एक अनोखा बंधन compleet

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rajaarkey
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by rajaarkey » 13 Oct 2014 08:57

एक अनोखा बंधन--28

गतान्क से आगे.....................

“नाराज़ क्यों होते हो आदित्य. मेरी ज़ींदगी का इतना बड़ा दिन है और मैं अपनी पसंद का कुछ पहन-ना चाहती हूँ तो क्या ये ग़लत है. ये दिन जींदगी भर याद रहेगा हमें. देखो याद रखो कोई लड़ाई नही करनी है हमें. लड़ाई का परिणाम देख चुके हैं हम.”

“लड़ाई तो बेसक करेंगे जान पर एक दूसरे को छ्चोड़ कर नही जाएँगे. अब हम शादी के बंधन में बँधने जा रहे हैं. ये बात गाँठ बाँध लेते हैं की कभी एक दूसरे का साथ नही छ्चोड़ेंगे. क्योंकि छ्चोड़ेंगे भी तो पछताना भी हमें ही पड़ेगा.”

“हां ये तो हम देख ही चुके हैं. दूसरी सारी ले लेते हैं ना आदित्य…प्लीज़.”

“अरे पागल प्लीज़ क्यों बोल रही हो. एनितिंग फॉर यू. चलो अभी लेकर आते हैं तुम्हारी मन पसंद सारी. मेरी ज़रीना दुल्हन बन-ने जा रही है कोई मज़ाक नही है”

“आदित्य बहुत खर्चा करवा रही हूँ तुम्हारा. शरम सी तो आती है पर क्या करूँ. 10 लाख की एफडी है मेरे नाम…वो दहेज में दे रही हूँ तुम्हे. पूरी भरपाई कर लेना.”

“ये क्या बकवास कर रही हो ज़रीना. तुम्हारा मेरा क्या अलग-अलग है.”

“मुझे ताना दिया गया था इस बात का आदित्य. बहुत बुरा लगा था मुझे. मैं कोई तुम्हारी दौलत के पीछे नही हूँ. तुम तो जानते ही हो ना, मेरे अब्बा का भी तो अच्छा बिज़्नेस था. दंगो ने सब तबाह कर दिया.”

“मैं जानता हूँ जान. दुनिया तो कुछ भी कहती है. सचाई तो हम जानते हैं ना. चलो अब तुम्हारे लिए प्यारी सी सारी लेकर आते हैं.”

“तुम भी तो कुछ नया खरीद लो ना. शादी में पुराने कपड़े नही पहने जाते.” ज़रीना ने कहा.

“ऐसा है क्या…चलो फिर मैं भी खरीद लेता हूँ.”

शादी हो रही थी दोनो की. ये बात सोच कर ही झूम उठते थे दोनो. बहुत मुश्किल से ये खुशी पाने जा रहे थे दोनो. एक लंबा इंतेज़ार किया था दोनो ने. ज़रीना ने अपनी मन पसंद सारी खरीदी. आदित्य ने भी अपने लिए एक नयी पॅंट शर्ट ले ली. ख़ुसनसीब थे दोनो जो की एक साथ अपनी शादी की शॉपिंग कर रहे थे. ये अवसर हमारे समाज में हर किसी को नही मिलता.

शॉपिंग करने के बाद वो जब होटेल की तरफ जा रहे थे तो एक अज़ीब सी सुंदर सी मुस्कुराहट थी दोनो के चेहरे पर. चेहरे के ये भाव उनके दिलो में बसी ख़ुसी का इज़हार कर रहे थे.

होटेल पहुँच कर दोनो बिस्तर पर गिर गये. आदित्य एक कोने पर था और ज़रीना दूसरे कोने पर. बहुत थक गये थे दोनो.

“ज़रीना!”

“हां आदित्य”

“आइ लव यू सूऊऊ मच.”

“आइ लव यू टू.”

“शादी तो कर रहा हूँ तुमसे मगर अब एक चिंता सता रही है.” आदित्य ने कहा.

ये सुनते ही ज़रीना के चेहरे पर चिंता की लकीरे उभर आई. वो आदित्य की तरफ मूडी और बोली, “कैसी चिंता आदित्य.”

“रहने दो तुम्हे बुरा लगेगा” आदित्य ने कहा.

“बोलो आदित्य प्लीज़…मेरा दिल बैठा जा रहा है.” ज़रीना ने कहा.

