खूनी हवेली की वासना compleet

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raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:55

खूनी हवेली की वासना पार्ट --4

गतान्क से आगे........................

"ह्म्‍म्म" शर्मा ने कहना शुरू किया "तो सर जिस वक़्त खून हुआ उस वक़्त हवेली में 11 लोग थे.

1. पुरुषोत्तम सिंग - ठाकुर साहब का सबसे बड़ा बेटा. बेहद शरीफ इंसान. काम सार खुद देखता है. या ये कह लीजिए के ठाकुर साहब का पूरा बिज़्नेस अकेले ही चलाता है. स्कूल कुच्छ टाइम तक यहाँ शहर में गया और उसके बाद ठाकुर साहब ने उसको लंडन पढ़ने के लिए भेज दिया. वो अपनी पढ़ाई पूरी करके आया तो ठाकुर साहब ने उसकी शादी करा दी और अब पूरा काम वही देखता है. उसके बारे में जो यहाँ आस पास बात उड़ी हुई है वो ये है पुरुसोत्तम नमार्द है साला"

"नमार्द?" ख़ान ने सवालिया नज़र से शर्मा की तरफ देखा

"खड़ा नही होता साले का" शर्मा हस्ते हुए बोला "और आप तो जानते ही हो सर, ये बातें च्छुपति नही. कहते हैं के शादी से पहले दोस्तों के साथ एक पार्टी करी, वहाँ कुच्छ रंडिया बुलाई गयी पर बेचारे ठाकुर साहब कुच्छ कर ही नही सके क्यूंकी उनका खड़ा ही नही हुआ. कितनी सच्चाई है ये तो बस पुरुषोत्तम ही जानता है"

"ह्म्‍म्म्म" ख़ान ने हामी भरी"

"दूसरा तेजविंदर" शर्मा ने बात जारी रखी "ठाकुर साहब का दूसरा बेटा. एक नंबर का आय्याश और रंडीबाज. इलाक़े में शायद ही कोई रंडी बची हो जिसके साथ वो ना सोया हो. ज़्यादातर वक़्त शराब के नशे में रहता है और अपने बड़े भाई की तरह वो पढ़ने के लिए लंडन नही गया. उसके बारे में बात ये उड़ी हुई है के वो आजकल ठाकुर साहब से बटवारे को लेकर अक्सर लड़ता था. उसका गुस्सा बहुत मश-हूर है. माथा गरम हो जाए तो फिर वो कुच्छ नही देखता"

"ओके" ख़ान ने कहा

"तीसरा कुलदीप. ठाकुर साहब का सबसे छ्होटा बेटा. उसके बारे में ज़्यादा कुच्छ नही जानता क्यूंकी वो बहुत छ्होटा था जब उसको लंडन भेज दिया गया था. उस वक़्त पुरुषोत्तम भी लंडन में ही था इसलिए वो अपने भाई के साथ रहा. बाद में पुरुषोत्तम वापिस आ गया पर कुलदीप पढ़ाई पूरी करने के लिए वहीं रुका रहा. आजकल च्छुतटियों में आया हुआ है"

"ह्म्‍म्म्म"

"कामिनी. ठाकुर साहब की एकलौती बेटी और उनकी आँखों का सितारा. उसको बहुत चाहते थे ठाकुर साहब. उसको लोग या तो गूंगी कामिनी कहते हैं या पागल कामिनी"

"ऐसा क्यूँ?" ख़ान ने पुचछा

"कुच्छ बोलती नही सर" शर्मा बोला "चुप रहती है बिल्कुल. आजकल शायद ही गाओं में किसी ने उसको बात करते सुना हो. कुच्छ लोग कहते हैं के उसपर भूत का साया है और कुच्छ कहते हैं के पागल है दिमाग़ से और इसलिए ही ठाकुर साहब इतना लाड करते थे उसको"

"जै. ठाकुर साहब के छ्होटे भाई के बेटा और आक्च्युयली खानदान का सबसे बड़ा बेटा. ठाकुर साहब के तीनो बेटे हैं बेटी उससे छ्होटी हैं. वो कोई 15-16 साल का होगा जब उसके माँ बाप एक कार आक्सिडेंट में मारे गये और उसके बाद वो कुच्छ टाइम तक हवेली में रहा. फिर एक दिन अचानक ठाकुर साहब ने उसको हवेली से निकाल दिया और जायदाद का एक छ्होटा सा हिस्सा उसके नाम कर दिया. कोई नही जानता के ऐसा क्यूँ हुआ पर जै प्रॉपर्टी को लेकर ठाकुर साहब से केस लड़ रहा था"

"रूपाली" शर्मा बोला "ठाकुर साहब की बहू. उसके बारे में क्या बताऊं सर. बहुत सारी बातें उड़ी हुई हैं"

"जैसे के?" ख़ान बोला

"जैसे के लोग कहते हैं उसका कॅरक्टर एक रंडी की सलवार के नाडे से भी ज़्यादा ढीला है"

"अच्छा?" ख़ान हस्ता हुआ बोला "और?"

"ठाकुर खानदान से ही है और उसका बाप भी काफ़ी रईस है. लोग कहते हैं के जब उसकी शादी हुई उससे पहले वो पेट से थी और बच्चा गिराया गया था इसलिए उसके घर वालों ने जल्दी जल्दी में शादी कर दी. कुच्छ तो ये तक कहते हैं के ठाकुर साहब को अपनी बहू का कॅरक्टर पता था पर वो ये भी जानते थे के उनका बेटा नमार्द है इसलिए उन्होने भी शादी से इनकार नही किया"

"ह्म्‍म्म्मम" ख़ान ने गर्दन हिलाई

"इंद्रासेन राणा" शर्मा बोला "या शॉर्ट में इंदर. रूपाली का भाई. उसके बारे में मैं कुच्छ नही जानता सर सिवाय इसके के शहर में ही रहता है और कुच्छ बिज़्नेस करता है. उस रात अपनी बेहन से मिलने आया हुआ था"

"ओके" ख़ान बोला

"सरिता देवी" शर्मा ने बात जारी रखी "ठाकुर साहब की धरम पत्नी यानी के ठकुराइन. कई साल पहले सीढ़ियो से गिर गयी थी जिसके बाद से व्हील चेर पर ही बैठ गयी. ठाकुर साहब ने बहुत इलाज कराये, देसी और विदेशी दोनो पर कुच्छ नही हुआ. उनके बारे में यही है के बहुत बड़ी पुजारन हैं, धरम करम में पूरा विश्वास है बस. चल फिर नही सकती इसलिए हर काम एक नौकरानी ही करती है"

"अब आते हैं नौकरों पर सर" शर्मा बोला "यूँ तो हवेली में बहुत सारे नौकर हैं पर सब सुबह आते हैं और शाम तक अपने अपने घर चले जाते हैं. 4 ऐसे हैं जो हवेली में ही रहते हैं. उनमें से वो जो बुड्ढ़ा एक खड़ा था वहाँ वो था भूषण. हवेली का सबसे पुराना और वफ़ादार नौकर. ठाकुर साहब की गाड़ी चलाता था और ज़्यादातर काम वही देखता था. शादी उसने कभी की नही और अपनी सारी ज़िंदगी ठाकुर खानदान की नौकरी करने में ही गुज़री है"

"ओके"

"वो जो ठकुराइन के पिछे उनकी व्हील चेर पकड़े खड़ी थी वो थी बिंदिया. गाओं की ही एक औरत है. उसका पति ठाकुर साहब के खेतों में काम करता था. जब वो मरा तो ठाकुर साहब ने उसको हवेली में ही रख लिया ताकि ठकुराइन की देख-भाल कर सके."

"पायल. बिंदिया की बेटी. वहीं हवेली में अपनी माँ के साथ रहती है"

"चंदर या चंदू कह लीजिए. गूंगा है, बोल नही पाता. उसके माँ बाप जब वो छ्होटा था तब ही मर गये थे उसके बाद से बिंदिया ने उसको पाल पोसकर बड़ा किया. अपना बेटा कहती है उसको. वो भी वहीं उसके पास ही हवेली में रहता है"

"ह्म्‍म्म्मम" ख़ान ने एक सिगरेट जलाई "अब देखना ये है के इनमें से किसके पास ठाकुर साहब को मारने की वजह थी और किसने उस रात ये काम किया. मुझे पूरा यकीन है के बाहर का कोई नही था. इन्ही में से किसी ने ये काम किया है और ग़लत टाइम पर वहाँ पहुँच गया जै"

"सर आपको इतना यकीन कैसे है के उसने ही मर्डर नही किया?" शर्मा ने पुछा

"पता नही यार. किया भी हो सकता है पर जाने क्यूँ मुझे लगता है के वो वहाँ बस ग़लत टाइम पर था. इतना बेवकूफ़ नही लगता वो शकल से. अगर उसको ठाकुर का खून करना ही होता तो उस वक़्त क्यूँ करता जब पूरी दुनिया हवेली में मौजूद थी और वो पकड़ा जाता"

"ह्म्‍म्म .. " शर्मा ने गर्दन हिलाई.

रूपाली का जन्म एक ज़मींदार के घर में हुआ था इसलिए बचपन से ही उसको कोई कमी नही थी. जो चीज़ चाही, वो माँग ली और मिल भी जाती थी. घर पर सिर्फ़ उसके पिता, उसकी माँ और एक छ्होटा भाई था. बड़ा सा घर जिसमें बहुत सारे नौकर और एक छ्होटा सा परिवार. यही वजह थी के बहुत ही कम उमर में उसने बडो वाले खेल देख भी लिए थे और खेल भी लिए थे.

उसकी उमर कोई 14-15 साल की रही होगी जब उसने पहली बार एक आदमी और एक औरत को जिस्मानी संबंध बनाते हुए देखा. सनडे का दिन था. उस दिन उसके माँ बाप मंदिर जाया करते थे. सुबह सुबह तड़के निकल जाते थे और 11 बजे तक वापिस नही आते थे. उन्होने लाख कोशिश की थी के रूपाली भी सुबह सुबह उठकर उनके साथ चले पर रूपाली ना तो कभी इतनी सुबह उठ पाती थी और ना ही वो कभी मंदिर गयी.

हर सनडे की तरह उस दिन भी घर पर वो अकेली थी. माँ बाप भाई मंदिर के लिए जा चुके थे जहाँ से उन्होने 11 बजे तक वापिस नही आना था. सनडे के दिन सब नौकरो की छुट्टी होती थी. सिर्फ़ दो नौकर घर पर होते थे. एक सफाई करने वाली कल्लो और दूसरे उनके घर पर खाना बनाने वाले शंभू काका. 11 बजे तक वो दोनो अपना काम करते रहते थे और रूपाली अपने कमरे में पड़ी सोती रहती थी.

शंभू की उमर कोई 60 के पार थी और वो रोज़ ही आकर 3 वक़्त का खाना बना जाया करता था. कल्लो की उमर भी 40 के आस पास ही थी. उसके रंग एक दम उल्टे तवे जैसा काला था जिसकी वजह से सब उसको कल्लो कहा करते थे. उसका असली नाम क्या था, ये तो शायद बस वो खुद ही बता सकती थी.

