्च्छा लग रहा था.. चाचा चाची के आने पर उसका मूड ऑफ सा हो गया...

"पापा.. आज में अंजू के साथ इसके घर सो जाउ क्या?" पिंकी की इस बात से मुझे भी हैरानी हुई.. मेरे आगे उसने ऐसा कुच्छ जिकर किया नही था...

"क्यूँ? यहाँ क्या दिक्कत है बेटी..? अंजलि भी तो रोज़ यहीं सोती है..." पापा ने प्यार से पूचछा....

"ययए.. ये मीनू हमें पढ़ने नही देती यहाँ...!" पिंकी ने जाने ऐसा क्यूँ कहा...

"क्यूँ..?" मीनू तरारे से बोली...," मैं क्या सींग मारती हूँ तेरे पेट में... पापा! जब से आई है इसने किताब खोल कर नही देखी.. खंख़्वाह मेरा नाम ले रही है....!"

"पिनकययययी! तू बहुत शरारती होती जा रही है आज कल... चलो किताब खोल के पढ़ाई करो...!" चाचा ने कहा और उपर चले गये....

मीनू अब भी गुस्से से अपने कुल्हों पर हाथ रखे पिंकी की ओर देखे जा रही थी.. पिंकी ने शरारत से उसकी और जीभ निकल दी और फिर हँसने लगी.....

"देख लो मम्मी अब इसको!" मीनू तुनक कर बोली....

चाची ने मीनू के लहजे पर ध्यान नही दिया...," आजा बेटी.. उपर आजा.. थोड़ी देर काम में मदद कर दे.. बहुत थक गयी हूँ....!" चाची भी कहते कहते उपर चढ़ गयी...

"वापस आने के बाद बताती हूँ तुझे...!" मीनू ने बनावटी गुस्से से पिंकी की ओर उंगली की....

"लंबू.. लंबू.. लंबू... हे हे हे!" पिंकी ने उसको जाते जाते भी छेड़ ही दिया... फिर उसके जाते ही गंभीर सी होकर बोली...,"तूने गोली.. ले ली क्या अंजू?"

"हां.. 'वो' तो मैने आते ही ले ली थी..." मैने कहने के बाद उस'से पूचछा..," तू हमारे घर चलने के लिए क्यूँ कह रही थी....

पिंकी जवाब देते हुए कहीं खो सी गयी..," आ.. नही.. बस ऐसे ही....!"

"वो.. मुझे तो अभी भी डर लग रहा है कि हरीश किसी को बोल ना दे... तूने बताया भी नही कि तू उसको इतने अच्छे से कैसे जानती है...!" मैं जाकर उसकी चारपाई पर ही बैठ गयी...

"अर्रे.. अच्छे से नही जानती पागल... पर मुझे ये पता है कि 'वो' बुरा लड़का नही है... मुझे विश्वास है कि 'वो' किसी को नही बोलेगा....!"

"पर तुझे विश्वास कैसे है..? कुच्छ तो बता ना! मुझे सच में डर लग रहा है..." मैने कहा....

"तू किसी को बताएगी तो नही ना...!" पिंकी की आवाज़ धीमी हो गयी...

"नही.. मैं पागल हूँ क्या?" मैं उत्सुकता से उसकी और सरक गयी...

"पहले मेरी कसम खा!" पिंकी अब भी कुच्छ बताने से हिचकिचा रही थी...

"तेरी कसम ले! बता ना जल्दी.. फिर मीनू आ जाएगी....!" मुझे लगने लगा था कि कुच्छ ना कुच्छ 'कपड़ों के नीचे' की ही बात है....

"ववो..." पिंकी ने इतना कहते ही मेरी आँखों में आँखें डाल कर सुनिसचीत किया कि मैं सच में ही उसकी बात को 'राज़' रखूँगी या नही.. फिर कुच्छ हिचकते हुए बोली...," ववो.. एक बार 2 गाँव के लड़कों ने मुझे अंधेरे में तालाब के पिछे वाली झाड़ियों में पकड़ लिया था... तब 'वहाँ' इसी ने मुझे उनसे बचाया था.. मुझे तब डर लग रहा था कि अब 'ज़रूर' ये बकवास करेगा.. पर 'ये' मुझे घर तक ठीक ठाक छ्चोड़ कर गया था... इसीलिए मुझे विश्वास है कि 'ये' तेरी बात भी किसी को नही बताएगा...."

मैने आस्चर्य से मुँह खोल कर पिंकी की ओर देखा..,"सच! कब हुआ था ये... पूरी बात बता ना प्लीज़....."

"नही.. मुझे शर्म आ रही है... पूरी बात नही बता सकती..." पिंकी नर्वस हो गयी...

"धात पागल.. मुझसे कैसी शर्म.. बता ना... 'कौन' थे वो लड़के...?"

"पता नही.. अंधेरे में मैं उनको पहचान नही पाई थी... और मेरी आवाज़ सुनकर हॅरी झाड़ियों में आ गया.. इसको देखते ही 'वो' मुझे छ्चोड़ कर भाग गये थे.. उसने भी उनको नही देखा...!" पिंकी ने बताया....

"पूरी बात तो बता दे.. ऐसे मेरी समझ में कैसे आएगा कि असल में हुआ क्या था... बता ना प्लीज़..." मैने ज़ोर देकर पूचछा....," और तू तालाब के पार क्या करने गयी थी.. कब हुआ था ये...?"

पिंकी कुच्छ देर चुपचाप अपना सिर लटकाए बैठी रही.. शायद वा अपनी यादों को ताज़ा कर रही थी..,"......... तू किसी को भी नही बोलेगी ना! देख मैने ये बात आज तक मम्मी को भी नही बताई है...!"

"नही बताउन्गि ना यार.. मुझ पर विश्वास नही है क्या? तेरा पास भी तो मेरा इतना बड़ा राज़ है... रुक एक मिनिट.. मैं दरवाजा बंद करके आती हूँ..", उसको राज़ी होते देख मैं उत्सुकतावश खड़ी हो गयी...

"नही रहने दे... ऐसे ही ठीक है.. दरवाजा बंद करेंगे तो मीनू को शक़ होगा... तू दूसरी चारपाई पर आकर अपनी किताब खोल ले.. बताती हूँ..", बोलते हुए पिंकी के चेहरे पर हुल्की सी उदासी सॉफ पढ़ी जा सकती थी....

"हां.. बता... अब!" मैं जाकर उसके पास वाली चारपाई पर बैठ गयी.....

पिंकी ने गहरी साँस लेने के बाद बोलना शुरू किया...,"वो.. पिच्छले अक्टोबर की बात है... पापा घर पर नही थे.. इसीलिए मुझे भैंसॉं को शाम को तालाब पर लेकर जाना पड़ा था.. " बोलकर पिंकी चुप हो गयी और मेरे चेहरे को देखने लगी...

"अच्च्छा...", मैने उत्सुकता से हुंकार भरी....

"जब मैं तालाब पर गयी तो वहाँ बहुत से लोग थे.. धीरे धीरे सब की भैंस निकालने लगी और एक एक करके सब अपने अपने घर जाने लगे.. अंधेरा होने लगा था.. पर हमारी भैंसे बाहर नही आई..." पिंकी ने आगे बोला....

"फिर?", मैने पूचछा...

"फिर मैने एक लड़के से अंदर जाकर हमारी भैंसे निकाल देने को कहा.. पर उसने पानी ठंडा होने की बात कहकर अंदर घुसने से इनकार कर दिया.. वैसे भी उनकी भैंसे बाहर निकल चुकी थी... वह भी मना करके भाग गया.. तालाब पर मैं अकेली ही रह गयी...", पिंकी बोलते हुए अब मेरे चेहरे को नही देख रही थी.. शायद वा नज़रें झुकाए पूरी तरह अतीत में खो गयी थी....

"ओह्ह.. फिर वो लड़के आए और तुझे ज़बरदस्ती झाड़ियों में ले गये.. है ना?", मुझसे अंदाज़ा लगाए बिना रहा ना गया... मेरी आँखों के सामने अभी से एक द्रिश्य तैरने लगा था जैसे दो लड़के पिंकी के बदन को नोच रहे हों....

"नही.. मैं बहुत उदास हो गयी थी.... मैने हताशा में पास पड़े पत्थर अपनी भैंसॉं की तरफ फैंकने शुरू कर दिए... उनमें से एक पत्थर हमारी भैंस की आँख के पास लग गया और वो उठ कर दूसरी तरफ चल दी... उसके पिछे पिछे बाकी दोनो भैंसें हो ली... झाड़ियों की ओर..."

"ओह्ह अच्च्छा.. फिर..?", मैने कंबल अपनी जांघों पर डाला और हाथ नीचे ले जाकर अपनी योनि को सहलाना शुरू कर दिया... 'काश.. कभी ऐसा मेरे साथ होता..' मैने मंन ही मंन सोच कर तड़प उठी थी....

"फिर क्या? ...अंधेरा होने वाला था.. अगर मैं उनके पिछे दूसरी तरफ ना जाती तो उनके खो जाने का डर था... मैं डरती डरती तालाब के किनारे किनारे दूसरी तरफ जाने लगी... बीच रास्ते में पहुँची तो 2 लड़के तालाब के किनारे पेशाब कर रहे थे... कुत्ते कामीनो ने मुझे देखते ही मेरी ओर मुँह कर लिया... बिना ज़िप बंद किए...!"

"आआआअ...!", मेरा एक हाथ आस्चर्य से खुल गये मेरे होंटो पर चला गया.. दूसरा हाथ तो 'वहीं' पर था...," तूने देख लिया..?"

"धात बेशर्म...!", पिंकी के गालों की रंगत मेरी बात सुनकर गुलाबी होने लगी..," एक बार तो मेरी नज़र 'वहाँ' चली ही गयी थी... पर मैने अपनी नज़रें तुरंत झुका ली और उनकी ओर बिना देखे उनके बीच से निकल कर आगे चली गयी..! मेरा आगे जाना ज़रूरी था ना!"

"उन्होने तुझे कुच्छ नही कहा...?", मेरी उत्सुकता चरम पर थी.. और मेरी योनि का कुलबुलाना भी....

"भौंक रहे थे कुच्छ कुच्छ.. ऐसे ही.. पर मैने ध्यान नही दिया... पर तब तक अंधेरा गहराने लगा था और डर के मारे मेरा दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा.. खास तौर से उन्न लड़कों की बकवास के कारण.... उनमें से एक लड़के की बात मुझे सॉफ सुनी थी.. 'वो' कह रहा था 'आ पकड़ लें बुलबुल को.. करारा माल है..."

"फिर...?" मैने अपनी उंगली कहने से पहले ही अंदर सरका चुकी थी... मेरी जांघों में कंपन बढ़ गया था....

"जैसे तैसे मैं दूसरी तरफ गयी तो झाड़ियों के बीच मुझे हमारी भैंसे चरती हुई दिखाई दे गयी... मैं दूसरी तरफ से उनके आगे जाकर उनको वापस मोड़ने का ख़याल बना ही रही थी कि मुझे पिछे से उन्न लड़कों के मेरी तरफ चल कर आने की आवाज़ सुनाई दी... मैं तुरंत पलट कर खड़ी हो गयी और भय के मारे थर थर काँपने लगी......"

"क्या हो गया छ्छोकरी? इस टाइम यहाँ क्या कर रही है..? तुझे डर नही लगता क्या? कोई तुझे अकेली देख कर तुझे..." "उन्होने बहुत गंदा शब्द इस्तेमाल किया था.." पिंकी उनकी बात बताते हुए बीच में रुक कर बोली..," मैं खड़ी खड़ी सिर से पाँव तक पसीना पसीना हो गयी....,"वववो.. भैया.. म्‍म्माइन.. अपनी भैंसे लेने आई हूँ... यहाँ आ गयी तालाब से निकाल कर..." "मैने थरथरते हुए अपनी भैंसॉं की तरफ इशारा किया..." पिंकी की आँखों में 'उसके' साथ गुजरा वो पल सजीव सा हो गया था...

"तू क्यूँ चिंता करती है... हम यहाँ खड़े होते हैं.. तू जाकर भैंसॉं को इधर भगा दे... हम उन्हे तेरे साथ साथ कर देंगे.. जा.. पुचह" "उन्होने कहने के बाद ऐसे किया..." पिंकी बोली....

"तू बता ना.. फिर मीनू आ जाएगी..." उत्तेजना के मारे मेरी जांघों में ऐथेन सी हो चुकी थी.....

"फिर मैं डरती डरती बार बार पिछे देखती झाड़ियों में जाने लगी तो मुझे एक लड़के की आवाज़ सुनाई दी....," देख.. कोई आ तो नही रहा..."

"उसकी आवाज़ की टोन पहचान कर मैं धक से रह गयी... मेरे पाँवों ने काम करना बंद कर दिया और मैं झाड़ियों के बीच खड़ी खड़ी काँपने लगी.... वो दोनो मुझे झाड़ियों के अंदर आते दिखाई दिए...

"ट्तूम.. इधर मत आओ... वहीं खड़े रहो..." मेरे मुँह से निकला...

"पर उनके कदम मेरी ओर बढ़ते चले गये.. एक ने कहा की भैंस उधर ना भाग जायें.. इसीलिए आगे आकर खड़े हो रहे हैं.... और पास आते ही एक ने कसकर मेरा हाथ पकड़ लिया...

"छ्चोड़ दो मुझे.. मुझे जाने दो... पापा अपने आप ले जाएँगे.. इनको..." मेरा बुरा हाल हो गया था... मैं उनकी और बिना देखे ही कुच्छ कुच्छ बोलती जा रही थी.. पर इतनी देर में तो दूसरे ने भी आकर मुझे पकड़ लिया था....

"चली जाना ... ऐसी भी क्या जल्दी है... " उन्होने उसके बाद मुझे गंदी गंदी बातें कहनी शुरू कर दी... मुझे लगने लगा था की 'वो' मेरा आख़िरी दिन है.. तभी जाने कहाँ से मेरे अंदर ताक़त आ गयी और मैं पूरा ज़ोर लगा कर चीखी... मैं दोबारा भी चीख लगाना चाहती थी.. पर इस'से पहले ही एक ने मेरा मुँह दबा लिया... और 'वो' दोनो मेरे कपड़े निकालने की कोशिश करने लगे....." बोलते हुए पिंकी मेरे सामने बैठी हुई भी काँपने लगी थी.....

"ऊओाअहह...फिर क्या हुआ?" मेरी योनि ने आगे सुने बिना ही पानी छ्चोड़ दिया था... मैने उंगली बाहर निकाल कर अपनी जांघों को एक दूसरी के उपर चढ़ा लिया....

"तभी भगवान की दया से हॅरी झाड़ियों के पास आ पहुँचा.. उसने शायद मेरी चीख सुन ली थी... पास आते ही उसने ज़ोर से कहा...," कौन है यहाँ?"

"उसकी आवाज़ सुनकर दोनो लड़के मुझे छ्चोड़ कर भाग गये..... मैं खड़ी खड़ी रोने लगी थी.. हॅरी ने पास आकर मुझसे पूचछा," कौन थे वो...?"

"उस घड़ी में मेरे लिए 'वो' किसी देवदूत से कम नही था... मैं कुच्छ बोल नही पाई.. पर जैसे ही वो मेरे पास आकर खड़ा हुआ.. मैं उस'से लिपट कर दहाड़ें मार कर रोने लगी...." पिंकी की आँखों में सच में ही आँसू आ चुके थे....

"ओह्ह.. रो क्यूँ रही है यार... कुच्छ हुआ तो नही ना..." मैने आगे होकर पिंकी के आँसू पौंचछते हुए कहा..,"फिर क्या हुआ?"

"थोड़ी देर तक मैं ऐसे ही खड़ी रोती रही और 'वो' मुझे दुलर्ता हुआ झाड़ियों से बाहर ले आया... थोड़ी शांत होने पर में छितक कर उस'से अलग हो गयी...

"यहाँ क्या कर रही हो इस वक़्त.." हॅरी ने प्यार से मुझसे पूचछा था...

"म्‍मैइन.. अपनी भैंसॉं को लेने आई थी..." बोलना शुरू करते ही मुझे फिर से रोना आ गया....

"ओह्ह.. कोई बात नही... ये हैं क्या तुम्हारी भैंसें...?" हॅरी ने पूचछा था...

"हूंम्म.." मैने रोते हुए ही जवाब दिया....

"कोई बात नही.. मैं निकाल कर लाता हूँ...!" हॅरी बड़े प्यार से बात कर रहा था.. पर मेरे दिल में उन्न लड़कों की वजह से बार बार खटका हो रहा था...,"नही.. तुम चले जाओ.. मैं अपने आप निकाल कर ले जाउन्गि...!"

"ओके.. निकाल लो.. मैं यहीं खड़ा होता हूँ..." हॅरी ने कहा...

"मैं झाड़ियों की ओर जाने लगी तो फिर से मेरे कदम ठिठक गये.. मैं मूडी और बोली,"तुम जाओ पहले.. मैं बाद में निकालूंगी..." सच कहूँ तो उस वक़्त तक मुझे हॅरी से भी डर लगने लगा था.. कि कहीं झाड़ियों में जाते ही वो भी...."

"तुम पागल हो क्या...?" मैं यहाँ खड़ा होता हूँ.. तुम निकाल कर ले आओ..." हॅरी ने मुझे धमका सा दिया था.... पर मेरी उसके होते हुए झाड़ियों में जाने की हिम्मत नही हुई.. मैं वापस आ गयी,"ठीक है.. तुम्ही निकाल दो..."

हॅरी ने मेरे हाथ से च्छड़ी ली और भैंसॉं को वापस ले आया... सच कहूँ तो उसके साथ चलते हुए मुझे इतना डर लग रहा था कि मैं रह रह कर उसकी ओर देख रही थी कि कहीं मेरे पास तो नही आ रहा.... पर उसने ऐसा कुच्छ नही किया और हम दोनो भैंसॉं के साथ गाँव तक आ गये..."

"रोशनी में आने के बाद ही मैने पहचाना कि 'वो' हॅरी था... मेरे कलेजे को इतनी शांति मिली कि मेरी आँखों से खुशी के आँसू छलक उत्ते थे... पर उसने शायद मुझे मेरी आवाज़ से ही पहचान लिया था...

"कौन थे वो?" उसने पूचछा....

"पता नही.. मैने उन्हे पहचाना नही... अब तुम जाओ.. मैं चली जाउन्गि...!" मैने कहा...

"कोई बात नही.. मैने तुम्हारे घर की तरफ से होता हुआ निकल जाउन्गा..." हॅरी मेरे साथ साथ चलता रहा था...

"कहा ना तुम जाओ!" घर नज़दीक आते ही मैं उस पर भी शेर हो गयी..." पिंकी ये कहकर हँसने लगी....

मैं मुस्कुराइ..," फिर.. चला गया बेचारा?"

"नही... पिछे रह गया था मेरे डाँटने पर... पर मैने घर आने पर देखा था.. 'वो' मेरे पिछे पिछे आ रहा था...." पिंकी ने बात पूरी की.....

"बेचारा...!" मैं लंबी साँस लेकर बोली....,"तुमने उसको क्यूँ डांटा.. उसने तो तुम्हे बचाया ही था ना...."

"हां..." पिंकी सिर हिलाते हुए बोली....,"बाद में मुझे अफ़सोस भी हुआ था..और मैने एक दिन उसको इसके लिए सॉरी भी बोला था.... पर उस दिन में बहुत डरी हुई थी...."

"हूंम्म.. फिर उसने किसी को नही बताई ये बात....!" मैने पूचछा....

"नही.. बताई होती तो अपने गाँव के लड़के इतने गंदे हैं कि ताने मार मार कर ही मेरा जीना मुश्किल कर देते... मैने उस'से पूचछा भी था.. उसने मना कर दिया था कि किसी को नही बताई बात...."

"सच में बहुत अच्च्छा है फिर तो वो..?" मैने कहा....

"नही.. इतना भी अच्च्छा नही है.. मेरा नाम निकाल दिया था उसने.. 'गुलबो!' कहने लगा कि एक ही बात होती है.. और 'वो' प्यार से बोल देता है... मैने उसको सॉफ सॉफ कह दिया.. 'ज़्यादा प्यार दिखाने की ज़रूरत नही है.. हाँ!' उसके बाद उसने कभी नही बोला.. हे हे हे.." पिंकी का चेहरा खिल उठा....

पिंकी की इस बात पर मैं ना तो ढंग से हंस पाई.. और ना ही मैने कोई प्रतिक्रिया ही दी.. मेरा मंन तो अब भी तालाब के उस पार झाड़ियों में अटका हुआ था.. कल शाम 'संदीप' के साथ खेली गयी मेरी प्रथम 'रासलीला' की झलकियाँ मेरी आँखों में वासना के 'लाल डोरे' बनकर तैरने लगी थी और अब पिंकी की बात ने तो मेरी जांघों के बीच की 'अमिट' भूख को ज्वलनांक तक ही पहुँचा दिया था... मैने तकिया सिरहाने लगाया और लेट कर कंबल औध लिया.. मैं कल्पना करके देखना चाहती थी कि अगर झाड़ियों में मेरी भैंस गयी होती और नादान पिंकी की जगह 'वहाँ' मैं होती तो आगे क्या क्या होता...!

पर पिंकी ने मुझे 2 पल के लिए भी चैन से लॅट्न ना दिया," आए... क्या हो गया?" पिंकी ने मुझे पकड़ कर हिला दिया...

"कुच्छ नही.. थोड़ी देर लॅट्न का मॅन कर रहा है..." मैने अपने चेहरे से कंबल हटते हुए आनमना सा जवाब दिया....

"ये लड़के ऐसे क्यूँ होते हैं अंजू.. ? अकेली लड़की को देखते ही भूखे भेड़िए क्यूँ बन जाते हैं.. हमें इस तरह डरकर ज़बरदस्ती करके क्या मिलता है इनको...?"

जाने अंजाने ही पिंकी ने मेरा पसंदीदा विषय छेड़ दिया था... मैने तुरंत तिरछि होकर अपने 'सिर' को कोहनी के सहारे टीका लिया," सब तो ऐसे नही होते ना.. हरीश ने तो तुम्हारे साथ कुच्छ ज़बरदस्ती नही की....!"

"हाँ.. सब तो नही होते.. पर ज़्यादातर ऐसे ही होते हैं.. तभी तो घर वाले लड़कियों को रात में बाहर जाने नही देते... 'ऐसे' ही कामीनो के डर से.. दुनिया में 'गंदे' लड़के नही होने चाहियें थे.. फिर तो हम भी देर रात तक घूम फिर कर आते.. जहाँ 'दिल' करता वहाँ खेलने जाते...! ऐसे लड़कों की वजह से ही हम लड़कियों का जीना हराम हो गया है.." पिंकी लड़कों को कोसने लगी....

"सब एक जैसे थोड़े होते हैं पागल! किसी को किसी काम में मज़ा आता है और किसी को दूसरे 'काम' में..." मैने जवाब दिया...

"क्यूँ? लड़की से ज़बरदस्ती करने में कैसा मज़ा? ये तो बहुत ही घटिया बात है ना...!" पिंकी तुनक कर बोली....

