खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:06

खूनी हवेली की वासना पार्ट --16

गतान्क से आगे........................

वो अपनी सोच में ही गुम था के अपने लंड पर उसे एक आठ महसूस हुआ. हाथ बिंदिया का था. वो जाग गयी थी. चंदर के उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखा.

"क्या हुआ?" उसने इशारे से पुच्छा "क्या चाहिए?"

"तेरा लंड" बिंदिया ने कहा और पूरी चंदर के उपेर चढ़ गयी.

चंदर अपनी सोच में ही गुम था के अपने लंड पर उसे एक हाथ महसूस हुआ. हाथ बिंदिया का था. वो जाग गयी थी. चंदर के उसकी तरफ मुस्कुरा कर देखा.

"क्या हुआ?" उसने इशारे से पुछा "क्या चाहिए?"

"तेरा लंड" बिंदिया ने कहा और पूरी चंदर के उपेर चढ़ गयी.

पर चंदर बिंदिया को तड़पाने के मूड में था. जैसे ही बिंदिया उसके उपेर आई, उसने उसके कंधे पकड़े और फिर बिस्तर पर गिरा दिया और खुद उसके उपेर आ गया.

"क्या चाहिए?" उसने फिर इशारे पुछा

"तेरा लंड" बिंदिया ने जवाब दिया. वो पूरी तरह से नंगी पड़ी थी.

"कहाँ चाहिए?" चंदर ने फिर इशारा किया.

"अर्रे तू जहाँ चाहे डाल दे. एक विधवा औरत को बिस्तर पे गरम करके पुछ्ता है के कहाँ घुसाना है? तू जहाँ चाहे घुसा दे" बिंदिया बेसब्री होती हुई बोली.

उसने एक हाथ अपने और चंदर के बीच में घुसाके उसका लंड पकड़ लिया. खुद वो बिस्तर पर अपनी कमर पर लेटी हुई. टांगे दोनो फेली हुई और टाँगो के बीच चंदर बैठा था. चादर कबकि सरक कर बिस्तर से नीचे गिर चुकी थी.

बिंदिया ने लंड पकड़ कर उपेर उपेर से ही अपनी चूत पर रगड़ा.

"म्‍म्म्मम, और तू बता, तुझे क्या चाहिए?" वो मुस्कुराइ.

चंदर ने उसकी चूत की तरफ इशारा किया

"तो डाल ना अंदर. रुका क्यूँ है," बिंदिया चंदर को अपनी बाहों में खींचती हुई बोली. उसने अपनी टांगे और खोली और गांद थोड़ी हवा में उठाई ताकि चंदर पूरी तरह से उसकी चूत में समा सके

"तेरा जब दिल करे तब आके घुसा ले, मैं रोकूंगी नही." बिंदिया मदहोश सी आवाज़ में बोली

उसने अपने दोनो हाथों से चंदर की गांद को जाकड़ लिया.अपने घुटने को अच्छी तरह फेलते हुए मोड़ा और अपने चूत को लंड पर दबाया. लंड का अगला हिस्सा बड़ी आसानी से चूत में घुसता चला गया.

"आआहह" बिंदिया ने आह भरी और अपनी आँखें बंद कर ली.

चंदर उपेर से बिंदिया की तरफ देख कर मुस्कुराया. बिंदिया पूरी तरह उसके वश में थी. वो जो चाहता, वही करती.

बिंदिया ने चंदर का चेहरा पकड़ा और अपनी छातियो की तरफ खींचा. उसका एक हाथ चंदर के सर पर था और दूसरा हाथ उसकी गांद पर.

"आधी रात को फिर से गरम कर दिया तूने मुझे" बिंदिया बड़बड़ाई, नीचे से वो अपनी गांद हिलकर अपनी चूत चंदर के लंड और टट्टो पर रगड़ रही थी.

और फिर कमरे में वाशना का तूफान सा आ गया. दोनो में से किसी को होश नही था के नीचे ज़मीन पर एक 10-12 साल की बच्ची पायल सो रही थी. चंदर ने लंड चूत में तेज़ी के साथ अंदर बाहर करना शुरू कर दिया और बिंदिया ने अपनी दोनो टांगे कसकर उसकी कमर पर मोड़ ली. उपेर से आते चंदर के हर धक्के का जवाब वो नीचे से अपनी गांद उठाकर दे रही थी. अपनी दोनो पैर उसने चंदर की गांद पर अड़ा रखे थे. वो थोड़ी देर पहले ही चंदर से चुदवा कर सोई थी पर चंदर समझ चुका था के इस औरत को वो जितना चाहे चोदे, उसको कभी भी पूरा नही पड़ेगा.

नीचे से बिंदिया पागल की तरह कराहती हुई अपनी गांद हिला रही थी. लंड चूत में पूरा अंदर बाहर हो रहा था. चोदते चोद्ते चंदर ने उसकी एक चूची अपने मुँह में ले ली और निपल चूसने लगा. कभी वो निपल को होंठो में दबाके छूता, कभी जीभ फिराता और कभी दाँत से काट देता. नीचे से बिंदिया की आती आवाज़ को सुनकर वो जानता था के उसके नीचे जो औरत थी, वो बिस्तर पर किसी रंडी से कम नही थी.

"म्‍म्म्मम, ज़ोर से, ज़ोर से , चंदर!" बिंदिया जैसे चिल्ला उठी. "ओह्ह्ह्ह, चंदर, चोद मुझे! ह, बहुत मज़ा आ रहा है, पूरा अंदर घुसा.... हां ऐसे ही ... आअहह!"

चंदर पूरी ताक़त से लंड चूत में अंदर बाहर करने लगा.

"चोद बेटा, चोद मुझे!" नीचे पड़ी बिंदिया उसको और उकसा रही थी. "अपनी माँ को ही चोद रहा है तू ....आआहह ... मर्द की तरह चोद, बच्चे की तरह क्या चोद रहा है ... और ज़ोर से ... और ज़ोर से!"

चंदर ने अपने दोनो हाथों से बिंदिया की गांद को पकड़ा हुआ था और रगड़ रहा था. उसकी एक अंगुली गांद पर सरकते सरकते सीधी बिंदिया के गांद के बीच आआए.

"आआअहह!" बिंदिया तड़प उठी. "ये क्या कर रहा है ... यहाँ भी घुसाएगा क्या?!"

उसकी आवाज़ सुनते ही चंदर ने भी बिना रुके अपनी अंगुली थोड़ी सी बिंदिया की गांद के अंदर कर दी और पूरी तेज़ी से लंड अंदर बाहर करने लगा.

गांद में अंगुली जाते ही बिंदिया किसी नागिन की तरह फूंकारने की आवाज़ करने लगी. चंदर की आँखों में देखते हुए वो उसकी अंगुली पर अपनी गांद सिकोड़ने लगी और अचानक आगे को होकर उसका निचला होंठ चूसने लगी. चूसने क्या वो तो जैसे उसका होंठ चबा रही थी. चंदर को एक पल के लिए लगा के मज़े के कारण कहीं ये औरत बिस्तर पर मर ही ना जाए.

"ऊओ! ह, ज़ोर से, ज़ोर से!" को चिल्लाई. "पूरा मर्द हो गया है रे तू तो! सोचा भी नही था मैने के जिस ज़रा से बच्चे को अपने घर लेके आ रही हूँ वहीं एक दिन बिस्तर पर मुझे रगड़ेगा. कब इतना बड़ा हो गया रे तू के अपनी माँ के बराबर की औरत को चोद रहा है?"

बिंदिया बड़बदाए जा रही थी

चंदर का पूरा ध्यान अपने लंड की तरफ था जिसे वो बिंदिया के चूत में अंदर बाहर होता देख रहा था. बिंदिया की चूत कितनी गीली हो रखी थी और कितनी आसानी से उसका लंड ले रही थी.

अचानक बिंदिया का पूरा शरीर जैसे थर्रा उठा. उसने अपनी गांद हवा में जितना हो सका उठा दी और लंड चूत में पूरा का पूरा ले लिया. उसकी साँस जैसे अटकने लगी थी. चंदर के हर धक्के पर उसकी चूचियाँ हिल रही थी जिन्हें बिंदिया ने अपने दोनो हाथों में जाकड़ लिया.

"मेरा निकलने वाला है चंदर!" वो बोली. "अब रुकना मत ... रुकना मत! हे भगवान! हन ऐसे ही ... करता रह !ज़ोर से, ज़ोर से! ज़ोर से चोद, चंदर! मार मेरी चूत! घुसा दे अंदर, और अंदर, और तेज़!"

चंदर ने ठीक उसी पल अपनी अंगुली तकरीबन आधी बिंदिया की गांद के अंदर कर दी. और इसी के साथ बिंदिया ने उसको बुरी तरह जाकड़ लिया, अपने दाँत उसके कंधे पर गढ़ा दिए.

"आआहह!" बिंदिया चिल्लाई. "मर गयी मैं!"

चंदर भी पूरी तेज़ी से अपने लंड चूत में अंदर बाहर करने लगा. वो लंड पूरा बाहर निकाल लेता और फिर से अंदर घुसाता. और फिर उसके गले से एक भारी आवाज़ निकली और लंड से वीर्य छ्होट पड़ा और बिंदीय की चूत को भरने लगा.

बिंदिया को चूत में भरते हुए चंदर के पानी का एहसास हुआ तो वो एक बार फिर चिल्ला उठी.

ठकुराइन सरिता देवी डरी सहमी एक तरफ खड़ी थी. उनकी गाड़ी के पास ही उनके ड्राइवर की लाश पड़ी थी जिसका गला काट कर जान ले ली गयी थी. हत्यारे उनके सामने ही खड़े थी.

वो राजन के लोग थे ये बात वो समझती थी. राजन उस इलाक़े का एक जाना माना डकेट था जो रात को सड़क से गुज़रते मुसाफिरो को लूटने के लिए मश-हूर था. इस वक़्त उनके गिरोह ने ठकुराइन की गाड़ी को रोक कर उन्हें घेरा हुआ था.

अपनी बहेन के घर से निकलते वक़्त ही ठकुराइन को लग गया था के वो ठीक नही कर रही हैं. वो अपनी छ्होटी बहेन से मिलने पास के गाओं आई हुई थी.

साथ में एक ड्राइवर था और वो 17-18 साल का लड़का. उनका इरादा तो रात को रुक कर अगले दिन जाने का था और ठाकुर साहब से भी वो यही कह कर आई थी पर उस लड़के की ज़िद पर वो शाम को ही निकल पड़ी.

वो जब अपने घर के लिए वापिस निकली तो शाम के तकरीबन 5 बज रहे थे. यूँ तो रास्ता सिर्फ़ 3 घंटे का था और ठकुराइन जानती थी के अंधेरा होते होते वो वापिस हवेली पहुँच जाएँगी पर उस दिन किस्मत ही धोखा दे गयी.