“उस दिन के चुंबन से मेरे होन्ट अभी तक झुलस रहे हैं. शादी के बाद मेरा क्या होगा ज़रीना. कैसे झेलूँगा मैं तुम्हारे अंगारों को. यही चिंता सता रही है.”

“आदित्य मैं मारूँगी तुम्हे तुमने दुबारा ऐसा मज़ाक किया तो. अब से कोई चुंबन नही होगा हमारे बीच.”

“क्यों नही होगा!...ऐसा क्यों बोल रही हो.”

“बोल दिया तो बोल दिया.”

आदित्य ने ज़रीना का हाथ थाम लिया और उसे अपने तरफ झटका दिया. दोनो बहुत करीब आ गये. चेहरे बिल्कुल आमने सामने थे. साँसे टकरा रही थी दोनो की.

“छ्चोड़ो मुझे आदित्य.”

“तुम्हारे होंटो के अंगारों से झुलस जाना चाहता हूँ मैं. रख दो ये अंगारे मेरे होंटो पर जान मैं फिर से उसी अहसास को जीना चाहता हूँ.”

“ना मेरे होन्ट अंगारे हैं और ना मैं इन्हे कही रखूँगी छ्चोड़ो मुझे.”

“उफ्फ गुस्से में तो तुम और भी ज़्यादा सुंदर लगती हो. मन तो कर रहा है तुम्हारे होंटो पर होन्ट रखने का पर तुम्हारी मर्ज़ी के बिना नही रखूँगा.”

“मेरी मर्ज़ी कभी नही होगी अब. तुम मज़ाक उड़ाते हो मेरा. छ्चोड़ो मुझे.”

“कभी सपने में भी नही सोचा था कि इस नकचाढ़ि को प्यार करूँगा और इसके होंटो पर अपने होन्ट रखूँगा. कॉलेज टाइम में ऐसा विचार भी आता तो मुझे उल्टी आ जाती. इतनी नापसंद थी तुम मुझे.”

“ये…ये..ये…तुम बड़े मुझे पसंद थे. सर फोड़ने का मन करता था तुम्हारा.उस वक्त तुमसे प्यार का सोचने से पहले स्यूयिसाइड कर लेती मैं. बहुत ज़्यादा बेकार लगते थे तुम मुझे.”

“आज ऐसा क्या है ज़रीना कि हम एक साथ इस बिस्तर पर पड़े हैं एक दूसरे के इतने करीब.”

“तुमने ज़बरदस्ती रोक रखा है मुझे अपने करीब. कॉन तुम्हारे करीब रहना चाहता है.”

“चलो फिर छ्चोड़ दिया तुम्हारा हाथ. जाओ जहा जाना है.” आदित्य ने ज़रीना का हाथ छ्चोड़ दिया.

ज़रीना आदित्य के पास से बिल्कुल नही हिली. आँखे बंद करके वही पड़ी रही.

“क्या हुवा जान…जाओ ना. मैने तुम्हारा हाथ छ्चोड़ दिया है.”

ज़रीना ने आदित्य की छाती में ज़ोर से मुक्का मारा.

“आउच…इतनी ज़ोर से क्यों मारा.” आदित्य कराह उठा.

“तुम्हे पता है ना कि मैं तुमसे दूर नही रह सकती इश्लीए ये सब मज़ाक करते हो.” ज़रीना ने कहा.

“अफ जान निकाल दी मेरी. बहुत ख़तरनाक हो तुम.” आदित्य ने कहा.

ज़रीना ने आदित्य की छाती पर हाथ रखा और उसे मसल्ते हुवे बोली, “ज़्यादा ज़ोर से लगी क्या?”

“तुम जब मारती हो तो ज़ोर से ही मारती हो.”

“तुम मुझे यू सताते क्यों हो फिर. शरम भी आती है किसी को ये बाते सुन कर.”

“किसको शरम आती है? इस कमरे में तुम्हारे और मेरे शिवा भी कोई है क्या.”

“आदित्य तुम इतने शैतान निकलोगे मैने सोचा नही था.” ज़रीना ने कहा.

rajaarkey
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by rajaarkey » 13 Oct 2014 08:57

“ऐसा तो नही था कभी. तुमने दीवाना बना दिया मुझे जान. तुम मेरा पहला प्यार हो. तुमसे पहले ज़्यादा इनटरेक्षन नही रहा लड़कियों से.”

