बाली उमर की प्यास compleet

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raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:45

बाली उमर की प्यास पार्ट--30

गतान्क से आगे........................

संदीप ने झट से अपनी शर्ट उतार फैंकी.. उसकी गोरी छाती पर हुल्‍के हुल्‍के बाल देख कर मैं रोमच से भर उठी... छाती पर दोनो और आकड़े हुए उसके 'तिल' भर के दाने मुझे बड़े प्यारे लग रहे थे.. जैसे ही उसने पास बैठ कर मेरी चूचियो को दबाना शुरू किया.. मैने झट से बैठ कर उसको नीचे गिरा लिया और उसके पाते पर हाथ फेरती हुई उसके 'दानो' को चूमने लगी....

"आ.. क्या कर रही हो अंजू..? गुदगुदी हो रही है..." वह एकदम मस्ती से छॅट्पाटा कर उठा और एक बार फिर मुझे अपने नीचे दबोच लिया...

"करने दो ना.. मुझे मज़ा आ रहा है बहुत..." अपनी छाती पर उसके हाथ का दबाव महसूस करके मैं तड़प कर गिड़गिडाई और अपना हाथ बिना देर किए उसकी पॅंट में डाल दिया और 'कछे' के उपर से ही उसके 'फुफ्कार्ते' हुए साँप का 'फन' अपनी मुट्ठी में दबोच लिया....

"ओह्ह..होह..." मेरे हाथ की मौजूदगी का अहसास होते ही संदीप के लिंग ने एक झटके के साथ अंगड़ाई सी ली.. और आकार में अचानक बढ़कर सीधा होने की कोशिश करने लगा...

"इसको चूसो ना जान... आहह... तुम्हारे 'काम' की चीज़ तो ये है..." संदीप कहते हुए अपनी पॅंट का 'हुक' खोलने लगा.. जल्द ही उसकी पॅंट उसकी टाँगों से बाहर थी और उसका 'लिंग' कछे को 'फाड़' देने पर उतारू हो गया...

संदीप मेरी ओर मुँह करके खड़ा होकर मुस्कुराने लगा.. उसका इशारा समझ कर मैं उसके आगे घुटने टेक कर बैठ गयी और कछे के उपर से ही लिंग को हाथ में पकड़ कर उसको अपने दाँतों से हल्का सा 'काट' लिया...

वह उच्छल पड़ा..,"आह.. किस मूड में हो आज? प्यार से करो ना...!"

"नही.. आज तो मैं तुम्हे कच्चा ही खा जाउन्गि..," मैने कहा और अंजाने में ही मेरे हाथ मेरी सलवार के उपर से ही मचल उठी योनि को कुरेदने लगे...

"प्यार से भी तो खा...." संदीप अचानक बोलते बोलते रुक गया... उसके पॅंट की जेब में रखे मोबाइल के वाइब्रेशन्स की 'घररर..घर्ररर..' सन्नाटे में साफ सुनाई दे रही थी..,"एक मिनिट..." उसने पॅंट की जेब से अपना मोबाइल निकाला और कोने में जाकर कॉल रिसीव की....

"कुच्छ देर चुप रहने के बाद संदीप ने सिर्फ़ इतना ही कहा..,"आधा घंटा".. और फोन काट दिया....

"किसका फोन था...?" मैने उत्सुकता से पूचछा...

"कुच्छ नही.. एक दोस्त था..!" संदीप ने जल्दी जल्दी में अपना कच्च्छा निकलनते हुए कहा...

"आधा घंटा क्या?" मैने पूचछा...

"ओफ्फो..मुझे उसके घर जाना है.. चलो.. जल्दी जल्दी करते हैं...!" संदीप मेरे पास आया और अपना लिंग मेरे होंटो से सटा दिया....

"क्या? सिर्फ़ आधा घंटा ही...!" मैं मायूस होकर बोली..,"आधे घंटे में क्या होगा..." मुझे अचानक ध्यान आया कि 'इस' काम के साथ मुझे एक और काम भी करना था.....

"ओह्हो.. एक बार तो कर लो.. बाद की बाद में देखेंगे..." कहते हुए संदीप ने घुटनो के बल बैठ कर मेरी सलवार का नाडा खींचने के लिए बाहर निकल लिया...

मैने उसका हाथ वहीं दबोच लिया..,"तुम.. तुम मुझसे सच्चा प्यार करते हो ना संदीप?"

"और नही तो क्या..? ये तुम आज कैसी बातें कर रही हो... जल्दी निकालो अपनी सलवार..!" संदीप हड़बड़कर बोला...

"नही...!" मैने मुँह बनाकर कहा....

"क्यूँ..? अब क्या हुआ?" वह घिघिया कर बोला....

"पहले मुझे 'वो' मोबाइल चाहिए...!" मैने दाँव फैंका...

"कौनसा.. ओहो.. कितनी बार बताऊं.. वो नही मिल सकता अब.. थोड़े दीनो में नया लाकर दे दूँगा.. तुम्हारी कसम... बस!" संदीप ने कहा और ज़बरदस्ती मेरा नाडा खींच कर सलवार ढीली कर दी.... मैं नीचे गिर गयी.. पर मैने जांघों को कसकर भींच कर अपनी योनि को छिपा कर रखा हुआ था...

"नयी.. तुम झूठ बोल रहे हो.. 'ढोलू' ने मना कर दिया होगा देने से... मुझे सब पता है..." मैने नाराज़गी भरे लहजे में कहा और झट से खड़ी होकर अपना नाडा फिर से बाँध लिया....

"आन्जुउउउउ.... ये क्या कर रही हो यार.. मेरे पास ज़्यादा टाइम नही है.. अब नखरे बंद करो अपने.." नंग धड़ंग संदीप जैसी ही पागल सा होकर मेरी तरफ लपका.. उसकी हालत देख कर मेरी हँसी छूट गयी...,"नही.. पहले मोबाइल की बात!" मैं खिलखिलाते हुए इधर उधर भागने लगी....

"तुम्हारी कसम जान.. ढोलू से पूच्छ लेना चाहे... आ जाओ ना..!" मेरी हँसी से हतोत्साहित होकर वो एक जगह खड़ा हो गया और अपना कच्च्छा वापस डाल लिया.. शायद उसको अहसास हो गया था कि मैं उसके नंगेपन पर हंस रही हूँ...

"ठीक है.. पुच्छवा दो पहले....!" मैं तपाक से बोली... संदीप ने मुझे कमर से पकड़ कर अपनी और खींच लिया....

"अब... जब 'वो' आएगा तो उस'से पूच्छ लेना.. मेरे पास उसका नंबर. नही है..." मेरी छातियो को वो अपनी नंगी छाती से दबाकर भींचते हुए बोला...

"फिर झूठ.. अया..." जैसे ही संदीप ने मेरी जांघों के बीच हाथ दिया.. मैं कसमसा उठी...," जब तक तुम मोबाइल वाली बात क्लियर नही करवाते.. मैं कुच्छ नही करूँगी...

उसने ज़बरदस्ती मुझे वापस वहीं पटक लिया और यहाँ वहाँ हाथ मार कर मुझे उकसाने की कोशिश करने लगा... पर मैं जानबूझ कर हँसती रही और मौका मिलते ही अपनी टाँगों के सहारे उठाकर उसको दूर पटक देती.....,"पहले मोबाइल.. बाकी 'काम' बाद में.." मैं अपनी ज़िद पर आडी रही....

तक हार कर 'वो' मुझसे दूर हट गया...," ठीक है.. मेरी कसम खाओ ये बात किसी को नही बतओगि....!"

"कौनसी बात?" उसके दूर हट'ते ही मेरा सारा बदन बेचैन सा हो उठा था....

"यही कि मैने तुम्हारी बात ढोलू से करवाई है....!" संदीप बोला...

"कब करवाई है...?" मैं अपनी आँखें सिकोड ली और उसके पास जाकर उस'से चिपकती हुई बोली...

"एक मिनिट..." संदीप ने मोबाइल निकाला और एक नंबर. डाइयल कर दिया...," हेलो भाई!"

"ये.. ये आपसे बात करना चाहती है... एक मिनिट..!" संदीप ने कहा और फोन मेरे कान से लगा दिया....

"हेलो.." मैने कहा...

ढोलू का जवाब काफ़ी देर बाद आया.. उसकी आवाज़ में हल्की सी हड़बड़ाहट थी....,"कौन?"

"मैं... अंजलि....!"

"और कौन है वहाँ..?" ढोलू ने पूचछा...

"कोई नही...!"

"ओह्ह.. मैं तो डर गया था.. तुम हमारे घर पर हो क्या?"

"ना.. ववो.. हां! मैं शिखा से मिलने आई थी.. मैने बात को सुधारा...

"शिखा कहाँ है..?"

"ववो.. दूसरे कमरे में है....!"

"बोलो.. क्या बात है...?" ढोलू जल्दी जल्दी में बोल रहा था....

"ववो.. ये संदीप फोन वापस नही दे रहा... मुझे तुमसे बात करने का दिल करता है...!" मैने मासूमियत से कहा...

"हाए मेरी जान..! ज़रा अलग होना संदीप से...!" ढोलू अचानक उत्तेजित सा लगने लगा....

"हां.. आ गयी... "मैने वहीं खड़े खड़े कहा....

"तुम्हारा सच में दिल करता है क्या.. मुझसे बात करने का...!" ढोलू पासीज सा गया था...

"और नही तो क्या? उस दिन के बाद तुम मिले ही नही हो... मेरा बुरा हाल करके छ्चोड़ गये....!" मेरी आवाज़ में कामुकता तो पहले ही थी.. अब शब्द भी कामुक हो गये....

"क्या करूँ जान.. मजबूरी है... बस थोड़े दिन रुक जाओ.. तुम्हारी सील मैं ही तोड़ूँगा...!"

"मुझसे नही रुका जाता अब.. जल्दी आ जाओ... मेरे वहाँ पता नही कैसा हो रहा है...

"हाए मेरी जान... कहाँ कैसा हो रहा है...." ढोलू का बुरा हाल हो गया लगता था..

"वहाँ.. नीचे...!" मैं संदीप की ओर मुस्कुरा कर बोली...

"हाए मेरी छम्मक्छल्लो.. एक बार बोलो.. मेरी चूत लंड माँग रही है...!"

"हां.. सच्ची...!" मेरा हाथ मेरी सलवार में घुस चुका था... संदीप अजीब सी नज़रों से मुझे घूरता रहा...

"हाँ नही.. बोल कर दिखाएक बार.. क्या माँग रही है तेरी चूत....?"

"मुझे नही पता.. तुम जल्दी आकर खुद ही देख लो..." मैं शरारत से कसमसाती हुई बोली.....

"तुम समझती नही जान.. ये पोलीस मेरी दुश्मन बनकर मेरे पिछे लगी है.. बस थोड़े से दिन और रुक जाओ...!"

"ये संदीप ना तो तुम्हारा नंबर. दे रहा है.. और ना ही मोबाइल...!" मैने शिकायती लहजे में कहा...

"वो ठीक ही कर रहा है जान.. थोड़े दिन रुक जाओ.. मैं नया मोबाइल दे दूँगा तुम्हे..!"

"कम से कम अपना नंबर. तो दे दो... मैं तुम्हे फोन तो कर लूँगी..." मैने अपनी योनि की फांकों को उंगली से कुरेदते हुए पूचछा....

कुच्छ देर ढोलू कुच्छ नही बोला... मैने एक नया पत्ता फैंका..,"मैं कल या परसों शहर आ रही हूँ... वहाँ तो मिल सकते हो ना!"

"मेरा नंबर. लिख लो... ध्यान रखना.. किसी के हाथ लग गया तो मेरी मा चुद जाएगी अच्छे से... तुम किसी को नही दोगि ना...!"

"नही.. तुम्हारी कसम...." उसके साथ बातों में खोए खोए मुझे पता ही नही चला की कब संदीप ने मेरी सलवार खोलकर नीचे सरका दी थी... जैसे ही उसने मेरे 'पेडू' से नाक' सटाते हुए मेरी 'योनि' में गरम साँस छ्चोड़ी.. मैं उच्छल पड़ी... इसके साथ ही मेरी टाँगों में जैसे जान बची ही ना हो... संदीप के हल्का सा ज़ोर लगते ही मैं पिछे गिर पड़ी... संदीप ने मेरी जांघों को हाथों में दबोच कर अपना मुँह उनके बीच घुसा दिया...

ज़ोर से सिसक कर मैने अपनी जांघें कसकर उसकी कमर के उपर रख दी..,"अया...!"

"क्या हुआ ...?" ढोलू ने मेरी सिसकी लेने का तरीका सुन कर चौंकते हुए पूचछा....

"आ.. कुच्छ नही... नीचे पता नही क्या हो रहा है...अयाया..." आनंद के मारे मरी सी जा रही मैं अपनी जांघों को खोलने भींचने लगी.. संदीप पूरे मज़े से मेरी योनि को चाट रहा था... जैसे ही उसकी जीभ की नोक मेरी 'योनि' के दाने पर आकर टिकती.. मुझे खुद पर काबू रखना मुश्किल हो जाता और मैं सिसक उठती....

"तुम हो कहाँ इस वक़्त...?" ढोलू को कुच्छ शक सा होने लगा था....

"अया... तुमसे बात करते हुए चौपाल में आ गयी हूँ... संदीप का मोबाइल लेकर...!" मैने बहाना बनाया....

"ओह्ह.. संदीप कहाँ है..?"

"घर पर ही होगा...आईईई!" मैं एक बार फिर धहक उठी... संदीप ने फांकों को चौड़ा करते हुए अपनी जीभ मेरी योनि के छेद में घुसा दी थी....

"तुम अपनी चूत रगड़ रही हो ना...?" ढोलू खुश होकर बोला....

"आअहाआनन्न!" मेरी आँखें बंद हो चुकी थी.. मेरे जवाब देने का लहज़ा बदल गया था....

"फोन पर चूत मरवावगी?" ढोलू ने पूचछा...

"अया... कैसे...?" मैं बिलबिला उठी थी... संदीप ने अचानक मेरी पूरी योनि को अपने मुँह में भरकर उसको दातों से हल्के हल्के कुतरना शुरू कर दिया था....

"ऐसे ही.. एक मिनिट.. मेरी बात का जवाब देती जाना... तुम्हे भी बहुत मज़ा आएगा... तुम्हारी चूत कैसी है?"

"अया... गोरी..."

"आ.. गोरी नही मेरी रानी... मक्खन मलाई जैसी बोलो.. बोल कर दिखाओ...!"

"अयाया... अया... मैं स्खलन के बिल्कुल करीब थी.. जैसे तैसे मैने बोलने के लिए शब्द ढूढ़ ही लिए..," मेरी चूऊऊथ मक्खन मलाई हैईआआआह्ह्ह्ह...!"

ढोलू की आवाज़ में भी कंपन सा शुरू हो गया था.....,"मेरे लौदा कैसा है रानी!"

"अया... तेरा लौदा क़ाला... अया.. नही.. तेरा लौदा 'डंडे' जैसा है...." मैं फुदक्ति हुई बोली...

"शाबाश... लड़की की चूत किसलिए होती है बता!"...

"प्याअर करने के लिए...!"

"नही सलीईइ.... चूत चोदने के लिए होती है.. लंड अंदर पेलने के लिए होती है....!"

"आह्ह्हाआ..ओहूओ.. हाआअन्न्न्न्न..अया!" संदीप ने अपनी दो उंगलियाँ मेरी योनि के अंदर डाल दी थी और लपर लपर योनि की फांकों को चूस और चाट रहा था....

"लौदा किसलिए होता है बोल...?" ढोलू ने मस्त होकर पूचछा....

"अया... मुँह में लेकर चूसने के लिए.... आऔर्र्र... चूत चोदने के लिए.....!" मैं गन्गनति हुई बोली....

"और गांद मारने के लिए भी... हाए जान.. मुझसे गांद मरवाएगी ना अपनी...!" ढोलू आगे बोला....

"हाआँ.... ज़ाआआअँ...." अचानक मेरी इंदरियों ने काम करना बंद कर दिया.. मुझे अपनी योनि में से कुच्छ रिस्ता हुआ महसूस हुआ.. संदीप अब भी पागल से होकर उसस्पर लगा हुआ था.. अपनी उंगलियाँ निकाल कर 'वो' अंदर तक मेरी योनि के छेद को जीभ से चाटने लगा.....

"बोल किस'से चुदेगि तू....?" धलोलू ने पूचछा तो मैं कोई जवाब ना दे पाई.... बस पड़ी पड़ी आँखें बंद किए सिसकती रही...

"बोल ना.. किस'से चुदेगि तू....... क्या हुआ? निकल गया क्या?" ढोलू बोला...

"हाआँ...." मेरी आवाज़ से सन्तुस्ति और बेताबी दोनो झलक रही थी....

"नही अभी नही.. थोड़ी देर और... अभी मेरा काम नही हुआ है.. बोल ना.. किस'से अपनी सील तुडवाएगी तू....?" ढोलू तड़प कर बोला... उस बेचारे को क्या मालूम था कि 'सील' तो अब स्वर्ग सिधार चुकी है...

"तेरे से... तेरे लौदे से...!" मैने जवाब दिया...

"ऐसे नही जान.. क्या बोलेगी तू मेरा लौदा हाथ में पकड़ कर.. बोल ना!"

"मैं कहूँगी... मुझे चोद दो.. मेरी सील तोड़ दो.. मेरी चूत को फाड़ डालो... !"

"हाए मेरी रानी.. क्या चीज़ है तू.. एक बाआअर ओउर्र.. बोल ना..!" ढोलू कामुक ढंग से बोला...

"अया.. मेरी मक्खन मलाई चूत में अपना डंडे जैसा लौदा फँसा दो... मुझे चोद दो.." मैने बोलते हुए संदीप को उपर खींच लिया.... मेरा इशारा समझ कर संदीप उपर आया और मेरी जांघों को खोल कर उनके बीच उकड़ू होकर बैठ गया.. मैं एक बार फिर बदहवास सी होकर बोलने लगी...," घुसा दो मेरी चूत में अपना लोड्‍ा... जल्दी करो ना.. मैं मरी जा रही हूँ... चीर डालो इसको... चोद दो मुझे... " मुझे फोन पर ढोलू के हाँफने की आवाज़ें सॉफ सुनाई दे रही थी.. पर वह कुच्छ बोल नही रहा था...

संदीप ने मेरी योनि के बीचों बीच अपना 'डंडा' टिकाया और एक ही झटके में अंदर पेल दिया... आनद की उस अलौकिक प्रकाष्ठा पर पहुँचते ही मैं बावली सी हो गयी...,"हाईए... संडीईईप!"

मुझे बोलते ही अपनी ग़लती का अहसास हो गया था.. पर तीर कमान से निकल चुका था....

"साली बेहन चोद.. तू संदीप के बारे में सोच रही है कुतिया....

"नही.. ववो.. उसका मोबाइल.. अयाया...." संदीप का लिंग बाहर निकल कर एक बार फिर मेरे गर्भाष्या से जा टकराया..," आआआआहह... वो तो उसका ध्यान आ गया था.. ऐसे ही.. तुझसे ही चुदवाउन्गि जान!"

"कुतिया... तू एक नंबर. की रंडी है.. तेरा कोई भरोसा नही.. पर एक बार सील मुझसे तुद्वा लेना.. फिर चाहे कुत्तों से अपनी गांद मरवाना.. समझ गयी... तुम कल ही शहर आ जाओ.. मेरा नंबर. देख लेना मोबाइल में से....

