खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:03

खूनी हवेली की वासना पार्ट --13

गतान्क से आगे........................

चंदर अपनी माँ पर चढ़ता चला गया और उसको सिर्फ़ इतना ही करना पड़ा. बिंदिया ने उसके लंड को हाथ में पकड़ा और सीधा अपनी चूत पर रख कर अंदर लेने की कोशिश की. चंदर इशारा समझ गया और उसने भी एक हल्का सा धक्का मारा. वो बिंदिया की टाँगो के बीच बैठा हुआ था. बिंदिया ने अपने पैरों पर ज़ोर डाला और जैसे ही लंड चूत के अंदर गया, पैरों और कंधो के बल पर उसकी गांद हवा में उठती चली गयी.

जैसे जैसे बेटे का लंड माँ की चूत में घुसा, बिंदिया के आनंद की कोई सीमा ना रही. उसने लंड को अपनी चूत में महसूस करते हुए अपनी टाँगो के बीच के हिस्से को अपने बेटे के लंड पर धकेलना शुरू कर दिया. कभी उसकी गांद अपने पैरों और कंधे के बल पर उपेर नीचे होती, कभी आगे पिछे होती और कभी ऐसे गोल गोल घूमती जैसे हवा में कुच्छ घोत रही हो. उसके खुद के लिए ये कहना मुश्किल था के चंदर उसे चोद रहा था या वो चंदर को चोद रही थी.

चंदर अब बिंदिया के उपेर पूरी तरह लेटा हुआ धक्के लगा रहा था. बिंदिया ने अपनी टांगे हवा में उठाई और हाथ चंदर की कमर पर ले जाकर उसकी गांद को पकड़ लिया और उसको और अपनी तरफ खींचने लगी. नीचे से वो खुद अपनी गांद उठाते हुए चंदर के हर धक्के का जवाब दे रही थी. चंदर के हाथ उसको अपने पूरे शरीर पर महसूस हो रहे थे, उपेर से नीचे तक, जैसे वो एक औरत के नंगे शरीर का हाथों हाथों से जायज़ा ले रहा हो. कभी वो उसकी ब्लाउस के उपेर से ही चूचियाँ पकड़ता तो कभी नीचे ले जाकर उसकी नंगी गांद पर हाथ फिराने लगता.

"हे, भगवान! हे, भगवान!" जैसे जैसे धक्को में रफ़्तार आ रही थी, वैसे वैसे ही बिंदिया की आवाज़ भी तेज़ होती जा रही थी.

लंड अब बिंदिया की चूत में इतनी ज़ोर से घुस रहा था के नीचे उसका शरीर सख़्त ज़मीन पर घिसने लगा, उसका सर पिछे दीवार से टकराने लगा पर बिंदिया को कोई फरक नही पड़ा. उल्टा वो अभी भी नीचे से अपनी गांद हिलाती रही, एक पागलपन में चुदवाती रही. उसका दिमाग़ वासना और उस वासना से जुड़े पाप की गहराई में एक अजीब आनंद प्राप्त कर रहा था. चंदर का लंड उसकी चूत की वो गहराई नाप रहा था जो अब तक अछूती थी, जहाँ उसके पति का लंड कभी पहुँच ही नही पाया था. चूत की दीवारो में ऐसे गर्मी उठने लगी थी के बिंदिए को लगने लगा के उसकी चूत में आग लग जाएगी.

हर धक्के के साथ नीचे उसको अपनी गांद पर चंदर के टटटे टकराते हुए महसूस हो रहे थे. उसने अब भी चंदर की गांद को सख्ती से पकड़ रहा था और ज़्यादा से ज़्यादा लंड अपनी चूत में धकेलने की कोशिश कर रही थी. वो पूरी ताक़त से चंदर के हर धक्के का जवाब दे रही थी, बिना ये परवाह किए के उसकी चूत कई सालों से नही मारी गयी थी और उसको चोट पहुँच सकती थी. उसको उस वक़्त सिर्फ़ ये चाहिए था के चंदर का लंड ज़्यादा से ज़्यादा उसकी चूत में जाए, जितना ज़ोर से हो सके उसको चोदे.

"आआआः, चोद मुझे!" बिंदिया अपना सर पटकते हुए चिल्लाई और उसके बॉल बिखर गये. "चोद मुझे, बेटा! ज़ोर से चोद! ओह्ह्ह, चंदू ... ओह, चंदू! चोद मुझे, चोद मुझे!"

चंदर ने अपना सर नीचे झुकाते हुए उसके कंधे पर रख दिया और बिंदिया के बिखरे हुए बालों में दबा दिया. नीचे से उसने अपने दोनो हाथों से बिंदिया की गांद को मज़बूती से पकड़ रखा था ताकि पूरी ताक़त से धक्के मार सके.

बिंदिया की चूत पूरी खुल चुकी थी और लंड के चारो और एक रब्बर बंद की तरह लिपट गयी थी.

"ऊऊओ! ओह!" बिंदिया चिल्लाई. "मैं तो गयी .... गयी ! आहह, चंदू बेटे,! आज तूने अपनी माँ को चोद्कर झाड़ दिया! हे, राम! मेरी चूत ... मेरी चूत ... गयी मैं .... निकल गया!"

बिंदिया की चूत चंदर के लंड पर कस्ति चली गयी और पानी की एक धार बह चली.

उसने अपनी चूत को और सिकोड़ना शुरू कर दिया और अपनी गांद फिर हवा में उठाकर नीचे से हिलाने लगी. जैसे जैसे उसकी चूत से पानी छूट रहा था, उसकी मुँह से निकलती आवाज़ें और भी तेज़ होती जा रही थी.

और उसी पल चंदर के लंड से भी पानी बह चला.

बिंदिया ने उसको अपनी बाहों में समेटकर अपने आप से लपेट लिया और चूत में भरते हुए वीर्य को महसूस करने लगी. और जब लंड से वीर्य निकलना बंद हो गया, बिंदिया ने अपनी गांद को फिर नीचे ज़मीन पर टिकाकर कर सीधी लेट गयी और लंबी लंबी साँसें लेने लगी.

चंदर उसके उपेर लेटा हुआ भारी साँसें ले रहा था. बिंदिया ने अपने हाथों से कभी उसकी नंगी कमर को सहलाने लगी.

पायल मुश्किल से 2 साल की थी जब बिंदिया का पति खेत में साँप के काट लेने से मर गया था. ठाकुर साहब ने उसपर रहम करते हुए उसके पति की जगह बिंदिया को ही खेतों की देख रेख का काम सौंप दिया था. वो वहीं खेत के बीच बनी एक झोपड़ी में पायल के साथ रहने लगी थी.

एक दिन गाओं के एक बानिए के घर में आग लगी और काफ़ी सारे लोग जलकर मर गये. उन्ही में चंदर के माँ बाप भी थी जिनके मरने के बाद वो बिल्कुल अनाथ हो गया था. उस वक़्त वो कोई करीब 7 साल का था. बिंदिया उसपर तरस खाकर उसको अपने घर ले आई और फिर वो उसी के पास रह गया. बिंदिया को हमेशा से एक बेटे की चाह थी और चंदर को ही उसने अपना वो बेटा मान लिया.

चंदर बचपन से ही गूंगा था. कुच्छ भी बोल नही पाता था. बस गून गून की एक घुटि सी आवाज़ निकाल पता था.

ज़िंदगी फिर एक ढर्रे पर चल पड़ी. बिंदिया खेतों की चौकीदारी करती और थोड़ा बहुत जो मिलता उससे अपना और अपने 2 बच्चो का पेट भरती. ज़िंदगी से ना तो उसको कोई शिकायत थी और ना कोई चाह बाकी रह गयी थी. ज़िंदगी ने उसकी ज़िंदगी का बस एक ही रूप छ्चोड़ा था, एक माँ का रूप, और कोई रूप नही.

और बिंदिया अपनी ज़िंदगी से समझौता कर चुकी थी.

उसका पति हमेशा कहता था के बिस्तर पर आते ही वो किसी भूखी शेरनी के जैसी हो जाती है. बहुत कम ऐसा होता था के उसका पति शुरुआत करता. शुरुआत भी खुद बिंदिया ही करती थी और चुदाई के दौरान अक्सर वो ही सब कुच्छ कर रही होती थी. और हर बार यही होता था के उसका पति झाड़ जाता और उसके बाद बिंदिया अपनी चूत में उंगली चलाकर अपने आपको ठंडा करती. उसकी इन हरकतों की वजह से उसके पति ने उसको प्यार से अकेले में रंडी कहना शुरू कर दिया था.

बिंदिया अच्छी तरह जानती थी के उसके पति में कोई कमी नही थी. वो एक आम आदमी थी, आम सा डील डौल और साधारण सा स्टेमीना. वो बिस्तर पर वही करता था जो कोई आम आदमी करता है और अगर बिंदिया की जगह कोई और औरत होती तो शायद इतने से खुश रहती. पर बिंदिया को आम आदमी नही चाहिए था. उसको बिस्तर पर कोई ऐसा चाहिए था जो उसको अच्छी तरह से रगड़ सके. रात में कम से कम भी तो उसको 2-3 बार चोद सके.

एक दिन बिंदिया खाना बनाकर अपनी पति को खाना देने के लिए खेतों की तरफ जा रही थी. रास्ते में उसको एक घोड़े एक कार खड़ी दिखाई थी. कार वो जानती थी के ठाकुर खानदान की है पर वो अक्सर दोपहर को गर्मी की वजह से खेतों की तरफ नही आते थे. क्या हुआ होगा सोचकर बिंदिया कार की तरफ बढ़ी.

वो कार के नज़दीक पहुँची ही थी के उसके पावं ठिठक गये और वो फ़ौरन एक पेड़ के पिछे छुप गयी. कार की अगली सीट पर ठाकुर का भतीजा जै बैठा हुआ था. कार के दरवाज़े बंद थे और खिड़की से बिंदिया को सिर्फ़ जै के शरीर का उपरी हिस्सा नज़र आ रहा था. जिस बात की वजह से बिंदिया रुक कर छुप गयी थी वो ये थी के जै का शरीर उपेर से नंगा था. उसकी गर्दन पिछे को लुढ़की हुई थी और आँखें बंद थी. उसका एक हाथ उपेर नीचे हिल रहा था.

बिंदिया जानती थी के जै क्या कर रहा था. वो अपना लंड हिला रहा था. लड़के अक्सर खुद को ठंडा करने के लिए ऐसा करते हैं ये उसके पति ने उसको बताया था, बल्कि एक दिन करके भी दिखाया था.

बिंदिया मुस्कुराइ और वापिस जाने के लिए पलटी.

बिंदिया मूड ही रही थी के कुच्छ ऐसा हुआ के उसका पावं अपनी जगह पर जम गये.