यूँ तो रूपाली सनडे को 10-11 बजे से पहले बिस्तर नही छ्चोड़ती थी पर उस दिन नींद ना आने की वजह से वो 8 बजे ही बिस्तर से निकल गयी. थोड़ी देर यूँ ही बेड पर बैठे रहने के बाद उसने शंभू काका को चाइ के लिए बोलने की सोची और बिस्तर से निकली.

पूरा घर खाली पड़ा था. वो खुद भी जानती थी के आज घर पर सिर्फ़ कल्लो और शम्भी काका ही होंगे. आँखें मलति वो किचन तक पहुँची पर वहाँ कोई भी नही था. उसने ड्रॉयिंग रूम की तरफ देखा पर उधर भी कोई नज़र नही आया. वो शंभू काका का नाम पुकारने ही वाली थी के एक हसी की आवाज़ सुनकर चुप हो गयी. आवाज़ उसके माँ बाप के कमरे से आ रही थी.

एक पल के लिए रूपाली को लगा के उसके माँ बाप घर पर ही हैं पर जब हसी की आवाज़ दोबारा आई तो वो समझ गयी के ये आवाज़ उसके माँ बाप की नही है. रूपाली को कुच्छ ठीक नही लगा और उसने फिर शंभू काका का नाम पुकारना ठीक नही समझा. दबे पावं से वो अपने माँ बाप के कमरे तक पहुँची. दरवाज़ा बंद था और अंदर से लॉक्ड था.

रूपाली कमरे के बाहर खड़ी सोच ही रही थी के वो हसी की आवाज़ फिर से आई और इस बार रूपाली समझ गयी के आवाज़ कल्लो की थी. रूपाली सोच में पड़ गयी. कल्लो उसके माँ बाप के कमरे में, अंदर से दरवाज़ा बंद, रूपाली को कुच्छ ठीक नही लगा. अंदर क्या हो रहा था वो नही जानती थी पर ये समझ गयी के वो कुच्छ था ग़लत था इसलिए ही दरवाज़ा बंद है. वरना नौकरों का उसके माँ बाप के कमरे में क्या काम.

रूपाली के छ्होटे भाई इंदर का कमरा बिल्कुल उसके माँ बाप के कमरे से लगता हुआ था जबकि खुद रूपाली का कमरा 1स्ट्रीट फ्लोर पर था. पहले नीचे का वो कमरा रूपाली का हुआ करता था पर जब वो थोड़ा बड़ी हुई तो उसको उपेर वाला कमरा दे दिया गया और उसका छ्होटा भाई जो पहले अपने माँ बाप के साथ सोया करता था अब उस कमरे में सोने लगा. दोनो कमरो के बीच एक अडजाय्निंग दरवाज़ा था जिसका मकसद सिर्फ़ ये थे के अगर बच्चा रात को डरकर उठे तो उसके माँ बाप फ़ौरन वहाँ पर आ सकें. रूपाली को याद था के वो जब वो छ्होटी थी तो बहुत डरती थी जिसकी वजह से उसके माँ बाप उस दरवाज़े को अक्सर खुला रखते थे ताकि वो दोनो उसको देख सकें और रूपाली डरे नही.

धीरे धीरे रूपाली खामोशी से अपने भाई के कमरे में दाखिल हुई. वो कमरा कभी उसका खुद का हुआ करता था इसलिए वो अच्छी तरह से उस कमरे को पहचानती थी. 2 कमरो के बीच का दरवाज़ा पुराने ज़माने के दरवाज़ो की तरह था यानी किसी खिड़की की तरह 2 किवाड़ थे जो बंद करके बीच में एक कुण्डा लगाया जाता था. एक साल बहुत ज़्यादा बारिश की वजह से दरवाज़ा सील गया था जिसकी वजह से ढंग से बंद नही होता था. बंद होने के बाद भी दोनो किवाडो के बीच इतनी जगह बच जाती थी के उसमें से दूसरे कमरे में देखा जा सके. रूपाली दरवाज़े के पास पहुँची और झाँक कर अपने माँ बाप के कमरे में देखा. यूँ तो उस दरवाज़े पर एक परदा हुआ करता था पर किस्मत से आज परदा खुला हुआ नही था. दरवाज़े में से देखते ही रूपाली को जो नज़र आया उसने उसकी आँखें खोलकर रख दी.

एक पल के लिए रूपाली को समझ नही आया के वो क्या देख रही है या जो वो देख रही है वो क्या है. आँखें मलकर उसने दोबारा देखा तो मंज़र वैसा ही था. रूपाली ने गौर से देखना शुरू किया और समझना चाहा के अंदर हो क्या रहा है.

पहली चीज़ जो उसको दिखी वो था कल्लो का चेहरा. बॉल बिखरे हुए, माथे पर पसीना, आँखें फेली हुई, और मुँह खुला हुआ. उसकी एल्बोस बेड पर थी और जो झुकी हुई थी जिसकी वजह से उसके बॉल बार बार उसके चेहरे पर गिर जाते थे जिनको वो एक हाथ से अपने चेहरे से हटा देती थी. उसका सर आगे पिछे हो रहा था जैसे वो हिल रही हो और हर बार जैसे ही हो आगे को होती, उसके मुँह से आह ऊह जैसी आवाज़ निकलती.

अगली चीज़ जिसपर रूपाली का ध्यान गया वो थी कल्लो की चूचियाँ जिन्हें देखकर रूपाली का मुँह खुला रह गया. उसने एक 2 बार अपनी माँ को ब्रा में देखा था पर कल्लो की छातियाँ देखकर तो वो हैरत मान गयी. कल्लो आगे को झुकी हुई थी जिसकी वजह से उसकी चूचियाँ उसके शरीर और नीचे बेड के बीच में लटक रही थी. वो इतनो बड़ी बड़ी थी के शरीर और बेड के बीच थोडा फासला होने के बाद भी उसके निपल्स नीचे बेड पर टच कर रहे थे. जैसे ही कल्लो को शरीर हिलता, वो दोनो भी आगे पिछे को झूलती.

रूपाली की आँखों के लिए ये सब कुच्छ नया था. पहली नज़र पड़ते ही उसको एक झटका सा लगा था जो अब धीरे धीरे कम हो रहा था. उसकी आँख जो एक पल के लिए सामने के मंज़र पर यकीन नही कर पाई थी अब धीरे धीरे अड्जस्ट हो रही थी.

पहली बार रूपाली ने गौर से सिर्फ़ चूचियो से फोकस हटाकर कमरे में पूरी तरह नज़र फिराई.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --4

gataank se aage........................

"Hmmm" Sharma ne kehna shuru kiya "Toh Sir jis waqt khoon hua us waqt haweli mein 11 log the.

1. Purushottam Singh - Thakur Sahab ka sabse bada beta. Behad shareef insaan. Kaam saar khud dekhta hai. Ya ye keh lijiye ke thakur sahab ka poora business akele hi chalata hai. School kuchh time tak yahan shehar mein gaya aur uske baad Thakur sahab ne usko London padhne ke liye bhej diya. Vo apni padhai poori karke aaya toh Thakur Sahab ne uski shaadi kara di aur ab poora kaam vahi dekhta hai. Uske baare mein jo yahan aas paas baat udi hui hai vo ye hai je namard hai saala"

"Namard?" Khan ne sawaliya nazar se Sharma ki taraf dekha

"Khada nahi hota saale ka" Sharma haste hue bola "Aur aap toh jaante hi ho sir, ye baatein chhupti nahi. Kehte hain ke shaadi se pehle doston ke saath ek party kari, vahan kuchh randiyan bulayi gayi par bechare thakur sahab kuchh kar hi nahi sake kyunki unka khada hi nahi hui. Kitni sachchai hai ye toh bas Purushottam hi janta hai"

"Hmmmm" Khan ne haami bhari"

"Doosra Tejvinder" Sharma ne baat jaari rakhi "Thakur Sahab ka doosra beta. Ek umber ka ayyash aur randibaaz. Ilaake mein shayad hi koi randi bachi ho jiske saath vo na soya ho. Zyadatar waqt sharab ke nashe mein rehta hai aur apne bade bhai ki tarah vo padhne ke liye London nahi gaya. Uske baare mein baat ye udi hui hai ke vo aajkal Thakur Sahab se batware ko lekar aksar ladta tha. Uska gussa bahut mash-hoor hai. Matha garam ho jaaye toh phir vo kuchh nahi dekhta"

"Ok" Khan ne kahan

"Teesra Kuldeep. Thakur Sahab ke sabse chhota beta. Uske baare mein zyada kuchh nahi janta kyunki vo bahut chhota tha jab usko london bhej diya gaya tha. Us waqt Purushottam bhi london mein hi tha isliye vo apne bhai ke saath raha. Baad mein Purushottam vaapis aa gaya par Kuldeep padhai poori karne ke liye vahin ruka raha. Aajkal chhuttiyon mein aaya hua hai"

"Hmmmm"

"Kamini. Thakur sahab ke eklauti beti aur unki aankhon ka sitara. Usko bahut chahte the thakur sahab. Usko log ya toh goongi Kamini kehte hain ya pagal Kamini"

"Aisa kyun?" Khan ne puchha

"Kuchh bolti nahi sir" Sharma bola "Chup rehti hai bilkul. Aajkal shayad hi gaon mein kisi ne usko baat karte suna ho. Kuchh log kehte hain ke uspar bhoot ka saaya hai aur kuchh kehte hain ke pagal hai dimag se aur isliye hi thakur sahab itna laad karte the uska"

"Jai. Thakur sahab ke chhote bhai ke beta aur actually khandaan ka sabse bada beta. Thakur sahab ke teeno bete hain beti usse chhote hain. Vo koi 15-16 saal ka hoga jab uske maan baap ek car accident mein maare gaye aur uske baad vo kuchh time tak haweli mein raha. Phir ek din achanak Thakur Sahab ne usko haweli se nikal diya aur jaaydad ka ek chhota sa hissa uske naam kar diya. Koi nahi janta ke aisa kyun hua par Jai property ko lekar thakur sahab se case lad raha tha"

"Rupali" Sharma bola "Thakur sahab ki bahu. Uske baare mein kya bataoon sir. Bahut saari baatein udi hui hain"

"Jaise ke?" Khan bola

"Jaise ke log kehte hain uska character ek randi ki salwar ke naade se bhi zyada dheela hai"

"Achha?" Khan hasta hua bola "Aur?"