रास्ते में पहले तो गाड़ी पंक्चर हुई और फिर खराब जिसका नतीजा ये निकला के अब वो अकेली 6 लोगों से घिरी खड़ी थी और ड्राइवर की लाश नीचे ज़मीन पर पड़ी थी.

अंधेरा फेल चुका था. रात के यूँ तो सिर्फ़ 9 ही बजे थे पर ये गाओं का इलाक़ा था, शहर का नही. यहाँ लोग शाम के 7 बजते बजते अपने घरों में घुस जाते हैं और 9 बजते बजते तो सो जाते हैं. सरिता देवी जानती थी के इस रास्ते पर अब कोई नही आएगा जो उनकी मदद कर सके. और कोई अगर भूले भटके आ भी गया तो उसका भी वही हाल होना है जो उनके ड्राइवर का हुआ.

"ठकुराइन सरिता देवी जी" अंधेरे से एक भारी आवाज़ आई "बंदा आपको झुक कर सात सलाम ठोकता है"

आवाज़ के साथ ही आवाज़ का मालिक अंधेरे से निकल कर बाहर आया. बाकी के 6 लोगों ने अपने चेहरे पर कपड़ा डाल रखा था, बस एक वही था जिसके चेहरे पर को नकाब नही थी. ठकुराइन उसको देखते ही पहचान गयी. उसकी तस्वीर कई बार अख़बार में देखी थी.

"राजन" उन्होने धीमी आवाज़ में कहा

"भाई कमाल हो गये" राजन हस्कर बोला "आप तो पहचान गयी हमें"

"ये तुम ठीक नही कर रहे राजन" ठकुराइन ने धमकी देने की कोशिश की "अगर ठाकुर साहब को पता चला तो ..."

"तो क्या?" उनकी बात बीच में ही काट कर राजन ज़ोर से चिल्लाया "तो क्या?"

कहते ही अचानक वो बहुत तेज़ी से सरिता देवी के करीब आया और उनके चेहरे के बिल्कुल करीब आकर रुक गया.

"तो क्या ठकुराइन?" उसने फिर सवाल किया. सरिता देवी के मुँह से जवाब ना निकला.

राजन धीरे से मुस्कुराया और उस लड़के की तरफ गया. उसके 2 आदमी लड़के को दोनो तरफ से पकड़े खड़े थे. राजन उसके करीब आया और लड़के के सर पर प्यार से हाथ फेरा.

"बेटा है आपका?" उसने ठकुराइन से पलट कर पुछा

सरिता देवी ने जवाब नही दिया.

"मार दो लड़के को" उसने अपने एक आदमी से कहा

"नही" सरिता देवी फ़ौरन चिल्लाई.

राजन एक भारी डील डौल का आदमी था. कद 6"4 से कम नही था और उसपर वो हाढ़ चौड़ा था. चेहरे पर बड़ी बड़ी मूँछछ और रंग एकदम काला. रात के अंधेरे में ऐसा लग रहा था जैसे खुद यमराज उतर आए हों.

"क्यूँ क्या हुआ?" राजन ने पुछा "अभी जब मैने पुछा के क्या आपका बेटा है तो आपने कोई जवाब नही दिया. मुझे लगा के नौकर है कोई. वैसे हुलिए से नौकर ही लग रहा है"

"उसको कुच्छ मत करना" सरिता देवी ने कहा

"चलिए फिर पुछ्ता हूँ" राजन बोला "क्यूँ? बेटा है आपका?"

सरिता देवी ने हां में सर हिलाया.

"नाम क्या है बेटा तुम्हारा?" उसने लड़के से पुछा

लड़के ने कोई जवाब नही दिया. राजन ने फिर पुचछा पर फिर भी वो लड़का चुप चाप खड़ा उसको देखता रहा.

"अबे बोलता क्यूँ नही? मुँह में ज़ुबान नही है? गूंगा है?" राजन ने अचानक उस लड़के के बाल पकड़ कर खींचे.

लड़का फिर भी कुच्छ नही बोला. बस डरा सहमा सा राजन को देखता रहा.

"लगता है गूंगा ही है सरदार" राजन का एक आदमी पिछे से बोला.

"ठाकुर खानदान में गूंगे पैदा होने लगे? ऐसे कैसे चलेगा?" राजन ज़ोर से हसा. उसके पिछे पिछे उसके आदमी भी हस्ने लगे.

"तुम्हें जो चाहिए ले लो राजन" सरिता देवी हिम्मत करके बोली "हमें जाने दो"

राजन पलटकर उनके करीब आया.

"मुझे जो चाहिए ले लूँ?" उसने मुस्कुराते हुए पुचछा "जो भी चाहिए ले लूँ? आपका पता भी है के मुझे क्या चाहिए?"

कहते हुए उसने सरिता देवी पर उपेर से नीचे तक नज़र फिराई. सर से पावं तक ऐसा जायज़ा लिया जैसे उन्हें आँखो आँखो में नाप रहा हो. नज़र एक पल के लिए ठकुराइन की चूचियों पर रुकी और फिर उनके चेहरे पर. वो धीरे से मुस्कुराया.

ठकुराइन इशारा समझ गयी.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --16

gataank se aage........................

Vo apni soch mein hi gum tha ke apne lund par use ek aath mehsoos hua. Haath Bindiya ka tha. Vo jaag gayi thi. Chander ke uski taraf muskura kar dekha.

"Kya hua?" Usne ishare se puchha "Kya chahiye?"

"Tera Lund" Bindiya ne kaha aur poori Chander ke uper chadh gayi.

Chander apni soch mein hi gum tha ke apne lund par use ek aath mehsoos hua. Haath Bindiya ka tha. Vo jaag gayi thi. Chander ke uski taraf muskura kar dekha.

"Kya hua?" Usne ishare se puchha "Kya chahiye?"

"Tera Lund" Bindiya ne kaha aur poori Chander ke uper chadh gayi.

Par Chander Bindiya ko tadpane ke mood mein tha. Jaise hi Bindiya uske uper aayi, usne uske kandhe pakde aur phir bistar par gira diya aur khud uske uper aa gaya.

"Kya Chahiye?" Usne phir ishare puchha

"Tera Lund" Bindiya ne jawab diya. Vo poori tarah se nangi padi thi.

"Kahan chahiye?" Chander ne phir ishara kiya.

"Arrey tu jahan chahe daal de. Ek widhwa aurat ko bistar pe garam karke puchhta hai ke kahan ghusana hai? Tu jahan chahe ghusa de" Bindiya besabri hoti hui boli.

Usne ek haath apne aur Chander ke beech mein ghusake uska lund pakad liya. Khud vo bistar par apni kamar par leti hui. Taange dono pheli hui aur taango ke beech Chander betha tha. Chadar kabki sarak kar bistar se neeche gir chuki thi.

Bindiya ne lund pakad kar uper uper se hi apni choot par ragda.

"Mmmmm, Aur tu bata, tujhe kya chahiye?" Vo muskurayi.

Chander ne uski choot ki taraf ishara kiya

"Toh daal na andar. Ruka kyun hai," Bindiya Chander ko apni baahon mein khinchti hui boli. Usne apni taange aur kholi aur gaand thodi hawan mein uthayi taaki Chander poori tarah se uski choot mein sama sake

"Tera jab dil kare tab aake ghusa le, main rokungi nahi." Bindiya madhosh si aawaz mein boli

Usni apne dono haathon se Chander ki gaand ko jakad liya.Apne ghutne ko achhi tarah phelate hue moda aur apne choot ko lund par dabaya. Lund ka agla hissa badi aasani se choot mein ghusta chala gaya.

"Aaaahhhhhhhh" Bindiya ne aah bhari aur apni aankhen band kar li.

Chander uper se Bindiya ki taraf dekh kar muskuraya. Bindiya poori tarah uske vash mein thi. Vo jo chahta, vahi karti.

Bindiya ne Chander ka chehra pakda aur apni chhatiyon ki taraf khincha. Uska ek haath Chander ke sar par tha aur doosra haath uski gaand par.

"Aadhi raat ko phir se garam kar diya tune mujhe" Bindiya badbadayi, Neeche se vo apni gaand hilkar apni choot Chander ke lund aur tatto par ragad rahi thi.

Aur phir kamre mein vaashna ka toofas sa aa gaya. Dono mein se kisi ko hish nahi tha ke neeche zameen par ek 10-12 saal ki bachchi Payal so rahi thi. Chander ne lund choot mein tezi ke saath andar bahar karna shuru kar diya aur Bindiya ne apni dono taange kaskar uski kamar par mod li. Uper se aate Chander ke har dhakke ka jawab vo neeche se apni gaand uthakar de rahi thi. Apni dono pair usne Chander ki gaand par ada rakhe the. Vo thodi der pehle hi Chander se chudwa kar soyi thi par Chander samajh chuka tha ke is aurat ko vo jitna chahe chode, usko kabhi bhi poora nahi padega.

Neeche se Bindiya pagal ki tarah karahti hui apni gaand hila rahi thi. Lund choot mein poora andar bahar ho raha tha. Chodte chodte Chander ne uski ek chhati apne munh mein le li aur nipple choosne laga. Kabhi vo nipple ko hontho mein dabake choota, kabhi jeebh phirata aur kabhi daant se kaat deta. Neeche se Bindiya ki aati aawaz ko sunkar vo janta tha ke uske neeche jo aurat thi, vo bistar par kisi randi se kam nahi thi.

"Mmmmm, Zor se, zor se , Chander!" Bindiya jaise chilla uthi. "Ohhhh, Chander, Chod mujhe! Ahhhh, Bahut maza aa raha hai, poora andar ghusa.... haan aise hi ... aaahhhhh!"

Chander poori taakat se lund choot mein andar bahar karne laga.

"Chot beta, chod mujhe!" Neeche padi Bindiya usko aur uksa rahi thi. "Apni maan ko hi chod raha hai tu ....aaaahhhh ... mard ki tarah chod, bachche ki tarah kya chod raha hai ... aur zor se ... aur zor se!"

Chander ne apne dono haathon se Bindiya ki gaand ko pakda hua tha aur ragad raha tha. Uski ek anguli gaand par sarakte sarakte sidhi Bindiya ke gaand ke beech aaayi.

"Aaaaahhhh!" Bindiya tadap uthi. "Ye kya kar raha hai ... yahan bhi ghusayega kya?!"

Uski aawaz sunte hi Chander ne bhi bina ruke apni anguli thodi si Bindiya ki gaand ke andar kar di aur poori tezi se lund andar bahar karne laga.