एक पल के लिए जै की गोद में एक सर उपेर को उठा और फिर नीचे झुक गया. बिंदिया को समझने में एक पल नही लगा के सर किसी औरत का था. वो फिर वहीं रुक कर देखने लगी.

अगले कुच्छ पलों में वो सर कई बार उपेर को आया और फिर नीचे चला गया. बिंदिया देख चुकी थी के जै ने उस सर को पकड़ रखा था और क्यूंकी वो सर उपेर नीचे हो रहा था, इसलिए जै के हाथ भी हिल रहे थे. मतलब वो अपना हिला नही रहा था. कार में उसके साथ कोई और भी थी पर कौन? और क्या कर रही थी?

पहले सवाल का जवाब बिंदिया ने खुद अपने आपको दे दिया. ठाकुर के खेतों में कई सारी गाओं की औरतें काम करती थी तो ये कोई हैरत की बात नही थी के उनमें से कोई एक जै के साथ लगी हुई थी. पर दूसरा सवाल अब भी बाकी था. कार में वो औरत कर क्या रही थी? इसका जवाब उसको जै ने दे दिया.

"पूरा मुँह में लो ... ज़ोर से चूसो" जै की आवाज़ आई.

और बिंदिया सोच में पड़ गयी.

जै की आवाज़ धीरे धीरे तेज़ होने लगी और उसका शरीर काँपने लगा. बिंदिया आँख जमाए पेड़ के पिछे खड़ी सब देख रही थी

"बस बस" जै ने कहा "रूको नही तो मेरा निकल जाएगा. कपड़े उतारो"

बिंदिया एक औरत थी और बातें करना तो कुद्रत ने खुद उसकी फ़ितरत में शामिल किया था. वो ये जानने के लिए मरी जा थी थी के गाओं की कौन सी औरत

जै के साथ मुँह काला कर रही थी. उसने गौर से देखने की कोशिश की कार में कौन थी ताकि बाद में बातें बना सके.

तभी जै आगे को हुआ और उसने कार का दरवाज़ा खोला.

"कपड़े उतारो" उसने अपने साथ कार में बैठी औरत से कहा

इससे पहले के जै उसको वहाँ देखता, बिंदिया फ़ौरन घूमी और चुप चाप वहाँ से निकल ली. वरना जै अगर उसको देख लेता तो बिंदिया की खैर नही थी. ये जानना के कार में कौन चुद रही थी इतना ज़रूरी नही था के बिंदिया अपनी जान की बाज़ी लगाए और पकड़े जाने का ख़तरा मोल ले.

पर जाते जाते एक लम्हे के लिए, और सिर्फ़ एक लम्हे के लिए, बिंदिया को कुच्छ ऐसा नज़र आया जिसने उसको सोचने पर मजबूर कर दिया.

जै उस औरत को उठाने की कोशिश कर रहा था और जहाँ से बिंदिया देख रही थी वहाँ से उसको जै नज़र आ रहा था. क्यूंकी वो उठकर सीधा बैठ गया था तो कार में जो भी औरत थी वो उसके पिछे छुप सी गयी थी. बिंदिया को नज़र आई सिर्फ़ उसकी सारी.

सारी देखकर ही बिंदिया समझ गयी थी के वो काफ़ी महेंगी टाइप की थी, रेशमी सारी, जो पहेन्ने की खेत में काम करने वाली किसी औरत की औकात नही थी.

बिंदिया खाने का डब्बा लिए उस तरफ बढ़ी जहाँ उसका पति काम कर रहा था. पूरे रास्ते उसके कानो में बस एक ही बात गूँझ रही थी. जै के शब्द.

"पूरा मुँह में लो ... ज़ोर से चूसो"

थोड़ी देर बाद वो अपने पति के पास पहुँची.

"आ गयी तुम" उसके पति ने कहा "बड़ी भूख लगी हुई थी. आज इतना वक़्त कैसे लग गया?"

बिंदिया ने कोई जवाब नही दिया और अपने पति का हाथ पकड़कर उस पेड़ की तरफ चल पड़ी जहाँ वो रोज़ाना उसको खाना परोसा करती थी.

"अर्रे क्या हो गया? हाथ तो धो आऊँ" उसके पति ने पास चल रहे ट्यूब वेल की तरफ इशारा किया पर बिंदिया ने ये बात अनसुनी कर दी और उसको लेकर पेड़ के नीचे पहुँची. खाने का डब्बा एक तरफ रखकर उसके अपने पति को धकेल कर पेड़ के सहारे खड़ा कर दिया और खुद उसके सामने अपने घुटनो पर बैठ गयी.

"क्या कर रही हो?" उसके पति ने पुछा पर बिंदिया ने उसकी बात का जवाब उसकी लूँगी को खोलकर दिया. अगले ही पल लूँगी ज़मीन पर पड़ी थी और पातिदेव पेड़ के सहर पूरे नंगे खड़े थे.

"अर्रे कोई देख लेगा" उसने झुक कर लूँगी उठाने की कोशिस की पर बिंदिया ने धक्का देकर उसको सीधा खड़ा कर दिया.

"सस्शह" हाथ अपने होंठों पर रख कर उसने अपने पति को चुप रहने का इशारा किया और उसके लंड पर नज़र डाली.

छ्होटा सा लंड मुरझाया पड़ा था.

"कर क्या रही हो?" उसके पति ने पुछा

बिंदिया आगे को बढ़ी और अपने पति की जाँघो को चूमा. वो अब भी अपना मंन नही बना पा रही थी के क्या वो ऐसा कर सकती है. उसने कभी ये काम किया नही था. किया क्या उसने तो सुना भी नही था. आज पहली बार ज़िंदगी में इस बात का अंदाज़ा हुआ था के ऐसा भी होता है .....

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --13

gataank se aage........................

Chander apni maan par chadhta chala gaya aur usko sirf itna hi karna pada. Bindiya ne uske lund ko haath mein pakda aur sidha apni choot par rakh kar andar lene ki koshish ki. Chander ishara samajh gaya aur usne bhi ek halka sa dhakka mara. vo Bindiya ki taango ke beech betha hua tha. Bindiya ne apne pairon par zor daala aur jaise hi lund choot ke andar gaya, pairon aur kandho ke bal par uski gaand hawa mein uthti chali gayi.

Jaise jaise bete ka lund maan ki choot mein ghusa, Bindiya ke aanand ki koi seema na rahi. Usne lund ko apni choot mein mehsoos karte hue apni taango ke beech ke hisse ko apne bete ke lund par dhakelna shuru kar diya. Kabhi uski gaand apne pairon aur kandhe ke bal par uper neeche hoti, kabhi aage pichhe hoti aur kabhi aise gol gol ghoomti jaise hawa mein kuchh ghot rahi ho. Uske khud ke liye ye kehna mushkil tha ke Chander use chod raha tha ya vo Chander ko chod rahi thi.

chander ab Bindiya ke uper poori tarah leta hua dhakke laga raha tha. Bindiya ne apni taange hawa mein uthayi aur haath Chander ki kamar par le jakar uski gaand ko pakad liya aur usko aur apni taraf khinchne lagi. Neeche se vo khud apni gaand uthate hue Chander ke har dhakke ka jawab de rahi thi. Chander ke haath usko apne poore shareer par mehsoos ho rahe the, uper se neeche tak, jaise vo ek aurat ke nange shareer ka haathon haathon se jaayza le raha ho. Kabhi vo uski blouse ke uper se hi chhatiyan pakadta to kabhi neeche le jakar uski nangi gaand par haath phirane lagta.

"Hey, Bhagwan! Hey, Bhagwan!" Jaise jaise dhakko mein raftar aa rahi thi, vaise vaise hi Bindiya ki aawaz bhi tez hoti ja rahi thi.

Lund ab Bindiya ki choot mein itni zor se ghus raha tha ke neeche uska shareer sakht zameen par ghisne laga, uska sar pichhe deewar se takrane laga par Bindiya ko koi farak nahi pada. Ulta vo abhi bhi neeche se apni gaand hilati rahi, ek pagalpan mein chudwati rahi. Uska dimaag vaasna aur us vaasna se jude paap ki gehrai mein ek ajeeb aanand prapt kar raha tha. Chander ka lund uski choot ki vo gehrai naap raha tha jo ab tak achhuti thi, jahan uske pati ka lund kabhi pahunch hi nahi paya tha. Choot ki deewaro mein aise garmi uthne lagi thi ke Bindiye ko lagne laga ke uski choot mein aag lag jaayegi.

Har dhakke ke saath neeche usko apni gaand par Chander ke tatte takrate hue mehsoos ho rahe the. Usne ab bhi Chander ki gaand ko sakhti se pakad raha tha aur zyada se zyada lund apni choot mein dhakelne ki koshish kar rahi thi. Vo poori taqat se Chander ke har dhakke ka jawab de rahi thi, bina ye parwah kiye ke uski choot kai saalon se nahi maari gayi thi aur usko chot pahunch sakti thi. Usko us waqt sirf ye chahiye tha ke Chander ka lund zyada se zyada uski choot mein jaaye, jitna zor se ho sake usko chode.

"Aaaaah, Chod mujhe!" Bindiya apna sar patakte hue chillayi aur uske baal bikhar gaye. "Chod mujhe, beta! Zor se chod! Ohhh, Chandu ... oh, Chandu! chod mujhe, chod mujhe!"

Chander ne apna sar neeche jhukte hue uske kandhe par rakh diya aur Bindiya ke bikhre hue baalon mein daba diya. Neeche se usne apne dono haathon se Bindiya ki gaand ko mazbooti se pakad rakha tha taaki poori taaqat se dhakke maar sake.

Bindiya ki choot poori khul chuki thi aur lund ke chaaro aur ek rubber band ki tarah lipat gayi thi.

"Ooooo! Ohhhhh!" Bindiya chillayi. "Main toh gayi .... gayi ! Aahhh, Chandu bete,! Aaj tune apni maan ko chodkar jhaad diya! Hey, Ram! Meri choot ... Meri choot ... Gayi main .... nikal gaya!"

Bindiya ki choot Chander ke lund par kasti chali gayi aur paani ki ek dhaar beh chali.

Usne apni choot ko aur sikodna shuru kar diya aur apni gaand phir hawa mein uthakar neeche se hilane lagi. Jaise jaise uski choot se paani chhut raha tha, uski munh se nikalte aawazen aur bhi tez hoti ja rahi thi.

Aur usi pal Chander ke lund se bhi paani beh chala.

Bindiya ne usko apni baahon mein sametkar apne aap se lapet liya aur choot mein bharte hue veerya ko mehsoos karne lagi. Aur jab Lund se veerya nikalna band ho gaya, Bindiya ne apni gaand ko phir neeche zameen par tikar kar sidhi let gayi aur lambi lambhi saansen lene lagi.

