Jaal -जाल compleet

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raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 06:15

जाल पार्ट--34

गतान्क से आगे.

"सर,आपने प्रॉजेक्ट 23 मे 2 फ्लोर्स & बढ़ने के ऑर्डर्स दिए हैं.."

"हां.",प्रणव ने अपने लॅपटॉप को बंद किया & सामने खड़े शख्स को देखा.

"लेकिन सर,उस से तो प्रॉजेक्ट की कीमत बढ़ जाएगी & हमने तो पर्मिशन भी नही ली थी उन मंज़िलो की."

"मिस्टर.शर्मा,आप अपना काम मुस्तैदी से करते हैं,इस बात की कद्र करता हू लेकिन प्लीज़ मेरे फ़ैसलो को लेके ज़्यादा चिंतित ना हों.अर्ज़ी डाल दी गयी है & मैं कल खुद ही कन्सर्न्ड अफ़सर से मिलके उसे अप्रूव करवा दूँगा.वाहा काम रुकना नही चाहिए.प्रॉजेक्ट अपनी पुरानी डेडलाइन से पहले पूरा होना चाहिए."

"वो ठीक है सर,लेकिन ऐसे फ़ैसले तो केवल विजयंत सर ले सकते हैं."

"मिस्टर.शर्मा,अभी बॉस मैं हू & सारे फ़ैसले मैं ही लूँगा एम आइ क्लियर?",उसकी आवज़ तेज़ हो गयी थी.

"यस,सर."

"तो आप जा सकते हैं.",शर्मा गया तो प्रणव मुस्कुराया.ट्रस्ट ग्रूप उसके इशारो पे चल रहा था..कितनी ताक़त थी उसके पास..इस सब का मालिक वो था फिलहाल..फिलहाल..ससुर के आने पे उसे ये कुर्सी छ्चोड़नी पड़ेगी & उसका दिल अब ऐसा करने को तैय्यार नही था.वो कुर्सी से उठा & कुच्छ सोचने लगा.उसका दिमाग़ अब इस कुर्सी पे बरकरार रहने की तरकीब सोच रहा था.

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"तुमलोग कोई काम ढंग से नही कर सकते?..ये फ्लवर आरंगेमेंट कहा था मैने..!..वो पीले फूलो का क्या हुआ..",सोनिया अपने स्टाफ को डाँट रही थी,"..चलो जाओ,सब ठीक करो.",वो 1 कुर्सी पे बैठ गयी.उसे पता था कि उसने अभी कुच्छ ज़्यादा ही डांटा था सबको मगर वो क्या करती वो बहुत चिड़चिड़ी हो गयी थी इधर.कारण वही था,विजयंत से दूरी.

हर रोज़ ब्रिज उसके लिए वक़्त ज़रूर निकालता & हर रात की चुदाई तो पक्की थी ही,उपर से दौलत की कोई कमी थी नही,अपना बिज़्नेस भी उसके मन बहलाने के लिए काफ़ी था लेकिन विजयंत के साथ से मिलने वाला सुख नदारद था अभी.उसने अपना चेहरा हाथो मे च्छूपा लिया..ओह विजयंत कब आओगे वापस तुम!

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सोनम ने महसूस किया था कि प्रणव जैसा दिखता था वैसा सीधा या भला था नही.वो ये सोच रही थी कि कही समीर को गायब करवाने मे उसी का हाथ तो नही था.समीर के गायब होने से हर चीज़ की वारिस अकेली शिप्रा ही बचती थी & उसका पति होने के नाते ये सब प्रणव का ही हो जाता.उसने सोचा कि 1 बार विजयंत को बस इस बात का आभास करा दे लेकिन बात विजयंत के दामाद की थी जिसपे वो इतना भरोसा करता था.बिना सबूत के उंगली उठाने पे उसका निकाला जाना तय था & फिर ब्रिज भी उसे नही पुछ्ता.

नही..वो प्रणव पे निगाह रखेगी & जैसे ही काम की बात पता चली उस से अपना फ़ायदा ज़रूर निकालेगी.

क्लेवर्त के बुंगले के अपने कमरे मे रंभा ने बिस्तर से उतर के खड़ी होके अंगड़ाई ली.उसने 1 पूरे बाजुओ की सफेद टी-शर्ट & कसे,गुलाबी शॉर्ट्स पहने थे जो की बस उसकी गंद को ढके हुए थे.हाथ हवा मे उठे होने की वजह से उसकी शर्ट उपर उठ गयी & उसकी कमर का कुच्छ हिस्सा नुमाया हो गया.

"हुन्न..!",वो चौंक पड़ी.किसी ने उसकी नुमाया कमर को थम उसे पीछे से गर्दन पे चूम लिया.उसने गर्दन घुमाई तो देखा विजयंत मेहरा उस से चिपका खड़ा था.उसने उसे बड़ी ठंडी निगाहो से देखा & उस से अलग हो वापस बिस्तर पे चली गयी.वो उसकी ओर पीठ किए बाई करवट पे लेटी हुई थी.सॉफ ज़ाहिर था की वो अपने ससुर से खफा थी.

विजयंत मुस्कुराया & अपने साथ लाई शिशियो को वही बिस्तर पे रखा & उसके पीछे बैठ उसकी दाई टांग पे हाथ फिराने लगा.रंभा ने टांग खींच उसे ऐसा करने से रोक दिया.विजयंत ने मुस्कुराते हुए 1 शीशी खोली & उसमे से थोड़ा खुश्बुदार तेल हाथ मे धार उसे अपनी बहू की टांग पे मल दिया.रंभा खामोश रही & बस मुँह बिस्तर मे च्छूपाते हुए पेट के बल लेट गयी.

विजयंत सख़्त हाथो से उसकी टाँगो के पिच्छले हिस्से पे तेल की मालिश करने लगा.पिच्छले 2 दिनो से वो दिन भर कार मे बैठी रहती थी & रातें फार्म्स के कॉटेजस पे गुज़री थी.अभी जब विजयंत ने मालिश शुरू की तो उसे एहसास हुआ की उसकी टाँगे कितनी थॅकी हुई थी.विजयंत के मज़बूत हाथ उसके पाँवो से लेके घुटनो के पिच्छले हिस्से तक चल रहे थे.उसे बहुत अच्छा लग रहा था मगर वो वैसे ही चुप मुँह च्छुपाए पड़ी थी.

विजयंत ने उसकी बाई टांग को पकड़ उसे हवा मे उठाया & फिर उसके पाँव को दबाते हुए उसकी उंगलियो के बीच अपने हाथ की उंगलिया घुसा तेल मलने लगा.

"आहह..!",जब उसने उसके पंजो की उंगलियो को 1-1 कर खींचा तो रंभा के मुँह से सुकून भरी आह निकल ही गयी.विजयंत ने उसकी घुटने से उठी टांग को वैसे ही थामे हुए मालिश की & फिर दाई टांग को उठा लिया.वाहा भी उसने वही हरकत दोहराई.रंभा ने महसूस किया कि ना केवल उसकी थकान मिट रही थी बल्कि उसकी मस्ती भी धीमे-2 बढ़ रही थी.

विजयंत ने उसकी टाँगे वापस बिस्तर पे रखी & अब घुटनो से उपर उसकी शॉर्ट्स तक उसकी मांसल जाँघो के पिच्छले हिस्सो पे अपने हाथ चलाने लगा.रंभा की चूत मे कसक उठी.उसके ससुर के हाथ उसके जिस्म को मदहोश कर रहे थे.उसने अपने हाथ अपने सीने के नीचे दबाए हुए थे.उसकी मस्ती की गवाही देते हाथो ने बिस्तर की चादर को भींच लिया था.विजयंत कुच्छ देर तक उसकी कोमल जाँघो पे हाथ फिराता रहा.

"उउन्न्ह..!",रंभा ने बिस्तर से सर उठा के आँखे बंद किए 1 मस्त आ भारी.उसके ससुर के हाथ उसकी शर्ट मे घुस उसकी कमर की मांसल बगलो को मसल रहे थे.विजयंत हाथ ऐसे दबाते हुए उपर से नीचे ला रहा था मानो उसकी मांसपेशियो की थकान को उसके जिस्म से निचोड़ देना चाहता हो.रंभा की चूत गीली होने लगी थी.

विजयंत के हाथ उसकी बगलो पे फिरते हुए सीधे उसके जिस्म के नीचे उसके पेट पे पहुँच गये.रंभा चिहुनकि & उसने महसूस किया की उसका ससुर उसकी शॉर्ट्स के बटन को खोल रहा है.शॉर्ट्स ढीली करने के बाद विजयंत के मज़बूत हाथ वापस पीछे आए & वेयैस्टबंड मे फँस उसकी शॉर्ट्स को नीचे सरकाने लगे.

अगले पल रंभा अपने ससुर के सामने अपनी नंगी गंद किए लेटी थी.विजयंत की आँखे बहू की कसी गंद देख चमक उठी.उसने फिर से उसके घुटनो के उपर से जाँघो के पिच्छले हिस्सो पे हाथ चलाना शुरू किया & इस बार हाथो को गंद की फांको से होता हुआ सीधा उसकी कमर तक ले आया.रंभा अब बहुत हल्की-2 आहें भर रही थी.विजयंत ने 4-5 बार हाथ वैसे ही चलाए & उसके बाद उन्हे रंभा की मोटी गंद से चिपका दिया.हाथ दोनो फांको पे गोलाई मे घूमते हुए वाहा के माँस को गूँध रहा थे.पहले हाथो का बनाया दायरा बड़ा था लेकिन पल-2 वो दायरा छ्होटा होता जो रहा था.जब दायरा बिल्कुल छ्होटा हो गया तो विजयंत ने दोनो फांको के माँस को दोनो हाथ मे भींच के उपर खींचा.

"ऊव्ववव..!",रंभा के चेहरे पे मस्ती भरी शिकन आई & वो सर उठा के चिहुनकि.ससुर की इस हरकत ने चूत की कसक को कुच्छ ज़्यादा बढ़ा दिया था.उसने सर वापस बिस्तर मे धँसाया & विजयंत के हाथो का लुत्फ़ उठाने लगी.विजयंत ने देखा की बहू अब गर्दन को बहुत धीरे-2 उपर उठाके वापस बिस्तर पे दबा रही है.उसकी बेचैनी देख वो मुस्कराया & इस बार हाथो को गंद से फिसलते हुए उसकी कमर से पीठ तक ऐसे ले गया की रंभा की शर्ट उसकी गर्दन तक उठ गयी.

अब उसकी पीठ के पार सफेद ब्रा दिख रहा था जिसके उपर से ही हाथ चलाते हुए वो रंभा की मालिश कर रहा था.उसने अपने दोनो घुटने रंभा की कमर की दोनो ओर जमाए & उसकी गंद पे बैठ गया.

"उउन्न्ह....!",उसका दिल अज़ीज़ विजयंत का तगड़ा लंड जैसे ही उसकी गंद पे दबा रंभा ने फिर से सर उठाके अपनी खुशी & बेचैनी का इज़हार किया.विजयंत उसकी गंद पे लंड दबाए बैठा उसकी पीठ पे बहुत सख़्त हाथो से मालिश कर रहा था.उसके हाथ पहले रंभा के जिस्म की बगलो पे नीचे से उपर जाते & फिर उपर आके वो उसकी रीढ़ के दोनो तरफ हाथ उपर से चलते हुए नीचे उसकी गंद तक लाता.हाथ वापस उपर जाते & फिर उसकी बगलो पे फिसलते हुए वापस नीचे आते.

ससुर के हाथो की मस्ताना हरकते & उसके लंड का नशीला एहसास रंभा को झाड़वाने के लिए काफ़ी था.वो अपनी गंद पे बैठे ससुर को उसकी हर्कतो से झूलते हुए,बिस्तर मे मुँह च्छुपाए सुबक्ते हुए झाड़ गयी.विजयंत मुस्कुराते हुए उसकी गंद से उठा & बिस्तर के 1 किनारे आ गया & फिर रंभा के उपरी बाज़ू पकड़ उसका मुँह अपनी ओर कर लिया.अब रंभा पेट के बल बिस्तर के किनारे पे मुँह टिकाए लेटी हुई थी.