"Thakur khandaan se hi hai aur uska baap bhi kaafi raees hai. Log kehte hain ke jab uski shaadi hui usse pehle vo pet se thi aur bachcha giraya gaya tha isliye uske ghar walon ne jaldi jaldi mein shaadi kar di. Kuchh toh ye tak kehte hain ke thakur sahab ko apni bahu ka character pata tha par vo ye bhi jante the ke unka beta namard hai isliye unhone bhi shaadi se inkaar nahi kiya"

"Hmmmmm" Khan ne gardan hilayi

"Indrasen Rana" Jai bola "Ya short mein Inder. Rupali ka bhai. Uske baare mein main kuchh nahi janta sir sivaay iske ke shehar mein hi rehta hai aur kuchh business karta hai. Us raat apni behan se milne aaya hua tha"

"Ok" Khan bola

"Sarita Devi" Sharma ne baat jaari rakhi "Thakur Sahab ki dharam patni yaani ke thakurain. Kai saal pehle sidhiyin se gir gayi thi jiske baad se wheel chair par hi beth gayi. Thakur sahab ne bahut ilaaj karaye, desi aur videshi dono par kuchh nahi hua. Unke baare mein yahi hai ke bahut badi pujaran hain, dharam karam mein poora vishwas hai bas. Chal phir nahi sakti isliye har kaam ek naukrani hi karti hai"

"Ab aate hain naukaron par sir" Sharma bola "Yun to haweli mein bahut saare naukar hain par sab subah aate hain aur shaam tak apne apne ghar chale jaate hain. 4 aise hain jo haweli mein hi rehte hain. Unmein se Vo jo buddha ek khada tha vahan vo tha Bhushan. Haweli ka sabse purana aur vafadaar naukar. Thakur sahab ki gaadi chalata tha aur zyadatar kaam vahi dekhta tha. Shaadi usne kabhi ki nahi aur apni saari zindagi thakur khandaan ki naukri karne mein hi guzari hai"

"Ok"

"Vo jo thakurain ke pichhe unki wheel chair pakde khadi thi vo thi Bindiya. Gaon ki hi ek aurat hai. Uska pati thakur sahab ke kheton mein kaam karta tha. Jab vo mara toh thakur sahab ne usko haweli mein hi rakh liya taaki thakurain ki dekh-bhaal kar saake."

"Payal. Bindiya ki beti. Vahin haweli mein apni maan ke saath rehti hai"

"Chander ya Chandu keh lijiye. Goonga hai, bol nahi pata. Uske maan baap jab vo chhota tha tab hi mar gaye the uske baad se Bindiya ne usko paal poskar bada kiya. Apna beta kehti hai usko. Vo bhi vahin uske paas hi haweli mein rehta hai"

"Hmmmmm" Khan ne ek cigarette jalayi "Ab dekhna ye hai ke inmein se kiske paas Thakur Sahab ko maarne ki vajah thi aur kisne us raat ye kaam kiya. Mujhe poora yakeen hai ke bahar ka koi nahi tha. Inhi mein se kisi ne ye kaam kiya hai aur galat time par vahan pahunch gaya Jai"

"Sir aapko itna yakeen kaise hai ke usne hi murder nahi kiya?" Sharma ne puchha

"Pata nahi yaar. Kiya bhi ho sakta hai par jaane kyun mujhe lagta hai ke vo vahan bas galat time par tha. Itna bevakoof nahi lagta vo shakal se. Agar usko thakur ka khoon karna hi hota toh us waqt kyun karta jab poori duniya haweli mein maujood thi aur vo pakda jata"

"Hmmm .. " Sharma ne gardan hilayi.

Rupali ka janm ek zamindar ke ghar mein hua tha isliye bachpan se hi usko koi kami nahi thi. Jo cheez chahi, vo maang li aur mil bhi jaati thi. Ghar par sirf uske pita, uski maan aur ek chhota bhai tha. Bada sa ghar jismein bahut saare naukar aur ek chhota sa pariwar. Yahi vajah thi ke bahut hi kam umar mein usne bado wale khel dekh bhi liye the aur khel bhi liye the.

Uski umar koi 14-15 saal ki rahi hogi jab usne pehli baar ek aadmi aur ek aurat ko jismani sambandh banate hue dekha. Sunday ka din tha. Us din uske maan baap mandir jaya karte the. Subah subah tadke nikal jaate the aur 11 baje tak vaapis nahi aate the. Unhone lakh koshish ki thi ke Rupali bhi subah subah uthkar unke saath chale par Rupali na toh kabhi itni subah uth pati thi aur na hi vo kabhi mandir gayi.

Har Sunday ki tarah us din bhi ghar par vo akeli thi. Maan Baap Bhai mandir ke liye ja chuke the jahan se unhone 11 baje tak vaapis nahi aana tha. Sunday ke din sab naukaro ki chhutti hoti thi. Sirf do naukar ghar par hote the. Ek safai karne wali Kallo aur doosre unke ghar par khana banae wale Shambhu Kaka. 11 baje tak vo dono apna kaam karte rehte the aur Rupali apne kamre mein padi soti rehti thi.

Shambhu ki umar koi 60 ke paar thi aur vo roz hi aakar 3 waqt ka khana bana jaya karta tha. Kallo ki umar bhi 40 ke aas paas hi thi. Uske rang ek dam ulte tawe jaisa kala tha jiski vajah se sab usko Kallo kaha karte the. Uska asli naam kya tha, ye toh shayad bas vo khud hi bata sakti thi.

Yun toh Rupali Sunday ko 10-11 baje se pehle bistar nahi chhodti thi par us din neend na aane ki vajah se vo 8 baje hi bistar se nikal gayi. Thodi der yun hi bed par bethe rehne ke baad usne Shambhu Kaka ko chaai ke liye bolne ki sochi aur bistar se nikli.

Poora ghar khali pada tha. Vo khud bhi janti thi ke aaj ghar par sirf Kallo aur Shambhi Kaka hi honge. Aankhen malti vo kitchen tak pahunchi par vahan koi bhi nahi tha. Usne drawing room ki taraf dekha par udhar bhi koi nazar nahi aaya. Vo Shambhu Kaka ka naam pukarne hi wali thi ke ek hasi ki aawaz sunkar chup ho gayi. Aawaz uske maan baap ke kamre se aa rahi thi.

Ek pal ke liye Rupali ko laga ke uske maan baap ghar par hi hain par jab hasi ki aawaz dobara aayi toh vo samajh gayi ke ye aawaz uske maan baap ki nahi hai. Rupali ko kuchh theek nahi laga aur usne phir Shambhu Kaka ka naam pukarna theek nahi samjha. Dabe paon se vo apne maan baap ke kamre tak pahunchi. Darwaza band tha aur andar se locked tha.

Rupali kamre ke bahar khadi soch hi rahi thi ke vo hasi ki aawaz phir se aayi aur is baar Rupali samajh gayi ke aawaz Kallo ki thi. Rupali soch mein pad gayi. Kallo uske maan baap ke kamre mein, andar se darwaza band, Rupali ko kuchh theek nahi laga. Andar kya ho raha tha vo nahi janti thi par ye samajh gayi ke vo kuchh tha galat tha isliye hi darwaza band hai. Varna naukaron ka uske maan baap ke kamre men kya kaam.

Rupali ke chhote bhai Inder ka kamra bilkul uske maan baap ke kamre se lagta hua tha jabki khud Rupali ka kamra 1st floor par tha. Pehle neeche ka vo kamra Rupali ka hua karta tha par jab vo thoda badi hui toh usko uper wala kamra de diya gaya aur uska chhota bhai jo pehle apne maan baap ke saath soya karta tha ab us kamre mein sone laga. Dono kamro ke beech ek adjoining darwaza tha jiska maksad sirf ye the ke agar bachcha raat ko darkar uthe toh uske maan baap fauran vahan par aa saken. Rupali ko yaad tha ke vo jab vo chhoti thi toh bahut darti thi jiski vajah se uske maan baap us darwaze ko aksar khula rakhte the taaki vo dono usko dekh saken aur Rupali dare nahi.

Dheere dheere Rupali khamoshi se apne bhai ke kamre mein daakhil hui. Vo kamra kabhi uska khud ka hua karta tha isliye vo achhi tarah se us kamre ko pehchanti thi. 2 kamro ke beech ka darwaza purane zamane ke darwazo ki tarah tha yaani kisi khidki ki tarah 2 kiwaad the jo band karke beech mein ek kunda lagaya jata tha. Ek saal bahut zyada barish ki vajah se darwaza seel gaya tha jiski vajah se dhang se band nahi hota tha. Band hone ke baad bhi dono kiwadon ke beech itni jagah bach jaati thi ke usmein se doosre kamre mein dekha ja sake. Rupali darwaze ke paas pahunchi aur jhaank kar apne maan baap ke kamre mein dekha. Yun toh us darwaze par ek parda hua karta tha par kismat se aaj parda khula hua nahi tha. Darwaze mein se dekhte hi Rupali ko jo nazar aaya usne uski aankhen kholkar rakh di.

Ek pal ke liye Rupali ko samajh nahi aaya ke vo kya dekh rahi hai ya jo vo dekh rahi hai vo kya hai. Aankhen malkar usne dobara dekha to manzar vaisa hi tha. Rupali ne gaur se dekhna shuru kiya aur samajhna chaha ke andar ho kya raha hai.

Pehli cheez jo usko dikhi vo tha Kallo ka chehra. Baal bikhre hue, maathe par pasina, aankhen pheli hui, aur munh khula hua. Uski elbows bed par thi aur jo jhuki hui thi jiski vajah se uske baal baar baar uske chehre par gir jaate the jinko vo ek haath se apne chehre se hata deti thi. Uska sar aage pichhe ho raha tha jaise vo hil rahi ho aur har baar jaise hi ho aage ko hoti, uske munh se aah ooh jaisi aawaz nikalti.

Agli cheez jispar Rupali ka dhyaan gaya vo thi Kallo ki chhatiyan jinhen dekhkar Rupali ka munh khula reh gaya. Usne ek 2 baar apni maan ko bra mein dekha tha par Kallo ki chhatiyan dekhkar toh vo hairat maan gayi. Kallo aage ko jhuki hui thi jiski vajah se uski chhatiyan uske shareer aur neeche bed ke beech mein latak rahi thi. Vo itno badi badi thi ke Shareer aur bed ke beech thoda faasla hone ke baad bhi uske nipples neeche bed par touch kar rahe the. Jaise hi kallo ko shareer hilta, vo dono bhi aage pichhe ko jhoolti.

Ruali ki aankhon ke liye ye sab kuchh naya tha. Pehli nazar padte hi usko ek jhatka sa laga tha jo ab dheere dheere kam ho raha tha. Uski aankehn jo ek pal ke liye saamne ke manzar par yakeen nahi kar paayi thi ab dheere dheere adjust ho rahi thi.

Pehli baar Rupali ne gaur se sirf chhatiyon se focus hatakar kamre mein poori tarah nazar phirayi.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:56

खूनी हवेली की वासना पार्ट --5

गतान्क से आगे........................

कल्लो और शंभू काका दोनो ही पूरी तरह नंगे थे और उसके माँ बाप के बेड पर थे.कल्लो अपनी कोहनियों और घुटनो के बल आगे को झुकी हुई थी और शंभू काका उसके पिछे थे. वो अपने दोनो घुटनो पर खड़े हुए थे और पिछे से कल्लो के साथ सटे हुए थे. उनके पेट के नीचे का हिस्सा कल्लो की गांद से चिपका हुआ था और टांगे कल्लो की टाँगो के साथ. दोनो हाथों से उन्होने कल्लो की कमर को पकड़ा हुआ था और आगे पिछे हो रहे थे.