Chander uske uper leta hua bhaari saansen le raha tha. Bindiya ne apne haathon se kabhi uski nangi kamar ko sehlane lagi.

Payal mushkil se 2 saal ki thi jab Bindiya ka pati khet mein saanp ke kaat lene se mar gaya tha. Thakur Sahab ne uspar reham karte hue uske pati ki jagah Bindiya ko hi kheton ki dekh rekh ka kaam saunp diya tha. Vo vahin khet ke beech bani ek jhopdi mein Payal ke saath rehne lagi thi.

Ek din gaon ke ek baniye ke ghar mein aag lagi aur kaafi saare log jalkar mar gaye. Unhi mein Chander ke maan baap bhi thi jinke marne ke baad vo bilkul anaath ho gaya tha. Us waqt vo koi kareeb 7 saal ka tha. Bindiya uspar taras khakar usko apne ghar le aayi aur phir vo usi ke paas reh gaya. Bindiya ko hamesha se ek bete ki chah thi aur Chander ko hi usne apna vo beta maan liya.

Chander bachpan se hi goonga tha. Kuchh bhi bol nahi pata tha. Bas goon goon ki ek ghuti si aawaz nikal pata tha.

Zindagi phir ek dharre par chal padi. Bindiya kheton ki chaukadari karti aur thoda bahut jo milta usse apna aur apne 2 bachcho ka pet bharti. zindagi se na toh usko koi shikayat thi aur na koi chaah baaki reh gayi thi. Zindagi ne uski zindagi ka bas ek hi roop chhoda tha, ek maan ka roop, aur koi roop nahi.

Aur Bindiya apni zindagi se samjhauta kar chuki thi.

Uska pati hamesha kehta tha ke bistar par aate hi vo kisi bhookhi sherni ke jaisi ho jaati hai. Bahut kam aisa hota tha ke uska pati shuruat karta. Shuruat bhi khud Bindiya hi karti thi aur chudai ke dauraan aksar vo hi sab kuchh kar rahi hoti thi. Aur har baar yahi hota tha ke uska pati jhad jaata aur uske baad Bindiya apni choot mein ungli chalakar apne aapko thanda karti. Uski in harkaton ki wajah se uske pati ne usko pyaar se akele mein randi kehna shuru kar diya tha.

Bindiya achhi tarah jaanti thi ke uske pati mein koi kami nahi thi. Vo ek aam aadmi thi, aam sa deel daul aur sadharan sa stemina. Vo bistar par vahi karta tha joi koi aam aadmi karta hai aur agar Bindiya ki jagah koi aur aurat hoti toh shayad itne se khudh rehti. Par Bindiya ko aam aadmi nahi chahiye tha. Usko bistar par koi aisa chahiye tha jo usko achhi tarah se ragad sake. Raat mein kam se kam bhi toh usko 2-3 baar chod sake.

Ek din Bindiya khana banakar apni pati ko khana dene ke liye kheton ki taraf ja rahi thi. Raaste mein usko ek ghode ek car khadi dikhayi thi. Car vo jaanti thi ke Thakur Khandaan ki hai par vo aksar dopahar ko garmi ki vajah se kheton ki taraf nahi aate the. Kya hua hoga sochkar Bindiya car ki taraf badhi.

Vo car ke nazdeek pahunchi hi thi ke uske paon thithak gaye aur vo fauran ek ped ke pichhe chhup gayi. Car ki agli seat par Thakur ka bhateeja Jai betha hua tha. Car ke darwaze band the aur khidki se Bindiya ko sirf Jai ke shareer ka upari hissa nazar aa raha tha. Jis baat ki vajah se Bindiya ruk kar chhup gayi thi vo ye thi ke Jai ka shareer uper se nanga tha. Uski gardan pichhe ko ludhki hui thi aur aankhen band thi. Uska ek haath uper niche hil raha tha.

Bindiya jaanthi thi ke Jai kya kar raha tha. Vo apna lund hila raha tha. Ladke aksar khud ko thanda karne ke liye aisa karte hain ye uske pati ne usko bataya tha, balki ek din karke bhi dikhaya tha.

Bindiya muskurayi aur vaapis jaane ke liye palti.

Bindiya mud hi rahi thi ke kuchh aisa hua ke uska paon apni jagah par jam gaye.

Ek pal ke liye Jai ke god mein ek sar uper ko utha aur phir niche jhuk gaya. Bindiya ko samajhne mein ek pal nahi laga ke sar kisi aurat ka tha. Vo phir vahin ruk kar dekhne lagi.

Agle kuchh palon mein vo sar kai baar uper ko aaya aur phir niche chala gaya. Bindiya dekh chuki thi ke Jai ne us sar ko pakad rakha tha aur kyunki vo sar uper neeche ho raha tha, isliye Jai ke haath bhi hil rahe the. Matlab vo apna hila nahi raha tha. Car mein uske saath koi aur bhi thi par kaun? Aur kya kar rahi thi?

Pehle sawal ka jawab Bindiya ne khud apne aapko de diya. Thakur ke kheton mein kai saari gaon ki auraten kaam karti thi toh ye koi hairat ki baat nahi thi ke unmein se koi ek Jai ke saath lagi hui thi. Par doosra sawal ab bhi baaki tha. Car mein vo aurat kar kya rahi thi? Iska jawab usko Jai ne de diya.

"Poora munh mein lo ... zor se chooso" Jai ki aawaz aayi.

Aur Bindiya soch mein pad gayi.

Jai ki aawaz dheere dheere tez hone lagi aur uska shareer kaanpne laga. Bindiya aankh jamaye ped ke pichhe khadi sab dekh rahi thi

"Bas bas" Jai ne kaha "Ruko nahi toh mera nikal jaayega. Kapde utaaro"

Bindiya ek aurat thi aur baaten karna toh kudrat ne khud uski fitrat mein shaamil kiya tha. Vo ye jaanne ke liye mari ja thi thi ke gaon ki kaun se aurat

Jai ke saath munh kaala kar rahi thi. Usne gaur se dekhne ki koshish ki car mein kaun thi taaki baad mein baaten bana sake.

Tabhi Jai aage ko hua aur usne car ka darwaza khola.

"Kapde utaaro" Usne apne saath car mein bethi aurat se kaha

Isse pehle ke Jai usko vahan dekhta, Bindiya fauran ghoomi aur chup chaap vahan se nikal li. Varna Jai agar usko dekh leta toh Bindiya ki khair nahi thi. Ye jaanna ke car mein kaun chud rahi thi itna zaroori nahi tha ke Bindiya apni jaan ki baazi lagaye aur pakde jaane ka khatra mol le.

Par jaate jaate ek lamhe ke liye, aur sirf ek lamhe ke liye, Bindiya ko kuchh aisa nazar aaya jisne usko sochne par majboor kar diya.

Jai us aurat ko uthane ki koshish kar raha tha aur jahan se Bindiya dekh rahi thi vahan se usko Jai nazar aa raha tha. Kyunki vo uthkar sidha beth gaya tha toh car mein jo bhi aurat thi vo uske pichhe chhup si gayi thi. Bindiya ko nazar aayi sirf uski saree.

Saree dekhkar hi Bindiya samajh gayi thi ke vo kaafi mehengi type ki thi, reshmi saaree, jo pehenne ki khet mein kaam karne wali kisi aurat ki aukaat nahi thi.

Bindiya khaane ka dabba liye us taraf badhi jahan uska pati kaam kar raha tha. Poore raaste uske kaano mein bas ek hi baat goonjh rahi thi. Jai ke shabd.

"Poora munh mein lo ... zor se chooso"

Thodi der baad vo apne pati ke paas pahunchi.

"Aa gayi tum" Uske pati ne kaha "Badi bhookh lagi hui thi. Aaj itna waqt kaise lag gaya?"

Bindiya ne koi jawab nahi diya aur apne pati ka haath pakadkar us ped ki taraf chal padi jahan vo rozana usko khana parosa karti thi.

"Arrey kya ho gaya? Haath toh dho aaoon" Uske pati ne paas chal rahe tube well ki taraf ishara kiya par Bindiya ne ye baat ansuni kar di aur usko lekar ped ke niche pahunchi. Khaane ka dabba ek taraf rakhkar uske apne pati ko dhakel kar ped ke sahare khada kar diya aur khud uske saamne apne ghutno par beth gayi.

"Kya kar rahi ho?" Uske pati ne puchha par Bindiya ne uski baat ka jawab uski lungi ko kholkar diya. Agle hi pal lungi zameen par padi thi aur patidev ped ke sahar poore nange khade the.

"Arrey koi dekh lega" Usne jhuk kar lungi uthane ki koshi ki par Bindiya ne dhakkar dekar usko sidha khada kar diya.

"Ssshhhh" Haath apne honthon par rakh kar usne apne pati ko chup rehne ka ishara kiya aur uske lund par nazar daali.

Chhota sa lund murjhaya pada tha.

"Kar kya rahi ho?" Uske pati ne puchha

Bindiya aage ko badhi aur apne pati ki jaangho ko chooma. Vo ab bhi apna mann nahi bana pa rahi thi ke kya vo aisa kar sakti hai. Usne kabhi ye kaam kiya nahi tha. Kiya kya usne toh suna bhi nahi tha. Aaj pehli baar zindagi mein is baat ka andaza hua tha ke aisa bhi hota hai .....

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:04

खूनी हवेली की वासना पार्ट --14

गतान्क से आगे........................

एक हाथ से उसने लंड पकड़ा और धीरे से हिलाया. वो जानती थी के उसके पति को उसका लंड हिलाना बहुत पसंद है और ये नज़र भी आ गया. लंड पकड़ते ही पातिदेव की आँखें बंद हो गयी और वो पेड़ के सहर कमर टीका कर खड़ा हो गया.

"ओह रांड़ साली ....." आवाज़ आई "हर जगह चुदने को तैय्यार रहती है. पर नीचे बैठी क्या कर रही है चल घाघरा उठा, जल्दी से चोद देता हूँ तुझे. फिर मुझे काम है बहुत"

"स्शह," बिंदिया ने फिर इशारा किया. "खड़े रहो और चुप चाप मज़े लो."

वो उसका लंड हिलाती रही और अपनी होंठों से उसकी जाँघो को चूमती रही. खुद नीचे उसकी अपनी चूत भी गीली हो चुकी थी और लंड के लिए तैय्यार थी पर इस वक़्त बिंदिया के दिमाग़ में कुच्छ और था. वो एक ऐसा काम करने जा रही थी जो उसने अपनी शादी शुदा ज़िंदगी में कभी नही किया था.

लंड अब अकड़ना शुरू हो गया था. बिंदिया का हाथ तेज़ी से उपेर नीचे हो रहा था.

"हिलाके ही निकाल देगी क्या?" उसके पति की आवाज़ आई पर बिंदिया अपने काम में मगन थी.