विजयंत वही अपने पंजो पे बैठ गया & रंभा की बाई बाँह को अपने दाए कंधे पे रखा & फिर हाथो मे तेल लेके उस बाँह की मालिश करने लगा.रंभा अधखुली आँखो से उसे देख रही थी.उसकी निगाहो मे विजयंत को अब नाराज़गी की जगह केवल मस्ती दिखाई दे रही थी.वो अपने हाथो मे उसकी कलाई जाकड़ गोल-2 घूमाते हुए उसकी कोहनी तक जाता & वाहा से फिर उसके कंधे था.जब बाई बाँह की मालिश हो गयी तो उसने यही हरकत दाई बाँह के साथ दोहराई.अपने दोनो कंधो पे टिकी रंभा की बाँहो से उसने उसके ब्रा स्ट्रॅप्स को सरकाया & फिर खड़ा होने लगा तो रंभा ने उसका कुर्ता पकड़ उसे रोक लिया.

विजयंत फिर बैठ गया तो रंभा ने उसके कुर्ते को पकड़ उसे उपर खींचा & उसका इशारा समझ विजयंत ने कुर्ता निकाल दिया.रंभा ने वैसे ही लेटे हुए ससुर के सीने के बालो मे अपने हाथ फिराए & फिर उसकी गर्दन मे बाँहे डाल उसकी दाढ़ी पे अपने मुलायम गाल रगडे.विजयंत के होंठो को अपने लबो की गिरफ़्त मे ले उसके मुँह मे अपनी जीभ चलाके उसने अपनी नाराज़गी ख़त्म होने का एलान कर दिया.कुच्छ देर तक दोनो प्रेमी वैसे ही 1 दूसरे को चूमते रहे & फिर विजयंत खड़ा हो गया.

विजयंत ने खड़े होके हाथो मे थोडा सा तेल लिया & आगे झुक के रंभा की नंगी पीठ से लेके कमर तक अपने हाथ फिराने लगा.रंभा के चेहरे के सामने ही उसके ससुर के पाजामे मे क़ैद तना लंड पाजामे पे प्रेकुं का धब्बा छ्चोड़ता दिख रहा था.उसने फ़ौरन पाजामा ढीला किया & ससुर की बालो भरी जाँघो पे नीचे से उपर तक हाथ फिराने लगी & अपना मुँह आगे कर उसके लंड से उपर के बालो मे घुसा दिया.

विजयंत ने मज़े मे आँखे बंद की लेकिन बहू की मालिश वैसे ही जारी रखी.रंभा ने ससुर की मज़बूत,पुष्ट गंद को उंगलियो के नखुनो से खरोंचते हुए मसला & लंड के सूपदे को मुँह मे भर लिया.

"आहह..!",आह भर विजयंत आगे झुका & इस बार उसके हाथ रंभा की गंद तक पहुँच गये & उसकी फांको को फैलाने लगे.रंभा ने ससुर की गंद थाम लंड चूसना शुरू किया तो विजयंत ने बहू की गंद फैला पीछे से उसकी चूत मे उंगली कर दी.रंभा कमर उचकाते हुए ससुर का लंड चूस रही थी.विजयंत उसकी ज़ुबान की हर्कतो का लुत्फ़ उठाता हुआ उसकी चूत मे उंगली तेज़ी से अंदर-बाहर कर रहा था.

रंभा ने लंड मुँह से निकाला & उसपे अपनी नाक & गालो से रगड़ने लगी.वो अब पूरी तरह से मदहोश थी.विजयंत की उंगली उसे मस्ती की कगार पे ले गयी थी & अब वो अपनी ही दुनिया मे खो गयी थी.उसने अभी भी विजयंत की गंद थामी हुई थी लेकिन अब लंड चूस नही रही थी बल्कि अपना मुँह विजयंत की गोद मे धंसाए बस झाडे जा रही थी.विजयंत की उंगली उसकी चूत रगडे जा रही थी & वो उस कगार से गिर मस्ती के सागर मे गोते लगा रही थी.

वो शख्स अपने गाल के निशान को सहलाता बंगल के अहाते मे दाखिल हो गया था.ये बुंगला विजयंत का नही था बल्कि उसके किसी दोस्त का था.गेट के बाहर बैठा दरबान पास के बुंगले के चौकीदार के साथ बीड़ी पीता गप्पे हांक रहा था & उसकी नज़र बचा के वो पिच्छली दीवार के साथ कार लगाके उसपे चढ़ अंदर कूद गया था.फार्म्स विजयंत का इलाक़ा था & वाहा उसके मुसीबत मे फँसने के आसार बहुत थे लेकिन यहा ऐसी कोई बात नही थी बस रंभा उसे अकेली मिल जाए & उसका काम हो गया समझो.

बुंगले के बाहर भी 1 सीढ़ी थी जो उपरी मंज़िल को जा रही थी लेकिन सीढ़ी के अंत मे बना दरवाज़ा बंद था.वो सीढ़ी के उपर पहुँचा & देखा बाई तरफ बनी बाल्कनी तक वो पहुँच सकता था.सीधी के बगल की रैलिंग & उस बाल्कनी के बीच बस 4 फ्ट का फासला था,बस उसे सावधानी से कूदना था.उसने थोड़ी देर पहले इसी बाल्कनी पे विजयंत को खड़े देखा था.बाल्कनी का दरवाज़ा बंद था & कमरे मे अंधेरा था.उसने दरवाज़े को खिचा मगर वो मज़बूती से बंद था.वो अपने निशान को खुजाते आगे जाने का रास्ता सोचने लगा.

विजयंत ने रंभा को पलटा & उसकी छातियो को मसलने लगा.तेल लगी हथेलियो को वो उसकी छातियो पे जमा के उन्हे गोल-2 घुमा रहा था & रंभा मस्ती मे कराहे जा रही थी.उसने अपने हाथ पीच्चे ले जाके ससुर की गंद को फिर से थाम लिया था & नीचे से जीभ निकाल उसके आंडो को छेड़ रही थी.विजयंत थोडा झुका & रंभा ने उसके बाए अंडे को मुँह मे भर लिया.

विजयंत उसके निपल्स को उंगलियो मे पकड़ उपर खींचता & रंभा दर्द & मस्ती के अनूठे मिले-जुले भाव से आहत हो कराह उठती.विजयंत ने उसकी दोनो चूचियो को बाहर से पकड़ आपस मे दबा रहा था.रंभा भी आहे भरती हुई सर बिस्तर के किनारे से नीचे लटका उसके आंडो को चूस रही थी.विजयंत उसकी ज़ुबान से काफ़ी जोश मे आ चुका था.वो आगे झुका & बहू की जंघे फैला उसकी रस बहाती चूत से मुँह चिपका दिया.

रंभा मस्ती मे जंघे आपस मे भींचने-खोलने लगी & कमर उचकाने ल्गी.उसने विजयंत की कमर को जाकड़ लिया & आंडो को पागलो की तरह चूसने लगी.विजयंत ने उसकी नाज़ुक चूत पे बहुत जल्द दोबारा हमला कर दिया था & इस बार उसे झड़ने मे कोई वक़्त नही लगा.उसके झाड़ते ही विजयंत बिस्तर पे उसके पीछे आ गया & उसे बाई करवट पे कर उसकी दाई जाँघ को हवा मे उठा दिया.अपनी बाई कोहनी पे उचकी रंभा दाए हाथ से अपनी चूचिया मसला रही थी.

"ऊव्ववव....हाईईईईई..!",उसने बाया हाथ सीने से हटा पीछे ले जा ससुर के सर को थाम लिया जिसका लंड उसकी चूत मे उतर चुका था.विजयंत अपनी बाई कोहनी पे उचका दाए हाथ से उसके पेट को सहलाते हुए उसकी चूचियो को गिरफ़्त मे ले चुका था & पीछे सर घुमा के उसे चूमती रंभा की किस का भरपूर मज़ा ले रहा था.

उसका लंड चूत को बुरी तरह रगड़ रहा था.रंभा ने ससुर के बाल को पकड़ के खिचा & अपनी कोहनी सीधी करती बिस्तर पे निढाल हो गयी.उसकी आँखे बंद थी & उसके चेहरे पे केवल मस्ती दिख रही थी.विजयंत ने उसकी दाई जाँघ को उपर किया & बिना लंड निकाले सीधा हो गया & उसकी दाई जाँघ को अपने बाए कंधे पे टिका दिया.

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क्रमशः.......

JAAL paart--34

gataank se aage.

"sir,aapne project 23 me 2 floors & badhane ke orders diye hain.."

"haan.",Pranav ne apne laptop ko band kiya & samne khade shakhs ko dekha.

"lekin sir,us se to project ki keemat badh jayegi & humne to permission bhi nahi li thi un manzilo ki."

"mr.sharma,aap apna kaam mustaidi se karte hain,is baat ki kadr karta hu lekin please mere faislo ko leke zyada chintit na hon.arzi daal di gayi hai & main kal khud hi concerned afsar se milke use approve karwa dunga.vaha kaam rukna nahi chahiye.project apni puraniu deadline se pehle pura hona chahiye."

"vo thik hai sir,lekin aise faisle to keval vijayant sir le sakte hain."

"mr.sharma,abhi boss main hu & sare faisle main hi lunga.am i clear?",uski aavz tez ho gayi thi.

"yes,sir."

"to aap ja sakte hain.",sharma gaya to pranav muskuraya.Trust Group uske isharo pe chal raha tha..kitni taqat thi uske paas..is sab ka malik vo tha filhaal..filhaal..sasur ke aane pe use ye kursi chhodni padegi & uska dil ab aisa karne ko taiyyar nahi tha.vo kursi se utha & kuchh sochne laga.uska dimagh ab is kursi pe barkarar rehne ki tarkeeb soch raha tha.

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"tumlog koi kaam dhang se nahi kar sakte?..ye flower aarangement kaha tha maine..!..vo peele phoolo ka kya hua..",soniya apne staff ko dant rahi thi,"..chalo jao,sab thik karo.",vo 1 kursi pe baith gayi.use pata tha ki usne abhi kuchh zyada hi danta tha sabko magar vo kya karti vo bahut chidchidi ho gayi thi idhar.karan vahi tha,vijayant se duri.

har roz brij uske liye waqt zarur nikalta & har raat ki chudai to pakki thi hi,upar se daulat ki koi kami thi nahi,apna business bhi uske man behlane ke liye kafi tha lekin vijayant ke sath se milne vala sukh nadarad tha abhi.usne apna chehra hatho me chhupa liya..oh vijayant kab aaoge vapas tum!

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Sonam ne mehsus kiya tha ki pranav jaisa dikhta tha vaisa seedha ya bhala tha nahi.vo ye soch rahi thi ki kahi sameer ko gayab karwane me usi ka hath to nahi tha.sameer ke gayab hone se har chiz ki varis akeli Shipra hi bachti thi & uska pati hone ke nate ye sab pranav ka hi ho jata.usne socha ki 1 baar vijayant ko bas is baat ka aabhas kara de lekin baat vijayant ke damad ki thi jispe vo itna bharosa karta tha.bina saboot ke ungli uthane pe uska nikala jana tay tha & fir brij bhi use nahi puchhta.

nahi..vo pranav pe nigah rakhegi & jaise hi kaam ki baat pata chali us se apna fayda zarur nikalegi.

Clayworth ke bungle ke apne kamre me Rambha ne bistar se utar ke khadi hoke angdayi li.usne 1 pure bazuo ki safed t-shirt & kase,gulabi shorts pehne the jo ki bas uski gand ko dhake hue the.hath hawa me uthe hone ki vajah se uski shirt upar uth gayi & uski kamar ka kuchh hissa numaya ho gaya.