"ठीक है...", मुझे उसकी गालियाँ मदहोशी में बड़ी अच्छि लग रही थी...," तुझसे ही अपनी चूत मराउन्गि... अया.. अया...!"

"एक बार मरवा कर देखना साली.. और किसी का लंड पसंद आ जाए तो बताना फिर... कल पक्का आ रही है ना...?"

"हाँ..!"

"ठीक है.. फोन वापस दे आना.. और किसी को मेरा नंबर. मत बताना.. ठीक है ना...?" ढोलू ने पूचछा...

"हाँ...!" मेरे कहते ही ढोलू ने फोन काट दिया.... मैने ढोलू का नंबर. याद किया और फोन एक तरफ पटक दिया...,"अया... अयाया....!" बोल बोल कर धक्के मारो ना जान...!"

"ढोलू से तो बहुत गंदे तरीके से बात करती हो.. मुझसे ऐसे क्यूँ नही करती...!" संदीप धक्के लगाता हुआ बोला....

पहली बार वाली दिक्कत अब नही हो रही थी... सच में मेरी योनि आज मक्खन मलाई जैसी लग रही थी... संदीप का लिंग पूरी सफाई से मेरी योनि की दरारों को चीरता हुआ अंदर बाहर हो रहा था....

"पता नही मुझे क्या हो गया है.. मुझे अब कुच्छ भी बोलते हुए शर्म नही आ रही.. मज़ा आ रहा है गंदा बोलते हुए.....!" मैने संदीप की छाती पर हाथ फेरते हुए कहा और अपने नितंबों को उचकाने लगी...

"तो बोलो ना.. मुझे भी बहुत अच्च्छा लग रहा है.." संदीप धक्के मारते हुए बोला...

"नही.. अब नही बोला जा रहा.." मैं साथ साथ तेज धक्के लगाने लगी थी.. तभी मुझे अहसास हुआ कि संदीप की गति कुच्छ बढ़ गयी है.. मुझे अचानक ख़तरे का अहसास हुआ तो मैने झट से उसका लिंग बाहर निकलवा दिया...

"ये क्या किया? सारा मज़ा खराब कर दिया......!"

"नही अंदर नही... बाहर निकाल लो" मैं थरथरती हुई बोली.. मेरा 'काम' हो गया था....

"ठीक है..."संदीप मान गया और मेरी कमीज़ को चूचियो से उपर चढ़ता हुआ मेरी बराबर में लेट गया......

एक हाथ से वह मेरी चूची को मसलता हुआ दूसरी को मुँह में लेकर चूसने लगा.. अपने दूसरे हाथ से वह धीरे धीरे अपने लिंग को आगे पिछे कर रहा था... मस्ती में चूर होकर मज़े लेते हुए में जल्दी ही एक बार फिर गरम हो गयी.. मेरी योनि फिर से उसका 'लिंग' निगलने के लिए तड़पने लगी....

"संदीप!" मैं करहती हुई सी बोली....

"हाँ!"... उसने चूची के दाने को मुँह से निकाल कर पूचछा...

"अभी.. कितनी देर और लगेगी.....?"

"क्यूँ? जल्दी है क्या? " संदीप ने पूचछा...

"नही.. मुझे एक बार और करना है.."मैं तड़प कर बोली...

"थॅंक्स!" अगले ही पल वह उठा और बड़ी फुर्ती से मेरी जांघों के बीच में आ गया...

"नही.. ऐसे नही...!" मैं हड़बड़कर खुद को समेट कर बैठ गयी...

"तो कैसे?" उसने नासमझ सा बनकर पूचछा....

"पहले निकाल लो.. फिर दोबारा करना.. अंदर इसका रस नही निकलना चाहिए...." मैने उसका लिंग अपने हाथ में पकड़ लिया और सहलाने लगी...

"एक बात बोलूं.. बुरा मत मान'ना....!" संदीप गिड़गिडता हुआ सा मेरी ओर देखने लगा...

"क्या?" मैं उसके सामने उल्टी होकर लेट गयी और उसके लिंग के सूपदे को जीभ निकाल कर चाटने लगी.. वह सिसक उठा...

"पीछे कर लूँ क्या?" वह आहिस्ता से टेढ़ा होकर जैसे ही लेटा.. उसकी चीख सी निकल गयी...,"आईईई..."

"क्या हुआ?" मैने चौंक कर पूचछा...

"कुच्छ नही..." वह अपनी कोहनी को सहलाता हुआ बोला..," पथर पड़ा है शायद नीचे..." उसने चदडार को पलटा तो सचमुच वहाँ करीब 2-2.5 किलो का पत्थर निकला... संदीप ने 'वो' निकाला और पिछे डाल दिया.... वापस ऐसे ही वह मेरे नितंबों की तरफ मुँह करके लेट गया और उन्न पर प्यार से हाथ फेरता हुआ बोला....,"पिछे कर लूँ क्या अंजू?"

उसके सूपदे को एक बार मुँह में लेकर उसको जीभ से गुदगुदकर मैने 'पूच्छ' कि आवाज़ के साथ उसको बाहर निकाला और गौर से उसके लिंग के छिद्र को देखती हुई बोली..,"पीछे?... पीछे क्या?"

मेरे नितंबों को दोनो हाथों से अलग अलग चीर कर उसने मेरी योनि में उंगली घुसा दी.. मैं उच्छल सी पड़ी.. अगले ही पल उसने रस से सनी उंगली मेरे गुदा द्वार पर रख दी और हल्का सा दबाव बनाते हुए बोला,"इसमें..!"

"इसमें क्या? पता नही क्या बोल रहे हो...?" मैने कहा और उसकी बात पर ध्यान ना देते हुए आँखें बंद किए उसके लिंग को चूस्ति रही....

"अपना लौदा इसमें घुसा दूँ क्या?" बोलते हुए उसने अचानक उंगली का दबाव मेरे गुदा द्वार पर बढ़ा दिया... मैं दर्द से बिलखती हुई छ्ट-पटाने लगी..,"आई मुम्मय्यी... निकालो बाहर इसको!" उसकी उंगली का एक 'पोर' मेरे अंदर घुस गया था....

उंगली निकाल कर वा बोला..," मज़े आए ना!"

"मज़े?" मैने गर्दन घूमकर उसको घूर कर देखा..,"जान निकल गयी होती मेरी... दोबारा फिर ऐसा किया तो फिर कभी तुमसे प्यार नही करूँगी.....!"

"तुम तो वैसे ही डरी हुई हो.. पहली बार तो आगे भी दर्द हुआ था... एक बार घुस्वा कर तो देखो... 'गांद' मारने और मरवाने में और भी मज़े आते ही...."

"तुम मरवा लेना.. ये तो तुम्हारे पास भी है ना...!" मैं कहकर हंस पड़ी और फिर से उसके लिंग को मुँह में दबा लिया... वह भौचक्क सा मेरी और देखता रहा.. फिर अपने 'काम' पर लग गया....

"अच्च्छा.. ठीक है.. मुँह में तो निकालने दोगि ना....?" उसने मेरे नितंबों पर दाँतों से हल्का सा काट लिया.. मैं सिसकती हुई उच्छल कर बैठ गयी...,"हां.. ये मान लूँगी... तुम्हारा 'रस' बहुत अच्च्छा लगा था मुझे..."

वह अगले ही पल खड़ा हुआ और अपनी टाँगें चौड़ी करके मेरे होंटो पर अपना लिंग रख दिया.. मैं मुस्कुराइ और अपने होन्ट उसके लिंग के स्वागत में पूरे खोल दिए... उसने आगे होकर अपना आधा लिंग मेरे हलक में उतार दिया.. मैने अपने हाथ से उसकी जांघें पकड़ कर उसको 'बस' करने का इशारा किया...

संदीप जो काम थोड़ी देर पहले अपने हाथ से कर रहा था.. अब वह काम मेरे होन्ट कर रहे थे... उसने जैसे ही अपना लिंग आगे पिछे करना शुरू किया, मैने अपने होन्ट उसके चारों ओर कस दिए...

उसने पिछे से मेरे बालों को पकड़ा और धक्कों की स्पीड बढ़ा दी.. हर बार उसका लिंग मेरे गले में ठोकर मार रहा था.. तीन चार बार मुझे अजीब सा महसूस हुआ.. पर उसकी सिसकियाँ सुन सुन कर मुझे भी मज़ा आने लगा और मैं और भी जोश से उसका लिंग अपने होंटो में दबोच कर उसको आगे पिछे होते देखती रही... अचानक उसने मेरे बालों को खींच लिया और अपना लिंग अंदर करके खड़ा खड़ा काँपने सा लगा... अगले ही पल उसके 'रस' की धार सीधी मेरे गले में जाकर टकराई.. पर पता नही क्यूँ मैं उसको गटक नही पाई.. इसके बाद तीन चार और झटकों में मेरा मुँह पूरा भर गया... लगातार काफ़ी देर तक हान्फ्ते रहने के बाद उसने अपना लिंग जैसे ही बाहर निकाला.. मैने एक तरफ होकर उल्टी सी कर दी....

"क्या हुआ?" वह घबराकर बैठ गया...

"कुच्छ नही.. अंदर नही पिया गया..." मैने कहा और बड़ी बेताबी से उसके आधे झुके हुए झंडे को मुँह में दबोच लिया और जीभ से उसको 'पापोलने' लगी.... संदीप से भी ज़्यादा मुझे उसके लिंग के 'तन' कर सीधा हो जाने का इंतजार था... कुच्छ ही देर बाद संदीप ने अपने दोनो हाथों में मेरी गोल तनी हुई चूचियो को थाम लिया और सिसकियाँ भरने लगा....

"ये लो.. कर दिया खड़ा..." मैं खुश होकर जैसे ही उसके लिंग को मुँह से निकाल कर पिछे हटी.. मुझ पर मानो आसमान टूट पड़ा... मेरा अंग अंग काँप उठा... मेरी आँखें डर के मारे 'सुन्दर' पर ही जमी रह गयी....

'सुन्‍दर' दूसरे कमरे की 'दहलीज पर बैठा मुस्कुरा रहा था...,"साले.. लौदा खड़ा करने में ही तुझे आधा घंटा लगता है.. 'वो' भी ऐसे करार माल के सामने! हट पिछे.. तू फिर कभी करना.. मेरी बारी आ गयी.....!" सुन्दर ने मेरी दोनो बाहें पकड़ी और किसी गुड़िया की तरह सीधी खड़ी कर लिया.... मैं अपने आपको छुड़ाने के लिए छ्ट-पटाने लगी.. पर उस मुस्टंड के आगे मेरी क्या चलती...."

"कुच्छ याद आया..? कहा था ना कि एक दिन तुझे अपने लंड पर बिठा कर चोद चोद कर जवान करूँगा...!" उसने बड़ी बेशर्मी से कहा और पिछे से मेरे नितंबों के बीच हाथ डाल कर हवा में उठा लिया......

"छ्चोड़ दो मुझे..." मैने हवा में ही पैर चलते हुए सहायता के लिए नम आँखों से संदीप की ओर देखा.. पर वह 'चूतिया' सा मुँह बनाए अलग होकर हूमें देखता रहा.....

"अच्च्छा.. साली कुतिया रंडी की बच्ची... उस दिन मेरा हाथ लगवाने से भी परहेज कर रही थी... आज ये सारा 'प्रोग्राम' तुझे छ्चोड़ने के लिए नही.. चोदने के लिए किया है.. गांद मारूँगा तेरी... तेरी मा की तरह चोदुन्गा.. तेरी चूत का भोसड़ा ना बना दूँ तो नाम बदल देना......" बोलते हुए सुन्दर ने मेरी योनि में उंगली डाल दी... मैं बिलखने लगी थी.. और कर भी क्या सकती थी....!

"चल कमीज़ निकाल कर पूरी नंगी हो जा... आज तुझे 'मुर्गी डॅन्स' कराता हूँ..." कहते हुए उसने मुझे नीचे पटक दिया...," तुझे जाना है या खड़ा होकर तमाशा देखेगा...!" उसने संदीप से कहा....

"मैं बाद में कर लूँगा भाई... !" संदीप खड़ा खड़ा बोला....

"बाद में क्या घंटा मज़ा आएगा तुझे... मेरे चोदने के बाद ये तीन चार दिन तक चोदने लायक नही रहेगी...ले जल्दी चोद ले.. तेरा माल है.. पहले तेरा ही हक़ बनता है...." कहकर सुन्दर वापस जाकर कमरे की दहलीज पर बैठ गया.....

मैं आँखों में ढेर सारे आँसू लिए हुए संदीप को निरीह नज़रों से देखती हुई बोली..," ऐसा क्यूँ किया तुमने....?"

"वववो.. म्मै.. कुच्छ नही होगा अंजू...! ये भी आराम से करेगा....! मैं बोल दूँगा...." संदीप धीरे धीरे मेरे पास सरक आया....

मेरी आँखों से झार झार आँसू बहने लगे.... मेरे शरीर में मानो जान बची ही ना हो... संदीप ने जैसे लिटाया मैं लेट गयी... उसने मेरी जांघें सुन्दर के सामने ही खोल दी..

सच कहूँ तो पहली बार मुझे तब अहसास हुआ था कि 'शर्म' और इज़्ज़त क्या होती है... मुझे जो आदमी फूटी कोड़ी नही सुहाता था.. 'वो' मेरे नंगेपन का लुत्फ़ उठा रहा था.... उस दिन मुझे पहली बार अहसास हुआ कि मैं कितनी गिरी हुई हूँ.. अगर अपनी आकांक्षाओं पर काबू रखती तो शायद ऐसा दिन कभी ना आता....

इस आपा धापी में संदीप का लिंग सिकुड गया था.. वह बेचैन सा होकर मेरी योनि को मसलता हुआ दूसरे हाथ से उसको खड़ा करने की कोशिश करने लगा...

तभी सुन्दर खड़ा होकर मेरे पास आकर बैठ गया..," जवान हो गयी.. हैं..क्या बात है..?" उसने कहा और मेरी चूची की एक घुंडी पकड़ कर मसल दी... मैं दर्द से बिलख उठी...

"वैसे एक बात तो है... तेरी मा के बाद गाँव भर के मर्दों को संभालने लायक माल बन चुकी है तू.... देख क्या कड़क चूचिया हैं.. तेरी मा की भी जवानी में ऐसी ही थी... साली को बचपन से चोद रहा हूँ... अब तुझे चोदुन्गा!.... बुढ़ापे तक.. हा हा हा...!" सुन्दर ने कहा और मेरी चूचियो पर झुक गया... अपने काले काले मोटे होन्ट जैसे ही उसने मेरी चूचियो पर लगे.. मुझे लगा मुझे तुच्छ और घृणित लड़की इस पूरी दुनिया में नही होगी.... मेरा रोम रोम बिलख उठा.. मंन में आ रहा था कि जैसे....

अचानक मेरे मंन में एक ख़याल आया... संदीप का सिर झुका हुआ था.. सुन्दर आँखें बंद किए मेरी छातियो पर लेटा हुआ उन्हे बारी बारी चूस रहा था.. मैं अपने हाथ धीरे धीरे पिछे ले गयी और 'वो' पत्थर ढूँढने लगी.... मेरी किस्मत कहें या सुन्दर का दुर्भाग्या.. कुच्छ देर बाद 'वो' पत्थर मेरे हाथ में था....

मैने आव देखा ना ताव.. पूरी सख्ती से चिल्लाते हुए मैने पत्थर सुन्दर के सिर में दे मारा... उसने दहाड़ सी मारी और एक तरफ गिर कर अपना सिर पकड़ लिया.. उसका खोपड़ा खुल गया था....

अब मेरे पास ज़्यादा समय नही था... अवाक सा संदीप जब तक बात को समझ पाता.. मैने खींच कर एक लात उसकी छाती में दे मारी... मैं अब भी रो रही थी.. हड़बड़ाहट में मैं उठी और अपनी शॉल और सलवार ले कर बद-हवास सी बाहर भागी... संदीप मेरा पिच्छा करते हुए बरामदे तक आया और फिर लौट गया....

"पूरी गली मैने भागते हुए पार की... गली के कोने पर मूड कर देखा.. पर किसी के आ रहे होने की आहट सुनाई नही दी.. मैने जल्दी से अपनी सलवार पहनी और सुबक्ती हुई तेज़ी से घर की ओर चल दी......

"क्या हुआ अंजू...?" मीनू दरवाजा खोलते ही मेरे टपक रहे आँसुओं को देख कर भयभीत हो गयी....

"दीदी!" मैने इतना ही कहा और उस'से लिपट कर बिलखने लगी...... तब तक पिंकी भी मेरे पास आ चुकी थी...,"क्या हुआ अंजू?"

"कुच्छ मत बोल इस'से अभी.." मीनू मुझे अपने सीने से लगाए हुए बोली... चुप हो जा अंजू.. मम्मी ने सुन लिया तो तमाशा हो जाएगा.... 'ववो.. सोनू की लाश गाँव में आ चुकी है... पापा नीचे आए थे.... हमने कह दिया था कि तू बाथरूम में है...... शुक्र है तू आ गयी.. वरना पापा आते ही फिर पूछ्ते..... बस कर.."

कुच्छ देर रज़ाई में मीनू के साथ लेटी रहने के बाद मेरा सुबकना भी रुक गया... पर रह रह कर सुन्दर का ख़याल आते ही मेरे मंन में झुरजुरी सी उठ रही थी....

"क्या हुआ अंजू...?" मुझे सामान्य होता देख पिंकी भी मेरे पास आ बैठी....

अब मैं कुच्छ भी छिपाना नही चाहती थी... जो कुच्छ भी हुआ.. मैने सब बता दिया...!

"मैं ना कहती थी तुझसे.. संदीप एक नंबर. का कुत्ता कमीना है... क्यूँ गयी तू वहाँ...?" पिंकी तुनक कर बोली...

"बस कर पिंकी.. इसने जो कुच्छ भी किया.. मेरे लिए ही तो किया है...!" कहकर एक बार फिर मीनू मुझे सीने से लगा कर दुलार्ने लगी..... मेरी सुबाकियाँ एक बार फिर शुरू हो गयी.....

उस रात के 36 घंटे बाद भी मेरे दिमाग़ से वो घिनौना पल निकल नही पाया था... आख़िरी पेपर में संदीप ने अपने आप ही बोलकर मुझे सुन्दर से सावधान रहने को कहा था.. उसने बताया कि सुन्दर के सिर में 6 टाँके आए हैं.. यह भी कि वो मुझे पूरे गाँव के सामने जॅलील करने की बात कह रहा है.. मैं सहमी हुई थी.. मुझे नही पता था कि आगे क्या होने वाला है...

मेरे ज़िद करने पर मीनू ने पापा से मुझे शहर ले जाने की बात भी की.. पर पापा ने साफ मना कर दिया....

मीनू शहर कॉलेज जाने को तैयार होकर बैठी थी.. तैयार तो पिंकी और मैं भी थे.. पर मेरे बिना मीनू ने पिंकी को भी ले जाने से मना कर दिया...

पिंकी अपना मुँह फुलाए बैठी थी और हम दोनो उसके पास चुप्पी साधे बैठे थे..

