संघर्ष

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rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 21 Dec 2014 12:13

लेकिन पंडित जी अपने लंड को बाहर निकालने के बावजूद अपनी आखों को काफ़ी थोड़ा सा ही खोल रखा था मानो सो रहे हों. अभी भी सावित्री मूत ही रही थी की धन्नो की नज़रें दुबारा जैसे ही पंडित जी के तरफ पड़ी तो उसके होश ही उड़ गये. वह समझ गयी की पंडित जी उसकी करतूत का जबाव दे दिया है. अब पंडित जी का गोरा और मोटा लंड एक दम खड़ा था और मानो सुपाड़ा कमरे की छत की ओर देख रहा था. धन्नो के शरीर मे बिजली दौड़ गयी. उसने दुबारा अपनी नज़र को लंड पर दौड़ाई तो गोरे और मोटे लंड को देखते ही उसकी मुँह से पानी निकल आया. तभी इस घटना से बेख़बर सावित्री पेशाब कर के उठी और चड्डी उपर सरकाने लगी. धन्नो ने अपने काँपते हाथों से सावित्री की चड्डी को उपर सरकाते हुए धीरे से बोली "अरे जल्दी कर हर्जाइ...बड़ा गड़बड़ हो गया...हाई राम...भाग यहाँ से .." इतना सुनते ही सावित्री ने सोचा की कहीं पंडित जी जागने के बाद उठ कर बैठ ना गये हों और जैसे ही उसकी घबराई आँखें चौकी के तरफ पड़ी तो देखी की पंडित जी अभी भी आँखें मूंद कर लेटे हुए हैं. लेकिन दूसरे पल जैसे ही उसकी नज़र धोती के बाहर निकल कर खड़े हुए लंड पर पड़ी वह सर से पाँव तक काँप उठी और अपने सलवार के नाडे को जल्दी जल्दी बाँधने लगी. धन्नो मानो लाज़ के कारण अपने मुँह को भी लगभग ढक रखा था और सावित्री के बाँह को पकड़ कर एक झटका देते हुए बोली "जल्दी भाग उधेर..मैं मूत को पानी से बहा कर आती हूँ.." सावित्री तुरंत वहाँ से बिना देर किए दुकान वाले हिस्से मे आकर चटाई पर खड़ी हो गयी और हाँफने लगी. उसे समझ मे नही आ रहा था कि ये सब क्या हो रहा है. धन्नो ने तुरंत बगल मे एक बाल्टी मे रखे पानी को लोटे मे ले कर शौचालय के फर्श पर पड़े मूत को बहाने लगी. धन्नो कमर से काफ़ी नीचे झुक कर पानी से मूत बहा रही थी. इस वजह से धन्नो का बड़ा चूतड़ सारी मे एक दम बाहर निकल आया था. पंडित जी चौकी पर उठ कर बैठ गये. और जैसे ही पानी से मूत बहाकर धन्नो पीछे मूडी तो देखी की पंडित जी चौकी पर बैठे हैं और उनका लंड एक दम खड़ा है. इतना देखते ही लाज़ के मारे अपने दोनो हाथों से अपने मुँह को ढँक ली और धीरे धीरे दुकान वाले हिस्से की ओर जाने लगी जहाँ सावित्री पहले ही पहुँच गयी थी. धन्नो जैसे ही कुच्छ कदम बढ़ायी ही थी की पंडित जी ने चौकी पर से लगभग कूद पड़े और धन्नो के बाँह को पकड़ना चाहा. धन्नो पहले से ही सजग थी और वह भी तेज़ी से अपने बाँह को छुड़ाते हुए भागते हुए दुकान के हिस्से के पहले लगे हुए दरवाजे के पर्दे के पास ही पहुँची थी की पंडित जी धन्नो की कमर मे हाथ डालते हुए कस के जाकड़ लिया. धन्नो अब छूटने की कोशिस करती लेकिन कोई बस नही चल पा रहा था. पंडित जी धन्नो के कमर को जब जकड़ा तो उन्हे महसूस हुआ की धन्नो का चूतड़ काफ़ी भारी है और चुचियाँ भी बड़ी बड़ी हैं जिस वजह से धन्नो का पंडित जी के पकड़ से च्छुटना इतना आसान नही था. पंडित जी धन्नो को खींच कर चौकी पर लाने लगे तभी धन्नो ने छूटने की कोशिस के साथ कुच्छ काँपति आवाज़ मे गिड़गिदाई "अरे...