रूपाली को एक पल के लिए तो दोनो को ऐसे नंगा देखकर शरम आई. उसे पता नही था के कमरे में क्या हो रहा है पर वो ऐसे एक दूसरे के सामने नंगे होना उसको गंदा लगा. उसका पहला ख्याल था के अपने माँ बाप के आते ही उनको बता देगी के शंभू काका और कल्लो उनके कमरे में गंदा काम कर रहे थे. उसको दोनो पर ही बहुत गुस्सा आ रहा था.

उसने अपनी नज़र हटा ली और वापिस अपने कमरे में जाने की सोचने लगी.

"आआहह धीरे" दूसरे कमरे से कल्लो की आवाज़ आई.

इस आवाज़ ने रूपाली को पलटकर वापिस देखने पर मजबूर कर दिया. उसने फिर अपनी आँख दरवाज़े से लगा दी. सीन अब भी वही था पर अब शंभू काका अपने घुटनो के बजाय अपने पैरों पर खड़े थे और हाथों से रूपाली की गांद को पकड़कर बहुत ज़ोर से आगे पिछे हो रहे थे.

"दर्द हो रहा है मुझे" कल्लो फिर बोली पर शंभू काका पर इस बात का कोई असर नही पड़ा. वो वैसे ही आगे पिछे होते रहे.

इस बार रूपाली को जाने क्यूँ जो हो रहा था वो देखकर अच्छा लगा. उसका गुस्सा चलता बना और वो बड़े इंटेरेस्ट से सामने देखने लगी. शंभू काका और कल्लो दोनो ही बिस्तर पर बहुत ज़ोर से हिल रहे थे.

"छूटने वाला हूँ मैं ..... "शंभू काका ने कहा

"अंदर नही" कल्लो बोली

अचानक काका ज़ोर से आगे को होकर कल्लो के साथ चिपक गये.

"अंदर नही .... अंदर नही ..." कल्लो ज़ोर से चिल्लाई और आगे को होने लगी पर शंभू काका ने उसको बहुत ज़ोर से पकड़ रखा था. कल्लो जैसे ही आगे हुई वो भी उसके साथ आगे को हो गये. कल्लो ने फिर कोशिश की तो इस बार शंभू काका उसपर झुक गये. वज़न की वजह से झुकी हुई कल्लो बिस्तर पर उल्टी लेट ही गयी और शंभू काका उसके उपेर लेट गये.

थोड़ी देर तक दोनो यूँ ही लेटे रहे. दोनो की साँसें बहुत तेज़ी से चल रही थी. कुच्छ टाइम बाद कल्लो बोली.

"मना किया था ना मैने ... अंदर क्यूँ पानी छ्चोड़ा?"

"अर्रे कुच्छ नही होता. कुच्छ ठहर भी गया तो मैं दवाई ला दूँगा" शंभू काका बोले.

थोड़ी देर तक दोनो फिर ऐसे ही लेटे रहे. साँसें अब नॉर्मल हो गयी थी पर दोनो के जिस्म पसीने से भीगे हुए थी.

"अब निकालो अपने इस डंडे को और उठो" कल्लो कुच्छ देर बाद बोली

काका बिस्तर से उठे और खड़े हो गये और तब पहली बार रूपाली ने लंड देखा .

शंभू काका के खड़े होते ही उसकी जैसे हसी सी छूट गयी. वो एक बुड्ढे आदमी था और पूरा शरीर वैसा ही था जैसे एक बुड्ढे का होना चाहिए. ढला हुआ. ढीली सी स्किन और पतले पतले हाथ पावं. पूरे शरीर पर सफेद बॉल पर जहाँ रूपाली की नज़र पड़ी वो थी उनकी टाँगो के बीच झूली लड़को वाली चीज़.

रूपाली की 14-15 साल की उमर थी. वो एक आदमी और औरत की शरीर की बनावट जानती थी. जानती थी के लड़को की टाँगो के बीच क्या होता है पर आज वो पहली बार उसको देख रही थी. अजीब लग रहा था. जैसे काका की टाँगो के बीच एक छ्होटी सी तीसरी टाँग झूल रही हो. वो गौर से देख ही रही थी के काका ने पाजामा पहेन लिया.

"अब उठ जा" उन्होने कल्लो से कहा जो बिस्तर पर अब भी उल्टी पड़ी हुई थी.

कल्लो उठकर खड़ी हुई और रूपाली की नज़र काका से हटकर उसपर पड़ी. कल्लो थोड़ी मोटी थी. शरीर पर यहाँ वहाँ चरबी जमा थी. रंग बिल्कुल काला. रूपाली ने उसको उपेर से नीचे तक देखा. उसकी टाँगो के बीच बड़े बड़े बाल थे जो रूपाली के लिए कोई अजनबी बात नही थी. खुद उसकी टाँगो के बीच बाल निकलने शुरू हो गये थे और वो ये भी जानती थी के उन बालों के पिछे क्या छिपा हुआ था. पर जिस चीज़ पर फिर रूपाली की नज़र अटक गयी वो थी कल्लो की चूचियाँ. कल्लो के उठने और अपने ब्लाउस पहेन्ने तक रूपाली उसकी छातियो को देखकर यही सोचती रही के कितनी बड़ी बड़ी हैं.

"मैं किचन में जाता हूँ" काका ने कहा "रूपाली बिटिया उठने वाली होगी और मालिक भी आते ही होंगे. ये चादर निकालकर धोने के लिए डाल दे और दूसरी बिच्छा दे"

काका की बात सुनकर रूपाली समझ गयी के वो दोनो अब कमरे से बाहर आएँगे. वो जल्दी से उठी और चुप चाप इंदर के कमरे से निकलकर अपने कमरे में चली गयी. पर उसके दिमाग़ में जैसे हज़ारों बातें घूम रही ही, काका और कल्लो क्या कर रहे थे और क्यूँ कर रहे थे, शरम नही आई कल्लो को ऐसे काका के सामने नंगी होते हुए वगेरह वगेरह .....

अगले कुच्छ दिन तक रूपाली अजीब हालत में रही. जब भी वो शंभू या कल्लो को देखती, उसको हर बार वही सीन याद आता. उसके लिए जैसे उन दोनो के चेहरे पर नज़र रखना मुश्किल हो गया था. कभी उसको गुस्सा आता तो कभी उन दोनो को देखकर एक अजीब फीलिंग सी होती. जैसे ही वो दोनो रूपाली के सामने आता, रूपाली अपनी नज़र उनके चेहरे से हटा लेती पर सबसे ज़्यादा परेशान जो बात रूपाली को कर रही थी वो ये थी के जब शंभू आस पास होता तो रूपाली की नज़र जैसे अपने आप उसके पाजामे पर पड़ती और वो अपने दिमाग़ में उसका झूलता हुआ लंड इमॅजिन करने लगती.

इसी तरह जब कल्लो उसके आस पास होती तो रूपाली का दिल उसकी चूचियो की तरफ देखने को करता.

अगले कुच्छ दिन इसी तरह से गुज़र गये. रूपाली जानती थी के जहाँ एक तरफ वो शंभू और कल्लो पर दिल ही दिल में गुस्सा करती है, वहीं दूसरी तरफ उसका दिल अगले सनडे का इंतेज़ार कर रहा था, ताकि वही खेल दोबारा देखे.

सॅटर्डे की रात को नींद तो जैसे रूपाली की नज़रों से जाने कहाँ उड़ गयी थी. उसको बेसब्री से कल सुबह का इंतेज़ार था के माँ बाप मंदिर जाएँ, शम्भी और कल्लो अपना खेल शुरू करें और रूपाली फिर से देखे. खाना खाने के बाद जब उसको नींद नही आई तो वो अपने छ्होटे भाई इंदर के साथ उसके कमरे में बैठकर उसको पढ़ने लगी.

उसको पता ही नही चला के कब इंदर और वो खुद बातें करते करते सो गये.

रात को एक आवाज़ पर रूपाली की आँख खुली. उसने देखा के कमरे में अंधेरा था और नाइट बल्ब जल रहा था. वो अब भी इंदर के कमरे में ही थी जो उसके पास ही सो रहा था. अपने उपेर चादर देखकर उसने अंदाज़ा लगाया के मम्मी या डॅडी में से किसी ने उसको वहाँ सोता देखकर चादर ओढ़ा दी और वहीं सोने दिया.

रूपाली ने घड़ी की तरफ नज़र डाली. रात के 12 बज रहे थे. उसको प्यास लगी थी. वो बिस्तर से उठने ही लगी थी के मम्मी पापा के कमरे से आती आवाज़ ने उसको चौंका दिया. बीच का दरवाज़ा बंद था पर मम्मी डॅडी के कमरे में लाइट जल रही थी.

"आआअहह निकालो निकालो ... दर्द हो रहा है मुझे" अचानक से मम्मी की आवाज़ आई तो रूपाली चौंक पड़ी. नींद आँखों से फ़ौरन उड़ गयी और उसको ये समझते एक सेकेंड नही लगा के मम्मी डॅडी भी वही कर रहे हैं जो शंभू और कल्लो कर रहे थे.

"बससस्स ... घुस गया, घुस गया ... " पापा की आवाज़ आई.

"आई .... आ, मर गयी मैं" उसकी माँ की घुटि घुटि आवाज़ आ रही थी.

रूपाली जैसे शरम से पानी पानी हो गयी. वो अच्छी तरह से जानती थी के कमरे में क्या हो रहा है. वो फ़ौरन बिस्तर से उठी और कमरे से बाहर जाने लगी. बाहर जाते हुए उसने ना चाहते हुए एक नज़र बीच के दरवाज़े पर डाली और सीधी निकल गयी पर कमरे से बाहर जाने तक उसके कदम रुक चुके थे.

लास्ट सनडे की तरह आज भी पीछ का परदा हटा हुआ था. मम्मी पापा के कमरे की लाइट जल रही थी इसलिए सब कुच्छ साफ दिख रहा था.

यूँ तो रूपाली ने एक नज़र ही डाली थी पर उस एक सेकेंड में ही कमरे का सीन उसकी दिमाग़ में बैठ गया. उसके कदम रुके और वो जैसे एक नशे की सी हालत में वापिस कमरे में आई और चुपके से मम्मी पापा के कमरे में झाँका.

जो उसने सोचा था वही हो रहा था पर एक अलग अंदाज़ में. रूपाली की नज़र सीधी अपने माँ बाप के बेड पर पड़ी पर वो खाली था. उसकी मम्मी कमरे की एक दीवार से सटी खड़ी थी. पापा ठीक उनके पिछे उनसे सटे हुए खड़े थे.

जहाँ से रूपाली देख रही थी और जिस तरह से उसके मम्मी पापा खड़े थे, वहाँ से दोनो रूपाली को साइड से नज़र आ रहे थे.

उसकी माँ का चेहरा दीवार से सटा हुआ था, और पूरा शरीर दीवार और पापा के बीच था. पापा ने मम्मी को ज़ोर से दोनो तरफ से अपनी बाहों में पकड़ रखा और उनकी कमर आगे पिछे हो रही थी. मम्मी ने एक हाथ से पापा का हाथ पकड़ रखा था और दूसरे हाथ से पापा की गांद सहला रही थी.