"hunn..!",vo chaunk padi.kisi ne uski numaya kamar ko tham use peechhe se gardan pe chum liya.usne gardan ghumayi to dekha Vijayant Mehra us se chipka khada tha.usne use badi thandi nigaho se dekha & us se alag ho vapas bistar pe chali gayi.vo uski or pith kiye bayi karwat pe leti hui thi.saaf zahir tha ki vo apne sasur se khafa thi.

vijayant muskuraya & apne sath layi shishiyo ko vahi bistar pe rakha & uske peechhe baith uski dayi tang pe hath firane laga.rambha ne tang khinch use aisa karne se rok diya.vijayant ne muskurate hue 1 shishi kholi & usme se thoda khushbudar tel hath me dhaar use apni bahu ki tang pe mal diya.rambha khamosh rahi & bas munh bistar me chhupate hue pet ke bal let gayi.

vijayant sakht hatho se uski tango ke pichhle hisse pe tel ki malish karne laga.pichhle 2 dino se vo din bhar car me baithi rehti thi & raaten farms ke cottages pe guzari thi.abhi jab vijayant ne malish shuru ki to use ehsas hua ki uski tange kitni thaki hui thi.vijayant ke mazbut hath uske panvo se leke ghutno ke pichhle hisse tak chal rahe the.use bahut achha lag raha tha magar vo vaise hi chup munh chhupaye padi thi.

vijayant ne uski bayi tang ko pakad use hawa me uthaya & fir uske panv ko dabate hue uski ungliyo ke beech apne hath ki ungliya ghusa tel malne laga.

"aahhhh..!",jab usne uske panjo ki ungliyo ko 1-1 kar khincha to rambha ke munh se sukun bhari aah nikal hi gayi.vijayant ne uski ghutne se uthi tang ko vaise hi thame hue malish ki & fir dayi tang ko utha liya.vaha bhi usne vahi harkat dohrayi.rambha ne mehsus kiya ki na keval uski thakan mit rahi thi balki uski masti bhi dhime-2 badh rahi thi.

vijayant ne uski tange vapas bistar pe rakhi & ab ghutno se upar uski shorts tak uski mansal jangho ke pichhle hisso pe apne hath chalane laga.rambha ki chut me kasak uthi.uske sasur ke hath uske jism ko madhosh akr rahe the.usne apne hath apne seene ke neeche dabaye hue the.uski masti ki gawahi dete hatho ne bistar ki chadar ko bhinch liya tha.vijayant kuchh der tak uski komal jangho pe hath firata raha.

"uunnhhhhh..!",rambha ne bistar se sar utha ke aankhe band kiye 1 mast aah bhari.uske sasur ke hath uski shirt me ghus uski kamar ki mansal baglo ko masal rahe the.vijayant hath aise dabate hue upar se neeche la raha tha mano uski manspeshiyo ki thakan ko uske jism se nichod dena chahta ho.rambha ki chut gili hone lagi thi.

vijayant ke hath uski baglo pe firte hue seedhe uske jism ke neeche uske pet pe pahunch gaye.rambha chihunki & usne mehsus kiya ki uska sasur uski shorts ke button ko khol raha hai.shorts dhili karne ke baad vijayant ke mazbut hath vapas peechhe aaye & waistband me fans uski shorts ko neeche sarkane lage.

agle pal rambha apne sasur ke samne apni nangi gand kiye leti thi.vijayant ki aankhe bahu ki kasi gand dekh chamak uthi.usne fir se uske ghutno ke upar se jangho ke pichhle hisso pe hath chalana shuru kiya & is baar hatho ko gand ki fanko se hota hua seedha uski kamar tak le aaya.rambha ab bahut halki-2 aahen bahr rahi thi.vijayant ne 4-5 baar hath vaise hi chalaye & uske baad unhe rambha ki moti gand se chipka diya.hath dono fanko pe golayi me ghumte hue vaha ke mans ko gundh raha the.pehle hatho ka banaya dayra bada tha lekin pal-2 vo dayra chhota hota jo raha tha.jab dayra bilkul chhota ho gaya to vijayant ne dono fanko ke mans ko dono hath me bhinch ke upar khincha.

"oow.!",rambha ke chehre pe masti bhari shikan aayi & vo sar utha ke chihunki.sasur ki is harkat ne chut ki kasak ko kuchh zyada badha diya tha.usne sar vapas bistar me dhansaya & vijayant ke hatho ka lutf uthane lagi.vijayant ne dekha ki bahu ab gadn ko bahut dhire-2 upar uthake vapas bistar pe daba rahi hai.uski bechaini dekh vo muskraya & is baar hatho ko gand se fislate hue uski kamar se pith tak aise le gaya ki rambha ki shirt uski gardan tak uth gayi.

ab uski pith ke paar safed bra dikh raha tha jiske upar se hi hath chalate hue vo rambha ki malish kar raha tha.usne apne dono ghutne rambha ki kamar ki dono or jamaye & uski gand pe baith gaya.

"uunnhhhhh....!",uska dil aziz vijayant ka tagda lund jaise hi uski gand pe daba rambha ne fir se sar uthake apni khushi & bechaini ka izhar kiya.vijayant uski gand pe lund dabaye baitha uski pith pe bahut sakht hatho se malish akr raha tha.uske hath pehle rambha ke jism ki baglo pe neeche se upar jate & fir upar aake vo uski ridh ke dono taraf hath upar se chalate hue neeche uski gand tak lata.hath vapas upar jate & fir uski baglo pe fisalte hue vapas neeche aate.

sasur ke hatho ki mastana harkate & uske lund ka nashila ehsas rambha ko jhadwane ke liye kafi tha.vo apni gand pe baithe sasur ko uski harkato se jhulate hue,bistar me munh chhupaye subakte hue jhad gayi.vijayant muskurate hue uski gand se utha & bistar ke 1 kinare aa gaya & fir rambha ke upri bazu pakad uska munh apni ro akr liya.ab rambha pet ke bal bistar ke kinare pe munh tikaye leti hui thi.

vijayant vahi apne panjo pe baith gaya & rambha ki bayi banh ko apne daye kandhe pe rakha & fir hatho me tel leke us banh ki malish akrne laga.rambha adhkhuli aankho se use dekh rahi thi.uski nigaho me vijayant ko ab narazgi ki jagah keval masti dikahyi de rahi thi.vo apne hatho me uski kalayi jakad gol-2 ghumate hue uski kohni tak jata & vaha se fir uske kandhe tha.jab bayi banh ki malish ho gayi to usne yehi harkat dayi banh ke sath dohrayi.apne dono kandho pe tiki rambha ki banho se usne uske bra straps ko sarkaya & fir khada hone laga to rambha ne uska kurta pakd use rok liya.

vijayant fir baith gaya to rambha ne uske kurte ko pakad use uapr khincha & uska ishara samajh vijayant ne kurta nikal diya.rambha ne vaise hi lete hue sasur ke seene ke baalo me apne hath firaye & fir uski gardan me banhe daal uski dadhi pe apne mulayam gaal ragde.vijayant ke hotho ko apne labo ki giraft me le uske munh me apni jibh chalake usne apni narazgi khatm hone ka elan kar diya.kuchh der tak dono premi vaise hi 1 dusre ko chumte rahe & fir vijayant khada ho gaya.

vijayant ne kahde hoke hatho me thoda sa tel liya & aage jhuk ke rambha ki nangi pith se leke kamar tak apne hath firane laga.rambha ke chehre ke samne hi uske sasur ke pajame me qaid tana lund pajame pe precum ka dhabba chhodta dikh raha tha.usne fauran pajama dhila kiya & sausr ki baalo bhari jangho pe neeche se upar tak hath firane lagi & apna munh aage kar uske lund se upar ke baalo me ghusa diya.

vijayant ne maze me aankhe badn ki lekin bahu ki malish vaise hi jari rakhi.rambha ne sasur ki mazbut,pusht gand ko ungliyo ke nakhuno se kahrochte hue masla & lund ke supade ko munh me bhar liya.

"aahhhh..!",aah bhar vijayant aage jhuka & is baar uske hath rambha ki gand tak pahunch gaye & uski fanko ko failane lage.rambha ne sasur ki gand tham lund chusna shuru kiya to vijayant ne bahu ki gand faila peechhe se uski chut me ungli kar di.rambha kamar uchkate hue sasur ka lund chus rahi thi.vijayant uski zuban ki harkato ka lutf uthata hua uski chut me ungli tezi se andar-bahar kar raha tha.

rambha ne lund munh se nikala & uspe apni naak & galo se ragadne lagi.vo ab puri tarah se madhosh thi.vijayant ki ungli use masti ki kagar pe le gayi thi & ab vo apni hi duniya me kho gayi thi.usne abhi bhi vijayant ki gand thami hui thi lekin ab lund chus nahi rahi thi balki apna munh vijayant ki god me dhansaye bas jhade ja rahi thi.vijayant ki ungli uski chut ragde ja rahi thi & vo us kagar se gir masti ke sagar me gote laga rahi thi.

vo shakhs apne gaal ke nishan ko sehlata bungle ke ahate me dakhil ho gaya tha.ye bungla vijayant ka nahi tha balki uske kisi dost ka tha.gate ke bahar baitha darban paas ke bungle ke chaukidar ke sath bidi pita gappe hank raha tha & uski nazar bacha ke vo pichhli deewar ke sath car lagake uspe chadh andar kud gaya tha.farms vijayant ka ilaka tha & vaha uske musibat me fansane ke aasar bahut the lekin yaha aisi koi baat nahi thi bas rambha use akeli mil jaye & uska kaam ho gaya samjho.

bungle ke bahar bhi 1 seedhi thi jo upri manzil ko ja rahi thi lekin seedhi ke ant me bana darwaza band tha.vo seedhi ke uapr pahuncha & dekha bayi taraf bani balcony tak vo pahunch sakta tha.seedhi ke bagal ki railimg & us balcony ke beech bas 4 ft ka fasla tha,bas use savdhani se kudna tha.usne thodi der pehle isi balcony pe vijayant ko khade dekha tha.balcony ka darwaza band tha & kamre me andhera tha.usne darwaze ko khicnh kde kha magar vo mazbuti se band tha.vo apne nishan ko khujate aage jane ka rasta sochne laga.

vijayant ne rambha ko palta & uski chhatiyo ko maslane laga.tel lagi hatheliyo ko vo uski chhatiyo pe jama ke unhe gol-2 ghuma raha tha & rambha masti me karahe ja rahi thi.usne apne hath peechhe le jake sasur ki gand ko fir se tham liya tha & neeche se jibh nikla uske ando ko chhed rahi thi.vijayant thoda jhuka & rambha ne uske baye ande ko munh me bhar liya.

vijayant uske nipples ko ungliyo me pakad upar khinchta & rambha dard & masti ke anuthe mile-jule bhav se aahat ho karah uthati.vijayant ne uski dono choochiyo ko bahar se pakad aapas me daba raha tha.rambha bhi aahe bharti hui sar bistar ke kinare se neeche latka uske ando ko chus rahu thi.vijayant uski zuban se akfi josh me aa chuka tha.vo aage jhuka & bahu ki janghe faila uski ras bahati chut se munh chipka diya.

rambha masti me janghe aapas me bhinchne-kholne lagi & kamar uchkane lgi.usne vijayant ki kamar ko jakad liya & ando ko paglo ki tarah chusne lagi.vijayant ne uski nazuk chut pe bahut jald dobara humla kar diya tha & is baar use jhadne me koi waqt nahi laga.uske jahdte hi vijayant bistar pe uske peechhe aa gaya & use bayi karwat pe kar uski dayi jangh ko hawa me utha diya.apni bayi kohni pe uchki rambha daye hath se apni choochiya masla rahi thi.

"oow...haiiiiii..!",usne baya hath seene se hata peechhe le ja sasur ke sar ko tham liya jiska lund uski chut me utar chuka tha.vijayant apni bayi kohni pe uchka daye hath se uske pet ko sehlate hue uski choochiyo ko giraft me le chuka tha & peechhe sar ghuma ke use chumti rambha ki kiss ka bharpur maza le raha tha.

uska lund chut ko buri tarah ragad raha tha.rambha ne sausr ke baal ko pakad ke khicnha & apni kohni seedhi karti bistar pe nidhal ho gayi.uski aankhe badn thi & uske chehre pe keval masti dikh rahi thi.vijayant ne uski dayi jangh ko upar kiya & bina lund nikale seedha ho gaya & uski dayi jangh ko apne baye kandhe pe tika diya.