पंडित जीइ...ये क्या कर रहे हैं...कुच्छ तो लाज़ कीजिए...मेरा धर्म मत लूटीए...मैं वैसी औरत नही हूँ जैसी आप समझ रहे हैं...मुझे जाने दीजिए.." धन्नो की काँपति आवाज़ सावित्री को सुनाई पड़ा तो वह एक दम सिहर उठी लेकिन उसकी हिम्मत नही पड़ी कि वह पर्दे के पीछे देखे की क्या हो रहा. है. वह चटाई पर एकदम शांत खड़ी हो कर अंदर हो रहे हलचल को भाँपने की कोशिस कर रही थी. धन्नो का कोई बस नही चल रहा था. धन्नो के गिड़गिदाने का कोई असर नही पड़ रहा था. पंडित जी बिना कुच्छ जबाब दिए धन्नो को घसीट कर चौकी पर ले आए और चौकी पर लिटाने लगे " धन्नो जैसे ही चौकी पर लगभग लेटी ही थी की पंडित जी उसके उपर चाड. गये. दूसरे ही पल धन्नो ने हाथ जोड़ कर बोली "मेरी भी इज़्ज़त है ...मेरे साथ ये सब मत करिए..सावित्री क्या सोचेगी ...मुझे बर्बाद मत करिए...पंडित जी मैं आपके हाथ जोड़ती हूँ..." और इतना कह कर जैसे ही अपनी चेहरे को दोनो हाथों से च्छुपाने की कोशिस की वैसे ही पंडित जी ने अपने धोती को खोलकर चौकी से नीचे गिरा दिए. ढीली लंगोट भी दूसरे पल शरीर से दूर हो गया. अब पूरी तरह नंगे पंडित जी का लंड लहरा रहा था. धन्नो के शरीर पर पंडित जी अपने पूरे शरीर का वजन रखते हुए सारी को ब्लाउज के उपर से हटा कर चुचियो को मीसना सुरू कर दिए. चुचिओ का आकार सावित्री की चुचिओ से कुच्छ बड़ा ही था. वैसे ही धन्नो 43 साल की हो गयी थी. धन्नो ने अब कोई ज़्यादा विरोध नही किया और अपने मुँह को दोनो हाथों से च्छुपाए रखा. इतना देख कर पंडित जी धन्नो के शरीर पर से उतर कर एक तरफ हो गये और धन्नो के कमर से सारी की गाँठ को छुड़ाने लगे. तभी धन्नो की एक हाथ फिर पंडित जी के हाथ को पकड़ ली और धन्नो फिर बोली "पंडित जी मैं अपने इज़्ज़त की भीख माँग रही हूँ...इज़्ज़त से बढ़कर कुच्छ नही है.मेरे लिए..ऊहह" लेकिन पंडित जी ताक़त लगाते हुए सारी के गाँठ को कमर से बाहर निकाल दिए. कमर से सारी जैसे ही ढीली हुई पंडित जी के हाथ तेज़ी से सारी को खोलते हुए चौकी के नीचे गिराने लगे. आख़िर धन्नो के शरीर को इधेर उधेर करते हुए पंडित जी ने पूरे सारी को उसके शरीर से अलग कर ही लिए और चौकी के नीचे गिरा दिए. अब धन्नो केवल पेटिकोट और ब्लाउज मे थी. दूसरे पल पंडित जी ब्लाउज को खोलने लगे तो फिर धन्नो गिड़गिदाई "अभी भी कुच्छ नही बिगड़ा है मेरा पंडित जी...रहम कीजिए ...है ..रामम.." लेकिन ब्लाउज के ख़ूलते ही धन्नो की दोनो बड़ी बड़ी चुचियाँ एक काले रंग की पुरानी ब्रा मे कसी हुई मिली. पंडित जी बिना समय गवाए ब्लाउज को शरीर से अलग कर ही लिए और लेटी हुई धन्नो के पीठ मे हाथ घुसा कर जैसे ही ब्रा की हुक खोला की काफ़ी कसी हुई ब्रा एक झटके से अलग हो कर दोनो चुचिओ के उपर से हट गयी. पंडित जी ने तुरंत जैसे ही अपने हाथ दोनो चुचिओ पर रखने की कोशिस की वैसे ही धन्नो ने उनके दोनो हाथ को पकड़ने लगी और फिर गिड़गिदाई "अरे मैं किसे मुँह दिखाउन्गि ...जब मेरा सब लूट जाएगा...मुझे मत लुटीए..." लेकिन पंडित जी के शक्तिशाली हाथ को काबू मे रखना धन्नो के बस की बात नही थी और दोनो हाथ दोनो चुचिओ को मसल्ने लगे.