"अच्च्छा अंजू.. मैं चलती हूँ...!" गहरी साँस लेकर मीनू खड़ी हो गयी...

"नही दीदी.. मैं भी आपके साथ चल रही हूँ...!" मैने अचानक अपना मंन बनाते हुए कहा....

"नही.. तू कैसे चल सकती है.. चाचा ने साफ साफ मना कर दिया है...!" मीनू मायूस होकर बोली... दिल तो उसका भी बहुत कर रहा था मुझे साथ लेकर जाने का.. मानव का भी ये बात सुनकर मूड ऑफ हो गया था कि मैं शहर नही आ सकती.. उसने कहा भी था कि दोबारा बात करके देख लो.. पर उसको पापा के नेचर का पता नही था.. हम दोबारा बात करने की सोच भी नही सकते थे....

"नही दीदी.. मेरा चलना बहुत ज़रूरी है.. पापा तो खेत में गये हैं.. उनको क्या पता लगेगा...! शाम तक तो हम वापस आ ही जाएँगे..." मैने पूरा मंन बना लिया था.. पिंकी चुपचाप हमारी ओर देखती हुई निर्णय का इंतजार कर रही थी...

"पर.. अगर पता चल गया तो...!" मीनू ने आशंका से मेरी और देखा...

"कोई बात नही.. देखा जाएगा वो भी.... मैं चल रही हूँ आपके साथ...!" मैं खड़ी हो गयी...

कुच्छ देर की चुप्पी के बाद मीनू अपने माथे पर बल लाती हुई बोली...,"ठीक है.. तुम दोनो आगे चलो.. मैं तुमसे पिछे आउन्गि..."

"हुर्रेयययी..." पिंकी ने कहा और खुश होकर मुझे बाहों में भर लिया..,"चलो चलें.. बस ना निकल जाए कहीं...!"

मैं चाह कर भी अपने चेहरे पर हँसी के भाव नही ला सकी... हम दोनो घर से बाहर निकल कर बस स्टॅंड की ओर चल पड़े....

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शहर जाते हुए मेरे मंन में खुद के लिए कोई उत्साह नही था.. कुच्छ था तो सिर्फ़ ढोलू को पकड़वा कर मीनू और पिंकी की नज़रों में ये साबित करने का कि उस दिन मैने जो कुच्छ भी किया था सिर्फ़ और सिर्फ़ मीनू के लिए ही किया था... ऐसा करके मैं कुच्छ हद तक आत्मग्लानि से भी मुक्त हो रही थी...

दरअसल.. सुन्दर के उस रात के डाइलॉग मेरे दिमाग़ में रह रह कर हथोदे की तरह चोट कर रहे थे.. आख़िरकार मैं अपना 'वजूद' टटोलने पर मजबूर हो ही गयी थी...

पिंकी जैसी मेरी उमर की जाने कितनी ही लड़कियाँ थी जो लड़की होने का मतलब जानती थी.... अपनी मर्यादायें अच्छि तरह से समझती थी और उन्हे खुशी खुशी निभा भी रही थी... फिर उस कच्ची उमर में मेरा मंन ही क्यूँ बहक रहा था? मैं ही क्यूँ 'जल्दी' जवान होने को मचल उठी थी... मैं ही क्यूँ लड़कों की 'मर्दानगी' से इतनी जल्दी रूबरू होना चाहती थी.... ? सच कहूँ तो इन्न सब सवालों का जवाब मेरे पास उस वक़्त कतयि नही था.. पर इतना ज़रूर था कि उस वक़्त मुझमें भी 'पिंकी' जैसी बन'ने की इच्च्छा सिर चढ़ कर बोलने लगी थी....

"मैने मानव को बता दिया कि तू आ रही है.. सुनते ही खुश हो गया.." मीनू ने पिच्छली सीट से मेरे कान के पास होन्ट लाकर बताया.. मैं आनमने से ढंग से मुस्कुरा दी...

"क्या कह रही हैं दीदी?" पिंकी ने मचलते हुए मुझसे पूचछा.. बस की आवाज़ में शायद 'वो' सुन नही पाई थी...

"कुच्छ नही.. मानव को बता दिया कि मैं आ रही हूँ... खुश हो गया!" मैने धीरे से उसको कहा...

"और मैं..?" पिंकी ने मेरी तरफ देखा और फिर पिछे मूड गयी..," मेरे बारे में क्या बोले दीदी..?"

"चुप करके बैठी रह.. चल कर पूच्छ लेना...!" मीनू ने उसको दुतकार सा दिया.. पिंकी अपना सा मुँह लेकर बैठ गयी.....

"इस आदमी का क्या करें..? ये तो कल से फोन पर फोन कर रहा है...!" मीनू ने एक बार फिर मेरे कान में ही कहा......

"वहीं चल कर पूच्चेंगे.. उन्होने मना किया है ना?" मैने कहा...

"क्या?" पिंकी ज़्यादा देर चुप ना बैठ सकी.....

"वो मैं कह रही हूँ कि पिंकी को 'जलेबी' बहुत पसंद हैं...!" मुझसे पहले ही मीनू बोली और हँसने लगी....

"हाँ.. और चॉककलते और 'समोसा' भी...." पिंकी का चेहरा खिल उठा....

सुनकर मैं भी हँसे बिना ना रह सकी... पर हमारी हँसी से अंजान 'पिंकी' कुच्छ देर बाद फिर बोल उठी...,"आज तो मैं गोलगप्पे भी खाउन्गि.... मेरे पास 100 रुपए हैं...!"

"बस कर भूखी... सब सुन रहे हैं...!" मीनू ने उसके कान के पास आकर उसको लताड़ लगाई......

9:00 बजे से कुच्छ पहले ही हम शहर के बस स्टॅंड पहुँच गये.. मीनू ने नीचे उतरते ही मानव को फोन किया..,"हाँ.. वो.. हम यहाँ पहुँच गये.. बस अड्डे पर...!"

"पर मैने बताया तो था कि 9:00 बजे के आसपास हम पहुँच जाएँगे..!" मीनू ने फिर से कहा....

"ठीक है.. हम यहीं वेट करते हैं तब तक....!" मीनू ने मायूस होकर फोन काट दिया...

"क्या बोले वो?" मैने मीनू के कॉल डिसकनेक्ट करते ही पूचछा....

"कह रहा है अभी टाइम लगेगा.. हमने रात को मना कर दिया था ना... वो अभी घर पर ही है...!" मीनू ने इधर उधर देखते हुए कहा और फिर बोली..,"आओ.. वहाँ अंदर बैठते हैं...!"

हम दोनो मीनू के पिछे पिछे जाकर बस-स्टॅंड के अंदर एक जगह बैठ गये...

"चलो ना दीदी.. तब तक मार्केट घूम आते हैं..." पिंकी से रहा ना गया...

"चुप करके बैठ जा थोड़ी देर...! पहले ही दिमाग़ खराब है...इतने दीनो बाद तो कॉलेज आई थी.. लगता है आज भी क्लास अटेंड नही कर पाउन्गि...!" मीनू ने हताशा से कहा....

तभी अचानक पिंकी ने मेरे कान में फुसफुसाया..,"हॅरी!"

नाम मुझे सुन गया था.. पर मैं मतलब नही समझ पाई..,"क्या हॅरी?"

पिंकी का चेहरा अचानक तमतमा सा गया.. उसने सकपका कर मीनू की ओर देखा और हड़बड़ा कर इशारा करते हुए बोली...,"कुच्छ नही.. वो.. हॅरी जैसा लग रहा है ना..!"

हम दोनो की नज़रें उसकी उंगली का पिच्छा करते हुए हमसे काफ़ी दूर खड़े होकर रह रह कर हमारी ही ओर देख रहे हॅरी पर पड़ी...

"हाँ.. हॅरी ही है.. वो शहर नही आ सकता क्या?" मीनू उसको पहचान कर पिंकी की ओर देखते हुए बोली..,"तो क्या हुआ?"

"न्नाही.. ववो.. मुझे लगा शायद वो हॅरी नही है...!" पिंकी की साँसे उखड़ गयी...

शायद हमें अपनी और लगातार देखता पाकर हॅरी हमारे पास ही आ गया..,"वो.. आज यहाँ कैसे..?"

"बस.. कुच्छ काम सा था.. !" मीनू बनावटी तौर पर मुस्कुरकर बोली....

"ओह्ह... 9:00 वाली बस में आई हो क्या..?" हॅरी ने पूचछा...

"हाँ.. तुम भी?" पिंकी से बोले बिना रहा ना गया....

"नही.. मैं बस थोड़ी देर पहले ही गाड़ी से आया हूँ.. मुझे पता होता तो..." हॅरी कुच्छ कह ही रहा था कि मीनू ने बीच में ही टोक दिया...,"नही.. कोई बात नही....

"यहाँ कैसे बैठी हो..? किसी का इंतज़ार है क्या?" हॅरी ने आगे पूचछा....

"नही.. हाँ.. ववो एक फ्रेंड आनी है मेरी...!" मीनू ने सकपकते हुए बोला....

"लो.. तब तक पेपर पढ़ लो.. मैं भी किसी का इंतजार ही कर रहा हूँ..." कहकर हॅरी मीनू वाली साइड आकर बैठ गया......"

कुच्छ देर हम चारों चुप चाप बैठे रहे.. अचानक मीनू मुझे अख़बार देकर खड़ी हो गयी..,"अच्च्छा.. मैं चलती हूँ.. मेरी फ्रेंड बाहर आ गयी होगी... उसका फोन आएगा तो मैं बोल दूँगी कि तुम यहाँ बैठे हो...! आजा पिंकी.. कॉलेज घुमा लाती हूँ..."

"नही दीदी.. मैं अंजू के साथ ही बैठती हूँ... पर आप..?" पिंकी कुच्छ बोलते बोलते रुक गयी...

"कोई बात नही.. तुम आराम से बैठे रहो.. अभी तो थोड़ी देर हॅरी भी यहीं होगा.....!" मीनू ने मुड़कर कहा...

"हाँ.. मैं तो काफ़ी देर यहीं हूँ..." हॅरी ने कहा और मीनू के बस-स्टॅंड से बाहर निकलते ही मुझसे पूचछा...,"कौन आ रहा है...?"

"ववो.. कोई.. एक रिलेटिव है.." और कुच्छ मेरी समझ में ही नही आया....

"ओह्ह... कहीं आगे जा रहे हो क्या?" हॅरी कुच्छ ज़्यादा ही सवाल जवाब कर रहा था....

"हाँ.. वो.. पिंकी!" मैने पिंकी का हाथ पकड़ कर कहा...,"आना एक बार...!" और उसको उठाकर दूर ले गयी....

"ये क्यूँ आ गया?" मैने पिंकी की आँखों में देख कर डर से कहा..," पहले ही मेरी टांगे डर के मारे काँप रही हैं... अब ये.. इनस्पेक्टर इसके सामने ही कुच्छ बोल ना दे!"

पिंकी की आँखों में एक अलग ही नूर चमक रहा था...,"कुच्छ नही होगा.. तुम्हे पता है ना ये किसी को कुच्छ नही बताता कभी..."

"वो तो ठीक है.. पर ये खुद क्या सोचेगा...?" मैने बुरा मुँह बनाकर कहा.. मेरी कही गयी ये बात मुझमें बदलाव का पहला सबूत थी....

"कुच्छ नही होगा... और वो.. तुम इसको 'पटाकर दिखाने की बोल रही थी.. दिखाओ अब!" पिंकी ने मुझे चॅलेंज करने के अंदाज में कहा....

"प्लीज़ पिंकी.. मुझसे ऐसी बात मत करो.. मेरे सिर में दर्द हो रहा है...!"

"ठीक है... मार्केट चलें तब तक.. हॅरी को ले चलेंगे साथ..." पिंकी खिसियकर बोली...

"पागल है क्या तू.. इनस्पेक्टर आने वाला होगा... आधे घंटे से उपर... वो शायद आ ही गया...!" बस स्टॅंड के पिछे आकर रुकी पोलीस ज़ीप को देखकर मैं बोली...

कुच्छ देर बाद मानव सीधा हमारे पास आकर खड़ा हो गया...ब्लॅक जीन्स और वाइल टी-शर्ट में 'वो' बड़ा ही स्मार्ट लग रहा था... शायद मीनू के लिए तैयार होकर आया था...," इसको क्यूँ उठा लाए...? इसको थोड़े ही साथ लेकर चल सकते हैं....!" मानव पिंकी को देख कर बोला....

पिंकी अपने उपर हुए इस अप्रत्याशित हमले को देख कर भौचक्क रह गयी.. वो रोनी सूरत बनाकर मानव की ओर देखने लगी..

"ववो.. हॅरी है यहाँ.. उसके पास रह लेगी तब तक...!" मेरे मुँह से हड़बड़ाहट में निकल गया.....

"कौन.. दूर बैठे हॅरी को हमारी ही तरफ देखते पाकर मानव बोला..,"वो.. ! वो तुम्हारे साथ ही है क्या?"

"हाँ..!" मैने कह दिया....

"ठीक है.. तुम यहीं बैठना.. थोड़ी देर बाद मीनू आ जाएगी या हम.. तब तक कहीं जाना नही.. ठीक है...!" मानव ने जल्दी जल्दी में कहा और मेरी ओर देख कर बोला...,"आओ.. मेरे साथ!"

मैं बार बार मुड़कर पिंकी की ओर देखती हुई उसके पिछे चल दी.. पिंकी की शकल रोने जैसी हो गयी थी.. वो अब तक वहीं खड़ी थी.. हॅरी से दूर...!

"नंबर. याद है...?" मानव ने पूचछा....

"हन..! आपके साथ और पोलीस वाले नही हैं क्या?" मैने पूचछा....

"वो यार.. जल्दी निकलना पड़ा.. फिर तुम यहाँ इंतजार कर रहे थे.. मैने बोल भी दिया है वैसे.. कोई टाइम तक आ गया तो ठीक है.. वरना.... पर क्यूँ पूच्छ रही हो..?" मानव ने अचानक पूचछा....

"मुझे डर लग रहा है बहुत..." मैं सचमुच्च डरी हुई थी...

"मुझसे?" वा हंसता हुआ बोला....

"नही... उस'से!" मैने सपस्ट किया....

"तुम्हे सिर्फ़ एक फोन ही तो करना है... फोन करके उसको यहाँ बुला लो... बाकी मैं देख लूँगा.... इसमें डरने वाली क्या बात है...?"

हम दोनो अभी बस-स्टॅंड की चारदीवारी के अंदर ही खड़े थे... उसने मुझे सारी बातें खोल कर समझाई और मुझे बस-स्टॅंड के सामने पी.सी.ओ. के बारे में बताता हुआ बोला..,"वो जहाँ कहे.. वहीं खड़ी हो जाना... किसी भी तरह का डर मंन में मत रखो.. वह जहाँ भी खड़ा होने को बोले.. खड़ी हो जाना.... मेरी नज़र तुम पर ही रहेगी.. ठीक है...? डरना मत!"

मैने सहमति में सिर हिलाया और बस-स्टॅंड के बाहर निकल कर पी.सी.ओ. जा पहुँची...

"हेलो..." मैने ढोलू के फोन उठाते ही कहा....

"हाए मेरी रानी...! कल से शहर में डेरा डाले पड़ा हूँ तेरे लिए... कहाँ है तू....?" ढोलू की आवाज़ में उत्साह सॉफ झलक रहा था....

"मैं शहर आ गयी हूँ... बस-स्टॅंड के बाहर से फोन कर रही हूँ...!" मैने अपनी आवाज़ को यथासंभव सामान्य बनाते हुए कहा.....

"ऐसा करो... कोई ऑटो कर लो.. उसको बोलो कि 'काले के ढाबे' के पास उतार दे.. वहाँ मेरे लड़के मिल जाएँगे...!" ढोलू ने कह कर मुझे संशत में डाल दिया....

"पर.. पर मैं... तुम यहीं आ जाओ ना... मैं कैसे आउन्गि वहाँ..?" मैं हड़बड़ा सी गयी....

"अरे तुझे पता नही है... मैं शहर के अंदर नही आ सकता... बताया तो था तुझे... 'वो' लड़के भी नही आ सकते... किसी और को मैं भेजूँगा नही.. क्या पता मेरे से पहले ही 'वो' तेरा 'काम' कर दे..... तू जल्दी आ जा.. ढाबे से तुझे वो आराम से मेरे पास ले आएँगे....!"

"नही.. मैं अपने आप नही आ सकती...!" मैने असम्न्झस से कहा...

"तो अपनी गांद मारा भौसदि की.. साली कुतिया.. तुझे गांद मरवाने की तो पड़ी है... मेरी जिंदगी का कोई ख़याल नही तुझे.. रख दे फोन.....!" कह कर ढोलू ने अचानक फोन काट दिया.....

मैने जाकर मानव को सारी बात बता दी......

"ओह्ह्ह..." मानव के माथे पर बल पड़ गये... कुच्छ देर ऐसे ही वो अपने बालों में खुजली करता रहा.. फिर बोला..," मेरे साथ चल सकती हो वहाँ?"

"हां पर... 'वो'लड़के आपके साथ थोड़े ही मुझे उसके पास लेकर जाएँगे...." मैं बोली....

"देखते हैं... तुम जाकर उसको फोन कर दो कि तुम आ रही हो..." उसने कहा ही था कि दो आदमी मोटरसाइकल पर हमारे पास आकर रुक गये..," जैहिन्द जनाब!" उन्होने आते ही कहा...

"ओह्ह.. आ गये तुम.. अब सब ठीक हो जाएगा अंजू... जाकर फोन कर दो... और फोन करके यहीं आ जाना....." मानव ने कहा....

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मैं फोन करके वापस आई तो मानव का रंग रूप देख कर दंग रह गयी.. एक बार को तो मुझे लगा.. उसके जैसी शकल का कोई और है...

"चलो में'शाब! ऑटो तैयार है..." मानव ने टपोरी लहजे में कहा....

मैं हँसे बिना ना रह सकी... मानव ने ग्रीस में काला हो चुका एक कुर्ता पाजामा डाल रखा था.. पाजाम छ्होटा होने की वजह से उसके टखने सॉफ दिख रहे थे... उसके पास ही एक ग़रीब सा लड़का मानव की जीन्स डाले खड़ा बड़ा ही अजीब लग रहा था...

"आप मेरे साथ ऐसे चलोगे...?" मैं अपना चेहरा हाथों में छुपा कर बोली...

"तुम्हारे पास पैसे हैं...?" मानव बोला...

"मेरे पास 50 रुपए ही थे.. मैने शरमाते हुए नोट निकाल कर दिखाया..,"ये हैं..!"

"गुड.. लाओ.. मुझे दो...!" कह कर उसने नोट झटक लिया.....,"आओ..!"

लड़का हमारे साथ ही था... मानव जाकर आगे बैठ गया..," इसके गियर वेर कैसे लगेंगे भाई...?"

लड़के ने हंसते हुए मानव को ऑटो चलाने के कुच्छ टिप्स दिए.. और मानव को नीचे उतरने को कहकर रस्सा खींच कर ऑटो स्टार्ट कर दिया..,"संभाल के ले जाना साहब.. मेरी रोज़ी रोटी यही है..." कह कर लड़का अलग हट गया....

"बैठो में'शाब!" मानव ने एक बार फिर मुस्कुरकर मुझे इज़्ज़त बखसी और मेरे बैठते ही ऑटो इधर उधर बहकाता हुआ चलाने लगा......

