माँ का प्यार

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The Romantic
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माँ का प्यार

Unread post by The Romantic » 19 Dec 2014 04:22

माँ का प्यार-1

दोस्तो छुट्टियाँ ख़तम हो गई और मैं वापस अपने घर आ गया. अरे यार मैं अपने घर के बारे मे तो बताना ही भूल गया. मेरे पिता मिल में काम करने वाले एक सीधे साधे आदमी थे उनमें बस एक खराबी थी, वे बहुत शराब पीते थे अक्सर रात को बेहोशी की हालत में उन्हें उठा कर बिस्तर पर लिटाना पड़ता था पर माँ के प्रति उनका व्यवहार बहुत अच्छा था और माँ भी उन्हें बहुत चाहती थी और उनका आदर करती थी

मैंने बहुत पहले माँ पर हमेशा छाई उदासी महसूस कर ली थी पर बचपन में इस उदासी का कारण मैं नहीं जान पाया था मैं माँ की हमेशा सहायता करता था सच बात तो यह है कि माँ मुझे बहुत अच्छी लगती थी और इसलिए मैं हमेशा उसके पास रहने की कोशिश करता था माँ को मेरा बहुत आसरा था और उसका मन बहलाने के लिए मैं उससे हमेशा तरह तरह की गप्पें लडाया करता था उसे भी यह अच्छा लगता था क्योंकि उसकी उदासी और बोरियत इससे काफ़ी कम हो जाती थी

मेरे पिता सुबह जल्दी घर से निकल जाते थे और देर रात लौटते फिर पीना शुरू करते और ढेर हो जाते उनकी शादी अब नाम मात्र को रह गई थी, ऐसा लगता था बस काम और शराब में ही उनकी जिंदगी गुजर रही थी और माँ की बाकी ज़रूरतों को वे नज़रअंदाज करने लगे थे दोनों अभी भी बातें करते, हँसते पर उनकी जिंदगी में अब प्यार के लिए जैसे कोई स्थान नहीं था

मैने पढने के साथ साथ पार्ट-टाइम काम करना शुरू कर दिया था इससे कुछ और आमदनी हो जाती थी पर यार दोस्तों में उठने बैठने का मुझे समय ही नहीं मिलता था, प्यार व्यार तो दूर रहा जब सब सो जाते थे तो मैं और माँ किचन में टेबल के पास बैठ कर गप्पें लडाते माँ को यह बहुत अच्छा लगता था उसे अब बस मेरा ही सहारा था और अक्सर वह मुझे प्यार से बाँहों में भर लेती और कहती कि मैं उसकी जिंदगी का चिराग हूँ

बचपन से मैं काफ़ी समझदार था और दूसरों से पहले ही जवान भी हो गया था सोलह साल का होने पर आपको तो मालूम ही है शन्नो मौसी ने और रवि मौसा जी , ललिता रश्मि डॉली की सारी कहानी पहले ही बता चुका हूँ . अब मैं धीरे धीरे माँ को दूसरी नज़रों से देखने लगा किशोरावस्था में प्रवेश के साथ ही मैं यह जान गया था कि माँ बहुत आकर्षक और मादक नारी थी उसके लंबे घने बाल उसकी कमर तक आते थे और तीन बच्चे होने के बावजूद उसका शरीर बड़ा कसा हुआ और जवान औरतों सा था अपनी बड़ी काली आँखों से जब वह मुझे देखती तो मेरा दिल धडकने लगता था

हम हर विषय पर बात करते यहाँ तक कि व्यक्तिगत बातें भी एक दूसरे को बताते मैं उसे अपनी प्रिय अभिनेत्रियों के बारे में बताता वह शादी के पहले के अपने जीवन के बारे में बात करती वह कभी मेरे पिता के खिलाफ नहीं बोलती क्योंकि शादी से उसे काफ़ी मधुर चीज़ें भी मिली थीं जैसे कि उसके बच्चे

माँ के प्रति बढ़ते आकर्षण के कारण मैं अब इसी प्रतीक्षा में रहता कि कैसे उसे खुश करूँ ताकि वह मुझे बाँहों में भरकर लाड दुलार करे और प्यार से चूमे जब वह ऐसा करती तो उसके उन्नत स्तनों का दबाव मेरी छाती पर महसूस करते हुए मुझे एक अजीब गुदगुदी होने लगती थी मैं उसने पहनी हुई साड़ी की और उसकी तारीफ़ करता जिससे वह कई बार शरमा कर लाल हो जाती काम से वापस आते समय मैं उसके लिए अक्सर चॉकलेट और फूलों की वेणी ले आता हर रविवार को मैं उसे सिनेमा और फिर होटल ले जाता