क्रमशः...........


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 21 Dec 2014 12:14

Sangharsh--28

dhanno ke bur se nikla mut shauchalay ke farsh par fail kar andar ki or bahne lagaa. peshaab khatm hone ke baad dhanno jaise hi khadi hui ki uski dono chutad fir aapas me sat gaye aur daraar fir kafi gahari ho gayi aur dono golaaion ke beech wali lakeer ab deekhai nahi de paa rahi thi. pandit ji ne jab dhanno ke mote mote dono janghon ko dekha to uski banavat aur bharaav ke vajah se dhanno ko chodne ki tivra ichchha jaag uthi. tabhi dhanno ne apni saari aur peticot ko kamar aur peeth se neeche giraa di aur sab kuchh dhak gayaa. dhanno apni jagah se hat kar bagal me khadi savitri ko boli "chal jaldi se yahin baith kar mut le..." savitri jo ki dhanno ki gandi aur ashleel baaton aur pandit ji ko chori aur chalanki se gaand deekhane ki ghatnaa se ekdam garm aur uttejit bhi ho chuki thi. uski bur bahut garm ho gayi thi. pataa nahi kyon dhanno chachi ka pandit ji ko gaand dikhaana use bahut achchha lagaa tha. jaise hi usne dhanno chachi ne usase kahaa ki wahin mutanaa hai vah samajh gayi ki uski bhi gaand padnit ji dekh lenge aur vah bhi dhanno chachi ke saamne. itani baat man me aate hi vah ekdam se sansanaa kar mast si ho gayi. pataa nahi kyon use aisa karne me jahaan dar aur laaz lag rahi thi vahin andar hi andar kuchh anand bhi mil rahi thi. dhanno chachi ne use fir mutne ke liye boli "are jaldi mut nahi to jag jaayenge to bahut gadbad ho jayegi..." savitri samajh rahi thi ki pandit ji jage huye hain. isi vajah se uske pair apni jagah se hil nahi paa rahe the. uski nazren jhuki hui thi. dhanno samajh gayi ki savitri ab jaan chuki hai ki pandit ji jage hain aur isi liye mut nahi rahi hai. lekin vah savitri ko mutane par badhya karna chah rahi thi ki uske andar bhi nirlajjtaa ka samaavesh ho jaay. yahi sochte huye dhanno ne turant savitri ke baanh ko pakad kar shauchalay ke darwaaje par kheench layi aur boli "jaldi mut le..der mat kar..chal main tere peeche khadi hun ..yadi jag jayenge to bhi nahi dekh paayenge. ." savitri theek shauchalay ke darwaaje ke beech jahaan dhanno ne peshaab ki thi vahi khadi ho gayi. uske kaampte huye haath salwar ke naade ko kholne ki koshis kar rahe the. jaise hi naade ki gaanth khuli ki usne apne kamar ke hisse me salwaar ko dheeli ki aur fir chaddi ko neeche sarkaane ki koshis karne lagi. chaddi kafi kasi hone ke vajah se savitri ke bade bade chutadon par se neeche nahi sarak paa rahi thi.

dhanno jo theek savitri ke peeche hi khadi thi jab dekhi ki chaddi kafi kasi hone ke vajah se savitri ke bade bade chutadon par se neeche nahi sarak paa rahi hai tab dheere se fusfusaai " hai ram itna badaa chutad hai tumhara ..aur kapade ke upar se to maloom hi nahi chalta ki andar do bade bade tarbooz rakhi ho..teri chaddi fat na jaaye..laa main peeche ka sarkaa deti hun..." itna kah kar dhanno savitri ke peechhe se thodi bagal ho gayi aur ab pandit ji ko savitri ka pura peechhwada deekhne lagaa. dhanno ne kafi chalanki se pandit ji se bina nazar milaaye teji se apni pallu ko sar ke upar rakhte huye pallu ke ek hisse ko kheench kar apne munh me danton dabaa li aur ab uskaa shareer lagbhag puri tarah se dhak gayaa tha mano vah bahut hi shareef aur lazaadhur aurat ho. dusre hi pal bina der kiye jhat se savitri ke sameez wale hisse ko ek haath se uske kamar ke upar uthaai to pandit ji ko savitri ke dono bade bade chutad uski kasi hui chaddi me deekhne lage. dhanno ke ek haath jahaan sameez ko uske kamar ke upar utha rakhi thi wahin dusre hath ki unglian teji se savitri ki kasi huyi chaddi ko dono chutadon