मुझे पिंकी की बातों की दिशा 'अजीब' ढंग से घूमती नज़र आई.. मुझे लगा जैसे वो इस बारे में और 'बात करना चाहती है.. मैं उत्साहित होकर बैठ गयी," हां.. 'वो' तो है.... पर... मैने सुना है कि लड़कियों को भी बाद में 'मज़ा' आने लगता है.. क्या पता 'वो' लड़के यही सोच कर 'लड़कियों' को छेड़ने लग जाते हों की बाद में हम अपने आप तैयार हो जाएँगी..."

"सुना क्या है? तूने तो कर भी लिया...." पिंकी मेरी आँखों में देखते हुए बोली और फिर नज़रों को झुका कर धीरे से बोली,"तुझे मज़ा आया था क्या?"

उसकी पहली बात सुनकर तो मैं सकपका ही गयी थी.. पर उसके पूच्छे सवाल ने मुझे दुविधा में डाल दिया.... मैं तब तक उसके चेहरे को घूरती रही जब तक की मेरे जवाब का इंतजार करने के बाद उसने मेरी आँखों में आँखें नही डाली..,"बोल!"

"अब क्या बताउ? 'हाँ' भी और 'नही' भी..." मैने सिक्का उच्छल दिया...

"ये क्या बात हुई? ढंग से बोल ना...!" पिंकी उत्सुकता से मेरी ओर देखती हुई बोली...

"सच बताउ?"

"हां.. सच ही तो पूच्छ रही हूँ...!" पिंकी लगातार मेरी आँखों में आँखें डाले रही.. जैसे मेरे चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही हो....

"हां.. आया था...!" मैने सीधे सीधे बोल दिया....

मेरा जवाब सुनते ही पिंकी की गालों से लेकर उसकी आँखों तक में 'लज्जा' पसर गयी..,"तुझे... शरम नही आई क्या?"

"अब ये क्यूँ पूच्छ रही है? हां.. बहुत आई थी.. पर मज़ा भी बहुत 'आया' था.. सच्ची...!" मैने कसमसा कर कहा...

"पर.. 'ये' काम तो शादी के बाद ही करते हैं ना... पहले करना तो 'पाप' होता है..." पिंकी ने शरमाते हुए कहा....

मुझे लगा कि पिंकी 'इस' मामले में मेरी सोच से कहीं ज़्यादा समझदार है...,"वो अलग बात है... मैं तो बस 'मज़े' की बता रही हूँ... मज़ा तो आता ही है.. सच में..!"

"चल छ्चोड़.. हम भी कैसी बातें करने लग गये...!" पिंकी को शायद अभी अहसास हुआ कि 'हम' कहाँ से कहाँ पहुँच गये थे....

"अच्च्छा ये बता.. तू शादी करेगी तो कैसे लड़के से करेगी...!" मैं बात जारी रखना चाहती थी...

"छ्चोड़ ना.. ये क्या लेकर बैठ गयी तू.. अभी तो बहुत टाइम है इन्न बातों के लिए.." पिंकी थोड़ा झेंप कर बोली....

"बता ना.. बस ये आख़िरी बात...!" मैने ज़ोर देकर कहा...

"उम्म्म्मम..." पिंकी बोलते बोलते रुक कर आँखें बंद करके मुस्कुराने लगी.. उसके गोरे गालों में मुस्कुराहट के चलते गड्ढा सा बन गया.. 'वो' गड्ढा'; जो मुझे पिंकी के पास लड़कों के मर मिटने के लिए सबसे कातिल चीज़ लगता था... ऐसा लगा जैसे उसके मानस पटल पर 'कोई' तस्वीर साक्षात हो गयी हो..,"उम्म्म्म.. हॅरी..... हॅरी जैसा...!" उसने आँखें बंद किए हुए ही बोला और फिर अपने होन्ट जैसे 'सी' कर मुस्कुराती रही....

"क्या?" मेरा रोम रोम 'उसके' दिल का राज सुनकर झन्ना उठा...,"तुझे हॅरी से प्यार है..?"

"चल हट.. बेशर्म!" पिंकी के गाल गुलाबी से हो गये और 'वो' सच में ही 'गुलबो' सी लगने लगी..," मैने ऐसा थोड़े ही कहा है.. मैने सिर्फ़ 'उस' जैसा कहा है.. मैं किसी से प्यार व्यार नही करती...."

"पर मतलब तो यही हुआ ना...!" मैने खिलखिला कर उसको छेड़ते हुए कहा....

"क्यूँ..? यही मतलब कैसे हुआ... पर मुझे सच में ऐसा ही लड़का चाहिए 'जो' 'लड़की' होने की मर्यादायें जानता हो... जो उसकी भावनाओ की कद्र कर सके.. जिसको 'प्यार' का 'असली' मतलब पता हो... 'जो' लड़की के 'लड़की' होने का फ़ायडा उठना ना जानता हो...!" पिंकी भाव विभोर होकर बोली....

"पर.. हॅरी ऐसा ही तो है.. शकल में भी कितना 'क्यूट' सा है.. और जो तू कह रही है.. 'वो' सारी' बातें तो उसमें हैं ही.... हैं ना?" मैने उसको उकसाने की सोची...

"चल हट अब.. बकवास मत कर मेरे साथ... वैसे.. मानव और मीनू की जोड़ी कैसी लगती है तुझे...?" पिंकी बात को टालते हुए बोली....

"मस्त है एक दम...!" मैने दिल पर पत्थर रख कर कहा...," पर तू ऐसा क्यूँ बोल रही है.. कुच्छ बात है क्या इनकी..?" मैने पूचछा...

"पता नही.. पर मुझे लगता है कि कुच्छ ना कुच्छ तो ज़रूर है....मीनू अकेली होते ही मुझे 'मानव' की बातें कर कर के बोर करने लग जाती है... और कल मानव की बातों से भी मुझे ऐसा लगा....

तभी मीनू नीचे आ गयी..," क्या बातें हो रही हैं अकेले अकेले..!"

"लंबू की..!" पिंकी ने कहा और हम दोनो खिलखिला कर हंस पड़े...... मीनू ने आकर पिंकी की चोटी पकड़ कर खींच ली..,"तेरी पिटाई करनी पड़ेगी मुझे... अब पढ़ी क्यूँ नही तुम दोनो.. बाद में कहोगी की मैं पढ़ने नही देती.... पापा ने बोला है कि कहीं नही जाना... यहीं सोना है तीनो को!"

क्रमशः.......................

gataank se aage.............

Jab tak chacha chachi nahi aa gaye, Pinky ne usko chidana nahi chhoda.. Kuchh der baad main bhi Pinky ke sath hi Meenu ko baaton hi baaton mein tang karne lagi thi.. Par chacha chachi ke baad hamein shant ho jana pada.. Meenu ke chehre se aisa lag raha tha jaise Manav ka naam le le kar usko tang kiya jana usko achchha lag raha tha.. Chacha chachi ke aane par uska mood off sa ho gaya...

"Papa.. aaj mein Anju ke sath iske ghar so jaaun kya?" Pinky ki iss baat se mujhe bhi hairani huyi.. Mere aage usne aisa kuchh jikar kiya nahi tha...

"Kyun? yahan kya dikkat hai beti..? Anjali bhi toh roz yahin soti hai..." Papa ne pyar se poochha....

"Yye.. Ye Meenu hamein padhne nahi deti yahan...!" Pinky ne jane aisa kyun kaha...

"Kyun..?" Meenu tarare se boli...," Main kya seeng maarti hoon tere pate mein... Papa! Jab se aayi hai isne kitab khol kar nahi dekhi.. khamkhwah mera naam le rahi hai....!"

"Pinkyyyyy! tu bahut shararati hoti ja rahi hai aaj kal... Chalo kitab khol ke padhai karo...!" chacha ne kaha aur upar chale gaye....

Meenu ab bhi gusse se apne kulhon par hath rakhe Pinky ki aur dekhe ja rahi thi.. Pinky ne shararat se uski aur jeebh nikal di aur fir hansne lagi.....

"Dekh lo mummy ab isko!" Meenu tunak kar boli....

Chachi ne Meenu ke lahje par dhyan nahi diya...," Aaja beti.. upar aaja.. thodi der kaam mein madad kar de.. bahut thak gayi hoon....!" Chachi bhi kahte kahte upar chadh gayi...

"Wapas aane ke baad batati hoon tujhe...!" Meenu ne banawati gusse se Pinky ki aur ungali ki....

"lambu.. lambu.. lambu... he he he!" Pinky ne usko jate jate bhi chhed hi diya... Fir uske jate hi gambheer si hokar boli...,"Tune goli.. le li kya Anju?"

"Haan.. 'wo' toh maine aate hi le li thi..." Maine kahne ke baad uss'se poochha..," Tu hamare ghar chalne ke liye kyun kah rahi thi....

Pinky jawab dete huye kahin kho si gayi..," aa.. nahi.. bus aise hi....!"

"Wo.. Mujhe toh abhi bhi darr lag raha hai ki Harish kisi ko bol na de... Tune bataya bhi nahi ki tu usko itne achchhe se kaise jaanti hai...!" Main jakar uski charpayi par hi baith gayi...

"Arrey.. achchhe se nahi jaanti pagal... par mujhe ye pata hai ki 'wo' bura ladka nahi hai... Mujhe vishvas hai ki 'wo' kisi ko nahi bolega....!"

"Par tujhe vishvas kaise hai..? kuchh toh bata na! Mujhe sach mein darr lag raha hai..." Maine kaha....

"Tu kisi ko batayegi toh nahi na...!" Pinky ki aawaj dheemi ho gayi...

"Nahi.. Main pagal hoon kya?" Main utsukta se uski aur sarak gayi...

"Pahle meri kasam kha!" Pinky ab bhi kuchh batane se hichkicha rahi thi...

"Teri kasam le! Bata na jaldi.. fir Meenu aa jayegi....!" Mujhe lagne laga tha ki kuchh na kuchh 'kapdon ke neeche' ki hi baat hai....

"Wwo..." Pinky ne itna kahte hi meri aankhon mein aankhein daal kar sunischit kiya ki main sach mein hi uski baat ko 'raaz' rakhoongi ya nahi.. Fir kuchh hichakte huye boli...," Wwo.. Ek baar 2 gaanv ke ladkon ne mujhe andhere mein talab ke pichhe waali jhadiyon mein pakad liya tha... Tab 'wahan' isi ne mujhe unse bachaya tha.. Mujhe tab darr lag raha tha ki ab 'jaroor' ye bakwas karega.. Par 'ye' mujhe ghar tak theek thaak chhod kar gaya tha... Isiliye mujhe vishvas hai ki 'ye' teri baat bhi kisi ko nahi batayega...."

Maine aascharya se munh khol kar Pinky ki aur dekha..,"Sach! kab hua tha ye... Poori baat bata na plz....."

"Nahiii.. mujhe sharm aa rahi hai... poori baat nahi bata sakti..." Pinky nervous ho gayi...

"dhat pagal.. mujhse kaisi sharm.. bata na... 'koun' the wo ladke...?"

"Pata nahi.. Andhere mein main unko pahchan nahi payi thi... Aur Meri aawaj sunkar Harry jhadiyon mein aa gaya.. isko dekhte hi 'wo' mujhe chhod kar bhag gaye the.. Usne bhi unko nahi dekha...!" Pinky ne bataya....

"Poori baat toh bata de.. Aise meri samajh mein kaise aayega ki asal mein hua kya tha... bata na plz..." Maine zor dekar poochha....," Aur tu talab ke paar kya karne gayi thi.. kab hua tha ye...?"

"Pata nahi.. Andhere mein main unko pahchan nahi payi thi... Aur Meri aawaj sunkar Harry jhadiyon mein aa gaya.. isko dekhte hi 'wo' mujhe chhod kar bhag gaye the.. Usne bhi unko nahi dekha...!" Pinky ne bataya....

"Poori baat toh bata de.. Aise meri samajh mein kaise aayega ki asal mein hua kya tha... bata na plz..." Maine zor dekar poochha...., "Aur tu talab ke paar kya karne gayi thi.. kab hua tha ye...?"

Pinky kuchh der chupchap apna sir latkaye baithi rahi.. Shayad wah apni yaadon ko taja kar rahi thi..,"......... Tu kisi ko bhi nahi bolegi na! Dekh maine ye baat aaj tak mummy ko bhi nahi batayi hai...!"

"Nahi bataaungi na yaar.. Mujh par vishvas nahi hai kya? Tera paas bhi toh mera itna bada raaz hai... ruk ek minute.. main darwaja band karke aati hoon..", Usko razi hote dekh main utsuktavash khadi ho gayi...

"Nahi rahne de... aise hi theek hai.. Darwaja band karenge toh Meenu ko shaq hoga... Tu dusri charpayi par aakar apni kitab khol le.. batati hoon..", Bolte huye Pinky ke chehre par hulki si udaasi saaf padhi ja sakti thi....

"Haan.. bata... ab!" Main jakar uske paas wali charpayi par baith gayi.....

Pinky ne gahri saans lene ke baad bolna shuru kiya...,"Wo.. Pichhle october ki baat hai... Papa ghar par nahi the.. isiliye mujhe bhainson ko Sham ko Talab par lekar jana pada tha.. " Bolkar Pinky chup ho gayi aur mere chehre ko dekhne lagi...

"Achchha...", Maine utsukta se hunkaar bhari....

"Jab main talab par gayi toh wahan bahut se log the.. dheere dheere sab ki bhains nikalne lagi aur ek ek karke sab apne apne ghar jane lage.. Andhera hone laga tha.. Par hamari bhainse bahar nahi aayi..." Pinky ne aage bola....

"Fir?", Maine poochha...

"Fir maine ek ladke se andar jakar hamari bhainse nikal dene ko kaha.. Par Usne pani thanda hone ki baat kahkar andar ghusne se inkaar kar diya.. Waise bhi unki bhainse bahar nikal chuki thi... Wah bhi mana karke bhag gaya.. talab par main akeli hi rah gayi...", Pinky bolte huye ab mere chehre ko nahi dekh rahi thi.. shayad wah najrein jhukaye poori tarah ateet mein kho gayi thi....

"Ohh.. Fir wo ladke aaye aur tujhe jabardasti jhadiyon mein le gaye.. hai na?", Mujhse andaja lagaye bina raha na gaya... Meri aankhon ke saamne abhi se ek drishya tairne laga tha jaise do ladke Pinky ke badan ko noch rahe hon....

"Nahi.. Main bahut udas ho gayi thi.... Maine hatasha mein paas pade patthar apni bhainson ki taraf fainkne shuru kar diye... Unmein se ek patthar hamari bhains ki aankh ke paas lag gaya aur wo uth kar dusri taraf chal di... Uske pichhe pichhe baki dono bhainsein ho li... jhaadiyon ki aur..."

"Ohh achchha.. Fir..?", Maine kambal apni jaanghon par dala aur hath neeche le jakar apni yoni ko sahlana shuru kar diya... 'kash.. kabhi aisa mere sath hota..' Maine mann hi mann soch kar tadap uthi thi....

"Fir kya? ...Andhera hone wala tha.. agar main unke pichhe dusri taraf na jati toh unke kho jane ka darr tha... Main darti darti talab ke kinare kinare dusri taraf jane lagi... Beech raaste mein pahunchi to 2 ladke talab ke kinare peshab kar rahe the... Kutte kamino ne mujhe dekhte hi meri aur munh kar liya... Bina Zip band kiye...!"

"aaaaaaa...!", Mera ek hath aascharya se khul gaye mere honton par chala gaya.. dusra hath toh 'wahin' par tha...," Tune dekh liya..?"

"Dhat besharm...!", Pinky ke gaalon ki rangat meri baat sunkar gulabi hone lagi..," Ek baar toh meri najar 'wahan' chali hi gayi thi... Par maine apni najrein turant jhuka li aur unki aur bina dekhe unke beech se nikal kar aage chali gayi..! mera aage jana jaroori tha na!"

"Unhone tujhe kuchh nahi kaha...?", Meri utsukta charam par thi.. aur meri yoni ka kulbulana bhi....

"Bhounk rahe the kuchh kuchh.. aise hi.. par maine dhyan nahi diya... Par tab tak andhera gahrane laga tha aur darr ke maare mera dil jor jor se dhadakne laga.. khas tour se unn ladkon ki bakwas ke karan.... unmein se ek ladke ki baat mujhe saaf suni thi.. 'wo' kah raha tha 'aa pakad lein bulbul ko.. karara maal hai..."

"Fir...?" Maine apni ungali kahne se pahle hi andar sarka chuki thi... Meri jaanghon mein kampan badh gaya tha....

"Jaise taise main dusri taraf gayi toh jhadiyon ke beech mujhe hamari bhainse charti huyi dikhayi de gayi... Main dusri taraf se unke aage jakar unko wapas modne ka khayal bana hi rahi thi ki mujhe pichhe se unn ladkon ke meri taraf chal kar aane ki aawaj sunayi di... Main turant palat kar khadi ho gayi aur bhay ke maare thar thar kaanpne lagi......"

"Kya ho gaya chhokri? Iss time yahan kya kar rahi hai..? tujhe darr nahi lagta kya? Koyi tujhe akeli dekh kar tujhe..." "Unhone bahut ganda shabd istemaal kiya tha.." Pinky unki baat batate huye beech mein ruk kar boli..," Main khadi khadi sir se paanv tak pasina pasina ho gayi....,"wwwo.. bhaiya.. Mmmain.. apni bhainse lene aayi hoon... yahan aa gayi talab se nikal kar..." "Maine thartharate huye apni bhainson ki taraf ishara kiya..." Pinky ki aankhon mein 'uske' sath gujra wo pal sajeev sa ho gaya tha...

"Tu kyun chinta karti hai... hum yahan khade hote hain.. tu jakar bhainson ko idhar bhaga de... hum unhe tere sath sath kar denge.. ja.. Puchhhhh" "Unhone kahne ke baad aise kiya..." Pinky boli....

"Tu bata na.. fir Meenu aa jayegi..." Uttejana ke maare meri jaanghon mein aithen si ho chuki thi.....

"Fir main darti darti baar baar pichhe dekhti jhadiyon mein jane lagi toh mujhe ek ladke ki aawaj sunayi di....," Dekh.. koyi aa toh nahi raha..."

"uski aawaj ki tone pahchan kar main dhak se rah gayi... Mere paanvon ne kaam karna band kar diya aur main jhadiyon ke beech khadi khadi kaanpne lagi.... Wo dono mujhe jhadiyon ke andar aate dikhayi diye...

"ttum.. idhar mat aao... wahin khade raho..." Mere munh se nikla...

"Par unke kadam meri aur badhte chale gaye.. Ek ne kaha ki bhains udhar na bhag jayein.. isiliye aage aakar khade ho rahe hain.... aur paas aate hi ek ne kaskar mera hath pakad liya...

"Chhod do mujhe.. mujhe jane do... papa apne aap le jayenge.. inko..." Mera bura haal ho gaya tha... Main unki aur bina dekhe hi kuchh kuchh bolti ja rahi thi.. par itni der mein toh dusre ne bhi aakar mujhe pakad liya tha....

"Chali jana ... aisi bhi kya jaldi hai... " Unhone uske baad mujhe gandi gandi baatein kahni shuru kar di... Mujhe lagne laga tha ki 'wo' mera aakhiri din hai.. tabhi jaane kahan se mere andar takat aa gayi aur main poora jor laga kar cheekhi... Main dobara bhi cheekh lagana chahti thi.. par iss'se pahle hi ek ne mera munh daba liya... aur 'wo' dono mere kapde nikalne ki koshish karne lage....." Bolte huye Pinky mere saamne baithi huyi bhi kaanpne lagi thi.....

"oooaaahh...Fir kya hua?" Meri yoni ne aage sune bina hi paani chhod diya tha... Maine ungali bahar nikal kar apni jaanghon ko ek dusri ke upar chadha liya....

"Tabhi bhagwan ki daya se Harry jhadiyon ke paas aa pahuncha.. usne shayad meri cheekh sun li thi... Paas aate hi usne zor se kaha...," Koun hai yahan?"

"Uski aawaj sunkar dono ladke mujhe chhod kar bhag gaye..... Main khadi khadi rone lagi thi.. Harry ne paas aakar mujhse poochha," Koun the wo...?"

"Uss ghadi mein mere liye 'wo' kisi devdoot se kam nahi tha... main kuchh bol nahi payi.. par jaise hi wo mere paas aakar khada hua.. main uss'se lipat kar dahadein maar kar rone lagi...." Pinky ki aankhon mein sach mein hi aansoo aa chuke the....

"Ohh.. ro kyun rahi hai yaar... kuchh hua toh nahi na..." Maine aage hokar Pinky ke aansu pounchhte huye kaha..,"fir kya hua?"

"Thodi der tak main aise hi khadi roti rahi aur 'wo' mujhe dularta hua jhaadiyon se bahar le aaya... Thodi shant hone par mein chhitak kar uss'se alag ho gayi...

"yahan kya kar rahi ho iss waqt.." Harry ne pyar se mujhse poochha tha...

"Mmain.. apni bhainson ko lene aayi thi..." Bolna shuru karte hi mujhe fir se rona aa gaya....

"Ohh.. koyi baat nahi... Ye hain kya tumhari bhainsein...?" Harry ne poochha tha...

"Hummm.." Maine rote huye hi jawab diya....

"Koyi baat nahi.. main nikal kar lata hoon...!" Harry bade pyar se baat kar raha tha.. par mere dil mein unn ladkon ki wajah se baar baar khatka ho raha tha...,"Nahi.. tum chale jao.. main apne aap nikal kar le jaaungi...!"

"OK.. nikal lo.. main yahin khada hota hoon..." Harry ne kaha...

"Main jhadiyon ki aur jane lagi toh fir se mere kadam thithak gaye.. main mudi aur boli,"Tum jao pahle.. main baad mein nikaaloongi..." Sach kahoon toh uss waqt tak mujhe harry se bhi darr lagne laga tha.. ki kahin jhadiyon mein jate hi wo bhi...."

"Tum pagal ho kya...?" Main yahan khada hota hoon.. tum nikal kar le aao..." Harry ne mujhe dhamka sa diya tha.... par meri uske hote huye jhadiyon mein jane ki himmat nahi huyi.. main wapas aa gayi,"Theek hai.. tumhi nikal do..."

Harry ne mere hath se chhadi li aur bhainson ko wapas le aaya... Sach kahoon toh uske sath chalte huye mujhe itna darr lag raha tha ki main rah rah kar uski aur dekh rahi thi ki kahin mere paas toh nahi aa raha.... Par usne aisa kuchh nahi kiya aur hum dono bhainson ke sath gaanv tak aa gaye..."

"Roshni mein ane ke baad hi maine pahchana ki 'wo' harry tha... Mere kaleje ko itni shanti mili ki meri aankhon se khushi ke aansoo chhalak utthe the... Par usne shayad mujhe meri aawaj se hi pahchan liya tha...

"koun the wo?" Usne poochha....

"Pata nahi.. maine unhe pahchana nahi... ab tum jao.. main chali jaaungi...!" Maine kaha...

"koyi baat nahi.. maine tumhare ghar ki taraf se hota hua nikal jaaunga..." Harry mere sath sath chalta raha tha...