धीरे धीरे बिंदिया ने अपना मुँह आगे करना शुरू किया. लंड उसके चेहरे से बस कुच्छ ही दूर था. हाथ अब भी लंड पर उपेर नीचे हो रहा था और लंड के साथ साथ नीचे लटके टटटे भी झूल रहे थे. बिंदिया के हलक से आह की आवाज़ निकली और उसने लंड को और तेज़ी से हिलाया ताकि वो अच्छी तरह से खड़ा हो सके. उसके पति के मुँह से आती आवाज़ों से वो अच्छी तरह जानती थी के उसको बहुत मज़ा आ रहा है.

कैसी शुरू करूँ सोचते हुए बिंदिया ने अपनी जीभ एक बार अपने होंठों पर घुमाई और नीचे हिलते टट्टो पर धीरे से फिराई. जीभ पर अजीब सा नमकीन टेस्ट आ गया. उसके एक बार फिर अपनी जीभ बाहर निकाली और फिर वही काम किया.

हाथ अब भी तेज़ी से लंड हिला रहा था.

उसने अब लगातार टट्टो पर जीभ घुमानी शुरू कर दी. सामने खड़े उसके पति ने अपनी आँखें खोलकर देखा और चौंक पड़ा.

"क्या कर रही हो?" वो हिलने लगा पर एक हाथ से बिंदिया ने फिर उसको पेड़ के सहारे धकेल दिया.

जब वो फिर चुप चाप खड़ा होकर बिंदिया को हैरत से देखने लगा तो बिंदिया ने अपना एक हाथ उसकी टाँगो के बीच से पिछे घुमाया और उसकी गांद को पकड़ लिया. टट्टो को वो अब भी चाट रही थी और जिस तरह से लंड उसके हाथ में अकड़ रहा था वो जानती थी के बहुत जल्द खेल ख़तम हो जाएगा और उसका हाथ वीर्य से भर जाएगा.

अब भी उसको समझ नही आ रहा था के आगे क्या करे. करे या ना करे?

पर अब तक खुद उसके दिल में भी ये भावना जाग चुकी थी के लंड को एक बार मुँह में लेके देखे. देखे के कैसा लगता है लंड चूसना. बिस्तर पर हमेशा

वो कुच्छ नया करने को तैय्यार रहती थी और ये तो पूरी तरह नया था.

अगर कार में वो औरत जै का चूस सकती है तो मैं भी अपनी पति का चूस ही सकती हूँ, उसने सोचा. उसका लंड, छ्होटा सा ज़रूर था पर कितना अकड़ गया था.

एक आह की आवाज़ के साथ बिंदिया ने अपनी जीभ टट्टो पर पूरी तरह से घुमाई, उन्हें अच्छे से चॅटा और दोनो बॉल्स को अपने मुँह में भर लिया.

"आआहह" उसके पति की आवाज़ आई पर उसने बिंदिया को रोकने की कोई कोशिश नही की.

मुँह में दोनो बॉल्स को लेटे ही बिंदिया के शरीर में एक अजीब सा करेंट दौड़ गया जो उसके सर से होता हुआ सीधा उसकी टाँगो के बीच जाकर रुका. अगले ही पल उसकी

चूत से भी पानी बह चला. उसके मुँह से अजीब सी आवाज़ निकल पड़ी जो मुँह में भरे हुए टट्टो की वजह से पूरी तरह बाहर ना आई. हाथ अब भी तेज़ी के साथ लंड हिला रहा था.

अब उसके हाथ के साथ साथ उसके पति ने भी अपनी गांद हिलानी शुरू कर दी थी जैसे बिंदिया के हाथ को ही चोद रहा था. बिंदिया ने अपना मन पक्का किया और उसके टट्टो को मुँह से निकाला.

वो लंड मुँह में लेने की सोच ही रही थी के एक वीर्य की तेज़ धार सीधी उसके मुँह पर आकर गिरी.

दूसरी उसके सर पर.

तीसरी सीधी उसके होंठो पर.

वो थोड़ी पिछे को हुई और उसके बाद उसके पति का वीर्य लंड से निकलता हुआ सीधा उसके ब्लाउस पर गिरने लगा. कुच्छ ब्लाउस के उपेर गले के पास गिरा और बहता हुआ नीचे उसकी छातियो के बीच चला गया.

बिंदिया मन मसोस कर रह गयी. जो काम वो करना चाह रही थी वो पूरा कर नही पाई.

उस दिन के बाद बिंदिया की दोनो ख्वाहिश सिर्फ़ ख्वाहिश ही रह गयी.

उस दिन के बाद उसके पति ने कभी उसको अपना मुँह में नही लेने दिया. जब भी

बिंदया ऐसी कोशिश करती , वो उसको ये कहके रोक देता के ऐसा करना ग़लत है. बिंदिया मन मारकर रह जाती.

दूसरा जब भी वो अपने पति से ये बात करती के उस दिन कार में जै के साथ कौन औरत हो सकती थी, वो हर बार ये कहकर बात टाल जाता ले उन्होने ठाकुर खानदान का नमक खाया है और उनके खिलाफ बोलना ठीक नही है.

और कुच्छ दिन बाद ही उसका पति साँप के काट लेने से इस दुनिय से चलता हुआ.

कुच्छ दिन तक बिंदिया अपने उस झोपड़ी में अपनी बेटी के साथ रही और फिर चंदर को गोद ले आई. चंदर को वो प्यार से चंदू कहकर बुलाती थी. वो बचपन से ही गूंगा था. कुच्छ बोल नही सकता था पर दिमाग़ का बहुत तेज़ था. हर काम बड़ी तेज़ी से सीखता और बहुत मेहनत से करता. बिंदिया के साथ साथ वो भी ठाकुर के खेतों में काम करने लगा.

एक दिन बिंदिया को खबर मिली के ठकुराइन को सीढ़ियों से गिरने की वजह से बहुत चोट आई है और वो बिस्तर पर हैं. ठाकुर साहब का बड़ा बेटा पुरषोत्तम उन दिनो विदेश में था. इलाज करने के लिए ठकुराइन को भी अपने बेटे के पास विदेश भेज दिया गया. ठाकुर साहब की तरफ से बिंदिया को फरमान मिल चुका था के जैसे ही ठकुराइन वापिस आए, वो उनकी देखभाल के लिए हवेली में ही आकर रहना शुरू कर दे.

इन दिनो के आस पास ही ऐसा कुच्छ हुआ के बिंदिया का अपने मुँह बोले बेटे चंदू के साथ रिश्ता बदल गया.

चंदर तब करीब 17 साल का था. बिंदिया दोपहर के करीब खाना लेकर खेत के उस तरफ चली जहाँ चंदर काम कर रहा था. ये उसकी बहुत पुरानी आदत आज भी वैसे ही थी. कई साल पहले वो अपनी पति के लिए खाना लेकर जाती थी और अब अपने बेटे के लिए.

वो खेत में पहुँची तो चंदर कहीं दिखाई नही दिया. उसको ढूँढती बिंदिया ट्यूब वेल की तरफ गयी तो चंदर मिल गया पर वो अकेला नही था.

उसके साथ सुनीता थी.

सुनीता गाओं की ही एक लड़की थी और चंदर से करीब 3 साल बड़ी थी. वो उस वक़्त ट्यूब वेल के नीचे बैठी नहा रही थी. चंदर किनारे पर बैठा उसको देख रहा था.

"चंदू चल खाना खा ले बेटा" कहती हुई बिंदिया नज़दीक आई. चंदू ने उसकी आवाज़ सुनी तो फ़ौरन पलटकर उसको देखा. वो एक पल के लिए खड़ा होने लगा पर फिर अपनी जगह पर बैठ गया.

सुनीता भी ट्यूब वेल के नीचे से निकल कर बाहर आ गयी. उसने उस वक़्त एक हल्के गुलाबी रंग की सलवार कमीज़ पहेन रखी थी और पूरी तरह भीगी हुई थी.

"आजा तू भी खा ले" बिंदिया ने सुनीता से कहा. सुनीता ने फ़ौरन हां में सर हिला दिया.

"आप चलो, मैं हाथ मुँह धोके आता हूँ" चंदू ने इशारे से बिंदिया को कहा.

"जल्दी आना" बिंदिया ने उसको जवाब दिया और सुनीता को साथ लेकर उस तरफ चल पड़ी जहाँ वो खाना छ्चोड़ कर आई थी.

उनके पिछे पिछे ही चंदू भी आ गया और उसके आते ही बिंदिया समझ गयी के वो उनके साथ क्यूँ नही आया था. उसका पाजामा सामने की तरफ से अजीब तरह उठा हुआ था.

बिंदिया समझ गयी के ऐसा क्यूँ है और क्यूँ चंदू सुनीता के पास बैठा हुआ था. सुनीता शरीर से पूरी तरह औरत थी और चंदू उसके भीगे हुए शरीर को निहार रहा था.

बिंदिया को शरम भी आई और हैरत भी हुई. जिस चंदू को वो बच्चा समझती थी वो कब इतना जवान हो गया था उसको खबर ही ना हुई थी..

वो तीनो ही खाना खाने के लिए बैठ गये. बिंदिया ने महसूस किया के खाने खाते हुए भी चंदू नज़र बचा कर बार बार सुनीता की तरफ देख रहा था जो अभी भी भीगी हुई थी. गुलाबी रंग के उसके सूट में से उसके शरीर का हर अंग सॉफ सॉफ नज़र आ रहा था.

बिंदिया ने दिल ही दिल में चंदू को दोष नही दिया. सुनीता शकल से खूबसूरत थी और शरीर पूरी तरह भरा हुआ था. पर चंदू अभी काफ़ी छ्होटा था, कम से कम बिंदिया को तो ऐसा ही लगता था.

कुच्छ देर बाद खाना खाकर चंदू उठ गया और सुनीता भी चली गयी. बिंदिया बर्तन समेट कर वापिस घर आने लगी तो चंदू ने इशारे से कहा के वो भी घर जाकर थोड़ी देर सोना चाहता है. वो दोनो साथ साथ वापिस झोपड़ी में पहुँचे.

चंदू झोपड़ी में पड़ी चारपाई पर आँखें मूंद कर लेट गया. दोपहर का वक़्त था. थोड़ी देर बाद बिंदिया भी आराम करने के इरादे से ज़मीन पर चादर बिच्छा कर लेट गयी और उसकी आँख लग गयी.

थोड़ी देर बाद उसकी आँख खुली तो चंदू चारपाई पर नही था. शायद खेत पर चला गया हो, बिंदिया ने सोचा. वो उठी और उसको ढूँढती झोपड़ी के पिछे आई तो हैरत से उसकी आँखें खुली रह गयी.