क्रमशः.............................

gataank se aage............

Sandeep ne jhat se apni shirt utar fainki.. uski gori chhati par hulke hulke baal dekh kar main romach se bhar uthi... chhati par dono aur akde huye uske 'til' bhar ke daane mujhe bade pyare lag rahe the.. jaise hi usne paas baith kar meri chhhatiyon ko dabana shuru kiya.. maine jhat se baith kar usko neeche gira liya aur uske pate par hath ferti huyi uske 'daano' ko choomne lagi....

"aah.. kya kar rahi ho Anju..? Gudgudi ho rahi hai..." Wah ekdum masti se chhatpata kar utha aur ek baar fir mujhe apne neeche daboch liya...

"Karne do na.. mujhe maza aa raha hai bahut..." Apni chhati par uske hath ka dabav mahsoos karke main tadap kar gidgidayi aur apna hath bina der kiye uski pant mein daal diya aur 'kachchhe' ke upar se hi uske 'fufkaarte' huye saanp ka 'fun' apni mutthi mein daboch liya....

"Ohh..hohhhhh..." Mere hath ki moujoodgi ka ahsaas hote hi Sandeep ke ling ne ek jhatke ke sath angdayi si li.. aur aakar mein achanak badhkar seedha hone ki koshish karne laga...

"Isko chooso na jaan... aahhh... tumhare 'kaam' ki cheej toh ye hai..." Sandeep kahte huye apni pant ka 'hook' kholne laga.. Jald hi uski pant uski taangon se bahar thi aur uska 'ling' kachchhe ko 'faad' dene par utaaru ho gaya...

Sandeep meri aur munh karke khada hokar muskurane laga.. Uska ishara samajh kar main uske aage ghutne tek kar baith gayi aur kachchhe ke upar se hi ling ko hath mein pakad kar usko apne daanton se hulka sa 'kaat' liya...

Wah uchhal pada..,"aah.. kis mood mein ho aaj? pyar se karo na...!"

"Nahi.. aaj toh main tumhe kachcha hi kha jaaungi..," Maine kaha aur anjane mein hi mere hath meri salwar ke upar se hi machal uthi yoni ko kuredne lage...

"Pyar se bhi toh kha...." Sandeep achanak bolte bolte ruk gaya... Uske pant ki jeb mein rakhe mobile ke vibrations ki 'gharrr..gharrrr..' sannate mein saaf sunayi de rahi thi..,"Ek minute..." Usne pant ki jeb se apna mobile nikala aur kone mein jakar call receive ki....

"Kuchh der chup rahne ke baad Sandeep ne sirf itna hi kaha..,"aadha ghanta".. aur fone kaat diya....

"Kiska fone tha...?" Maine utsukta se poochha...

"Kuchh nahi.. ek dost tha..!" Sandeep ne jaldi jaldi mein apna kachchha nikalnte huye kaha...

"aadha ghanta kya?" maine poochha...

"offoh..Mujhe uske ghar jana hai.. chalo.. jaldi jaldi karte hain...!" Sandeep mere paas aaya aur apna ling mere honton se sata diya....

"Kya? sirf aadha ghanta hi...!" Main mayoos hokar boli..,"aadhe ghante mein kya hoga..." Mujhe achanak dhyan aaya ki 'iss' kaam ke sath mujhe ek aur kaam bhi karna tha.....

"Ohho.. ek baar toh kar lo.. baad ki baad mein dekhenge..." Kahte huye Sandeep ne ghutno ke bal baith kar meri salwar ka nada kheenchne ke liye bahar nikal liya...

Maine uska hath wahin daboch liya..,"tum.. tum mujhse sachcha pyar karte ho na Sandeep?"

"Aur nahi toh kya..? ye tum aaj kaisi baatein kar rahi ho... Jaldi nikalo apni Salwar..!" Sandeep hadbadakar bola...

"Nahi...!" Maine munh banakar kaha....

"Kyun..? ab kya huaa?" wah ghighiya kar bola....

"Pahle mujhe 'wo' mobile chahiye...!" Maine daanv fainka...

"kounsa.. oho.. kitni baar bataaoon.. wo nahi mil sakta ab.. thode dino mein naya lakar de doonga.. tumhari kasam... bus!" Sandeep ne kaha aur jabardasti mera nada kheench kar salwar dheeli kar di.... Main neeche gir gayi.. par maine jaanghon ko kaskar bheench kar apni yoni ko chhipa kar rakha hua tha...

"Nayi.. tum jhooth bol rahe ho.. 'Dholu' ne mana kar diya hoga dene se... mujhe sab pata hai..." Maine narazgi bhare lahje mein kaha aur jhat se khadi hokar apna nada fir se baandh liya....

"Anjuuuuu.... ye kya kar rahi ho yaar.. mere paas jyada time nahi hai.. ab nakhre band karo apne.." Nang dhadang Sandeep jaisi hi pagal sa hokar meri taraf lapka.. uski halat dekh kar meri hansi chhot gayi...,"Nahi.. pahle mobile ki baat!" Main khilkhilate huye idhar udhar bhagne lagi....

"Tumhari kasam jaan.. Dholu se poochh lena chahe... aa jao na..!" Meri hansi se hatotsahit hokar wo ek jagah khada ho gaya aur apna kachchha wapas daal liya.. Shayad usko ahsaas ho gaya tha ki main uske nangepan par hans rahi hoon...

"Theek hai.. puchhwa do pahle....!" Main tapak se boli... Sandeep ne mujhe kamar se pakad kar apni aur kheench liya....

"Ab... jab 'wo' aayega toh uss'se poochh lena.. mere paas uska no. nahi hai..." Meri chhatiyon ko wo apni nangi chhati se dabakar bheenchte huye bola...

"Fir jhooth.. aaah..." Jaise hi Sandeep ne meri jaanghon ke beech hath diya.. main kasmasa uthi...," jab tak tum mobile wali baat clear nahi karwate.. main kuchh nahi karoongi...

Usne jabardasti mujhe wapas wahin patak liya aur yahan wahan hath maar kar mujhe uksaane ki koshish karne laga... Par main jaanboojh kar hansti rahi aur mouka milte hi apni taangon ke sahare uthakar usko door patak deti.....,"Pahle mobile.. baaki 'kaam' baad mein.." Main apni jid par adi rahi....

Thak haar kar 'wo' mujhse door hat gaya...," theek hai.. meri kasam khao ye baat kisi ko nahi bataogi....!"

"kounsi baat?" Uske door hat'te hi mera sara badan bechain sa ho utha tha....

"yahi ki maine tumhari baat Dholu se karwayi hai....!" Sandeep bola...

"Kab karwayi hai...?" Main apni aankhein sikod li aur uske paas jakar uss'se chipakti huyi boli...

"Ek minute..." Sandeep ne mobile nikala aur ek no. dial kar diya...," Hello bhai!"

"ye.. ye aapse baat karna chahti hai... ek minute..!" Sandeep ne kaha aur fone mere kaan se laga diya....

"Hello.." Maine kaha...

Dholu ka jawaab kafi der baad aaya.. uski aawaj mein hulki si hadbadahat thi....,"Koun?"

"Main... Anjali....!"

"aur koun hai wahan..?" Dholu ne poochha...

"koyi nahi...!"

"Ohh.. main toh darr gaya tha.. tum hamare ghar par ho kya?"

"na.. wwo.. haan! main Shikha se milne aayi thi.. maine baat ko sudhara...

"Shikha kahan hai..?"

"Wwo.. dusre kamre mein hai....!"

"Bolo.. kya baat hai...?" Dholu jaldi jaldi mein bol raha tha....

"wwo.. ye Sandeep fone wapas nahi de raha... mujhe tumse baat karne ka dil karta hai...!" Maine maasoomiyat se kaha...

"Haye meri jaan..! jara alag hona Sandeep se...!" Dholu achanak uttejit sa lagne laga....

"haan.. aa gayi... "Maine wahin khade khade kaha....

"Tumhara sach mein dil karta hai kya.. mujhse baat karne ka...!" Dholu paseej sa gaya tha...

"aur nahi toh kya? uss din ke baad tum mile hi nahi ho... Mera bura haal karke chhod gaye....!" Meri aawaj mein kamukta toh pahle hi thi.. ab shabd bhi kamuk ho gaye....

"kya karoon jaan.. majboori hai... bus thode din ruk jao.. tumhari seal main hi todunga...!"

"Mujhse nahi ruka jata ab.. jaldi aa jao... mere wahan pata nahi kaisa ho raha hai...

"haye meri jaan... kahan kaisa ho raha hai...." Dholu ka bura haal ho gaya lagta tha..

"Wahan.. neeche...!" Main Sandeep ki aur muskurakar boli...

"Haye meri chhammakchhallo.. ek baar bolo.. meri choot lund maang rahi hai...!"

"Haan.. Sachchi...!" Mera hath meri salwar mein ghus chuka tha... Sandeep ajeeb si najron se mujhe ghoorta raha...

"Haan nahi.. bol kar dikhaek baar.. kya maang rahi hai teri choot....?"

"mujhe nahi pata.. tum jaldi aakar khud hi dekh lo..." Main shararat se kasmasati huyi boli.....

"Tum samajhti nahi jaan.. ye police meri dushman bankar mere pichhe lagi hai.. bus thode se din aur ruk jao...!"

"Ye Sandeep na toh tumhara no. de raha hai.. aur na hi mobile...!" Maine shikayati lahje mein kaha...

"wo theek hi kar raha hai jaan.. thode din ruk jao.. main naya mobile de doonga tumhe..!"

"Kam se kam apna no. toh de do... main tumhe fone toh kar loongi..." Maine apni yoni ki faankon ko ungali se kuredte huye poochha....

Kuchh der Dholu kuchh nahi bola... Maine ek naya patta fainka..,"Main kal ya parson shahar aa rahi hoon... wahan toh mil sakte ho na!"

"Mera no. likh lo... dhyan rakhna.. kisi ke hath lag gaya toh meri maa chud jayegi achchhe se... tum kisi ko nahi dogi na...!"

"Nahi.. tumhari kasam...." Uske sath baaton mein khoye khoye mujhe pata hi nahi chala ki kab Sandeep ne meri salwar kholkar neeche sarka di thi... Jaise hi usne mere 'pedu' se naak' satate huye meri 'yoni' mein garam saans chhodi.. main uchhal padi... Iske sath hi meri taangon mein jaise jaan bachi hi na ho... Sandeep ke hulka sa jor lagate hi main pichhe gir padi... Sandeep ne meri jaanghon ko hathon mein daboch kar apna munh unke beech ghusa diya...

Jor se sisak kar maine apni jaanghein kaskar uski kamar ke upar rakh di..,"aaah...!"

"Kya hua ...?" Dholu ne meri siski lene ka tareeka sun kar chounkte huye poochha....

"aah.. kuchh nahi... neeche pata nahi kya ho raha hai...aaaah..." Aanand ke maare mari si ja rahi main apni jaanghon ko kholne bheenchne lagi.. Sandeep poore maje se meri yoni ko chaat raha tha... Jaise hi uski jeebh ki nok meri 'yoni' ke daane par aakar tikti.. mujhe khud par kabu rakhna mushkil ho jata aur main sisak uthti....

"tum ho kahan iss waqt...?" Dholu ko kuchh shak sa hone laga tha....

"aaah... tumse baat karte huye choupal mein aa gayi hoon... Sandeep ka mobile lekar...!" Maine bahana banaya....

"Ohh.. Sandeep kahan hai..?"

"Ghar par hi hoga...aayiiiii!" Main ek baar fir dhahak uthi... Sandeep ne faankon ko chouda karte huye apni jeebh meri yoni ke ched mein ghusa di thi....

"Tum apni choot ragad rahi ho na...?" Dholu khush hokar bola....

"aaahhhhhaaaannn!" Meri aankhein band ho chuki thi.. mere jawab dene ka lahja badal gaya tha....

"Fone par choot marwaaogi?" Dholu ne poochha...

"aaah... kaise...?" Main bilbila uthi thi... Sandeep ne achanak meri poori yoni ko apne munh mein bharkar usko daaton se hulke hulke kutarna shuru kar diya tha....

"aise hi.. ek minute.. meri baat ka jawab deti jana... tumhe bhi bahut maja aayega... Tumhari choot kaisi hai?"

"aaah... Gori..."

"aah.. gori nahi meri rani... makkhan malayi jaisi bolo.. bol kar dikhaao...!"

"aaaah... aaah... Main skhalan ke bilkul kareeb thi.. jaise taise maine bolne ke liye shabd dhooondh hi liye..," Meri choooooot makkhan malayi haiiiaaaaaahhhh...!"

Dholu ki aawaj mein bhi kampan sa shuru ho gaya tha.....,"Mere louda kaisa hai rani!"

"aaah... tera louda kala... aaah.. nahi.. tera louda 'dandey' jaisa hai...." Main fudakti huyi boli...

"shaabash... ladki ki choot kisliye hoti hai bata!"...

"pyaaar karne ke liye...!"

"nahi saliiiii.... choot chodne ke liye hoti hai.. lund andar pelne ke liye hoti hai....!"

"aahhhaaaa..ohhhooo.. haaaaannnnn..aaah!" Sandeep ne apni do ungaliyan meri yoni ke andar daal di thi aur lapar lapar yoni ki faankon ko choos aur chat raha tha....

"louda kisliye hota hai bol...?" Dholu ne mast hokar poochha....

"aaah... Munh mein lekar choosne ke liye.... aaaurrr... choot chodne ke liye.....!" Main ganganati huyi boli....

"aur gaaand maarne ke liye bhi... haye jaan.. mujhse gaand marwayegi na apni...!" Dholu aage bola....

"haaan.... jaaaaaaan...." Achanak meri indariyon ne kaam karna band kar diya.. mujhe apni yoni mein se kuchh rista hua mahsoos hua.. Sandeep ab bhi pagal se hokar usspar laga hua tha.. apni ungaliyan nikal kar 'wo' andar tak meri yoni ke chhed ko jeebh se chaatne laga.....

"bol kiss'se chudegi tu....?" Dhlolu ne poochha toh main koyi jawab na de payi.... bus padi padi aankhein band kiye sisakti rahi...

"Bol na.. kiss'se chudegi tu....... kya hua? nikal gaya kya?" Dholu bola...

"haaan...." Meri aawaj se santusti aur betabi dono jhalak rahi thi....

"nahi abhi nahi.. thodi der aur... abhi mera kaam nahi hua hai.. bol na.. kis'se apni seal tudwayegi tu....?" Dholu tadap kar bola... uss bechare ko kya maloom tha ki 'seal' toh ab swarg sidhar chuki hai...

"tere se... tere loude se...!" Maine jawab diya...

"aise nahi jaan.. kya bolegi tu mera louda hath mein pakad kar.. bol na!"

"Main kahoongi... mujhe chod do.. meri seal tod do.. meri choot ko faad daalo... !"

"haye meri rani.. kya cheej hai tu.. ek baaaaar auurr.. boll na..!" Dholu kamuk dhang se bola...

"aaah.. meri makkhan malayi choot mein apna dandey jaisa louda fansa do... mujhe chod do.." Maine bolte huye Sandeep ko upar kheench liya.... Mera ishara samajh kar Sandeep upar aaya aur meri jaanghon ko khol kar unke beech ukdoo hokar baith gaya.. main ek baar fir badhawaas si hokar bolne lagi...," Ghusa do meri choot mein apna loda... jaldi karo na.. main mari ja rahi hoon... cheer daalo isko... chod do mujhe... " Mujhe fone par Dholu ke haanfne ki aawajein saaf sunayi de rahi thi.. par wah kuchh bol nahi raha tha...

Sandeep ne Meri yoni ke beechon beech apna 'danda' tkaya aur ek hi jhtke mein andar pel diya... Aanad ki uss aloukik prakashtha par pahunchte hi main bawli si ho gayi...,"hayeee... Sandeeeeeep!"

Mujhe bolte hi apni galati ka ahsaas ho gaya tha.. par teer kamaan se nikal chuka tha....

"sali behan chod.. Tu Sandeep ke baare mein soch rahi hai kutiya....

"nahi.. wwo.. uska mobile.. aaaah...." Sandeep ka ling bahar nikal kar ek baar fir mere garbhashya se ja takraya..," aaaaaaaahhhh... wo toh uska dhyan aa gaya tha.. aise hi.. tujhse hi chudwaaungi jaan!"

"Kutiya... tu ek no. ki randi hai.. tera koyi bharosa nahi.. par ek baar seal mujhse tudwa lena


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:46

बाली उमर की प्यास पार्ट--31

गतान्क से आगे............

"सर्र.. ववो...!"

"चुप करके बैठो यार.. दिखता नही क्या? ऑटो चला रहा हूँ...!" मानव ने मुझे बोलते ही टोक दिया....,"और ययए.. सर सर.. कहना छ्चोड़ दो... अभी मैं ऑटो वाला हूँ... ठीक है...!"

अभी हम शहर के बीचों बीच ही चल रहे थे..,"नही सर.. वो मैं पूच्छ रही थी कि....."

"फिर सर.. अकल नही है क्या..? मुझे सर वर मत बोलो.. सारा खेल खराब करओगि क्या...?" मानव ने मुझे फिर झिड़क दिया...

"तो क्या बोलूं?" मैने चिड़ कर पूचछा....

"भैईय.. नही नही.. भैया कैसे बोल सकती हो...!" मानव अपने आप ही हँसने लगा... कहा ना.. कुच्छ मत बोलो.. अभी चुप चाप रहो... मुझे ऑटो वाला समझ कर बैठी रहो...."

"पर.. ऑटो वाले तो आप लग ही नही रहे...!" उसके सामने लगे आईने में उसकी शकल निहारती हुई मैं बोली...

"क्यूँ..?" मानव ने झट से ऑटो रोक दिया...,"क्या खराबी है मुझमें...?"

"ना.नही.. वो.. आपके बाल.. आपका चेहरा.. ये सिर पे बाँध लो..!" मैने झेंपटे हुए पिछे सीट पर पड़ा मैला सा तौलिए जितना कपड़ा आगे बढ़ाते हुए कहा....

"हां.. ये बात तो सही है..." मानव ने शीशे में अपनी शकल देख कर कहा और फिर कपड़ा मेरे हाथ से लेकर सिर पर लपेटने लगा..,"दिमाग़ तो बहुत है तुझमें.. बस सही जगह लगाती नही है.... अब बोल क्या कह रही थी....?"

"वो मैं कह रही थी कि.. कहीं वो मुझे ले गये तो?".....

"ऐसे कैसे ले जाएँगे.. मैं किसलिए हूँ साथ.. बस एक बात का ध्यान रखना... मैं तुमसे किराया मांगू तो कह देना कि दे तो दिया था मैने...!"

"ठीक है..." मैं उसकी बात का मतलब समझे बिना ही बोली..,"पर मुझे बहुत डर लग रहा है.. आप..मुझसे दूर मत जाना...!"

"तुम फिकर मत करो.. वो दोनो पोलीस वाले भी हमारे पिछे पिछे ही हैं... एक बात बताओ.. रेवोल्वेर चलानी आती है...?"

"नही.. मैने तो बस एक बार 'ढोलू' के पास रखी देखी थी... "मैने जवाब दिया...

"मतलब चलानी नही आती ना?" उसने फिर पूचछा...

"कह तो रही हूँ.. मैने तो....!"