सिनेमा देखते हुए अक्सर मैं बड़े मासूम अंदाज में उससे सट कर बैठ जाता और उसके हाथ अपने हाथों में ले लेता जब उसने कभी इसके बारे में कुछ नहीं कहा तो हिम्मत कर के मैं अक्सर अपना हाथ उसके कंधे पर रख कर उसे पास खींच लेता और वह भी मेरे कंधे पर अपना सिर रखकर पिक्चर देखती अब वह हमेशा रविवार की राह देखती खुद ही अपनी पसंद की पिक्चर भी चुन लेती

पिक्चर के बाद अक्सर हम एक बगीचे में गप्पें मारते हुए बैठ जाते एक दूसरे से मज़ाक करते और खिलखिलाते एक दिन माँ बोली "राज अब तू बड़ा हो गया है, जल्द ही शादी के लायक हो जाएगा तेरे लिए अब एक लड़की ढूँढना शुरू करती हूँ"

मैंने उसका हाथ पकडते हुए तुरंत जवाब दिया "अम्मा, मुझे शादी वादी नहीं करनी मैं तो बस तुम्हारे साथ ही रहना चाहता हूँ" मेरी बात सुनकर वह आश्चर्य चकित हो गई और अपना हाथ खींच कर सहसा चुप हो गई "क्या हुआ अम्मा? मैंने कुछ ग़लत कहा?" मैंने घबरा कर पूछा वह चुप रही और कुछ देर बाद रूखे स्वरों में बोली "चलो, घर चलते हैं, बहुत देर हो गई है"

मैंने मन ही मन अपने आप को ऐसा कहने के लिए कोसा पर अब जब बात निकल ही चुकी थी तो साहस करके आगे की बात भी मैंने कह डाली "अम्मा, तुम्हें ग़लत लगा तो क्षमा करो पर सच तो यही है कि मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूँ तुम्हारी खुशी के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूँ" काफ़ी देर माँ चुप रही और फिर उदासी के स्वर में बोली "ग़लती मेरी है बेटे यहा सब पहले ही मुझे बंद कर देना था लगता है की अकेलेपना के अहसास से बचाने के लिए मैंने तुझे ज़्यादा छूट दे दी इसलिए तेरे मन में ऐसे विचार आते हैं"

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Re: माँ का प्यार

Unread post by The Romantic » 19 Dec 2014 04:23

मैं बोला "ग़लत हो या सही, मैं तो यही जानता हूँ कि तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो" वह थोड़ा नाराज़ हो कर बोली "पागलपन की बातें मत करो सच तो यह है कि तू मेरा बेटा है, मेरी कोख से जनमा है" मैंने अधीर होकर कहा "अम्मा, जो हुआ सो हुआ, पर मुझसे नाराज़ मत हो मैं अपना प्यार नहीं दबा सकता तुम भी ठंडे दिमाग़ से सोचो और फिर बोलो"

माँ बहुत देर चुप रही और फिर रोने लगी मेरा भी दिल भर आया और मैंने उसे सांत्वना देने को खींच कर अपनी बाँहों में भर लिया वह छूट कर बोली "चलो, रात बहुत हो गयी है, अब घर चलते हैं"

इसके बाद हमारा घूमने जाना बंद हो गया मेरे बहुत आग्रह करने पर भी वह मेरे साथ नहीं आती थी और कहती थी कि मैं किसी अपनी उम्र की लड़की के साथ पिक्चर देखने जाऊ मुझसे वह अभी भी दूर रहती थी और बोलती कम थी पर जैसे मेरे मन में हलचल थी वैसी ही उसके भी मन में होती मुझे सॉफ दिखती थी

एक दो माह ऐसे ही गुजर गये इस बीच मेरा एक छोटा बिज्निस था, वह काफ़ी सफल हुआ और मैं पैसा कमाने लगा एक कार भी खरीद ली माँ मुझ से दूर ही रहती थी मेरे पिता ने भी एक बार उससे पूछा कि अब वह क्यों मेरे साथ बाहर नहीं जाती तो वह टाल गयी एक बार उसने उनसे ही कहा कि वे क्यों नहीं उसे घुमाने ले जाते तो काम ज़्यादा होने का बहाना कर के वे मुकर गये शराब पीना उनका वैसे ही चालू था उस दिन उनमें खूब झगड़ा हुआ और आख़िर माँ रोते हुए अपने कमरे में गई और धाड से दरवाजा लगा लिया