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kramashah.......


raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 06:16

जाल पार्ट--35

गतान्क से आगे.

रंभा की गंद बिस्तर से उठ गयी & विजयंत का लंड उसकी चूत को पार कर उसकी कोख को चूमने लगा.कमरा रंभा की मस्त चीखो से गुलज़ार हो गया.विजयंत उसकी उठी जाँघ को सहलाते हुए तंग चूमते धक्के लगाए जा रहा था & उसे खबर नही थी कि कमरे के दरवाज़े के बाहर पर्दे की ओट से देखता वो शख्स हक्का-बक्का खड़ा था.

विजयंत के कमरे की बाल्कनी के बंद दरवाज़े के उपरी फ्रेम मे शीशे लगे थे.उस शख्स ने रुमाल को अपने हाथ पे बाँधा & फिर कोट उतार उसकी बाँह को अपनी दाई बाँह पे इस तरह चढ़ाया कि उसकी मुट्ठी उस से ढँकी रहे & फिर 1 शीशे पे मुक्का मारा.2-3 मुक्को मे शीशा टूट गया.वो कुछ देर सांस रोके खड़ा रहा मगर शायद काँच टूटने की आवाज़ किसी ने सुनी नही थी.उसने उस सुराख से हाथ अंदर डाल के कुण्डी खोली & कमरे मे दाखिल हुआ.

दबे पाँव वो उस कमरे से बाहर निकल बुंगले का मुआयना करने लगा & रंभा की आहो को सुन उस केमर की ओर आ गया.....ये तो ससुर है उसका & उसी से चुद रही है ये!..उसने अपनी आँखे मल दोबारा देखा..कैसी लड़की है ये?..पति गायब है & ये ससुर के साथ मज़े ले-2 के चुदाई कर रही है!..& वो कैसा बाप है जो अपने बेटे की बीवी की चूत मे लंड घुसाए जम के धक्के लगा रहा है..!

उसका दिमाग़ घूम गया था..साली!..जैसी माँ वैसी बेटी!..अब उसे कुच्छ बुरा नही लग रहा था..औलाद को मा-बाप का क़र्ज़ उतारना ही पड़ता है,आज ये भी अपनी माँ का क़र्ज़ उतारेगी..वो दरवाज़े से हट दूसरी तरफ के कमरे मे चला गया.अब उसे इंतेज़ार करना था कि कब वो अकेली मिलती है & उसका इंटेक़ाम पूरा होता है.

"ओईईईईईई.....हाईईईईईईईईईईईईईईईई......उउन्न्ञनह......हाआआआआअन्न्‍नननणणन्..!",विजयंत के गहर्रे धक्को के कमाल से कमर उचकती अपने सर के नीचे के बिस्तर की चादर को बेचैनी से नोचती रंभा झाड़ रही थी & उसकी दाई टांग को उठाए उस से होंठ चिपकाए विजयंत भी झाडे जा रहा था.लंड थोड़ा सिकुदा तो विजयंत ने उसे बाहर खींचा.लंड खींचते ही उसका गाढ़ा वीर्य रंभा की चूत से टपक उसकी गंद के छेद तक गिरने लगा.

विजयंत ने फ़ौरन अपने साथ लाई 1 डिबिया को खोला & उसमे से 1 क्रीम अपनी उंगली पे लगाई & फिर अपने वीर्य & उस क्रीम को रंभा की गंद के छेद मे भरने लगा.झड़ने से मदहोश रंभा कमर उचकते हुए फिर से बेचैन होने लगी.उसका ससुर उसकी गंद मे उंगली कर रहा था & उसे अजीब सा मज़ा आ रहा था.

"ना...मत करिए,डॅड..आननह..!",रंभा ने बाए हाथ से उसकी कलाई थाम उसे रोकने की नाकाम कोशिश की.विजयंत उसके दाई तरफ हो गया & उसके तरफ अपनी गंद कर उसकी जाँघो को फैला उपर से उसकी चूत चाटता उसकी गंद मे उंगली करने लगा.रंभा ने मदहोशी मे सर इधर-उधर घुमाया & पूरा जिस्म घुमा पेट के बल हो गयी.उसने बाई तरफ सर घुमाया तो उसे विजयंत का सिकुदा लंड लटका दिखा जिस से अभी भी वीर्य की कुच्छ बूंदे टपक रही थी.

रंभा ने हाथ बढ़ा के लंड को पकड़ा & थोड़ा उचक के सिकुदे लंड को चूसने लगी.विजयंत अब उसकी गंद की दरार मे जीभ फिराता उसकी गंद की छेद मे क्रीम भरते हुए उंगली किए जा रहा था.वो रंभा की गंद के कसे छेद को थोडा ढीला कर देना चाहता था ताकि उसके मोटे लंड को घुसने मे आसानी हो.जब रंभा बेचैन हो कमर हिलाने लगी & उसकी ज़ुबान ने उसके सिकुदे लंड को फिर से खड़ा कर दिया तो उसने रंभा की गंद से उंगली निकाली & उसकी कमर थाम गंद को हवा मे उठा उसके पीछे आ गया.

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"हेलो.",बलबीर ने देखा कि बॅंकर से बातचीत के बीच ब्रिज कोठारी ने अपने मोबाइल पे 1 कॉल ली & उसके चेहरे का रंग थोड़ा बदल गया.

"एक्सक्यूस मी.",वो अपनी मेज़ से उठा & अंदर बाथरूम की ओर जाने लगा.बलबीर भी उसके पीछे हो लिया.ब्रिज टाय्लेट मे घुसा & 1 क्यूबिकल मे घुसा दरवाज़ा बंद किया.बलबीर उसके साथ वाले क्यूबिकल मे दबे पाँव घुसा.

"तुम पिच्छले 6-7 दिनो से मुझे फोन कर के परेशान रहे हो.आख़िर चाहते क्या हो तुम?",ये शख्स रोज़ ब्रिज को फोन करता था हर बार नंबर बदल के & हर बार 1 ही बात कि क्या उसे अपने दुश्मन को मज़ा चखाना है.

"ब्रिज बाबू,आप क्लेवर्त के पास जो धारदार झरने हैं वाहा पहुँचो & मेरा यकीन मानो की आपको आपकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा तोहफा मिलेगा वाहा.कल सवेरे 4 बजे तक किसी भी हालत मे वाहा पहुँच जाओ मगर बिल्कुल अकेले अगर कोई भी साथ आया तो मुझे पता चल जाएगा & तुम्हारा तोहफा तुम्हे नही मिलेगा."

"मगर..",फोन काट गया था.

बलबीर ने उधर वाले अंजान शख्स की बात तो नही सुनी मगर ये समझ गया कि ब्रिज परेशान है.ब्रिज का दिमाग़ बड़ी तेज़ी से चल रहा था & अपना खाना ख़त्म होने तक उसने फ़ैसला कर लिया था कि वो धारदार फॉल्स ज़रूर जाएगा.खाना ख़त्म होते ही वो अपने दफ़्तर गया & वही से अपनी कार मे अकेला क्लेवर्त के लिए निकल पड़ा.बलबीर उसके पीछे ही था.

"हेलो,सोनिया.मैं क्लेवर्त जा रहा हू किसी काम से लेकिन तुम किसी को ये बात मत बताना मेरे ऑफीस वालो को भी नही.सब ठीक रहा तो कल लौट आऊंगा."

"लेकिन डार्लिंग..-"

"आज कुच्छ मत पुछो जान.कल सब बताउन्गा.बाइ!",ब्रिज ने फोन रखा & कार ड्राइव करने लगा.उधर घर मे अकेली बैठी सोनिया का दिल ना जाने क्यू बहुत ज़ोर से धड़कने लगा,उसे लगा की कुच्छ बुरा होने वाला है.

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"आईईईईईईईययययययययययईईईई...प्लीज़ मत डालिए..बहुत बड़ा है आपका लंड....हाआआआआईयईईईईईईईईईईईई..!",विजयंत के मोटे सूपदे ने रंभा की गंद के छ्होटे से सुराख को बहुत बुरी तरह फैला दिया था & वो चीख रही थी.

"बस हो गया मेरी रानी!....ये लो...चला गया......आहह..!",विजयंत ने सूपदे के पीछे क्रीम & वीर्य से चिकनी गंद मे आधा लंड घुसा दिया.वो जानता था की इसके आगे घुसाना उसकी प्यारी बहू के लिए बहुत तकलीफ़देह हो सकता है.रंभा की गंद ने तो उसके लंड को बिल्कुल जाकड़ लिया था & हर धक्के पे मज़े की वजह से उसकी आह निकल जाती थी.वो उसकी फांको को मसल्ते हुए उसकी गंद मार रहा था & रंभा अब दर्द से कम & जोश से ज़्यादा चीख रही थी.

"उउम्म्म्मममम.....!",वो अपने हाथ को अपने मुँह मे घुसा अपनी ही उंगलिया मस्ती मे चूसे जा रही थी.विजयंत ने दाया हाथ उसकी कमर से आगे उसकी चूत पे सरकया & उसके दाने को छेड़ने लगा & बाए को आगे बढ़ा उसकी भारी-भरकम लेकिन कसी चूचियो को मसल दिया.

"आन्न्‍न्णनह..बहुत ज़ालिम हैं आप डॅड!..ऊऊव्ववववववव..!",विजयंत ने उसके निपल पे चिकोटी काट ली,"..अपनी बहू को कितना दर्द पहुँचा रहे हैं.....आन्न्न्नह......हाआंन्‍नणणनह..!",विजयंत आगे झुका & उसकी पीठ से अपनी छाती सताते हुए उसके बाए कान को काट लिया.

"कहो तो निकाल लू लंड बाहर.",उसकी उंगली दाने पे तेज़ी से गोल-2 घूम रही थी.

"उउन्न्ञन्..नही.....उसने बाई तफा मुँह घुमा के बाए हाथ से उनके बाल पकड़ के खींच के उन्हे बड़ी शिद्दत से चूमा,"..बस तड़पाना है मुझे..है ना?....हाईईईईईईई..!",विजयंत ने धक्के लगते हुए उसे पूरी तरह से बिस्तर पे लिटा दिया था & अब उसके ुआप्र लेट के हल्के-2 आधे लंड के धक्के लगा रहा था.

"हााआअन्न्‍नननणणन्..मारिए......& मारिए अपनी बहू की गंद..आप ही की है ये डॅड......हाआअन्न्‍नननननणणन्......!",रंभा उसके नीचे दबी च्चटपटाने लगी थी & उसकी गंद ने विजयंत के लंड को और कस लिया था.

"आहह.......रंभा..!",विजयंत ने चीख मारी & बहू के झाड़ते ही उसकी गंद मे अपना गाढ़ा वीर्य छ्चोड़ दिया.

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"विजयंत डार्लिंग?"

"सोनिया?",विजयंत अभी भी रंभा के उपर लेटा था & उसका लंड उसकी गंद मे सिकुड रहा था.

"विजयंत,कुछ बताना है तुम्हे."

"हां-2.बोलो."

"अभी-2 ब्रिज क्लेवर्त गया है अकेला."

"तो?"

"विजयंत..",सोनिया रो रही थी.

"रो मत सोनिया..घबराओ मत..मैं तुम्हे कुच्छ नही होने दूँगा.",रंभा गौर से ससुर की बात सुन रही थी,"..ब्रिज क्लेवर्त गया है..किसलिए गया है?",..उसका ससुर ब्रिज कोठारी की बीवी को जानता था..रंभा हैरान हो गयी..,"..सोनिया..जान..प्लीज़ चुप हो जाओ..& सारी बात बताओ."..हैं!..जान..बाप रे!..ये तो बड़ा पहुँचा खिलाड़ी है..दुश्मन की बीवी को फँसा रखा हैयस इसने!

"विजयंत..विजयंत..मुझे लगता है कि..",सोनिया रोने लगी,"..मुझे लगता है की समीर की गुमशुदगी मे ब्रिज का हाथ है.",उसकी रुलाई & तेज़ हो गयी.