"मुझे समझ नही आता के आपको पिछे से क्या मज़ा आता है" मम्मी ने कहा

"तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे के नही आता" पापा कमर हिलाते हुए बोले

"जितना दर्द होता है ना उसके मुक़ाबले में जो मज़ा आता है वो ना के बराबर है ... "मम्मी बोली

पापा अब भी वैसे ही मम्मी की पिछे खड़े कमर हिला रहे थे. क्या हो रहा था और क्यूँ हो रहा था ये रूपाली को समझ नही आया पर अपने पापा को बिना कपड़ो के नंगे देखना का उसका ये पहला मौका था. वो नशीली नज़रों से अपने बाप के शरीर को उपेर से नीचे तक देख रही थी.

"आआए मर गयी ..." उसकी मम्मी चिल्लाई " अब क्या पिछे से डालके आगे से निकालने का इरादा है. धीरे करो"

"क्या धीरे करूँ?" पापा ने पुछा

"वही जो कर रहे हो"मम्मी ने कहा

"क्या कर रहा हूँ?" पापा ने फिर पुछा

"मुझे पता है आप क्या सुनना चाहते हो" मम्मी मुस्कुराती हुई बोली

"तो बोलो ना" पापा ने मम्मी के गाल पर एक पप्पी दी और ज़ोर से कमर को हिलाया

"आहह" मम्मी ने कहा

"अब मज़ा आ रहा है?" पापा ने पुछा

"हां" मम्मी वैसे ही बोली "बिस्तर पर लेट जाने दो ना. मेरे घुटनो में खड़े होने की ताक़त नही रही"

"ठीक है" पापा बोले "लेट जाने दूँगा. पहले बताओ के क्या कर रहा हूँ मैं"

मम्मी थोड़ी देर को चुप हो गयी

"बोलो ना" पापा फिर से गाल पर पप्पी लेते हुए बोले

"मार रहे हो" मम्मी ने शरमाते हुए कहा

"क्या मार रहा हूँ?" पापा ने पुचछा

मम्मी फिर चुप हो गयी

"कहो ना" पापा ने फिर पुचछा

"गांद" मम्मी ने फिर शरमाते हुए कहा और अपनी आँखें बंद कर ली

"गांद क्या?" पापा ने अपनी कमर और तेज़ी से हिल्लाई

"आअहह" मम्मी ने फिर आवाज़ की पर इस बार रूपाली को वो आवाज़ अलग लगी. पहले ऐसा लगा था जैसे मम्मी को बहुत दर्द हो रहा हो पर अब तो ऐसा लगा जैसे मम्मी को अच्छा लग रहा हो.

"गांद मार रहे हो" मम्मी ने कहा

"पड़ोसन की गांद मार रहा हूँ?" पापा बोले तो मम्मी हस पड़ी.

"नही" वो बोली "मेरी गांद मार रहे हो"

"ओह मेरी जान" सुनते ही जैसे पापा को जोश सा आ गया "क्या टाइट गांद है तुम्हारी. मज़ा आ रहा है?"

"हां" मम्मी ने कहा

"पूरी बात बोलो"

"हाँ मज़ा आ रहा है" रूपाली ने देखा के अब धीरे धीरे मम्मी भी हिलने लगी थी. पापा आगे को हो रहे थे और मम्मी पिछे को.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --5

gataank se aage........................

Kallo aur Shambhu Kaka dono hi poori tarah nange the aur uske maan baap ke bed par the.Kallo apni kohniyon aur ghunto ke bal aage ko jhuki hui thi aur Shambhu Kaka uske pichhe the. Vo apne dono ghutno par khade hue the aur pichhe se Kallo ke saath sate hue the. Unke pet ke neeche ka hissa Kallo ki gaand se chipka hua tha aur taange kallo ki taango ke saath. Dono haathon se unhone Kallo ki kamar ko pakda hua tha aur aage pichhe ho rahe the.

Rupali ko ek pal ke liye toh dono ko aise nanga dekhkar sharam aayi. Use pata nahi tha ke kamre mein kya ho raha hai par vo aise ek doosre ke saamne nange hona usko ganda laga. Uska pehla khyaal tha ke apne maan baap ke aate hi unko bata degi ke Shambhu Kaka aur Kallo unke kamre mein ganda kaam kar rahe the. Usko dono par hi bahut gussa aa raha tha.

Usne apni nazar hata li aur vaapis apne kamre mein jaane ki sochne lagi.

"Aaaahhhh Dheere" Doosre kamre se Kallo ki aawaz aayi.

Is aawaz ne Rupali ko palatkar vaapis dekhne par majboor kar diya. Usne phir apni aankh darwaze se laga di. Scene ab bhi vahi tha par ab Shambhu kaka apne ghutno ke bajaay apne pairon par khade the aur haathon se Rupali ki gaand ko pakadkar bahut zor se aage pichhe ho rahe the.

"Dard ho raha hai mujhe" Kallo phir boli par Shambhu kaka par is baat ka koi asar nahi pada. Vo vaise hi aage pichhe hote rahe.

Is baar Rupali ko jaane kyun jo ho raha tha vo dekhkar achha laga. Uska gussa chalta bana aur vo bade interest se saamne dekhne lagi. Shambhu Kaka aur Kallo dono hi bistar par bahut zor se hil rahe the.

"Chhutne wala hoon main ..... "Shambhi Kaka ne kaha

"Andar nahi" Kallo boli

Achanak kaka zor se aage ko hokar Kallo ke saath chipak gaye.

"Andar nahi .... andar nahi ..." Kallo zor se chillayi aur aage ko hone lagi par Shambhi Kaka ne usko bahut zor se pakad rakha tha. Kallo jaise hi aage hui vo bhi uske saath aage ko ho gaye. Kallo ne phir koshish ki toh is baar Shambhu Kaka uspar jhuk gaye. Vazan ki vajah se jhuki hui Kallo bistar par ulti let hi gayi aur Shambhu Kaka uske uper let gaye.

Thodi der tak dono yun hi lete rahe. Dono ki saansen bahut tezi se chal rahi thi. Kuchh time baad Kallo boli.

"Mana kiya tha na maine ... Andar kyun paani chhoda?"

"Arre kuchh nahi hota. Kuchh thehar bhi gaya toh main dawai la doonga" Shambhu Kaka bole.

Thodi der tak dono phir aise hi lete rahe. Saansen ab normal ho gayi thi par dono ke jism paseene se bheege hue thi.

"Ab nikalo apne is dande ko aur utho" Kallo kuchh der baad boli

Kaka bistar se uthe aur khade ho gaye aur tab pehli baar Rupali ne lund dekha .

Shambhu Kaka ke khade hote hi uski jaise hasi si chhut gayi. Vo ek buddhe aadmi tha aur poora shareer vaisa hi tha jaise ek buddhe ka hona chahiye. Dhala hua. Dheeli si skin aur patle patle haath paon. Poore shareer par safed baal par jahan Rupali ki nazar padi vo thi unki taango ke beech jhooli ladko wali cheez.

Rupali ki 14-15 saal ki umar thi. Vo ek aadmi aur aurat ki shareer ki banawat jaanti thi. Jaanthi thi ke ladko ki taango ke beech kya hota hai par aaj vo pehli baar usko dekh rahi thi. Ajeeb lag raha tha. Jaise Kaka ki taango ke beech ek chhoti si teesri taang jhool rahi ho. Vo gaur se dekh hi rahi thi ke Kaka ne pajama pehen liya.

"Ab uth ja" Unhone Kallo se kaha jo bistar par ab bhi ulti padi hui thi.

Kallo uthkar khadi hui aur Rupali ki nazar Kaka se hatkar uspar padi. Kallo thodi moti thi. Shareer par yahan vahan charbhi jama thi. Rang bilkul kala. Rupali ne usko uper se neeche tak dekha. Uski taango ke beech bade bade baal the jo Rupali ke liye koi ajnabhi baat nahi thi. Khud uski taango ke beech baal nikalne shuru ho gaye the aur vo ye bhi jaanti thi ke un baalon ke pichhe kya chhipa hua tha. Par jis cheez par phir Rupali ki nazar atak gayi vo thi Kallo ki chhatiyan. Kallo ke uthne aur apne blouse pehenne tak Rupali uski chhatiyon ko dekhkar yahi sochti rahi ke kitni badi badi hain.

"Main kitchen mein jaata hoon" Kaka ne kaha "Rupali bitiya uthne wali hogi aur maalik bhi aate hi honge. Ye chadar nikalkar dhone ke liye daal de aur doosri bichha de"

Kaka ki baat sunkar Rupali samajh gayi ke vo dono ab kamre se bahar aayenge. Vo jaldi se uthi aur chup chap Inder ke kamre se nikalkar apne kamre mein chali gayi. Par uske dimag mein jaise hazaron baatein ghoom rahi hi, Kaka aur Kallo kya kar rahe the aur kyun kar rahe the, sharam nahi aayi Kallo ko aise Kaka ke saamne nangi hote hue vagerah vagerah .....

Agle kuchh din tak Rupali ajeeb halat mein rahi. Jab bhi vo Shambhu ya Kallo ko dekhti, usko har baar vahi scene yaad aata. Uske liye jaise un don ke chehre par nazar rakhna mushkil ho gaya tha. Kabhi usko gussa aata to kabhi un dono ko dekhkar ek ajeeb feeling si hoti. Jaise hi vo dono Rupali ke saamne aata, Rupali apni nazar unke chehre se hata leti par sabse zyada pareshan jo baat Rupali ko kar rahi thi vo ye thi ke jab Shambhu aas paas hota toh Rupali ki nazar jaise apne aap uske pajame par padti aur vo apne dimag mein uska jhoolta hua lund imagine karne lagti.

Isi tarah jab Kallo uske aas paas hoti toh Rupali ka dil uski chhatiyon ki taraf dekhne ko karta.

Agle kuchh din isi tarah se guzar gaye. Rupali jaanti thi ke jahan ek taraf vo Shambhi aur Kallo par dil hi dil mein gussa karti hai, vahin doosri taraf uska dil agle Sunday ka intezaar kar raha tha, taaki vahi khel dobara dekhe.

Saturday ki raat ko neend toh jaise Rupali ki nazaron se jaane kahan ud gayi thi. Usko besabri se kal subah ka intezaar tha ke maan baap mandir jaayen, Shambhi aur Kallo apna khel shuru karen aur Rupali phir se dekhe. Khana khane ke baad jab usko neend nahi aayi toh vo apne chhote bhai Inder ke saath uske kamre mein bethkar usko padhane lagi.

Usko pata hi nahi chala ke kab Inder aur vo khud baaten karte karte so gaye.

Raat ko ek aawaz par Rupali ki aankh khuli. Usne dekha ke kamre mein andhera tha aur night bulb jal raha tha. Vo ab bhi Inder ke kamre mein hi thi jo uske paas hi so raha tha. Apne uper chadar dekhkar usne andaza lagaya ke mummy ya daddy mein se kisi ne usko vahan sota dekhkar chadar odha di aur vahin sone diya.

Rupali ne ghadi ki taraf nazar daali. Raat ke 12 baj rahe the. Usko pyaas lagi thi. Vo bistar se uthne hi lagi thi ke mummy papa ke kamre se aati aawaz ne usko chaunka diya. Beech ka darwaza band tha par mummy daddy ke kamre mein light jal rahi thi.