"फिर ठीक है... लो ये अपने पास रख लो... " उसने कुर्ते के अंदर से एक रेवोल्वेर निकल कर मुझे पकड़ा दी...,"कभी भी ख़तरा लगे तो ये उन्न पर तान देना सीधी....!"

"पर.. पर मैं इसको छिपाउंगी कहाँ.. ये तो बहुत भारी है...!" मैने उत्सुकता से पूचछा......

"ओफफो.. तुम तो पका देती हो.. अब ये भी मैं ही बताऊं क्या?.. लाओ.. वापस दो.. मुझसे दूर मत होना...!" कहकर मानव ने वापस रेवोल्वेर मेरे हाथ से झटक ली.. मैं उसका मुँह देखती रह गयी... उसने फिर से ऑटो चलानी शुरू कर दी...,"वहाँ ये मत दिखाना कि तुम मुझे जानती हो.....!"

"ठीक है.. मैं मुँह चढ़ा कर बोली.....

"काले का ढाबा तो यही है..." मानव ने ऑटो की स्पीड कम करते हुए कहा.. हम शहर से बाहर खेतों में आ गये थे....

हमारी ऑटो रुकते ही ढाबे के दूसरी और से दो लड़के भागते हुए हमारी तरफ आए... आते ही उनमें से एक ने पूचछा..,"तू अंजू है..?"

मैं अचानक सिहर सी गयी... मेरे सारे शरीर में कंपन सी शुरू हो गयी.. सच में ही मैं हद से ज़्यादा डर गयी थी.. मानव के साथ होने पर भी मेरे पसीने से छ्छूटने लगे.. मैने एक बार घबराहट में मानव की ओर देखा और फिर अपनी गर्दन हिला दी....

"आजा नीचे... भाई के पास चलना है ना...?" उसी लड़के ने फिर पूचछा और फिर दूसरे लड़के को देख कर आँख मारते हुए बोला...,"क्या आइटम है यार.... प्रियंका जैसी लगती है.. नही?? हे हे हे..."

मैने डर के मारे सहमे हुए ही आईने में मानव की ओर देखा.. उसने मुझे आँखों ही आँखों में नीचे उतरने का इशारा किया... मैं हड़बड़ाई हुई सी नीचे उतरी ही थी कि एक ने मेरा हाथ पकड़ लिया....,"आजा.. अपना भी नंबर. लग जाए तो... हाए...!"

"किराया तो देती जाओ मेडम!" लड़के ने जैसे ही मेरा हाथ पकड़ा.. मानव बोल पड़ा...

"आ.. इतनी चिकनी लौंडिया से भी कोई किराया लेता है क्या..? बहुत अच्छि बोहनी हो गयी तेरी.. जा अब घर जाकर सीट को सूंघ पूरा दिन.. चल अपना काम कर...!" मेरे कुच्छ बोलने से पहले ही वो लड़का मानव के पास जाकर खड़ा हो गया....

"लेकिन भाई साहब... मेरी रोज़ी का सवाल है.. किराया तो देना ही पड़ेगा इसको....!" मानव ऑटो से नीचे आकर खड़ा हो गया....

तभी दोनो पोलीस वाले भी आकर तमाशबीनो की तरह हमारे पास बाइक रोक कर खड़े हो गये....,"क्या हो गया भाई?"

"दे ना यार इसको.. चलता कर.. क्यूँ बेमतलब का लोचा करवा रहा है..." दूसरे लड़के ने जेब से 10 रुपए निकाल कर मानव की ओर बढ़ा दिए....

"ये क्या भीख दे रहे हो... ? 100 रुपए में बात हुई थी....!" मानव तैश में आकर अपनी बाहें उपर करने लगा....

"100 रुपए.. साले तुझे क्या हम विदेशी लगते हैं... बस स्टॅंड से ही तो लेकर आया है... चूतिया बना रहा है.. 100 रुपए....!" मेरा हाथ थामे जो लड़का खड़ा था.. उसने कहा....

"आबे.. मैं कौनसा फोकट के माँग रहा हूँ.. 100 रुपए में बात हुई थी.. पूच्छ लो मेडम से!" मानव बोला....

तभी दूसरा लड़का मानव के कान के पास जाकर सिर उठाकर धीरे से बोला...," तेरा टाइम अच्च्छा है भोसड़ी के.. लॅफाडा करने का मूड नही है हमारा.. वरना तेरी गांद में गोली ठोक देता अभी... भाग जा वरना...!"

उस लड़के की बात सुनकर दोनो पोलीस वाले एक दम बाइक से नीचे आ गये थे.. पर मानव के हाथ का इशारा पाकर रुक गये...,"क्यूँ लड़ाई कर रहे हो भाई... दे दो ना बेचारे के पैसे.. जो बात हुई थी....!"

"आए.. चलो अपना रास्ता नापो.. यहाँ कोई रामलीला नही हो रही..." लड़का मेरा हाथ छ्चोड़ कर पोलीस वालों से बोला और जेब में हाथ डाल कर मोबाइल निकाल लिया... उसके नंबर. डाइयल करते ही तुरंत उधर से फोन उठा लिया गया.. आवाज़ मुझ तक सॉफ सॉफ आ रही थी.. वो ढोलू ही था...,"आ गयी क्या?"

"आ तो गयी भाई.. उस ऑटो वाले को कुच्छ खुजली है.. 100 रुपए माँग रहा है यहाँ तक के.... साला मान ही नही रहा.... मेरा तो मंन कर रहा है कि...." लड़के ने कहा....

"ना.. वहाँ तमाशा मत करो... ऐसा करो.. तू उसके साथ ही ऑटो मैं लेकर बैठ जा लौंडिया को... यहीं दे देंगे उसको खर्चा पानी... ले आ अपने साथ ही.. बाइक तेजा ले आएगा....!"

"ठीक है भाई.. ये सही है....!" लड़का बोला और उधर से फोन कट गया....

"थोड़ी आगे तक चलना पड़ेगा... 200 दे देंगे... बोल!" लड़के ने मानव को घूरते हुए कहा....

"ठीक है.. पर पूरे 200 ही लूँगा... आओ.. बैठो...!" मानव कहकर ऑटो में बैठ गया... मैं तो मानव से भी पहले ऑटो में आ चुकी थी.. मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था....

उस लड़के के बताए अनुसार रोड पर ही एक जगह मानव ने ऑटो रोक दी... लड़का ऑटो से उतरते ही बोला..," हां! रुपए लेगा ना तू?"

"हाँ.. और पूरे 200 रुपए...!" मानव ने ठोक कर कहा....

लड़का जाने क्या सोच कर हंस पड़ा.. ,"आजा.. मेरे साथ आजा.. तू भी क्या याद रखेगा...साले!" उसने कहा और मेरा हाथ पकड़ने लगा....

"छ्चोड़ दो.. मैं चल रही हूँ अपने आप...!" मैने उसका हाथ झटका और मानव के साथ साथ चलने लगी.....

"आए हाए.. तेरे नखरे..! क्या करती है तू...?" लड़के ने अपने होंटो पर जीभ फेरते हुए कहा..... मैने कोई जवाब नही दिया... तभी हम एक ट्यूबिवेल के साथ बने 2 कमरों वाले मकान के आगे जाकर रुक गये.. वो लड़का अंदर घुस गया था...

"आ ना.. डर क्यूँ रही है...? " लड़के ने मुड़कर कहा..और फिर मानव की तरफ देख कर बोला..,"तू भी आजा चिकने.. अब फट गयी क्या? ले ले 200 रुपए भाई से.. आजा.. पूच्छ.. हा हा हा...."

मानव ने दाई तरफ देखा... वो दोनो पोलीस वाले भी बाइक ऑटो के पास रोक कर तेज़ी से हमारी ओर चले आ रहे थे... मानव झट से अंदर घुस गया.... मैं अभी भी उस'से पीछे थी.....

लड़के के पिछे मानव जैसे ही दरवाजे पर जाकर खड़ा हुआ.. मेरी नज़र सीधी अंदर तीन और लोगों के साथ बैठे ढोलू पर पड़ी... चारों बीच में गिलास रखे ताश (कार्ड्स) खेल रहे थे.. वो खाली कछे में बैठा था और उसकी तोंद सॉफ दिख रही थी....

"ले आया... ढोलू मुझे देखते ही खुश होकर खड़ा हो गया और कछे पर हाथ मारते हुए मानव की ओर देखा...,"ये...?"

"भाई ऑटो वाला! अब 200 माँग रहा है..साला... हे हे हे.."

"तो मैं क्या आरती उतारू अब.. जा दूसरे कमरे में ले जाकर दे दो....जितने माँग रहा है..!" ढोलू ने कहा और फिर नज़रें फाड़ कर कुच्छ देर मानव की ओर घूर्ने के बाद बोला...," ओ तेरी बेहन को चोदु साले... थानेदार को ले आया...!" ढोलू की सिट्टी पिटी गुम हो गयी... उसने कहा और पिच्छले दरवाजे से निकल भागा....

ढोलू की बात सुनकर वहाँ बैठे सभी लोगों के कान खड़े हो गये... वो तो उठ भी ना सके... जैसे ही मैने कहा कि वही ढोलू है... मानव मेरे बारे में भूल कर सीधा पिच्छले दरवाजे से ही निकल कर ढोलू के पिछे दौड़ गया....

मानव को अपनी तरफ आता देखा तो तीनो के होश ही ऊड गये थे.. पर जैसे ही मानव उनके उपर से कूद कर पिछे गया.. उनकी जान में जान आई और 'वो' तीनो उठकर मेरी तरफ भागे... मैं खड़ी खड़ी थर थर काँप रही थी... पर वो मेरी और नही.. अपनी जान बचाने को बाहर की ओर भागे थे.. पर 'वो' बच ना सके.. बाहर निकलते ही उनमें से दो को उन्न पोलीस वालों ने दबोच लिया.. और तीसरा अपनी तरफ रेवोल्वेर का मुँह देख अपने आप ही गिर पड़ा... पर जो लड़का मुझे लेकर आया था.. उसका कहीं पता नही चल पाया......

----------------------------

करीब 15 मिनिट बाद मानव ढोलू को लेकर वहीं आ पहुँचा... उसने ढोलू की उंगलियाँ अपनी उंगलियों में फँसा रखी थी.... ढोलू का सारा शरीर पसीने से तर हो गया था और वो बुरी तरह हाँफ रहा था.... तभी वहाँ पोलीस की जीप सायरेन बजाते हुए आ पहुँची....

पसीने से तर मानव के चेहरे पर अनोखी चमक थी... मेरे पास आते ही वह हानफते हुए बोला..,"थॅंक यू मेम्शाब!"

मानव को देखकर ही मेरी जान में जान आई.. मुझे नही पता था कि अब क्या होने वाला है...! पोलीस वालों ने तीनो को ज़ीप में डाल लिया...," बैठो जनाब!"

"यार.. वो.. ऑटो भी तो वापस करके आनी है.. तुम चलो हम आते हैं..." मानव ने कहा....

"वो हम भिजवा देंगे जनाब.. आप फिकर ना करो...!" पोलीस वालों में से एक ने कहा.....

"समझा करो यार...! चलो तुम... मैं आता हूँ.. कहकर मानव मुस्कुरा दिया... वो पोलीस वाले भी अजीब ढंग से मुस्कुराए और अपनी ज़ीप मोड़ने लगे... मैं उनकी मुस्कुराहट का मतलब समझ गयी थी.. पर मुझे विश्वास नही था कि मानव मेरे साथ ऐसा करने की सोच भी सकता है... मैने घूर कर मानव की तरफ देखा......

"एक बात पूच्छू..?" मानव ट्यूबिवेल पर अपने हाथ पैर और चेहरा धोने के बाद मेरी तरफ मुड़कर बोला....

"क्या?" मैं अपनी जगह पर ही खड़ी रही.....

"ववो... आओ बैठो ना थोड़ी देर... साले बहा... सॉरी.. आदत हो जाती है पोलीस में... बहुत भगाया कुत्ते के बच्चे ने....!" मानव एक जगह बैठ कर सुसताने लगा... मैं कुच्छ ना बोल सकी... वहीं खड़ी रही....

"बैठो ना यार.. थोड़ी देर बैठ जाओ..." मानव ने खड़ा होकर मेरा हाथ खींचा और अपने पास बैठा लिया...

"कैसा लगता हूँ मैं?" मानव ने पूचछा...

मैं कुच्छ देर तो मुँह से कुच्छ निकल ही ना पाई... पर जब वो मुझे देखता ही रहा तो मेरे मुँह से निकल गया.,"क्या मतलब?"

"मतलब क्या यार.. सिंपल.. कैसा लगता हूँ मैं...?" मानव ने फिर पूचछा....

"पोलीस वाले या ऑटो वाले..?" मैने मुँह पिचका कर कहा.. मुझे उसके अरमानो पर शक पैदा होने लगा था....

"हा हा हा.. तो तुम मज़ाक भी कर लेती हो...." थोड़ी देर मानव हंसता रहा फिर एक दम गंभीर होकर बोला...," मैं तुम्हारे बारे में ग़लत सोच रहा था.. तुम वैसी नही हो जैसी तुम तुम्हारी आँखों में देखने पर लगती हो...!"

"क्क्या मतलब?" मैं सिहर सी गयी थी....

"मतलब कि तुम बहुत बहुत अच्छि हो.. बहूऊत अच्छि..." मानव मुस्कुराया...

सच कहूँ तो ये बात सुनकर मुझे उस वक़्त उतनी खुशी नही हुई जितनी हो सकती थी.. मेरे मंन में अजीब सा डर पैदा हो रहा था.. मानव को लेकर... मैने नज़रें झुका ली.....

"एक बात पूच्छ लूँ.. किसी को कहना नही....!" मानव ने कहा तो मेरा दिल धड़क उठा...,"क्या?" मैने धीरे से नज़रें झुकाए हुए कहा...

"ववो.. तुम ग़लत मत सोचना... ववो.. मीनू मेरे बारे में बात करती है क्या?"

"ऑश..." मेरी जान में जान आई...," हां.. कभी कभी.. मैं उसकी ओर देख कर मुस्कुरा पड़ी....

"क्या बात करती है..?" उसने उत्सुकता से पूचछा....

"उम्म्म.. यही.. केस के बारे में ही.. वो मुझे सब बताती है... कब आपको फोन करके क्या बताया.. और.. आपकी प्लॅनिंग... सब!"

"ये नही यार.. और कुच्छ.. और कुच्छ जैसे.... चलो छ्चोड़ो.. तुम नही समझोगी...!" मानव खड़ा हो गया...,"आओ चलते हैं.... पिंकी भी वेट कर रही होगी....!"

मैं मानव के पिछे पिछे चल पड़ी... मीनू के बारे में उसने क्यूँ पूचछा.. वो तो मैं साफ साफ समझ ही गयी थी... मानव का ये कहना कि तुम बहूत अच्छि हो.. अब मेरे दिल को गहरा सुकून दे रहा था.....

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"लो भाई.. बहुत बहुत धन्यवाद..." मानव ने ऑटो से उतार कर ऑटो वाले से कहा और उसके हाथ में 500 रुपए पकड़ा दिए....

"ये किसलिए साहब?" वो चौंक कर खुश होते हुए बोला....

"रख ले यार.. तुझे ऑटो की सर्विस तो करवानी ही पड़ेगी लगता है..." मानव ने उसकी पीठ थौन्क कर कहा और फिर तपाक से बोला..,"अभी मत बैठ यार.. बाथरूम में चल... ये कपड़े पहन कर थाने गया तो फोटो छप जाएगी अख़बार में..." मानव हंसता हुआ बोला तो ऑटो वाला झेंप सा गया...,"हाँ साहब.. ये तो मैं भूल ही गया था.....!"

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मैं सीधी बस-स्टॅंड के अंदर गयी.. हॅरी एक जगह बैठा था और पिंकी उसके पास खड़ी होकर बाहर की ओर ही देख रही थी... मुझे देखते ही वो भाग कर बाहर आई....

मैं उसके पास आते ही मुस्कुरकर बोली..,"हो गया काम!"

पर पिंकी ने कोई प्रतिक्रिया ना दी.. उसकी सूरत रोने जैसी लग रही थी... मैने एक बार हॅरी की तरफ देखा और फिर उस'से बोली,"क्या हुआ पिंकी?"

"कुच्छ नही.. मुझसे बात मत करो..." पिंकी चिड़ कर बोली....

तभी हॅरी हमारे पास आ गया..,"मैं जाउ अब?"

मैने उसको देख कर अपना सिर हिला दिया..," हाँ जाओ... पर इसको क्या हो गया...?"

"पता नही.. मार्केट से चोवमीन खाकर आए थे.. तब से ऐसे ही बैठी है.. पेट खराब हो गया शायद... गोली लाकर दूँ क्या?" हॅरी ने प्यार से पूचछा...

"नही.. मुझे नही चाहिए कुच्छ....!" पिंकी तुनक कर बोली और अपना मुँह फेर लिया....

"वैसे मुझे भी गाँव ही जाना है.. तुम कहो तो मैं इंतजार कर लेता हूँ..." हॅरी ने उसके तेवरों पर ध्यान नही दिया.....," मीनू को फोन करके देख लो..."

"पर हमारे पास नंबर. तो नही है... हां.. एक मिनिट..." मैं भाग कर बाहर गयी.. वहाँ शायद मानव मेरा ही इंतजार कर रहा था.....,"वो.. मुझे मीनू के पास फोन करना है... उसका नंबर.?" मैने पूचछा....

"वो बस दो मिनिट में आ रही है यहीं.. बात कर्वाउ क्या?" मानव ने पूचछा....

"नही रहने दो फिर तो...." मैने बोला ही था कि मीनू मुझे हमारी ही ओर आती दिख गयी...

"पिंकी कहाँ है..?" उसने आते ही पूचछा......

"यहीं है अंदर... ववो.. हमने ढोलू को पकड़ लिया!" मैने गर्व से बताया....

"हाँ.. ववो.. बता दिया इन्होने...!" मीनू लगातार सिर झुकाए खड़ी थी..," हम जायें अब?"

"हाँ.. तुम चलो... मैं शाम को फोन करके बताता हूँ.. सारी बात...!" मानव ने कहा...

"ठीक है..." मीनू ने कनखियों से एक बार मानव की सूरत देखने की कोशिश भर की और मेरा हाथ पकड़ कर अंदर चल दी... पिंकी अभी भी मुँह फुलाए खड़ी थी... मैने हॅरी की बात उसको बताई....

मीनू कुच्छ देर सोचने के बाद बोली...,"ठीक है.. चलते हैं.. अब क्या काम बचा है...?"

"ठीक है.. मैं पार्किंग से गाड़ी लेकर आता हूँ.. बाहर आ जाओ तब तक..!" हॅरी ने कहा और हमसे दूर चला गया.....

पता नही पिंकी कितनी देर से अपना दुखड़ा छिपाए बैठी थी.. जैसे ही हॅरी हमसे दूर गया.. पिंकी दहाड़े सी मार कर रोने लगी....

"क्या हुआ पिंकी.." मीनू ने अचानक चिंता में डूब कर पिंकी के गालों को सहलाते हुए पूचछा.....

"ववो..."पिंकी रोते रोते हॅरी की ओर मासूम सी सूरत बनाते हुए उंगली करके बोली..," वो मेरे 100 रुपए का चीनुमीनु खा गया...!" पिंकी ने कहा और मोटे मोटे आँसू टपकाने लगी.....