“जानती हूँ मैं. मेरा तो इंटेरेस्ट ही नही था किसी से दोस्ती करने में. मैं भी बस तुम्हे जानती हूँ. मेरा पहला और आखरी प्यार तुम ही हो.”

“इतनी प्यारी बात कर रही हो. एक प्यारी सी किस दे दो ना और जला दो मेरे होंटो को एक बार फिर से.”

“जल कर राख हो जाओगे रहने दो हिहिहीही.” ज़रीना ने हंसते हुवे कहा.

“तुम मुझे खाक में मिला दो तो भी चलेगा. तुम्हारे हुस्न की आग में जलना चाहता हूँ मैं.”

“अछा.”

“हां.”

“तुम कही झुटि तारीफ़ तो नही करते मेरी.”

“लो कर लो बात. कॉलेज में तुम मशहूर थी अपने हुस्न के लिए. तुम्हारी ही चर्चा हुवा करती थी हर तरफ लड़को में. ये बात और थी की तुम मुझे बिल्कुल पसंद नही थी.”

“क्या मैं इश्लीए पसंद नही थी कि मैं मुस्लिम थी?”

“ज़रीना कैसी बात कर रही हो.”

“बोलो ना आदित्य मैं नापसंद क्यों थी तुम्हे.”

“ये तो मैं भी पूछ सकता हूँ कि क्या तुम मुझसे नफ़रत इश्लीए करती थी क्योंकि मैं हिंदू था.”

“पहले मेरे सवाल का जवाब दो ना प्लीज़. पहले मैने सवाल किया है.”

“हां ज़रीना झूठ नही बोलूँगा. उस वक्त मुस्लिम लोगो से चिढ़ता था मैं. देश में कही भी टेररिस्ट अटॅक होता था तो बहुत गालिया देता था मैं. काई बार मन में ख़याल आता था कि मेरे पड़ोस में भी टेररिस्ट रह रहे हैं. तुम लोगो से लड़ाई और ज़्यादा नफ़रत पैदा करती थी तुम्हारे प्रति.”

“झूठ नही बोल सकते थे…इतना कड़वा सच बोलने की क्या ज़रूरत थी.” ज़रीना रो पड़ी बोलते-बोलते.

“जान…तुमने सवाल सच जान-ने के लिए किया था या फिर झूठ. अब तुम बताओ कि तुम क्यों नफ़रत करती तू मुझसे.”

“मुझे कभी किसी हिंदू के नज़दीक जाने की इच्छा नही होती थी, क्योंकि मुझे यही लगता था कि ये लोग हमें दबाते हैं इस देश में. माइनोरिटी होने के कारण हमारे साथ हर जगह भेदभाव होता है. कॉलेज में मेरे सभी मुस्लिम फ्रेंड्स ही थे. और हम लोगो के परिवारों का लड़ाई झगड़ा होने के कारण तुमसे नफ़रत और ज़्यादा बढ़ गयी थी.”

“शूकर है शादी होने से पहले ये राज खुल गये.” आदित्य ने कहा.

“तो क्या अब हम शादी नही करेंगे.” ज़रीना ने बड़ी मासूमियत से पूछा.

“तुम बताओ क्या इरादा है तुम्हारा?”

एक पल को खामोसी छा गयी दोनो के बीच. दोनो बहुत करीब पड़े थे एक दूसरे के. कुछ कहने की बजाए दोनो एक दूसरे की आँखो में झाँक रहे थे. कब उनके होन्ट मिल गये एक दूसरे से उन्हे पता ही नही चला. दोनो के होन्ट एक साथ हरकत कर रहे थे. 10 मिनिट तक बेतहासा चूमते रहे दोनो एक दूसरे को. जब उनके होन्ट जुदा हुवे तो बड़े प्यार से देख रहे थे दोनो एक दूसरे को.

“मिल गया जवाब.” आदित्य ने हंसते हुवे पूछा.

“हां मिल गया. यही कह सकती हूँ कि प्यार के आगे ये बातें कुछ मायने नही रखती.”