par se neeche khiskaane lagi. salwaar ka naadaa dheela hone ke baad salwaar savitri ki bharipuri janghon me jaa kar ruk gayaa tha kyonki savitri ne ek haath se salwaar ke naade ko pakadi thi aur dusari hath se apni chaddi ko neeche sarkaane ki koshis kar rahi thi. dhanno ke ek nihaayat shareef aurat ki tarah saari me khood ko dhak lene aur apne sar par pallu rakhte huye munh par bhi pallu ke hisse dal kar mano ek nai naveli aur lazaadhur dulhan ki tarah pallu ke kone ko apne danton se dabaa lene ke baad savitri ki chutad par se sameez ko upar utha kar chaddi ko jaldi jaldi sarkaana pandit ji ko bahut ajeeb lagne ke saath saath kuchh aisa lag rahaa tha ki dhanno khood to shareef ban kar ek jawaan ladki ke shareer ko kisi dusare mard ke saamne nanga kar rahi thi aur dhanno ki is adaa ne pandit ji ko ghaayal kar diyaa. pandit ji dhanno ki haath ki harkat ko kafi gaur se apni palkon ke beech se dekh rahe the jo chaddi ko sarkaane ke liye koshis kar rahi thi. akhir kisi tarah savitri ki kasi hui chaddi dono chutadon se neeche ek jhatake ke saath sarak gayi aur dono chutad ek dam aajad ho kar apni puri golaaion me baahar nikal kar mano latakate huye hilane lage. tabhi dhanno ne dheere se fusfusaai "teri bhi chutad teri maa ki tarah hi kafi bade bade hain ...isi vajah se chaddi fans jaa rahi hai...jab itni pareshaani hoti hai to salwaar ke neeche chaddi mat pahnaa kar..itnaa badaa gaand kisi chaddi me bhalaa kaise aayegi..." itna kah kar dhanno dheere se hans padi aur chaddi wale haath khaali hote hi pane pallu ko fir se aise theek karne lagi ki pandit ji uske shareer ke kisi hisse na dekh sanken mano vah koi dulhan ho. lekin savitri ki haalat ekdam buri thi. jis pal chaddi dono golaaion se neeche ek jhatke se sarki usi pal use aisa lagaa mano mut degi. vah jaan rahi thi ki pandit ji kafi chalanki se sab kuchh dekh rahen hain. ab use dhanno ke upar bhi shak ho gayaa ki dhanno ko bhi ab yah maloom ho gayaa hai ki pandit ji un dono ki is kartooton ko dekh rahen hain. lekin use yah sab kuchh bahut hi nashaa aur mast karne wala lag rahaa tha. uska kalejaa dhak dhak kar rahaa tha aur bur me ek sansanaahat ho rahi thi. lekin use ek ajeeb anand mil rahaa tha aur shayad isi liye kafi laaz aur dar ke baavjood savitri ko aisa karna ab theek lag rahaa tha.

dusare pal savitri peshaab karne baith gayi aur baithate hi sameez ke peechhe wala hissa peeth par se sarak kar dono gol gol chutadon ko dhak liya. itna dekhte hi dhanno ne turant sameez ke us peechhe wale hisse ko apne haath se uthaa kar vapas peeth par rakh di jisase savitri ka dhutad fir ekdam nangaa ho gayaa aur pandit ji use apne bharpoor nazron se dekhne lage. savitri ki bur se peshaab ki dhaar nikal kar farsh par girne lagi aur ek dheemi aawaj uthne lagi. savitri jaan boojh kar kafi dheemi dhaar nikaal rahi thi taaki kamre me peshaab karne ki awaaj naa gunje. dhanno savitri ke peechhe ke bajaay bagal me khadi ho gayi thi aur uski nazren savitri ke nange gaand par hi thi. tabhi dhanno ne pandit ji ke chehre ke taraf apni nazar daudaai aur ek haath se apni saari ke upar se hi bur waale hisse ko khujulaa di mano vah pandit ji ko ishara kar rahi ho. lekin pandit ji apne ankhon ko bahut hi chalanki se bahut thoda sa khol rakhe the. fir bhi pandit ji dhanno ko samajh gaye ki kaafi kheli khaai aurat hai. aur dhanno ke apne saari ke upar se hi bur khujulaane ki harkat ka jabaav dete huye kafi dheere se apne ek haath ko apni dhoti me daal kar langot ke bagal se kuchh kasaav le rahe lund ko baahar nikaal diye aur lund dhoti ke bagal se ekdam baahar aa gayaa aur dheere dheere khadaa hone lagaa.