"क्या?!"

"हां..बस यही बताना था.बाइ!",उसने फोन काट दिया,"..आइ'म सॉरी,ब्रिज!",साइड-टेबल पे रखी पति की तस्वीर को देख उसकी रुलाई & तेज़ हो गयी.

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विजयंत उसकी गंद से लंड खींच अब हेअडबोर्ड से टेक लगाके पैरा फैलाक़े बैठा हुआ कुच्छ सोच रहा था.रंभा ने अभी उस से कुच्छ पुच्छना ठीक नही समझा.वो उसके दाई तरफ लेट गयी & दाई बाँह उसके जिस्म पे डाल दी & आज दिन के बारे मे सोचने लगी.ससुर के साथ इस मस्ताने रिश्ते की शुरुआत के बाद आज पहली बार दोनो मे थोड़ी कहा-सुनी हुई थी & विजयंत ने उसे डाँट दिया था.

रंभा का मानना था कि हरपाल की बेहन हिना से मिल के कुच्छ हासिल नही होना था उल्टे वो सावधान हो जाता & शायद समीर को कुच्छ नुकसान पहुँचा देता.इसी बात पे बहस हुई & विजयंत ने उसे डाँट दिया.उसका मानना था कि हरपाल जैसे लोग चूहे होते हैं & उन्हे पता चलने मे कोई हर्ज़ नही कि अब उन्हे मारने के लिए लोग मुस्तैद हो चुके हैं & जहा तक समीर का सवाल हो,अगर उसकी किस्मत खराब हुई तो हो सकता है अभी उन्हे उसकी लाश भी ना मिले.

रंभा को समीर से कोई गहरी मोहब्बत नही थी लेकिन समीर तो उस से मोहब्बत करता था.उसके लिए उसने अपनी दौलत,अपना खानदान ठुकरा दिया था & उसके इस जज़्बे की वो कद्र करती थी.उसे अपने ससुर की बात बहुत बुरी लगी थी.वो उसके कहने पे आवंतिपुर मे हिना से मिल आई.हिना ने भी पिच्छले & दिनो से भाई से बात नही की थी & उसने रंभा के सामने उसे फोन लगाया लेकिन फोन नही मिला.हिना उसे निर्दोष लगी थी & उसने उसे भाई की कोई भी खबर मिलने पे उसे बताने को कहा था.

क्लेवर्त तक के सारे रास्ते उसने विजयंत से कोई बात नही की थी & अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर दी थी लेकिन उसका ससुर भी कमाल का मर्द था!रूठी महबूबा को बिना 1 भी लफ्ज़ बोले ना केवल उसने मना लिया था बल्कि उसकी गंद भी मार ली थी!इतना वो समझ रही थी कि समीर के बारे मे कोई सुराग मिला है & शायद सारे मामले के तार ब्रिज से जुड़े हैं.

तभी विजयंत का मोबाइल दोबारा बजा.उसने नंबर देखा & चौंक गया,"समीर!",उसने रंभा की ओर देख के कहा तो वो भी उठ बैठी,"हेलो,समीर?"

"मेहरा,तुम्हारे लिए 1 तोहफा है.बस अभी 4 बजे तक धारदार फॉल्स पे पहुँचो.बिल्कुल अकेले आना वरना तोहफा नुकसान मे पड़ सकता है."

"हेलो..!..हेलो..!",फोन कट गया था.

"क्या हुआ?",रंभा ने ससुर के चेहरे पे हाथ फिराया.

"कोई समीर के मोबाइल से फोन करके मुझे धारदार फॉल्स बुला रहा है सवेरे 4 बजे."

"तो चलिए & पोलीस को भी खबर कर देते हैं."

"नही.मुझे अकेले बुलाया है नही तो समीर को नुकसान पहुँचा सकते हैं वो."

"मगर आप अकेले भी तो ख़तरे मे पड़ सकते हैं,डॅड..प्लीज़ मुझे ले चलिए."

"नही,तुम्हे ख़तरे मे नही डाल सकता & ना ही समीर को.",विजयंत बिस्तर से उठ गया,"..मैं अकेला जाउन्गा & उसे ले आऊंगा.",ससुर की भारी आवाज़ के वजन के आगे रंभा को कुच्छ और बोलने की हिम्मत नही हुई.

विजयंत मेहरा अपने कमरे मे जाके धारदार फॉल्स जाने की तैय्यारि करने लगा.रंभा अपने कमरे मे ही थी & वो शख्स तीसरे कमरे मे छिपा विजयंत के जाने का इंतेज़ार कर रहा था.वो शख्स जिस कमरे मे था उसमे घुप अंधेरा था & इतनी देर हो जाने के बाद भी उसकी आँखे अंधेरे की आदि नही हो पाई थी.

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क्रमशः.......

JAAL paart--35

gataank se aage.

rambha ki gand bistar se uth gayi & vijayant ka lund uski chut ko paar kar uski kokh ko chumne laga.kamra rambha ki mast chikho se gulzar ho gaya.vijayant uski uthi jangh ko sehlate hue tang chumte dhakke laagye ja raha tha & use khabar nahi thi ki kamre ke darvaze ke bahar parde ki ot se dekhta vo shakhs hakka-bakka khada tha.

vijayant ke kamre ki balcony ke band darwaze ke upari frame me shishe lage the.us shakhs ne rumal ko apne hath pe bandha & fir coat utar uski banh ko apni dayi banh pe is tarah chadhaya ki uski mutthi us se dhanki rahe & fir 1 shishe pe mukka mara.2-3 mukko me shisha toot gaya.vo kuch der sans roke khada raha magar shayad kanch tutne ki aavaz kisi ne suni nahi thi.usne us surakh se hath andar daal ke kundi kholi & kamre me dakhil hua.

dabe panv vo us kamre se bahar nikal bungle ka muayana karne laga & rambha ki aaho ko sun us kamer ki ro aa gaya.....ye to sasur hai uska & usi se chud rahi hai ye!..usne apni aankhe mal dobara dekha..kaisi ladki hai ye?..pati gayab hai & ye sasur ke sath maze le-2 ke chudai kar rahi hai!..& vo kaisa baap hai jo apne bete ki biwi ki chut me lund ghusaye jum ke dhakke laga raha hai..!

uska dimagh ghum gaya tha..sali!..jaisi maan vaisi beti!..ab use kuchh bura nahi lag raha tha..aulad ko maa-baap ka karz utarana hi padta hai,aaj ye bhi apni maan ka karz utaregi..vo darwaze se hat dusri taraf ke kamre me chala gaya.ab use intezar karna tha ki kab vo akeli milti hai & uska inteqam pura hota hai.

"ouiiiiiiiii.....haiiiiiiiiiiiiiiiii......uunnnnhhhhhhhhhh......haaaaaaaaaaannnnnnnn..!",vijayant ke gehrre dhakko ke kamal se kamar uchkati apne sar ke neeche ke bistar ki chadar ko bechaini se nochti rambha jhad rahi thi & uski dayi tang ko uthaye us se honth chipkaye vijayant bhi jhade ja raha tha.lund thoda sikuda to vijayant ne use bahar khincha.lund khinchte hi uska gadha virya rambha ki chut se tapak uski gand ke chhed tak girne laga.

vijayant ne fauran apne sath layi 1 dibiya ko khola & usme se 1 cream apni ungli pe lagayi & fir apne virya & us cream ko rambha ki gand ke chhed me bahrne laga.jhadne se madhosh rambha kamar uchkate hue fir se bechain hone lagi.uska sasur uski gand me ungli kar raha tha & use ajib sa maza aa raha tha.

"na...mat kariye,dad..aannhhhh..!",rambha ne baye hath se uski kalai tham use rokne ki nakaam koshish ki.vijayant uske dayi taraf ho gaya & uske taraf apni gand kar uski jangho ko faila upar se uski chut chaatata uski gand me ungli karne laga.rambha ne madhoshi me sar idhar-udhar ghumaya & puar jism ghuma pet ke bal ho gayi.usne bayi taraf sar ghumaya to use vijayant ka sikuda lund latka dikha jis se abhi bhi virya ki kuchh bunde tapak rahi thi.

rambha ne hath badha ke lund ko pakda & thoda uchak ke sikude lund ko chusne lagi.vijayant ab uski gand ki darar me jibh firata uski gand ki chhed me cream bharte hue ungli kiye ja raha tha.vo rambha ki gand ke kase chhed ko thoda dhila kar dena chahta tha taki uske mote lund ko ghusne me aasani ho.jab rambha bechain ho kamar hilane lagi & uski zuban ne uske sikude lund ko fir se khada kar diya to usne rambha ki gand se ungli nikali & uski kamar tham gand ko hawa me utha uske peechhe aa gaya.

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"hello.",Balbir ne dekha ki banker se baatchit ke beech Brij Kothari ne apne mobile pe 1 call li & uske chehre ka rang thoda badal gaya.

"excuse me.",vo apni mez se utha & andar bathroom ki or jane laga.balir bhi uske peechhe ho liya.brij toilet me ghusa & 1 cubicle me ghusa darwaza band kiya.balbir uske sath vale cubicle me dabe panv ghusa.

"tum pichhle 6-7 dino se mujhe fone kar ke pareshan rahe ho.aakhir chahte kya ho tum?",ye shakhs roz brij ko fone karta tha har baar number badal ke & har baar 1 hi baat ki kya use apne dushman ko maza chakhana hai.

"brij babu,aap clayworth ke paas jo Dhardar jharne hain vaha pahuncho & mera yakin mano ki aapko aapki zindagi ka sabse bada tohfa milega vaha.kal savere 4 baje tak kisi bhi haalat me vaha pahunch jao magar bilkul akele agar koi bhi sath aaya to mujhe pata chal jayega & tumhara tohfa tumhe nahi milega."

"magar..",fone kat gaya tha.

balbir ne udhar vale anjan shakhs ki baat to nahi suni magar ye samajh gaya ki brij pareshan hai.brij ka dimagh badi tezi se chal raha tha & apna khana khatm hone tak uusne faisla kar liya tha ki vo Dhardar falls zarur jayega.khana khatm hote hi vo apne daftar gaya & vahi se apni car me akela clayworth ke liye nikal pada.balbir uske peechhe hi tha.

"hello,Soniya.main clayworth ja raha hu kisi kaam se lekin tum kisi ko ye baat mat batana mere office valo ko bhi nahi.sab thik raha to kal laut aaoonga."

"lekin darling..-"

"aaj kuchh mat puchho jaan.kal sab bataunga.bye!",brij ne fone rakha & car drive karne laga.udahr ghar me akeli baithi soniya ka dil na jane kyu bahut zor se dhadakne laga,use laga ki kuchh bura hone wala hai.

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"AAIIIIIIIYYYYYYYYYYEEEEEEEEEE...please mat daliye..bahut bada hai aapka lund....HAAAAAAAAAAIIIIIIIIIIIIIII..!",vijayant ke mote supade ne rambha ki gand ke chhote se surakh ko bahut buri tarah faila diya tha & vo chikh rahi thi.

"bas ho gaya meri rani!....ye lo...chala gaya......aahhhhhhhhhh..!",vijayant ne supade ke peechhe cream & virya se chikni gand me aadha lund ghusa diya.vo janta tha ki iske aage ghusana uski pyari bahu ke liye bahut taklifdeh ho sakta hai.rambha ki gand ne to uske lund ko bilkul jakad liya tha & har dhakke pe maze ki vajah se uski aah nikal jati thi.vo uski fanko ko masalte hue uski gand maar raha tha & rambha ab dard se kam & josh se zyada chikh rahi thi.

"uummmmmmm.....!",vo apne hath ko apne munh me ghusa apni hi ungliya masti me chuse ja rahi thi.vijayant ne daya hath uski kamar se aage uski chut pe sarkaya & uske dane ko chhedne laga & baye ko aage badha uski bhari-bharkam lekin kasi chhatiyo ko masal diya.