Gaand mein anguli jaate hi Bindiya kisi nagin ki tarah phunkarne ki aawaz karne lagi. Chander ki aankhon mein dekhte hue vo uski anguli par apni gaand sikodne lagi aur achanak aage ko hokar uska nichla honth choosne lagi. Choosne kya vo toh jaise uska honth chaba rahi thi. Chander ko ek pal ke liye laga ke maze ke karan kahin ye aurat bistar par marr hi na jaaye.

"Ooohhh! Ahhhh, zor se, zor se!" co chillayi. "Poora mard ho gaya hai re tu to! Socha bhi nahi tha maine ke jis zara se bachche ko apne ghar leke aa rahi hoon vahin ek din bistar par mujhe ragdega. Kab itna bada ho gaya re tu ke apni maan ke barabar ki aurat ko chod raha hai?"

Bindiya badbadaye ja rahi thi

Chander ka poora dhyaan apne lund ki taraf tha jise vo Bindiya ke choot mein andar bahar hota dekh raha tha. Bindiya ki choot kitni geeli ho rakhi thi aur kitni aasani se uska lund le rahi thi.

Achanak Bindiya ka poora shareer jaise tharra utha. Usne apni gaand hawa mein jitna ho saka utha di aur lund chhot mein poora ka poora le liya. Uski saans jaise atakne lagi thi. Chander ke har dhakke par uski chhatiyan hil rahi thi jinhen Bindiya ne apne dono haathon mein jakad liya.

"Mera nikalne wala hai Chander!" vo boli. "Ab rukna mat ... rukna mat! Hey Bhagwan! Haan aise hi ... karta reh !zor se, zor se! zor se Chod, Chander! Maar meri choot! ghusa de andar, aur andar, aur tez!"

Chander ne theek usi pal apni anguli takreeban aadhi Bindiya ki gaand ke andar kar di. Aur isi ke saath Bindiya ne usko buri tarah jakad liya, apne daant uske kandhe par gada diye.

"Aaaahhhhh!" Bindiya chillayi. "Marr gayi main!"

Chander bhi poori tezi se apne lund choot mein andar bahar karne laga. Vo lund poora bahar nikal leta aur phir se andar ghusata. Aur phir uske gale se ek bhaari aawaz nikli aur lund se veerya chhot pada aur Bindiy ki choot ko bharne laga.

Bindiya ko choot mein bharte hue Chander ke pani ka ehsaas hua toh vo ek baar phir chilla uthi.

Thakurain Sarita Devi dari sehmi ek taraf khadi thi. Unki gaadi ke paas hi unke driver ki laash padi thi jiska gala kaat kar jaan le li gayi thi. Hatyaare unke saamne hi khade thi.

Vo Rajan ke log the ye baat vo samajh thi. Rajan us ilaake ka ek jana mana daket tha jo raat ko sadak se guzarte musafiro ko lootne ke liye mash-hoor tha. Is waqt unke giroh ne Thakurain ki gaadi ko rok kar unhen ghera hua tha.

Apni behen ke ghar se nikalte waqt hi Thakurain ko lag gaya tha ke vo theek nahi kar rahi hain. Vo apni chhoti behen se milne paas ke gaon aayi hui thi.

Saath mein ek driver tha aur vo 17-18 saal ka ladka. unka irada toh raat ko ruk kar agle din jaane ka tha aur Thakur Sahab se bhi vo yahi keh kar aayi thi par us ladke ki zid par vo shaam ko hi nikal padi.

Vo jab apne ghar ke liye vaapis nikli toh shaam ke takreeban 5 baj rahe the. Yun toh raasta sirf 3 ghante ka tha aur Thakurain jaanti thi ke andhera hote hote vo vaapis Haweli pahunch jaayengi par us din kismat hi dhokha de gayi.

Raaste mein pehle toh gaadi puncture hui aur phir kharab jiska nateeja ye nikla ke ab vo akeli 6 logon se ghiri khadi thi aur driver ki laash neeche zameen par padi thi.

Andhera phel chuka tha. Raat ke yun toh sirf 9 hi baje the par ye gaon ka ilaka tha, shehar ka nahi. Yahan log shaam ke 7 bajte bajte apne gharon mein ghus jaate hain aur 9 bajte bajte toh so jaate hain. Sarita Devi jaanti thi ke is raaste par ab koi nahi aayega jo unki madad kar sake. Aur koi agar bhoole bhatke aa bhi gaya toh uska bhi vahi haal hona hai jo unke driver ka hua.

"Thakurain Sarita Devi Ji" Andhere se ek bhaari aawaz aayi "Banda aapko jhuk kar saat salam thokta hai"

Aawaz ke saath hi aawaz ka maalik andhere se nikal kar bahar aaya. Baaki ke 6 logon ne apne chehre par kapda daal rakha tha, bas ek vahi tha jiske chehre par ko nakaab nahi thi. Thakurain usko dekhte hi pehchan gayi. Uski tasveer kai baar akhbaar mein dekhi thi.

"Rajan" Unhone dheemi aawaz mein kaha

"Bhai kamal ho gaye" Rajan haskar bola "Aap toh pehchaan gayi hamen"

"Ye tum theek nahi kar rahe Rajan" Thakurain ne dhamki dene ki koshish ki "Agar Thakur Sahab ko pata chala toh ..."

"Toh kya?" Unki baat beech mein hi kaat kar Rajan zor se chillaya "Toh kya?"

Kehte hi achanak vo bahut tezi se Sarita Devi ke kareeb aaya aur unke chehre ke bilkul kareeb aakar ruk gaya.

"Toh kya Thakurain?" Usne phir sawal kiya. Sarita Devi ke munh se jawab na nikla.

Rajan dheere se muskuraya aur us ladke ki taraf gaya. Uske 2 aadmi ladke ko dono taraf se pakde khade the. Rajan uske kareeb aaya aur ladke ke sar par pyaar se haath phera.

"Beta hai aapka?" Usne Thakurain se palat kar puchha

Sarita Devi ne jawab nahi diya.

"Maar do ladke ko" Usne apne ek aadmi se kaha

"Nahi" Sarita Devi fauran chillayi.

Rajan ek bhaari deel daul ka aadmi tha. Kad 6"4 se kam nahi tha aur uspar vo hadh chauda tha. Chehre par badi badi moonchh aur rang ekdam kala. Raat ke andhere mein aisa lag raha tha jaise khud Yamraj utar aaye hon.

"Kyun kya hua?" Rajan ne puchha "Abhi jab maine puchha ke kya aapka beta hai toh aapne koi jawab nahi diya. Mujhe laga ke naukar hai koi. Vaise huliye se naukar hi lag raha hai"

"Usko kuchh mat karna" Sarita Devi ne kaha

"Chaliye phir puchhta hoon" Rajan bola "Kyun? Beta hai aapka?"

Sarita Devi ne haan mein sar hilaya.

"Naam kya hai beta tumhara?" Usne ladke se puchha

Ladke ne koi jawab nahi diya. Rajan ne phir puchha par phir bhi vo ladka chup chap khada usko dekhta raha.

"Abe bolta kyun nahi? Munh mein zubaan nahi hai? Goonga hai?" Rajan ne achanak us ladke ke baal pakad kar khinche.

Ladka phir bhi kuchh nahi bola. Bas dara sehma sa Rajan ko dekhta raha.

"Lagta hai goonga hi hai sardar" Rajan ka ek aadmi pichhe se bola.

"Thakur khandaan mein goonge paida hone lage? Aise kaise chalega?" Rajan zor se hasa. Uske pichhe pichhe uske aadmi bhi hasne lage.

"Tumhein jo chahiye le lo Rajan" Sarita Devi himmat karke boli "Hamein jaane do"

Rajan palatkar unke kareeb aaya.

"Mujhe jo chahiye le loon?" Usne muskurate hue puchha "Jo bhi chahiye le loon? Aapka pata bhi hai ke mujhe kya chahiye?"

Kehte hue usne Sarita Devi par uper se niche tak nazar phirayi. Sar se paon tak aisa jaayza liya jaise unhen aankho aankho mein naap raha ho. Nazar ek pal ke liye Thakurain ki chhatiyon par ruki aur phir unke chehre par. Vo dheere se muskuraya.

Thakurain ishara samajh gayi.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:07

खूनी हवेली की वासना पार्ट --17

गतान्क से आगे........................

"हिम्मत भी मत करना नीच आदमी" अचानक उनके अंदर का ठाकुर खून जाग उठा "तुझ जैसे को मैं अपनी जूती तले रखती हूँ. मेरे साथ कुच्छ करने का सोचना भी मत"

राजन के चेहरे के रंग बदलते चले गये. वो आगे बढ़ा और ठकुराइन के चेरहे पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मारा और दूसरे हाथ से उनकी सारी का पल्लू खींच दिया.

सरिता देवी हक्की बक्की रह गयी. थप्पड़ इतनी ज़ोर से था के उन्हें लगा जैसे रात में ही सूरज निकल आया हो. वो गिरते गिरते बची और फ़ौरन अपनी सारी पकड़ी.

"मैं तुझे बताता हूँ के तेरी औकात क्या है. जब यहाँ ये मेरे 6 आदमी तुझपर चढ़कर उतरेंगे तो पता चल जाएगा तुझे" कहते हुए उसने ठकुराइन को वापिस गाड़ी की पिच्छली सीट पर धकेलना शुरू किया.

"चल आज इसी गाड़ी में तेरे साथ सुहाग रात मना लेता हूँ"

"राजन छ्चोड़ दे मुझे. ठाकुर तेरे टुकड़े टुकड़े करवा देंगे. मेरे साथ यहाँ जो तू करेगा वो तो यहीं ख़तम हो जाएगा पर फिर तेरे साथ क्या होगा ये सोच ले" ठकुराइन हिम्मत करके बोली. उन्हें खुद हैरत थी के अपनी इज़्ज़त की गुहार लगाने के बजाय वो खुद राजन को धमकी दे रही थी.

और शायद धमकी असर कर गयी. राजा रुक गया और कुच्छ पल के लिए चुप होकर सोचने लगा.

"सही कह रही हो आप" वो थोड़ी देर बाद बोला "यहाँ जो होगा वो तो यहीं ख़तम हो जाएगा. आप अबला नारी बन जाओगी और हम दरिंदे. तो चलिए खेल एक दूसरी तरह से खेलते हैं. इस तरह से के आज की रात ठाकुर खानदान में आने वाले कई सालों तक याद की जाए. इस तरह से के आज की रात हवेली में रहने वालो का हवेली में रहना मुश्किल कर दे"

सब चुप खड़े उसकी बात सुन रहे थे.

"इस लड़के को इधर लाओ ओये" राजन ने अपने आदमियों से कहा. वो लड़के को पकड़कर करीब ले आए.