lekin pandit ji apne lund ko baahar nikaalne ke baavjood apni aakhon ko kafi thoda sa hi khol rakhaa tha mano so rahe hon. abhi bhi savitri mut hi rahi thi ki dhanno ki nazren dubaara jaise hi pandit ji ke taraf padi to uske hosh hi ud gaye. vah samajh gayi ki pandit ji uski kartoot ka jabaav de diyaa hai. ab pandit ji ka gora aur mota lund ek dam khadaa tha aur mano supaada kamare ki chat ki or dekh rahaa tha. dhanno ke shareer me bijli daud gayi. usne dubaara apni nazar ko lund par daudaayi to gore aur mote lund ko dekhte hi uski munh se paani nikal aaya. tabhi is ghatanaa se bekhabar savitri peshaab kar ke uthi aur chaddi upar sarkaane lagi. dhanno ne apne kaamtpe haathon se savitri ki chaddi ko upar sarkaate huye dheere se boli "are jaldi kar harjaai...badaa gadbad ho gyaa...hi raam...bhaag yahaan se .." itna sunate hi savitri ne socha ki kahin pandit ji jagne ke baad uth kar baith na gaye hon aur jaise hi uski ghabraai aankhen chauki ke taraf padi to dekhi ki pandit ji abhi bhi aankhen mund kar lete huye hain. lekin dusare pal jaise hi uski nazar dhoti ke baahar nikal kar khade huye lund par padi vah sar se paanv tak kaamp uthi aur apne salwaar ke naade ko jaldi jaldi baandhne lagi. dhanno mano laaz ke kaaran apne munh ko bhi lagbhag dhak rakhaa tha aur savitri ke baanh ko pakad kar ek jhatka dete huye boli "jaldi bhag udher..main mut ko paani se bahaa kar aaati hun.." savitri turant vahaan se binaa der kiye dukaan waale hisse me aakar chataai par khadi ho gayi aur haanfane lagi. use samajh me nahi aa rahaa tha ki ye sab kyaa ho rahaa hai. dhanno ne turant bagal me ek balti me rakhe paani ko lote me le kar shauchalay ke farsh par pade mut ko bahaane lagi. dhanno kamar se kafi neeche jhuk kar paani se mut bahaa rahi thi. is vajah se dhanno ka bada chutad saari me ek dam baahar nikal aaya tha. pandit ji chauki par uth kar baith gaye. aur jaise hi paani se mut bahaakar dhanno peechhe mudi to dekhi ki pandit ji chauki par baithe hain aur unkaa lund ek dam khadaa hai. itnaa dekhte hi laaz ke maare apne dono haathon se apne munh ko dhank li aur dheere dheere dukaan waale hisse ki or jaane lagi jahaan savitri pahle hi pahunch gayi thi. dhanno jaise hi kuchh kadam badhaayi hi thi ki pandit ji ne chauki par se lagbhag kud pade aur dhanno ke baanh ko pakadnaa chaha. dhanno pahle se hi sajag thi aur vah bhi teji se apne baanh ko chhudaate huye bhaagte huye dukaan ke hisse ke pahle lage huye darwaaje ke parde ke paas hi pahunchi thi ki pandit ji dhanno ke kamar me haath daalte huye kas ke jakad liya. dhanno ab chhutane ki koshis karti lekin koi bas nahi chal paa rahaa tha. pandit ji dhanno ke kamar ko jab jakadaa to unhe mahsoos huaa ki dhanno ka chutad kafi bhaari hai aur chuchian bhi badi badi hain jis vajah se dhanno ka pandit ji ke pakad se chhutana itna asaan nahi tha. pandit ji dhanno ko kheench kar chauki par laane lage tabhi dhanno ne chhutane ki koshis ke saath kuchh kampti awaaj me gidgidaai "are...pannnddeeet jiii...ye kyaa kar rahe hain...kuchh to laaz kijiye...mera dharm mat lootiye...main vaisi aurat nahi hun jaisi aap samajh rahe hain...mujhe jaane dijiye.." dhanno ki kampti awaaz savitri ko sunaai padaa to vah ek dam sihar uthi lekin uski himmat nahi padi ki vah parde ke peechhe dekhe ki kyaa ho rahaa. hai. vah chataai par ekdam shant khadi ho kar andar ho rahe halchal ko bhampane ki koshis kar rahi thi. dhanno ka koi bas nahi chal rahaa tha. dhanno ke gidgidaane ka koi asar nahi pad rahaa tha. pandit ji bina kuchh jabaab diye dhanno ko ghaseet kar chauki par le aaye aur chauki par litaane lage " dhanno jaise hi chauki par lagbhag leti hi thi ki pandit ji uske upar chad gaye. dusare hi pal dhanno ne haath jod kar boli "meri bhi izzat hai ...mere saath ye sab mat kariye..savitri