“हां हम एक दूसरे के करीब आए तो हम जान पाए एक दूसरे को. वरना तो जींदगी भर नफ़रत बनी रहती. हम आस आ हुमन बिएंग एक दूसरे से नफ़रत नही करते थे. बल्कि डिफरेंट रिलिजन से होने के कारण एक दूसरे को नापसंद करते थे. हम एक महीना साथ रहे तो धरम की झूठी दीवार गिर गयी. दीवार गिरने के बाद हम उसके पीछे खड़े असली इंसान को देख पाए. काश इस देश में हर कोई ऐसा कर पाए. मैं अपने पहले के विचारों के लिए शर्मिंदा हूँ.”

“मैं भी शर्मिंदा हूँ आदित्य. अच्छा हुवा जो कि हमें प्यार हुवा और हम एक दूसरे को जान पाए. प्यार में बहुत ताक़त होती है ना आदित्य.”

“हां बहुत ज़्यादा ताक़त होती है. ये प्यार ज़रीना जैसी लड़की को भी किस करना सीखा देता है. ऑम्ग फिर से बहुत प्यारा चुंबन दिया तुमने.”

“हटो छोड़ो मुझे…तुम फिर से शैतानी पर उतर आए.”

आदित्य और ज़रीना बिस्तर पड़े हुवे प्यार के उस कोमल अहसास को पा रहे थे जिसके लिए ज़्यादा तर लोग जीवन भर तरसते हैं. दोनो की आँखों में बहुत सारे सपने थे आने वाली जींदगी के लिए और दिलों में ढेर सारी उमंग थी.

क्रमशः...............................

rajaarkey
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by rajaarkey » 13 Oct 2014 08:58

Ek Anokha Bandhan--28

gataank se aage.....................

“naraaz kyon hote ho aditya. Meri zeendagi ka itna bada din hai aur main apni pasand ka kuch pahan-na chaahti hun to kya ye galat hai. ye din jeendagi bhar yaad rahega hamein. Dekho yaad rakho koyi ladaayi nahi karni hai hamein. Ladaayi ka parinaam dekh chuke hain hum.”

“ladaayi to besak karenge jaan par ek dusre ko chhod kar nahi jaayenge. Ab hum shaadi ke bandhan mein bandhne ja rahe hain. Ye baat gaanth baandh lete hain ki kabhi ek dusre ka saath nahi chhodenge. Kyonki chhodenge bhi to pachtaana bhi hamein hi padega.”

“haan ye to hum dekh hi chuke hain. Dusri saree le lete hain na aditya…please.”

“arey paagal please kyon bol rahi ho. Anything for you. Chalo abhi lekar aate hain tumhaari man pasand saree. Meri zarina dulhan ban-ne ja rahi hai koyi majaak nahi hai”

“aditya bahut kharcha karva rahi hun tumhaara. Sharam si to aati hai par kya karun. 10 lakh ki FD hai mere naam…vo dahej mein de rahi hun tumhe. Puri bharpaayi kar lena.”

“ye kya bakwaas kar rahi ho zarina. Tumhaara mera kya alag-alag hai.”

“mujhe taana diya gaya tha ish baat ka aditya. Bahut bura laga tha mujhe. main koyi tumhaari daulat ke peeche nahi hun. tum to jaante hi ho na, mere abba ka bhi to atcha business tha. dango ne sab tabaah kar diya.”

“main jaanta hun jaan. Duniya to kuch bhi kahti hai. sachaayi to hum jaante hain na. chalo ab tumhaare liye pyari si saree lekar aate hain.”

“tum bhi to kuch naya kharid lo na. shaadi mein purane kapde nahi pahne jaate.” Zarina ne kaha.

“aisa hai kya…chalo phir main bhi khareed leta hun.”

Shaadi ho rahi thi dono ki. Ye baat soch kar hi jhum uthte the dono. Bahut mushkil se ye khushi paane ja rahe the dono. Ek lamba intezaar kiya tha dono ne. zarina ne apni man pasand saree kharidi. Aditya ne bhi apne liye ek nayi pant shirt le li. Khusnasib the dono jo ki ek saath apni shaadi ki shoping kar rahe the. Ye avsar hamaare samaaj mein har kishi ko nahi milta.

Shoping karne ke baad vo jab hotel ki taraf ja rahe the to ek azib si shunder si muskuraahat thi dono ke chehre par. Chehre ke ye bhaav unke dilo mein basi khusi ka izhaar kar rahe the.