"तो ठकुराइन जी" राजन सरिता देवी से बोला "अब मैं तो ठहरा गंदा खून जो आपको हाथ भी नही लगा सकता पर आपका बेटा तो ठाकुरों का खून है ना. तो ऐसा करते हैं के आपके साथ आज सुहाग रात मैं नही, आपका अपना बेटा मनाएगा."

सरिता देवी का मुँह हैरत से खुला रह गया.

"क्यूँ क्या हुआ ठकुराइन?" राजन हस्ता हुआ बोला "हम गंदा खून हैं पर आपका अपना बेटा तो नही"

वो लड़का हैरत से खड़ा कभी सरिता देवी की तरफ देखता तो कभी राजन की तरफ.

"चल ओये आगे बढ़ और अपनी माँ के कपड़े उतार" राजन उसको धकेलटा हुआ बोला.

"नही" सरिता देवी लगभग चीख उठी "भगवान का ख़ौफ्फ खा राजन. ऐसा पाप करने से पहले सोच ले. इस ज़मीन पर ठाकुर और उपेर आसमान में भगवान तेरा क्या हाशर करेंगे एक बार सोच"

"सोचा तो मैने कभी ज़िंदगी में नही ठकुराइन" राजन ने कहा "सोचा होता तो आज डाकू थोड़े ही होता. आप लोगों की तरफ पढ़ा लिखा शरीफ आदमी होता"

उसकी बात सुनकर उसके सारे आदमी हस पड़े.

"चल ओये आगे बढ़" राजन ने फिर उस लड़के को धकेला पर वो अपनी जगह पर ही खड़ा रहा. उसका पूरा शरीर पत्ते की तरह काँप रहा था.

"सरदार ये गूंगा क्या करेगा" राजन का एक आदमी बोला "इसकी हालत देखो. लगता है यहीं खड़े खड़े मूत देगा"

राजन ने लड़के को गौर से देखा.

"बात तो सही है ठकुराइन" वो सरिता देवी से बोला "ये ज़रा सा बच्चा क्या करेगा आपके साथ. एक काम करते हैं. आप खुद क्यूँ नही सिखाती अपने बेटे को कुच्छ?"

सरिता देवी कुच्छ नही बोली. चुप चाप खड़ी रही.

"आगे बढ़ो ठकुराइन और शुरू करो. मैं बेसबरा हो रहा हूँ कुच्छ खेल तमाशा देखने को" राजन ने कहा

"तुम्हें जो करना है मेरे साथ कर लो. पर ये मत कर्वाओ मुझसे" सरिता देवी ने एक आखरी कोशिश की.

जवाब में राजन ने एक लंबा सा च्छुरा निकाला और उस आदमी के हाथ में दिया जो उस लड़के को पकड़े खड़ा था.

"अगर अगले एक मिनिट के अंदर अंदर ठकुराइन ने काम शुरू नही किया तो लड़के की गर्दन उड़ा देना"

"नही" सरिता देवी लगभग चीख उठी "मैं करती हूँ"

"शाबाश" राजन बोला "तो चलिए अब जैसा जैसा मैं करता हूँ वैसा वैसा करती जाओ"

सब खामोशी से सरिता देवी की तरफ देख रहे थे.

"और सुन ओये" राजन अपने आदमी से बोला "अगर ठकुराइन मेरी बात मानने में ज़रा भी आना कानी करें तो फ़ौरन लड़के का सर धड़ से अलग कर देना"

उसके आदमी ने दाँत दिखाते हुए हां में सर हिला दिया.

"शाबाश ठकुराइन जी" राजन बोला "तो चलिए शुरू करते हैं आपको नंगी देखने से. अब एक एक करके अपने कपड़े उतारिये ज़रा. हम भी तो देखें के ठाकुर खानदान की औरतें अंदर से कैसी होती हैं"

सरिता देवी शरम से गढ़ गयी. आज तक उनकी पूरी ज़िंदगी में उनेह्न उनके अपने पति के सिवा किसी और ने बेपर्दा नही देखा था. और आज 7 मर्द और एक 17-18 साल के लड़के के सामने उन्हें नंगी होने पर मजबूर किया जा रहा था.

"काट दे गर्दन" राजन ने जब देखा के ठकुराइन कुच्छ नही कर रही तो उसने अपने आदमी को इशारा किया.

सरिता देवी ने फ़ौरन अपनी सारी का पल्लू अपने कंधे से हटाया और सारी खोलनी शुरू कर दी. सबकी नज़रें उनके जिस्म पर आकर चिपक गयी.

सारी खोलकर सरिता देवी ने नीचे गिरा दी और हाथ बाँधकर खड़ी हो गयी.

"ब्लाउस" राजन ने इशारा किया

सरिता देवी एक पल को झिझकी और फिर अपना ब्लाउस खोलने लगी. थोड़ी ही देर बाद वो सिर्फ़ ब्रा और पेटिकट में खड़ी थी. ब्लाउस के नीच गिरते ही किसी आदमी के मुँह से आह निकली, तो किसी ने सीटी बजाई.

सरिता देवी फिर रुक गयी.

"ठकुराइन मैने आपको पूरी नंगी होने को कहा है" राजन बोला "अगर अगली बार पूरी नंगी होने से पहले रुकी तो कसम से इस लौंदे की लाश यहीं पड़ी होगी"

आसमान में पूरा चाँद था और बस वही एक रोशनी उस वक़्त उस रास्ते पर थे. हर चीज़ चाँद की रोशनी में चमक रही थी और चमक रहा था सरिता देवी का जिस्म जो अब उन सब के बीच पूरी तरह नंगी खड़ी थी. उन्होने दोनो टांगे सिकोड रखी थी और एक हाथ से अपनी चूत और दूसरे से अपनी चूचियाँ जितनी हो सकें ढक रखी थी.

"क्या बात है" राजन ने कहा "भगवान ने क्या खूब बनाया है आपको ठकुराइन"

हर कोई उस वक़्त नंगी खड़ी ठकुराइन के बेदाग जिस्म को देख रहा था. बड़ी बड़ी चूचियाँ, गोरा चितता रंग, शरीर पर कहीं कोई दाग या धब्बा नही, बिल्कुल सपाट पेट, कहीं कोई चारभी का निशान नही, लंबी सुडोल टाँग.

"अपने बाल खोल दीजिए ठकुराइन" राजन ने हुकुम दिया.

सरिता देवी एक पल को झिझकी. बाल खोलना मतलब एक हाथ चूत या चूचियो पर से हटाना. वो शरम से गढ़ी जा रहीं थी. इतनी बे-इज़्ज़त वो अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी नही हुई थी.

"हे भगवान!" उन्होने मंन ही मंन में सोचा "ये दिन दिखाने से पहले मुझे उठा क्यूँ नही लिया"

"मार दो लड़के को" राजन की फिर आवाज़ आई तो वो जैसे एक सपने से जागी और फ़ौरन अपनी छातियो वाला हाथ उपेर किया, बाल खोले और फिर अपनी चूचियाँ ढक ली.

उनकी बड़ी बड़ी चूचियाँ एक पल को खुली और हर किसी के मुँह से एक ठंडी आह निकल पड़ी.

"सीधी खड़ी हो जाइए ठकुराइन" राजन ने कहा "अपने हाथ हटाइए"

सरिता देवी जानती थी के अगर उन्होने हाथ नही हटाए तो आगे क्या होगा" धीरे धीरे झिझकते हुए उन्होने अपने दोनो हाथ साइड में गिरा दिए.

अब वो पूरी तरह से नंगी, पूरी खुली हुई खड़ी थी.

किसी की नज़र उनकी चूचियो से चिपक कर रह गयी तो किसी की नज़र उनकी चूत पर और कोई उनके पूरे शरीर को उपेर से नीचे तक देख रहा था.

"कमाल हैं कसम से" राजन सरिता देवी के चारों तरफ गोल घूम रहा था और उन्हें उपेर से नीचे तक देख रहा था "बहुत नंगी औरतें देखी हैं ज़िंदगी में ठकुराइन पर कोई आपके जैसी नही देखी. दिल तो करता है के आपको यहीं गिराकर रगड़ दूँ पर वादे का पक्का है राजन. वादा किया के कोई कुच्छ नही करेगा आपके साथ तो कोई नही करेगा, सिवाय आपके बेटे के"

उसकी बात सुनकर ठकुराइन को उस लड़के की याद आई. वो तो जैसे भूल ही गयी थी उसके बारे में. उन्होने नज़र उठाकर उसकी तरफ देखा. वो अपनी नज़र नीची किए खड़ा था और अब भी काँप रहा था.

"चलिए ठकुराइन" राजन ने कहा "आगे बढ़िए. सिखाइए अपने बेटे को के औरत के जिस्म के साथ कैसे खेला जाता है"

ठकुराइन की टाँगें काँप उठी और उनका रोना छूट पड़ा. अब तक उन्होने एक भी ऐसी हरकत नही की थी जिससे राजन को ये लगे के वो डर रही हैं उससे पर आख़िर थी तो एक औरत ही. कब तक बर्दाश्त करती.

"अर्रे अर्रे सरदार" उन्हें रोता देखकर एक आदमी बोला "बेचारी ठकुराइन खुद अपने बेटे को ये सब कैसे सीखा सकती हैं. आप क्यूँ नही मदद करते ये बताकर के ठकुराइन को क्या करना चाहिए"

"हां बिल्कुल ठीक बात है" राजन हस्ता हुआ बोला "तो चलिए मैं आपकी मदद करता हूँ ठकुराइन" मैं बताता हूँ और आप करती जाइए. और याद रखना, अगर आप रुकी तो लड़के की गर्दन कटी. अब आप आगे बढ़िए और अपने बेटे के पास जाइए"

सरिता देवी अपना रोना दबाते हुए लड़के के करीब पहुँची.

"अब जैसा की आप देख सकती हैं के आपका बेटा काफ़ी डरा हुआ है. इस वक़्त जोश में नही हैं इसलिए कुच्छ भी कर नही पाएगा. तो एक माँ होने के नाते आपका फ़र्ज़ है के अपने बेटे का डर डोर कीजिए और उसको जोश में लाइए"

सरिता देवी को राजन की बात समझ नही आई.

"ओह्ह आप समझी नही?" राजन उनकी शकल की तरफ देखता हुआ बोला "अर्रे मेरा मतलब वही था, अँग्रेज़ी स्टाइल. आप अपने घुटनो पर बैठ जाइए"

सरिता देवी समझ गयी के वो क्या चाह रहा था पर ना बोलने का अंजाम भी वो जानती थी. चुप चाप अपने घुटनो पर बैठ गयी.