kya sochegi ...mujhe barbaad mat kariye...pandit ji main aapke hath jodti hun..." aur itna kah kar jaise hi apni chehre ko dono haathon se chhupaane ki koshis ki vaise hi pandit ji ne apne dhoti ko kholkar chauki se neeche giraa diye. dheeli langot bhi dusare pal shareer se dur ho gayaa. ab puri tarah nange pandit ji ka lund lahraa rahaa tha. dhanno ke shareer par pandit ji apne pure shareer ka vajan rakhte huye saari ko blauze ke upar se hataa kar chuchion ko meesanaa suru kar diye. chuchion ka akaar savitri ki chuchion se kuchh badaa hi tha. vaise hi dhanno 43 saal ki ho gayi thi. dhanno ne ab koi jyada virodh nahi kiya aur apne munh ko dono haathon se chhupaye rakha. itna dekh kar pandit ji dhanno ke shareer par se utar kar ek taraf ho gaye aur dhanno ke kamar se saari ki gaanth ko chhudaane lage. tabhi dhanno ki ek haath fir pandit ji ke hath ko pakad li aur dhanno fir boli "pandit ji main apne izzat ki bheekh mang rahi hun...izzat se badhkar kuchh nahi hai.mere liye..oohh" lekin pandit ji taakat lagaate huye saari ke gaanth ko kamar se baahar nikaal diye. kamar se saari jaise ji dheeli huyi pandit ji ke haath teji se saari ko kholte huye chauki ke neeche giraane lage. akhir dhanno ke shareer ko idher udher karte huye pandit ji ne pure saari ko uske shareer se alag kar hi liye aur chauki ke neeche giraa diye. ab dhanno keval peticot aur blauze me thi. dusare pal pandit ji ne blauze ko kholne lage to fir dhanno gidgidaai "abhi bhi kuchh nahi bigdaa hai meraa pandit ji...raham kijiye ...hai ..raamm.." lekin balouze ke khoolate hi dhanno ki dono badi badi chuchian ek kaale rang ki puraani braa me kasi huyi mili. pandit ji binaa samay gawaaye blauze ko shareer se alag kar hi liye aur leti huyi dhanno ke peeth me haath ghusaa kar jaise hi bra ki hook kholaa ki kafi kasi huyi bra ek jhatake se alag ho kar dono chuchion ke upar se hat gayi. pandit ji ne turant jaise hi apne haath dono chuchion par rakhne ki koshis ki vaise hi dhanno ne unke dono haath ko pakadane lagi aur fir gidgidaai "are main kise munh dikhaungi ...jab mera sab lut jaayega...mujhe mat lutiye..." lekin pandit ji ke shaktishaali haath ko kaabu me rakhnaa dhanno ke bas ki baat nahi thi aur dono haath dono chuchion ko masalne lage.


rajaarkey
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Re: संघर्ष

Unread post by rajaarkey » 21 Dec 2014 12:15

संघर्ष--29

पंडित जी दोनो चुचिओ को मीसते हुए धन्नो के मांसल और भरे हुए शरीर का जायज़ा लेने लगे. धन्नो जब पंडित जी दोनो हाथों को अपनी चुचों पर से हटा नही पाई तो लाज़ दीखाते हुए अपनी दोनो हाथों से चेहरे को ढक ली. लेकिन पंडित जी अगले पल अपने एक हाथ से उसके हाथ को चेहरे पर से हटाते हुए अपने मुँह धन्नो के मुँह पर टीकाने लगे. इतना देख कर धन्नो अपने सर को इधेर उधेर घुमाने लगी और पंडित जी के लिए धन्नो के मुँह पर अपने मुँह को भिड़ना मुश्किल होने लगा. इतना देख कर पंडित जी उसके चुचिओ पर से हाथ हटा कर तुरंत अपने एक हाथ से धन्नो के सर को कस कर पकड़ लिए और दूसरे हाथ से उसके गाल और जबड़े को कस कर दबाया तो धन्नो का मुँह खूल सा गया और पंडित जी तुरंत अपने मुँह को उसके मुँह पर सटा दिया और धन्नो के खुले हुए मुँह मे ढेर सारा थूक धकेलते हुए अपने जीभ को धन्नो के मुँह मे घुसेड कर मानो आगे पीछे कर के उसके मुँह को जीभ से ही पेलने लगे. धन्नो का पूरा बदन झनझणा उठा. दूसरे पल धन्नो के ओठों को भी चूसने लगे. और अब हाथ फिर से चुचिओ पर अपना काम करने लगे. धन्नो की सिसकारियाँ दुकान वाले हिस्से मे खड़ी सावित्री को सॉफ सुनाई दे रहा था. सावित्री का कलेजा धक धक कर रहा था. थोड़ी देर तक ऐसे ही धन्नो के होंठो को कस कस कर चुसते हुए पंडित जी ने दोनो चुचिओ को खूब मीसा और नतीज़ा यह हुआ की पेटिकोट के अंदर गुदाज बुर की फांकों मे लार का रिसाव सुरू हो गया. सिसकिओं को सुन सुन कर सावित्री की भी बुर मे मस्ती छाने लगी. लेकिन वह जैसे की तैसे दुकान वाले हिस्से मे खड़ी थी और अंदर क्या हो रहा होगा यही सोच कर सिहर जा रही थी.