दूसरे दिन बुधवार को जब मेरे भाई बहन बाहर गये थे, मैंने एक बार फिर साहस करके उसे रविवार को पिक्चर चलने को कहा तो वह चुपचाप मान गई मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा और मैं उससे लिपट गया उसने भी मेरे सीने पर सिर टिकाकर आँखें बंद कर लीं मैंने उसे कस कर बाँहों में भर लिया

यह बड़ा मधुर क्षण था हमारा संबंध गहरा होने का और पूरा बदल जाने का यह चिन्ह था मैंने प्यार से उसकी पीठ और कंधे पर हाथ फेरे और धीरे से उसके नितंबों को सहलाया वह कुछ ना बोली और मुझसे और कस कर लिपट गयी मैंने उसकी ठुड्डी पकड़ कर उसका सिर उठाया और उसकी आँखों में झाँकता हुआ बोला "अम्मा, मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ, जो भी हो, मैं तुझे अकेला नहीं रहने दूँगा"

फिर झुक कर मैंने उसके गाल और आँखें चूमी और साहस करके अपने होंठ उसके होंठों पर रख दिए माँ बिलकुल नहीं विचलित हुई बल्कि मेरे चुंबन का मीठा प्रतिसाद उसने मुझे दिया मेरी माँ का वह पहला चुंबन मेरे लिए अमृत से ज़्यादा मीठा था

उसके बाद तो उसमें बहुत बदलाव आ गया हमेशा वह मेरी राह देखा करती थी और लाई हुई वेणी बड़े प्यार से अपने बालों में पहन लेती थी जब भी हम अकेले होते, एक दूसरे के आलिंगन में बँध जाते और मैं उसके शरीर को सहलाकार अपनी कुछ प्यास बुझा लेता माँ का यह बदला रूप सबने देखा और खुश हुए कि माँ अब कितनी खुश दिखती है मेरी बहन ने तो मज़ाक में यह भी कहा कि इतना बड़ा और जवान होने पर भी मैं छोटे बच्चे जैसा माँ के पीछे घूमता हूँ मैंने जवाब दिया की आख़िर अम्मा का अकेलापन कुछ तो दूर करना हमारा कर्तव्य है

उस रविवार को अम्मा ने एक बहुत बारीक शिफान की साड़ी और एकदम तंग ब्लओज़ पहना उसके स्तनो का उभार और नितंबों की गोलाई उनमें निखार आया था वह बिलकुल जवान लग रही थी और सिनेमा हाल में काफ़ी लोग उसकी ओर देख रहे थे वह मुझसे बस सात आठ साल बड़ी लग रही थी इसलिए लोगों को यही लगा होगा कि हमारी जोड़ी है

पिक्चर बड़ी रोमान्टिक थी माँ ने हमेशा की तरह मेरे कंधे पर सिर रख दिया और मैंने उसके कंधों को अपनी बाँह में घेरकर उसे पास खींच लिया पिक्चर के बाद हम पार्क में गये रात काफ़ी सुहानी थी माँ ने मेरी ओर देखकर कहा "राज बेटे, तू ने मुझे बहुत सुख दिया है इतने दिन तूने धीरज रखा आज मुझे बहुत अच्छा लग रहा है"

मैंने माँ की ओर देख कर कहा "अम्मा, आज तुम बहुत हसीन लग रही हो और सिर्फ़ सुंदर ही नहीं, बल्कि बहुत सेक्सी भी" अम्मा शरमा गयी और हँस कर बोली "राज, अगर तू मेरा बेटा ना होता तो मैं यही समझती कि तू मुझ पर डोरे डाल रहा है"

मैंने उसकी आँखों में आँखें डाल कर कहा "हाँ अम्मा, मैं यही कर रहा हूँ" माँ थोड़ा पीछे हटी और काँपते स्वर में बोली "यह क्या कह रहा है बेटा, मैं तुम्हारी माँ हूँ, तू मेरी कोख से जन्मा है और फिर मेरी शादी हुई है तेरे पिता से"

मैं बोला "अम्मा, उन्होंने तुम्हें जो सुख देना चाहिए वह नहीं दिया है, मुझे आजमा कर देखो, मैं तुम्हे बहुत प्यार और सुख दूँगा" माँ काफ़ी देर चुप रही और फिर बोली "राज, घर चलना चाहिए नहीं तो हम कुछ ऐसा कर बैठेंगे जो एक माँ बेटे को नहीं करना चाहिए तो जिंदगी भर हमें पछताना पड़ेगा"