Hotel pahunch kar dono bistar par gir gaye. Aditya ek kone par tha aur zarina dusre kone par. Bahut thak gaye the dono.

“zarina!”

“haan aditya”

“I love you soooooo much.”

“I love you too.”

“shaadi to kar raha hun tumse magar ab ek chinta sata rahi hai.” aditya ne kaha.

Ye shunte hi zarina ke chehre par chinta ki lakire ubhar aayi. Vo aditya ki taraf mudi aur boli, “kaisi chinta aditya.”

“rahne do tumhe bura lagega” aditya ne kaha.

“bolo aditya please…mera dil baitha ja raha hai.” zarina ne kaha.

“ush din ke chumban se mere hont abhi tak jhulas rahe hain. Shaadi ke baad mera kya hoga zarina. Kaise jhelunga main tmhaare angaaron ko. Yahi chinta sata rahi hai.”

“aditya main maarungi tumhe tumne dubara aisa majaak kiya to. Ab se koyi chumban nahi hoga hamaare beech.”

“kyon nahi hoga!...aisa kyon bol rahi ho.”

“bol diya to bol diya.”

Aditya ne zarina ka haath thaam liya aur ushe apne taraf jhatka diya. Dono bahut karib aa gaye. Chehre bilkul aamne saamne the. Saanse takra rahi thi dono ki.

“chhodo mujhe aditya.”

“tumhaare honto ke angaaron se jhulas jaana chaahta hun main. Rakh do ye angaare mere honto par jaan main phir se ushi ahsaas ko jeena chaahta hun.”

“na mere hont angaare hain aur na main inhe kahi rakhungi chhodo mujhe.”

“uff gusse mein to tum aur bhi jyada shunder lagti ho. Man to kar raha hai tumhaare honto par hont rakhne ka par tumhaari marji ke bina nahi rakhunga.”

“meri marji kabhi nahi hogi ab. Tum majaak udaate ho mera. Chhodo mujhe.”

“kabhi sapne mein bhi nahi socha tha ki ish nakchadhi ko pyar karunga aur ishke honto par apne hont rakhunga. College time mein aisa vichaar bhi aata to mujhe ulti aa jaati. Itni naapasand thi tum mujhe.”

“ye…ye..ye…tum bade mujhe pasand the. Sar phodne ka man karta tha tumhaara.ush vakt tumse pyar ka sochne se pahle suicide kar leti main. Bahut jyada bekaar lagte the tum mujhe.”

“aaj aisa kya hai zarina ki hum ek saath ish bistar par pade hain ek dusre ke itne karib.”

“tumne jabardsati rok rakha hai mujhe apne karib. Kon tumhaare karib rahna chaahta hai.”

“chalo phir chhod diya tumhaara haath. Jaao jaha jaana hai.” aditya ne zarina ka haath chhod diya.

Zarina aditya ke paas se bilkul nahi hili. Aankhe band karke vahi padi rahi.

“kya huva jaan…jaao na. maine tumhaara haath chhod diya hai.”

Zarina ne aditya ki chaathi mein jor se mukka maara.

“ouch…itni jor se kyon maara.” Aditya karaah utha.

“tumhe pata hai na ki main tumse dur nahi rah sakti ishliye ye sab majaak karte ho.” Zarina ne kaha.

“uff jaan nikaal di meri. Bahut khatarnaak ho tum.” Aditya ne kaha.

Zarina ne aditya ki chaati par haath rakha aur ushe masalte huve boli, “jyada jor se lagi kya?”

“tum jab maarti ho to jor se hi maarti ho.”

“tum mujhe yu sataate kyon ho phir. Sharam bhi aati hai kishi ko ye baate shun kar.”

“kishko sharam aati hai? ish kamre mein tumhaare aur mere shiva bhi koyi hai kya.”

“aditya tum itne shaitaan nikloge maine socha nahi tha.” zarina ne kaha.

“aisa to nahi tha kabhi. Tumne deewana bana diya mujhe jaan. Tum mera pahla pyar ho. Tumse pahle jyada interection nahi raha ladkiyon se.”

“jaanti hun main. Mera to interest hi nahi tha kishi se dosti karne mein. Main bhi bas tumhe jaanti hun. mera pahla aur aakhrin pyar tum hi ho.”

“itni pyari baat kar rahi ho. Ek pyari si kiss de do na aur jala do mere honto ko ek baar phir se.”