"Aaaaahhhh nikalo nikalo ... dard ho raha hai mujhe" Achanak se mummy ki aawaz aayi toh Rupali chaunk padi. Neend aankhon se fauran ud gayi aur usko ye samajhte ek second nahi laga ke mummy daddy bhi vahi kar rahe hain jo Shambhu aur Kallo kar rahe the.

"Bassss ... ghus gaya, ghus gaya ... " Papa ki aawaz aayi.

"aayi .... aah, mar gayi main" Uski maan ki ghuti ghuti aawaz aa rahi thi.

Rupali jaise sharam se pani pani ho gayi. Vo achhi tarah se janti thi ke kamre mein kya ho raha hai. Vo fauran bistar se uthi aur kamre se bahar jaane lagi. Bahar jaate hue usne na chahte hue ek nazar beech ke darwaze par daali aur sidhi nikal gayi par kamre se bahar jaane tak uske kadam ruk chuke the.

Last Sunday ki tarah aaj bhi peech ka parda hata hua tha. Mummy Papa ke kamre ki light jal rahi thi isliye sab kuchh saaf dikh raha tha.

Yun to Rupali ne ek nazar hi daali thi par us ek second mein hi kamre ka scene uski dimag mein beth gaya. Uske kadam ruke aur vo jaise ek nashe ki si halat mein vaapis kamre mein aayi aur chupke se mummy papa ke kamre mein jhanka.

Jo usne socha tha vahi ho raha tha par ek alag andaaz mein. Rupali ki nazar sidhi apne maan baap ke bed par padi par vo khali tha. Uski mummy kamre ki ek deewar se sati khadi thi. Papa theek unke pichhe unse sate hue khade the.

Jahan se Rupali dekh rahi thi aur jis tarah se uske mummy papa khade the, vahan se dono Rupali ko side se nazar aa rahe the.

Uski maan ka chehra Deewar se sata hua tha, aur poora shareer deewar aur papa ke beech tha. Papa ne mummy ko zor se dono taraf se apni baahon mein pakad rakha aur unki kamar aage pichhe ho rahi thi. Mummy ne ek haath se papa ka haath pakad rakha tha aur doosre haath se papa ki gaand sehla rahi thi.

"Mujhe samajh nahi aata ke aapko pichhe se kya maza aata hai" Mummy ne kaha

"Tum to aise keh rahi ho jaise ke nahi aata" Papa kamar hilate hue bole

"Jitna dard hota hai na uske mukable mein jo maza aata hai vo na ke barabar hai ... "Mummy boli

Papa ab bhi vaise hi mummy ki pichhe khade kamar hila rahe the. Kya ho raha tha aur kyun ho raha tha ye Rupali ko samajh nahi aaya par apne Papa ko bina kapdo ke nange dekhna ka uska ye pehla mauka tha. Vo nasheeli nazron se apne baap ke shareer ko uper se neeche tak dekh rahi thi.

"Aaayi mar gayi ..." Uski mummy chillayi " Ab kya pichhe se daalke aage se nikalne ka irada hai. Dheere karo"

"Kya dheere karun?" Papa ne puchha

"Vahi jo kar rahe ho"Mummy ne kaha

"Kya kar raha hoon?" Papa ne phir puchha

"Mujhe pata hai aap kya sunna chahte ho" Mummy muskurati hui boli

"Toh bolo na" Papa ne mummy ke gaal par ek pappi di aur zor se kamar ko hilaya

"AAHHH" Mummy ne kaha

"Ab maza aa raha hai?" Papa ne puchha

"Haan" Mummy vaise hi boli "Bistar par let jaane do na. Mere ghutno mein khade hone ki taakat nahi rahi"

"Theek hai" Papa bole "Let jaane doonga. Pehle batao ke kya kar raha hoon main"

Mummy thodi der ko chup ho gayi

"Bolo na" Papa phir se gaal par pappi lete hue bole

"Maar rahe ho" Mummy ne sharmate hue kaha

"Kya maar raha hoon?" Papa ne puchha

Mummy phir chup ho gayi

"Kaho na" Papa ne phir puchha

"Gaand" Mummy ne phir sharmate hue kaha aur apni aankhen band kar li

"Gaand kya?" Papa ne apni kamar aur tezi se hillayi

"Aaahhhh" Mummy ne phir aawaz ki par is baar Rupali ko vo aawaz alag lagi. Pehle aisa laga tha jaise mummy ko bahut dard ho raha hoon par ab toh aisa laga jaise mummy ko achha lag raha ho.

"Gaand maar rahe ho" Mummy ne kaha

"Padosan ki gaand maar raha hoon?" Papa bole toh mummy has padi.

"Nahi" Vo boli "Meri gaand maar rahe ho"

"Oh meri jaan" Sunte hi jaise papa ko josh sa aa gaya "Kya tight gaand hai tumhari. Maza aa raha hai?"

"Haan" Mummy ne kaha

"Poori baat bolo"

"Haan maza aa raha hai" Rupali ne dekha ke ab dheere dheere Mummy bhi hilne lagi thi. Papa aage ko ho rahe the aur Mummy pichhe ko.

kramashah........................................


raj..
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Re: खूनी हवेली की वासना

Unread post by raj.. » 17 Dec 2014 12:57

खूनी हवेली की वासना पार्ट --6

गतान्क से आगे........................

"किस्में मज़ा आ रहा है?" पापा जैसे सवाल पर सवाल कर रहे थे

"गांद मरवाने में" मम्मी भी अब बिना रुके जवाब दे रही थी.

"ज़ोर से मारु या धीरे से?"

"अब कुच्छ नही बोलूँगी" मम्मी ने आँखें खोली "पहले बेड पर लेट जाने दो उसके बाद जो पुच्छना है पुच्छ लेना"

पापा हस्ने लगे और मम्मी को छ्चोड़ते हुए धीरे से पिछे हुए.

तब रूपाली को पहली बार अंदाज़ा हुआ के हो क्या रहा था और उसको एक झटका सा लगा. पापा जब पिछे हुए तो उनकी लड़को वाली चीज़ मम्मी के पिछे से बाहर आई. दो चीज़ें जो रूपाली को नज़र नही आ रही थी वो अब अचानक से दिखी. अपने बाप का खड़ा हुआ लंड और अपनी माँ की गांद. ये उसकी आँखों के लिए बहुत ज़्यादा हो गया था, अपने माँ बाप को यूँ नंगे देखना. गिल्ट और शरम की एक फीलिंग उसके पूरे शरीर में दौड़ गयी और वो फ़ौरन दरवाज़े से हटी, कमरे से बाहर निकली और अपने कमरे में आ गयी.

ख़ान अपने घर पहुँचा तो दिमाग़ में बस एक ही ख्याल और एक ही नाम घूम रहा था.

किरण चतुर्वेदी

किरण से वो पहली बार कॉलेज में मिला था. किरण के पिछे कॉलेज का हर लड़का था, हर ख्याल के साथ. कोई उससे दोस्ती करना चाहता था, कोई उससे अफेर रखना चाहता था, कोई उससे प्यार करना चाहता था, कोई बस उसको चोदना चाहता था और कोई उससे शादी करना चाहता था.

पर किस्मत खुली तो ख़ान की. किरण से उसकी दोस्ती धीरे धीरे प्यार में बदलती चली गयी. वो दोनो एक दूसरे के करीब आते चले गये और जल्दी ही प्यार शादी के इरादे में बदल गया.

मुसीबत आई कॉलेज ख़तम होने के बाद. किरण के घरवाले उसकी शादी करना चाहते थे और ख़ान को समझ नही आ रहा था के क्या करे. वो एक पठान था और किरण एक ब्रामिन. उसके उपेर से वो एक ग़रीब घर से था और किरण का बाप करोड़पति था.

उन दोनो को ये मालूम था के किरण का बाप उनकी शादी होने नही देगा इसलिए दोनो ने भागने का प्लान बनाया.

ख़ान को आज भी याद था के जिस दिन उनका शाम को भागने का प्लान था उसी दिन उसके घर पर कुच्छ लोग आए. उन्होने घर में घुसकर ख़ान और उसकी माँ को इतना मारा था के उसकी माँ की वहीं मौत हो गयी थी और ख़ान 1 महीने तक हॉस्पिटल में रहा था.

बाहर आया तो पता चला के किरण की शादी हो चुकी था. उसकी दोस्तों से मालूम किया तो खबर मिली के किरण ने खुद ही अपने बाप को उस दिन भाग जाने के प्लान के बारे में बता दिया था. वो जानता था के जिन लोगों ने उसकी माँ को मारा वो कौन था पर उसकी लाख कोशिश पर भी पोलीस ने किरण के बाप के खिलाफ एक एफआइआर तक दर्ज नही की और ना ही कोई कार्यवाही हुई. उल्टा ख़ान पर इल्ज़ाम डाल दिया गया के उसकी संगत ग़लत थी और उसने कुच्छ ग़लत लोगों से पैसे उधार ले रखे थे जिन्होने पैसे वापिस ने मिलने की वजह से ख़ान और उसकी माँ पर हमला किया.

सिर्फ़ किरण के बाप से अपनी माँ की मौत का बदला लेने के लिए ख़ान पोलीस में भरती हुआ पर उसकी फूटी किस्मत के जिस दिन उसने पोलीस फोर्स जाय्न की, उसी दिन किरण के बाप की हार्ट अटॅक से मौत हो गयी. बदले का इरादा सिर्फ़ इरादा रह गया.

एक बुरा सपना समझकर ख़ान सारी बातों को भूलकर ज़िंदगी में आगे बढ़ गया. किरण से उसका कोई वास्ता ना रहा और उसने उसके बारे में सोचना भी बंद कर दिया था. एक दिन जब एक एनकाउंटर में ख़ान की गोली से एक सब-इनस्पेक्टर की मौत हुई तो उसकी ज़िंदगी में वापिस किरण दाखिल हुई.

उस दिन ख़ान ने पहली बार कई सालों बाद किरण को देखा था. उसको तो पता भी नही था के किरण एक जर्नलिस्ट बन गयी थी और एक काफ़ी बड़े चॅनेल के लिए काम करती थी. जो सब-इनस्पेक्टर ख़ान की गोली से मरा था वो किरण की किसी सहेली का भाई था और पता नही कैसे पर किरण को ये इन्फर्मेशन मिल गयी के जो गोली सब-इंस्पेकोर को लगी थी, वो पोलीस रेवोल्वेर से चली थी और उस एनकाउंटर के दौरान रेवोल्वेर सिर्फ़ एक ख़ान के पास था.

वो किरण ही थी जिसने इस बात को लेकर मीडीया में बवाल मचा दिया था. बात यहाँ तक बढ़ गयी थी ख़ान की नौकरी पर बन आई थी. वो तो पोलीस कमिशनर से उसकी बहुत अच्छी बनती थी जिसकी वजह से इस बात को दबा दिया गया और कुच्छ टाइम के लिए ख़ान को इस छ्होटे से गाओं में पोस्ट कर दिया गया ताकि वो कुच्छ दिन के लिए गायब हो सके.

और आज फिर कुच्छ महीनो बाद किरण ने उसको फोन किया. क्यूँ, ये बात वो नही जानता था.