"aannnnnhhhhhh..bahut zalim hain aap dad!..oooowwwww.!",vijayant ne uske nipple pe chikoti kaat li,"..apni bahu ko kitna dard pahuncha rahe hain.....aannnnhhhhhhh......haaaannnnnnhhhhhh..!",vijayant aage jhuka & uski pith se apni chhati satate hue uske baye kaan ko kaat liya.

"kaho to nikal lu lund bahar.",uski ungli dane pe tezi se gol-2 ghum rahi thi.

"uunnnn..nahi.....usne bayi tafa munh ghuma ke baye hath se unke baal pakad ke khinch ke unhe badi shiddat se chuma,"..bas tadpana hai mujhe..hai na?....haiiiiiiii..!",vijayant ne dhakke lagate hue use puri tarah se bistar pe lita diya tha & ab uske uapr let ke halke-2 aadhe lund ke dhakke laga raha tha.

"haaaaaaannnnnnnn..mariye......& mariye apni bahu ki gand..aap hi ki hai ye dad......haaaaannnnnnnnnn......!",rambha uske neeche dabi chhatpatane lagi thi & uski gand ne vijayant ke lund ko aur kas liya tha.

"aahhhhhhhh.......rambha..!",vijayant ne chikh mari & bahu ke jhadte hi uski gand me apna gadha virya chhod diya.

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"vijayant darling?"

"soniya?",vijayant abhi bhi rambha ke upar leta tha & uska lund uski gand me sikud raha tha.

"vijayant,kuchhh batana hai tumhe."

"haan-2.bolo."

"abhi-2 brij clayworth gaya hai akela."

"to?"

"vijayant..",soniya ro rahi thi.

"ro mat soniya..ghabrao mat..main tumhe kuchh nahi hone dunga.",rambha gaur se sasur ki baat sun rahi thi,"..brij clayworth gaya hai..kisliye gaya hai?",..uska sasur brij kothari ki biwi ko janta tha..rambha hairan ho gayi..,"..soniya..jaan..please chup ho jao..& sari baat batao."..hain!..jaan..baap re!..ye to bada pahuncha khiladi hai..dushman ki biwi ko phansa rakha hais isne!

"vijayant..vijayant..mujhe lagta hai ki..",soniya rone lagi,"..mujhe lagta hai ki sameer ki gumshudgi me brij ka hath hai.",uski rulayi & tez ho gayi.

"kya?!"

"haan..bas yehi batana tha.bye!",usne fone kaat diya,"..i'm sorry,brij!",side-table pe rakhi pati ki tasvir ko dekh uski rulayi & tez ho gayi.

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vijayant uski gand se lund khinch ab headbord se tek lagake paira faialake baitha hua kuchh soch raha tha.rambha ne abhi us se kuchh puchhna thik nahi samjha.vo uske dayi taraf let gayi & dayi banh uske jism pe daal di & aaj din ke bare me sochne lagi.sasur ke sath is mastane rishte ki shuruat ke baad aaj pehli baar dono me thodi kaha-suni hui thi & vijayant ne use dant diya tha.

rambha ka maanana tha ki Harpal ki behan Hina se mil ke kuchh hasil nahi hona tha ulte vo savdhan ho jata & shayad Sameer ko kuchh nuksan pahuncha deta.isi baat pe behas hui & vijayant ne use dant diya.uska maanana tha ki harpal jaise log chuhe hote hain & unhe pata chalne me koi harz nahi ki ab unhe marne ke liye log mustaid ho chuke hain & jaha tak sameer ka saval ho,agar uski kismat kharab hui to ho sakta hai abhi unhe uski lash bhi na mile.

rambha ko sameer se koi gehri mohabbat nahi thi lekin sameer to us se mohabbat karta tha.uske liye usne apni daulat,apna khandan thukra diya tha & uske is jazbe ki vo kadr karti thi.use apne sasur ki baat bahut buri lagi thi.vo uske kehne pe Avantipur me Hina se mil aayi.hina ne bhi pichhle & dino se bhai se baat nahi ki thi & usne rambha ke samne use fone lagaya lekin fone nahi mila.hina use nirdosh lagi thi & usne use bhai ki koi bhi khabar milne pe use batane ko kaha tha.

clayworth tak ke sare raste usne vijayant se koi baat nahi ki thi & apni narazgi zahir kar di thi lekin uska sasur bhi kamal ka mard tha!ruthi mehbooba ko bina 1 bhi lafz bole na keval usne mana liya tha balki uski gand bhi maar li thi!itna vo samajh rahi thi ki sameer ke bare me koi surag mila hai & shayad sare mamle ke taar brij se jude hain.

tabhi vijayant ka mobile dobara baja.usne number dekha & chaunk gaya,"sameer!",usne rambha ki or dekh ke kaha to vo bhi uth baithi,"hello,sameer?"

"mehra,tumhare liye 1 tohfa hai.bas abhi 4 baje tak dhardar falls pe pahuncho.bilkul akele aana varna tohfa nuksan me pad sakta hai."

"hello..!..hello..!",fone kat gaya tha.

"kya hua?",rambha ne sasur ke chehre pe hath firaya.

"koi sameer ke mobile se fone karke mujhe dhardar falls bula raha hai savere 4 baje."

"to chaliye & police ko bhi khabar kar deta hain."

"nahi.muhe akele bulaya hai nahi to sameer ko nuksan pahuncha sakte hain vo."

"magar aap akele bhi to khatre me pad sakte hain,dad..please mujhe le chaliye."

"nahi,tumhe khatre me nahi daal sakta & na hi sameer ko.",vijayant bistar se uth gaya,"..main akela jaunga & use le aaoonga.",sasur ki bhari aavaz ke vajan ke aage rambha ko kuchh aur bolne ki himmat nahi hui.

Vijayant Mehra apne kamre me jake Dhardar Falls jane ki taiyyari karne laga.Rambha apne kamre me hi thi & vo shakhs teesre kamre me chhipa vijayant ke jane ka intezar kar raha tha.vo shakhs jis kamre me tha usme ghup andhera tha & itni der ho jane ke baad bhi uski aankhe andhere ki adi nahi ho payi thi.

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kramashah.......


raj..
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Re: Jaal -जाल

Unread post by raj.. » 14 Dec 2014 06:16

जाल पार्ट--36

गतान्क से आगे.

"मैं जा रहा हू,तुम अंदर से दरवाज़ा बंद रखना.बाहर गार्ड को भी बोल जाउन्गा की मुस्तैद रहे."

"ठीक है.वैसे क्या हमे पोलीस को नही बता देना चाहिए?",रंभा ससुर के कोट के कॉलर पे उंगली फिरा रही थी.

"हां,मैं वाहा पहुँच के इन्वेस्टिगेटिंग ऑफीसर को खबर दूँगा..-"

"तन्णन्न्..!",विजयंत & रंभा निचली मंज़िल पे बने हाल से बाहर जाने वाले मैं दरवाज़े पे खड़े बातें कर रहे थे कि उपर कुच्छ गिरने की आवाज़ आई.

"कौन है?!",विजयंत चीखा,"..रंभा,सारी बत्तियाँ जलाओ!",वो सीढ़ियाँ फलंगता उपर भागा.

"धात तेरे की!",खामोशी हो जाने की वजह से वो शख्स कमरे से बाहर निकल के वाहा का जायज़ा लेने की सोच ही रहा था की कमरे के बाहर रखे पीतल के बड़े से सजावटी वेस से वो टकरा गया & वो ज़ोर की आवाज़ करता गिरा.रंभा ने बत्तियाँ जलानी शुरू की & वो शख्स उधर ही भागा जिधर से आया था.

"आए!रुक!",विजयंत ने उस शख्स को अपने कमरे मे घुसते हुए,उसकी पीछे से बस 1 झलक देखी.वो शख्स दौड़ता हुआ बाल्कनी मे पहुँचा & जिस दरवाज़े का शीशा तोड़ अंदर घुसा था उसी से बाहर निकला & उसे बाहर से बंद कर भागा.

"साले..!रुक..!",विजयंत ने कंधे से धक्के मार दरवाज़े को खोलना चाहा & 2-3 धक्को मे वो कामयाब हो गया.इधर रंभा ने बाहर भाग के दरबान को आगाह किया तो उसने दिमाग़ लगाते हुए बुंगले के पीछे की ओर दौड़ लगाई.जब तक विजयंत बाल्कनी मे आया & दरबान पीछे पहुँचा,वो शख्स दूसरी तरफ से घूम बंगल के मेन गेट तक पहुँच गया था.

"हेयययी..!",रंभा चीखी,वो अभी तक बंगल के सामने की तरफ ही थी.वो शख्स घुमा & रंभा ने उसके चेहरे पे वही निशान देखा & देखी उसकी नफ़रत से भरी आँखे.वो शख्स घुमा & फुर्ती से गेट पे चढ़ उसे फाँद गया.बगल के बंगल का चौकीदार शोरॉगुल सुन बाहर आ ही रहा था कि उस शख्स ने उसे करारा घूँसा उसके जबड़े पे जमाया & बंगल के पिच्छली तरफ भागा & वही से अपनी कार मे सवार हो निकल भागा.

"#!$%^&*&..साला..!",वो गालिया बकता गाड़ी को वाहा से भगाए जा रहा था.वो मंज़िल के इतने करीब पहुँच नाकाम होके लौट रहा था.

"ये आदमी अंदर घुसा कैसे?",विजयंत की रोबदार आवाज़ ने दरबान का खून जमा दिया.

"प-पता नही साहब..म-मैं तो जगा था & यहा से तो कोई नही घुसा."

"ये ठीक कह रहा है.जब मैं इसे बुलाने निकली तो ये हंगामा सुन इधर ही आ रहा था.",रंभा को उस बेचारे पे तरस आ गया.वो समझ रही थी कि वो सच कह रहा है.

"आप पोलीस को खबर कर दीजिए प्लीज़."

"हूँ.",विजयंत ने जेब से मोबाइल निकाला & पहले समीर का केस देख रहे अफ़सर की नींद खराब की & फिर क्लेवर्त की पोलीस की,"..अब मैं जा रहा हू.कही देर ना हो जाए."

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ब्रिज कोठारी कोई कच्चा खिलाड़ी तो था नही & बलबीर मोहन की लाख होशियारी के बावजूद उसने भाँप लिया कि वो उसका पीछा कर रहा है.आज उसने सोच ही लिया था कि इस फोन की गुत्थी सुलझा के ही रहेगा.वो रात भर गाड़ी चलाके अब आवंतिपुर से आगे आ गया था & अब मौका था उसका पीछा कर रहे शख्स को चकमा देने का.

उसने कार की रफ़्तार बिना कम किए अचानक उसे बाई तरफ 1 कच्चे रास्ते पे उतार दिया.बलबीर चौंक गया & वो उस रास्ते से आगे बढ़ गया.उसने फ़ौरंम ब्रेक लगाया & वापस आया.उस कच्चे रास्ते पे उतर वो आयेज बढ़ा लेकिन उसे ब्रिज की कार नज़र नही आ रही थी.ब्रिज इस इलाक़े से अच्छी तरह से वाकिफ़ था & उसने फ़ौरन कार को आगे ले जाके वापस मेन रोड की तरफ घुमाया & फिर मैं रोड पार कर दूसरी तरफ के कच्चे रास्ते पे उतार दिया.उस रास्ते से होके वो फिर से थोडा आगे मेन रोड पे आया & फिर कार तेज़ी से क्लेवर्त की ओर भगा दी.जब तक बलबीर मोहन ने उसकी तरकीब समझी तब तक वो बहुत आगे निकल चुका था.

अब बलबीर मोहन को ये तो पता था नही कि ब्रिज जा कहा रहा है.वो आगे बढ़ने लगा लेकिन उसने सोचा की अब विजयंत को इस बारे मे बता देना चाहिए.विजयंत वक़्त से पहले ही झरने पे पहुच जाना चाहता था & वो अपनी कार टेढ़े-मेधे पहाड़ी रास्ते पे चला रहा था जब बलबीर का फोन आया.

"वो क्लेवर्त आ रहा है,बलबीर."