“jal kar raakh ho jaaoge rahne do hihihihi.” Zarina ne hanste huve kaha.

“tum mujhe khaak mein mila do to bhi chalega. Tumhaare husn ki aag mein jalna chaahta hun main.”

“acha.”

“haan.”

“tum kahi jhuti taarif to nahi karte meri.”

“lo kar lo baat. College mein tum mashoor thi apne husn ke liye. tumhaari hi charcha huva karti thi har taraf ladko mein. Ye baat aur thi ki tum mujhe bilkul pasand nahi thi.”

“kya main ishliye pasand nahi thi ki main muslim thi?”

“zarina kaisi baat kar rahi ho.”

“bolo na aditya main naapasand kyon thi tumhe.”

“ye to main bhi puch sakta hun ki kya tum mujhse nafrat ishliye karti thi kyonki main hindu tha.”

“pahle mere sawaal ka jawaab do na please. Pahle maine sawaal kiya hai.”

“haan zarina jhut nahi bolunga. Ush vakt muslim logo se chidhta tha main. Desh mein kahi bhi terrorist attack hota tha to bahut gaaliya deta tha main. Kayi baar man mein khayaal aata tha ki mere padosh mein bhi terrorist rah rahe hain. Tum logo se ladaayi aur jyada nafrat paida karti thi tumhaare prati.”

“jhut nahi bol sakte the…itna kadva sach bolne ki kya jaroorat thi.” zarina ro padi bolte-bolte.

“jaan…tumne sawaal sach jaan-ne ke liye kiya tha ya phir jhut. Ab tum bataao ki tum kyon nafrat karti thu mujhse.”

“mujhe kabhi kishi hindu ke nazdik jaane ki icha nahi hoti thi, kyonki mujhe yahi lagta tha ki ye log hamein dabaate hain ish desh mein. Minority hone ke kaaran hamaare saath har jagah bhedbhaav hota hai. college mein mere sabhi muslim friends hi the. Aur hum logo ke parivaron ka ladaayi jhagda hone ke kaaran tumse nafrat aur jyada badh gayi thi.”

“shukar hai shaadi hone se pahle ye raaj khul gaye.” Aditya ne kaha.

“to kya ab hum shaadi nahi karenge.” Zarina ne badi maasumiyat se pucha.

“tum bataao kya iraada hai tumhaara?”

Ek pal ko khaamosi chaa gayi dono ke beech. Dono bahut karib pade the ek dusre ke. Kuch kahne ki bajaaye dono ek dusre ki aankho mein jhaank rahe the. Kab unke hont mil gaye ek dusre se unhe pata hi nahi chala. Dono ke hont ek saath harkat kar rahe the. 10 minute tak betahasa chumte rahe dono ek dusre ko. Jab unke hont juda huve to bade pyar se dekh rahe the dono ek dusre ko.

“mil gaya jawaab.” Aditya ne hanste huve pucha.

“haan mil gaya. yahi kah sakti hun ki pyar ke aage ye baatein kuch maayne nahi rakhti.”

“haan hum ek dusre ke karib aaye to hum jaan paaye ek dusre ko. Varna to jeendagi bhar nafrat bani rahti. Hum as a human bieng ek dusre se nafrat nahi karte the. Balki different religion se hone ke kaaran ek dusre ko naapasand karte the. Hum ek mahina saath rahe to dharam ki jhuti deewar gir gayi. Deewar girne ke baad hum ushke peeche khade asli insaan ko dekh paaye. Kaash ish desh mein har koyi aisa kar paaye. Main apne pahle ke vicharon ke liye sharminda hun.”

“main bhi sharminda hun aditya. Acha huva jo ki hamein pyar huva aur hum ek dusre ko jaan paaye. Pyar mein bahut taakat hoti hai na aditya.”

“haan bahut jyada taakat hoti hai. ye pyar zarina jaisi ladki ko bhi kiss karna seekha deta hai. omg phir se bahut pyara chumban diya tumne.”

“hato chodo mujhe…tum phir se shaitaani par utar aaye.”

Aditya aur zarina bistar pade huve pyar ke ush komal ahsaas ko pa rahe the jishke liye jyada tar log jeevan bhar taraste hain. Dono ki Aankhon mein bahut saare sapne the aane wali jeendagi ke liye aur dilon mein dher saari umang thi.

kramashah...............................