उनके अपने सामने बैठे ही लड़के ने पिच्चे हटने की कोशिश की पर पिछे से उसके एक आदमी पकड़े खड़ा था इसलिए कामयाब ना हो सका.

"आप जानती हैं के आपको क्या करना है" राजन बोला

सरिता देवी ने किसी हलाल होती मुर्गी की तरह राजन की तरफ देखा, ये सोचकर के शायद वो तरस खा ले पर राजन के चेहरे के भाव ज़रा भी नही बदले.

"शुरू हो जाइए वरना च्छुरा चल जाएगा"

सरिता देवी ने काँपते हाथों से लड़के के पाजामे का नाडा खोला. लड़के के पिछे खड़े आदमी ने उसका कुर्ता उठाकर उपर पकड़ लिया. नडा खुलते ही पाजामा नीचे आ गिरा.

"शाबाश" पाजामा खुलते ही राजन बोला "अब ज़रा अपने मुँह का कमाल दिखाइए"

सरिता देवी की आँखें भर आई थी. जो काम राजन उन्हें करने को कह रहा था वो करना उनको बहुत पसंद था, पर अपनी मर्ज़ी से और अपने पति के साथ. सामने खड़े अपने बेटे की उमर के लड़के के साथ नही, वो भी मर्ज़ी के खिलाफ.

"ठकुराइन" पीछे से राजन की आवाज़ आई.

सरिता देवी ने अपने आपको किस्मत पर छ्चोड़ा और आँखें बंद कर ली. अपने कमरे में अपने पति के साथ वो ये काम हमेशा आँखें खोलकर करती थी ताकि ठाकुर के चेहरे पर गुज़रते भाव देख सकते. वो जब भी ठाकुर का चूस्ति, तो ठाकुर मज़े से कराह उठता था और उस हालत में उसको देखना सरिता देवी को बहुत पसंद था. पर इस उन्होने अपनी आँखें बंद करके अपना मुँह खोला.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --17

gataank se aage........................

"Himmat bhi mat karna neech aadmi" Achanak unke andar ka Thakur khoon jaag utha "Tujh jaise ko main apni jooti tale rakhti hoon. Mere saath kuchh karne ka sochna bhi mat"

Rajan ke chehre ke rang badalte chale gaye. Vo aage badha aur Thakurain ke cherhe par ek zordar thappad maara aur doosre haath se unki saree ka pallu khinch diya.

Sarita Devi hakki bakki reh gayi. Thappad itni zor se tha ke unhen laga jaise raat mein hi sooraj nikal aaya ho. Vo girte girte bachi aur fauran apni saree pakdi.

"Main tujhe batata hoon ke teri aukaat kya hai. Jab yahan ye mere 6 aadmi tujhpar chadhkar utrenge toh pata chal jaayega tujhe" Kehte hue usne Thakurain ko vaapis gaadi ki pichhli seat par dhakelna shuru kiya.

"Chal aaj isi gaadi mein tere saath suhag raat mana leta hoon"

"Rajan chhod de mujhe. Thakur tere tukde tukde karwa denge. Mere saath yahan jo tu karega vo toh yahin khatam ho jayega par phir tere saath kya hoga ye soch le" Thakurain himmat karke boli. Unhen khud hairat thi ke apni izzat ki guhaar lagane ke bajaay vo khud Rajan ko dhamki de rahi thi.

Aur shayad Dhamki asar kar gayi. Raja ruk gaya aur kuchh pal ke liye chup hokar sochne laga.

"Sahi keh rahi ho aap" Vo thodi der baad bola "Yahan jo hoga vo toh yahin khatam ho jaayega. Aap abla naari ban jaogi aur ham darinde. Toh chaliye khel ek doosri tarah se khelte hain. Is tarah se ke aaj ki raat Thakur khandaan mein aane wale kai saalon tak yaad ki jaaye. Is tarah se ke aaj ki raat Haweli mein rehne walo ka Haweli mein rehna mushkil kar de"

Sab chup khade uski baat sun rahe the.

"Is ladke ko idhar laao oye" Rajan ne apne aadmiyon se kaha. Vo ladke ko pakadkar kareeb le aaye.

"Toh Thakurain ji" Rajan Sarita Devi se bola "Ab main toh thehra ganda khoon jo aapko haath bhi nahi laga sakta par aapka beta toh Thakuron ka khoon hai na. Toh aisa karte hain ke aapke saath aaj suhaag raat main nahi, aapka apna beta manayega."

Sarita Devi ka munh hairat se khula reh gaya.

"Kyun kya hua Thakurain?" Rajan hasta hua bola "Ham ganda khoon hain par aapka apna beta toh nahi"

Vo ladka hairat se khada kabhi Sarita Devi ki taraf dekhta toh kabhi Rajan ki taraf.

"chal oye aage badh aur apni maan ke kapde utaar" Rajan usko dhakelta hua bola.

"Nahi" Sarita Devi lagbhag cheekh uthi "Bhagwan ka khauff kha Rajan. Aisa paap karane se pehle soch le. Is zameen par Thakur aur uper aasman mein bhagwan tera kya hashar karenge ek baar soch"

"Socha toh maine kabhi zindagi mein nahi Thakurain" Rajan ne kaha "Socha hota toh aaj daaku thode hi hota. Aap logon ki taraf padha likha shariff aadmi hota"

Uski baat sunkar uske saare aadmi has pade.

"Chal oye aage badh" Rajan ne phir us ladke ko dhakela par vo apni jagah par hi khada raha. Uska poora sharee patte ki tarah kaanp raha tha.

"Sardar ye goonga kya karega" Rajan ka ek aadmi bola "Iski haalat dekho. Lagta hai yahin khade khade moot dega"

Rajan ne ladke ko gaur se dekha.

"Baat toh sahi hai Thakurain" Vo Sarita Devi se bola "Ye zara sa bachcha kya karega aapke saath. Ek kaam karte hain. Aap khud kyun nahi sikhati apne bete ko kuchh?"

Sarita Devi kuchh nahi boli. Chup chap khadi rahi.

"Aage badho Thakurain aur shuru karo. Main besabra ho raha hoon kuchh khel tamasha dekhne ko" Rajan ne kaha

"Tumhein jo karna hai mere saath kar lo. Par ye mat karvao mujhse" Sarita Devi ne ek aakhri koshish ki.

Jawab mein Rajan ne ek lamba sa chhura nikala aur us aadmi ke haath mein diya jo us ladke ko pakde khada tha.

"Agar agle ek minute ke andar andar Thakurain ne kaam shuru nahi kiya toh ladke ki gardan uda dena"

"Nahi" Sarita Devi lagbhag cheekh uthi "Main karti hoon"

"Shabash" Rajan bola "Toh chaliye ab jaisa jaisa main karta hoon vaisa vaisa karti jaao"

Sab khamoshi se Sarita Devi ki taraf dekh rahe the.

"Aur sun oye" Rajan apne aadmi se bola "Agar Thakurain meri baat maanne mein zara bhi aana kani karen toh fauran ladke ka sar dhad se alag kar dena"

Uske aadmi ne daant dikhate hue haan mein sar hila diya.

"Shabash Thakurain ji" Rajan bola "To chaliye shuru karte hain aapko nangi dekhne se. Ab ek ek karke apne kapde utariye zara. Ham bhi toh dekhen ke Thakur Khandan ki auraten andar se kaisi hoti hain"

Sarita Devi sharam se gad gayi. Aaj tak unki poori zindagi mein unehn unke apne pati ke siwa kisi aur ne beparda nahi dekha tha. Aur aaj 7 mard aur ek 17-18 saal ke ladke ke saamne unhen nangi hone par majboor kiya ja raha tha.

"Kaat de gardan" Rajan ne jab dekha ke Thakurain kuchh nahi kar rahi toh usne apne aadmi ko ishara kiya.

Sarita Devi ne fauran apni saree ka pallu apne kandhe se hataya aur saree kholni shuru kar di. Sabki nazaren unke jism par aakar chipak gayi.

saree kholkar Sarita Devi ne neeche gira di aur haath baandhkar khadi ho gayi.

"Blouse" Rajan ne ishara kiya

Sarita Devi ek pal ko jhijhki aur phir apna blouse kholne lagi. Thodi hi der baad vo sirf bra aur petticot mein khadi thi. Blouse ke neech girte hi kisi aadmi ke munh se aah nikli, toh kisi ne seeti bajayi.

Sarita Devi phir ruk gayi.

"Thakurain maine aapko poori nangi hone ko kaha hai" Rajan bola "Agar agli baar poori nangi hone se pehle ruki toh kasam se is launde ki laash yahin padi hogi"

Aasman mein poora chand tha aur bas vahi ek roshni us waqt us raaste par the. Har cheez chand ki roshni mein chamak rahi thi aur chamak raha tha Sarita Devi ka jism jo ab un sab ke beech poori tarah nangi khadi thi. Unhone dono taange sikod rakhi thi aur ek haath se apni choot aur doosre se apni chhatiyan jitni ho saken dhak rakhi thi.

"Kya baat hai" Rajan ne kaha "Bhagwan ne kya khoob banaya hai aapko Thakurain"

Har koi us waqt nangi khadi Thakurain ke bedaag jism ko dekh raha tha. Badi badi chhatiyan, gora chitta rang, shareer par kahin koi daag ya dhabba nahi, bilkul sapaat pet, kahin koi charbhi ka nishan nahi, lambi sudol taang.

"Apne baal khol dijiye Thakurain" Rajan ne hukum diya.

Sarita Devi ek pal ko jhijhki. Baal kholna matlab ek haath choot ya chhatiyon par se hatana. Vo sharam se gadi ja rahin thi. Itni be-izzat vo apni poori zindagi mein kabhi nahi hui thi.

"Hey Bhagwan!" Unhone mann hi mann mein socha "Ye din dikhane se pehle mujhe utha kyun nahi liya"

"Maar do ladke ko" Rajan ki phir aawaz aayi toh vo jaise ek sapne se jaagi aur fauran apni chhatiyon wala haath uper kiya, baal khole aur phir apni chhatiyan dhak li.

Unki badi badi chhatiyan ek pal ko khuli aur har kisi ke munh se ek thandi aah nikal padi.

"sidhi khadi ho jaaiye Thakurain" Rajan ne kaha "Apne haath hataiye"

Sarita Devi jaanti thi ke agar unhone haath nahi hataye toh aage kya hoga" Dheere dheere jhijhakte hue unhone apne dono haath side mein gira diye.

Ab vo poori tarah se nangi, poori khuli hui khadi thi.

Kisi ki nazar unki chhatiyon se chipak kar reh gayi toh kisi ki nazar unki choot par aur koi unke poore shareer ko uper se neeche tak dekh raha tha.