मैं तडप कर बोला "अम्मा, मैं तुम्हे दुख नहीं पहुँचाना चाहता पर तुम इतनी सुंदर हो कि कभी कभी मुझे लगता है कि काश तुम मेरी माँ ना होतीं तो मैं फिर तुम्हारे साथ चाहे जो कर सकता था" मेरे इस प्यार और चाहत भरे कथन पर माँ खिल उठी और मेरे गालों को सहलाते हुए बोली "मेरे बच्चे, तू भी मुझे बहुत प्यारा लगता है, मैं तो बहुत खुश हूँ कि तेरे जैसा बेटा मुझे मिला है क्या सच में मैं इतनी सुंदर हूँ कि मेरे जवान बेटे को मुझ पर प्रेम आ गया है?" मैंने उसे बाँहों में भरते हुए कहा "हाँ अम्मा, तुम सच में बहुत सुंदर और सेक्सी हो"

अचानक मेरे सब्र का बाँध टूट गया और मैंने झुक कर माँ का चुंबन ले लिया माँ ने प्रतिकार तो नहीं किया पर एक बुत जैसी चुपचाप मेरी बाँहों में बँधी रही अब मैं और ज़ोर से उसे चूमने लगा सहसा माँ ने भी मेरे चुंबन का जवाब देना शुरू करा दिया उसका सम्यम भी कमजोर हो गया था अब मैं उसके पूरे चेहरे को, गालों को, आँखों को और बालों को बार बार चूमने लगा अपने होंठ फिर माँ के कोमल होंठों पर रख कर जब मैंने अपनी जीभ उनपर लगाई तो उसने मुँह खोल कर अपने मुख का मीठा खजाना मेरे लिए खुला कर दिया

काफ़ी देर की चूमाचाटी के बाद माँ अलग हुई और बोली "राज, बहुत देर हो गयी बेटे, अब घर चलना चाहिए" घर जाते समय जब मैं कार चला रहा था तो माँ मुझ से सट कर मेरे कंधे पर सिर रखकर बैठी थी मैंने कनखियों से देखा कि उस के होंठों पर एक बड़ी मधुर मुस्कान थी

बीच में ही मैंने एक गली में कार रोक कर आश्चर्यचकित हुई माँ को फिर आलिंगन में भर लिया और उसे बेतहाशा चूमने लगा इस बार मैंने अपना हाथ उसके स्तनों पर रखा और उन्हें प्यार से टटोलने लगा माँ थोड़ी घबराई और अपने आप को छुड़ाने की कोशिश करने लगी "राज, हमें यह नहीं करना चाहिए बेटे"

मैंने अपने होंठों से उसका मुँहा बंद कर दिया और उसका गहरा चुंबन लेते हुए उन कोमल भरे हुए स्तनों को हाथ में लेकर हल्के हल्के दबाने लगा बड़े बड़े मांसल उन उरोजो का मेरे हाथ में स्पर्श मुझे बड़ा मादक लग रहा था इन्हीं से मैंने बचपन में दूध पिया था माँ भी अब उत्तेजित हो चली थी और सिसकारियाँ भरते हुए मुझे ज़ोर ज़ोर से चूमने लगी थी फिर किसी तरह से उसने मेरे आलिंगन को तोड़ा और बोली "अब घर चल बेटा"

क्रमशः…………………


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Re: माँ का प्यार

Unread post by The Romantic » 19 Dec 2014 04:23



माँ का प्यार-2

गतान्क से आगे ……………………

मैंने चुपचाप कार स्टार्ट की और हम घर आ गये घर में अंधेरा था और शायद सब सो गये थे मुझे मालूम था कि मेरे पिता अपने कमरे में नशे में धुत पड़े होंगे घर में अंदर आ कर वहीं ड्राइंग रूम में मैं फिर माँ को चूमने लगा

उसने इस बार विरोध किया कि कोई आ जाएगा और देख लेगा मैं धीरे से बोला "अम्मा, मैं तुम्हे बहुत प्यार करता हूँ, ऐसा मैंने किसी और औरत या लड़की को नहीं किया मुझसे नहीं रहा जाता, सारे समय तुम्हारे इन रसीले होंठों का चुंबन लेने की इच्छा होती रहती है और फिर सब सो गये हैं, कोई नहीं आएगा"

माँ बोली "मैं जानती हूम बेटे, मैं भी तुझे बहुत प्यार करती हूँ पर आख़िर मैं तुम्हारे पिता की पत्नी हूँ, उनका बाँधा मंगल सूत्र अभी भी मेरे गले में है" मैं धीरे से बोला "अम्मा, हम तो सिर्फ़ चुंबन ले रहे हैं, इसमें क्या परेशानी है?"