"किरण किरण कम्बख़्त किरण" ख़ान अपने आप से बोला "मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी पनौती"

दूसरा केस में एक ऐसे इनस्पेक्टर की इन्वॉल्व्मेंट जिसपर खुद कभी अपने एक कॉलेग, एक सब इनस्पेक्टर को मारने का इल्ज़ाम था पोलीस वाले नही चाहते थे. इसलिए पोलीस कमिशनर के फोर्स करने पर ख़ान ने चार्ज शीट पर साइन कर दिया पर जाने क्यूँ उसको लगता था के कहीं कुच्छ मिस्सिंग था. हो सकता था के खून जै ने ही किया हो पर बिना किसी छान बीन के यूँ सीधे सीधे जै को ही फंदे पर टंगा देना उसको ठीक नही लग रहा था. ये भी तो हो सकता था के खून किसी और ने किया हो और जै बस ग़लत वक़्त पर वहाँ पहुँच गया हो.

ख़ान ये भी जानता था के हर कोई जल्दी से जल्दी जै को खून के इल्ज़ाम में टंगा देना चाहेगा. पोलीस वाले इतनी एविडेन्स दे देंगे के ये केस कोर्ट में ओपन आंड शूट केस साबित होगा और जै का काम तमाम कर दिया जाएगा. उसको जो करना था, जल्दी करना था.

यही सोचते हुए उसने ड्रॉयर से एक पेन और नोटपॅड निकाला और बेड पर एक कप चाइ लेकर बैठ गया.

केस के बारे में जो बातें वो जानता था उसने नोटपेड में लिखनी शुरू कर दी.

1. क़त्ल की रात ठाकुर ने अपने कमरे में ही डिन्नर किया था. उनको अपने कमरे के बाहर आखरी बार 8 बजे देखा गया था, ड्रॉयिंग हॉल में टीवी देखते हुए.

2. 8:15 के करीब वो अपने कमरे में चले गये थे और उसके बाद उनकी नौकरानी पायल खाना देने कमरे में गयी.

3. 8:30 के आस पास नौकरानी ठाकुर के बुलाने पर वापिस उनके कमरे में पहुँची. ठाकुर ने ज़्यादा कुच्छ नही खाया था और उसको प्लेट्स ले जाने के लिए कहा.

4. इसके बाद 9:15 के आस पास उनकी बहू रूपाली कपड़े लेने के लिए हवेली की पिछे वाले हिस्से में गयी जहाँ ठाकुर के कमरे की खिड़की खुलती थी और खिड़की से ठाकुर उसको अपने कमरे में खड़े हुए दिखाई दिए. वो अकेले थे.

5. उसके बाद तकरीबन 9.30 बजे तेज अपने बाप के कमरे में उनसे बात करने पहुँचा था. क्या बात करनी थी ये उसने नही बताया. सिर्फ़ कुच्छ बात करनी थी.

6. 9:40 के करीब सरिता देवी अपने पति के कमरे में पहुँची. उनके आने के बाद तेज वहाँ से चला गया.

7. 9:45 के करीब ठाकुर ने भूषण को बुलाकर गाड़ी निकालने को कहा. कहाँ जाना था ये नही बताया और खुद सरिता देवी भी ये नही जानती थी के उनके पति कहाँ जा रहे हैं.

8. 10:00 बजे के करीब भूषण वापिस ठाकुर के कमरे में चाबी लेने गया. ठाकुर उस वक़्त कमरे में अकेले थे और सरिता देवी बाहर कॉरिडर में बैठी थी.

9. 10:00 के करीब ही जब भूषण ठाकुर के कमरे से बाहर निकला तो पायल कमरे में गयी ये पुच्छने के लिए के ठाकुर को और कुच्छ तो नही चाहिए था. ठाकुर ने उसको मना कर दिया.

10. 10:05 के करीब जब भूषण कार पार्किंग की ओर जा रहा था तब उसने और ठकुराइन ने जै को हवेली में दाखिल होते हुए देखा.

11. 10:15 पर जब पायल किचन बंद करके अपने कमरे की ओर जा रही थी तब उसने ठाकुर के कमरे से जै को बाहर निकलते देखा. वो पूरा खून में सना हुआ था जिसके बाद उसने चीख मारी.

12. उसकी चीख की आवाज़ सुनकर जै को समझ नही आया के क्या करे. वो पायल को बताने लगा के अंदर ठाकुर साहब ज़ख़्मी हैं और इसी वक़्त पुरुषोत्तम और तेज आ गये. जब उन्होने जै को खून में सना देखा और अपने बाप को अंदर नीचे ज़मीन पर पड़ा देखा तो वो जै को मारने लगे.

13. जै भागकर किचन में घुस गया और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया.

14. 10:45 के करीब ख़ान को फोन आया था के ठाकुर का खून हो गया है जिसके बाद वो हवेली पहुँचा.

पूरा लिखकर ख़ान ने अपनी लिस्ट को दोबारा देखा. जब जै हवेली में आया था उस वक़्त ठाकुर ज़िंदा थे इस बात की गवाही घर के 3 लोग दे सकते हैं. जै का कहना है जब वो कमरे में दाखिल हुआ था तब ठाकुर साहब मरे पड़े थे. यानी के जो हुआ, बीच के कुल 10 मिनट में हुआ.

"10 मिनट में खून? वाउ" ख़ान ने सोचा

जो बातें उसको अब तक पता नही थी वो ये थी के जै इतनी रात को हवेली क्या करने गया था और घर की कौन सी औरत ने ख़ान को फोन करके खून के बारे में बताया था.

और सबसे बड़ा सवाल ये था के अगर जै ने ठाकुर को नही मारा, तो किसने मारा. और 10 मिनट के अंदर अंदर कैसे मारा.

उस रात के इन्सिडेंट ने रूपाली के दिल और दिमाग़ को जैसे झंझोड़ दिया था. एक ही हफ्ते में उसने 2 आदमियों और 2 औरतों को नंगा देखा था, आपस में कुच्छ ऐसा करते हुए जो उसकी समझ में अब तक नही आया था पर हां इतना ज़रूर समझ गयी थी के वो जो भी कर रहे थे, उन्हें ऐसा करते हुए बहुत अच्छा लग रहा था.

वो जवानी की दहलीज़ पर अभी कदम रख ही रही थी. बचपाना अभी तक गया नही था और जवानी पूरी तरह आई नही थी. सीने पर उभार उठ गया था और उसने कुच्छ दिन पहले ही ब्रा पहननी शुरू की थी. टाँगो के बीच हल्के हल्के बाल आ गये थे. वो एक बच्ची से एक जवान लड़की में तब्दील हो रही थी पर जवानी के खेल से पूरी तरह अंजान थी. स्कूल में उसकी सहेलियाँ गिनी चुनी ही थी और जो थी उनको किताबों से फ़ुर्सत नही होती थी. खुद रूपाली भी आधा वक़्त किताबों में घुसी रहती और बाकी आधा वक़्त अपनी सहेलियों से गप्पे लड़ाती रहती.

उस रात के बाद अपने माँ बाप को नंगा देखकर वो सहम सी गयी थी. उसका दिमाग़ कन्फ्यूज़्ड था के रिक्ट करे तो कैसे करे. उसके दिल में एक तरफ तो एक ये डर था के अगर किसी भी तरह मम्मी पापा को पता चल गया के उसने उस रात उन दोनो को देखा था तो उसका क्या होगा तो दूसरी तरफ ये गिल्ट के उसने अपने मम्मी पापा को नंगा देखा.

ज़्यादा गिल्ट इस बात का था के उसे उन दोनो को देखते वक़्त बहुत अच्छा लग रहा था.

अगले कुच्छ दिन तक वो बहुत खोई खोई सी रही. दिल में एक अजीब सी बेचैनी और घबराहट रहती थी. वो ना तो अपने माँ बाप से नज़रे मिला पाती और ना ही कल्लो और शंभू से. हर पल यही लगता के वो सब जानते हैं के उसने क्या किया था और किसी भी वक़्त उससे पुच्छ लेंगे के उसने ऐसा क्यूँ किया.

उसकी हालत ऐसी हो गयी थी के उसकी माँ को फिकर होने लगी के कहीं वो बीमार तो नही.

ज़्यादा परेशान रूपाली को ये बात कर रही थी के वो समझ नही पा रही थी के उसने क्या देखा और कहीं उसका दिमाग़ उसके माँ बाप से नाराज़ था के वो अकेले में ऐसे गंदे काम करते हैं. वो 2 लोग जिन्हें वो इतना प्यार करती थी उन दोनो को ऐसा काम करते देख उसका दिमाग़ सहम गया था. कभी कभी दिल करता था के चिल्ला कर बोल पड़े के आप लोग गंदे हो, मैने देखा था आपको उस रात.

इसी कन्फ्यूषन के चलते उसने अगले कुच्छ हफ़्तो तक दोबारा कल्लो और शंभू को भी देखने की कोशिश नही की जबकि वो जानती थी के उन्होने फिर से वही काम सनडे को किया तो ज़रूर होगा.

और जैसे ये सब कन्फ्यूषन एक दिन अचानक शुरू हो गया था, वैसे ही सब कुच्छ एक दिन अचानक ख़तम हो गया.

क्रमशः........................................

खूनी हवेली की वासना पार्ट --6

gataank se aage........................

"Kismein maza aa raha hai?" Papa jaise sawal par sawal kar rahe the

"Gaand marwane mein" Mummy bhi ab bina ruke jawab de rahi thi.

"Zor se maarun ya dheere se?"

"Ab kuchh nahi bolungi" Mummy ne aankhen kholi "Pehle bed par let jaane do uske baad jo puchhna hai puchh lena"

Papa hasne lage aur mummy ko chhodte hue dheere se pichhe hue.

Tab Rupali ko pehli baar andaza hua ke ho kya raha tha aur usko ek jhatka sa laga. Papa jab pichhe hue toh unki ladko wali cheez mummy ke pichhe se bahar aayi. Do cheezen jo Rupali ko nazar nahi aa rahi thi vo ab achanak se dikhi. Apne baap ka khada hua lund aur apni maan ki gaand. Ye uski aankhon ke liye bahut zyada ho gaya tha, apne maan baap ko yun nange dekhna. Guilt aur sharam ki ek feeling uske poore shareer mein daud gayi aur vo fauran darwaze se hati, kamre se bahar nikli aur apne kamre mein aa gayi.

Khan apne ghar pahuncha toh dimag mein bas ek hi khyaal aur ek hi naam ghoom raha tha.

Kiran Chaturvedi

Kiran se vo pehli baar college mein mila tha. Kiran ke pichhe college ka har ladka tha, har khyaal ke saath. Koi usse dosti karna chahta tha, koi usse affair rakhna chahta tha, koi usse pyaar karna chahta tha, koi bas usko chodna chahta tha aur koi usse shaadi karna chahta tha.

Par kismat khuli to Khan ki. Kiran se uski dosti dheere dheere pyaar mein badalti chali gayi. Vo dono ek doosre ke kareeb aate chale gaye aur jaldi hi pyaar shaadi ke iraade mein badal gaya.