तभी पंडित जी ने धन्नो के पेटिकोट के उपर से ही उसके जांघों को पकड़ कर मसल्ने लगे. धन्नो समझ गयी की पंडित जी अब उसके शरीर के अंतिम चीर को भी हरने जा रहे हैं. और अगले पल जैसे ही उनके हाथ धन्नो के पेटिकोट के नाडे को खोलने के लिए बढ़े ही थे की वह उठ कर बैठ गयी और मानो सावित्री को सुनाते हुए फिर से गिड़गिदाने का नाटक सुरू कर दी "मान जाइए ...आप जो कहिए मैं करूँगी लेकिन मेरी पेटिकोट को मत खोलिए.. उपर की इज़्ज़त पर तो हाथ फेर ही दिए हैं लेकिन पेटिकोट वाली मेरी अस्मत को मत लूटीए...मैं मोसाम्मि के पापा के सामने कैसे जाउन्गि...क्या मुँह दिखाउन्गि...ये तो उन्ही की अमानत है......अरी मान जाइए मेरा धर्म इस पेटिकोट मे है...ऊ राम..." लेकिन पंडित जी के हाथ तबतक अपना काम कर चुका था और धन्नो की बात ख़त्म होते ही पेटीकोत कमर मे ढीला हो चुका था. धन्नो इतना देखते ही एक हाथ से ढीले हुए पेटिकोट को पकड़ कर चौकी से नीचे कूद गयी. पंडित जी भी तुरंत चौकी से उतरकर धन्नो के पकड़ना चाहा लेकिन तबतक धन्नो भाग कर दुकान वाले हिस्से मे खड़ी सावित्री के पीछे खड़ी हो कर अपने पेटिकोट के खुले हुए नाडे को बाँधने की कोशिस कर ही रही थी कि तब तक पंडित जी भी आ गये और जैसे ही धन्नो को पकड़ना चाहा की धन्नो सावित्री के पीछे जा कर सावित्री को कस कर पकड़ ली और सावित्री से गिड़गिदाई "अरे बेटी ...मेरी इज़्ज़त बचा लो ....अपने पंडित जी को रोको ...ये मेरे साथ क्या कर रहे हैं...." सावित्री ऐसा नज़ारा देखते ही मानो बेहोश होने की नौबत आ गयी. और लंड खड़ा किए हुए पंडित जी भी अगले पल धन्नो के पीछे आ गये और पेटिकोट के नाडे को दुबारा खींच दिया और दूसरे पल ही धन्नो का पेटिकोट दुकान के फर्श पर गिर गया. सावित्री पंडित जी के साथ साथ धन्नो चाची को भी एकदम नंगी देख कर एक झटके से धन्नो से अलग हुई दुकान के भीतर वाले कमरे मे भाग गयी. फिर एकदम नंगी हो चुकी धन्नो भी उसके पीछे पीछी भागती हुई फिर सावित्री के पीछे जा उसे कस कर पकड़ ली मानो अब उसे छ्होरना नही चाहती हो. दूसरे पल लपलपाते हुए लंड के साथ पंडित जी भी आ गये. सावित्री की नज़र जैसे ही पंडित जी खड़े और तननाए लंड पर पड़ी तो वा एक दम सनसना गयी और अपनी नज़रे कमरे के फर्श पर टीका ली. अगले पल पंडित जी धन्नो के पीछे आने की जैसे ही कोशिस किए धन्नो फिर सावित्री को उनके आगे धकेलते हुए बोली "अरे सावित्री मना कर अपने पंडित जी .को ...तू कुच्छ बोलती क्यूँ नही..कुच्छ करती क्यों नही...मेरी इज़्ज़त लूटने वाली है...अरे हरजाई कुच्छ तो कर....