"Kamal hain kasam se" Rajan Sarita Devi ke chaaron taraf gol ghoom raha tha aur unhen uper se niche tak dekh raha tha "Bahut nangi auraten dekhi hain zindagi mein Thakurain par koi aapke jaisi nahi dekhi. Dil toh karta hai ke aapko yahin girakar ragad hoon par wade ka pakka hai Rajan. Wada kiya ke koi kuchh nahi karega aapke saath toh koi nahi karega, sivaay aapke bete ke"

Uski baat sunkar Thakurain ko us ladke ki yaad aayi. Vo toh jaise bhool hi gayi thi uske baare mein. Unhone nazar uthakar uski taraf dekha. Vo apni nazar neechi kiye khada tha aur ab bhi kaanp raha tha.

"Chaliye Thakurain" Rajan ne kaha "Aage badhiye. Sikhaiye apne bete ko ke aurat ke jism ke saath kaise khela jata hai"

Thakurain ki taangen kaanp uthi aur unka rona chhut pada. Ab tak unhone ek bhi aisi harkat nahi ki thi jisse Rajan ko ye lage ke vo daar rahi hain usse par aakhir thi to ek aurat hi. Kab tak bardasht karti.

"Arrey arrey Sardar" Unhen rota dekhkar ek aadmi bola "Bechari Thakurain khud apne bete ko ye sab kaise sikha sakti hain. Aap kyun nahi madad karte ye batakar ke Thakurain ko kya karna chahiye"

"Haan bilkul theek baat hai" Rajan hasta hua bola "Toh chaliye main aapki madad karta hoon Thakurain" Main batata hoon aur aap karti jaaiye. Aur yaad rakhna, agar aap ruki toh ladke ki gardan kati. Ab aap aage badhiye aur apne bete ke paas jaaiye"

Sarita Devi apna rona dabate hue ladke ke kareeb pahunchi.

"Ab jaisa ki aap dekh sakti hain ke aapka beta kaafi dara hua hai. Is waqt josh mein nahi hain isliye kuchh bhi kar nahi payega. Toh ek maan hone ke naate aapka farz hai ke apne bete ka darr door kijiye aur usko josh mein laaiye"

Sarita Devi ko Rajan ki baat samajh nahi aayi.

"Ohh aap samjhi nahi?" Rajan unki shakal ki taraf dekhta hua bola "Arrey mera matlab vahi tha, angrezi style. Aap apne ghutno par beth jaaiye"

Sarita Devi samajh gayi ke vo kya chah raha tha par na bolne ka anjaam bhi vo jaanti thi. Chup chap apne ghutno par beth gayi.

Unke apne saamne bethte hi ladke ne pichhe hatne ki koshish ki par pichhe se uske ek aadmi pakde khada tha isliye kaamyab na ho saka.

"Aap jaanti hain ke aapko kya karna hai" Rajan bola

Sarita Devi ne kisi halal hoti murgi ki tarah Rajan ki taraf dekha, ye sochkar ke shayad vo taras kha le par Rajan ke chehre ke bhaav zara bhi nahi badle.

"Shuru ho jaaiye varna chhura chal jaayega"

Sarita Devi ne kaanpte haathon se ladke ke pajame ka nada khola. Ladke ke pichhe khade aadmi ne uska kurta uthakar upar pakad liya. Nada khulte hi pajama niche aa gira.

"Shabash" Pajama khulte hi Rajan bola "Ab zara apne munh ka kamal dikhaiye"

Sarita Devi ki aankhen bhar aayi thi. Jo kaam Rajan unhen karne ko keh raha tha vo karna unko bahut pasand tha, par apni marzi se aur apne Pati ke saath. Saamne khade apne bete ki umar ke ladke ke saath nahi, vo bhi marzi ke khilaf.

"Thakurain" Pichhe se Rajan ki aawaz aayi.

Sarita Devi ne apne aapko kismat par chhoda aur aankhen band kar li. Apne kamre mein apne pati ke saath vo ye kaam hamesha aankhen kholkar karti thi taaki Thakur ke chehre par guzarte bhaav dekh sakte. Vo jab bhi Thakur ka choosti, toh thakur maze se karah uthta tha aur us halat mein usko dekhna Sarita Devi ko bahut pasand tha. Par is unhone apni aankhen band karke apna munh khola.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 13:08

खूनी हवेली की वासना पार्ट --18

गतान्क से आगे........................

उनके सामने उस लड़के का लंड था जो उस वक़्त डर के मारे सिकुड कर मुश्किल से 1 इंच का भी नही था. उस वक़्त उसके टट्टो और लंड में कोई ख़ास फरक नही लग रहा था.

"सरदार वैसे यहाँ ठकुराइन के लिए कुच्छ ख़ास है नही. इतने से इनका क्या होगा?" लड़के के पिछे खड़ा आदमी उसके लंड को देख कर बोला और सब ज़ोर ज़ोर से हस पड़े.

"क्या ठकुराइन" राजन की आवाज़ फिर आई "ऐसे नमर्द पैदा हो रहे हैं ठाकुर खानदान में? एक तो गूंगा और उपेर से इतना सा लंड? ऐसे कैसे चलेगा?"

दोबारा हसी की आवाज़ गूँज उठी.

सरिता देवी ने आँखें बंद किए हुए अपने खुला मुँह लड़के के लंड की तरफ बढ़ाया. उस वक़्त वो लड़का और सरिता देवी दोनो ही बुरी तरह काँप रहे थे. राजन के पूरे खानदान को दिल ही दिल में कोसते हुए सरिता देवी ने लंड मुँह में ले लिया.

उस लड़का का जिस्म लंड मुँह में जाते ही ऐसा हिला जैसे 1000 वॉट का करेंट दौड़ गया हो.

"अबे खड़ा रह आराम से" उसको पकड़ने वाले ने कहा "तेरी मान तेरा लंड चूस रही है. ऐसा नसीब किसी किसी को ही नसीब होता है बेटा. सरदार का एहसान मान और मज़े ले"

फिर से एक हसी की आवाज़ गूँजी.

नीचे सरिता देवी अपने मुँह में लंड लिए बैठी थी. उनको समझ नही आ रहा था के क्या करे. वो अपने घुटनो के बल उकड़ूं बैठी आगे को झुकी हुई थी और उस लड़के का ज़रा सा लंड उनके पूरा उनके मुँह में समाया हुआ था. उन्होने आँखें खोलकर एक नज़र लड़के की तरफ उठाई. वो आँखें बंद किए खड़ा था पर उसकी आँखों से बहता पानी सरिता देवी देख चुकी थी.

"वाह क्या सीन है" राजन बोला "एक कॅमरा होता मेरे पास तो कसम से एक फोटो तो ज़रूर लेता"

फिर से हसी की आवाज़ उठी.

सरिता देवी अपने मुँह में लंड लिए वैसे ही बैठी रही. उन्होने कोई हरकत नही की. अपने पति के साथ जब लंड उनके मुँह में होता तो अपने मुँह, जीभ और हाथ का ऐसा ताल मेल बिठाकर वो चूसा करती थी के ठाकुर उनके मुँह में ही झड़ने को आ जाते थे. पर इस वक़्त वो सिर्फ़ मुँह में लंड लिए बैठी रही. ना अपनी जीभ चलाई, ना मुँह आगे पिछे किया और ना ही अपने हाथ उपेर उठाए. वो बस इस लम्हे को किसी बुरे सपने की तरह पूरा हो देना चाहती थी.

पर तभी उनके मुँह में हरकत हुई और उनकी आँखें हैरत से खुल गयी.

उस लड़के का लंड उनके मुँह में खड़ा हो रहा था.

"नही" उनका दिमाग़ ने जैसे एक चीख मारी "ये ग़लत है"

पर वो खुद भी जानती थी के इसमें उस लड़के की कोई ग़लती नही थी. भले उनके साथ उसका कोई भी रिश्ता हो पर वो एक औरत भी थी जो उस वक़्त उसका लंड अपने मुँह में लिए बैठी थी. खड़ा तो होना ही था.

धीरे धीरे लंड मुँह में बड़ा होता चला गया और सरिता देवी एक अजीब दुविधा में पड़ गयी.

अगर वो लंड मुँह से निकालती तो सब देखते के लड़के का लंड खड़ा हो गया है और हस्ते. फिर ये किसी से ना च्छूपा रहता के जो हो रहा था, उसमें उस लड़के को मज़ा आ रहा था.

दूसरा ये के लंड खड़ा होने के बाद उसको मुँह से निकाल कर ठकुराइन के अंदर कहीं और से डाला जाएगा. सरिता देवी भले ही लंड मुँह में लिए बैठी थी पर उस लड़के को अपने उपेर, अपनी टाँगो के बीच सोचकर ही उनका कलेजा दहल गया.

"नही !!" उन्होने सोचा "जो हुआ सो हुआ, इससे आगे नही"

वो अपने दिल ही दिल में ठान चुकी थी के उनको क्या करना है. और फिर जो काम वो इस वक़्त कर रही थी, ये काम करना तो बिस्तर पर वो काफ़ी अच्छी तरह से कर लेती थी.

लकड़े के खड़े होते लंड को सरिता देवी ने अपने मुँह में ही रखा. वो खड़ा होकर उनका मुँह भरता चला गया और उनके गले के अंदर तक पहुँच गया पर सरिता देवी ने ज़रा भी अपने मुँह से बाहर ना निकलने दिया.

"सरदार" एक आदमी ने कहा "ये लड़का तो नमार्द भी है शायद"

फिर से हसी की आवाज़ गूँजी.

सरिता देवी जानती थी के उनको जो करना था जल्दी ही करना था. लंड अपने मुँह में रखे रखे उन्होने अपनी जीभ लंड पर रगड़ी शुरू कर दी. वो मुँह बंद किए अंदर ही अंदर जीभ ऐसे हिला रही थी जैसे लंड को धीरे धीरे सहला रही थी.

लड़का कच्चा था, किसी औरत के साथ पहली बार था. ठकुराइन बिस्तर पर खेली खाई थी. मुश्किल से आधे मिनिट में उनकी जीभ ने काम कर दिखाया.

राजन कुच्छ सोचकर उस लड़के की तरफ बढ़ा ही था के लड़का का पूरा शरीर काँपा और उसी पल सरिता देवी ने उसका लंड मुँह से निकाल दिया. लंड से वीर्य छूट रहा था जो आधा सरिता देवी के मुँह में था और बाकी निकलकर सीधा उनके चेहरे पर जा गिरा.

"ये लो" राजन बोला "ये तो साला इतने में ही ख़तम हो गया और कहाँ हम सोच रहे थे के अब चुदाई होगी"

"सरदार" अचानक उसका एक आदमी चिल्लाया "उस तरफ"

सबने नज़र उठाकर उस तरफ देखा जहाँ वो आदमी इशारा कर रहा था. डोर कुच्छ गाड़ियों की रोशनी दिखाई दे रही थी. हेडलाइट के अंदाज़े से कहा जा सकता था के कम से कम चार गाड़ियाँ थी.