"Kaha na tum jao!" Ghar najdeek aate hi main uss par bhi sher ho gayi..." Pinky ye kahkar hansne lagi....

Main muskurayi..," Fir.. chala gaya bechara?"

"Nahi... pichhe rah gaya tha mere daantne par... par maine ghar aane par dekha tha.. 'wo' mere pichhe pichhe aa raha tha...." Pinky ne baat poori ki.....

"Bechara...!" Main lambi saans lekar boli....,"Tumne usko kyun daanta.. usne toh tumhe bachaya hi tha na...."

"Haan..." Pinky sir hilate huye boli....,"Baad mein mujhe afsos bhi hua tha..aur maine ek din usko iske liye sorry bhi bola tha.... par uss din mein bahut dari huyi thi...."

"Hummm.. fir usne kisi ko nahi batayi ye baat....!" Maine poochha....

"Nahi.. batayi hoti toh apne gaanv ke ladke itne gande hain ki taane maar maar kar hi mera jeena mushkil kar dete... Maine uss'se poochha bhi tha.. usne mana kar diya tha ki kisi ko nahi batayi baat...."

"Sach mein bahut achchha hai fir toh woh..?" Maine kaha....

"Nahi.. itna bhi achchha nahi hai.. mera naam nikal diya tha usne.. 'gulabo!' kahne laga ki ek hi baat hoti hai.. aur 'wo' pyar se bol deta hai... maine usko saaf saaf kah diya.. 'jyada pyar dikhane ki jaroorat nahi hai.. haaaan!' uske baad usne kabhi nahi bola.. he he he.." Pinky ka chehra khil utha....

Pinky ki iss baat par main na toh dhang se hans payi.. aur na hi maine koyi pratikriya hi di.. Mera mann toh ab bhi talab ke uss paar jhadiyon mein atka hua tha.. Kal sham 'Sandeep' ke sath kheli gayi meri pratham 'raasleela' ki jhalkiyan meri aankhon mein wasna ke 'laal dorey' bankar tairne lagi thi aur ab Pinky ki baat ne toh meri jaanghon ke beech ki 'amit' bhookh ko jwalanank tak hi pahuncha diya tha... Maine takiya sirhane lagaya aur late kar kambal audh liya.. Main kalpana karke dekhna chahti thi ki agar jhadiyon mein meri bhains gayi hoti aur nadan Pinky ki jagah 'wahan' main hoti toh aage kya kya hota...!

Par Pinky ne mujhe 2 pal ke liye bhi chain se latne na diya," Aey... kya ho gaya?" Pinky ne mujhe pakad kar hila diya...

"Kuchh nahi.. thodi der latne ka mann kar raha hai..." Maine apne chehre se kambal hatate huye anmana sa jawab diya....

"Ye ladke aise kyun hote hain Anju.. ? Akeli ladki ko dekhte hi bhookhe bhediye kyun ban jate hain.. Hamein iss tarah darakar jabardasti karke kya milta hai inko...?"

Jane anjane hi Pinky ne mera pasandeeda vishay chhed diya tha... Maine turant tirachhi hokar apne 'sir' ko kohni ke sahare tika liya," Sab toh aise nahi hote na.. Harish ne toh tumhare sath kuchh jabardasti nahi ki....!"

"Haan.. sab toh nahi hote.. par jyadatar aise hi hote hain.. Tabhi toh ghar wale ladkiyon ko raat mein bahar jane nahi dete... 'aise' hi kamino ke darr se.. duniya mein 'gande' ladke nahi hone chahiyein the.. fir toh hum bhi der raat tak ghoom fir kar aate.. jahan 'dil' karta wahan khelne jate...! Aise ladkon ki wajah se hi ham ladkiyon ka jeena haram ho gaya hai.." Pinky ladkon ko kosne lagi....

"Sab ek jaise thode hote hain Pagal! kisi ko kisi kaam mein maja aata hai aur kisi ko dusre 'kaam' mein..." Maine jawab diya...

"Kyun? ladki se jabardasti karne mein kaisa maja? ye toh bahut hi ghatiya baat hai na...!" Pinky tunak kar boli....

Mujhe Pinky ki baaton ki disha 'ajeeb' dhang se ghoomti nazar aayi.. mujhe laga jaise wo iss baare mein aur 'baat karna chahti hai.. Main utsahit hokar baith gayi," Haan.. 'wo' toh hai.... par... maine suna hai ki ladkiyon ko bhi baad mein 'maza' aane lagta hai.. kya pata 'wo' ladke yahi soch kar 'ladkiyon' ko chhedne lag jate hon ki baad mein hum apne aap taiyaar ho jayengi..."

"Suna kya hai? tune toh kar bhi liya...." Pinky meri aankhon mein dekhte huye boli aur fir nazron ko jhuka kar dheere se boli,"Tujhe maja aaya tha kya?"

Uski pahli baat sunkar toh main sakpaka hi gayi thi.. par uske poochhe sawaal ne mujhe duvidha mein daal diya.... Main tab tak uske chehre ko ghoorti rahi jab tak ki mere jawab ka intjaar karne ke baad usne meri aankhon mein aankhein nahi dali..,"Bol!"

"Ab kya bataaun? 'haan' bhi aur 'nahi' bhi..." Maine sikka uchhal diya...

"Ye kya baat huyi? dhang se bol na...!" Pinky utsukta se meri aur dekhti huyi boli...

"Sach bataaun?"

"Haan.. Sach hi toh poochh rahi hoon...!" Pinky lagataar meri aankhon mein aankhein daale rahi.. jaise mere chehre ko padhne ki koshish kar rahi ho....

"Haan.. aaya tha...!" Maine seedhe seedhe bol diya....

Mera jawab sunte hi Pinky ki gaalon se lekar uski aankhon tak mein 'lajja' pasar gayi..,"tujhe... sharam nahi aayi kya?"

"Ab ye kyun poochh rahi hai? haan.. bahut aayi thi.. par maja bhi bahut 'aaya' tha.. Sachchi...!" Maine kasmasa kar kaha...

"Par.. 'ye' kaam toh shadi ke baad hi karte hain na... pahle karna toh 'paap' hota hai..." Pinky ne sharmate huye kaha....

Mujhe laga ki Pinky 'iss' maamle mein meri soch se kahin jyada samajhdaar hai...,"Wo alag baat hai... main toh bus 'maje' ki bata rahi hoon... Maja toh aata hi hai.. sach mein..!"

"chal chhod.. hum bhi kaisi baatein karne lag gaye...!" Pinky ko shayad abhi ahsaas hua ki 'hum' kahan se kahan pahunch gaye the....

"achchha ye bata.. tu shadi karegi toh kaise ladke se karegi...!" Main baat jari rakhna chahti thi...

"chhod na.. ye kya lekar baith gayi tu.. abhi toh bahut time hai inn baaton ke liye.." Pinky thoda jhenp kar boli....

"Bata na.. bus ye aakhiri baat...!" Maine jor dekar kaha...

"Ummmmm..." Pinky bolte bolte ruk kar aankhein band karke muskurane lagi.. Uske gore gaalon mein muskurahat ke chalte gaddha sa ban gaya.. 'wo' gaddha'; jo mujhe Pinky ke paas ladkon ke mar mitne ke liye sabse katil cheej lagta tha... Aisa laga jaise uske manas patal par 'koyi' tasveer sakshaat ho gayi ho..,"ummmm.. Harry..... Harry jaisa...!" Usne aankhein band kiye huye hi bola aur fir apne hont jaise 'si' kar muskurati rahi....

"Kya?" Mera rom rom 'uske' dil ka raaj sunkar jhanna utha...,"Tujhe harry se pyar hai..?"

"Chal hat.. besharm!" Pinky ke gaal gulabi se ho gaye aur 'wo' sach mein hi 'gulabo' si lagne lagi..," Maine aisa thode hi kaha hai.. maine sirf 'uss' jaisa kaha hai.. Main kisi se pyar vyar nahi karti...."

"Par matlab toh yahi hua na...!" Maine khilkhila kar usko chhedte huye kaha....

"Kyun..? yahi matlab kaise hua... par Mujhe sach mein aisa hi ladka chahiye 'jo' 'ladki' hone ki maryadaayein jaanta ho... Jo uski bhawnaao ki kadra kar sake.. jisko 'pyar' ka 'asli' matlab pata ho... 'Jo' Ladki ke 'ladki' hone ka faayda uthana na jaanta ho...!" Pinky bhav vibhor hokar boli....

"Par.. harry aisa hi toh hai.. shakal mein bhi kitna 'cute' sa hai.. aur jo tu kah rahi hai.. 'wo' sari' baatein toh usmein hain hi.... hain na?" Maine usko uksane ki sochi...

"Chal hat ab.. bakwaas mat kar mere sath... waise.. Manav aur Meenu ki jodi kaisi lagti hai tujhe...?" Pinky baat ko taalte huye boli....

"Mast hai ek dum...!" Maine dil par patthar rakh kar kaha...," Par tu aisa kyun bol rahi hai.. kuchh baat hai kya inki..?" Maine poochha...

"Pata nahi.. par mujhe lagta hai ki kuchh na kuchh toh jaroor hai....Meenu akeli hote hi mujhe 'Manav' ki baatein kar kar ke bore karne lag jati hai... aur kal Manav ki baaton se bhi mujhe aisa laga....

Tabhi Meenu neeche aa gayi..," Kya baatein ho rahi hain akele akele..!"

"Lambu ki..!" Pinky ne kaha aur hum dono khilkhila kar hans pade...... Meenu ne aakar Pinky ki choti pakad kar kheench li..,"Teri pitayi karni padegi mujhe... ab padhi kyun nahi tum dono.. baad mein kahogi ki main padhne nahi deti.... Papa ne bola hai ki kahin nahi jana... Yahin sona hai teeno ko!"

kramshah......................

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raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:40

बाली उमर की प्यास पार्ट--25

गतान्क से आगे.............

उस दिन मैने खाना भी वहीं खाया और हम तीनो अपनी अपनी किताब खोल कर बैठ गये.. उनका पता नही.. पर मैं सिर्फ़ किताब को खोले बैठी थी.. कुच्छ पढ़ नही रही थी.. वैसे भी अगले दिन संस्कृत का पेपर था और मुझे विश्वास था कि 'वो' पेपर तो 'संदीप' पूरा ही कर देगा.....

अर्रे हां.. मैं 'वो' डॉक्टर वाली बात बताना तो भूल ही गयी थी... जब हम दोनो हॅरी के पास 'वो' गोली लेने गये थे तो मुझे कतयि विश्वास नही था कि हॅरी हमसे इतनी शराफ़त से पेश आएगा.. में समझती थी कि डॉक्टर्स के पास तो इलाज के बहाने कहीं भी हाथ लगाने का लाइसेन्स होता है... और 'उस' गोली के लिए तो मुझे लग रहा था कि हॅरी मेरी सलवार भी खुलवा कर देख सकता है.. दरअसल हॅरी के पास जाने से कुच्छ दिन पहले ही मेरे साथ एक वाक़या हुआ था.....

हुआ यूँ था कि एक दिन स्कूल जाने का दिल ना होने के कारण सुबह सुबह ही मैने पेट-दर्द का बहाना बना लिया और चारपाई में पड़ी रही....

"क्या बात है अंजू? महीना लग गया क्या?" मम्मी ने 11 बजे के आसपास मेरे पास बैठ कर पूचछा..

"नही तो मम्मी... !" मैने कराहते हुए अपने पेट पर हाथ फेरा...

"तो फिर क्या हो गया...? बहुत ज़्यादा दर्द है क्या अभी भी..."

"हां.. ऐंठन सी हो रही है पेट में.. पता नही क्या बात है...?" मैने बुरा सा मुँह बनाकर जवाब दिया...

"तो ऐसा करना... छोटू के आते ही उसको साथ लेकर डॉक्टर के पास चली जाना.. मुझे खेत में देर हो रही है... तेरे पापा भूखे बैठे होंगे सुबह से..!" मम्मी ने कहा ही था की तभी सीढ़ियों से छोटू के आने की आवाज़ सुनाई दी....

"छोटू.. स्कूल से छुट्टी कर ले और अपनी दीदी को लेकर डॉक्टर साहब के पास चला जा... इसका पेट ठीक नही हुआ है.. सुबह से...!" मम्मी ने उसको हिदायत दी...

"छुट्टी का नाम सुनते ही छोटू की भी बाँच्चें खिल गयी..,"चलो.. उठो!"

मैं पहले बताना भूल गयी शायद.. छोटू उस वक़्त पाँचवी में पढ़ता था... मम्मी जा चुकी होती तो मैं उसको टरका भी देती.. पर मजबूरन मुझे खड़ी होकर नीचे उतरना ही पड़ा...

"ये लो चाबी.. और डॉक्टर साहब को अच्छे से बता देना कि कैसा दर्द हो रहा है...."मम्मी ने घर को ताला लगाकर चाबी छोटू को दी और खेत की और चली गयी.. हम अगले 15 मिनिट में गाँव के डॉक्टर की दुकान पर थे.. अनिल चाचा के घर! याद आया ना?

नीचे उनकी दुकान खाली पड़ी थी.. छोटू ने नीचे से आवाज़ दी," चाचा!"

"कौन है..?" चाची बाहर मुंडेर पर आकर बोली और हमें देखते ही उपर चले आने को कहा.. सीढ़ियों से होकर हम उपर चले गये....

अनिल चाचा खाना खा रहे थे... मुझे देखते ही उनकी तबीयत हरी हो गयी..,"क्या हुआ छोटू को, अंजू!"

"मुझे नही चाचा.. अंजू के पेट में दर्द है...!" छोटू तपाक से बोला...

सुनते ही चाचा की आँखें चमक उठी.. उन्होने मुझे उपर से नीचे तक गौर से देखा और बोले...,"ओह्ह्ह.. आजकल " पता नही उन्होने किस बीमारी का नाम लिया..," का बड़ा प्रकोप चल रहा है... चलो नीचे चलो... मैं आता हूँ..." उन्होने कहा और फिर अंदर मुँह करके अपने बेटे को आवाज़ लगाई," अरे प्रिन्स.. देख छोटू आया है.. इसको भी दिखा दे अपने वीडियो गेम्स!"

बस फिर क्या था! वीडियो गेम्स का नाम सुनते ही छोटू तो प्रिन्स के बिना बुलाए ही अंदर घुस गया.. मैने अपने पेट को पकड़े वहीं खड़ी रही...

"चलो..." चाचा ने तुरंत उठकर कुल्ला किया और मेरे साथ नीचे जाने लगे..

"ये रोटिया क्यूँ छ्चोड़ दी... आज 2 ही खाई आपने...!" चाची थाली उठाते हुए बोली...

"बस.. पता नही क्यूँ.. आज भूख नही है..." चाचा ने कहा और मेरे आगे आगे सीढ़ियों से उतरते चले गये...

"हुम्म.. पेट में दर्द हो गया अंजू बेटी?" अनिल चाचा नीचे जाकर अंदर वाले कमरे में अपनी कुर्सी पर बैठ गये और मुझे बोलते हुए इशारे से अपनी ओर बुलाया....

"जी चाचा..." मैं जाकर उनके पास खड़ी हो गयी.. अचानक ही मेरे मंन में 'वो' दिन ताज़ा हो गया जब अनिल चाचा और सुन्दर ने मम्मी का 'इलाज' किया था... उसको याद करते ही मैं थोड़ी सी झेंप सी गयी... बेशक मेरे अंदर 'काम ज्वाला' प्रचंड ही रहती थी.. पर अपनी इस कामग्नी को शांत करने के लिए मेरी अपनी पसंद जवान और कुंवारे लड़के ही थे... कम से कम अनिल चाचा तो मेरी पसंद नही ही थे!

"कब से दर्द है..?" चाचा ने प्यार से मुझसे पूचछा....

"सुबह से ही है चाचा.. जब मैं उठी थी तो पेट में दर्द था..." इस झेंपा झेंपी में मुझे याद ही नही रहा था कि मुझे 'पेट दर्द' भी है.. उनके पूच्छने पर जैसे ही मुझे याद आया.. मैने अपने चेहरे के भाव बदले और अपने पेट पर हाथ रख लिया...

"हूंम्म.. ज़रा कमीज़ उपर करना..!" चाचा ने मेरी आँखों में आँखें डाल कर कहा...

"ज्जई?" मैं अचानक उनकी बात सुनकर हड़बड़ा सी गयी...

"अरे.. इसमें शरमाने वाली क्या बात है.. डॉक्टर से थोड़ा कोई शरमाता है... वैसे भी तुम... मेरी बेटी जैसी हो.. चाचा बोलती हो ना मुझे..?" उन्होने मुस्कुराते हुए प्यार से कहा...

"जी.. चाचा..!" मेरे पास झिझकने लायक कोई कारण नही बचा था.. मैने अपनी कमीज़ का पल्लू पकड़ा और उसको समेट'ते हुए उपर उठा लिया... पर 'वो' जिस लगन से मेरा पेट देखने को लालायित होकर अपने होंटो पर जीभ फेर'ने लगे थे.. मैं अपना कमीज़ अपनी 'नाभि' से उपर नही उठा पाई.. मेरी चेहरे पर झिझक सॉफ झलक रही थी...

मेरा कमणीय और चिकना पेट देखकर चाचा को अपनी लार संभालनी मुश्किल हो गयी... असहाय से होकर 'वो' एक बार नीचे देखते और फिर अपना चेहरा उपर उठाकर मेरी आँखों में झाँकते.. मानो मेरी आँखों में 'रज़ामंदी' तलाश रहे हों... पर मैं ज़्यादा देर उनकी 'लाल लपटें' छ्चोड़ रही आँखों से आँखें मिला कर ना रख सकी.. और अपने आप ही मेरी नज़रें नीचे झुक गयी...

नीचे झुकते ही मेरी नज़र मेरी सलवार के नाडे पर पड़ी.. मैं शरम के मारे सिहर सी गयी.. नाडे का एक फूँगा बाहर लटक रहा था और डॉक्टर चाचा की नज़र वहीं टिकी हुई थी... मेरी सलवार को नाभि से काफ़ी नीचे बाँधने की आदत थी.. जिसकी वजह से मेरी आधी 'पेल्विस बोन्स' और उनके बीचों बीच नाभि से नीचे मेरे 'योनीप्रदेश' के 'ख़ाके' की शुरुआत सॉफ नज़र आ रही थी.. चाचा को इस तरह 'वहाँ' घतूरता देख मेरे बदन का रोम रोम झनझणा उठा..

मैने तुरंत कमीज़ को नीचे किया और कमीज़ के उपर से ही सलवार को नाडे से पकड़ कर उपर खींचा...

"अर्रे.. ये क्या कर रही हो अंजू...उपर उठाओ ना कमीज़.. शरमाओगी तो मैं इलाज कैसे करूँगा.. तुमने अपना पेट तो ढंग से दिखाया ही नही...!" कहने के बाद चाचा ने कमीज़ उठाने के लिए मेरे हाथों की 'पहल' होने तक की प्रतीक्षा नही की... उन्होने खुद ही कमीज़ का छ्होर पकड़ा और मुझे नाभि से भी काफ़ी उपर तक नंग धड़ंग कर दिया... व्याकुलता, शर्म और उत्तेजना के मारे मेरी टांगे काँपने लगी.. जैसे ही नज़रें झुका कर मैने नीचे देखा.. मेरी तो साँसें ही जम गयी... नाडे से पकड़ कर सलवार उपर खींचने का मेरा दाँव उल्टा पड़ गया था... खिचने की वजह से नाडा कुच्छ और ढीला हो गया था और अब मेरी 'योनि' के पेडू पर उगे हुए हल्क सुनहरी रंग के रेशमी 'फुनगे' थोड़े थोड़े मेरी सलवार से बाहर झाँक रहे थे...

"चाच्चा...." जैसे ही चाचा ने अपनी पूरी हथेली मेरे पेट पर रख कर मेरी नाभि को ढका.. मेरा पूरा बदन जल उठा....

"ओह्ह.. यहाँ दर्द है क्या?" चाचा ने मेरी 'आह' को मेरी शारीरिक पीड़ा समझ कर एक बार उपर देखा और फिर से नज़रें झुका कर सलवार और पेट के बीच की खाली दरार से अंदर झाँकने की कोशिश करते हुए उंगलियों से मेरे पेट को यहाँ वहाँ दबा दबा कर देखने लगे.....

चाचा को इलाज के बहाने मेरी योनि का X-रे उतारने की कोशिश करते देख मेरा बुरा हाल हो गया था... उत्तेजना से अभिभूत होकर मैं अपने आप पर काबू पाने की कोशिश करती हुई अपनी जांघों को कभी खोलने और कभी बंद करने लगी..

सिर्फ़ कमीज़ के कपड़े में बिना 'ब्रा' या समीज़ के मेरी चूचियो के दानो को भी मस्ताने का मौका मिल गया और उन्होने भी अकड़ कर खड़े हो 'मेरे' यौवन का झंडा बुलंद करने में कोई कसर ना छ्चोड़ी... जल्द ही बाहर से ही उनकी मक्का के दाने जैसी चौन्च नज़र आने लगी... मैं सिसकती हुई अपनी साँसों को अपने अंदर ही दफ़न करने की कोशिश करती हुई दुआ कर रही थी की चाचा की चेकिंग जल्दी ही समाप्त हो.... पर तब तो सिर्फ़ शुरुआत हुई थी....

"जा.. उपर जाकर तेरी चाची से थोड़ा गरम पानी करवा कर ला.. कहना 'दवाई' तैयार करनी है..." चाचा ने कहकर मुझे छ्चोड़ा तो मैने राहत की साँस ली...

उपर जाते ही मैने चाची को पानी गरम करने को बोला और सीधी बाथरूम में घुस गयी... नाडा खोल कर मैने योनि का जयजा लिया... उत्तेजना से फूल कर तिकोने आकर में कटी हुई पाव रोटी जैसी हो चुकी योनि धीरे धीरे रिस रही थी... मैने बैठकर पेशाब किया और उसस्पर ठंडे पानी के छींटे मारे... तब जाकर मेरी साँसें सामानया हो सकी... खड़ी होकर मैने वहाँ टँगे तौलिए से उसको अच्छि तरह पौंच्छा और 'नाडा' कसकर बाँध कर बाहर निकल आई..

बाहर एक पतीले में पानी तैयार रखा था... मैं उसको उठाकर नीचे चाचा के पास ले आई....

"शाबाश.. यहाँ रख दो.. टेबल पर...!" चाचा अभी भी कमरे के कोने में रखी कुर्सी पर ही बैठे हुए थे...

"कौनसी क्लास में हो गयी अंजू!" चाचा ने पानी को छ्छू कर देखते हुए कहा..

"10 वी में चाचा जी..." पहले की अपेक्षा अब मेरी आवाज़ में आत्मविश्वास सा झलक रहा था...

"तू तो बड़ी जल्दी जवान हो गयी.. अभी तक तो छ्होटी सी थी तू.. अब देख!" चाचा की नज़रों का निशाना मेरे उन्नत उरोज थे... उनका हाथ रह रह कर उनकी जांघों के बीच जा रहा था....

मैं उनकी बात पर कोई प्रतिक्रिया नही दे पाई...