माँ बोली "पर राज, कोई अगर नीचे आ गया तो देख लेगा" मुझे एक तरकीब सूझी "अम्मा, मेरे कमरे में चलें? अंदर से बंद करके सिटकनी लगा लेंगे बापू तो नशे में सोए हैं, उन्हें खबर तक नहीं होगी"

माँ कुछ देर सोचती रही सॉफ दिख रहा था कि उसके मन में बड़ी हलचला मची हुई थी पर जीत आख़िर मेरे प्यार की हुई वह सिर डुला कर बोली "ठीक है बेटा, तू अपने कमरे में चल कर मेरी राह देख, मैं अभी देख कर आती हूँ कि सब सो रहे हैं या नहीं"

मेरी खुशी का अब अंत ना था अपने कमरे में जाकर मैं इधर उधर घूमता हुआ बेचैनी से माँ का इंतजार करने लगा कुछ देर में दरवाजा खुला और माँ अंदर आई उसने दरवाजा बंद किया और सिटकनी लगा ली

मेरे पास आकर वह काँपती आवाज़ में बोली "तेरे पिता हमेशा जैसे पी कर सो रहे हैं पर राज, शायद हमें यह सब नहीं करना चाहिए इसका अंत कहाँ होगा, क्या पता मुझे डर भी लग रहा है"

मैंने उसका हाथ पकडकर उसे दिलासा दिया "डर मत अम्मा, मैं जो हूँ तेरा बेटा, तुझ पर आँच ना आने दूँगा मेरा विश्वास करो किसी को पता नहीं चलेगा" माँ धीमी आवाज़ में बोली "ठीक है राज बेटे" और उसने सिर उठाकर मेरा गाल प्यार से चूम लिया

मैंने अपनी कमीज़ उतारी और अम्मा को बाँहों में भरकर बिस्तर पर बैठ गया और उसके होम्ठ चूमने लगा हमारे चुंबनो ने जल्द ही तीव्र स्वरूप ले लिया और ज़ोर से चलती साँसों से माँ की उत्तेजना भी स्पष्ट हो गई मेरे हाथ अब उसके पूरे बदन पर घूम रहे थे मैंने उसके उरोज दबाए और नितंबों को सहलाया आख़िर मुझ से और ना रहा गया और मैंने माँ के ब्लओज़ के बटन खोलने शुरू कर दिए

एक क्षण को माँ का शरीर सहसा कड़ा हो गया और फिर उसका आखरी संयम भी टूट गया अपने शरीर को ढीला छोड़कर उसने अपने आप को मेरे हवाले कर दिया इसके पहले कि वह फिर कुछ आनाकानी करे, मैंने जल्दी से बटन खोल कर उसका ब्लओज़ उतार दिया इस सारे समय मैं लगातार उसके कोमल मुख को चूम रहा था

ब्लओज़ उतरने पर माँ फिर थोड़ा हिचकिचाई और बोलने लगी "ठहर बेटे, सोच यह ठीक है या नहीं " अब पीछे हटने का सवाल ही नहीं था इसलिए मैंने उसका मुँह अपने होंठों से बंद कर दिया और उसे आलिंगन में भर लिया अब मैंने उसकी ब्रेसियार के हुक खोलकर उसे भी निकाल दिया माँ ने चुपचाप हाथ उपर करके ब्रा निकालने में मेरी सहायता की

उसके नग्न स्तन अब मेरी छाती पर सटे थे और उसके उभरे निपलो का स्पर्श मुझे मदहोश कर रहा था उरोजो को हाथ में लेकर मैं उनसे खेलने लगा बड़े मुलायम और मांसल थे वे झुक कर मैंने एक निपल मुँह में ले लिया और चूसने लगा माँ उत्तेजना से सिसक उठी उसके निपल बड़े और लंबे थे और जल्द ही मेरे चूसने से कड़े हो गये "अम्मा, मैं तुझे बहुत प्यार करता हूँ मुझे मालूम है कि अपने ही माँ के साथ रति करना ठीक नहीं है, पर मैं क्या करूँ, मैं अब नहीं रह सकता"

उसके शरीर को चूमते हुए मैं नीचे की ओर बढ़ा और अपनी जीभ से उसकी नाभि चाटने लगा वहाँ का थोड़ा खारा स्वाद मुझे बहुत मादक लग रहा था माँ भी अब मस्ती से हुंकार रही थी और मेरे सिर को अपने पेट पर दबाए हुई थी उसकी नाभि में जीभ चलाते हुए मैंने उसके पैर सहलाना शुरू कर दिए उसके पैर बड़े चिकने और भरे हुए थे अपना हाथ अब मैंने उसकी साड़ी और पेटीकोट के नीचे डाल कर उसकी मांसल मोटी जांघें रगडना शुरू कर दीं