"चाउमीन खा गया?.." एक पल तो मीनू भी सकपका गयी.. फिर थोड़ा खिज कर बोली..,"बस कर अब.. यहाँ तमाशा क्यूँ कर रही है.. तूने दिए ही क्यूँ उसको पैसे?"

आसपास के लोगों को अपनी ओर घूरते देख कर पिंकी सहम गयी और उसने तुरंत अपने आँसू पौंच्छ लिए..,"मैने कहाँ दिए थे उसको पैसे..! वो तो.. वो तो मैने उसको सिर्फ़ यही कहा था कि चलो 'समोसा' खायें...!"

"फिर?" मीनू उसकी शकल देख मुश्किल से अपनी हँसी रोक पा रही थी....

"फिर क्या? कहने लगा मुझे भी भूख लगी है... समोसे में क्या होगा.. ये कहकर वो मुझे बाहर बड़े होटेल में ले गया.... वहाँ जाकर उसने 2 चीनुमीनु और 2 'ठंडे' मंगवा लिए... 'ठंडा' तो मैं कभी पीती भी नही...." कहते ही सुबाकी रोकने की कोशिश में पिंकी की हिचकी निकल गयी... थोडा साँस लेकर वह फिर बोलने लगी..," खाने के बाद अपनी जेब पर हाथ मारकर बोला.."ओह्हो.. पर्स तो गाड़ी में ही रह गया.. " पिंकी ने मुँह बनाकर मटकते हुए उसकी नकल की..,"बेशरम ने मुझसे पैसे माँग लिए...."

मीनू और मैं पिंकी के अंदाज पर खिलखिलाकर हंस पड़े.. पिंकी गुस्से से हमारी और देखने लगी थी तभी मीनू हंसते हुए ही बोली..," तो क्या हो गया... उसका पर्स गाड़ी में रह गया होगा.. दे देगा तेरे पैसे... क्यूँ मातम मना रही है....?"

"नही देगा वो.. मुझे पता है.. उसने अपनी 'गोली' के पैसे काटने के लिए ही किया है ऐसा... देने होते तो अब तक दे ही ना देता... मैं आधे घंटे से उसको याद दिला रही हूँ ये बोल बोल कर की गाड़ी कहाँ है..? मैने उसको गाड़ी में चलने को भी बोला.. पर वो चला ही नही.. ऐसे ही टालता रहा...." पिंकी अब भी गुस्से में थी....

"तो क्या हो गया.. तूने भी तो खाया है ना उसके साथ.. 'चीनुमीनु' हे हे हे.." मीनू हंस कर बोली..,"और ईडियट 'वो' चाउमीन होता है.. चीनुमीनु नही!"

"कुच्छ भी हो.. पर मुझे 'वो' थोड़े ही खाना था... मुझे तो..." तभी हॅरी हमारे पास ही आ पहुँचा...,"तुम आए नही बाहर.. मैं वेट करके आया हूँ..."

"हमें नही जाना अभी.. हम तो शॉपिंग करके आएँगे...!" पिंकी मुँह चिडा कर बोली...

"कोई बात नही.. मैं भी तुम्हारे साथ चल पड़ता हूँ..... अगर दिक्कत ना हो तो.. वैसे बस में ही जाना है तो अलग बात है....!" हॅरी बेचारा सा मुँह बनाकर बोला....

"नही.. तुम भी साथ चलो..!" पिंकी अचानक बोल पड़ी......

"चलो फिर....!" कहकर हॅरी खुश होकर हमारे साथ चल पड़ा.. मीनू उसके साथ थोड़ी असहज महसूस कर रही थी... इसीलिए 'वो' बहुत कम बोल रही थी....

गाड़ी में बैठ कर हम शहर में घुसे ही थे कि पिंकी अचानक चहक सी उठी..,"मुझे चॉकलेट लेनी है....!"

"ओके.. " हॅरी ने तुरंत एक दुकान देखकर गाड़ी साइड में लगाकर खड़ी कर दी...,"मैं लेकर आता हूँ.. कितनी लाउ?"

मीनू बोलने ही वाली थी कि बीच में बैठी पिंकी ने उसका हाथ पकड़ कर दबा दिया...,"कितने की आती है..?"

"ववो.. तो डिपेंड करता है...." हॅरी बोला...

"ठीक है.. 100 रुपए की ले आओ!" बोलते ही पिंकी ने अपनी हँसी रोकने के लिए अपने होंटो को कसकर भींच लिया.. और मेरी और देखने लगी...

"ठीक है..." हॅरी बोलकर जैसे ही पलटा.. पिंकी तालियाँ पीट'ते हुए हँसने लगी..,"अब चखाउन्गि इसको मज़ा!"

"शर्म नही आई तुझे बेशर्म.." मीनू चिड कर बोली....

"मुझे क्यूँ आएगी शर्म.. कंजूसों के साथ ऐसा ही करना चाहिए... अब मैं पूरा बदला लूँगी..... अभी तो मुझे जलेबिया, समोसे और गोलगप्पे भी खाने हैं.... हे हे हे..." पिंकी का चेहरा चमक उठा....

उस दिन पिंकी ने जो कुच्छ हॅरी के साथ किया.. याद करके आज भी पेट में बल पड़ जाते हैं... हॅरी 'और कुच्छ' कहते कहते थक गया था.. पर पिंकी की फरमाइशे ख़तम नही हुई.... गोलगप्पे और समोसा खाने के बाद जब पेट में जगह नही बची तो पिंकी ने 2 किलो देसी घी की जलेबियाँ पॅक करवा ली... अब भी शायद उसका मंन भरा नही था... पर मीनू ने इस बार उसको कसकर डाँट पीला दी..,"घर चल एक बार.. तुझे देखती हूँ में... आज के बाद आना तू मेरे साथ शहर में...!"

इस बार हेरी ने 'और कुच्छ कहा तो पिंकी ने बिना कुच्छ कहे अपना सिर झुका लिया... हॅरी की मुस्कुराहट साफ बता रही थी कि उसको मालूम था पिंकी उसको तंग करने की कोशिश कर रही है.... पर वह पिंकी का भी उस्ताद निकला....

शहर से बाहर जाते ही हॅरी ने 100 का नोट निकाल कर पिछे बढ़ा दिया..,"पिंकी; ये तुम्हारे 100 रुपए...!"

अचानक पिंकी का चेहरा पीला पड़ गया.. उसको शायद लगा कि उसकी शैतानी पकड़ी गयी है.. वह झेंप कर बोली..,"नही.. रख लो!"

"अरे रख लो क्या..? मैं तो भूल ही गया था.. अभी याद आया...! ये लो.. पाकड़ो!" कहकर हॅरी ने नोट पिछे ही छ्चोड़ दिया....

उसके बाद तो गाँव तक पिंकी की आवाज़ तक नही निकली... हम दोनो हंस हंस कर पागल हो रहे थे.. पर शायद हमारी हँसी का राज हॅरी समझ नही पाया होगा...

क्रमशः........................

gataank se aage............

"sirr.. wwo...!"

"Chup karke baitho yaar.. dikhta nahi kya? auto chala raha hoon...!" Manav ne mujhe bolte hi tok diya....,"aur yye.. sir sir.. kahna chhod do... abhi main auto wala hoon... theek hai...!"

Abhi hum shahar ke beechon beeh hi chal rahe the..,"Nahi Sir.. wo main poochh rahi thi ki....."

"Fir Sir.. akal nahi hai kya..? mujhe sir war mat bolo.. sara khel kharab karaogi kya...?" Manav ne mujhe fir jhidak diya...

"toh kya boloon?" Maine chid kar poochha....

"Bhaiy.. nahi nahi.. bhaiya kaise bol sakti ho...!" Manav apne aap hi hansne laga... kaha na.. kuchh mat bolo.. abhi chup chap raho... mujhe auto wala samajh kar baithi raho...."

"Par.. auto wale toh aap lag hi nahi rahe...!" Uske saamne lage aaine mein uski shakal niharti huyi main boli...

"Kyun..?" Manav ne jhat se auto rok diya...,"Kya kharabi hai mujhmein...?"

"na.nahi.. wo.. aapke baal.. aapka chehra.. ye sir pe baandh lo..!" Maine jhenpte huye pichhe seat par pada maila sa touliye jitna kapda aage badhate huye kaha....

"Haan.. ye baat toh sahi hai..." Manav ne sheeshe mein apni shakal dekh kar kaha aur fir kapda mere hath se lekar sir par lapetne laga..,"Dimag toh bahut hai tujhmein.. bus sahi jagah lagati nahi hai.... ab bol kya kah rahi thi....?"

"Wo main kah rahi thi ki.. kahin wo mujhe le gaye toh?".....

"Aise kaise le jayenge.. main kisliye hoon sath.. bus ek baat ka dhyan rakhna... main tumse kiraya maangoo toh kah dena ki de toh diya tha maine...!"

"Theek hai..." Main uski baat ka matlab samjhe bina hi boli..,"Par mujhe bahut darr lag raha hai.. aap..mujhse door mat jana...!"

"Tum fikar mat karo.. wo dono police wale bhi hamare pichhe pichhe hi hain... ek baat batao.. revolver chalani aati hai...?"

"Nahi.. maine toh bus ek baar 'Dholu' ke paas rakhi dekhi thi... "Maine jawab diya...

"Matlab chalani nahi aati na?" Usne fir poochha...

"Kah toh rahi hoon.. maine toh....!"

"Fir theek hai... lo ye apne paas rakh lo... " Usne kurte ke andar se ek revolver nikal kar mujhe pakda di...,"Kabhi bhi khatra lage toh ye unn par taan dena seedhi....!"

"Par.. par main isko chhpaaoon kahan.. ye toh bahut bhari hai...!" Maine utsukta se poochha......

"offo.. tum toh paka deti ho.. ab ye bhi main hi bataoon kya?.. lao.. wapas do.. Mujhse door mat hona...!" Kahkar Manav ne wapas revolver mere hath se jhatak li.. main uska munh dekhti rah gayi... usne fir se auto chalani shuru kar di...,"wahan ye mat dikhana ki tum mujhe jaanti ho.....!"

"theek hai.. main munh chadha kar boli.....

"kale ka dhaba toh yahi hai..." Manav ne auto ki speed kam karte huye kaha.. hum shahar se bahar kheton mein aa gaye the....

Hamari auto rukte hi dhabe ke dusri aur se do ladke bhagte huye hamari taraf aaye... aate hi unmein se ek ne poochha..,"Tu Anju hai..?"

Main achanak sihar si gayi... mere sare shareer mein kampan si shuru ho gayi.. Sach mein hi main had se jyada darr gayi thi.. manav ke sath hone par bhi mere pasine se chhootne lage.. maine ek baar ghabrahat mein Manav ki aur dekha aur fir apni gardan hila di....

"aaja neeche... bhai ke paas chalna hai na...?" Usi ladke ne fir poochha aur fir dusre ladke ko dekh kar aankh maarte huye bola...,"kya item hai yaar.... Priyanka jaisi lagti hai.. nahi?? he he he..."

Maine darr ke maare sahme huye hi aaine mein Manav ki aur dekha.. usne mujhe aankhon hi aankhon mein neeche utarne ka ishara kiya... Main hadbadayi huyi si neeche utari hi thi ki ek ne mera hath pakad liya....,"aaja.. apna bhi no. lag jaye toh... haye...!"

"kiraya toh deti jao madam!" Ladke ne jaise hi mera hath pakda.. Manav bol pada...

"A.. itni chikni loundiya se bhi koyi kiraya leta hai kya..? bahut achchhi bohni ho gayi teri.. ja ab ghar jakar seat ko soongh poora din.. chal apna kaam kar...!" Mere kuchh bolne se pahle hi wo ladka Manav ke paas jakar khada ho gaya....

"lekin bhai sahab... meri rozi ka sawaal hai.. kiraya toh dena hi padega isko....!" Manav auto se neeche aakar khada ho gaya....

Tabhi Dono police wale bhi aakar tamashbeeno ki tarah hamare paas bike rok kar khade ho gaye....,"kya ho gaya bhai?"

"de na yaar isko.. chalta kar.. kyun bematlab ka locha karwa raha hai..." Dusre ladke ne jeb se 10 rupaiye nikal kar Manav ki aur badha diye....

"Ye kya bheekh de rahe ho... ? 100 rupaiye mein baat huyi thi....!" Manav taish mein aakar apni baahein upar karne laga....

"100 rupaiye.. sale tujhe kya hum videshi lagte hain... bus stand se hi toh lekar aaya hai... chutiya bana raha hai.. 100 rupaiye....!" Mera hath thame jo ladka khada tha.. usne kaha....

"abe.. main kounsa fokut ke maang raha hoon.. 100 rupaiye mein baat huyi thi.. poochh lo madam se!" Manav bola....

Tabhi dusra ladka Manav ke kaan ke paas jakar sir uthakar dheere se bola...," tera time achchha hai bhosadi ke.. lafda karne ka mood nahi hai hamara.. warna teri gaand mein goli thok deta abhi... bhag ja warna...!"

Uss ladke ki baat sunkar dono police wale ek dum bike se neeche aa gaye the.. par manav ke hath ka ishara pakar ruk gaye...,"Kyun ladayi kar rahe ho bhai... de do na bechare ke paise.. jo baat huyi thi....!"

"Aey.. chalo apna rasta naapo.. yahan koyi ramleela nahi ho rahi..." Ladka mera hath chhod kar police walon se bola aur jeb mein hath daal kar mobile nikal liya... Uske no. dial karte hi turant udhar se fone utha liya gaya.. aawaj mujh tak saaf saaf aa rahi thi.. wo dholu hi tha...,"aa gayi kya?"

"aa toh gayi bhai.. uss auto wale ko kuchh khujali hai.. 100 rupaiye maang raha hai yahan tak ke.... sala maan hi nahi raha.... mera toh mann kar raha hai ki...." ladke ne kaha....

"na.. wahan tamasha mat karo... aisa karo.. tu uske sath hi auto main lekar baith ja loundiya ko... yahin de denge usko kharcha pani... le aa apne sath hi.. bike teja le aayega....!"

"theek hai bhai.. ye sahi hai....!" ladka bola aur udhar se fone kat gaya....

"Thodi aage tak chalna padega... 200 de denge... bol!" ladke ne manav ko ghoorte huye kaha....

"Theek hai.. par poore 200 hi loonga... aao.. baitho...!" Manav kahkar auto mein baith gaya... Main toh Manav se bhi pahle Auto mein aa chuki thi.. mera dil buri tarah dhadak raha tha....

Uss ladke ke bataye anusaar road par hi ek jagah Manav ne auto rok di... Ladka auto se utarte hi bola..," Haan! rupaiye lega na tu?"

"Haan.. aur poore 200 rupaiye...!" Manav ne thok kar kaha....

Ladka jane kya soch kar hans pada.. ,"aaja.. mere sath aaja.. tu bhi kya yaad rakhega...saley!" Usne kaha aur mera hath pakadne laga....

"Chhod do.. main chal rahi hoon apne aap...!" Maine uska hath jhatka aur Manav ke sath sath chalne lagi.....

"aaye haye.. tere nakhre..! kya karti hai tu...?" Ladke ne apne honton par jeebh ferte huye kaha..... maine koyi jawab nahi diya... Tabhi hum ek tubewell ke sath bane 2 kamron wale makaan ke aage jakar ruk gaye.. wo ladka andar ghus gaya tha...

"aa na.. darr kyun rahi hai...? " Ladke ne mudkar kaha..aur fir manav ki taraf dekh kar bola..,"tu bhi aaja chikne.. ab fat gayi kya? le le 200 rupaiye bhai se.. aaja.. puchch.. ha ha ha...."

Manav ne dayi taraf dekha... wo dono police wale bhi bike auto ke paas rok kar tezi se hamari aur chale aa rahe the... Manav jhat se andar ghus gaya.... Main abhi bhi uss'se peechhe thi.....

Ladke ke pichhe Manav jaise hi darwaje par jakar khada hua.. meri nazar seedhi andar teen aur logon ke sath baithe Dholu par padi... charon beech mein gilas rakhe tash (cards) khel rahe the.. wo khali kachchhe mein baitha tha aur uski tond saaf dikh rahi thi....

"le aaya... Dholu mujhe dekhte hi khush hokar khada ho gaya aur kachchhe par hath maarte huye Manav ki aur dekha...,"Ye...?"

"Bhai auto wala! ab 200 maang raha hai..sala... he he he.."

"toh main kya aarti utaaroo ab.. ja doosre kamre mein le jakar de do....jitne maang raha hai..!" Dhlou ne kaha aur fir najrein faad kar kuchh der Manav ki aur ghoorne ke baad bola...," O Teri behan ko chodu saale... thanedaar ko le aaya...!" Dholu ki sitti pitti gum ho gayi... Usne kaha aur pichhle darwaje se nikal bhaga....

Dholu ki baat sunkar wahan baithe sabhi logon ke kaan khade ho gaye... Wo toh uth bhi na sake... Jaise hi maine kaha ki wahi dholu hai... Manav mere baare mein bhool kar seedha pichhle darwaje se hi nikal kar Dholu ke pichhe doud gaya....

Manav ke apni taraf aata dekh toh teeno ke hosh hi udd gaye the.. par jaise hi Manav unke upar se kood kar pichhe gaya.. unki jaan mein jaan aayi aur 'wo' teeno uthkar meri taraf bhage... Main khadi khadi thar thar kaanp rahi thi... par wo meri aur nahi.. apni jaan bachane ko bahar ki aur bhage the.. par 'wo' bach na sake.. bahar nikalte hi unmein se do ko unn police waalon ne daboch liya.. aur teesra apni taraf revolver ka munh dekh apne aap hi gir pada... par jo ladka mujhe lekar aaya tha.. uska kahin pata nahi chal paya......

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kareeb 15 minute baad Manav Dholu ko lekar wahin aa pahuncha... Usne Dholu ki ungaliyan apni ungaliyon mein fansa rakhi thi.... Dholu ka sara shareer pasine se tar ho gaya tha aur wo buri tarah haanf raha tha.... Tabhi wahan police ki jeep sairen bajate huye aa pahunchi....

Pasine se tarr Manav ke chehre par anokhi chamak thi... Mere paas aate hi wah haanfte huye bola..,"Thank you memshab!"

Manav ko dekhkar hi meri jaan mein jaan aayi.. mujhe nahi pata tha ki ab kya hone wala hai...! Police waalon ne teeno ko zeep mein daal liya...," Baitho janaab!"

"Yaar.. wo.. auto bhi toh wapas karke aani hai.. tum chalo hum aate hain..." Manav ne kaha....

"wo hum bhijwa denge janab.. aap fikar na karo...!" Police waalon mein se ek ne kaha.....

"Samjha karo yaar...! chalo tum... main aata hoon.. kahkar Manav muskura diya... Wo police wale bhi ajeeb dhang se muskuraye aur apni zeep modne lage... Main unki muskurahat ka matlab samajh gayi thi.. par mujhe vishvas nahi tha ki Manav mere sath aisa karne ki soch bhi sakta hai... Maine ghoor kar Manav ki taraf dekha......

"Ek baat poochhoon..?" Manav Tubewell par apne hath pair aur chehra dhone ke baad meri taraf mudkar bola....

"Kya?" Main apni jagah par hi khadi rahi.....