"क्या कर रही थी तेरी चाची..?" चाचा जी ने पूचछा...

"जी.. लेटी हुई थी चाचा जी..!" मैने उनकी आँखों में आँखें डाल कर कहा.. पर उनकी नज़रें अभी भी मेरी चूचियो में ही कहीं अटकी हुई थी...

"इधर आ जा... तू तो ऐसे शर्मा रही है जैसे किसी अजनबी के पास खड़ी है.." चाचा ने कहा और मेरे थोड़ी आगे सरकते ही मेरा हाथ पकड़ कर खींचते हुए मुझे पहले से भी ज़्यादा करीब कर लिया...,"चल.. कमीज़ उपर उठा... शाबाश.. शरमाना नही... अरे.. और उपर करो ना.." कहते हुए चाचा ने खुद ही मेरा कमीज़ इतनी उपर उठा दिया कि उनका हाथ ज़ोर से मेरी चूचियो से टकरा गया.. मैं मस्ती से गन्गना उठी... अब कमीज़ मेरी चूचियो से एक इंच नीचे इकट्ठा हो गया था... शायद मेरी सुडौल छातिया आड़े ना आती तो कमीज़ उनसे भी उपर ही होता...

कमीज़ को इतना उपर उठाने के बाद चाचा ने मेरी आँखों में आँखें डाली.. पर में निशब्द: खड़ी रही.. मैने अपने मॅन की उथल पुथल उनके सामने प्रकट नही होने दी....

थोड़ी देर यूँही इधर उधर की हांकते हुए मेरे पुलकित उरजों का कमीज़ के उपर से रसास्वादन करने के बाद उनकी निगाह नीचे गयी और नीचे देखते ही 'वो' बनावटी गुस्से से झल्ला कर बोले," ओफ्फूह.. ये भी एक कारण है पेट दर्द का.. सलवार को इतनी कसकर क्यूँ बाँधा हुआ है.. इसको ढीला बाँधा करो.. और नीचे.. जहाँ पहले बाँधा हुआ था.. समझी.."

चाचा ने कहा और बला की तेज़ी दिखाते हुए मेरे नाडे की डोर सलवार से बाहर निकाल दी.. मैं बड़ी मुश्किल से उनका हाथ पकड़ पाई.. वरना 'वो' तो उसको पकड़ कर खींचने ही वाले थे..,"चाचा...." मैं कसमसा कर रह गयी..

"इसको खोल कर अभी के अभी ढीला करो..." मेरी आवाज़ में हल्का सा प्रतिरोध जानकर चाचा थोड़े ढीले पड़ गये और उन्होने नाडा छ्चोड़ दिया...

मैं अनमानी सी उनके चेहरे को देखती रह गयी.. 'ना' करने की मुझमें हिम्मत नही थी... सच कहूँ तो इतनी हरकत होने के बाद 'दिल' भी नही था.. 'ना' करने का...

"अरे.. ऐसे क्या देख रही हो... अपने चाचा को खा जाने का इरादा है क्या? खोल कर बांधो इसको...!"

"जी.. चाचा.." मैने कह कर अपना कमीज़ नीचे किया और मुड़ने लगी तो उन्होने मुझे पकड़ लिया..,"देख अंजू.. या तो मुझे चाचा कहना बंद कर दे या फिर ऐसे शरमाना छ्चोड़ दे... तुझे नही पता हम डॉक्टर्स को क्या क्या देखना पड़ता है... फिर तू तो मेरी प्यारी सी बेटी है..." कहकर वो खड़े हुए और मेरे गालों को चूम लिया...

"ठीक है चाचा...!" मैं हड़बड़ा कर बोली....

"ठीक क्या है..! अभी मेरे सामने ही सलवार को खोलो और ढीला करके बांधो.. मैं देखूँगा कि ठीक जगह पर बँधा है या नही..!" चाचा बोलकर वापस कुर्सी पर बैठ गये...

"पर चाचा..." मैं गहरी असमन्झस में थी...

"पर क्या? वो दिन भूल गयी जब मैं तेरी कछि नीचे करके 'यहाँ' इंजेक्षन लगता था..." चाचा ने मेरे गदराए हुए मांसल नितंबों पर थपकी मार कर कहा.. मेरी क्षणिक उत्तेजना अचानक चरम पर जा पहुँची..," तुझे एक बात बताउ?" बोलते हुए चाचा ने मुझे अपनी तरफ घूमकर अपने दोनो हाथ ही मेरे नितंबों पर रख लिए..,"इलाज के लिए तो मुझे तुझसे भी बड़ी लड़कियों को कयि बार पूरी तरह नंगी करना पड़ता है... सोचो.. उन्न पर क्या बीत'ती होगी.. पर इलाज के लिए तो शर्म छ्चोड़नी ही पड़ेगी ना बेटी...?"

"जी.. चाचा जी.." मैने सहमति में सिर हिलाया और अपने नाडे की डोर खींच दी..

"शाबाश.. अब ढीला करके बांधो इसको.." कहते हुए जैसे ही चाचा ने मेरी तरफ हाथ बढ़ाए.. मैं बोल उठी..,"म्मे.. बाँध लूँगी चाचा जी.. ढीला..."

"हां हां.. तुम्ही बांधो.. मैं सिर्फ़ बता रहा हूँ कि कितना ढीला बाँधना है..." चाचा ने कहा और मुझे अपने करीब खींच कर मेरी खुली सलवार के अंदर झाँकने लगे.. जितना जल्दी हो सका मैने अपना 'खुला दरबार' समेट लिया.. पर चाचा मेरी गोरी गदरेली योनि की एक झलक तो ले ही गये... उनकी आँखों की चमक सॉफ बता रही थी... मैं पछ्ता रही थी कि चाचा के पास आने से पहले 'कछि क्यूँ नही पहन कर आई.....

चाचा ने अपना हाथ मेरी कमर में ले जाकर मेरी सलवार समेत थोड़े से नाडे को मुट्ठी में लपेट लिया.. मैं उनके हाथ के अंदर जाने की कल्पना से सिहर उठी थी.. पर गनीमत था कि ऐसा नही हुआ...

"हां.. अब बाँध लो; जितना कसकर तुम्हे बाँधना है...!" चाचा मेरी हालत पर भी मुस्कुरा रहे थे... मैने काँपते हुए हाथों से जितना हो सका कसकर अपनी सलवार को बाँध लिया.. पर मुझे विश्वास था कि चाचा के अपनी मुट्ठी में दबाए हुए नाडे को छ्चोड़ते ही 'सलवार' अपने आप निकल ही जानी है..

"हुम्म.. कमीज़ उपर उठाओ.. जितना मैने उठाया था..." चाचा ने अभी मेरी सलवार को नही छ्चोड़ा था....

मुझे वैसा ही करना पड़ा... मेरी दानो की कसक एक बार फिर नंगेपन को 'नज़दीक' पाकर बढ़ गयी थी.. और 'वो' फिर से सिर उठाकर खड़े हो गये थे... मेरी छातियो से नीचे और नाभि से उपर का चिकना सपाट और गोरा बदन देख कर चाचा पूरी तरह मस्त हो चले थे और उनके दूसरे हाथ की हरकतें उनकी जांघों के बीच बढ़ गयी थी... जैसे ही उन्होने अपना हाथ वहाँ से हटाया.. 'उनके' पाजामे में तना हुआ तंबू मुझे सॉफ दिखाई देने लगा....

शर्म की हद तक शरमाने के बावजूद मुझे मज़ा भी आ रहा था और डर भी लग रहा था... अचानक 'वो' अपने हाथ को मेरे पेट पर ले आए और प्यार से 'उसको सहलाने लगे..,"मैं जगह जगह दबा कर देखूँगा.. ये बताना कि दर्द कहाँ हो रहा है.. और कहाँ नही....!"

मैने कसमसा कर अपनी जांघों को भींच लिया और सहमति में अपना सिर हिलाया.. जैसे जैसे उनका हाथ उपर जाता गया.. मेरे दिल की धड़कन बढ़ती चली गयी और चूचियो में अकड़न सी आनी शुरू हो गयी...,"अया..." मेरे मुँह से निकल ही गया...

"यहाँ दर्द है क्या?" जब मेरी सिसकी निकली तो उनका हाथ कमीज़ के अंदर घुस कर मेरी चूचियो को छ्छू गया था.. भला तब भी मैं अपनी सिसकी निकालने से कैसे रोक पाती...

उन्होने अपना हाथ वापस नही खींचा बुल्की वहीं अपनी उंगलियों को दायें बायें करके मेरी मखमली चूचियो को थिरकने से लगे.. मेरी आँखें बंद हो गयी थी और साँसें 'आहें' बनकर निकल रही थी.. उन्होने एक बार फिर पूचछा,"यहाँ दर्द है क्या अंजू बेटी...!"

"आ.. नही.. चा...चा.. नी.. छे!" मैं पूरी तरह पिघल चुकी थी....

"कितनी नीचे बेटी?" उन्होने अपना हाथ एक तरफ खिसका कर मेरी बाईं चूची को दबाना शुरू कर दिया था.....

"नीचे चाचा.. यहाँ नही...!" मैने अपना हाथ उपर उठा कर कमीज़ के उपर से ही अपनी छाती को अपने कब्ज़े में ले लिया.. नही तो तब तक पूरी छाती को उनका हाथ लपेट चुका होता....

"ठीक है.. नीचे देखते हैं..."कहकर उन्होने अपनी उंगलियाँ कमीज़ से बाहर निकाली और एक बार फिर से 'पतीले में हाथ डूबा कर देखा...,"हां.. अब ठीक हो गया है.. तेरे पेट की थोड़ी सिकाई (वॉरमिंग) कर देता हूँ...." कहकर उन्होने दूसरे हाथ से मेरी कमर में पकड़े हुए नाडे को छ्चोड़ दिया.. और तुरंत ही मेरी सलवार ढीली होकर नीचे खिसक गयी.. भला हो मेरे पहाड़ जैसे ऊँचे उठे हुए नितंबों का.. जिन्होने सलवार को घुटनो तक आने से रोक लिया.... पर इसके बावजूद आगे से मेरी योनि का पेडू लगभग आधा दिखने लगा था.. मेरी योनि का 'चीरा' मुश्किल से एक इंच नीचे ही रह गया होगा...

मैं गन्गना उठी.. पर कुच्छ कर ना सकी.. चाचा एक हाथ से मेरे दोनो हाथ पकड़े हुए थे और ललचाई आँखों से 'पेडू' को निहार रहे थे........

"नही चाचा..." उनकी नीयत भाँप कर मैं काँप उठी...

"ओह्हो.. फिर वही बात..." चाचा ने आगे कुच्छ नही कहा और अपना दूसरा हाथ गरम पानी में डुबो कर मेरी 'योनि' के पास रख दिया.... मुझे अजीब सी गुदगुदी उठी और मैं सिहर गयी.. एक दो बार और ऐसा करते ही पानी की बूँदें छ्होटी छ्होटी धाराओं का रूप धारण कर मेरी सलवार में घुसने लगी और हल्का गरम पानी टॅप टॅप करके मेरी योनि दरार में से रिसने लगा... मेरा बुरा हाल हो गया... अब मुझे यक़ीनन तौर पर दूसरे इलाज की ज़रूरत महसूस होने लगी थी...,"अया... चच्च्चाआअह्ह्ह!"

"आराम मिल रहा है ना...!" चाचा की लपलपाति जीभ और नज़रें अब सीधी मेरी आधी दिखाई देने लगी मेरी योनि की करारी फांकों पर थी.... मुझे अहसास तक नही हुआ कि कब उन्होने अपना दूसरा हाथ वापस पिछे ले जाकर मेरी सलवार को नितंबों से नीचे सरकाना शुरू कर दिया है.. और अब उनकी उंगलिया मेरे नितंबों की दरार में कुच्छ टटोल रही हैं...

और जब अहसास हुआ.. 'और' अहसास लेने की तमन्ना परवान चढ़ चुकी थी... अब मैं अपनी आँखें बंद किए हुए लगातार बिना हिचके सिसकियाँ ले रही थी.. और उन्होने भी अब सिकाई छ्चोड़ कर पिच्छले हाथ की उंगली से मेरे गुदा द्वार को और आगे वाले हाथ की उंगली से मेरे 'मदनमानी (क्लाइटॉरिस) को कुरेदना शुरू कर दिया था.....

मैने सिसकियों की हुंकार सी भरते हुए अपनी एडियो को उपर उठा लिया...

"मज़ा आ रहा है ना अंजू..! आराम मिल रहा है ना...?" चाचा ने उंगली का दबाव मेरी गुदद्वार पर बढ़ाते हुए पूचछा....

"आआहाआँ.. पूरा... मज़ा आआ.. रहा है चाचा... कुच्छ और करिए ना..!" मैने लरजते हुए लबों से कहा...

"वो वाला करूँ.. क्या?" मेरे पागलपन का अहसास होते ही चाचा ने तपाक से मेरी सलवार नितंबों से नीचे खींची और कुर्सी से नीचे बैठ कर मेरे नितंबों को कसकर अपने हाथों में दबोचे मेरी योनि को होंटो में भींच लिया...

"अया.. चाचा... मैं तो मर गयी..." सिसकते हुए मैं उनकी जीभ को अपनी योनि की फांकों में महसूस करने लगी...

"बता ना... 'वोही' इलाज करूँ क्या तेरा भी......! जो तेरी मम्मी का किया था.. तू तो 'पूरा लेने लायक हो गयी है...साली!" चाचा ने जैसे ही बोलने के लिए अपने होन्ट मेरी योनि से दूर किए.. मुझे ऐसा लगा मानो मेरी मछ्लि किसी ने जल से बाहर निकाल कर फैंक दी... मैने तुरंत चाचा के सिर को पकड़ा और वापस उनके होन्ट 'वहीं; चिपका दिए...

पर शायद चाचा को उतनी जल्दी नही थी जितनी मुझे... 'वो' मुझे तड़पति छ्चोड़ कर अलग हट गये..," तू देखती जा मैं तुझे कितने मज़े देता हूँ... आज तेरी चूत का उद्घाटन करूँगा अंजू.. बड़े प्यार से.. देखना कितने मज़े आएँगे.. तेरी मम्मी भी पूरे मज़े से चुदवा रही थी ना....?"

"जल्दी करो ना चाचा.. बीच में क्यूँ छ्चोड़ दिया..." मैं तड़प कर बोली....

"हाँ हाँ.. अभी करता हूँ ना सब कुच्छ...! जा एक बार सलवार पहन कर तेरी चाची को देख कर आ 'वो' क्या कर रही है...? फिर देता हूँ तुझे सारे मज़े...!" चाचा ने अपना लिंग निकाल कर मुझे दिखाया..," याद है ना तुझे सब कुच्छ... इस'से तेरी मम्मी ने कितने मज़े लिए थे.. याद है कि नही...?"

मैने बिना कोई जवाब दिए फटाफट अपनी सलवार पहनी और बाहर निकल गयी.. पर जैसे ही मैं सीढ़ियों में पहुँची.. मेरा दिल धक से रह गया.. चाची नीचे ही आ रही थी... मंन ही मंन भगवान को मैने कितनी बार याद किया मुझे खुद भी याद नही...

"क्या हुआ अंजू? इतनी देर कैसे लगा दी.. अभी तक तुझे दवाई नही दी उन्होने..." चाची को शायद मेरी उड़ी हुई रंगत देख कर शक हो गया होगा.. तभी वो मुझे लगातार घूरती रही....

"म्‍म्मे.. मैं तो घर चली गयी थी चाची.. अभी आई हूँ छोटू को बुलाने..." मैने बोलते हुए अपनी हड़बड़ाहट छिपाने की पूरी कोशिश की.. साथ ही नीचे आते हुए ऊँची आवाज़ में बोला ताकि चाचा भी सुन लें....

नीचे आते ही चाची चाचा पर बरस पड़ी..,"यहाँ क्या कर रहे हो जी.. उपर क्यूँ नही आए?"

"वो.. शांति.. वो मैं अख़बार पढ़ रहा था.. थोडा सा!" चाचा ने मेरी बात सुनकर पहले ही अख़बार उठा लिया था....

"देखो जी.. थोड़ा पढ़ो या ज़्यादा.. खम्ख्वह नीचे मत बैठा करो.. उपर आकर पढ़ लो जो भी पढ़ना है....!"

"ओफ्फो.. बच्चों के आगे तो सोच समझ कर बोल लिया करो... चलो.." कहते हुए चाचा अख़बार से अपने पयज़ामे के उभार को ढके हुए चाची के साथ उपर चढ़ने लगे.... मेरी उपर जाने की हिम्मत नही हुई..," छोटू को भेज दो चाची!" मैने नीचे से ही कहा और हाँफती हुई घर भाग आई....

"आअनहाआँ?" किताब खोले बैठी हुई मैं यादों के भंवर में कुच्छ इस तरह खो गयी थी कि जैसे ही पिंकी ने मेरा कंधा हिलाकर मुझे टोका.. मैं हड़बड़ा सी गयी...,"क्क्या है..?"

"नींद आ गयी क्या?" पिंकी ने पूचछा...

"न.नही तो..! पढ़ रही हूँ...!" मैं जैसे सच में ही नींद से जागी थी...

"अच्च्छा? क्या पढ़ रही है बता तो?" पिंकी ने हंसते हुए कहा...

"ये.." बोलना शुरू करते ही जैसे ही मैने नीचे देखा.. मेरी सिट्टी पिटी गुम हो गयी.. मेरी किताब तो वहाँ थी ही नही..,"क्क्या है ये पिंकी? मेरी किताब क्यूँ उठा ली??" मैने बड़बड़ाते हुए अपनी आँखें मली...

"देखा! सो गयी थी ना? तेरी किताब मीनू दीदी ने उठाकर रखी थी.. 5 मिनिट हो गये..!" पिंकी हंसते हुए बोल रही थी...

"दीदी कहाँ हैं?" मैने मीनू की चारपाई को देख कर पूचछा... 'वो' वहाँ नही थी...

"वो उपर गयी हैं.. कुच्छ काम होगा.. जाकर मुँह धो ले.. अब तो बस दो दिन की बात रह गयी.. फिर मज़े ही मज़े.. बहुत दिन की छुट्टिया होंगी..." पिंकी का चेहरा खिल उठा...

"हूंम्म.. तू क्या करेगी छुट्टियो में..?" मैने पूचछा.. यादों का खुमार दिल से उतर चुका था...

"कुच्छ नही.. मैं तो ऐश करूँगी...हे हे" पिंकी हंसते हुए बोली.. और फिर संजीदा हो गयी,"पर मीनू दीदी कह रही हैं कि कंप्यूटर सीख ले... देखूँगी!"

"कहाँ?" मैने पूचछा...

"शहर में.. दीदी अपने साथ ले जाने को बोल रही हैं...!" पिंकी ने चहकते हुए कहा...

सुनकर मैं मायूस हो गयी... मैने उस दिन देखा था.. शहर के लड़कियाँ कैसे अकेली बैठकर लड़कों के साथ गुटार-गू करती रहती हैं... मेरा भी शहर पढ़ने का बड़ा मंन था.. पर 'पापा' के रहते मेरा ये सपना कभी पूरा नही होने वाला था....

"क्या हुआ?" पिंकी ने मेरे चेहरे की मायूसी को पढ़ लिया था..,"दीदी कह रही हैं कि 'वो' तेरे लिए भी पापा से चाचा को कहलवा देंगी...!"

"पापा नही मानेंगे..! मुझे पता है..!" मैने कहा...

"अच्च्छा! क्यूँ नही मानेंगे.. कंप्यूटर तो बहुत काम की चीज़ है.. आज कल तो सबके लिए ज़रूरी हो गया है 'वो!" पिंकी ने मुझे भरोसा सा दिलाया...

"नही... पर..." मैं बोलकर खामोश हो गयी...

"बता ना! क्या बात है..?"

"पापा नही भेजेंगे.. मुझे पता है.. 'जब 'वो' गाँव के स्कूल में नही भेजते तो शहर कैसे भेज देंगे..!" मैने दुखी मंन से बोला...

"पर तुझे 'वो' स्कूल क्यूँ नही भेजते.. क्या बात हो गयी?" पिंकी आकर मेरे कंबल में घुस गयी...

"ववो.. एक दिन क्लास के किसी लड़के ने मेरे बॅग में 'गंदा' सा खत लिख कर डाल दिया था.. 'वो' पापा को मिल गया.. बस तभी से...!" मैने बोल कर अपनी नज़रें झुका ली...

"हाए राम! तूने 'वो' फाड़ कर क्यूँ नही फैंका देखते ही... एक दिन मेरे बाग में भी मुझे लेटर मिला था... मैने तो थोड़ा सा पढ़ते ही टुकड़े टुकड़े करके फैंक दिया था.....!" पिंकी मुझ पर गुस्सा होते हुए बोली...

"मुझे मिलता तभी तो... 'वो' छोटू के हाथ लग गया और उसने पापा को पकड़ा दिया.... उस दिन.." मैं बोल ही रही थी कि तभी मीनू आ गयी और मेरी आवाज़ धीमी होते होते गायब ही हो गयी....

मीनू ने हमारे पास आकर अपने दोनो हाथ कुल्हों पर टीका लिए,"आख़िर तुम्हारे बीच 'ये' चल क्या रहा है..? मेरे जाते ही तुम दोनो पास आकर ख़ुसर फुसर करने लग जाती हो... क्या चक्कर है ये?"

"कुच्छ नही दीदी.. ववो.. अंजू कह रही है कि उसके पापा उसको शहर नही जाने देंगे... यही बात थी.." पिंकी बोलते हुए थोड़ा हड़बड़ा सी गयी...

"वो बाद की बात है.. मैं देख लूँगी.. अभी तुम्हारे 2 पेपर बाकी हैं.. अलग अलग बैठ कर पढ़ाई कर लो.. मैं उपर जा रही हूँ.. 11 बजे आउन्गि.. कोई सी भी सोती मिली तो देख लेना... ठंडा पानी डाल दूँगी आते ही...!" मीनू ने कहा और अपनी किताब उठा कर जाने लगी...

"हम साथ साथ बैठ कर पढ़ रहे हैं दीदी.. एक दूसरे से 'रूप' और 'धातु' सुनकर देख रहे हैं..."पिंकी की ये बात मीनू ने अनसुनी कर दी और उपर चली गयी....

क्रमशः........................

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gataank se aage.............

Uss din maine khana bhi wahin khaya aur hum teeno apni apni kitab khol kar baith gaye.. Unka pata nahi.. Par main sirf kitab ko khole baithi thi.. kuchh padh nahi rahi thi.. waise bhi agle din sanskrit ka paper tha aur mujhe vishvas tha ki 'wo' paper toh 'Sandeep' poora hi kar dega.....

Arrey haan.. Main 'wo' doctor wali baat batana toh bhool hi gayi thi... Jab hum dono Harry ke paas 'wo' goli lene gaye the toh mujhe katayi vishvas nahi tha ki Harry humse itni sharafat se pesh aayega.. mein samajhti thi ki doctors ke paas toh ilaaj ke bahane kahin bhi hath lagane ka license hota hai... aur 'uss' goli ke liye toh mujhe lag raha tha ki Harry meri salwar bhi khulwa kar dekh sakta hai.. Darasal Harry ke paas jane se kuchh din pahle hi mere sath ek wakya hua tha.....