बचा ले मेरी इज़्ज़त....." सावित्री को जैसे धन्नो ने पंडित जी के सामने धकेलते हुए खूद को बचाने लगी तो सावित्री के ठीक सामने पंडित जी का तननाया हुया लंड आ गया जिसके मुँह से हल्की लार निकलने जैसा लग रहा था और सुपादे के उपर वाली चमड़ी पीछे हो जाने से सूपड़ा भी एक दम लाल टमाटर की तरह चमक रहा था. सावित्री को लगा की पंडित जी कहीं उसे ही ना पेल दें. सावित्री भले अपने समीज़ और सलवार और दुपट्टे मे थी लेकिन इतना सब होने के वजह से उसकी भी बुर चड्डी मे कुच्छ गीली हो गयी थी. धन्नो सावित्री का आड़ लेने के लिए उसे पकड़ कर इधेर उधेर होती रही लेकिन पंडित जी भी आख़िर धन्नो के कमर को उसके पीछे जा कर कस कर पकड़ ही लिया और अब धन्नो अपने चूतड़ को कही हिला नही पा रही थी. सावित्री ने जैसे ही देखा एकदम नगी हो चुकी धन्नो चाची को पंडित जी अपने बस मे कर लिए हैं वह समझ गयी अब पंडित जी धन्नो चाची चोदना सुरू करेंगे. सावित्री को ऐसा लगा मानो उसकी बुर काफ़ी गीली हो गयी है और उसकी चड्डी भी भीग सी गयी हो. और सावित्री अब धन्नो से जैसे ही अलग होने की कोशिस की वैसे धन्नो ने सावित्री के पीछे से उसके गले मे अपनी दोनो बाँहे डाल कर अपने सर को सावित्री के कंधे पर रखते हुए काफ़ी ज़ोर से पकड़ ली और अब सावित्री चाह कर भी धन्नो से अलग नही हो पा रही थी और विवश हो कर अपनी दोनो हाथों से अपने मुँह को च्छूपा ली. इधेर पंडित जी भी धन्नो के कमर को कस कर पकड़ लिए थे और धन्नो के सावित्री के कंधे पर कुच्छ झुकी होने के वजह से धन्नो का चूतड़ कुच्छ बाहर निकल गया था और पंडित जी का तन्नाया हुआ लंड अब धन्नो की दोनो चूतदों के दरार के तरफ जा रहा था जिसे धन्नो महसूस कर रही थी. पंडित जी के एक हाथ तो कमर को कस कर पकड़े थे लेकिन दूसरा हाथ जैसे ही लंड को धन्नो के पीछे से उसकी गीली हो चुकी बुर पर सताते हुए एक ज़ोर दार धक्का मारा तो धक्का जोरदार होने की वजह से ऐसा लगा की धन्नो आगे की ओर गिर पड़ेगी और सावित्री के आगे होने की वजह से वह धन्नो के साथ साथ सावित्री भी बुरी तरह हिल गयी और एक कदम आगे की ओर खिसक गयी और लंड के बुर मे धँसते ही धन्नो ने काफ़ी अश्लीलता भरे आवाज़ मे सावित्री के कान के पास चीख उठी "..आआआआआआआआआआ ररीए माआई रे बाआअप्प रे बाप फट गया.... फट गया ................फ..अट गाइ रे बुरिया फट फाया ...फट गया रे ऊवू रे बाप फाड़ दिया रे फाड़ दिया ......अरे मुसाममी के पापा को कैसा मुँह देखाउन्गा मुझे तो छोड़ दिया रे......श्श्सश्..........अरे. ..बाप हो.....मार ....डाला ...बुर मे घूवस गया रे ..हरजाइइ...तेरे पंडित ने ...चोद दिया मेरी ...बुर....उउउहहारे अरे हरजाई रंडी....तेरे पंडित ने मुझे चोद दिया..रे ...आरे बाप रे बाप मैं किसे मुँह दिखाउन्गि....आजज्ज तो लूट लिया रे.....मैं नही जानती थी ....आज मेरी बुर ....फट जाएगी.....ऊवू रे मा रे बाप ...मेरी बुर मे घूस ही गया..रे..मैं तो बर्बाद हो गयी...रे.अयाया " पंडित जी का लंड का आधा हिस्सा बुर मे घुस चुका था.