"आपको कैसे पता,मिस्टर.मेहरा?",विजयंत ने उसे फोन & घर मे घुसे आदमी वाली बातें बता दी.

"मिस्टर.मेहरा,आप प्लीज़ अकेले मत जाइए.पोलीस का या मेरे आने का इंतेज़ार कीजिए."

"मेरे बेटे का सवाल है,बलबीर!..मैं कोई ख़तरा नही ले सकता.",उसने फोन काट दिया.

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धारदार फॉल्स सैलानियो के बीच बहुत मशहूर था & वाहा तक पहुँचने के लिए 1 पक्का पैदल रास्ता था.नीचे कार पार्किंग मे गाड़ी लगा लोग उपर जाते थे & झरने के नीचे नहाने या फीओर आस-पास के खूबसूरत नज़ारे का लुत्फ़ उठाते थे.विजयंत वही खड़ा फोन करने वाले का इंतेज़ार कर रहा था कि तभी उसे दूर से कोई आता दिखा.

अभी उजाला होना शुरू नही हुआ था & उस अंधेरे मे उसे उस आदमी की शक्ल नही दिखी.हां,उसने ये ज़रौर भाँप लिया कि कद-काठी उसी के जैसी थी.उसकी चाल उसे जानी-पहचानी लगी.शायद अस आदमी ने भी उसे देख लिया & ठिठक गया.

ब्रिज ने दूर खड़े आदमी को पहचानना चाहा मगर उसे भी कुच्छ सॉफ नही दिखा.वो आगे बढ़ा की तभी उसके पैरो से कोई चीज़ आ टकराई.ऐसा लगता था जैसे किसी ने कुच्छ फेंका था उसके पैरो पे.उसने उसे उठाया तो वो कोई पॅकेट था.उसके हाथ मे कुच्छ गीला महसूस हुआ तो उसने पॅकेट को चेहरे के पास किया & फिर ऐसे दूर फेका जैसे वो कोई बड़ी ख़तरनाक चीज़ है.

ब्रिज ने सामने खड़े इंसान को देखा & सब समझ गया.ये किसी की साज़िश थी उसे फँसाने की & वो भी बेवकूफो की तरह इस जाल मे फँसता चला आया था.वो सामने खड़ा इंसान मेहरा था & उस पॅकेट मे कोई कपड़ा था जिसपे खून लगा था.ब्रिज उल्टे पाँव भागा.

विजयंत ने दूर खड़े इंसान को वो कपड़ा फेंकते देख सोचा की वो वो पॅकेट उसकी ओर फेंका रहा है.वो आगे बढ़ा & उस पॅकेट को उठाया & उसे खोल के देखा.अंदर खून के धब्बो वाली 1 कमीज़ थी.

1 पल को ब्रिज ने सोचा कि मेहरा को सब बता दे लेकिन उसे पता था कि मेहरा उसपे कभी यकीन नही करेगा & फिर ये भी तो हो सकता था की ये मेहरा की ही कोई चाल हो उसे फँसाने की.ब्रिज अपनी कार तक पहुँचा & उसे स्टार्ट कर वाहा से निकल गया.चाहे कुच्छ भी हो उसे आवंतिपुर पहुँचना था अपने होटेल & फिर वाहा से वापस डेवाले.

"कामीने..!",विजयंत बुदबुडाया.उसे समझ आ गया था की उस शख्स की कद-कती,चल-ढाल उसे क्यू जाने-पहचाने लगे थे.वो & कोई नही उसका दुश्मन कोठारी था.उसने पॅकेट को टटोला तो अंदर 1 छ्होटे से प्लास्टिक पॅकेट मे कंप्यूटर पे टाइप किया 1 खत था.

"मेहरा

ये खून तुम्हारे बेटे का है मगर घबराओ मत उसकी जान ख़तरे मे नही है.थोड़ी खरॉच आई थी उसे तो सोचा कि उस खरॉच को & कुरेद कर उसी के खून को सबूत के तौर पे तुम्हे भेजा जाए.ये कमीज़ भी उसी की है ताकि तुम्हे पक्का यकीन हो जाए की ये खत सच्चा है.

मेहरा,तुम कुच्छ दिन कोई नया काम ना करो तो तुम्हारा बेटा सही-सलामत तुम्हारे पास पहुँच जाएगा.ये बात लिख के दे दो की तुम अगले 6 महीनो तक कोई नया टेंडर लेने की कोशिश नही करोगे तो समीर तुम्हे लौटा दिया जाएगा वरना ये हो सकता है कि अगली बार खून के साथ-2 तुम्हारे प्यारे बेटे के जिस्म का कोई टुकड़ा भी तुम्हे भेजना पड़े."

खत पढ़ते ही विजयंत गुस्से से भर उठा.कुच्छ आवाज़ें सुनी तो उसने देखा की पोलिसेवाले वाहा आ रहे हैं.उसने पॅकेट थामा & उनकी ओर बढ़ गया.

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रंभा ने चाइ बनाई & 1 प्याला ले हॉल मे बैठ गयी.उस शख्स की शक्ल उसकी आँखो के सामने से हट नही रही थी & उनकी आँखो मे वो नफ़रत!..था कौन वो & इतनी नफ़रत से क्यू देखा था उसने उसको?..वो समझ नही पा रही थी की आख़िर समीर किस मुसीबत मे & क्यू फँस गया था?

वो शख्स घर मे किस इरादे से घुसा था?..उसने बंगल मे घूम रहे पोलिसेवालो को देखा.उसने उनके लिए भी चाइ बनाके हॉल के डाइनिंग टेबल पे रख दी थी & वो सब अपने-2 प्याले उठा रहे थे.

"मेडम..",थानेदार उसके पास आके बैठ गया,"..आपके ससुर के कमरे के बाल्कनी के दरवाज़े का काँच टूटा हुआ है.वो आदमी वही से घुसा था लेकिन सवाल ये है की उस वक़्त आपके ससुर कहा थे?",रंभा का दिल धड़क उठा..यानी की वो तब घुसा था जब वो विजयंत से चुद रही थी..कही उसने उन दोनो की चुदाई तो नही देख ली थी!

"मेडम..आपने जवाब नही दिया."

"हूँ..हां....देखिए,रात को 10 बजे के करीब हम दोनो अपने-2 कमरो मे सोने चले गये,उसके बाद मेरे ससुर ने मुझे 1 बजे जगाया & उस फोन का बारे मे बताया..",अभी तक थानेदार को पंचमहल पोलीस से समीर के केस के बारे मे भी जानकारी मिल गयी थी,"..हम दोनो मेरे कमरे मे ही बैठ के उस सिलसिले मे बातें करने लगे."

"आपलोगो ने कोई आवाज़ नही सुनी?"

"नही..",सुनते भी कैसे दोनो को फ़ुर्सत कहा थी 1 दूसरे के जिस्मो से खेलने से,"..हम उस फोन के बारे मे सुनके बहुत चिंतित हो गये थे."

"हूँ.",थानेदार उसे देखते हुए चाइ पीता रहा.

जब रात वियजयंत मेहरा & रंभा क्लेवर्त के बुंगले मे 1 दूसरे की बाहो मे समाए थे & ब्रिज कोठारी तेज़ी से धारदार फॉल्स जा रहा था,उस वक़्त रीता अपने कमरे मे अपने बिस्तर पे लेटी हल्के सरदर्द से परेशान अपना माथा सहला रही थी.समीर की गुमशुदगी का राज़ उसे भी समझ नही आ रहा था.पहले तो उसने सोचा था कि वो किसी हादसे का शिकार हो गया लेकिन अब उसे भी लग रहा था कि वो किसी साज़िश का शिकार हुआ है.वो इन्ही ख़यालो मे खोई थी की दरवाज़े पे दस्तक हुई.

"कौन है?"

"मैं,प्रणव."

"आ जाओ,बेटा.",वो उठ के बैठ गयी.

"क्या हुआ,मोम..तबीयत ठीक नही क्या?"

"नही,ठीक है.हल्का सरदर्द है."

"लाइए मैं दबा दू.",प्रणव उसके बाई तरफ बैठ गया & उसका सर दबाने लगा.

"अरे नही बेटा..ठीक है..तुम मत परेशान हो!",उसने उसका हाथ पकड़ हटाने की कोशिश की.

"क्यू?मैं नही दबा सकता क्या?..चलिए दबाने दीजिए.",प्रणव ने उसका हाथ हटाया & उसकी निगाह 1 पल को रीता के पतले स्ट्रॅप्स वाले नाइट्गाउन के गले पे चली गयी.रीता का दूधिया क्लीवेज हाथ उठाने-गिरने से छल्छला रहा था.उसने तुरंत नज़रे फेर ली लेकिन रीता ने उसे देख लिया था.

उसे थोड़ी शर्म आई & उसके गाल लाल हो गये लेकिन साथ ही उसे थोडा अच्छा भी लगा.प्रणव चुप-चाप उसका सर दबा रहा था & रीता भी नही समझ पा रही थी कि क्या बोले.

"शिप्रा कहा है?",उसने सवाल कर वो असहज चुप्पी तोड़ी.

"उसकी किसी सहेली की हें पार्टी थी.मैने उसे वही भेजा है.वो तो जाना नही चाह रही थी.मैने इसरार किया की जाएगी तो दिल बहलेगा."

"अच्छा किया.उसे भी परेशानी से राहत तो मिलनी ही चाहिए."

"& आपको?",प्रणव बिस्तर पे थोड़ा उपर हो गया था & उसका सर दबा रहा था.

"मैं तो ठीक हू."

"प्लीज़ मोम,झूठ मत बोलिए.आप आजकल अकेली बैठी रहती हैं & ना जाने क्या-2 सोचती रहती हैं.",रीता ने फीकी हँसी हँसी & प्रणव के हाथ हटा दिए & बिस्तर से उतरने लगी.उसका गाउन बिस्तर & उसके जिस्म के बीच फँस उसके घुटनो से उपर हो गया & प्रणव ने सास की गोरी टाँगे देखी.उसे पहली बार ये एहसास हुआ कि उसकी सास उम्र से कम दिखती थी & उसका जिस्म अभी बहुत ढीला नही पड़ा था.रीता ने जल्दी से गाउन ठीक किया & जाके कमरे की खिड़की पे खड़ी हो गयी.

"प्लीज़ मोम.संभालिए खुद को.",प्रणव उसके पीछे गया & उसके कंधो पे हाथ रख दिए.उसने ऐसा करने का सोचा नही था पर उसका दिल रीता के रेशमी जिस्म को छुना चाह रहा था.उसके हाथो के एहसास से रीता के जिस्म मे सनसनी दौड़ गयी लेकिन प्रणव का साथ उसे भला लग रहा था.प्रणव उसके कंधो को हल्के-2 दबाने लगा था.रीता ने आँखे बंद कर ली & उस छुअन के एहसास मे खोने लगी.

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क्रमशः.......

JAAL paart--36

gataank se aage.

"main ja raha hu,tum andar se darwaza band rakhna.bahar guard ko bhi bol jaunga ki mustaid rahe."

"thik hai.vaise kya hume police ko nahi bata dena chahiye?",rambha sasur ke coat ke collar pe ungli fira rahi thi.

"haan,main vaha pahunch ke investigating officer ko khabar dunga..-"

"tannnn..!",vijayant & rambha nichli manzil pe bane hal se bahar jane vale main darwaze pe khade baaten kar rahe the ki upar kuchh girne ki aavaz aayi.

"kaun hai?!",vijayant chikha,"..rambha,sari battiyan jalao!",vo seedhiyan falangta upar bhaga.

"dhat tere ki!",khamoshi ho jane ki vajah se vo shakhs kamre se bahar nikal ke vaha ka jayza lene ki soch hi raha tha ki kamre ke bahar rakhe pital ke bade se sajawati vase se vo takra gaya & vo zor ki aavaz karta gira.rambha ne battioyan jalani shuru ki & vo shakhs udhar hi bhaga jidhar se aaya tha.