Hua yun tha ki ek din School jane ka dil na hone ke karan subah subah hi maine pate-dard ka bahana bana liya aur charpayi mein padi rahi....

"Kya baat hai Anju? Mahina lag gaya kya?" Mummy ne 11 baje ke aaspaas mere paas baith kar poochha..

"Nahi toh mummy... !" Maine karahte huye apne pate par hath fera...

"Toh fir kya ho gaya...? Bahut jyada dard hai kya abhi bhi..."

"Haan.. aithan si ho rahi hai pate mein.. pata nahi kya baat hai...?" Maine bura sa munh banakar jawab diya...

"Toh aisa karna... Chhotu ke aate hi usko sath lekar doctor ke paas chali jana.. mujhe khet mein der ho rahi hai... Tere papa bhookhe baithe honge subah se..!" Mummy ne kaha hi tha ki tabhi seedhiyon se chhotu ke aane ki aawaj sunayi di....

"Chhotu.. School se chhutti kar le aur apni didi ko lekar doctor sahab ke paas chala ja... Iska pate theek nahi hua hai.. subah se...!" Mummy ne usko hidayat di...

"Chhutti ka naam sunte hi chhotu ki bhi baanchhein khil gayi..,"Chalo.. utho!"

Main pahle batana bhool gayi shayad.. Chhotu uss waqt paanchvi mein padhta tha... Mummy ja chuki hoti toh main usko tarka bhi deti.. Par majbooran mujhe khadi hokar neeche utarna hi pada...

"Ye lo chabi.. aur doctor sahab ko achchhe se bata dena ki kaisa dard ho raha hai...."Mummy ne ghar ko tala lagakar chabi chhotu ko di aur khet ki aur chali gayi.. Hum agle 15 minute mein gaanv ke doctor ki dukaan par the.. Anil chacha ke ghar! yaad aaya na?

Neeche unki dukaan khali padi thi.. Chhotu ne neeche se aawaj di," Chachaaaaa!"

"Koun hai..?" Chachi bahar munder par aakar boli aur hamein dekhte hi upar chale aane ko kaha.. Seedhiyon se hokar hum upar chale gaye....

Anil chacha khana kha rahe the... Mujhe dekhte hi unki tabiyat hari ho gayi..,"Kya hua chhotu ko, Anju!"

"Mujhe nahi chacha.. Anju ke pate mein dard hai...!" Chhotu tapak se bola...

Sunte hi chacha ki aankhein chamak uthi.. unhone mujhe upar se neeche tak gour se dekha aur bole...,"Ohhh.. aajkal " Pata nahi unhone kis bimari ka naam liya..," ka bada prakop chal raha hai... chalo neeche chalo... main aata hoon..." Unhone kaha aur fir andar munh karke apne bete ko aawaj lagayi," Arey Prince.. dekh chhotu aaya hai.. isko bhi dikha de apne video games!"

Bus fir kya tha! video games ka naam sunte hi chhotu toh Prince ke bina bulaye hi andar ghus gaya.. Maine apne pate ko pakde wahin khadi rahi...

"Chalo..." Chacha ne turant uthkar kulla kiya aur mere sath neeche jane lage..

"Ye rotiya kyun chhod di... aaj 2 hi khayi aapne...!" Chachi thali uthate huye boli...

"Bus.. pata nahi kyun.. aaj bhookh nahi hai..." Chacha ne kaha aur mere aage aage seedhiyon se utarte chale gaye...

"Humm.. pate mein dard ho gaya Anju beti?" Anil chacha neeche jakar andar wale kamre mein apni kursi par baith gaye aur mujhe bolte huye ishare se apni aur bulaya....

"Ji chacha..." Main jakar unke paas khadi ho gayi.. achanak hi mere mann mein 'wo' din taza ho gaya jab Anil chacha aur Sunder ne mummy ka 'ilaaj' kiya tha... Usko yaad karte hi main thodi si jhenp si gayi... Beshak mere andar 'kaam jwala' prachand hi rahti thi.. par apni iss kaamagni ko shant karne ke liye meri apni pasand jawan aur kunware ladke hi the... Kum se kum Anil chacha toh meri pasand nahi hi the!

"Kab se dard hai..?" Chacha ne pyar se mujhse poochha....

"Subah se hi hai chacha.. jab main uthi thi toh pate mein dard tha..." Iss jhenpa jhenpi mein mujhe yaad hi nahi raha tha ki mujhe 'patedard' bhi hai.. Unke poochhne par jaise hi mujhe yaad aaya.. maine apne chehre ke bhav badle aur apne pate par hath rakh liya...

"Hummm.. jara kameej upar karna..!" Chacha ne meri aankhon mein aankhein daal kar kaha...

"jji?" Main achanak unki baat sunkar hadbada si gayi...

"arey.. ismein sharmane wali kya baat hai.. doctor se thoda koyi sharmata hai... waise bhi tum... meri beti jaisi ho.. chacha bolti ho na mujhe..?" Unhone muskurate huye pyar se kaha...

"Ji.. chacha..!" Mere paas jhijhakne layak koyi karan nahi bacha tha.. Maine apni kameej ka pallu pakda aur usko samet'te huye upar utha liya... Par 'wo' jis lagan se mera pate dekhne ko lalayit hokar apne honton par jeebh fer'ne lage the.. main apna kameej apni 'nabhi' se upar nahi utha payi.. meri chehre par jhijhak saaf jhalak rahi thi...

Mera kamneey aur chikna pate dekhkar chacha ko apni laar sambhalni mushkil ho gayi... Asahay se hokar 'wo' ek baar neeche dekhte aur fir apna chehra upar uthakar meri aankhon mein jhaankte.. Mano meri aankhon mein 'rajamandi' talaash rahe hon... par main jyada der unki 'laal lapatein' chhod rahi aankhon se aankhein mila kar na rakh saki.. aur apne aap hi meri najarein neeche jhuk gayi...

Neeche jhukte hi meri najar meri salwar ke naade par padi.. Main sharam ke maare sihar si gayi.. Naade ka ek funga bahar latak raha tha aur doctor chacha ki nazar wahin tiki huyi thi... Meri salwar ko nabhi se kafi neeche baandhne ki aadat thi.. Jiski wajah se meri aadhi 'pelvis bones' aur unke beechon beech nabhi se neeche mere 'yonipradesh' ke 'khake' ki shuruaat saaf nazar aa rahi thi.. Chacha ko iss tarah 'wahan' ghtoorta dekh mere badan ka rom rom jhanjhana utha..

Maine turant kameej ko neeche kiya aur kameej ke upar se hi salwar ko naade se pakad kar upar kheencha...

"Arrey.. ye kya kar rahi ho Anju...upar uthao na kameej.. sharmaaogi toh main ilaaj kaise karoonga.. tumne apna pate toh dhang se dikhaya hi nahi...!" Kahne ke baad chacha ne kameej uthane ke liye mere hathon ki 'pahal' hone tak ki prateeksha nahi ki... Unhone khud hi kameej ka chhor pakda aur mujhe nabhi se bhi kafi upar tak nang dhadang kar diya... Vyakulta, sharm aur uttejana ke maare meri taange kaanpne lagi.. Jaise hi najrein jhuka kar maine neeche dekha.. meri toh saansein hi jam gayi... Naade se pakad kar salwar upar kheenchne ka mera daanv ulta pad gaya tha... Khichne ki wajah se nada kuchh aur dheela ho gaya tha aur ab meri 'yoni' ke pedu par uge huye hulke sunhari rang ke reshami 'funage' thode thode meri salwar se bahar jhank rahe the...

"chachchaaaaah...." Jaise hi chacha ne apni poori hatheli mere pate par rakh kar meri nabhi ko dhaka.. mera poora badan jal utha....

"Ohh.. yahan dard hai kya?" Chacha ne meri 'aah' ko meri sharirik peeda samajh kar ek baar upar dekha aur fir se najrein jhuka kar salwar aur pate ke beech ki khali daraar se andar jhankne ki koshish karte huye ungaliyon se mere pate ko yahan wahan daba daba kar dekhne lage.....

chacha ko ilaaj ke bahane meri yoni ka X-ray utaarne ki koshish karte dekh mera bura haal ho gaya tha... uttejana se abhibhoot hokar main apne aap par kaabu paane ki koshish karti huyi apni jaanghon ko kabhi kholne aur kabhi band karne lagi..

Sirf kameej ke kapde mein bina 'bra' ya sameej ke meri chhatiyon ke daano ko bhi mastaane ka mouka mil gaya aur unhone bhi akad kar khade ho 'mere' youvan ka jhanda buland karne mein koyi kasar na chhodi... Jald hi bahar se hi unki makka ke daane jaisi chounch najar aane lagi... Main sisakti huyi apni saanson ko apne andar hi dafan karne ki koshish karti huyi dua kar rahi thi ki chacha ki cheking jaldi hi samapt ho.... Par tab toh sirf shuruaat huyi thi....

"Ja.. upar jakar teri chachi se thoda garam pani karwa kar la.. kahna 'dawayi' taiyaar karni hai..." Chacha ne kahkar mujhe chhoda toh maine rahat ki saans li...

Upar jate hi maine chachi ko pani garam karne ko bola aur seedhi bathroom mein ghus gayi... Nada khol kar maine yoni ka jayja liya... uttejna se phool kar tikone aakar mein kati huyi paav roti jaisi ho chuki yoni dheere dheere ris rahi thi... Maine baithkar peshab kiya aur usspar thande pani ke chheente maare... tab jakar meri saansein samanya ho saki... Khadi hokar maine wahan tange touliye se usko achchhi tarah pounchha aur 'naada' kaskar baandh kar bahar nikal aayi..

Bahar ek patile mein pani taiyaar rakha tha... Main usko uthakar neeche chacha ke paas le aayi....

"Shabaash.. yahan rakh do.. table par...!" Chacha abhi bhi kamre ke kone mein rakhi kursi par hi baithe huye the...

"Kounsi class mein ho gayi Anju!" Chacha ne pani ko chhoo kar dekhte huye kaha..

"10 vi mein chacha ji..." Pahle ki apeksha ab meri aawaj mein aatmvishvas sa jhalak raha tha...

"Tu toh badi jaldi jawan ho gayi.. abhi tak toh chhoti si thi tu.. ab dekh!" Chacha ki najron ka nishana mere unnat uroj the... Unka hath rah rah kar unki jaanghon ke beech ja raha tha....

Main unki baat par koyi pratikriya nahi de payi...

"Kya kar rahi thi teri chachi..?" chacha ji ne poochha...

"Ji.. leti huyi thi chacha ji..!" Maine unki aankhon mein aankhein daal kar kaha.. par unki najarein abhi bhi meri chhatiyon mein hi kahin atki huyi thi...

"Idhar aa ja... tu toh aise sharma rahi hai jaise kisi ajnabi ke paas khadi hai.." Chacha ne kaha aur mere thodi aage sarakte hi mera hath pakad kar kheenchte huye mujhe pahle se bhi jyada kareeb kar liya...,"Chal.. kameej upar utha... shabaash.. sharmana nahi... arey.. aur upar karo na.." Kahte huye chacha ne khud hi mera kameej itni upar utha diya ki unka hath jor se meri chhatiyon se takra gaya.. Main masti se gangana uthi... Ab kameej meri chhatiyon se ek inch neeche ikattha ho gaya tha... Shayad meri sudoul chhatiyan aade na aati toh kameej unse bhi upar hi hota...

Kameej ko itna upar uthane ke baad chacha ne meri aankhon mein aankhein daali.. par mein nishabd: khadi rahi.. maine apne mann ki uthal puthal unke saamne prakat nahi hone di....

Thodi der yunhi idhar udhar ki haankte huye mere pulkit urojon ka kameej ke upar se rasaswadan karne ke baad unki nigah neeche gayi aur neeche dekhte hi 'wo' banawati gusse se jhalla kar bole," Offooh.. ye bhi ek karan hai pate dard ka.. Salwar ko itni kaskar kyun baandha hua hai.. isko dheela baandha karo.. aur neeche.. jahan pahle baandha hua tha.. Samjhi.."

chacha ne kaha aur bala ki teji dikhate huye mere naade ki dor salwar se bahar nikal di.. Main badi mushkil se unka hath pakad payi.. warna 'wo' toh usko pakad kar kheenchne hi wale the..,"chachaaaa...." Main kasmasa kar rah gayi..

"Isko khol kar abhi ke abhi dheela karo..." Meri aawaj mein hulka sa pratirodh jaankar chacha thode dheele pad gaye aur unhone nada chhod diya...

Main anmani si unke chehre ko dekhti rah gayi.. 'na' karne ki mujhmein himmat nahi thi... sach kahoon toh itni harkat hone ke baad 'dil' bhi nahi tha.. 'na' karne ka...

"Arey.. aise kya dekh rahi ho... apne chacha ko kha jane ka irada hai kya? khol kar baandho isko...!"

"Ji.. chacha.." Maine kah kar apna kameej neeche kiya aur mudne lagi toh unhone mujhe pakad liya..,"Dekh Anju.. ya toh mujhe chacha kahna band kar de ya fir aise sharmana chhod de... Tujhe nahi pata hum doctors ko kya kya dekhna padta hai... fir tu toh meri pyari si beti hai..." Kahkar wo khade huye aur mere gaalon ko choom liya...

"Theek hai chacha...!" Main hadbada kar boli....

"theek kya hai..! abhi mere saamne hi salwaar ko kholo aur dheela karke baandho.. main dekhoonga ki theek jagah par bandha hai ya nahi..!" Chacha bolkar wapas kursi par baith gaye...

"Par chacha..." Main gahri asamanjhas mein thi...

"Par kya? wo din bhool gayi jab main teri kachchhi neeche karke 'yahan' injection lagata tha..." Chacha ne mere gadraye huye maansal nitambon par thapki maar kar kaha.. Meri kshanik uttejna achanak charam par ja pahunchi..," Tujhe ek baat bataaun?" Bolte huye chacha ne mujhe apni taraf ghumakar apne dono hath hi mere nitambon par rakh liye..,"Ilaaj ke liye toh mujhe tujhse bhi badi ladkiyon ko kayi baar poori tarah nangi karna padta hai... Socho.. unn par kya beet'ti hogi.. par ilaaj ke liye toh sharm chhodni hi padegi na beti...?"

"Ji.. chacha ji.." Maine sahmati mein sir hilaya aur apne naade ki dor kheench di..

"shaabash.. ab dheela karke baandho isko.." Kahte huye jaise hi chacha ne meri taraf hath badhaye.. main bol uthi..,"mmain.. baandh loongi chacha ji.. dheela..."

"haan haan.. tumhi baandho.. Main sirf bata raha hoon ki kitna dheela baandhna hai..." Chacha ne kaha aur mujhe apne kareeb kheench kar meri khuli salwar ke andar jhankne lage.. Jitna jaldi ho saka maine apna 'khula darbaar' samet liya.. par chacha meri gouri gadreli yoni ki ek jhalak toh le hi gaye... Unki aankhon ki chamak saaf bata rahi thi... main pachhta rahi thi ki chacha ke paas aane se pahle 'kachchhi kyun nahi pahan kar aayi.....

chacha ne apna hath meri kamar mein le jakar meri salwar samet thode se naade ko mutthi mein lapet liya.. Main unke hath ke andar jane ki kalpana se sihar uthi thi.. par ganimat tha ki aisa nahi hua...

"Haan.. ab baandh lo; jitna kaskar tumhe baandhna hai...!" Chacha meri halat par bhi muskura rahe the... Maine kaanpte huye hathon se jitna ho saka kaskar apni salwar ko baandh liya.. par mujhe vishvas tha ki chacha ke apni mutthi mein dabaye huye naade ko chhodte hi 'salwar' apne aap nikal hi jani hai..

"Humm.. kameej upar uthao.. jitna maine uthaya tha..." Chacha ne abhi meri salwar ko nahi chhoda tha....

Mujhe waisa hi karna pada... meri daano ki kasak ek baar fir nangepan ko 'najdeek' pakar badh gayi thi.. aur 'wo' fir se sir uthakar khade ho gaye the... Meri chhatiyon se neeche aur nabhi se upar ka chikna sapat aur gora badan dekh kar chacha poori tarah mast ho chale the aur unke dusre hath ki harkatein unki jaanghon ke beech badh gayi thi... Jaise hi unhone apna hath wahan se hataya.. 'unke' pajame mein tana hua tambu mujhe saaf dikhayi dene laga....

Sharm ki had tak sharmane ke baawjood mujhe maja bhi aa raha tha aur darr bhi lag raha tha... Achanak 'wo' apne hath ko mere pate par le aaye aur pyar se 'usko sahlane lage..,"Main jagah jagah daba kar dekhoonga.. ye batana ki dard kahan ho raha hai.. aur kahan nahi....!"

Maine kasmasa kar apni jaanghon ko bheench liya aur sahmati mein apna sir hilaya.. jaise jaise unka hath upar jata gaya.. mere dil ki dhadkan badhti chali gayi aur chhatiyon mein akdan si aani shuru ho gayi...,"aaah..." Mere munh se nikal hi gaya...

"Yahan dard hai kya?" Jab meri siski nikli toh unka hath kameej ke andar ghus kar meri chhatiyon ko chhoo gaya tha.. bhala tab bhi main apni siski nikalne se kaise rok pati...

unhone apna hath wapas nahi kheencha bulki wahin apni ungaliyon ko dayein bayein karke meri makhmali chhatiyon ko thirkane se lage.. meri aankhein band ho gayi thi aur saansein 'aahein' bankar nikal rahi thi.. unhone ek baar fir poochha,"Yahan dard hai kya anju beti...!"

"aah.. nahi.. cha...cha.. nee.. che!" Main poori tarah pighal chuki thi....

"Kitni neeche beti?" Unhone apna hath ek taraf khiska kar meri bayin chhati ko dabana shuru kar diya tha.....

"Neeche chacha.. yahan nahi...!" Maine apna hath upar utha kar kameej ke upar se hi apni chhati ko apne kabje mein le liya.. nahi toh tab tak poori chhati ko unka hath lapet chuka hota....

"theek hai.. neeche dekhte hain..."Kahkar unhone apni ungaliyan kameej se bahar nikali aur ek baar fir se 'patile mein hath duba kar dekha...,"Haan.. ab theek ho gaya hai.. tere pate ki thodi sikayi (warming) kar deta hoon...." Kahkar unhone dusre hath se meri kamar mein pakde huye naade ko chhod diya.. aur turant hi meri salwar dheeli hokar neeche khisak gayi.. bhala ho mere pahad jaise oonche uthe huye nitambon ka.. jinhone salwar ko ghutno tak aane se rok liya.... par iske baawjood aage se meri yoni ka pedu lagbhag aadha dikhne laga tha.. Meri yoni ka 'cheera' mushkil se ek inch neeche hi rah gaya hoga...

Main gangana uthi.. par kuchh kar na saki.. chacha ek hath se mere dono hath pakde huye the aur lalchayi aankhon se 'pedu' ko nihar rahe the........

"Nahi chacha..." Unki neeyat bhanp kar main kaanp uthi...

"Ohho.. fir wahi baat..." chacha ne aage kuchh nahi kaha aur apna dusra hath garam pani mein dubo kar meri 'yoni' ke paas rakh diya.... Mujhe ajeeb si gudgudi uthi aur main sihar gayi.. Ek do baar aur aisa karte hi pani ki boondein chhoti chhoti dharaaon ka roop dharan kar meri salwar mein ghusne lagi aur hulka garam pani tap tap karke meri yoni daraar mein se risne laga... Mera bura haal ho gaya... Ab mujhe yakeenan tour par doosre ilaaj ki jaroorat mahsoos hone lagi thi...,"aaah... chachchchaaaaahhh!"

"aaram mil raha hai na...!" Chacha ki laplapati jeebh aur najarein ab seedhi meri aadhi dikhayi dene lagi meri yoni ki karari faankon par thi.... Mujhe ahsaas tak nahi hua ki kab unhone apna dusra hath wapas pichhe le jakar meri salwar ko nitambon se neeche sarkana shuru kar diya hai.. aur ab unki ungaliya mere nitambon ki daraar mein kuchh tatol rahi hain...

Aur jab ahsaas hua.. 'aur' ahsaas lene ki tamanna parwaan chadh chuki thi... ab main apni aankhein band kiye huye lagataar bina hichke siskiyan le rahi thi.. aur unhone bhi ab sikayi chhod kar pichhle hath ki ungali se mere guda dwar ko aur aage wale hath ki ungali se mere 'madanmani (clitoris) ko kuredna shuru kar diya tha.....

Maine siskiyon ki hunkaar si bharte huye apni aediyon ko upar utha liya...

"Maja aa raha hai na Anju..! aaram mil raha hai na...?" Chacha ne ungali ka dabav meri gudadwar par badhate huye poochha....

"aaahaaan.. poora... maja aaaa.. raha hai chacha... kuchh aur kariye na..!" Maine larajte huye labon se kaha...

"Wo wala karoon.. kya?" Mere pagalpan ka ahsaas hote hi chacha ne tapak se meri salwar nitambon se neeche kheenchi aur kursi se neeche baith kar mere nitambon ko kaskar apne hathon mein daboche meri yoni ko honton mein bheench liya...

"aaah.. chacha... main toh mar gayi..." Sisakte huye main unki jeebh ko apni yoni ki faankon mein mahsoos karne lagi...

"Bata na... 'wohi' ilaaj karoon kya tera bhi......! jo teri mummy ka kiya tha.. tu toh 'poora lene layak ho gayi hai...sali!" Chacha ne jaise hi bolne ke liye apne hont meri yoni se door kiye.. mujhe aisa laga mano meri machhli kisi ne jal se bahar nikal kar faink di... Maine turant chacha ke sir ko pakda aur wapas unke hont 'wahin; chipka diye...

Par shayad chacha ko utni jaldi nahi thi jitni mujhe... 'wo' mujhe tadapti chhod kar alag hat gaye..," tu dekhti ja main tujhe kitne maje deta hoon... aaj teri choot ka udghatan karoonga Anju.. bade pyar se.. dekhna kitne maje aayenge.. teri mummy bhi poore maje se chudwa rahi thi na....?"

"Jaldi karo na chacha.. beech mein kyun chhod diya..." Main tadap kar boli....

"Haan haan.. abhi karta hoon na sab kuchh...! ja ek baar salwar pahan kar teri chachi ko dekh kar aa 'wo' kya kar rahi hai...? Fir deta hoon tujhe sare maje...!" Chacha ne apna ling nikal kar mujhe dikhaya..," yaad hai na tujhe sab kuchh... iss'se teri mummy ne kitne maje liye the.. yaad hai ki nahi...?"

Maine bina koyi jawab diye fatafat apni salwar pahni aur bahar nikal gayi.. par jaise hi main seedhiyon mein pahunchi.. mera dil dhak se rah gaya.. chachi neeche hi aa rahi thi... Mann hi mann bhagwan ko maine kitni baar yaad kiya mujhe khud bhi yaad nahi...