झोपड़ी के पिछे बैठा चंदू अपना लंड हिला रहा था.

बिंदिया के आने की आवाज़ सुनकर वो उठा और खड़ा हो गया पर अपना लंड च्छुपाने की कोई कोशिश नही की. बिंदिया को भी जाने क्या सूझा पर वो भी वहीं खड़ी एकटूक चंदर की तरफ देखती रही. उसका लंड अब भी उसके हाथ में था जिसको वो बेशर्मी से बिंदिया के सामने ही हिला रहा था.

बिंदिया को अपनी और चंदू की हालत का अंदाज़ा तब हुआ जब उसकी खुद की टाँगो के बीच उसे गीला पन महसूस हुआ. उस गीलेपन ने बिंदिया को एहसास दिलाया के वो अपने मुँह बोले बेटे को देखकर ही गरम हो रही थी.

वो फ़ौरन ही पलटी और झोपड़ी के अंदर आ गयी.

पीछे पीछे ही चंदू भी अंदर आ गया और उस दिन मुँह बोली माँ और मुँह बोले बेटे का रिश्ता ख़तम होकर दोनो के बीच एक आदमी और औरत का रिश्ता बन गया.

........................

ख़ान जानता था के उसके पास टाइम बहुत कम था. जै की पोलीस रेमांड ख़तम होने वाली थी मतलब उसपर मुक़दमा

शुरू होने के दिन काफ़ी नज़दीक आ गये.

और ख़ान ये भी जानता था के ये मुक़दमा ज़्यादा दिन नही चलने वाला. जल्द से जल्द केस को निपटाया जाएगा और जै को फाँसी पर टंगा दिया जाएगा.

"मुझे समझ नही आ रहा के कहाँ से शुरू करूँ यार" वो जै से मिलने जैल आया हुआ था "जिधर से भी घूमके देखूं, हर किसी का कोई ना कोई अलीबी है. हर कोई क़त्ल के वक़्त या तो किसी और के साथ था या उसको कहीं और किसी

ना किसी ने देखा था. क़त्ल के वक़्त ठाकुर साहब के वक़्त तुम्हारे सिवा कोई भ उनके आस पास नही था"

"बाकी लोगों से बात की आपने?" जै ने पुछा

"कहाँ यार" ख़ान ने साँस छ्चोड़ते हुए कहा "साला पोलीस इन्वेस्टिगेशन के लिए भी ऐसे बुलाना पड़ता है जैसे कहीं शादी में बुला रहे हों और फिर साले आते भी नही. ठाकुर ना हुए राजा हो गये यहाँ के"

"उनका रुतबा इस इलाक़े में राजा से कम नही है ख़ान साहब" जै ने कहा "मेरी मानिए तो पुच्छने का काम नौकरों से

शुरू कीजिए"

उसी दिन शाम को ख़ान अपने घर में बैठा फिर से पहेली सुलझाने की कोशिश कर रहा था. सामने डाइयरी थी और हाथ में पेन.

वो बड़ी खुशी खुशी ये थेओरी अपना लेता के ठाकुर को बाहर के किसी आदमी ने मारा है. ऐसा हो सकता था. ख़ान ने हवेली का पूरा जायज़ा लिया था. चारों तरफ एक तकरीबन 15 फुट ऊँची दीवार थे जिसपर बिजली के तार थे. उन तारों में 24 घंटे करेंट रहता था यानी किसी का भी दीवार कूदकर आ पाना ना-मुमकिन था.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --14

gataank se aage........................

Ek haath se usne lund pakda aur dheere se hilaya. Vo jaanti thi ke uske pati ko uska lund hilana bahut pasand hai aur ye nazar bhi aa gaya. Lund pakadte hi patidev ki aankhen band ho gayi aur vo ped ke sahar kamar tika kar khada ho gaya.

"Oh raand saali ....." Aawaz aayi "Har jagah chudne ko taiyyar rehti hai. Par niche bethi kya kar rahi hai Chal ghaghra utha, jaldi se chod deta hoon tujhe. Phir mujhe kaam hai bahut"

"Sshhh," Bindiya ne phir ishara kiya. "Khade raho aur chup chap maze lo."

Vo uska lund hilati rahi aur apni honthon se uski jaangho ko choomti rahi. Khud neeche uski apni choot bhi geeli ho chuki thi aur lund ke liye taiyyar thi par is waqt Bindiya ke dimag mein kuchh aur tha. Vo ek aisa kaam karne ja rahhi thi jo usne apni shaadi shuda zindagi mein kabhi nahi kiya tha.

Lund ab akadna shuru ho gaya tha. Bindiya ka haath tezi se uper neeche ho raha tha.

"Hilake hi nikaal degi kya?" Uske pati ki aawaz aayi par Bindiya apne kaam mein magan thi.

Dheere dheere Bindiya ne apna munh aage karna shuru kiya. Lund uske chehre se bas kuchh hi door tha. Haath ab bhi lund par uper niche ho raha tha aur lund ke saath saath niche latke tatte bhi jhool rahe the. Bindiya ke halak se aah ki aawaz nikli aur usne lund ko aur tezi se hilaya taaki vo achhi tarah se khada ho sake. Uske pati ke munh se aati aawazon se vo achhi tarah jaanti thi ke usko bahut maza aa raha hai.

Kaisi shuru karun sochte hue Bindiya ne apni jeebh ek baar apne honthon par ghumayi aur neeche hilte tatto par dheere se phirayi. Jeebh par ajeeb sa namkeen taste aa gaya. Uske ek baar phir apni jeebh bahar nikali aur phir vahi kaam kiya.

Haath ab bhi tezi se lund hila raha tha.

Usne ab lagatar tatto par jeebh ghumani shuru kar di. Saamne khade uske pati ne apni aankhen kholkar dekha aur chaunk pada.

"Kya kar rahi ho?" Vo hilne laga par ek haath se Bindiya ne phir usko ped ke sahare dhakel diya.

Jab vo phir chup chap khada hokar Bindiya ko hairat se dekhne laga toh Bindiya ne apna ek haath uski taango ke beech se pichhe ghumaya aur uski gaand ko pakad liya. Tatto ko vo ab bhi chaat rahi thi aur jis tarah se lund uske haath mein akad raha tha vo jaanti thi ke bahut jald khel khatam ho jaayega aur uska haath veerya se bhar jaayega.

Ab bhi usko samajh nahi aa raha tha ke aage kya kare. Kare ya na kare?

Par ab tak khud uske dil mein bhi ye bhaavna jaag chuki thi ke lund ko ek baar munh mein leke dekhe. Dekhe ke kaisa lagta hai lund choosna. Bistar par hamesha

vo kuchh naya karne ko taiyyar rehti thi aur ye toh poori tarah naya tha.

Agar car mein vo aurat Jai ka choos sakti hai toh main bhi apni pati ka choos hi sakti hoon, usne socha. Uska lund, chhota sa zaroor tha par kitna akad gaya tha.

Ek aah ki aawaz ke saath Bindiya ne apni jeebh tatto par poori tarah se ghumayi, unhen achhe se chaata aur dono balls ko apne munh mein bhar liya.

"AAAAHHHHHH" Uske pati ki aawaz aayi par usne Bindiya ko rokne ki koi koshish nahi ki.

Munh mein dono balls ko lete hi Bindiya ke shareer mein ek ajeeb sa current daud gaya jo uske sar se hota hua sidha uski taango ke beech jakar ruka. Agle hi pal uski

choot se bhi pani beh chala. Uske munh se ajeeb si aawaz nikal padi jo munh mein bhare hue tatto ki vajah se poori tarah bahar na aayi. Haath ab bhi tezi ke saath lund hila raha tha.

Ab uske haath ke saath saath uske pati ne bhi apni gaand hilani shuru kar di thi jaise Bindiya ke haath ko hi chod raha tha. Bindiya ne apna man pakka kiya aur uske tatto ko munh se nikala.

Vo lund munh mein lene ki soch hi rahi thi ke ek veerya ki tez dhaar sidhi uske munh par aakar giri.

Doosri uske sar par.

Teesri sidhi uske hontho par.

Vo thodi pichhe ko hui aur uske baad uske pati ka veerya lund se nikalta hua sidha uske blouse par girne laga. Kuchh blouse ke uper gale ke paas gira aur behta hua niche uski chhaityon ke beech chala gaya.

Bindiya man masos kar reh gayi. Jo kaam vo karna chah rahi thi vo poora kar nahi paayi.

Us din ke baad Bindiya ki dono khwahish sirf khwahish hi reh gayi.

Us din ke baad uske pati ne kabhi usko apna munh mein nahi lene diya. Jab bhi

Bindya aisi koshish karti , vo usko ye kehke rok deta ke aisa karna galat hai. Bindiya man maarkar reh jaati.

Doosra jab bhi vo apne pati se ye baat karti ke us din car mein Jai ke saath kaun aurat ho sakti thi, vo har baar ye kehkar baat taal jata le unhone Thakur Khandaan ka namak khaya hai aur unke khilaaf bolna theek nahi hai.

Aur kuchh din baad hi uska pati saanp ke kaat lene se is duniy se chalta hua.

Kuchh din tak Bindiya apne us jhopdi mein apni beti ke saath rahi aur phir Chander ko god le aayi. Chander ko vo pyaar se Chandu kehkar bulati thi. Vo bachpan se hi goonga tha. Kuchh bol nahi sakta tha par dimaag ka bahut tez tha. Har kaam badi tezi se seekhta aur bahut mehnat se karta. Bindiya ke saath saath vo bhi Thakur ke kheton mein kaam karne laga.

Ek din Bindiya ko khabar mili ke Thakurain ko seedhiyon se girne ki vajah se bahut chot aayi hai aur vo bistar par hain. Thakur Sahab ka bada beta Purshottam un dino videsh mein tha. Ilaaj karane ke liye thakurain ko bhi apne bete ke paas videsh bhej diya gaya. Thakur Sahab ki taraf se Bindiya ko farmaan mil chuka tha ke jaise hi Thakurain vaapis aaye, vo unki dekhbhaal ke liye haweli mein hi aakar rehna shuru kar de.

In dino ke aas paas hi aisa kuchh hua ke Bindiya ka apne munh bole bete Chandu ke saath Rishta badal gaya.

Chander tab kareeb 17 saal ka tha. Bindiya dopahar ke kareeb khana lekar khet ke us taraf chali jahan Chander kaam kar raha tha. Ye uski bahut purani aadat aaj bhi vaise hi thi. Kai saal pehle vo apni pati ke liye khana lekar jaati thi aur ab apne bete ke liye.

Vo khet mein pahunchi toh Chander kahin dikhai nahi diya. Usko dhoondhti Bindiya Tube well ki taraf gayi toh Chander mil gaya par vo akela nahi tha.

Uske saath Sunita thi.