"wwo... aao baitho na thodi der... saale beha... sorry.. aadat ho jati hai police mein... bahut bhagaya kutte ke bachche ne....!" Manav ek jagah baith kar sustaane laga... main kuchh na bol saki... wahin khadi rahi....

"Baitho na yaar.. thodi der baith jao..." Manav ne khada hokar mera hath kheencha aur apne paas baitha liya...

"Kaisa lagta hoon main?" Manav ne poochha...

Main kuchh der toh munh se kuchh nikal hi na payi... par jab wo mujhe dekhta hi raha toh mere munh se nikal gaya.,"kya matlab?"

"Matlab kya yaar.. simple.. kaisa lagta hoon main...?" Manav ne fir poochha....

"Police wale ya auto wale..?" Maine munh pichka kar kaha.. Mujhe uske armaano par shak paida hone laga tha....

"ha ha ha.. toh tum majak bhi kar leti ho...." Thodi der Manav hansta raha fir ek dum gambheer hokar bola...," Main tumhare baare mein galat soch raha tha.. tum waisi nahi ho jaisi tum tumhari aankhon mein dekhne par lagti ho...!"

"kkya matlab?" Main sihar si gayi thi....

"Matlab ki tum bahut bahut achchhi ho.. bahoooot achchhi..." Manav muskuraya...

Sach kahoon toh ye baat sunkar mujhe uss waqt utni khushi nahi huyi jitni ho sakti thi.. mere mann mein ajeeb sa darr paida ho raha tha.. manav ko lekar... Maine najrein jhuka li.....

"Ek baat poochh loon.. kisi ko kahna nahi....!" Manav ne kaha toh mera dil dhadak utha...,"kya?" Maine dheere se najrein jhukaye huye kaha...

"wwo.. tum galat mat sochna... wwo.. Meenu mere baare mein baat karti hai kya?"

"ohhh..." Meri jaan mein jaan aayi...," Haan.. kabhi kabhi.. main uski aur dekh kar muskura padi....

"Kya baat karti hai..?" Usne utsukta se poochha....

"ummm.. yahi.. case ke baare mein hi.. wo mujhe sab batati hai... kab aako fone karke kya bataya.. aur.. aapki planning... sab!"

"ye nahi yaar.. aur kuchh.. aur kuchh jaise.... chalo chhodo.. tum nahi samjhogi...!" Manav khada ho gaya...,"aao chalte hain.... Pinky bhi wait kar rahi hogi....!"

Main Manav ke pichhe pichhe chal padi... Meenu ke baare mein usne kyun poochha.. wo toh main saaf saaf samajh hi gayi thi... Manav ka ye kahna ki tum bahooooot achchhi ho.. ab mere dil ko gahra sukoon de raha tha.....

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"Lo bhai.. Bahut bahut dhanyawaad..." Manav ne auto se utar kar auto wale se kaha aur uske hath mein 500 rupaiye pakda diye....

"Ye kisliye sahab?" Wo chounk kar khush hote huye bola....

"Rakh le yaar.. tujhe auto ki service toh karwani hi padegi lagta hai..." Manav ne uski peeth thounk kar kaha aur fir tapak se bola..,"Abhi mat baith yaar.. bathroom mein chal... ye kapde pahan kar thane gaya toh foto chhap jayegi akhbaar mein..." Manav hansta hua bola toh Auto wala jhenp sa gaya...,"haan sahab.. ye toh main bhool hi gaya tha.....!"

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Main seedhi bus-stand ke andar gayi.. Harry ek jagah baitha tha aur Pinky uske paas khadi hokar bahar ki aur hi dekh rahi thi... Mujhe dekhte hi wo bhag kar bahar aayi....

Main uske paas aate hi muskurakar boli..,"Ho gaya kaam!"

Par Pinky ne koyi pratikriya na di.. Uski soorat rone jaisi lag rahi thi... Maine ek baar harry ki taraf dekha aur fir uss'se boli,"kya hua Pinky?"

"kuchh nahi.. mujhse baat mat karo..." Pinky chid kar boli....

Tabhi harry hamare paas aa gaya..,"main jaaun ab?"

Maine usko dekh kar apna sir hila diya..," Haan jao... par isko kya ho gaya...?"

"Pata nahi.. market se chowmeen khakar aaye the.. tab se aise hi baithi hai.. pate kharaab ho gaya shayad... goli lakar doon kya?" Harry ne pyar se poochha...

"Nahi.. mujhe nahi chahiye kuchh....!" Pinky tunak kar boli aur apna munh fer liya....

"Waise mujhe bhi gaanv hi jana hai.. tum kaho toh main intjaar kar leta hoon..." Harry ne uske tewaron par dhyan nahi diya.....," Meenu ko fone karke dekh lo..."

"Par hamare paas no. toh nahi hai... haan.. ek minute..." Main bhag kar bahar gayi.. wahan shayad Manav mera hi intjaar kar raha tha.....,"wo.. mujhe Meenu ke paas fone karna hai... uska no.?" Maine poochha....

"Wo bus do minute mein aa rahi hai yahin.. baat karwaaun kya?" Manav ne poochha....

"nahi rahne do fir toh...." Maine bola hi tha ki Meenu mujhe hamari hi aur aati dikh gayi...

"Pinky kahan hai..?" Usne aate hi poochha......

"Yahin hai andar... wwo.. hamne dholu ko pakad liya!" Maine garv se bataya....

"Haan.. wwo.. bata diya inhone...!" Meenu lagataar sir jhukaye khadi thi..," hum jayein ab?"

"Haan.. tum chalo... main shaam ko fone karke batata hoon.. sari baat...!" Manav ne kaha...

"Theek hai..." Meenu ne kankhiyon se ek baar Manav ki soorat dekhne ki koshish bhar ki aur mera hath pakad kar andar chal di... Pinky abhi bhi munh fulaye khadi thi... Maine harry ki baat usko batayi....

Meenu kuchh der sochne ke baad boli...,"theek hai.. chalte hain.. ab kya kaam bacha hai...?"

"Theek hai.. main parking se gadi lekar aata hoon.. bahar aa jao tab tak..!" Harry ne kaha aur hamse door chala gaya.....

Pata nahi Pinky kitni der se apna dukhda chhipaye baithi thi.. jaise hi Harry humse door gaya.. Pinky dahade si maar kar rone lagi....

"Kya hua Pinky.." Meenu ne achanak chinta mein doob kar Pinky ke gaalon ko sahlaate huye poochha.....

"wwo..."Pinky rote rote Harry ki aur masoom si soorat banate huye ungali karke boli..," wo mere 100 rupaiye ka cheenumeenu kha gaya...!" Pinky ne kaha aur mote mote aansoo tapkane lagi.....

"cheenumeenu kha gaya?.." Ek pal toh Meenu bhi sakpaka gayi.. fir thoda khij kar boli..,"Bus kar ab.. yahan tamasha kyun kar rahi hai.. tune diye hi kyun usko paise?"

Aaspaas ke logon ko apni aur ghoorte dekh kar Pinky saham gayi aur usne turant apne aansu pounchh liye..,"Maine kahan diye the usko paise..! Wo toh.. wo toh maine usko sirf yahi kaha tha ki chalo 'samosa' khayein...!"

"Fir?" Meenu uski shakal dekh mushkil se apni hansi rok pa rahi thi....

"Fir kya? kahne laga mujhe bhi bhookh lagi hai... Samose mein kya hoga.. ye kahkar wo mujhe bahar bade hotel mein le gaya.... wahan jakar usne 2 cheenumeenu aur 2 'thandey' mangwa liye... 'thanda' toh main kabhi peeti bhi nahi...." Kahte hi subaki rokne ki koshish mein Pinky ki hichki nikal gayi... thoda saans lekar wah fir bolne lagi..," Khane ke baad apni jeb par hath maarkar bola.."Ohho.. purse toh gadi mein hi rah gaya.. " Pinky ne munh banakar matakte huye uski nakal ki..,"Besharam ne mujhse paise maang liye...."

Meenu aur main Pinky ke andaj par khilkhilakar hans pade.. Pinky gusse se hamari aur dekhne lagi thi tabhi Meenu hanste huye hi boli..," Toh kya ho gaya... Uska purse gadi mein rah gaya hoga.. de dega tere paise... kyun matam mana rahi hai....?"

"Nahi dega wo.. mujhe pata hai.. usne apni 'goli' ke paise kaatne ke liye hi kiya hai aisa... dene hote toh ab tak de hi na deta... main aadhe ghante se usko yaad dila rahi hoon ye bol bol kar ki gadi kahan hai..? Maine usko gadi mein chalne ko bhi bola.. par wo chala hi nahi.. aise hi taalta raha....l" Pinky ab bhi gusse mein thi....

"toh kya ho gaya.. tune bhi toh khaya hai na uske sath.. 'cheenumeenu' he he he.." Meenu hans kar boli..,"aur idiot 'wo' chauwmeen hota hai.. cheenumeenu nahi!"

"Kuchh bhi ho.. par mujhe 'wo' thode hi khana tha... mujhe toh..." Tabhi Harry hamare paas hi aa pahuncha...,"tum aaye nahi bahar.. main wait karke aaya hoon..."

"Hamein nahi jana abhi.. hum toh shopping karke aayenge...!" Pinky munh chida kar boli...

"koyi baat nahi.. main bhi tumhare sath chal padta hoon..... agar dikkat na ho toh.. waise bus mein hi jana hai toh alag baat hai....!" Harry bechara sa munh banakar bola....

"Nahi.. tum bhi sath chalo..!" Pinky achanak bol padi......

"Chalo fir....!" Kahkar Harry khush hokar hamare sath chal pada.. Meenu uske sath thodi asahaj mahsoos kar rahi thi... isiliye 'wo' bahut kam bol rahi thi....

Gadi mein baith kar hum shahar mein ghuse hi the ki Pinky achanak chahak si uthi..,"Mujhe Chocklate leni hai....!"

"OK.. " Harry ne turant ek dukan dekhkar gadi side mein lagakar khadi kar di...,"Main lekar aata hoon.. kitni laaun?"

Meenu bolne hi wali thi ki beech mein baithi Pinky ne uska hath pakad kar daba diya...,"Kitne ki aati hai..?"

"wwo.. toh depend karta hai...." Harry bola...

"Theek hai.. 100 rupaiye ki le aao!" Bolte hi Pinky ne apni hansi rokne ke liye apne honton ko kaskar bheench liya.. aur meri aur dekhne lagi...

"Theek hai..." Harry bolkar jaise hi palta.. Pinky taaliyan peet'te huye hansne lagi..,"ab chakhaungi isko maja!"

"Sharm nahi aayi tujhe besharm.." Meenu chid kar boli....

"Mujhe kyun aayegi sharm.. kanjooson ke sath aisa hi karna chahiye... Ab main poora badla loongi..... abhi toh mujhe jalebiyan, samose aur golgappe bhi khane hain.... he he he..." Pinky ka chehra chamak utha....

Uss din Pinky ne jo kuchh harry ke sath kiya.. yaad karke aaj bhi pate mein bal pad jate hain... Harry 'aur kuchh' kahte kahte thak gaya tha.. par Pinky ki farmayishein khatam nahi huyi.... golgappe aur samosa khane ke baad jab pate mein jagah nahi bachi toh Pinky ne 2 kilo desi ghee ki jalebiyan pack karwa li... ab bhi shayad uska mann bhara nahi tha... Par Meenu ne iss baar usko kaskar daant pila di..,"Ghar chal ek baar.. tujhe dekhti hoon mein... aaj ke baad aana tu mere sath shahar mein...!"

Iss baar Haary ne 'aur kuchh kaha toh Pinky ne bina kuchh kahe apna sir jhuka liya... Harry ki muskurahat saaf bata rahi thi ki usko maloom tha Pinky usko tang karne ki koshish kar rahi hai.... Par wah Pinky ka bhi ustaad nikla....

Shahar se bahar jate hi Harry ne 100 ka note nikal kar pichhe badha diya..,"Pinky; ye tumhare 100 rupaiye...!"

Achanak Pinky ka chehra peela pad gaya.. Usko shayad laga ki uski shaitani pakdi gayi hai.. wah jhenp kar boli..,"Nahi.. rakh lo!"

"Arey rakh lo kya..? main toh bhool hi gaya tha.. abhi yaad aaya...! ye lo.. pakdo!" Kahkar Harry ne note pichhe hi chhod diya....

Uske baad toh gaanv tak Pinky ki aawaj tak nahi nikli... Hum dono hans hans kar pagal ho rahe the.. par shayad hamari hansi ka raaj Harry samajh nahi paya hoga...

kramshah.................


raj..
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Re: बाली उमर की प्यास

Unread post by raj.. » 11 Dec 2014 15:47

बाली उमर की प्यास पार्ट--32

गतान्क से आगे............

"हे भगवान! जाने कौनसी बिजली गिर गयी है...हमारे गाँव पर...बताओ! कोई किसी पर भरोसा करे भी तो कैसे करे? दोस्त ही दोस्त की जान लेने लगेगा तो भरोसा किस पर रहेगा....?" हम घर पहुँचे तो चाची माथे पर हाथ रखे चाचा से बतिया रही थी....

"क्या हुआ मम्मी?" मीनू ने उपर जाते ही पूचछा...चाची की बात हमने सीढ़ियों से ही सुन ली थी...

"हुआ क्या बेटी...? वो मनीषा बता रही थी... बेचारे तरुण को सोनू ने ही मारा था....?" चाची उदासी भरे लहजे में बोली....

"सीसी..सीसी..क्या?" हम तीनो के पैरों तले की ज़मीन खिसक गयी...," ये क्या कह रही हो मम्मी.... वो क्यूँ खून करेगा....?" मीनू सकपका सी गयी.....

"मैं क्या कह रही हूँ..? ये तो मनीषा बता रही है आज!" चाची ने जवाब दिया....

"पर.. चाची.. उसने पहले क्यूँ नही बताया...? और.. और उसको कैसे पता?" मैं अपने आपको बोलने से रोक ना पाई......

"उसको पहले डर लग रहा था.. डर वाली बात भी ठीक है उसकी.. खंख़्वाह गाँव में दुश्मनी कौन मोल लेगा.... अब जब सोनू रहा ही नही तो उसने बता दिया सब कुच्छ...!"

"और सोनू को..? उसको किसने मारा....?" मीनू पास बैठ कर बोली.. हम दोनो अभी भी खड़ी ही थी......

"अब उसका क्या पता बेचारी को....? उसको तो किसी ने बाहर ही मारा है...! बुरी करनी का फल मिल ही गया ना उसको भी.....!" चाची बुदबुदाई....

"पर मम्मी... मनीषा को कैसे पता चला... खोल के बताओ ना सारी बात....!" मीनू उत्सुकता से बोली.....

"अरे उसने सब सुनी थी उनकी बातें... आवाज़ भी पहचान ली थी दोनो की... सोनू तरुण से कुच्छ माँग रहा था... उसने इनकार कर दिया तो सोनू ने चाकू घोप दिए बेचारे के पेट में.... मनीषा ने चीख भी सुनी थी... और बोलो.. पोलीस हमारे पिछे पड़ी है.. हमारी बेटी पर शक कर रही है......!" चाची मानव को कोसते हुए बोली....

"शक कहाँ कर रहे हैं मम्मी... वो तो बस मदद ले रहे हैं.. थोड़ी सी...!" मीनू खिसिया कर बोली....

"जा अपना काम कर... तुझे ज़्यादा पता है क्या इन पोलीस वालों का... ये ऐसे ही बात करते हैं.. मान में कुच्छ और बाहर कुच्छ.. मदद लेनी होती तो मनीषा से ना लेते.. दोबारा उसके पास गया 'वो' कभी... यहाँ आ जाता है भाग कर.. लोग भी जाने क्या क्या बातें करने लगे होंगे.....!" चाची चिड़ कर बोली....

"पर मम्मी... मनीषा उसके कॉलेज लाइफ के बारे में थोड़े ही बता सकती है... वो तो..." मीनू ने मानव का बचाव करने की कोशिश की....

"अब तो पता लग गया ना...? अब आने दो उस मुए को यहाँ... भला ये भी कोई तरीका हुआ उसका... आता है और हमें भगा देता है... तेरे पापा को तो आज ही पता चला... लड़की से पूचहताच्छ के लिए लेडी पोलीस होनी ज़रूरी होती है.....!" चाची का चेहरा ख़ूँख़ार हो गया.....

"छ्चोड़ो ना मम्मी... मुझ पर भी भरोसा नही है क्या...? वो सिर्फ़ काम की बातें पूछ्ते हैं....... अंजलि भी तो पास रहती है ना.... पूच्छ लो..!" मीनू नाराज़ सी होकर बोली...

"हां चाची.. सिर्फ़ काम की बातें ही करते हैं..." मैने चाची के बिना पूच्छे ही मीनू की हां में हां मिला दी.....

"चलो छ्चोड़ो.... और हाँ... मैने तेरी मम्मी को बता दिया था कि तू और पिंकी मीनू के साथ शहर गये हो... अपने पापा को मत बताना.. तेरी मम्मी मना कर रही थी......" चाची ने कहा तो मैं हड़बड़ा सी गयी...,"हां.. ववो.. चाची..."

"पिंकी.. ज़रा दो कप चाय तो बना दे बेटी.....!" चाचा ने हस्तक्षेप करते हुए कहा....

मीनू किसी को बिना कुच्छ बोले नीचे भाग गयी... मुझे भी तरुण और सोनू के बारे में जान'ने की दिलचस्पी थी.... मैं भी तुरंत उसके पिछे पिछे हो ली....

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--------------

"ये मनीषा झूठ तो नही बोल रही दीदी?" मेरे मंन में उथल पुथल सी मची हुई थी.....

"क्यूँ? उसको क्या मिलेगा झूठ बोल कर.... पर फिर सोनू को किसने मारा यार...?" मीनू मेरे बात पर प्रतिक्रिया देने के बाद बोली....,"और.. सोनू क्या माँग रहा होगा उस'से... जिसके बदले उसने खून कर दिया!"

"क्या पता.. आपके लेटर माँग रहा हो...!" मैने आइडिया लगाया...

"पर 'वो तो उसकी जेब में ही मिल गये ना... ऐसा करता तो वो उनको लेकर नही जाता क्या?" मीनू बोली....

"वो... तरुण का फोन...? उसमे भी आपके फोटो थे ना...? और ववो.. स्कूल वाली वीडियो भी..."

"हाँ ...ये हो सकता है...! पर तरुण का फोन तो उसके पास है जो अब हमें फोन कर रहा है....!" मीनू झल्ला कर बोली....

"हो सकता है उसीने फोने छ्चीन कर खून कर दिया हो उसका......" मैं असमन्झस से बोली...,"कुच्छ समझ नही आ रहा दीदी.. सोनू का फोन ढोलू के पास... तरुण का किसी और के पास..."

"अब पता लग जाएगा... मानव ढोलू से सारी बातें उगलवा लेगा.... पता नही क्या होने वाला है .. हे भगवान!" मीनू हाथ जोड़ कर बोली.....

"फोन कर लो ना दीदी.... अभी....!" मैने मीनू से कहा...

"नही.. वो अपने आप ही कर देगा.. उसने शाम को फोन करने को बोला था ना... ऐसे बार बार अच्च्छा नही लगता....!" मीनू शायद मेरे सामने उस'से बात नही करना चाहती थी......