"Kya hua Anju? itni der kaise laga di.. abhi tak tujhe dawayi nahi di unhone..." Chachi ko shayad meri udi huyi rangat dekh kar shak ho gaya hoga.. tabhi wo mujhe lagataar ghoorti rahi....

"mmmain.. main toh ghar chali gayi thi chachi.. abhi aayi hoon Chhotu ko bulane..." Maine bolte huye apni hadbadahat chhipane ki poori koshish ki.. sath hi neeche aate huye oonchi aawaj mein bola taki chacha bhi sun lein....

Neeche aate hi chachi chacha par baras padi..,"Yahan kya kar rahe ho ji.. upar kyun nahi aaye?"

"Wo.. Shanti.. wo main akhbaar padh raha tha.. thoda sa!" Chacha ne meri baat sunkar pahle hi akhbaar utha liya tha....

"Dekho ji.. thoda padho ya jyada.. khamkhwah neeche mat baitha karo.. upar aakar padh lo jo bhi padhna hai....!"

"Offoh.. bachchon ke aage toh soch samajh kar bol liya karo... chalo.." Kahte huye chacha akhbaar se apne payjaame ke ubhar ko dhake huye chachi ke sath upar chadhne lage.... Meri upar jane ki himmat nahi huyi..," Chhotu ko bhej do chachi!" Maine neeche se hi kaha aur haanfti huyi ghar bhag aayi....

"aaanhaaan?" Kitab khole baithi huyi main yaadon ke bhanwar mein kuchh iss tarah kho gayi thi ki jaise hi Pinky ne mera kandha hilakar mujhe toka.. main hadbada si gayi...,"kkya hai..?"

"Neend aa gayi kya?" Pinky ne poochha...

"n.nahi toh..! padh rahi hoon...!" Main jaise sach mein hi neend se jagi thi...

"Achchha? kya padh rahi hai bata toh?" Pinky ne hanste huye kaha...

"Ye.." Bolna shuru karte hi jaise hi maine neeche dekha.. meri sitti pitti gum ho gayi.. Meri kitab toh wahan thi hi nahi..,"Kkya hai ye Pinky? Meri kitab kyun utha li??" Maine badbadate huye apni aankhein mali...

"Dekha! so gayi thi na? Teri kitab Meenu didi ne uthakar rakhi thi.. 5 minute ho gaye..!" Pinky hanste huye bol rahi thi...

"didi kahan hain?" Maine Meenu ki charpayi ko dekh kar poochha... 'wo' wahan nahi thi...

"Wo upar gayi hain.. kuchh kaam hoga.. jakar munh dho le.. ab toh bus do din ki baat rah gayi.. Fir maje hi maje.. bahut din ki chhuttiyan hongi..." Pinky ka chehra khil utha...

"Hummm.. tu kya karegi chhuttiyon mein..?" Maine poochha.. yaadon ka khumar dil se utar chuka tha...

"Kuchh nahi.. main toh aish karoongi...he he" Pinky hanste huye boli.. aur fir sanjeeda ho gayi,"Par Meenu didi kah rahi hain ki computer seekh le... dekhoongi!"

"Kahan?" Maine poochha...

"Shahar mein.. didi apne sath le jane ko bol rahi hain...!" Pinky ne chahakte huye kaha...

Sunkar main mayoos ho gayi... Maine uss din dekha tha.. Shahar ke ladkiyan kaise akeli baithkar ladkon ke sath gutar-goo karti rahti hain... mera bhi shahar padhne ka bada mann tha.. par 'papa' ke rahte mera ye sapna kabhi poora nahi hone wala tha....

"Kya hua?" Pinky ne mere chehre ki mayoosi ko padh liya tha..,"Didi kah rahi hain ki 'wo' tere liye bhi papa se chacha ko kahalwa dengi...!"

"Papa nahi maanenge..! mujhe pata hai..!" Maine kaha...

"achchha! kyun nahi maanenge.. computer toh bahut kaam ki cheej hai.. aaj kal toh sabke liye jaroori ho gaya hai 'wo!" Pinky ne mujhe bharosa sa dilaya...

"Nahi... par..." Main bolkar khamosh ho gayi...

"Bata na! kya baat hai..?"

"Papa nahi bhejenge.. mujhe pata hai.. 'jab 'wo' gaanv ke school mein nahi bhejte toh shahar kaise bhej denge..!" Maine dukhi mann se bola...

"Par tujhe 'wo' school kyun nahi bhejte.. kya baat ho gayi?" Pinky aakar mere kambal mein ghus gayi...

"wwo.. Ek din class ke kisi ladke ne mere bag mein 'ganda' sa khat likh kar daal diya tha.. 'wo' papa ko mil gaya.. bus tabhi se...!" Maine bol kar apni najrein jhuka li...

"Haye Raam! tune 'wo' faad kar kyun nahi fainka dekhte hi... ek din mere bag mein bhi mujhe letter mila tha... maine toh thoda sa padhte hi tukde tukde karke faink diya tha.....!" Pinky mujh par gussa hote huye boli...

"Mujhe milta tabhi toh... 'wo' chhotu ke hath lag gaya aur usne papa ko pakda diya.... uss din.." Main bol hi rahi thi ki tabhi Meenu aa gayi aur meri aawaj dheemi hote hote gayab hi ho gayi....

Meenu ne hamare paas aakar apne dono hath kulhon par tika liye,"aakhir tumhare beech 'ye' chal kya raha hai..? mere jate hi tum dono paas aakar khusar phusar karne lag jati ho... kya chakkar hai ye?"

"Kuchh nahi didi.. wwo.. Anju kah rahi hai ki uske papa usko shahar nahi jane denge... yahi baat thi.." Pinky bolte huye thoda hadbada si gayi...

"Wo baad ki baat hai.. main dekh loongi.. abhi tumhare 2 paper baki hain.. alag alag baith kar padhayi kar lo.. Main upar ja rahi hoon.. 11 baje aaungi.. koyi si bhi soti mili toh dekh lena... thanda pani daal dungi aate hi...!" Meenu ne kaha aur apni kitab utha kar jane lagi...

"Hum sath sath baith kar padh rahe hain didi.. ek dusre se 'roop' aur 'dhatu' sunkar dekh rahe hain..."Pinky ki ye baat Meenu ne ansuni kar di aur upar chali gayi....

kramshah......................

...


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:41

बाली उमर की प्यास पार्ट--26

गतान्क से आगे.............

जाने उस रात पिंकी के मॅन में कैसी उधेड़बुन चल रही थी.. करीब 10 मिनिट तक खामोशी से किताब में नज़रें गड़ाए रहने के बाद अचानक वा बोल पड़ी..,"अंजू!"

"हाँ?" मैने उसकी आँखों में देख कहा..

"वो... ऐसा क्या लिखा था लेटर में जो चाचा ने तेरा स्कूल ही च्छुड़वा दिया?"

मैं आस्चर्य से उसकी आँखों में आँखें डाले उसके मंन की इस अधीरता का कारण समझने की कोशिश करती रही.. आज से पहले तो पिंकी ने कभी इन्न बातों में इतनी रूचि नही ली जितनी 'वो' आज ले रही है.. मैं कुच्छ बोलने ही वाली थी कि उसने 'टोक' दिया,"कोई.. ऐसी वैसी बात हो तो मत बताना..!"

"हां.. बहुत गंदी बातें लिखी हुई थी.. इसीलिए तो मैने तुझे नही बताया था.. वरना 'तो' मैं पहले ही बता देती..." मैने सॉफ सॉफ कहा...

"ओह्ह!" कहने के बाद पिंकी ने एक लंबी सी साँस ली..,"जाने इन लड़कों को क्या मज़ा मिलता है.. ऐसी हरकतें करने में.. जितना नज़रअंदाज करो; उतना ही सिर पर चढ़ने की कोशिश करते हैं...!" कहकर पिंकी ने अजीब से ढंग से अपना मुँह पिचकाया..

"क्यूँ..? आजकल में फिर कुच्छ ऐसा हुआ क्या?" मैने पूचछा...

"नही.. बस 'वो'.... कल तुझे संदीप के पास देखा ना... तभी से दिमाग़ सा खराब है... कुच्छ तो सोचना चाहिए ना.. लड़कों को.. आख़िर हमारी 'इज़्ज़त' ही हमारा हथियार होती है..! और तुझ पर भी मुझे हैरत होती है.. तू फटक से अलमारी में जाकर छिप गयी.. मुझे ऐसा लगता है कि तुम.. अपनी मर्ज़ी से ही उसके पास... है ना?" पिंकी ने झिझकते हुए पूचछा...

कुच्छ देर मैं सोचती रही कि क्या कहूँ और क्या नही.. फिर मैने अपने दिल पर पत्थर रख कर बोल ही दिया..," सच कहूँ तो..."मैने बोलना बंद करके उसकी आँखों में झाँका.. वह 'सच' सुन'ने को बेचैन सी लग रही थी," बोल ना! तुम्हारी कसम कुच्छ नही कहूँगी किसी को!"

"मुझसे नाराज़ भी नही होएगी ना?" मैने पूचछा...

"नही ना यार! तू बता ना सब सच सच!" पिंकी कसमसा कर बोल उठी...

"ववो.. पहले तो 'वो' ज़बरदस्ती ही कर रहा था.. पर बाद में मुझे थोड़ा थोड़ा अच्च्छा भी लगने लगा था..." मैने जवाब दिया...

"क्या?" पिंकी बेचैन सी हो उठी थी....

"वही.. जो 'वह' कर रहा था.. उसमें से 'कुच्छ कुच्छ'!" मैने अब की बार भी पर्दे की बातें 'पर्दे' में ही रहने दी...

कुच्छ देर पिंकी अजीब से ढंग से दायें बायें देखती रही.. उसके चेहरे के भावों से मुझे सॉफ सॉफ पता चल रहा था कि 'पिंकी' 'उस बात' को भुला नही पा रही है... पर शायद 'वह' समझ नही पा रही थी कि 'शर्मीलेपान' और 'शराफ़त' का चोला उतारे बगैर कैसे 'कुच्छ कुच्छ' का मतलब पूच्छे...

"तुझे सच में 'उसकी' बातें अच्छि लग रही क्या? या तू मुझे बना रही है..?" पिंकी ने अजीब सी प्यासी नज़रों से मुझे देखते हुए कहा...

"बता तो रही हूँ.. 'कुच्छ कुच्छ' बातें अच्छि भी लग रही थी...!" मैने दोहराया...

"क्या?" पिंकी ने अपने दाँतों से अनामिका का नाख़ून चबाते हुए मेरी आँखों में देखा...

"क्या 'क्या?" मैं उसका मन्तव्य समझने के बावजूद 'अंजान' बनी रही...

थोड़ी देर की चुप्पी के बाद पिंकी ने एक लंबी साँस के सहारे अपनी बेकरारी जता ही दी..,"क्या क्या अच्च्छा लग रहा था.. बता ना प्लीज़?"

"ओह्ह.. अच्च्छा..." मैने कहा और फिर नज़रें झुका कर बोली..,"खुल कर कैसे बताउ? मुझे शर्म आ रही है..."

पिंकी ने थोड़ा आगे सरक कर अपने घुटने मेरे घुटने से मिला दिए..,"बता ना! मैं तो लड़की हूँ.. मुझसे कैसी शर्म?"

"हां.. लड़की तो तू है.. पर बड़ी ख़तरनाक लड़की है.."मैं कहने के बाद उसकी और देख कर हँसी," मेरे मुँह से कोई ऐसी वैसी बात निकल गयी तो मुझे पता है तू कैसी शकल बना लेगी... कल मुझसे बात करने से भी मना कर दिया था तूने..!"

पिंकी असहाय सी होकर मुझे देखती रही... फिर अचकचा कर बोली..,"कहा ना कुच्छ नही बोलूँगी.. किसी बात का बुरा नही मानूँगी...?"

"पर तू पूच्छना क्यूँ चाहती है..?" मैने सवाल करके उसको उलझन में डाल दिया...

"ठीक है.. नही बताना तो मत बता.. आज के बाद मेरे से बात मत करना!" पिंकी भड़क कर उठने लगी तो मैने उसका हाथ पकड़ लिया..,"बता तो रही हूँ.. रुक तो सही...!"

"ठीक है.. जल्दी बता.. फिर मीनू दीदी आ जाएगी..." पिंकी खुश होकर वापस बैठ गयी....

"वो.... उसने जब मुझे हाथ लगाया था तो पता नही क्या हो गया था.. पर बहुत अच्च्छा लगा था मुझे... शुरू में मैने बहुत मना किया पर 'उसकी' हरकतें मुझे अच्छि भी लग रही थी.. 'पता नही..' पर संदीप के हाथ लगने से मेरे शरीर में गुदगुदी सी होने लगी थी.. इसीलिए 'उसके' छ्चोड़ने के बाद भी मैं वहाँ से भाग नही पाई...!" मैने कहा...

"कहाँ...?" पिंकी ने थोडा हिचकने के बाद खुद ही 'अपना' सवाल खोल कर पूच्छ लिया..,".. मतलब... कहाँ हाथ लगाया था.. संदीप ने?"

"शुरू में तो 'बस' हाथ ही पकड़ा था...!" मैने कहा...

"फिर?"

"फिर.. फिर उसने ज़बरदस्ती करके मुझे अपनी 'गोद' में बैठा लिया.. और 'यहाँ वहाँ' छ्छूना शुरू कर दिया..!" मैं धीरे धीरे आगे बढ़ रही थी...

इतना सुन'ने भर से ही पिंकी की आँखें शर्म से झुक गयी... उसके गालों की रंगत बदलने लगी थी..,"हाए राम.. तुझे शरम नही आई.. लड़के की गोद में बैठते हुए...!"

"आई थी.. पर तू 'शर्म' के बारे में पूच्छ रही है या 'मज़े' के बारे में..?" मैं खिन्न होकर बोली...

"अच्च्छा रहने दे.. मत बता.." पिंकी ने कहा और अगले ही पल बेचैनी के लबादे से लदे उसके लब थिरक उठे..,"अच्च्छा.. चल बता.... 'और' क्या हुआ..? ......कहाँ कहाँ हाथ लगाया था उसने?"

"अब सारी बात खोल कर बताउ क्या?" मैं झिझक कर बोली.. पर मैं उसके मुँह से 'हाँ' सुन'ना चाहती थी...

"नही.. खोल कर मत बता चाहे.. पर समझा तो सकती है ना!" पिंकी उत्सुकता से मेरी ओर देखने लगी....

"अम्म्म... गोद में बैठकर वह 'इनको' दबाने लगा था...." कहने के बाद मैने अपना हाथ अचानक आगे करके आकर में मेरी चूचियो से आधे उसके एक 'उरोज' को पकड़ लिया..

"आहह.. " पिंकी हड़बड़ा कर उच्छल पड़ी..,"क्या कर रही है बेशर्म? गुदगुदी हुई बड़े ज़ोर की..."

"मैं तो बस बता रही हूँ... मेरे हाथ से तो 'बस' गुदगुदी हुई है... पर अगर कोई लड़का इनको पकड़ेगा तो तुझे पता चलेगा.. असलियत में क्या होता है.. आँखें बंद होनी शुरू हो जाती हैं.. शरीर में भूचाल सा आ जाता है... खुद पर काबू नही रह पता... सच पिंकी.. बहुत मज़ा आता है..!" मैं 'संदीप' के साथ बिताए पल याद करते ही मस्ती से झनझणा उठी और जाने क्या क्या बोलने लगी..

"कोई लड़का नही पागल..."पिंकी ने कहा और फिर अपने आप में ही शर्मा कर संकुचित सी हो गयी..,"सिर्फ़ मेरा 'हज़्बेंड'! उसके अलावा किसी लड़के को मैं इन्हे छ्छूने नही दूँगी..." कहते हुए पिंकी के 'होन्ट' रस से तर हो गये...

"मतलब हरीश...!" मैने शरारत भरे लहजे में कहा...

"मैं तेरा सिर फोड़ दूँगी अगर ऐसे 'किसी' का नाम लिया तो... 'उस'से' मुझे क्या मतलब..?" पिंकी ने बोलते हुए अपने चेहरे पर 'गुस्सा' लाने की भरसक कोशिश की.. पर क्या मज़ाल जो 'लज्जा' की चादर को तनिक भी खिसका पाई हो...,"अच्च्छा.. छ्चोड़.. और बता ना!"

"और क्या बताउ..? फिर तो बस 'वह' आगे बढ़ता गया और में 'मज़े' से पागल हो उठी... पर मैं बता नही सकती कि कितना मज़ा आया था.. 'वो' तो करके देखने पर ही पता चलता है....!"

"उसने तुझे हर जगह हाथ लगाया था क्या?" पिंकी कसमसा कर बोली...

"और कैसे बताउ अब? बोल तो दिया.. उसके बाद तो जो उसका दिल किया था.. 'वो' सब किया था उसने...!"

"अच्च्छा ठीक है.. बस एक बात और पूछ लूँ..?" पिंकी अधीर हो कर बोली...

"हां.. पूच्छ..!"

"दोबारा 'वो' सब करने का मन करता है...?" पिंकी अजीब सी नज़रों से मुझे घूरती हुई बोली...

"शायद मीनू आ रही है...!" सीढ़ियों में उतरते कदमों की आहट सुनकर मेरे कान खड़े हो गये... "छ्चोड़.. बाद में बात करेंगे..." मैने कहा और हम दोनो ही बोल बोल कर पढ़ने लगे....

मीनू नीचे आई तो उसने अपने सिर पर 'चुननी' बाँधी हुई थी... वह आते ही अपनी चारपाई में लेट गयी..,"मेरे सिर में दर्द है.. थोड़ा आराम से पढ़ लो..." उसने कहा और चारपाई में घुस कर करवट ले ली...

"चल हम भी सोते हैं अब... काफ़ी रात हो गयी.. सुबह उठना भी है...!" मैने किताब बंद करके रखते हुए कहा...

"नही.. मैं अभी थोड़ी देर और पढ़ूंगी...!" पिंकी ने कहा..

"ठीक है.."मैं रज़ाई में घुसती हुई बोली..,"अपनी चार पाई पर जाकर पढ़ ले..."

"आए.. यहीं बैठ कर पढ़ने दे ना.. मेरा कंबल तो ठंडा हो गया होगा..!" पिंकी ने याचना सी करते हुए कहा...

"कोई बात नही.. पढ़ ले...!" मैने मुस्कुरकर कहा और अपना चेहरा धक लिया...

रज़ाई में दुब्के हुए आधा घंटा होने पर भी मेरी आँखों में नींद नही थी.. अनिल चाचा की 'उस' दिन की हरकतें याद करके मेरी कामुक चाहतों ने अंगड़ाई लेना शुरू कर दिया था... 2 दिन पहले संदीप ने मुझे जो 'स्वर्णिम नज़ारे' दिखाए थे.. उनकी एक और झलक पाने की आरज़ू में मेरी जांघों के बीच 'बार बार' असहनीय 'फदाक' मुझे सोने नही दे रही थी... जाने अंजाने रज़ाई में घुसते ही मेरा हाथ अपने आप ही मेरी सलवार में घुस चुका था... पर लिंग्सुख भोग कर 'फूल' बन चुकी मेरी 'योनि' को अब उंगली के 'छलावे' से बहकना मुमकिन नही था.. अब तो उसको 'मर्द' ही चाहिए था.. दोबारा बरसने के लिए; कहीं से भी!..

अचानक पिंकी का हाथ पढ़ते हुए ग़लती से मेरी जाँघ पर टिक गया और मेरा सारा बदन झंझनाहट से गड़गड़ा गया... आलथी पालती मार कर पढ़ रही पिंकी की एक जाँघ मेरे घुटने से सटी हुई थी... वह अपनी जांघों को मेरी रज़ाई मे दिए पढ़ रही थी.. उपर उसने कंबल औध रखा था... उसकी हथेली का स्पर्श अपनी जाँघ पर होते ही मेरी 'वो' टाँग कंपकंपा गयी थी.. शुक्र रहा कि उसने हाथ तुरंत हटा लिया वरना मैं कुच्छ भी सोच सकती थी...

मैने अपनी हड़बड़ाहट उस'से छिपाते हुए दूसरी ओर करवट ले ली और अपना हाथ सलवार के उपर से ही अपनी जांघों के बीच 'कसकर' दबाए लेट गयी और 2 दिन पहले संदीप के साथ बिताए पलों को याद करके तड़पने लगी... उस तड़प में भी अजीब आनंद था...

"अंजू...!" पिंकी ने सहसा अपना हाथ ठीक मेरे कूल्हे पर रख कर मुझे हूल्का सा हिलाया.. ऐसा करते हुए उसकी चारों उंगलियाँ मेरी 'पेल्विस' पर आगे योनि की ओर और उसका अंगूठा मेरे नितंब पर टिक गया था...

मैं मेरे मॅन में चल रहे 'काम प्रवाह' को तोड़ना नही चाहती थी, इसीलिए गुम्सुम लेटी रही...

"अंजू!" पिंकी की आवाज़ इस बार भी धीमी थी.. बोलते हुए इस बार उसका हाथ सरक कर थोड़ा नीचे आ गया और मुझे उसका अंगूठा मेरे नितंबों की जड़ में मेरी जांघों पर चुभता सा महसूस हुआ...

"हूंम्म्म.... क्याअ.. है.. सोने दे ना याआर..." मैं जानबूझ कर उनीनदी सी होकर बोली और ऐसे ही पड़ी रही...

"अच्च्छा... चल सो जा.. पर थोड़ी सी उधर को हो जा ना.. मेरा लेट कर पढ़ने का मंन है..." पिंकी ने याचना सी करते हुए कहा... उसके बोल में इतनी मिठास अक्सर नही होती थी....

मैं नींद में ही बड़बड़ाने की आक्टिंग करती हुई थोडा दूसरी तरफ खिसक ली.. पिंकी ने साथ वाली चारपाई से तकिया उठाकर मेरे सिरहाने के साथ लगाया और मेरे बाजू में लेट कर पढ़ने लगी...

मैं उसके बाद जल्द ही नींद के आगोश में समा कर सपनो की दुनिया में खो गयी थी..'संदीप' भी पूरी तरह नंगा था और मैं भी.. मुझे अपनी गोद में बिठाए हुए वो मेरी चूचियो को हाथों में लेकर उनको दुलार्ता हुआ बार बार मुझे अपनी टांगे खोलने को कह रहा था... पर सामने खड़ा होकर अपने 'कपड़े' निकाल रहे 'ढोलू' के कारण में शरमाई हुई थी और अपनी 'योनि' को जांघों के बीच दबाए सिसकियाँ ले रही थी...

अगले ही पल मुझे ढोलू का काला लिंग मेरी आँखों के सामने लटकता दिखाई दिया.. राक्षस की तरह हंसते हुए वो मेरे सामने आकर घुटनों के बल बैठ गया..,"ऐसे नही खोलेगी ये.. तू इसकी टाँग पकड़ कर फैला और में इसकी 'चूत' फाड़ता हूँ साली की... बहुत मस्ता रही है...!"

"नही... प्लीज़.. ऐसे नही...!" मैं गिड़गिदा कर बोली....