Sunita gaon ki hi ek ladki thi aur Chander se kareeb 3 saal badi thi. Vo us waqt tube well ke neeche bethi naha rahi thi. Chander kinare par betha usko dekh raha tha.

"Chandu chal khana kha le beta" Kehti hui Bindiya nazdeek aayi. Chandu ne uski aawaz suni toh fauran palatkar usko dekha. Vo ek pal ke liye khada hone laga par phir apni jagah par beth gaya.

Sunita bhi Tube well ke neeche se nikal kar bahar aa gayi. Usne us waqt ek halke gulabi rang ki salwar kameez pehen rakhi thi aur poori tarah bheegi hui thi.

"Aaja tu bhi kha le" Bindiya ne Sunita se kaha. Sunita ne fauran haan mein sar hila diya.

"Aap chalo, main haath munh dhoke aata hoon" Chandu ne ishare se Bindiya ko kaha.

"Jaldi aana" Bindiya ne usko jawab diya aur Sunita ko saath lekar us taraf chal padi jahan vo khana chhod kar aayi thi.

Unke pichhe pichhe hi Chandu bhi aa gaya aur uske aate hi Bindiya samajh gayi ke vo unke saath kyun nahi aaya tha. Uska pajama saamne ki taraf se ajeeb tarah utha hua tha.

Bindiya samajh gayi ke aisa kyun hai aur kyun Chandu Sunita ke paas betha hua tha. Sunita shareer se poori tarah aurat thi aur Chandu uske bheege hue shareer ko nihaar raha tha.

Bindiya ko sharam bhi aayi aur hairat bhi hui. Jis Chandu ko vo bachcha samajhti thi vo kab itna jawan ho gaya tha usko khabar hi na hui thi..

Vo teeno hi khana khaane ke liye beth gaye. Bindiya ne mehsoos kiya ke khaane khaate hue bhi Chandu nazar bacha kar baar baar Sunita ki taraf dekh raha tha jo abhi bhi bheegi hui thi. Gulabi rang ke uske suit mein se uske shareer ka har ang saaf saaf nazar aa raha tha.

Bindiya ne dil hi dil mein Chandu ko dosh nahi diya. Sunita shakal se khoobsurat thi aur shareer poori tarah bhara hua tha. Par Chandu abhi kaafi chhota tha, kam se kam Bindiya ko toh aisa hi lagta tha.

Kuchh der baad khana khakar Chandu uth gaya aur Sunita bhi chali gayi. Bindiya bartan samet kar vaapis ghar aane lagi toh Chandu ne ishare se kaha ke vo bhi ghar jakar thodi der sona chahta hai. Vo dono saath saath vaapis jhopdi mein pahunche.

Chandu jhopdi mein pati charpaai par aankhen moond kar let gaya. Dopahar ka waqt tha. Thodi der baad Bindiya bhi aaram karne ke iraade se zameen par chadar bichha kar let gayi aur uski aankh lag gayi.

Thodi der baad uski aankh khuli toh Chandu charpai par nahi tha. Shayad khet par chala gaya ho, Bindiya ne socha. Vo uthi aur usko dhoondhti jhopdi ke pichhe aayi toh hairat se uski aankhen khuli reh gayi.

Jhopdi ke pichhe betha Chandu apna lund hila raha tha.

Bindiya ke aane ki aawaz sunkar vo utha aur khada ho gaya par apna lund chhupane ki koi koshish nahi ki. Bindiya ko bhi jaane kya soojha par vo bhi vahin khadi ektuk Chander ki taraf dekhti rahi. Uska lund ab bhi uske haaath mein tha jisko vo besharmi se Bindia ke saamne hi hila raha tha.

Bindiya ko apni aur Chandu ki halat ka andaza tab hua jab uski khud ki taango ke beech use geela pan mehsoos hua. Us geelepan ne Bindiya ko ehsaas dilaya ke vo apne munh bole bete ko dekhkar hi garam ho rahi thi.

Vo fauran hi palti aur jhopdi ke andar aa gayi.

Pichhe pichhe hi Chandu bhi andar aa gaya aur us din munh boli maan aur munh bole bete ka rishta khatam hokar dono ke beech ek aadmi aur aurat ka rishta ban gaya.

Khan janta tha ke uske paas time bahut kam tha. Jai ki police remaand khatam hone wali thi matlab uspar mukadma

shuru hone ke din kaafi nazdeek aa gaye.

Aur Khan ye bhi janta tha ke ye mukadma zyada din nahi chalne wala. Jald se jald case ko niptaya jaayega aur Jai ko phaansi par tanga diya jaayega.

"Mujhe samajh nahi aa raha ke kahan se shuru karun yaar" Vo Jai se milne jail aaya hua tha "Jidhar se bhi ghumake dekhun, har kisi ka koi na koi alibi hai. Har koi qatl ke waqt ya toh kisi aur ke saath tha ya usko kahin aur kisi

na kisi ne dekha tha. Qatl ke waqt Thakur Sahab ke waqt tumhare siwa koi bh unke aas paas nahi tha"

"Baaki logon se baat ki aapne?" Jai ne puchha

"Kahan yaar" Khan ne saans chhodte hue kaha "Sala police investigation ke liye bhi aise bulana padta hai jaise kahin shaadi mein bula rahe hon aur phir saale aate bhi nahi. Thakur na hue Raja ho gaye yahan ke"

"Unka rutba is ilaake mein Raja se kam nahi hai Khan Sahab" Jai ne kaha "Meri maniye toh puchhne ka kaam naukron se

shuru kijiye"

Usi din shaam ko Khan apne ghar mein betha phir se paheli suljhane ki koshish kar raha tha. Saamne diary thi aur haath mein pen.

Vo badi khushi khushi ye theory apna leta ke Thakur ko bahar ke kisi aadmi ne maara hai. Aisa ho sakta tha. Khan ne hawli ka poora jaayza liya tha. Chaaron taraf ek takreeban 15 foot oonchi deewar the jispar bijli ke taar the. Un taaron mein 24 ghante current rehta tha yaani kisi ka bhi deewar koodkar aa pana na-mumkin tha.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:05

खूनी हवेली की वासना पार्ट --15

गतान्क से आगे........................

पर फिर भी अगर दिमाग़ लगाया जाए तो मुश्किल भी नही था. एक सीढ़ी लगाकर उपेर चढ़े, कोई चमड़े या लकड़ी की चीज़ से तारों को दबाना और अंदर कूद जाना मुश्किल नही था. बाउंड्री वॉल और हवेली के आस पास काफ़ी सारी ज़मीन खाली थी जिसमें गार्डेन बनाया हुआ था और काफ़ी सारे पेड़ थे. ये मुमकिन था का कोई पहले ही वहाँ आकर च्छूपा बैठा हो, मौका मिलने पर खिड़की से ठाकुर साहब के कमरे के अंदर गया हो और क़त्ल करने के बाद फिर वहीं से निकल कर बाहर आ गया हो. जब खून का पता चला तो हर कोई हवेली में ठाकुर साहब के कमरे पर पहुँच गया था. यानी बाहर कोई नही था और उस आदमी के लिए हवेली के कॉंपाउंड से निकल कर भागना बहुत आसान था.

पर उसकी इस थियरी को सिर्फ़ एक ही बात नाकाम कर देती थी. और वो बात ये थी के ठाकुर के कमरे की खिड़की अंदर से बंद थी. यांकी वहाँ से कोई निकल कर नही भागा था.

ख़ान ने ठंडी आह भारी और फिर अपनी पुरानी थियरी पर आ गया के खून किसी घर के आदमी ने ही किया है.

उसके सामने ठाकुर की पोस्ट मॉर्टेम रिपोर्ट की एक कॉपी रखी थी. ख़ान ने वो फिर खोली और इस उम्मीद से पढ़ने लगा के शायद कुच्छ यहाँ से समझ आ जाए पर ऐसा भी नही हुआ.

ठाकुर का क़त्ल एक स्क्रूड्राइवर से किया गया था जो किसी भी घर में बड़ी आसानी से मिल जाता है. उनके राइट आर्म के नीचे 2 वार किए गये थे. पहला हल्का और दूसरा पूरी ताक़त के साथ. दूसरा वार जानलेवा साबित हुआ था.

ख़ान ने रिपोर्ट बंद की और फिर से अपनी डाइयरी में सबके नाम लिखे. हर क़त्ल एक मकसद से किया जाता है और इस खून की पिछे भी एक मकसद तो होगा ही.

1. पुरुषोत्तम - क्या मकसद हो सकता है? उसके बाप ने सब कुच्छ उसको ही सौंप रखा था. सारा काम वो खुद ही देखता था.... अपने बाप को मारकर इसको क्या मिलेगा?

2. रूपाली - ससुर को मारने की इसके पास भी कोई वजह नही. एक शादी शुदा औरत जिसके पास खुला पैसा था. ये क्यूँ मारेगी ???????

3. तेज - इसके पास मोटिव है. ठाकुर इसको जायदाद के मामलो से अलग ही रखता था और वजह थी इसकी अययाशी की आदत. जायदाद के लिए हो सकता है के इसने गुस्से में अपने बाप का काम कर दिया हो.

4. कुलदीप - फॉरिन में पढ़ता है. ब्राइट फ्यूचर है. छुट्टी में आया हुआ है. ये क्यूँ मारेगा ????

5. कामिनी - घर की सीधी सादी बेटी. शादी करके एक अमीर घर से दूसरे घर में चली जाती. इसके पास क्या वजह हो सकती है ???

6. सरिता देवी - व्हील चेर पर बैठी एक बीमार औरत जिसका नीचे का शरीर हिलता ही नही. पहली बात तो ये के अपने पति को मारकर ये जाए भी तो कहाँ और दूसरा ये के अगर मारना चाहे भी तो इसके बस का नही के ठाकुर

जैसे हत्ते कत्ते आदमी को मार सके. और जिस वक़्त खून हुआ ये बाहर बैठी हुई थी इस बात की गवाही कई लोग दे रहे हैं. कोई मकसद नही ......

7. भूषण - बुड्ढ़ा ड्राइवर. फिर वही बात. ठाकुर इसके जैसे 10 को अकेला संभाल लेता. ये भला ठाकुर को कैसे मारेगा. और दूसरा ये के जब खून हुआ तो ये बाहर गाड़ी निकाल रहा था इसकी गवाही भी कई लोग दे रहे हैं. कोई

मक़सद नही ....

8. बिंदिया - घर की नौकरानी. दूर दूर तक कोई मकसद नही ......

9. पायल - घर की नौकरानी. दूर दूर तक कोई मकसद नही ......

10. चंदर - ये चाहता तो खून कर सकता था. लंबा चौड़ा जवान है. ठाकुर को संभाल सकता था. पर ये हवेली के मैन गेट पर ये पहरा दे रहा था इस बात की गवाही भी कई लोग दे रहे हैं. और इसके पास भला क्या मकसद हो सकता है .....