"निकलो यहाँ से" राजन ने अपने आदमियों को इशारा किया और वो सारे अगले पाले ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सर से सींग.

ठकुराइन ने भाग कर अपने कपड़े उठाए और पहेन्ने लगी. उस लड़के ने भी अपना पाजामा उपेर करके बाँध लिया.

"किसी से कुच्छ कहने की ज़रूरत नही" सरिता देवी ने उस लड़के से कहा.

गाड़ियों की रोशनी धीरे धीरे नज़दीक आती जा रही थी.

अगले दिन सरिता देवी किसी ज़िंदा लाश से ज़्यादा नही थी. मंन में हज़ार ख्याल उठ रहे थे जिन में से एक अपने आपको मार लेने का भी था. ठाकुर गुस्से से पागल हुए जा रहे थे. हर तरफ राजन को ढूँढा जा रहा था.

पूरे गाओं में और आस पास के सारे गाओं में ये बात फेल चुकी थी के राजन ने ठकुराइन की कार को रोक कर उन्हें लूटने की कोशिश की और उनके ड्राइवर को मार दिया.

उस रात हक़ीक़त में जो हुआ था वो सरिता देवी और उस लड़के के सिवा और कोई नही जानता था. ये उनकी किस्मत ही थी के उस रात ठाकुर ने उनसे बात करने के लिए उनकी बहेन के घर फोन कर दिया. जब वहाँ से पता चला के ठकुराइन शाम के 5 बजे ही अपने गाओं के लिए निकल गयी थी तो ठाकुर परेशान हो उठे. उन्होने फ़ौरन अपनी गाड़ी निकाली और अपने कुच्छ आदमियों के साथ ठकुराइन को ढूँढने के लिए निकल पड़े. पर जब तक वो सरिता देवी तक पहुँचे, देर हो चुकी थी.

सरिता देवी ने आती गाड़ियों के देख कर अंदाज़ा लगा लिया था के ठाकुर ही उनको ढूँढते हुए आ रहे हैं. राजन के आदमी वहाँ से भाग चुके थे. ठकुराइन ने फ़ौरन अपने कपड़े पहने और अपनी हालत ठीक की. जब तक ठाकुर की गाड़ी आकर रुकी, सरिता देवी को देख कर ये कोई नही कह सकता था के अभी थोड़ी देर पहले ये औरत नंगी बैठी लंड चूस रही थी.

ठाकुर आए तो उन्होने सिर्फ़ इतना ही बताया के राजन ने उनकी गाड़ी रोकी और उन्हें लूटने की कोशिश की. जब उन्होने विरोध किया तो उनके ड्राइवर को मार दिया गया और ठकुराइन को भी थप्पड़ मारा. उनका चेहरा तब तक राजन के पड़े थप्पड़ की वजह से लाल था.

अगले 2 दिन जैसे हवेली में तूफान मचा हुआ था. कभी पोलिसेवाले आते तो कभी ठाकुर के आदमी. ठाकुर ने एलान करवा दिया था के जिसने भी राजन का पता दिया उसको 5 लाख इनाम और जिसने राजन को पकड़ कर ठाकुर के हवाले कर दिया उसको 10 लाख. आस पास के 50 गाओं में जैसे हर कोई बस एक ही काम में लगा हुआ था और वो था राजन को ढूँढना ताकि इनाम की मोटी रकम कमा सके.

कहते हैं के ढूँढने से तो भगवान भी मिल सकते हैं, भला राजन क्या चीज़ थी. ठाकुर के कहेर के आगे वो 2 दिन नही टिक सका. हर तरफ हर कोई बस उसे ही ढूँढ रहा था जिसकी वजह से उसके च्छूपने और भागने का हर रास्ता बंद हो चुका था.

दूसरे दिन की शाम सरिता देवी अपने कमरे में खोई खोई से बैठी थी. घड़ी में 8 बज रहे थे और रात के खाने का इंटेज़ाम किया जा रहा था पर उनकी भूख तो 2 दिन से जैसे उनके पास तक नही आई थी. डरी सहमी वो बस अपने कमरे में ही बैठी रहती थी. तभी बाहर एक शोर उठा और उन्हें ठाकुर साहब की गुस्से में किसी पर चिल्ला की आवाज़ आई . सरिता देवी उठकर हवेली के बाहर निकली और सामने बने लॉन में आई.

बाहर एक भीड़ सी लगी हुई थी. कुच्छ पोलिसेवाले खड़े थे और कुच्छ ठाकुर के हथियार बंद आदमी.

"यहाँ आइए" ठाकुर ने उन्हें आते देखा तो अपने करीब बुलाया. सरिता देवी बाहर निकल कर उनके करीब आई.

सामने ज़मीन पर 6 लाशें पड़ी थी.

ठकुराइन देखते ही समझ गयी के ये राजन के आदमी थे. और वहीं एक तरफ ज़मीन पर रस्सी से बँधा बैठा था खुद राजन.

सरिता देवी को अंदर उसे देखते ही एक अजीब सा एहसास हुआ. अपने गाल पर पड़े थप्पड़ का दर्द एक बार फिर उठ गया और डर का एहसास दिल में समा गया. पर अगले ही पल वो डर गुस्से और नफ़रत में बदल गया.

ठकुराइन के आते ही सब खामोश हो गये और एक अजीब सा सन्नाटा फेल गया. ठाकुर ने कुच्छ कहने के लिए मुँह खोला ही था के सरिता देवी ने हाथ के इशारे से उनको चुप रहने को कह दिया.

धीमे कदमो से चलती वो राजन के करीब आई.

उनके सामने अब जो बँधा बैठा था वो एक मश-हूर डकेट नही था जिसके डर से लोग रात को सफ़र नही करते थे. उस रात का राजन जिसने सरिता देवी से अपने मंन की करवाई थी कहीं गायब हो चुका. अब जो उनके सामने था उसकी हालत किसी गली के कुत्ते से ज़्यादा नही था जिसके साथी उसकी बगल में मरे पड़े थे.

राजन को देख कर ही अंदाज़ा लगाया जा सकता था के उसको बहुत बुरी तरह से मारा पीटा गया है. उसका पूरा चेहरा सूजा हुआ था. आँखें मुश्किल से खुल पा रही थी. जिस्म खून में सना हुआ था. वो अपने घुटनो पर बैठा हुआ था और उसके हाथ पावं किसी जानवर की तरह रस्सी से बँधे हुए थे.

सरिता देवी ठीक उसे सामने जा खड़ी हुई.

"क्या हुआ राजन?" उन्होने नफ़रत से भरी आवाज़ में कहा "अब हमें उठकर थप्पड़ नही मारेगा?"

उसकी हालत देख कर सरिता देवी ये कह नही सकती थी के वो उनकी बात सुन भी रहा है या नही. ठाकुर सरिता देवी के पास आए और उनके हाथ में एक पिस्टल दे दी.

"आपका मुजरिम है ये" ठाकुर ने कहा "सज़ा भी आप ही देंगी. इसलिए हमने इसे अब तक ज़िंदा रखा है ताकि आप इसकी जान निकाल सकें"

"नही" सरिता देवी ने हाथ में पिस्टल लेते हुए कहा "मौत तो आसान रास्ता है इसके लिए"

ठाकुर ने सवालिया नज़रों से उनकी तरफ देखा.

"हम चाहते हैं के ये हमारी शकल देखे और उसके बाद ज़िंदा तो रहे पर फिर और कुच्छ ना देख सके. बस हमारी शकल ही इसके दिमाग़ में आखरी नज़ारा बन कर रहे ताकि ये उमर भर तड़प्ता रहे. इसने हमसे बद-तमीज़ी की थी, हमें गाली दी थी और हम चाहते हैं के अब ये ज़िंदगी भर कुच्छ ना कह सके"

ठाकुर उनकी बात समझ गये. उन्होने अपने आदमी को इशारा किया.

कुच्छ देर बाद उनका एक आदमी एक कार की बॅटरी उठा लाया. दूसरे आदमी ने एक बड़ा सा च्छुरा निकाला.

"पहले आँखें" सरिता देवी नफ़रत से जल रही थी "ताकि जब ये दर्द से रोए चिल्लाए, रहम की भीख माँगे तो हम सुन सकें"

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --18

gataank se aage........................

Unke saamne us ladke ka lund tha jo us waqt darr ke maare sikud kar mushkil se 1 inch ka bhi nahi tha. Us waqt uske tatto aur lund mein koi khaas farak nahi lag raha tha.

"Sardar vaise yahan Thakurain ke liye kuchh khaas hai nahi. Itne se inka kya hoga?" Ladke ke pichhe khada aadmi uske lund ko dekh kar bola aur sab zor zor se has pade.

"Kya Thakurain" Rajan ki aawaz phir aayi "Aise namard paida ho rahe hain Thakur Khandaan mein? Ek toh goonga aur uper se itna sa lund? Aise kaise chalega?"

Dobara hasi ki aawaz goonj uthi.

Sarita Devi ne aankhen band kiye hue apne khula munh ladke ke lund ki taraf badhaya. Us waqt vo ladka aur Sarita Devi dono hi buri tarah kaanp rahe the. Rajan ke poore khandaan ko dil hi dil mein koste hue Sarita Devi ne lund munh mein le liya.

Us ladka ka jism lund munh mein jaate hi aisa hila jaise 1000 watt ka current daud gaya ho.

"Abe khada reh aaram se" Usko pakadne wale ne kaha "Teri maan tera lund choos rahi hai. Aisa naseeb kisi kisi ko hi naseeb hota hai beta. Sardar ka ehsaan maan aur maze le"

Phr se ek hasi ki aawaz goonji.

Niche Sarita Devi apne munh mein lund liye bethi thi. Unko samajh nahi aa raha tha ke kya kare. Vo apne ghutno ke bal ukdoon bethi aage ko jhuki hui thi aur us ladke ka zara sa lund unke poora unke munh mein samaya hua tha. Unhone aankhen kholkar ek nazar ladke ki taraf uthayi. Vo aankhen band kiye khada tha par uski aankhon se behta pani Sarita Devi dekh chuki thi.

"Wah kya scene hai" Rajan bola "Ek camera hota mere paas toh kasam se ek photo toh zaroor leta"

Phir se hasi ki aawaz uthi.