"सीसी..कुच्छ नही...सो जा!" ढोलू की आवाज़ रहस्मयी ढंग से बदल गयी.. अब की बार अचानक वह किसी लड़की की आवाज़ में मिमिया कर बोला था.. अचानक संदीप और ढोलू दोनो ही मेरे सपने से गायब हो गये.. और भले ही सपने में ही सही.. पर 'अपनी' तड़प का 'इलाज' इस तरह से गायब होते ही मैं भनना सी गयी..

मेरी नींद खुल गयी थी....

अचानक नींद खुलते ही मेरे आस्चर्य का ठिकाना ना रहा... मेरे साथ, मेरी ही रज़ाई में सो रही पिंकी अजीब ढंग से लंबी लंबी साँसें ले रही थी.. मैं उसको टोक कर उठाने ही वाली थी की 'मामला मेरी समझ में आ गया.. 'तो इसका मतलब लास्ट में जो मुझे सुनाई दिया 'वो' ढोलू की नही.. पिंकी की आवाज़ थी...

मैं अचरज से भरी हुई बिना कुच्छ बोले लेटी रही... पिंकी की 'साँसों' की तेज़ी तो मैं पहले ही महसूस कर चुकी थी.. पर अब मेरी कमर में गढ़ी उसकी नन्ही चूचियो की धड़कन में भी मुझे कुच्छ अजीब से 'तेज़ी' का अहसास हुआ.. उसके दिल की आवाज़ इतनी तेज थी मानो वो उसके अंदर नही बुल्की मेरे भीतर धड़क रहा हो...

उत्सुकता के मारे मेरा मन मचल उठा.. तो क्या पिंकी भी...? मेरा मन सोच कर ही गड़गड़ा गया था...

कुच्छ सोच कर मैं नींद में होने का नाटक करती हुई बुदबुदाई और करवट लेकर सीधी लेट गयी.....

काफ़ी देर तक भी जब उसकी तरफ से कोई हरकत नही हुई तो मेरा मॅन बेचैन हो उठा...

'उसकी दाहाकति हुई सी साँसें बता रही थी कि 'वो' जाग रही है.. अगर उसके मॅन में कुच्छ नही होता तो 'वो' मेरे पास क्यूँ सोती? और अगर सोना ही था तो अब तक तो 'सो' जाना चाहिए था.. ऐसे आहें भरने का क्या मतलब?'

यही सब सोचने के बाद मेरा हौंसला थोड़ा बढ़ा और मेरे मॅन में एक अजीब सी खुरापात ने जनम ले लिया.. 'जैसा कुच्छ दिन पहले मनीषा ने मेरे साथ किया था, कुच्छ वैसा ही मेरा मॅन पिंकी के साथ करने को मचल उठा... आख़िर 'कुच्छ नही' से तो 'कुच्छ ही सही' बेहतर था..

मैने पिंकी की ओर करवट ली और खुद को नींद में ही दिखाते हुए हम दोनो के चेहरों पर से रज़ाई हटा दी...

पिंकी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नही हुई.. एक बार तो उसको देख कर मुझे ऐसा लगा जैसे 'वो' सच में ही सो रही हो.. पर उसके नथुनो से आती 'भारी' साँसों ने मुझे संशय में डाल रखा था.. कुच्छ पल की उधेड़ बुन के बाद मैने अपना हाथ उसके कंधे के पास उसकी बाँह पर रख दिया... हमारी छातिया ठीक एक दूसरी की छातिया के आमने सामने थी और 'छ्छूने' ही वाली थी...

अचानक मुझे पिंकी के कसमसने का हल्का सा अहसास हुआ... तभी उसने मेरे हाथ के नीचे से अपनी बाँह निकाली और रज़ाई को पकड़ कर उपर खींच लिया.. ऐसा करने से मेरा हाथ खुद-बा-खुद उसकी छाती की बगल में जा टीका और जैसे ही पिंकी ने अपनी बाँह वापस 'वहाँ' रखी; मेरी हथेली का दबाव उसकी छाती पर बढ़ गया...

मुझे पूरा विश्वास नही था कि वह जाग रही है या सो रही है.. और फिर उसके स्वाभाव से भी मुझे डर लगता था.. शायद इसी वजह से मैं पहल करने में हिचकिचा रही थी...

कुच्छ देर बाद ऊंघते हुए पिंकी धीरे से सीधी होकर लेट गयी.. मॅन में उसके बारे में 'गंदे ख़याल' आने के बाद मुझे डर सा लगने लगा था.. मैं अपना हाथ हड़बड़ा कर हटाने को हो गयी थी.. पर उसने करवट इतनी सफाई से और इतनी धीरे बदली थी कि मुझे भी कुच्छ देर बाद ही अहसास हो पाया कि अब उसकी 'बाई चूची' मेरी हथेली के नीचे धड़क रही है... मैने अपनी साँसें रोके हुए 'वहाँ' से हाथ ना हटाने का फ़ैसला कर लिया....

उसकी चूची पर हथेली टिकाए हुए मुझे ऐसा आभास हो रहा था जैसे मैने अपने हाथों में 'छ्होटे' आकर का कश्मीरी सेब थाम रखा हो.. बेहद मुलायम, मखमली और रेशमी अहसास लिए उसकी चूची तेज़ी से उपर नीचे होती हुई धीरे धीरे अकड़ने सी लगी और जल्द ही मुझे मेरी हथेली में उसकी चूची का 'मिश्रीदाना' महसूस होने लगा...

मैने जैसे ही अपनी हथेली का दबाव बढ़ा कर उसके 'सेब' को भींच कर देखना चाहा, पिंकी ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख लिया.. मुझे लगा 'वह' मेरा हाथ वहाँ से हटा देगी.. पर सुखद आस्चर्य रहा कि उसकी चूची को समेटे मेरे हाथ पर 'सिवाय' अपने हाथ का 'बोझ' रखने के; उसने कुच्छ नही किया..

उत्साहित सी होकर मैने अपनी टाँग घुटने से मोडी और उसकी जांघों पर रख ली.. 'केले' के चिकने तने जैसी उसकी गदराई जांघों पर अपनी मस्त मांसल और चिकनी जांघों से स्पर्श मुझे बहुत ही उत्तेजक लगा... जल्द ही मेरी साँसें भी अपनी 'गिनती' भूलने वाली थी....

एका एक जाने मुझे क्या हुआ.. 'वासना' की अग्नि में तो जल ही रही थी.. अचानक 'जो' होगा देखा जाएगा के अंदाज में मैने उसकी चूची कस कर दबा दी.. इसके साथ ही उसकी सिसकी निकल गयी..

"आअहह.." वह कसमसाई और मेरा हाथ दूर झटक कर करवट ले मुझसे लिपट कर आहें भरने लगी...

उसकी हालत देख कर मेरा रोम रोम गड़गड़ा उठा.. मैं अपना एक हाथ उसकी कमर पर ले जाकर कसकर अपने सीने से भींचती हुई उसके कान में फुसफुसाई,"क्या हुआ पिंकी?"

पर उसने कोई जवाब नही दिया.. शायद उसको कुच्छ भी बोलते हुए शर्म आ रही होगी.. पर 'ये' सॉफ हो चुका था कि वा जाग रही है और 'कच्ची जवानी' की उंबूझी लपटों से उसका शरीर धधक सा रहा है.. उसके बदन का बढ़ा हुया तापमान और साँसों की गर्मी सपस्ट बता रही थी कि 'वो' बुरी तरह से मचल चुकी है....

मैं उसके गालों पर चुंबन लेने को हुई तो 'वह' छितक कर मुझसे दूर हो गयी...

"क्या हुआ?" मैं तड़प कर उसके पास खिसकते हुए बोली तो उसने करवट बदल ली.. उसके करवट बदलने के दौरान जैसे ही रज़ाई थोड़ी उपर उठी.. अंदर आए प्रकाश ने मुझे उसके शर्म से लाल हो चुके गाल और खुली हुई उसकी आँखों के दर्शन करा दिए.. अब हिचकने का सवाल ही पैदा नही होता था...

मैने दुस्साहस सा दिखाते हुए अपना हाथ फिर से उसकी चूची पर रख लिया और उसको अपनी तरफ खींचते हुए बोली," मज़ा आ रहा है ना पिंकी?"

उसने जवाब दिया तो उसकी आवाज़ में कंपन सा था..," ये... ये ग़लत है अंजू!"

मैने अपनी जाँघ उठाकर उसके कुल्हों से सटा दी और पैर दूसरी तरफ से उसके घुटनो के बीच फँसा लिया..,"इसमें.. ग़लत क्या है पागल..? मज़ा आ रहा हो तो ले ले थोड़ा सा!"

करवट लिए हुए ही पिंकी ने अपना चेहरा उपर किया और एक बार फिर से उसके लब थिरक उठे..,"...पर.. ये ग़लत है.. पाप लगेगा..!" वा फुसफुसाई..

"पाप!" मैं मंन ही मंन हँसी और फिर धीरे से ही उसके कान में बोली,"पाप कैसा पागल? देख ना कितना मज़ा आ रहा है! ऐसे तो किसी बात का डर भी नही.. और ना ही किसी को पता लगेगा... मैं कोई लड़का थोड़े ही हूँ जो कुच्छ ग़लत हो जाएगा.." मैने बोलने के बाद उसके पेट में गुदगुदी सी कर दी..

"हे हे हे.." हँसी को दबाने की कोशिश में 'वो' उच्छल सी पड़ी और सीधी लेट गयी.....,"पर मुझे बहुत अजीब सा लग रहा है.. पता नही ये क्या हो रहा है मुझे..?" पिंकी फुसफुसाई..

"अच्च्छा एक बात बता! 'अच्च्छा' लग रहा है या बुरा?" मैने उसको अपने आगोश में समेट'ते हुए पूचछा...

वह भी सिकुड कर मुझसे पूरी तरह सॅट गयी," शरीर को अच्च्छा लग रहा है.. पर दिमाग़ में बुरा!"

"अच्च्छा छ्चोड़! ये बता.. जब मैने इसको दबाया था तो" मैने उसकी चूची पर हाथ रख कर बोली..,"तब कैसा लगा था?"

उसने बिना बोले ही जवाब दे दिया.. अपना हाथ फिर से मेरे हाथ पर रख कर वह धीरे धीरे खुद ही दबाने लगी.. इसके साथ ही उसकी साँसें फिर से तेज होने लगी..

"मज़ा आ रहा है ना?" मैं उसके मनोभावों को पढ़ते हुए खुश होकर बोली और अपने हाथ से बारी बारी उसकी दोनो चूचियो को सहलाने लगी...

"आ.. हाअ.. हाआअ!" उसने कसमसा कर अपनी चूचियो से मेरा हाथ हटाया और मुझसे चिपक कर सिसकने लगी...

"कैसा लग रहा है? बता ना?" मैने अलग होकर उसका हाथ पकड़ा और अपनी छातियो पर रख दिया.. वह कुच्छ देर उन्हे दबा दबा कर देखती रही.. फिर मेरा हाथ पकड़ कर अपनी छाती पर ले गयी,"आह.. तुम भी करो.. बहुत मज़ा आ रहा है अंजू.. यहाँ ऐसी क्या बात है.. खुद के हाथ से तो कभी कुच्छ नही होता.. ऐसा लग रहा है जैसे अंदर से कुच्छ खींच सा रहा है.. अयाया.."

"पता नही.. पर मज़ा बहुत आता है.. सच में...."मैने कुच्छ रुक कर फिर कहा,"और.... और नीचे तो पूच्छो ही मत...!"

"नीचे कहा?" मेरी बात सुनकर उसने मेरी छाती को कसकर भींच दिया.. मेरी भी सिसकी सी निकल गयी..

"नीचे... यहाँ.. जहाँ से हम पेशाब करती हैं..." कहने के बाद जैसे ही मैने अपना हाथ नीचे ले जाने की कोशिश की.. उसने बीच रास्ते में ही पकड़ लिया,"धात बेशर्म.. ऐसी बातें मत कर.. मैं उठकर चली जाउन्गि...!"

"ओह्हो.. तू हाथ तो लगवा कर देख एक बार.. इस'से 100 गुना मज़ा ना आए तो कहना!" मैने लगभग ज़बरदस्ती करते हुए अपना हाथ फिर से उसकी योनि की तरफ बढ़ाना शुरू कर दिया.. पर आशंका से ही उसके रोंगटे खड़े हो गये..,"नही.. तुझे मेरी कसम.. वहाँ नही.." और उसने अपनी योनि को छूने तक नही दिया...

"ठीक है..!" मैं हताश होकर बोली..,"तू करके देख ले मेरे 'वहाँ'... मैं कुच्छ नही कहूँगी..!"

"नही.. बस यहीं ठीक है.." वह मेरी चूची को दबाकर देखती हुई बोली..,"तेरी तो मीनू दीदी जैसी हो गयी अभी से.. उसने भी ऐसे ही किया था क्या?"

"किसने?" मेरी समझ में ठीक से उसकी बात नही आई...

"अरे उसने.. उसने भी ऐसे ही दबाया था क्या इनको....!"

"अच्च्छा.. संदीप ने?" मैं बोली..

"हां..!"

"बताउ?" मैं बोली..

"हां.. पूच्छ ही तो रही हूँ..."

"उसने तो..." मैं बोलते हुए रुकी और उसके समीज़ के नीचे से अपना हाथ डाल कर उपर चढ़ा लिया.. उसने कोई विरोध नही किया.. पर जैसे ही उसकी नंग-धड़ंग चूची मेरे हाथ में आई.. वह मस्ती से झंझनती हुई सिसक सी पड़ी...,"आई... ऊऊऊओईईईई..मुंम्म्ममय्ययी...!"

"क्या हुआ?" मैं उसके कान में फुसफुसते हुए मुस्कुराइ...

"आ.. बस पूच्छ मत... 'इन्न' पर उंगली मत लगा खाली.. मुझसे सहन नही हो रहा.. पूरी को पकड़ ले.."वह बोलती हुई पागल सी होकर मेरी चूची को ज़ोर ज़ोर से मसालने सी लगी...

उसकी खुमारी थोड़ी उतरी तो जाकर ही उसकी आवाज़ निकली...,"और क्या क्या किया था उसने!" पिंकी की आवाज़ में एक अजीब सी तड़प थी...

"तू बताने देगी तभी तो.. पर तू तो नीचे कुच्छ करने ही नही देती..."मैने कहते हुए उसकी एक चूची को जड़ से पकड़ कर भींच दिया...

"अयाया.. नही.. ऐसे ही बता दे...!" उसने कहा और अपना हाथ भी मेरी कमीज़ में डाल कर उपर चढ़ा लिया...

"ऐसे क्या क्या बताउ? उसने तो मेरे गालों को चूमा था.. मेरी चूचियो को ऐसे ही दबाया था और फिर इनको मुँह में लेकर चूसा था.. फिर जब मैं पागल सी हो गयी तो उसने मेरे सारे कपड़े निकाल दिए और फिर उपर नीचे सब जगह चूमा था..." मैं बताती जा रही थी और पिंकी अंदर ही अंदर पिघलती जा रही थी... अपनी ही जांघों को एक दूसरी के साथ रगड़ता देख मुझे विश्वास हो रहा था कि उसकी 'योनि' इन सब बातों की गर्मी से 'द्रवित' हो कर फदक उठी है और उसकी अपनी जांघें अब उसकी नादान योनि की गर्मी को कुचल कुचल कर बाहर निकाल देना चाह रही हैं.... मेरी हर एक लाइन के बाद उसके मुँह से एक सिसकी निकलती और मेरी चूचियो पर उसकी पकड़ बढ़ने के साथ ही उसकी जांघों के बीच हुलचल में और तेज़ी आ जाती...

अचानक उसने एक टाँग मेरी जाँघ के उपर चढ़ाई और मेरा घुटना अपनी जांघों के बीच कस कर दबाए हुए सिसकियाँ लेकर उपर नीचे होने लगी... मुझे अहसास हो चुका था कि अब ये इस लोक में नही है.. इसीलिए मैने भी बोलना बंद करके उसको कसकर पकड़ लिया... काफ़ी देर से मेरा दूसरा हाथ मेरी सलवार में होने के कारण मैं भी चरम पर पहुँचने ही वाली थी... तभी वह एक हिचकी सी लेकर मुझसे बुरी तरह लिपट गयी... और सिर नीचे करके मेरी चूची को अपने दाँतों में दबा लिया... उस आख़िरी पल में तो उसने जैसे मेरे 'दाने' को काट ही दिया होता... मैं पीड़ा से बिलबिला उठी.. पर उस पीड़ा में जो आनंद था.. 'वो' अविस्मरणीय था...

काफ़ी देर तक हम एक दूसरी से लिपटी हुई हाँफती रही.. अचानक जाने पिंकी के मंन में क्या आया.. वह झटके के साथ अलग हुई और अपनी कमीज़ ठीक करके उठने लगी... उसके बाल अस्त-व्यस्त हो चुके थे.. साँसें अभी भी उखड़ी हुई थी...

"क्या हुआ पिंकी? लेट जा ना!" मैने उसका हाथ पकड़ कर धीरे से बोला....

पर वह तो नज़रें तक नही मिला पा रही थी.. अपनी कोहनी मोड़ कर उसने हाथ छुड़ाया और रोनी सूरत बनाए तकिया उठा कर अपनी चारपाई पर जा लेटी...

क्रमशः........................

gataank se aage.............

Jane uss raat Pinky ke mann mein kaisi udhedbun chal rahi thi.. kareeb 10 minute tak khamoshi se kitab mein najrein gadaye rahne ke baad achanak wah bol padi..,"Anju!"

"Haan?" Maine uski aankhon mein dekh kaha..

"wo... aisa kya likha tha letter mein jo chacha ne tera school hi chhudwa diya?"

Main aascharya se uski aankhon mein aankhein daale uske mann ki iss adheerta ka karan samajhne ki koshish karti rahi.. aaj se pahle toh Pinky ne kabhi inn baaton mein itni ruchi nahi li jitni 'wo' aaj le rahi hai.. Main kuchh bolne hi wali thi ki usne 'tok' diya,"koyi.. aisi vaisi baat ho toh mat batana..!"

"Haan.. bahut gandi baatein likhi huyi thi.. isiliye toh maine tujhe nahi bataya tha.. warna 'toh' main pahle hi bata deti..." Maine saaf saaf kaha...

"Ohh!" Kahne ke baad Pinky ne ek lambi si saans li..,"Jane in ladkon ko kya maja milta hai.. aisi harkatein karne mein.. Jitna nazarandaj karo; utna hi sir par chadhne ki koshish karte hain...!" Kahkar Pinky ne ajeeb se dhang se apna munh pichkaya..

"Kyun..? aajkal mein fir kuchh aisa hua kya?" Maine poochha...

"Nahi.. bus 'wo'.... kal tujhe Sandeep ke paas dekha na... Tabhi se dimag sa kharaab hai... kuchh toh sochna chahiye na.. ladkon ko.. aakhir hamari 'ijjat' hi hamara hathiyaar hoti hai..! Aur tujh par bhi mujhe hairat hoti hai.. tu fatak se almari mein jakar chhip gayi.. Mujhe aisa lagta hai ki tum.. apni marzi se hi uske paas... hai na?" Pinky ne jhijhakte huye poochha...

Kuchh der main sochti rahi ki kya kahoon aur kya nahi.. fir maine apne dil par patthar rakh kar bol hi diya..," Sach kahoon toh..."Maine bolna band karke uski aankhon mein jhanka.. wah 'sach' sun'ne ko bechain si lag rahi thi," Bol na! tumhari kasam kuchh nahi kahoongi kisi ko!"

"Mujhse naraj bhi nahi hoegi na?" Maine poochha...

"Nahi na yaar! tu bata na sab sach sach!" Pinky kasmasa kar bol uthi...

"Wwo.. pahle toh 'wo' jabardasti hi kar raha tha.. par baad mein mujhe thoda thoda achchha bhi lagne laga tha..." Maine jawab diya...

"Kya?" Pinky bechain si ho uthi thi....

"Wahi.. jo 'wah' kar raha tha.. usmein se 'kuchh kuchh'!" Maine ab ki baar bhi parde ki baatein 'parde' mein hi rahne di...

Kuchh der Pinky ajeeb se dhang se daayein baayein dekhti rahi.. uske chehre ke bhawon se mujhe saaf saaf pata chal raha tha ki 'Pinky' 'uss baat' ko bhula nahi pa rahi hai... par shayad 'wah' samajh nahi pa rahi thi ki 'sharmilepan' aur 'sharafat' ka chola utaare bagair kaise 'kuchh kuchh' ka matlab poochhe...

"Tujhe sach mein 'uski' baatein achchhi lag rahi kya? ya tu mujhe bana rahi hai..?" Pinky ne ajeeb si pyaasi najron se mujhe dekhte huye kaha...

"Bata toh rahi hoon.. 'kuchh kuchh' baatein achchhi bhi lag rahi thi...!" Maine dohraya...

"Kya?" Pinky ne apne daanton se anamika ka nakhoon chabate huye meri aankhon mein dekha...

"Kya 'kya?" Main uska mantavya samajhne ke baawjood 'anjaan' bani rahi...

thodi der ki chuppi ke baad Pinky ne ek lambi saans ke sahare apni bekarari jata hi di..,"kya kya achchha lag raha tha.. bata na plz?"

"Ohh.. achchha..." Maine kaha aur fir najrein jhuka kar boli..,"Khul kar kaise bataaun? Mujhe sharm aa rahi hai..."

Pinky ne thoda aage sarak kar apne ghutne mere ghutne se mila diye..,"Bata na! main toh ladki hoon.. mujhse kaisi sharm?"

"Haan.. ladki toh tu hai.. par badi khatarnaak ladki hai.."Main kahne ke baad uski aur dekh kar hansi," mere munh se koyi aisi vaisi baat nikal gayi toh mujhe pata hai tu kaisi shakal bana legi... kal mujhse baat karne se bhi mana kar diya tha tune..!"

Pinky asahay si hokar mujhe dekhti rahi... fir achkacha kar boli..,"Kaha na kuchh nahi bolungi.. kisi baat ka bura nahi manoongi...?"

"Par tu poochhna kyun chahti hai..?" Maine sawaal karke usko uljhan mein daal diya...

"Theek hai.. nahi batana toh mat bata.. aaj ke baad mere se baat mat karna!" Pinky bhadak kar uthne lagi toh maine uska hath pakad liya..,"Bata toh rahi hoon.. ruk toh sahi...!"

"Theek hai.. jaldi bata.. fir Meenu didi aa jayegi..." Pinky khush hokar wapas baith gayi....

"Woh.... Usne jab mujhe hath lagaya tha toh pata nahi kya ho gaya tha.. par bahut achchha laga tha mujhe... Shuru mein maine bahut mana kiya par 'uski' harkatein mujhe achchhi bhi lag rahi thi.. 'pata nahi..' par Sandeep ke hath lagne se mere shareer mein gudgudi si hone lagi thi.. isiliye 'uske' chhodne ke baad bhi main wahan se bhag nahi payi...!" Maine kaha...

"Kahan...?" Pinky ne thoda hichakne ke baad khud hi 'apna' sawaal khol kar poochh liya..,".. matlab... kahan hath lagaya tha.. Sandeep ne?"

"Shuru mein toh 'bus' hath hi pakda tha...!" Maine kaha...