ख़ान ने अपनी लिस्ट को ख़तम किया और सिगरेट जलाई. अचानक उसको ध्यान आया के वो एक नाम भूल गया.

11. इंद्रासेन राणा - ये खून की रात एग्ज़ॅक्ट्ली हवेली में कर क्या रहा था? पर अपनी बहेन के ससुर को मारकर उसका घर उजाड़ने की इसके पास भी क्या वजह होगी?????

ख़ान ने लिस्ट को फिर देखा और परेशान होकर सर खुजाने लगा.

बिस्तर पर चंदर कंबल ओढ़े पढ़ा था. उसी कंबल में उसके साथ उसके साथ बिंदिया थी, पूरी की पूरी नंगी. चंदर ने उसको थोड़ी देर पहले ही चोदा था ज्सिके बाद वो फ़ौरन ही सो गयी थी. बिंदिया का सर चंदर की छाती पर था और वो उससे लिपटी हुई सो रही थी.

चंदर ने एक नज़र बिंदिया के चेहरे पर डाली और मुस्कुरा उठा.

इस औरत ने उसको वो सब दिया था जो एक औरत किसी भी मर्द को दे सकती है.

बिंदिया उसके लिए कभी माँ बनी, तो कभी बड़ी बहेन, कभी एक अच्छी दोस्त की तरह उसके साथ बातें की और आज बीवी बनी उसकी बाहों में नंगी पड़ी थी. एक औरत एक ही साथ इतने रूप निभा सकती है, ये चंदर कभी सोच भी नही सकता था.

बिंदिया ने उसको हमेशा ही अपने सगे बेटे की तरह माना था.उसने कभी चंदर और अपनी बेटी पायल में कोई फरक नही किया. जो पायल को दिया, वही और उतना ही चंदर को भी दिया. पर ना जाने क्यूँ चंदर कभी उसको अपनी माँ के रूप में नही देख पाया. चंदर के लिए वो सिर्फ़ एक औरत थी जिसने उसको उस वक़्त सहारा दिया था जब उसके माँ बाप मर चुके थे.

ऐसा नही था के चंदर ने उस एहसान का बदला नही चुकाया था. बड़ा होने के बाद घर की सारी ज़िम्मेदारी उसने उठा ली थी. इस वक़्त भी खेतों में मज़दूरी करके वही कमाकर लाता था जिससे बिंदिया और रूपाली का भी पेट भरता था.

वो एक बेटे होने के पूरे फ़र्ज़ तो निभा रहा था पर कभी एक बेटा नही बन पाया. बिंदिया में कभी उसको अपनी माँ नज़र नही आई.

माँ ... चंदर को अपनी माँ आज भी याद थी. वो छ्होटा ज़रूर था पर माँ की कुच्छ यादें आज भी उसके साथ थी. और उन में से एक वो याद भी थी जब उसने अपनी माँ को ज़िंदा जलते देखा था.

गाओं के एक बानिए के घर में पूजा थी. उसके माँ बाप दोनो बानिए के घर काम करने गये थे. चंदर छ्होटा था और बोल नही पता था इसलिए उसको साथ ले गये थे. ठीक से तो चंदर को याद नही था पर फिर रात में कोई हंगामा मचा, गोलियों की आवाज़ सुनाई दी और हर तरफ आग लग गयी.

चंदर भाग दौड़ में अपने माँ बाप से अलग हो गया. और जब वो थोड़ी देर बाद उसको मिले तो उसके बाप की लाश ज़मीन पड़ी थी और उससे लिपटी उसकी माँ रो रही थी.

और फिर कमरे की छत भरभरा कर नीचे आ पड़ी.

उसकी माँ के उपेर.

वो जानता था के अंदर उसकी माँ ज़िंदा जल रही थी. उसकी चीख की आवाज़ वो आज भी सुन सकता था. और फिर उसको वो इंसान नज़र आया जो इस सबका ज़िम्मेदार था. काले घोड़े पर बैठा वो आदमी जिसके हाथ में एक बड़ी सी बंदूक थी.

वो आदमी जिसने चेहरे पर एक कपड़ा बाँध रखा था और कपड़ा एक पल के लिए हटा था.

वो आदमी जिसका चेहरा चंदर ने उस रात देखा था पर जानता नही था के कौन है.

वो आदमी जो उसको बाद में पता चला था के ठाकुर शौर्या सिंग था.

उसी दिन से वो ठाकुर से नफ़रत करने लगा. जैसे जैसे वो बड़ा होता गया, ये नफ़रत बदले की भावना में बदल गयी. और जाने कब ये बदले की भावना ठाकुर का खून करने के इरादे में तब्दील हो गयी.

किस्मत ने उसका साथ दिया था और बिंदिया ने उसको गोद ले लिया, वो बिंदिया जो खुद ठाकुर के यहाँ काम करती थी. हवेली में घुसना चंदर के लिए नामुमकिन था. वो ठाकुर के कहीं आस पास नही फाटक सकता था, उसको मारना तो दूर की बात थी. वो सही मौके के इंतेज़ार में ही था के एक दिन जैसे उसकी उपेरवाले ने सुन ली.

बिंदिया ने उसको बताया के वो हवेली में ही रहेगी क्यूंकी ठकुराइन को बहुत चोट आ गयी है. चंदर खुश हो उठा.

वो जानता था के बिंदिया का हवेली में रहना मतलब उसका और पायल का भी हवेली में ही रहना. इस तरह से वो 24 घंटे हवेली में ठाकुर के आस पास रह सकता था और मौका मिलने पर उसका काम तमाम कर सकता था. दिल ही दिल में उसने पूरा एक प्लान तक बना डाला था.

पर किस्मत को कुच्छ और ही मंज़ूर था.

बिंदिया ने उसको बताया के वो अकेली ही हवेली में रहेगी. ठाकुर साहब ने कहा था के वो चंदर को खेतों में ही रहने को छ्चोड़ दे ताकि वो खेतों की रखवाली कर सके.

चंदर को उस दिन अपना बना बनाया प्लान बिखरता नज़र आया. उसने बिंदिया से लाख ज़िद की के वो अकेला नही रहेगा और हवेली जाएगा पर बिंदिया ने उसकी एक नही सुनी. चंदर दिन रात इसी कोशिश में रहता के बिंदिया को इस बात के लिए मना ले के वो उसे अपने साथ हवेली ले जाए.

और ये मौका भी किस्मत ने अपने आप ही उसकी झोली में डाल दिया.

उस दिन खेत पर सुनीता उससे मिलने आई थी. सुनीता दिखने में सीधी थी पर थी पक्की रांड़. किसी ना किसी बहाने से चंदर को अपना शरीर का कोई ना कोई हिस्सा दिखती रहती थी. कभी उसके सामने झुक कर अपनी चुचियाँ दिखाती तो कभी गांद मटका मटका कर चंदर के सामने से गुज़र जाती.

और फिर उस दिन तो हद ही हो गयी थी. वो चंदर के सामने ही ट्यूबिवेल में बैठी नहाने लगी. कपड़े उसने यूँ तो पहेन रखे थे पर उनका होना ना होना एक बराबर ही था. उसका एक एक अंग कपड़ो के उपेर उभर आया था और चंदर का अपने आपको रोकना मुश्किल हो गया था. उसका लंड तन कर टाइट खड़ा हो गया था और वो कुच्छ करने की सोच ही रहा था के वहाँ बिंदिया आ गयी.

उस दिन घर आकर बिंदिया के सो जाने के बाद चंदर घर के पिछे जाकर अपना लंड हिलाने लगा ताकि ठंडा हो सके. सुनीता को देखने के बाद उसके तन मंन में आग सी लगी हुई थी. तभी जाने कैसे बिंदिया उठकर सीधा झोपड़ी के पिछे आ गयी.

चंदर हड़बड़ा कर उठ खड़ा हुआ और फिर पाजामा उपेर कर ही रहा था के उसको एहसास हुआ के बिंदिया उसके लंड की और ही देख रही थी और एकटूक देखे जा रही थी.

और उसी पल चंदर समझ गया था के उसको क्या करना है.

ये औरत बिस्तर पर जाने कितने सालों से गरम थी. वो बिना झिझके बिंदिया की तरफ बढ़ा. उसको लगा था के बिंदिया मना करेगी पर ऐसा हुआ नही. वो किसी पक्की रंडी की तरह बिस्तर पर चुदी.

अगर चंदर ने अपने और उस औरत के बीच के रिश्ते की कोई कदर नही की तो बिंदिया ने भी उस रिश्ते को दिल दिमाग़ से पूरा निकाल दिया था.

उस दिन से वो दिन में तो माँ बेटे की तरह होते थे पर रात में दोनो मिलकर चारपाई तोड़ते थे.

और चंदर समझ गया था के जब तक वो इस भूखी शेरनी को बिस्तर पर मास डालता रहेगा वो चंदर को अपने साथ रखेगी. और ऐसा हुआ भी. कुच्छ रातों बाद बिंदिया ने कह दिया के वो ठाकुर साहब से ज़िद करके उसे भी अपने साथ हवेली ले जाएगी क्यूंकी अब चंदर के बिना उसे नींद आएगी नही.

चंदर को अपना प्लान सफल होता नज़र आ रहा था.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --15

gataank se aage........................

Par phir bhi agar dimaag lagaya jaaye toh mushkil bhi nahi tha. Ek seedhi lagakar uper chadhn, koi chamde ya lakdi ki cheez se taaron ko dabana aur andar kood jaana mushkil nahi tha. Boundary wall aur haweli ke aas paas kaafi saari zameen khaali thi jismein garden banaya hua tha aur kaafi saare ped the. Ye mumkin tha ka koi pehle hi vahan aakar chhupa betha ho, mauka milne par khidki se thakur sahab ke kamre ke andar gaya ho aur qatl karne ke baad phir vahin se nikal kar bahar aa gaya ho. Jab khoon ka pata chala toh har koi haweli mein thakur sahab ke kamre par pahunch gaya tha. Yaani bahar koi nahi tha aur us aadmi ke liye haweli ke compound se nikal kar bhagna bahut aasan tha.

Par uski is theory ko sirf ek hi baat nakam kar deti thi. Aur vo baat ye thi ke thaur ke kamre ki khidki andar se band thi. Yaanki vahan se koi nikal kar nahi bhaga tha.

Khan ne thandi aah bhari aur phir apni purani theory par aa gaya ke khoon kisi ghar ke aadmi ne hi kiya hai.

Uske saamne thakur ki post mortem report ki ek copy rakhi thi. Khan ne vo phir kholi aur is ummeed se padhne laga ke shayad kuchh yahan se samajh aa jaaye par aisa bhi nahi hua.