"उसको ये तो बता दो... मनीषा वाली बात!" मैने ज़ोर देकर कहा...

"बता दूँगी थोड़ी देर में....!" मीनू ने एक बार फिर मुझे टालने की कोशिश की....

"बता दो ना दीदी.. अभी...!"

"चल ठीक है.. जीने वाला दरवाजा बंद कर दे....!" मीनू ने कहकर फोन निकाल लिया...

मेरे दरवाजा बंद करके आते ही उसने मानव को फोन लगा दिया....

"हां मीनू!" मानव की प्यार भरी आवाज़ हमारे कानो में गूँजी.. पर वो थोड़ा बिज़ी लग रहा था....

"ववो.. एक बात बतानी थी...!" मीनू ने हिचकते हुए कहा... मुझे लग रहा था कि ये हिचक मेरी वजह से है....

"बोलो ना!" उसने फिर कहा... अब दूसरी तरफ से आ रही आवाज़ें कम सुनाई देने लगी थी....

"वो.. मनीषा कह रही है कि तरुण को सोनू ने मारा था...."

"क्क्याअ?" मानव भी चौंक पड़ा...,"कौन मनीषा....?"

"वो ही जिसने चौपाल में आवाज़ें सुनी थी....!" मीनू ने याद दिलाया....

"ओह्ह हां... पर उसने पहले क्यूँ नही कहा ये सब....!" मानव कुच्छ सोचने के बाद बोला....

"पता नही... वो तो कह रही है कि पहले उसने 'सोनू' के डर से नही बोला कुच्छ... बाकी आप पूच्छ लेना... आपको कुच्छ पता लगा...?" मीनू बोली....

"क्या? किस बारे में...?" मानव ने यूँही शांत लहजे में पूचछा.....

"ढोलू ने कुच्छ बताया नही क्या?" मीनू ने मेरी और देख कर मुँह बनाया...

"ओह्ह.. ना! इसने तो और उलझा दी हैं बातें...!" मानव बोला....

"क्या मतलब?" मेरी भी कुच्छ समझ नही आया था....

"मतलब वही.. धाक के तीन पात.. कुच्छ खास फयडा नही हुआ... इसको ज़्यादा कुच्छ पता नही है....!"

"पर सोनू का फोन भी तो इसीके पास है ना... और तरुण वाले फोन पर भी इसकी बात होती हैं... फिर ये भाग क्यूँ रहा था पोलीस से....?" मीनू ने एक ही साँस में जाने कितनी बातें बोल दी...

"हां.. वो सब तो बता दिया... पर केस तो अब भी वहीं का वहीं है... 'उस' आदमी के बारे में कुच्छ खास पता नही चल पाया...." मानव ने लंबी साँस छ्चोड़ते हुए कहा....

"पर.. क्या पता ये झूठ बोल रहा हो....?" मीनू ने आशंका जताई....

"ना! मुझे नही लगता... पेशेवर अपराधी अदालत में जाकर झूठ बोलते हैं.. पोलीस के सामने नही.. इनको पता होता है कि यहाँ तो सब कुच्छ बताना ही पड़ेगा.. चाहे शुरू में बता दो.... या हड्डियाँ सीधी होने के बाद... बाकी रात को एक घंटी और लूँगा इसकी.. देखो कुच्छ और निकल कर आ जाए तो.... अभी तो मैं गाँव आ रहा हूँ.. मनीषा से मिलने... चाय पीने आ जाउ क्या?" मानव कहने के बाद हँसने लगा....

"कल आ जाना.. मम्मी पापा कहीं जा रहे हैं कल... मम्मी बहुत गुस्सा हैं आपसे.. जिस तरीके से आप आते हो!"

"तो ठीक है.. अब की बार सेहरा बाँध कर आउन्गा.. तब तो गुस्सा नही करेंगी ना....!" मानव ने हाज़िरजवाबी का परिचय दिया.....

मीनू के मुँह से एक बोल भी ना निकला.... पर मेरे मंन में एक सवाल रह रह कर उमड़ रहा था...,"सर.. ववो.. तो क्या आप ढोलू को छ्चोड़ दोगे..?"

"भाई कुच्छ नही मिला तो छ्चोड़ना तो पड़ेगा ही... वैसे अगर तुम्हे निज़ी दुश्मनी निकालनी हो तो 7/11 में अंदर करवा सकता हूँ हफ़्ता भर....!" मानव बोला....

"नही.. पर वो गाँव में आकर मुझसे......."

मेरे पूरी बात बोलने से पहले ही मानव समझ गया...," ये तुमने अब सोचा है... ये तो तुम्हे बहुत पहले सोच लेना चाहिए था....."

मैं एकदम से डर गयी..,"वो तो मुझे छ्चोड़ेगा नही.. अगर वापस आ गया तो.. मैने उसको पकड़वाया है....!" मैं घबराकर बोली....

"कौन कहता है?" मानव अजीब से ढंग से बोला..,"तुमने कैसे पकड़वाया है उसको... ये तो पोलीस का कमाल था...."

"नही.. मुझे सच में बहुत डर लग रहा है..." मैं उसकी बात को नज़र अंदाज करती हुई बोली.....

"अच्च्छा... तुम क्या मुझे आइवेइं ही समझती हो...? मैने ये बात तभी सोच ली थी जब तुमने कहा था कि तुम ढोलू को पकड़वा सकती हो... चिंता मत करो.. मैने सब सेट कर रखा है पहले से ही.." मानव मुस्कुराया....

"कैसे?" मुझे चैन नही आया था....

"ये लो! कह दिया ना कोई दिक्कत नही होगी... ढोलू यही समझता है कि तुम्हे नही पता था कि ऑटोडराइवर एक पोलीस वाला है...."

"प्लीज़ बता दो ना.. ऐसे मुझे चैन नही आएगा.." मैने याचना सी की....

"कल पेपर के बाद पोलीस संदीप को उठा लाई थी.. पूचहताच्छ के बहाने... ! अभी थोड़ी देर पहले छ्चोड़ा है उसको.... ढोलू का फोन सरविलेन्स पर तो लगा ही हुआ था... तुम्हारी और ढोलू की जो बातें रात को हुई थी.. उनमें से कुच्छ मैने संदीप को सुनवा दी.... और उस'से पूचछा कि ये लड़की कौन है! उसके तुम्हारा नाम बताने के बाद मैने उसके सामने ही ऐसे ही किसी को फोन करके तुम्हारा नाम पता देकर तुम पर 'कड़ी' नज़र रखने को कह दिया था... और बस स्टॅंड के बाहर एक 'ऑटो' का प्रबंध करने की बात भी कही थी.... आज मैने उन्न दोनो के सामने भी इस बात को उठाया था.. बाकी बात संदीप ने खुद उसको समझा दी होंगी....

अब ढोलू जिंदगी भर यही समझेगा कि मेरे बिच्छाए जाल में फंसकर तुम 'मेरी' ऑटो में बैठ गयी होगी... इसी को कहते हैं कि हींग लगे ना फिटकरी.. और रंग चोखा.. समझी!" कहकर मानव हँसने लगा तो मैं भी उसके साथ हंस पड़ी...

अचानक मुझे कुच्छ याद आया...,"तो क्या आपने ढोलू के साथ मेरी बात...!" मेरा चेहरा लाल हो गया...

"सुनी हैं.." मानव हंसता रहा...," तुम बहुत शातिर हो!"

क्रमशः.....................

gataank se aage............

"Hey bhagwan! Jane kounsi bijli gir gayi hai...hamare gaanv par...Batao! koyi kisi par bharosa kare bhi toh kaise kare? dost hi dost ki jaan lene lagega toh bharosa kis par rahega....?" Hum ghar pahunche toh chachi mathe par hath rakhe chacha se batiya rahi thi....

"Kya hua mummy?" Meenu ne upar jate hi poochha...Chachi ki baat humne seedhiyon se hi sun li thi...

"Hua kya beti...? Wo Manisha bata rahi thi... Bechare Tarun ko Sonu ne hi mara tha....?" Chachi udasi bhare lahje mein boli....

"kk..kk..kyaaaa?" Hum teeno ke pairon tale ki jameen khisak gayi...," Ye kya kah rahi ho mummy.... Wo kyun khoon karega....?" Meenu sakpaka si gayi.....

"Main kya kah rahi hoon..? ye toh Manisha bata rahi hai aaj!" Chachi ne jawab diya....

"Parr.. chachi.. usne pahle kyun nahi bataya...? aur.. aur usko kaise pata?" Main apne aapko bolne se rok na payi......

"Usko pahle darr lag raha tha.. darr wali baat bhi theek hai uski.. khamkhwah gaanv mein dushmani koun mol lega.... ab jab Sonu raha hi nahi toh usne bata diya sab kuchh...!"

"Aur Sonu ko..? usko kisne mara....?" Meenu paas baith kar boli.. hum dono abhi bhi khadi hi thi......

"Ab uska kya pata bechari ko....? usko toh kisi ne bahar hi mara hai...! Buri karni ka fal mil hi gaya na usko bhi.....!" Chachi budbudayi....

"Par mummy... Manisha ko kaise pata chala... khol ke batao na sari baat....!" Meenu utsukta se boli.....

"Arey usne sab suni thi unki baatein... aawaj bhi pahchan li thi dono ki... Sonu Tarun se kuchh maang raha tha... Usne inkaar kar diya toh Sonu ne chaku ghop diye bechare ke pet mein.... Manisha ne cheekh bhi suni thi... aur bolo.. Police hamare pichhe padi hai.. Hamari beti par shak kar rahi hai......!" Chachi manav ko koste huye boli....

"shak kahan kar rahe hain Mummy... wo toh bus madad le rahe hain.. thodi si...!" Meenu khisiya kar boli....

"Ja apna kaam kar... tujhe jyada pata hai kya in police walon ka... Ye aise hi baat karte hain.. man mein kuchh aur bahar kuchh.. madad leni hoti toh Manisha se na lete.. dobara uske paas gaya 'wo' kabhi... yahan aa jata hai bhag kar.. log bhi jane kya kya baatein karne lage honge.....!" Chachi chid kar boli....

"Par mummy... Manisha uske college life ke baare mein thode hi bata sakti hai... wo toh..." Meenu ne Manav ka bachav karne ki koshish ki....

"Ab toh pata lag gaya na...? ab aane do uss muye ko yahan... bhala ye bhi koyi tareeka hua uska... aata hai aur hamein bhaga deta hai... tere papa ko toh aaj hi pata chala... ladki se poochhtachh ke liye lady police honi jaroori hoti hai.....!" Chachi ka chehra khoonkhar ho gaya.....

"Chhodo na mummy... mujh par bhi bharosa nahi hai kya...? wo sirf kaam ki baatein poochhte hain....... Anjali bhi toh paas rahti hai na.... poochh lo..!" Meenu naraj si hokar boli...

"Haan chachi.. sirf kaam ki baatein hi karte hain..." Maine chachi ke bina poochhe hi Meenu ki haan mein haan mila di.....

"Chalo chhodo.... aur haan... maine teri mummy ko bata diya tha ki tu aur pinky Meenu ke sath shahar gaye ho... apne papa ko mat batana.. teri mummy mana kar rahi thi......" Chachi ne kaha toh main hadbada si gayi...,"haan.. wwo.. chachi..."

"Pinky.. jara do cup chay toh bana de beti.....!" Chacha ne hastakshep karte huye kaha....

Meenu kisi ko bina kuchh bole neeche bhag gayi... mujhe bhi Tarun aur Sonu ke baare mein jaan'ne ki dilchaspi thi.... Main bhi turant uske pichhe pichhe ho li....

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"Ye Manisha jhooth toh nahi bol rahi didi?" Mere mann mein uthal puthal si machi huyi thi.....

"Kyun? usko kya milega jhooth bol kar.... par fir Sonu ko kisne mara yaar...?" Meenu mere baat par pratikriya dene ke baad boli....,"aur.. Sonu kya maang raha hoga uss'se... jiske badle usne khoon kar diya!"

"Kya pata.. aapke letter maang raha ho...!" Maine idea lagaya...

"Par 'wo toh uski jeb mein hi mil gaye na... aisa karta toh wo unko lekar nahi jata kya?" Meenu boli....

"Wo... Tarun ka fone...? Usme bhi aapke foto the na...? aur wwo.. school wali video bhi..."

"Haan ...ye ho sakta hai...! par Tarun ka fone toh uske paas hai jo ab hamein fone kar raha hai....!" Meenu jhalla kar boli....

"ho sakta hai usine fone chheen kar khoon kar diya ho uska......" Main asamanjhas se boli...,"Kuchh samajh nahi aa rah didi.. Sonu ka fone dholu ke paas... Tarun ka kisi aur ke paas..."

"Ab pata lag jayega... Manav Dholu se sari baatein ugalwa lega.... pata nahi kya hone wala hai .. hey bhagwaan!" Meenu hath jod kar boli.....

"Fone kar lo na didi.... Abhi....!" Maine Meenu se kaha...

"Nahi.. wo apne aap hi kar dega.. Usne sham ko fone karne ko bola tha na... aise baar baar achchha nahi lagta....!" Meenu shayad mere saamne uss'se baat nahi karna chahti thi......

"Usko ye toh bata do... Manisha wali baat!" Maine jor dekar kaha...

"Bata doongi thodi der mein....!" Meenu ne ek baar fir mujhe taalne ki koshish ki....

"Bata do na didi.. abhi...!"

"Chal theek hai.. jeene wala darwaja band kar de....!" Meenu ne kahkar fone nikal liya...

Mere darwaja band karke aate hi usne Manav ko fone laga diya....

"Haan Meenu!" Manav ki pyar bhari aawaj hamare kaano mein goonji.. par wo thoda busy lag raha tha....

"wwo.. ek baat batani thi...!" Meenu ne hichakte huye kaha... Mujhe lag raha tha ki ye hichak meri wajah se hai....

"Bolo na!" Usne fir kaha... ab dusri taraf se aa rahi aawajein kam sunayi dene lagi thi....

"wo.. Manisha kah rahi hai ki Tarun ko Sonu ne mara tha...."

"kkyaaa?" Manav bhi chounk pada...,"koun Manisha....?"

"wo hi jisne choupal mein aawajein suni thi....!" Meenu ne yaad dilaya....

"Ohh haan... par usne pahle kyun nahi kaha ye sab....!" Manav kuchh sochne ke baad bola....

"Pata nahi... wo toh kah rahi hai ki pahle usne 'Sonu' ke darr se nahi bola kuchh... baki aap poochh lena... aapko kuchh pata laga...?" Meenu boli....

"Kya? Kis baare mein...?" Manav ne yunhi shant lahje mein poochha.....

"Dholu ne kuchh bataya nahi kya?" Meenu ne meri aur dekh kar munh banaya...

"Ohh.. Na! isne toh aur uljha di hain baatein...!" Manav bola....

"Kya matlab?" Meri bhi kuchh samajh nahi aaya tha....

"Matlab wahi.. dhak ke teen paat.. kuchh khas fayda nahi hua... isko jyada kuchh pata nahi hai....!"

"Par sonu ka fone bhi toh isike paas hai na... aur Tarun wale fone par bhi iski baat hoti hain... fir ye bhag kyun raha tha police se....?" Meenu ne ek hi saans mein jane kitni baatein bol di...

"Haan.. wo sab toh bata diya... par Case toh ab bhi wahin ka wahin hai... 'Uss' aadmi ke baare mein kuchh khas pata nahi chal paya...." Manav ne lambi saans chhodte huye kaha....

"Par.. kya pata ye jhooth bol raha ho....?" Meenu ne aashanka jatayi....

"Na! Mujhe nahi lagta... peshewar apraadhi adaalat mein jakar jhooth bolte hain.. Police ke saamne nahi.. inko pata hota hai ki yahan toh sab kuchh batana hi padega.. chahe shuru mein bata do.... ya haddiyan seedhi hone ke baad... baki raat ko ek ghanti aur loonga iski.. dekho kuchh aur nikal kar aa jaye toh.... abhi toh main gaanv aa raha hoon.. Manisha se milne... Chay peene aa jaaun kya?" Manav kahne ke baad hansne laga....

"Kal aa jana.. Mummy papa kahin ja rahe hain kal... Mummy bahut gussa hain aapse.. jis tareeke se aap aate ho!"

"toh theek hai.. ab ki baar sehra baandh kar aaunga.. tab toh gussa nahi karengi na....!" Manav ne hazirjawabi ka parichay diya.....

Meenu ke munh se ek bol bhi na nikla.... par mere mann mein ek sawaal rah rah kar umad raha tha...,"sir.. wwo.. toh kya aap Dholu ko chhod doge..?"

"bhai kuchh nahi mila toh chhodna toh padega hi... waise agar tumhe nizi dushmani nikalni ho toh 7/11 mein andar karwa sakta hoon hafta bhar....!" Manav bola....

"nahi.. par wo gaanv mein aakar mujhse......."

Mere poori baat bolne se pahle hi Manav samajh gaya...," ye tumne ab socha hai... ye toh tumhe bahut pahle soch lena chahiye tha....."

Main ekdum se darr gayi..,"wo toh mujhe chhodega nahi.. agar wapas aa gaya toh.. maine usko pakadwaya hai....!" Main ghabrakar boli....

"koun kahta hai?" Manav ajeeb se dhang se bola..,"Tumne kaise pakadwaya hai usko... ye toh police ka kamaal tha...."

"Nahi.. mujhe sach mein bahut darr lag raha hai..." Main uski baat ko nazar andaaj karti huyi boli.....

"achchha... tum kya mujhe aivein hi samajhti ho...? maine ye baat tabhi soch li thi jab tumne kaha tha ki tum Dholu ko pakadwa sakti ho... chinta mat karo.. maine sab set kar rakha hai pahle se hi.." Manav muskuraya....

"Kaise?" Mujhe chain nahi aaya tha....

"Ye lo! kah diya na koyi dikkat nahi hogi... Dholu yahi samajhta hai ki tumhe nahi pata tha ki autodriver ek police wala hai...."

"Pls bata do na.. aise mujhe chain nahi aayega.." Maine yachna si ki....

"kal paper ke baad police Sandeep ko utha layi thi.. poochhtachh ke bahane... ! abhi thodi der pahle chhoda hai usko.... Dholu ka fone survillance par toh laga hi hua tha... tumhari aur dholu ki jo baatein raat ko huyi thi.. unmein se kuchh maine Sandeep ko sunwa di.... aur uss'se poochha ki ye ladki koun hai! Uske tumhara naam batane ke baad maine uske saamne hi aise hi kisi ko fone karke tumhara naam pata dekar tum par 'kadi' najar rakhne ko kah diya tha... aur bus stand ke bahar ek 'auto' ka prabandh karne ki baat bhi kahi thi.... aaj maine unn dono ke saamne bhi iss baat ko uthaya tha.. baki baat sandeep ne khud usko samjha di hongi....

Ab Dholu jindagi bhar yahi samjhega ki mere bichhaye jaal mein fanskar tum 'meri' auto mein baith gayi hogi... Isi ko kahte hain ki heeng lage na fitkari.. aur rang chokha.. Samjhi!" Kahkar manav hansne laga toh main bhi uske sath hans padi...

Achanak mujhe kuchh yaad aaya...,"toh kya aapne Dholu ke sath meri baat...!" Mera chehra laal ho gaya...

"suni hain.." Manav hansta raha...," Tum bahut shatir ho!"

kramshah.....................