Sarita Devi apne munh mein lund liye vaise hi bethi rahi. Unhone koi harkat nahi ki. Apne pati ke saath jab lund unke munh mein hota toh apne munh, jeebh aur haath ka aisa taal mel bithakar vo choosa karti thi ke Thakur unke munh mein hi jhadne ko aa jate the. Par is waqt vo sirf munh mein lund liye bethi rahi. Na apni jeebh chalayi, na munh aage pichhe kiya aur na hi apne haath uper uthaye. Vo bas is lamhe ko kisi bure sapne ki tarah poora ho dena chahti thi.

Par tabhi unke munh mein harkat hui aur unki aankhen hairat se khul gayi.

Us ladke ka lund unke munh mein khada ho raha tha.

"Nahi" Unka dimag ne jaise ek cheekh maari "Ye galat hai"

Par vo khud bhi jaanti thi ke ismein us ladke ki koi galti nahi thi. Bhale unke saath uska koi bhi rishta ho par vo ek aurat bhi thi jo us waqt uska lund apne munh mein liye bethi thi. Khada toh hona hi tha.

Dheere dheere lund munh mein bada hota chala gaya aur Sarita Devi ek ajeeb duvidha mein pad gayi.

Agar vo lund munh se nikalti toh sab dekhte ke ladke ka lund khada ho gaya hai aur haste. Phir ye kisi se na chhupa rehta ke jo ho raha tha, usmein us ladke ko maza aa raha tha.

Doosra ye ke lund khada hone ke baad usko munh se nikal kar Thakurain ke andar kahin aur se dala jaayega. Sarita Devi bhale hi lund munh mein liye bethi thi par us ladke ko apne uper, apni taango ke beech sochkar hi unka kaleja dehal gaya.

"Nahi !!" Unhone socha "Jo hua so hua, isse aage nahi"

Vo apne dil hi dil mein thaan chuki thi ke unko kya karna hai. Aur phir jo kaam vo is waqt kar rahi thi, ye kaam karna to bistar par vo kaafi achhi tarah se kar leti thi.

Lakde ke khade hote lund ko Sarita Devi ne apne munh mein hi rakha. Vo khada hokar unka munh bharta chala gaya aur unke gale ke andar tak pahunch gaya par Sarita Devi ne zara bhi apne munh se bahar na nikalne diya.

"Sardar" Ek aadmi ne kaha "Ye ladka toh namard bhi hai shayad"

Phir se hasi ki aawaz goonji.

Sarita Devi jaanti thi ke unko jo karna tha jaldi hi karna tha. Lund apne munh mein rakhe rakhe unhone apni jeebh lund par ragadi shuru kar di. Vo munh band kiye andar hi andar jeebh aise hila rahi thi jaise lund ko dheere dheere sehla rahi thi.

Ladka kachcha tha, kisi aurat ke saath pehli baar tha. Thakurain bistar par kheli khaayi thi. Mushkil se aadhe minute mein unki jeebh ne kaam kar dikhaya.

Rajan kuchh sochkar us ladke ki taraf badha hi tha ke ladka ka poora shareer kaanpa aur usi pal Sarita Devi ne uska lund munh se nikaal diya. Lund se veerya chhut raha tha jo aadha Sarita Devi ke munh mein tha aur baaki nikalar sidha unke chehre par ja gira.

"Ye lo" Rajan bola "Ye toh sala itne mein hi khatam ho gaya aur kahan ham soch rahe the ke ab chudai hogi"

"Sardar" Achanak uska ek aadmi chillaya "Us taraf"

Sabne nazar uthakar us taraf dekha jahan vo aadmi ishara kar raha tha. Door kuchh gaadiyon ki roshni dikhai de rahi thi. Headlight ke andaze se kaha ja sakta tha ke kam se kam chaar gaadiyan thi.

"Niklo yahan se" Rajan ne apne aadmiyon ko ishara kiya aur vo saare agle pale aise gayab hue jaise gadhe ke sar se seeng.

Thakurain ne bhaag kar apne kapde uthaye aur pehenne lagi. Us ladke ne bhi apna pajama uper karke baandh liya.

"Kisi se kuchh kehne ki zaroorat nahi" Sarita Devi ne us ladke se kaha.

Gaadiyon ki roshni dheere dheere nazdeek aati ja rahi thi.

Agle din Sarita Devi kisi zinda laash se zyada nahi thi. Mann mein hazar khyaal uth rahe the jin mein se ek apne aapko maar lene ka bhi tha. Thakur gusse se pagal hue ja rahe the. Har taraf Rajan ko dhoondha ja raha tha.

Poore gaon mein aur aas paas ke saare gaon mein ye baat phel chuki thi ke Rajan ne Thakurain ki car ko rok kar unhen lootne ki koshish ki aur unke driver ko maar diya.

Us raat haqeeqat mein jo hua tha vo Sarita Devi aur us ladke ke siwa aur koi nahi janta tha. Ye unki kismat hi thi ke us raat Thakur ne unse baat karne ke liye unki behen ke ghar phone kar diya. Jab vahan se pata chala ke Thakurain shaam ke 5 baje hi apne gaon ke liye nikal gayi thi toh Thakur pareshaan ho uthe. Unhone fauran apni gaadi nikali aur apne kuchh admiyon ke saath Thaurian ko dhoondhne ke liye nikal pade. Par jab tak vo Sarita Devi tak pahunche, der ho chuki thi.

Sarita Devi ne aati gaadiyon ke dekh kar andaza laga liya tha ke Thakur hi unko dhoondhte hue aa rahe hain. Rajan ke aadmi vahan se bhaag chuke the. Thakurain ne fauran apne kapde pehne aur apni haalat theek ki. Jab tak Thakur ki gaadi aakar ruki, Sarita Devi ko dekh kar ye koi nahi keh sakta tha ke abhi thodi der pehle ye aurat nangi bethi lund choos rahi thi.

Thakur aaye toh unhone sirf itna hi bataya ke Rajan ne unki gaadi roki aur unhen lootne ki koshish ki. Jab unhone virodh kiya toh unke driver ko maar diya gaya aur Thakurain ko bhi thappad mara. Unka chehra tab tak Rajan ke pade thappad ki vajah se laal tha.

Agle 2 din jaise haweli mein toofan macha hua tha. Kabhi policewale aate toh kabhi Thakur ke aadmi. Thakur ne elaan karva diya tha ke jisne bhi Rajan ka pata diya usko 5 lakh inaam aur jisne Rajan ko pakad kar Thakur ke hawale kar diya usko 10 lakh. Aas paas ke 50 gaon mein jaise har koi bas ek hi kaam mein laga hua tha aur vo tha Rajan ko dhoondhna taaki inaam ki moti rakam kama sake.

Kehte hain ke dhoondhne se toh bhagwan bhi mil sakte hain, bhala Rajan kya cheez thi. Thakur ke keher ke aage vo 2 din nahi tik saka. Har taraf har koi bas use hi dhoondh raha tha jiski vajah se uske chhupne aur bhagne ka har rasta band ho chuka tha.

Doosre din ki shaam Sarita Devi apne kamre mein khoyi khoyi se bethi thi. Ghadi mein 8 baj rahe the aur raat ke khane ka intezaam kiya ja raha tha par unki bhookh toh 2 din se jaise unke paas tak nahi aayi thi. Dari sehmi vo bas apne kamre mein hi bethi rehti thi. Tabhi bahar ek shor utha aur unhen Thakur Sahab ki gusse mein kisi par chilla ki aawaz aayi . Sarita Devi uthkar haweli ke bahar nikli aur saamne bane lawn mein aayi.

Bahar ek bheed si lagi hui thi. Kuchh policewale khade the aur kuchh Thakur ke hathyaar band aadmi.

"Yahan aaiye" Thakur ne unhen aate dekha toh apne kareeb bulaya. Sarita Devi bahar nikal kar unke kareeb aayi.

Saamne zameen par 6 laashen padi thi.

Thakurain dekhte hi samajh gayi ke ye Rajan ke aadmi the. AUr vahin ek taraf zameen par rassi se bandha betha tha khud Rajan.

Sarita Devi ko andar use dekhte hi ek ajeeb sa ehsaas hua. Apne gaal pad pade thappad ka dard ek bara phir uth gaya aurdarr ka ehsaas dil mein sama gaya. Par agle hi pal vo darr gusse aur nafrat mein badal gaya.

Thakurain ke aate hi sab khamosh ho gaye aur ek ajeeb sa sannata phel gaya. Thakur ne kuchh kehne ke liye munh khola hi tha ke Sarita Devi ne haath ke ishare se unko chup rehne ko keh diya.

Dheeme kadmo se chalti vo Rajan ke kareeb aayi.

Unke saamne ab jo bandha betha tha vo ek mash-hoor daket nahi tha jiske darr se log raat ko safar nahi karte the. Us raat ka Rajan jisne Sarita Devi se apne mann ki karvai thi kahin gayab ho chuka. Ab jo unke saamne tha uski halat kisi gali ke kutte se zyada nahi tha jiske saathi uski bagal mein mare pade the.

Rajan ko dekh kar hi andaza lagaya ja sakta tha ke usko bahut buru tarah se mara peeta gaya hai. Uska poora chehra sooja hua tha. Aankhen mushkil se khul pa rahi thi. Jism khoon mein sana hua tha. Vo apne ghutno par betha hua tha aur uske haath paon kisi janwar ki tarah rassi se bandhe hue the.

Sarita Devi theek use saamne ja khadi hui.

"Kya hua Rajan?" Unhone nafrat se bhari aawaz mein kaha "Ab hamein uthkar thappad nahi marega?"

Uski halat dekh kar Sarita Devi ye keh nahi sakti thi ke vo unki baat sun bhi raha hai ya nahi. Thakur Sarita Devi ke paas aaye aur unke haath mein ek pistorl de di.

"Aapka mujrim hai ye" Thakur ne kaha "Saza bhi aap hi dengi. Isliye hamne ise ab tak zinda rakha hai taaki aap iski jaan nikal saken"

"Nahi" Sarita Devi ne haath mein pistol lete hue kaha "Maut toh aasan rasta hai iske liye"

Thakur ne sawaliya nazron se unki taraf dekha.

"Ham chahte hain ke ye hamari shakal dekhe aur uske baad zinda toh rahe par phir aur kuchh na dekh sake. Bas hamari shakal hi iske dimag mein aakhri nazara ban kar rahe taaki ye umar bhar tadapta rahe. Isne hamse bad-tamizi ki thi, hamen gaali di thi aur ham chahte hain ke ab ye zindagi bhar kuchh na keh sake"

Thakur unki baat samajh gaye. Unhone apne aadmi ko ishara kiya.

Kuchh der baad unka ek aadmi ek car ki battery utha laya. Doosre aadmi ne ek bada sa chhura nikala.

"Pehle aankhen" Sarita Devi nafrat se jal rahi thi "Taaki jab ye dard se roye chillaye, reham ki bheekh maange toh ham sun saken"

kramashah........................................