Thakur ka qatl ek screwdriver se kiya gaya tha jo kisi bhi ghar mein badi aasani se mil jata hai. Unke right arm ke neeche 2 vaar kiye gaye the. Pehla halka aur doosra poori taaqat ke saath. Doosra vaar jaanleva saabit hua tha.

Khan ne report band ki aur phir se apni diary mein sabke naam likhe. Har qatl ek maksad se kiya jata hai aur is khoon ki pichhe bhi ek maksad toh hoga hi.

1. Purushottam - Kya maksad ho sakta hai? Uske baap ne sab kuchh usko hi saunp rakha tha. saara kaam vo khud hi dekhta tha.... Apne baap ko maarkar isko kya milega?

2. Rupali - Sasur ko marne ki iske paas bhi koi vajah nahi. Ek shaadi shuda aurat jiske paas khula paisa tha. Ye kyun maregi ???????

3. Tej - Iske paas motive hai. Thakur isko jaaydad ke mamlo se alag hi rakhta tha aur vajah thi iski ayyashi ki aadat. Jaaydad ke liye ho sakta hai ke isne gusse mein apne baap ka kaam kar diya ho.

4. Kuldeep - Foreign mein padhta hai. Bright future hai. Chhutti mein aaya hua hai. Ye kyun maarega ????

5. Kamini - Ghar ki seedhi saadi beti. Shaadi karke ek ameer ghar se doosre ghar mein chali jaati. Iske paas kya vajah ho sakti hai ???

6. Sarita Devi - wheel chair par bethi ek bimaar aurat jiska neeche kashareer hilta hi nahi. Pehli baat toh ye ke apne pati ko markar ye jaaye bhi toh kahan aur doosra ye ke agar maarna chahe bhi toh iske bas ka nahi ke Thakur

jaise hatte katte aadmi ko maar sake. Aur jis waqt khoon hua ye bahar bethi hui thi is baat ki gawahi kai log de rahe hain. Koi maksad nahi ......

7. Bhushan - Buddha Driver. Phir vahi baat. Thakur iske jaise 10 ko akela sambhal leta. Ye bhala Thakur ko kaise marega. Aur doosra ye ke jab khoon hua toh ye bahar gaadi nikal raha tha iski gawahi bhi kai log de rahe hain. Koi

maqsad nahi ....

8. Bindiya - Ghar ki naukrani. Door door tak koi maksad nahi ......

9. Payal - Ghar ki naukrani. Door door tak koi maksad nahi ......

10. Chander - Ye chahta toh khoon kar sakta tha. Lamba chauda jawan hai. Thakur ko sambhal sakta tha. Par ye haweli ke main gate par ye pehra de raha tha is baat ki gawahi bhi kai log de rahe hain. Aur iske paas bhala kya maksad ho sakta hai .....

Khan ne apni list ko khatam kiya aur cigarette jalayi. Achanak usko dhyaan aaya ke vo ek naam bhool gaya.

11. Indrasen Rana - Ye khoon ki raat exactly haweli mein kar kya raha tha? Par apni behen ke sasur ko maarkar uska ghar ujaadne ki iske paas bhi kya vajah hogi?????

Khan ne list ko phir dekha aur pareshan hokar sar khujane laga.

Bistar par Chander kambal odhe padha tha. Usi kambal mein uske saath uske saath Bindiya thi, poori ki poori nangi. Chander ne usko thodi der pehle hi choda tha jsike baad vo fauran hi so gayi thi. Bindiya ka sar Chander ki chhati par tha aur vo usse lipti hui so rahi thi.

Chander ne ek nazar Bindiya ke chehre par daali aur muskura utha.

Is aurat ne usko vo sab diya tha jo ek aurat kisi bhi mard ko de sakti hai.

Bindiya uske liye kabhi maan bani, toh kabhi badi behen, kabhi ek achhi dost ki tarah uske saath baaten ki aur aaj biwi bani uski baahon mein nangi padi thi. Ek aurat ek hi saath itne roop nibha sakti hai, ye Chander kabhi soch bhi nahi sakta tha.

Bindiya ne usko hamesha hi apne sage bete ki tarah mana tha.Usne kabhi Chander aur apni beti Payal mein koi farak nahi kiya. Jo payal ko diya, vahi aur utna hi Chander ko bhi diya. Par na jaane kyun Chander kabhi usko apni maan ke roop mein nahi dekh paya. Chander ke liye vo sirf ek aurat thi jisne usko us waqt sahara diya tha jab uske maan baap mar chuke the.

Aisa nahi tha ke Chander ne us ehsaan ka badla nahi chukaya tha. Bada hone ke baad ghar ki saari zimmedari usne utha li thi. Is waqt bhi kheton mein mazdoori karke vahi kamakar laata tha jisse Bindiya aur Rupali ka bhi pet bharta tha.

Vo ek bete hone ke poore farz toh nibha raha tha par kabhi ek beta nahi ban paya. Bindiya mein kabhi usko apni maan nazar nahi aayi.

Maan ... Chander ko apni maan aaj bhi yaad thi. Vo chhota zaroor tha par maan ki kuchh yaaden aaj bhi uske saath thi. Aur un mein se ek vo yaad bhi thi jab usne apni maan ko zinda jalte dekha tha.

Gaon ke ek baniye ke ghar mein pooja thi. Uske maan baap dono baniye ke ghar kaam karne gaye the. Chander chhota tha aur bol nahi pata tha isliye usko saath le gaye the. Theek se toh Chander ko yaad nahi tha par phir raat mein koi hungama macha, goliyon ki aawaz sunai di aur har taraf aag lag gayi.

Chander bhaag daud mein apne maan baap se alag ho gaya. Aur jab vo thodi der baad usko mile toh uske baap ki laash zameen padi thi aur usse lipti uski maan ro rahi thi.

Aur phir kamre ki chhat bharbhara kar neeche aa padi.

Uski maan ke uper.

Vo janta tha ke andar uski maan zinda jal rahi thi. Uski cheekh ki aawaz vo aaj bhi sun sakta tha. Aur phir usko vo insaan nazar aaya jo is sabka zimmedar tha. Kaale ghode par betha vo aadmi jiske haath mein ek badi si bandook thi.

Vo aadmi jisne chehre par ek kapda baandh rakha tha aur kapda ek pal ke liye hata tha.

Vo aadmi jiska chehra Chander ne us raat dekha tha par janta nahi tha ke kaun hai.

Vo aadmi jo usko baad mein pata chala tha ke Thakur Shaurya Singh tha.

Usi din se vo Thakur se nafrat karne laga. Jaise jaise vo bada hota gaya, ye nafrat badle ki bhaavna mein badal gayi. Aur jaane kab ye badle ki bhaavna Thakur ka khoon karne ke iraade mein tabdeel ho gayi.

Kismat ne uska saath diya tha aur Bindiya ne usko god le liya, vo Bindiya jo khud Thakur ke yahan kaam karti thi. Haweli mein ghusna Chander ke liye namumkin tha. Vo Thakur ke kahin aas paas nahi phatak sakta tha, usko marna toh door ki baat thi. Vo sahi mauke ke intezaar mein hi tha ke ek din jaise uski uperwale ne sun li.

Bindiya ne usko bataya ke vo haweli mein hi rahegi kyunki Thakurain ko bahut chot aa gayi hai. Chander khush ho utha.

Vo janta tha ke Bindiya ka haweli mein rehna matlab uska aur Payal ka bhi haweli mein hi rehna. Is tarah se vo 24 ghante Haweli mein thakur ke aas paas reh sakta tha aur mauka milne par uska kaam tamam kar sakta tha. Dil hi dil mein usne poora ek plan tak bana daala tha.

Par kismat ko kuchh aur hi manzoor tha.

Bindiya ne usko bataya ke vo akeli hi Haweli mein rahegi. Thakur Sahab ne kaha tha ke vo Chander ko kheton mein hi rehne ko chhod de taaki vo kheton ki rakhwali kar sake.

Chander ko us din apna bana banaya plan bikharta nazar aaya. Usne Bindiya se laakh zid ki ke vo akela nahi rahega aur Haweli jaayega par Bindiya ne uski ek nahi suni. Chander din raat isi koshish mein rehta ke Bindiya ko is baat ke liye mana le ke vo use apne saath Haweli le jaaye.

Aur ye mauka bhi kismat ne apne aap hi uski jholi mein daal diya.

Us din khet par Sunita usse milne aayi thi. Sunita dikhne mein sidhi thi par thi pakki raand. Kisi na kisi bahane se Chander ko apna shareer ka koi na koi hissa dikhati rehti thi. Kabhi uske saamne jhuk kar apni chuchiyan dikhati toh kabhi gaand matka matka kar Chander ke saamne se guzar jaati.

Aur phir us din toh hadh hi ho gayi thi. Vo Chander ke saamne hi Tubewell mein bethi nahane lagi. Kapde usne yun toh pehen rakhe the par unka hona na hona ek barabar hi tha. Uska ek ek ang kapdo ke uper ubhar aaya tha aur Chander ka apne aapko rokna mushkil ho gaya tha. Uska lund tan kar tight khada ho gaya tha aur vo kuchh karne ki soch hi raha tha ke vahan Bindiya aa gayi.

Us din ghar aakar Bindiya ke so jaane ke baad Chander ghar ke pichhe jakar apna lund hilane laga taaki thanda ho sake. Sunita ko dekhne ke baad uske tan mann mein aag si lagi hui thi. Tabhi jaane kaise Bindiya uthkar sidha jhopdi ke pichhe aa gayi.

Chander hadbada kar uth khada hua aur phir pajama uper kar hi raha tha ke usko ehsaas hua ke Bindiya uske lund ki aur hi dekh rahi thi aur ektuk dekhe ja rahi thi.

Aur usi pal Chander samajh gaya tha ke usko kya karna hai.

Ye aurat bistar par jaane kitne saalon se garam thi. Vo bina jhijhke Bindiya ki taraf badha. Usko laga tha ke Bindiya mana karegi par aisa hua nahi. Vo kisi pakki randiki tarah bistar par chudi.

Agar Chander ne apne aur us aurat ke beech ke rishte ki koi kadar nahi ki toh Bindiya ne bhi us rishte ko dil dimag se poora nikal diya tha.

Us din se vo din mein toh maan bete ki tarah hote the par raat mein dono milkar charpai todte the.

Aur Chander samajh gaya tha ke jab tak vo is bhookhi sherni ko bistar par maas dalta rahega vo Chander ko apne saath rakhegi. Aur aisa hua bhi. Kuchh raaton baad Bindiya ne keh diya ke vo Thakur Sahab se zid karke use bhi apne saath haweli le jaayegi kyunki ab Chander ke bina use neend aayegi nahi.

Chander ko apna plan safal hota nazar aa raha tha.

kramashah........................................