"Fir?"

"Fir.. fir usne jabardasti karke mujhe apni 'god' mein baitha liya.. aur 'yahan wahan' chhoona shuru kar diya..!" Main dheere dheere aage badh rahi thi...

Itna sun'ne bhar se hi Pinky ki aankhein sharm se jhuk gayi... Uske gaalon ki rangat badalne lagi thi..,"Haye raam.. tujhe sharam nahi aayi.. ladke ki god mein baithte huye...!"

"Aayi thi.. par tu 'sharm' ke baare mein poochh rahi hai ya 'maje' ke baare mein..?" Main khinn hokar boli...

"Achchha rahne de.. mat bata.." Pinky ne kaha aur agle hi pal bechaini ke labade se ladey uske lab thirak uthe..,"Achchha.. chal bata.... 'aur' kya hua..? ......kahan kahan hath lagaya tha usne?"

"Ab sari baat khol kar bataaun kya?" Main jhijhak kar boli.. par main uske munh se 'haan' sun'na chahti thi...

"Nahi.. khol kar mat bata chahe.. par samjha toh sakti hai na!" Pinky utsukta se meri aur dekhne lagi....

"ammm... god mein baithakar wah 'inko' dabane laga tha...." Kahne ke baad maine apna hath achanak aage karke aakar mein meri chhatiyon se aadhe uske ek 'uroj' ko pakad liya..

"Aahh.. " Pinky hadbada kar uchhal padi..,"Kya kar rahi hai besharm? gudgudi huyi bade jor ki..."

"Main toh bus bata rahi hoon... mere hath se toh 'bus' gudgudi huyi hai... par agar koyi ladka inko pakadega toh tujhe pata chalega.. asliyat mein kya hota hai.. aankhein band honi shuru ho jati hain.. shareer mein bhoochal sa aa jata hai... khud par kabu nahi rah pata... Sach Pinky.. bahut maja aata hai..!" Main 'Sandeep' ke sath bitaye pal yaad karte hi masti se jhanjhana uthi aur jane kya kya bolne lagi..

"Koyi ladka nahi pagal..."Pinky ne kaha aur fir apne aap mein hi sharma kar sankuchit si ho gayi..,"Sirf mera 'husband'! Uske alawa kisi ladke ko main inhe chhoone nahi doongi..." Kahte huye Pinky ke 'hont' ras se tar ho gaye...

"Matlab Harish...!" Maine shararat bhare lahje mein kaha...

"Main tera sir fod doongi agar aise 'kisi' ka naam liya toh... 'uss'se' mujhe kya matlab..?" Pinky ne bolte huye apne chehre par 'gussa' lane ki bharsak koshish ki.. par kya majal jo 'lajja' ki chadar ko tanik bhi khiska payi ho...,"Achchha.. chhod.. aur bata na!"

"Aur kya bataaun..? fir toh bus 'wah' aage badhta gaya aur mein 'maje' se pagal ho uthi... par main bata nahi sakti ki kitna maja aaya tha.. 'wo' toh karke dekhne par hi pata chalta hai....!"

"Usne tujhe har jagah hath lagaya tha kya?" Pinky kasmasa kar boli...

"Aur kaise bataaun ab? bol toh diya.. uske baad toh jo uska dil kiya tha.. 'wo' sab kiya tha usne...!"

"Achchha theek hai.. bus ek baat aur pooochh loon..?" Pinky adheer ho kar boli...

"Haan.. poochh..!"

"Dobara 'wo' sab karne ka man karta hai...?" Pinky ajeeb si najron se mujhe ghoorti huyi boli...

"Shayad Meenu aa rahi hai...!" Seedhiyon mein utarte kadmon ki aahat sunkar mere kaan khade ho gaye... "chhod.. baad mein baat karenge..." maine kaha aur hum dono hi bol bol kar padhne lage....

Meenu neeche aayi toh usne apne sir par 'chunni' baandhi huyi thi... wah aate hi apni charpayi mein late gayi..,"Mere sir mein dard hai.. thoda aaram se padh lo..." Usne kaha aur charpayi mein ghus kar karwat le li...

"Chal hum bhi sote hain ab... kafi raat ho gayi.. subah uthna bhi hai...!" Maine kitab band karke rakhte huye kaha...

"Nahi.. main abhi thodi der aur padhungi...!" Pinky ne kaha..

"Theek hai.."Main rajayi mein ghusti huyi boli..,"Apni char payi par jakar padh le..."

"Aey.. yahin baith kar padhne de na.. mera kambal toh thanda ho gaya hoga..!" Pinky ne yachna si karte huye kaha...

"Koyi baat nahi.. padh le...!" Maine muskurakar kaha aur apna chehra dhak liya...

Rajayi mein dubke huye aadha ghanta hone par bhi meri aankhon mein neend nahi thi.. Anil chacha ki 'uss' din ki harkatein yaad karke meri kamuk chahton ne angdayi lena shuru kar diya tha... 2 din pahle Sandeep ne mujhe jo 'swarnim najare' dikhaye the.. Unki ek aur jhalak pane ki aarzoo mein meri jaanghon ke beech 'baar baar' asahaneey 'fadak' mujhe sone nahi de rahi thi... Jane anjane rajayi mein ghuste hi mera hath apne aap hi meri salwar mein ghus chuka tha... par lingsukh bhog kar 'phool' ban chuki meri 'yoni' ko ab ungali ke 'chhalawe' se bahkana mumkin nahi tha.. Ab toh usko 'mard' hi chahiye tha.. Dobara barasne ke liye; kahin se bhi!..

Achanak Pinky ka hath padhte huye galati se meri jaangh par tik gaya aur mera sara badan jhanjhanahat se gadgada gaya... aalthi paalthi maar kar padh rahi Pinky ki ek jaangh mere ghutne se sati huyi thi... wah apni jaanghon ko meri rajayi mei diye padh rahi thi.. upar usne kambal audh rakha tha... Uski hatheli ka sparsh apni jaangh par hote hi meri 'wo' taang kampkampa gayi thi.. shukra raha ki usne hath turant hata liya warna main kuchh bhi soch sakti thi...

Maine apni hadbadahat uss'se chhipate huye dusri aur karwat le li aur apna hath salwar ke upar se hi apni jaanghon ke beech 'kaskar' dabaye late gayi aur 2 din pahle Sandeep ke sath bitaye palon ko yaad karke tadapne lagi... Uss tadap mein bhi ajeeb aanand tha...

"Anju...!" Pinky ne sahsa apna hath theek mere kulhe par rakh kar mujhe hulka sa hilaya.. Aisa karte huye uski chaaron ungaliyan meri 'pelvis' par aage yoni ki aur aur uska angootha mere nitamb par tik gaya tha...

Main mere mann mein chal rahe 'kaam pravah' ko todna nahi chahti thi, isiliye gumsum leti rahi...

"Anju!" Pinky ki aawaj iss baar bhi dheemi thi.. Bolte huye iss baar uska hath sarak kar thoda neeche aa gaya aur mujhe uska angootha mere nitambon ki jad mein meri jaanghon par chubhta sa mahsoos hua...

"Hummmm.... kyaaa.. hai.. Soneee de na yaaaar..." Main jaanboojh kar uneendi si hokar boli aur aise hi padi rahi...

"Achchha... chal so ja.. par thodi si udhar ko ho ja na.. mera late kar padhne ka mann hai..." Pinky ne yachna si karte huye kaha... Uske bol mein itni mithas aksar nahi hoti thi....

Main neend mein hi badbadane ki acting karti huyi thoda dusri taraf khisk li.. Pinky ne sath wali charpayi se takiya uthakar mere sirhane ke sath lagaya aur mere baaju mein late kar padhne lagi...

Main uske baad jald hi neend ke aagosh mein sama kar sapno ki duniya mein kho gayi thi..'Sandeep' bhi poori tarah nanga tha aur main bhi.. Mujhe apni god mein bithaye huye wo meri chhatiyon ko hathon mein lekar unko dulaarta hua baar baar mujhe apni taange kholne ko kah raha tha... Par saamne khada hokar apne 'kapde' nikal rahe 'dholu' ke karan mein sharmayi huyi thi aur apni 'yoni' ko jaanghon ke beech dabaye siskiyan le rahi thi...

Agle hi pal mujhe Dholu ka kala ling meri aankhon ke saamne latakta dikhayi diya.. Rakshas ki tarah hanste huye wo mere saamne aakar ghutnon ke bal baith gaya..,"Aise nahi kholegi ye.. tu iski taang pakad kar faila aur mein iski 'choot' faadta hoon sali ki... bahut masta rahi hai...!"

"Nahi... plz.. aise nahi...!" Main gidgida kar boli....

"kk..kuchh nahi...so ja!" Dholu ki aawaj rahasmayi dhang se badal gayi.. ab ki baar achanak wah kisi ladki ki aawaj mein mimiya kar bola tha.. achanak Sandeep aur Dholu dono hi mere sapne se gayab ho gaye.. aur bhale hi sapne mein hi sahi.. par 'apni' tadap ka 'ilaaj' iss tarah se gayab hote hi main bhanna si gayi..

Meri neend khul gayi thi....

Achanak neend khulte hi mere aascharya ka thikana na raha... mere sath, meri hi rajayi mein so rahi Pinky ajeeb dhang se lambi lambi saansein le rahi thi.. Main usko tok kar uthane hi wali thi ki 'maamla meri samajh mein aa gaya.. 'Toh iska matlab last mein jo mujhe sunayi diya 'wo' dholu ki nahi.. Pinky ki aawaj thi...

Main achraj se bhari huyi bina kuchh bole leti rahi... Pinky ki 'saanson' ki tezi toh main pahle hi mahsoos kar chuki thi.. par ab meri kamar mein gadi uski nanhi chhatiyon ki dhadkan mein bhi mujhe kuchh ajeeb se 'tezi' ka ahsaas hua.. Uske dil ki aawaj itni tej thi mano wo uske andar nahi bulki mere bheetar dhadak raha ho...

Utsukta ke maare mera man machal utha.. toh kya Pinky bhi...? mera man soch kar hi gadgada gaya tha...

Kuchh soch kar main neend mein hone ka natak karti huyi budbudayi aur karwat lekar seedhi late gayi.....

Kafi der tak bhi jab uski taraf se koyi harkat nahi huyi toh mera mann bechain ho utha...

'Uski dahakti huyi si saansein bata rahi thi ki 'wo' jaag rahi hai.. agar uske mann mein kuchh nahi hota toh 'wo' mere paas kyun soti? aur agar sona hi tha toh ab tak toh 'so' jana chahiye tha.. aise aahein bharne ka kya matlab?'

yahi sab sochne ke baad mera hounsla thoda badha aur mere mann mein ek ajeeb si khurapaat ne janam le liya.. 'jaisa kuchh din pahle Manisha ne mere sath kiya tha, kuchh waisa hi mera mann Pinky ke sath karne ko machal utha... aakhir 'kuchh nahi' se toh 'kuchh hi sahi' behtar tha..

Maine Pinky ki aur karwat li aur khud ko neend mein hi dikhate huye hum dono ke chehron par se rajayi hata di...

Pinky ki taraf se koyi pratikriya nahi huyi.. ek baar toh usko dekh kar mujhe aisa laga jaise 'wo' sach mein hi so rahi ho.. par uske nathuno se aati 'bhari' saanson ne mujhe sanshay mein daal rakha tha.. Kuchh pal ki udhed bun ke baad maine apna hath uske kandhe ke paas uski baanh par rakh diya... Hamari chhatiyan theek ek dusri ki chhatiyon ke aamne saamne thi aur 'chhoone' hi wali thi...

Achanak mujhe Pinky ke kasmasane ka hulka sa ahsaas hua... Tabhi usne mere hath ke neeche se apni baanh nikali aur rajayi ko pakad kar upar kheench liya.. Aisa karne se mera hath khud-ba-khud uski chhati ki bagal mein ja tika aur jaise hi Pinky ne apni baanh wapas 'wahan' rakhi; meri hatheli ka dabav uski chhati par badh gaya...

Mujhe poora vishvas nahi tha ki wah jaag rahi hai ya so rahi hai.. aur fir uske swabhav se bhi mujhe darr lagta tha.. shayad isi wajah se main pahal karne mein hichkicha rahi thi...

Kuchh der baad oonghte huye Pinky dheere se seedhi hokar late gayi.. Mann mein uske baare mein 'gande khayaal' aane ke baad mujhe darr sa lagne laga tha.. Main apna hath hadbada kar hatane ko ho gayi thi.. par usne karwat itni safayi se aur itni dheere badali thi ki mujhe bhi kuchh der baad hi ahsaas ho paya ki ab uski 'baayi chhati' meri hatheli ke neeche dhadak rahi hai... Maine apni saansein roke huye 'wahan' se hath na hatane ka faisla kar liya....

Uski chhati par hatheli tikaye huye mujhe aisa aabhas ho raha tha jaise maine apne hathon mein 'chhote' aakar ka kashmiri seb tham rakha ho.. behad mulayaam, makhmali aur reshmi ahsaas liye uski chhati tezi se upar neeche hoti huyi dheere dheere akadne si lagi aur jald hi mujhe meri hatheli mein uski chhati ka 'mishridaana' mahsoos hone laga...

Maine jaise hi apni hatheli ka dabav badha kar uske 'seb' ko bheench kar dekhna chaha, Pinky ne apna hath mere hath par rakh liya.. Mujhe laga 'wah' mera hath wahan se hata degi.. par sukhad aascharya raha ki uski chhati ko samete mere hath par 'sivay' apne hath ka 'bojh' rakhne ke; usne kuchh nahi kiya..

Utsahit si hokar maine apni taang ghutne se modi aur uski jaanghon par rakh li.. 'Kele' ke chikne taney jaisi uski gadrayi jaanghon par apni mast maansal aur chikni jaanghon se sparsh mujhe bahut hi uttejak laga... Jald hi meri saansein bhi apni 'ginti' bhoolne wali thi....

Eka ek jaane mujhe kya hua.. 'wasna' ki agni mein toh jal hi rahi thi.. Achanak 'jo' hoga dekha jayega ke andaaj mein maine uski chhati kas kar daba di.. iske sath hi uski siski nikal gayi..

"aaahhhhhh.." wah kasmasayi aur mera hath door jhatak kar karwat le mujhse lipat kar aahein bharne lagi...

Uski halat dekh kar mera rom rom gadgada utha.. Main apna ek hath uski kamar par le jakar kaskar apne seene se bheenchti huyi uske kaan mein fusfusayi,"Kya hua Pinky?"

Par usne koyi jawab nahi diya.. Shayad usko kuchh bhi bolte huye sharm aa rahi hogi.. par 'ye' saaf ho chuka tha ki wah jaag rahi hai aur 'kachchi jawani' ki unbujhi lapton se uska shareer dhadhak sa raha hai.. Uske badan ka badha huya taapmaan aur saanson ki garmi sapast bata rahi thi ki 'wo' buri tarah se machal chuki hai....

Main uske gaalon par chumban lene ko huyi toh 'wah' chhitak kar mujhse door ho gayi...

"Kya hua?" Main tadap kar uske paas khisakte huye boli toh usne karwat badal li.. Uske karwat badalne ke douran jaise hi rajayi thodi upar uthi.. andar aaye prakash ne mujhe uske sharm se laal ho chuke gaal aur khuli huyi uski aankhon ke darshan kara diye.. Ab hichakne ka sawal hi paida nahi hota tha...

Maine dussahas sa dikhate huye apna hath fir se uski chhati par rakh liya aur usko apni taraf kheenchte huye boli," Maja aa raha hai na Pinky?"

Usne jawab diya toh uski aawaj mein kampan sa tha..," Ye... ye galat hai Anju!"

Maine apni jaangh uthakar uske kulhon se sata di aur pair dusri taraf se uske ghutno ke beech fansa liya..,"Ismein.. galat kya hai pagal..? Maja aa raha ho toh le le thoda sa!"

Karwat liye huye hi Pinky ne apna chehra upar kiya aur ek baar fir se uske lab thirak uthe..,"...par.. ye galat hai.. paap lagega..!" Wah fusfusayi..

"Paap!" Main mann hi mann hansi aur fir dheere se hi uske kaan mein boli,"Paap kaisa pagal? dekh na kitna maja aa raha hai! aise toh kisi baat ka darr bhi nahi.. aur na hi kisi ko pata lagega... main koyi ladka thode hi hoon jo kuchh galat ho jayega.." Maine bolne ke baad uske pate mein gudgudi si kar di..

"he he he.." Hansi ko dabane ki koshish mein 'wo' uchhal si padi aur seedhi late gayi.....,"Par mujhe bahut ajeeb sa lag raha hai.. pata nahi ye kya ho raha hai mujhe..?" Pinky fusfusayi..

"Achchha ek baat bata! 'achchha' lag raha hai ya bura?" Maine usko apne aagosh mein samet'te huye poochha...

Wah bhi sikud kar mujhse poori tarah sat gayi," shareer ko achchha lag raha hai.. par dimag mein bura!"

"Achchha chhod! Ye bata.. jab maine isko dabaya tha toh" maine uski chhati par hath rakh kar boli..,"Tab kaisa laga tha?"

Usne bina bole hi jawab de diya.. apna hath fir se mere hath par rakh kar wah dheere dheere khud hi dabane lagi.. iske sath hi uski saansein fir se tej hone lagi..

"Maza aa raha hai na?" Main uske manobhavon ko padhte huye khush hokar boli aur apne hath se bari bari uski dono chhatiyon ko sahlane lagi...

"aa.. haaa.. haaaaa!" Usne kasmasa kar apni chhatiyon se mera hath hataya aur mujhse chipak kar sisakne lagi...

"Kaisa lag raha hai? bata na?" Maine alag hokar uska hath pakda aur apni chhatiyon par rakh diya.. wah kuchh der unhe daba daba kar dekhti rahi.. fir mera hath pakad kar apni chhati par le gayi,"aah.. tum bhi karo.. bahut maja aa raha hai Anju.. yahan aisi kya baat hai.. khud ke hath se toh kabhi kuchh nahi hota.. aisa lag raha hai jaise andar se kuchh khinch sa raha hai.. aaaah.."

"Pata nahi.. par maza bahut aata hai.. sach mein...."Maine kuchh ruk kar fir kaha,"Aur.... aur neeche toh poochho hi mat...!"

"Neeche kaha?" Meri baat sunkar usne meri chhati ko kaskar bheench diya.. meri bhi siski si nikal gayi..

"Neeche... yahan.. jahan se hum peshab kaarti hain..." Kahne ke baad jaise hi maine apna hath neeche le jane ki koshish ki.. usne beech raaste mein hi pakad liya,"Dhat besharm.. aisi baatein mat kar.. main uthkar chali jaaungi...!"

"Ohho.. tu hath toh lagwa kar dekh ek baar.. iss'se 100 guna maja na aaye toh kahna!" Maine lagbhag jabardasti karte huye apna hath fir se uski yoni ki taraf badhana shuru kar diya.. par aashanka se hi uske rongte khade ho gaye..,"Nahi.. tujhe meri kasam.. wahan nahi.." Aur usne apni yoni ko chhoone tak nahi diya...

"Theek hai..!" Main hataash hokar boli..,"Tu karke dekh le mere 'wahan'... main kuchh nahi kahoongi..!"

"Nahi.. bus yahin theek hai.." Wah meri chhati ko dabakar dekhti huyi boli..,"Teri toh Meenu didi jaisi ho gayi abhi se.. Usne bhi aise hi kiya tha kya?"

"Kisne?" Meri samajh mein theek se uski baat nahi aayi...

"Arey usne.. Usne bhi aise hi dabaya tha kya inko....!"

"Achchha.. Sandeep ne?" Main boli..

"Haan..!"

"Bataaun?" Main boli..

"Haan.. poochh hi toh rahi hoon..."

"Usne toh..." Main bolte huye ruki aur uske sameej ke neeche se apna hath daal kar upar chadha liya.. usne koyi virodh nahi kiya.. par jaise hi uski nang-dhadang chhati mere hath mein aayi.. wah masti se jhanjhanati huyi sisak si padi...,"Aayi... oooooooyiiiiii..mummmmmyyyy...

!"

"Kya hua?" Main uske kaan mein fusfusate huye muskurayi...

"aah.. bus poochh mat... 'inn' par ungali mat laga khali.. mujhse sahan nahi ho raha.. poori ko pakad le.."Wah bolti huyi pagal si hokar meri chhati ko jor jor se masalne si lagi...

Uski khumari thodi utari toh jakar hi uski aawaj nikali...,"aur kya kya kiya tha usne!" Pinky ki aawaj mein ek ajeeb si tadap thi...

"Tu batane degi tabhi toh.. par tu toh neeche kuchh karne hi nahi deti..."Maine kahte huye uski ek chhati ko jad se pakad kar bheench diya...

"aaaah.. nahi.. aise hi bata de...!" Usne kaha aur apna hath bhi meri kameej mein daal kar upar chadha liya...

"Aise kya kya bataaun? usne toh mere gaalon ko chooma tha.. meri chhatiyon ko aise hi dabaya tha aur fir inko munh mein lekar choosa tha.. fir jab main pagal si ho gayi toh usne mere saare kapde nikal diye aur fir upar neeche sab jagah chooma tha..." Main batati ja rahi thi aur Pinky andar hi andar pighalti ja rahi thi... Apni hi jaanghon ko ek dusri ke sath ragadta dekh mujhe vishvas ho raha tha ki uski 'yoni' in sab baaton ki garmi se 'dravit' ho kar fadak uthi hai aur uski apni jaanghein ab uski nadan yoni ki garmi ko kuchal kuchal kar bahar nikal dena chah rahi hain.... Meri har ek line ke baad uske munh se ek siski nikalti aur meri chhatiyon par uski pakad badhne ke sath hi uski jaanghon ke beech hulchal mein aur tezi aa jati...

Achanak Usne ek taang meri jaangh ke upar chadhayi aur mera ghutna apni jaanghon ke beech kas kar dabaye huye siskiyan lekar upar neeche hone lagi... Mujhe ahsaas ho chuka tha ki ab ye iss lok mein nahi hai.. Isiliye maine bhi bolna band karke usko kaskar pakad liya... Kafi der se mera dusra hath meri salwar mein hone ke karan main bhi caram par pahunchne hi wali thi... Tabhi wah ek hichki si lekar mujhse buri tarah lipat gayi... aur sir neeche karke meri chhati ko apne daanton mein daba liya... Uss aakhiri pal mein toh usne jaise mere 'daane' ko kaat hi diya hota... main peeda se bilbila uthi.. par uss peeda mein jo aanand tha.. 'wo' avismarneey tha...

Kafi der tak hum ek dusri se lipti huyi haanfti rahi.. achanak jane Pinky ke mann mein kya aaya.. wah jhatke ke sath alag huyi aur apni kameej theek karke uthne lagi... uske baal ast-vyast ho chuke the.. saansein abhi bhi ukhadi huyi thi...

"Kya hua Pinky? Late ja na!" Maine uska hath pakad kar dheere se bola....

Par wah toh najrein tak nahi mila pa rahi thi.. apni kohni mod kar usne hath chhudaya aur roni soorat banaye takiya utha kar apni charpayi par ja leti...

kramshah...........