"aye!ruk!",vijayant ne us shakhs ko apne kamre me ghuste hue,uski peechhe se bas 1 jhalak dekhi.vo shakhs daudta hua balcony me pahuncha & jis darwaze ka shisha tod andar ghusa tha usi se bahar nikla & use bahar se band kar bhaga.

"sale..!ruk..!",vijayant ne kandhe se dhakke maar darvaze ko kholna chaha & 2-3 dhakko me vo kamyab ho gaya.idhar rambha ne bahar bhag ke darban ko aagah kiya to usne dimagh lagate hue bungle ke peechhe ki or daud lagayi.jab tak vijayant balcony me aaya & darban peechhe pahuncha,vo shakhs dusri taraf se ghum bungle ke main gate tak pahunch gaya tha.

"heyyyy..!",rambha chikhi,vo abhi tak bungle ke samne ki taraf hi thi.vo shakhs ghuma & rambha ne uske chehre pe vahi nishan dekha & dekhi uski nafrat se bhari aankhe.vo shakhs ghuma & furti se gate pe chadh use phand gaya.bagal ke bungle ka chaukidar shorogul sun bahar aa hi raha tha ki us shakhs ne use karara ghunsa uske jabde pe jamaya & bungle ke pichhli taraf bhaga & vahi se apni car me savar ho nikal bhaga.

"#!$%^&*&..sala..!",vo galiya bakta gadi ko vaha se bhagaye ja raha tha.vo manzil ke itne karib pahunch nakaam hoke laut raha tha.

"ye aadmi andar ghusa kaise?",vijayant ki robdar aavaz ne darban ka khun jama diya.

"p-pata nahi sahab..m-main to jaga tha & yaha se to koi nahi ghusa."

"ye thik keh raha hai.jab main ise bulane nikli to ye hungama sun idhar hi aa raha tha.",rambha ko us bechare pe taras aa gaya.vo samajh rahi thi ki vo sach keh raha hai.

"aap police ko khabar kar dijiye please."

"hun.",vijayant ne jeb se mobile nikala & pehle Sameer ka case dekh rahe afsar ki nind kharab ki & fir Clayworth ki police ki,"..ab main ja raha hu.kahi der na ho jaye."

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Brij Kothari koi kachcha khiladi to tha nahi & Balbir Mohan ki lakh hoshiyaro ke bavjud usne bhanp liya ki vo uska peechha kar raha hai.aaj usne soch hi liya tha ki is fone ki gutthi suljha ke hi rahega.vo raat bhar gadi chalake ab Avantipur se aage aa gaya tha & ab mauka tha uska peechha kar rahe shakhs ko chakma dene ka.

usne car ki raftar bina kam kiye achanak use bayi taraf 1 kachche raste pe utar diya.balbir chaunk gaya & vo us raste se aage badh gaya.usne fauranm brake lagaya & vapas aaya.us kachche raste pe utar vo aage badha lekin use brij ki car nazar nahi aa rahi thi.brij is ialke se achhi tarah se vakif tha & usne fauran car ko aage le jake vapas main road ki taraf ghumaya & fir main road paar kar dusri taraf ke kacche raste pe utar diya.us raste se hoke vo fir se thoda aage main road pe aaya & fir car tezi se clayworth ki or bhaga di.jab tak balbir mohan ne uski tarkib samjhi tab tak vo bahut aage nikal chuka tha.

ab balbir mohan ko ye to pata tha nahi ki brij ja kaha raha hai.vo aage badhne laga lekin usne socha ki ab vijayant ko is bare me bata dena chahiye.vijayant waqt se pehle hi jharne pe pahucnh jana chahta tha & vo apni car tedhe-medhe pahadi raste pe chala raha tha jab balbir ka fone aaya.

"vo clayworth aa raha hai,balbir."

"aapko kaise pata,mr.mehra?",vijayant ne use fone & ghar me ghuse admi vali baaten bata di.

"mr.mehra,aap please akele mat jaiye.police ka ya mere aane ka intezar kijiye."

"mere bete ka sawal hai,balbir!..main koi khatra nahi le sakta.",usne fone kaat diya.

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dhardar falls sailaniyo ke beech bahut mashur tha & vaha tak pahunchne ke liye 1 pakka paidal rasta tha.neeche car parking me gadi laga log upar jate the & jharne ke neeche nahane ya fior aas-paas ke khubsurat nazare ka lutf uthate the.vijayant vahi kahda fone karne vale ka intezar kar raha tha ki tabhi use door se koi aata dikha.

abhi ujala hona shuru nahi hua tha & us andhere me use us aadmi ki shakl nahi dikhi.haan,usne ye zaraur bhanp liya ki kad-kathi usi ke jaisi thi.uski chaal use jani-pehchani lagi.shayad uis aadmi ne bhi use dekh liya & thithak gaya.

brij ne door khade aadmi ko pehchanana chaha magar use bhi kuchh saaf nahi dikha.vo aage badha ki tabhi uske pairo se koi chiz aa takrayi.aisa lagta tha jaise kisi ne kuchh fenka tha uske pairo pe.usne use uthaya to vo koi packet tha.uske hath me kuchh gila mehsus hua to usne packet ko chehre ke paas kiya & fir aise door pehnka jaise vo koi badi khatarnak chiz hai.

brij ne samne khade insan ko dekha & sab samajh gaya.ye kisi ki sazish thi use fansane ki & vo bhi bevkufo ki tarah is jaal me phansta chala aaya tha.vo samne khada insan mehra tha & us packet me koi kapda tha jispe khoon laga tha.brij ulte panv bhaga.

vijayant ne door khade insan ko vo kapda fenklte dekh socha ki vo vo packet uski or fenka raha hai.vo aage badha & us packet ko uthaya & use khol ke dekha.andar khun ke dhabbo vali 1 kamiz thi.

1 pal ko brij ne socha ki mehra ko sab bata de lekin use pata tha ki mehra uspe kabhi yakin nahi karega & fir ye bhi to ho sakta tha ki ye mehra ki hi koi chaal ho use phansane ki.brij apni car tak pahuncha & use start kar vaha se nikal gaya.chahe kuchh bhi ho use avantipur pahunchana tha apne hotel & fir vaha se vapas Devalay.

"kamine..!",vijayant budbudaya.use samajh aa gaya tha ki us shakhs ki kad-kathi,chal-dhal use kyu jane-pehchane lage the.vo & koi nahi uska dushman kothari tha.usne packet ko tatola to andar 1 chhote se plastic packet me computer pe type kiya 1 khat tha.

"mehra

ye khun tumhare bete ka hai magar ghabrao mat uski jaan khatre me nahi hai.thodi kharoch aayi thi use to socha ki us kharoch ko & kured kar usi ke khun ko saboot ke taur pe tumhe bheja jaye.ye kamiz bhi usi ki hai taki tumhae pakka yakin ho jaye ki ye khat sachcha hai.

mehra,tum kuchh din koi naya kaam na karo to tumhara beta sahi-salamat tumhare paas pahunch jayega.ye baat likh ke de do ki tum agle 6 mahino tak koi naya tender lene ki koshish nahi karoge to sameer tumhe lauta diya jayega varna ye ho sakta hai ki agli baar khun ke sath-2 tumhare pyare bete ke jism ka koi tukda bahi tumhe bhejna pade."

khat padhte hi vijayant gusse se bhar utha.kuchh avazen suni to usne dekha ki policevale vaha aa rahe hain.usne packet thama & unki or badh gaya.

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rambha ne chai banayi & 1 pyala le hall me baith gayi.us shakhs ki shakl uski aankho ke samne se hat nahi rahi thi & unki aankho me vo nafrat!..tha kaun vo & itni nafrat se kyu dekha tha usne usko?..vo samajh nahi pa rahi thi ki aakhir sameer kis musibat me & kyu phans gaya tha?

vo shakhs ghar me kis irade se ghusa tha?..usne bungle me ghum rahe policevalo ko dekha.usne unke liye bhi chai banake hall ke dining table pe rakh di thi & vo sab apne-2 pyale utha rahe the.

"madam..",thanedar uske paas aake baith gaya,"..aapke sasur ke kamre ke balcony ke darwaze ka kanch tuta hua hai.vo admi vahi se ghusa tha lekin sawal ye hai ki us waqt aapke sasur kaha the?",rambha ka dil dhadak utha..yani ki vo tab ghusa tha jab vo vijayant se chud rahi thi..kahi usne un dono ki chudai to nahi dekh li thi!

"madam..aapne jawab nahi diya."

"hun..haan....dekhiye,raat ko 10 baje ke karib hum dono apne-2 kamro me sone chale gaye,uske baad mere sasur ne mujhe 1 baje jagaya & us fone ka bare me bataya..",abhi tak thanedar ko Panchmahal police se sameer ke case ke bare me bhi jankari mil gayi thi,"..hum dono mere kamre me hi baith ke us silsile me baaten karne lage."

"aaplogo ne koi aavaz nahi suni?"

"nahi..",sunte bhi kaise dono ko fursat kaha thi 1 dusre ke jismo se khelne se,"..hum us fone ke bare me sunke bahut chintit ho gaye the."

"hun.",thanedar use dekhte hue chai pita raha.

Jab raat Viajyant Mehra & Rambha Clayworth ke bungle me 1 dusre ki baaho me samaye the & Brij Kothari tezi se Dhardar Falls ja raha tha,us waqt Rita apne kamre me apne bistar pe leti halke sardard se pareshan apna matha sehla rahi thi.sameer ki gumshudgi ka raaz use bhi samajh nahi aa raha tha.pehle to usne socha tha ki vo kisi hadse ka shikar ho gaya lekin ab use bhi lag raha tha ki vo kisi sazish ka shikar hua hai.vo inhi khayalo me khoi thi ki darwaze pe dastak hui.

"kaun hai?"

"main,Pranav."

"aa jao,beta.",vo uth ke baith gayi.

"kya hua,mom..tabiyat thik nahi kya?"

"nahi,thik hai.halka sardard hai."

"laiye main daba du.",pranav uske bayi taraf baith gaya & uska sar dabane laga.

"are nahi beta..thik hai..tum mat pareshan ho!",usne uska hath pakad hatane ki koshish ki.

"kyu?main nahi daba sakta kya?..chaliye dabane dijiye.",pranav ne uska hath hataya & uski nigah 1 pal ko rita ke patle straps vale nightgown ke gale pe chali gayi.rita ka doodhiya cleavage hath uthane-girane se chhalchhala raha tha.usne turant nazre fer li lekin rita ne use dekh liya tha.

use thodi sharm aayi & uske gaal laal ho gaye lekin sath hi use thoda achha bhi laga.pranav chup-chap uska sar daba raha tha & rita bhi nahi samajh pa rahi thi ki kya bole.

"Shipra kaha hai?",usne sawal kar vo asahaj chuppi todi.

"uski kisi saheli ki hen party thi.maine use vahi bheja hai.vo to jana nahi chah rahi thi.maine israr kiya ki jayegi to dil bahlega."

"achha kiya.use bhi pareshani se rahat to milni hi chahiye."

"& aapko?",pranav bistar pe thoda upar ho gaya tha & uska sar daba raha tha.

"main to thik hu."

"please mom,jhuth mat boliye.aap aajkal akeli baithi rehti hain & na jane kya-2 sochti rehti hain.",rita ne fiki hansi hansi & pranav ke hath hata diye & bistar se utarne lagi.uska gown bistar & uske jism ke beech fans uske ghutno se upar ho gaya & pranav ne saas ki gori tange dekhi.use pehli baar ye ehsas hua ki uski saas umra se kam dikhti thi & uska jism abhi bahut dhila nahi pada tha.rita ne jaldi se gown thik kiya & jake kamre ki khidki pe khadi ho gayi.

"please mom.sambhaliye khud ko.",pranav uske peechhe gaya & uske kandho pe hath rakh diye.usne aisa karne ka socha nahi tha par uska dil rita ke reshmi jism ko chhuna chah raha tha.uske hatho ke ehsas se rita ke jism me sansani daud gayi lekin pranav ka sath use bhala lag raha tha.pranav uske kandho ko halke-2 dabane laga tha.rita ne aankhe band kar li & us chhuan ke ehsas me khone lagi.

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kramashah.......