Museebat aayi college khatam hone ke baad. Kiran ke gharwale uski shaadi karna chahte the aur Khan ko samajh nahi aa raha tha ke kya kare. Vo ek pathan tha aur Kiran ek Brahmin. Uske uper se vo ek gareeb ghar se tha aur Kiran ka baap crorepati tha.

Un dono ko ye malum tha ke Kiran ka baap unki shaadi hone nahi dega isliye dono ne bhaagne ka plan banaya.

Khan ko aaj bhi yaad tha ke jis din unka shaam ko bhaagne ka plan tha usi din uske ghar par kuchh log aaye. Unhone ghar mein ghuskar Khan aur uski maan ko itna mara tha ke uski maan ki vahin maut ho gayi thi aur Khan 1 mahine tak hospital mein raha tha.

Bahar aaya toh pata chala ke Kiran ki shaadi ho chuki tha. Uski doston se malum kiya toh khabar mili ke Kiran ne khud hi apne baap ko us din bhaag jaane ke plan ke baare mein bata diya tha. Vo janta tha ke jin logon ne uski maan ko mara vo kaun tha par uski lakh koshish par bhi police ne Kiran ke baap ke khilaf ek FIR tak darj nahi ki aur na hi koi kaaryavahi hui. Ulta Khan par ilzaam daal diya gaya ke uski sangat galat thi aur usne kuchh galat logon se paise udhar le rakhe the jinhone paise vaapis ne milne ki vajah se Khan aur uski maan par hamla kiya.

Sirf Kiran ke baap se apni maan ki maut ka badla lene ke liye Khan police mein bharti hua par uski phooti kismat ke jis din usne police force join ki, usi din Kiran ke baap ki heart attack se maut ho gayi. Badle ka irada sirf irada reh gaya.

Ek bura sapna samajhkar Khan saari baaton ko bhoolkar zindagi mein aage badh gaya. Kiran se uska koi vaasta na raha aur usne uske baare mein sochna bhi band kar diya tha. Ek din jab ek encounter mein Khan ki goli se ek sub-inspector ki maut hui toh uski zindagi mein vaapis Kiran daakhil hui.

Us din Khan ne pehli baar kai saalon baad Kiran ko dekha tha. Usko toh pata bhi nahi tha ke Kiran ek journalist ban gayi thi aur ek kaafe bade channel ke liye kaam karti thi. Jo sub-inspector Khan ki goli se mara tha vo Kiran ki kisi saheli ka bhai tha aur pata nahi kaise par Kiran ko ye information mil gayi ke jo goli sub-inspecor ko lagi thi, vo police revolver se chali thi aur us encounter ke dauran revolver sirf ek Khan ke paas tha.

Vo Kiran hi thi jisne is baat ko lekar Media mein bawal macha diya tha. Baat yahan tak badh gayi thi Khan ki naukri par ban aayi thi. Vo toh police commissioner se uski bahut achhi banti thi jiski vajah se is baat ko daba diya gaya aur kuchh time ke liye Khan ko is chhote se gaon mein post kar diya gaya taaki vo kuchh din ke liye gayab ho sake.

Aur aaj phir kuchh mahino baad Kiran ne usko phone kiya. Kyun, ye baat vo nahi janta tha.

"Kiran Kiran Kambakht Kiran" Khan apne aap se bola "Meri zindagi ki sabse badi panauti"

Doosra case mein ek aise inspector ki involvement jispar khud kabhi apne ek collegue, ek sub inspector ko maarne ka ilzaam tha police wale nahi chahte the. Isliye police commissioner ke force karne par Khan ne charge sheet par sign kar diya par jaane kyun usko lagta tha ke kahin kuchh missing tha. Ho sakta tha ke khoon Jai ne hi kiya ho par bina kisi chhan been ke yun sidhe sidhe Jai ko hi phande par tanga dena usko theek nahi lag raha tha. Ye bhi toh ho sakta tha ke khoon kisi aur ne kiya ho aur Jai bas galat waqt par vahan pahunch gaya ho.

Khan ye bhi janta tha ke har koi jaldi se jaldi Jai ko khoon ke ilzaam mein tanga dena chahega. Police wale itni evidence de denge ke ye case court mein open and shut case saabit hoga aur Jai ka kaam tamam kar diya jayega. Usko jo karna tha, jaldi karna tha.

Yahi sochte hue usne drawer se ek pen aur notepad nikala aur bed par ek cup chaai lekar beth gaya.

Case ke baare mein jo baaten vo janta tha usne notepad mein likhni shuru kar di.

1. Qatl ki raat Thakur ne apne kamre mein hi dinner kiya tha. Unko apne kamre ke bahar aakhri baar 8 baje dekha gaya tha, drawing hall mein TV dekhte hue.

2. 8:15 ke kareeb vo apne kamre mein chale gaye the aur uske baad unki naukrani Payal khana dene kamre mein gayi.

3. 8:30 ke aas paas naukrani thakur ke bulane par vaapis unke kamre mein pahunchi. Thakur ne zyada kuchh nahi khaya tha aur usko plates le jaane ke liye kaha.

4. Iske baad 9:15 ke aas paas unki bahu Rupali kapde lene ke liye Haweli ki pichhe wale hisse mein gayi jahan thakur ke kamre ki khidki khulti thi aur khidki se thakur usko apne kamre mein khade hue dikhai diye. Vo akele the.

5. Uske baad takreeban 9.30 baje Tej apne baap ke kamre mein unse baat karne pahuncha tha. Kya baat karni thi ye usne nahi bataya. Sirf kuchh baat karni thi.

6. 9:40 ke kareeb Sarita Devi apne pati ke kamre mein pahunchi. Unke aane ke baad Tej vahan se chala gaya.

7. 9:45 ke kareeb Thakur ne Bhushan ko bulakar gaadi nikalne ko kaha. Kahan jaana tha ye nahi bataya aur khud Sarita Devi bhi ye nahi jaanti thi ke unke pati kahan ja rahe hain.

8. 10:00 baje ke kareeb Bhushan vaapis Thakur ke kamre mein chaabi lene gaya. Thakur us waqt kamre mein akele the aur Sarita Devi bahar corridor mein bethi thi.

9. 10:00 ke kareeb hi jab Bhushan Thakur ke kamre se bahar nikla toh Payal kamre mein gayi ye puchhne ke liye ke Thakur ko aur kuchh toh nahi chahiye tha. Thakur ne usko mana kar diya.

10. 10:05 ke kareeb jab Bhushan car parking ki aur ja raha tha tab usne aur Thakurain ne Jai ko haweli mein daakhil hote hue dekha.

11. 10:15 par jab Payal kitchen band karke apne kamre ki aur ja rahi thi tab usne Thakur ke kamre se Jai ko bahar nikalte dekha. Vo poora khoon mein sana hua tha jiske baad usne cheek maari.

12. Uski cheekh ki aawaz sunkar Jai ko samajh nahi aaya ke kya kare. Vo Payal ko batane laga ke andar Thakur Sahab zakhmi hain aur isi waqt Purushottam aur Tej aa gaye. Jab unhone Jai ko khoon mein sana dekha aur apne baap ko andar neeche zameen par pada dekha toh vo Jai ko maarne lage.

13. Jai Bhagkar kitchen mein ghus gaya aur andar se darwaza band kar liya.

14. 10:45 ke kareeb Khan ko phone aaya tha ke Thakur ka khoon ho gaya hai jiske baad vo haweli pahuncha.

Poora likhkar Khan ne apni list ko dobara dekha. Jab Jai haweli mein aaya tha us waqt thakur zinda the is baat ki gawahi ghar ke 3 log de sakte hain. Jai ka kehna hai jab vo kamre mein daakhil hua tha tab thakur sahab mare pade the. Yaani ke jo hua, beech ke kul 10 min mein hua.

"10 min mein khoon? Wow" Khan ne socha

Jo baaten usko ab tak pata nahi thi vo ye thi ke Jai itni raat ko haweli kya karne gaya tha aur ghar ki kaun si aurat ne Khan ko phone karke khoon ke baare mein bataya tha.

Aur sabse bada sawal ye tha ke agar Jai ne thakur ko nahi mara, toh kisne maara. Aur 10 minat ke andar andar kaise mara.

Us raat ke incident ne Rupali ke dil aur dimaag ko jaise jhanjhod diya tha. Ek hi hafte mein usne 2 aadmiyon aur 2 auraton ko nanga dekha tha, aapas mein kuchh aisa karte hue jo uski samajh mein ab tak nahi aaya tha par haan itna zaroor samajh gayi thi ke vo jo bhi kar rahe the, unhen aisa karte hue bahut achha lag raha tha.

Vo jawani ki dahleez par abhi kadam rakh hi rahi thi. Bachpana abhi tak gaya nahi tha aur jawani poori tarah aayi nahi thi. Seene par ubhaar uth gaya tha aur usne kuchh din pehle hi bra pehenni shuru ki thi. Taango ke beech halke halke baal aa gaye the. Vo ek bachchi se ek jawan ladki mein tabdeel ho rahi thi par jawani ke khel se poori tarah anjaan thi. School mein uski saheliyan gini chuni hi thi aur jo thi unko kitabon se fursat nahi hoti thi. Khud Rupali bhi aadha waqt kitabon mein ghusi rehti aur baaki aadha waqt apni saheliyon se gappe ladati rehti.

Us raat ke baad apne maan baap ko nanga dekhkar vo seham si gayi thi. Uska dimag confused tha ke react kare toh kaise kare. Uske dil mein ek taraf toh ek ye dar tha ke agar kisi bhi tarah mummy papa ko pata chal gaya ke usne us raat un dono ko dekha tha toh uska kya hoga toh doosri taraf ye guilt ke usne apne mummy papa ko nanga dekgha.

Zyada guilt is baat ka tha ke use un dono ko dekhte waqt bahut achha lag raha tha.

Agle kuchh din tak vo bahut khoyi khoyi si rahi. Dil mein ek ajeeb si bechaini aur ghabrahat rehti thi. Vo na toh apne maan baap se nazre mila paati aur na hi kallo aur Shambhu se. Har pal yahi lagta ke vo sab jaante hain ke usne kya kiya tha aur kisi bhi waqt usse puchh lenge ke usne aisa kyun kiya.

Uski halat aisi ho gayi thi ke uski maan ko fikar hone lagi ke kahin vo bimaar toh nahi.

Zyada pareshaan Rupali ko ye baat kar rahi thi ke vo samajh nahi pa rahi thi ke usne kya dekha aur kahin uska dimaag uske maan baap se naraz tha ke vo akele mein aise gande kaam karte hain. Vo 2 log jinhen vo itna pyaar karti thi un dono ko aisa kaam karte dekh uska dimaag seham gaya tha. Kabhi kabhi dil karta tha ke chilla kar bol pade ke aap log gande ho, maine dekha tha aapko us raat.

Isi confusion ke chalte usne agle kuchh hafto tak dobara Kallo aur Shambu ko bhi dekhne ki koshish nahi ki jabki vo jaanti thi ke unhone phir se vahi kaam sundays ko kiya to zaroor hoga.

Aur jaise ye sab confusion ek din achanak shuru ho gaya tha, vaise hi sab kuchh ek din achanak khatam ho gaya.

kramashah........................................