दुक्खम्‌-सुक्खम्‌

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Jemsbond
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Re: दुक्खम्‌-सुक्खम्‌

Unread post by Jemsbond » 25 Dec 2014 09:10

मनीषा को लगता अगर बिरजो का झूठ पकड़ा गया तो क्या होगा लेकिन बिरजो पूरे धड़ल्ले से अपना काम किए जाती।

कई वर्ष पहले दादी ने बेबी-मुन्नी को गली की पीली कोठी के छज्जे पर बैठा एक आदमी दिखाकर बताया था, ‘‘यह देखो छोरियो छदम्मीमल। मंडी के बहुत बड़े ब्यौपारी हैं।

प्रतिभा ने फौरन पूछा, ‘‘दादी इनका मुँह टेढ़ा क्यों है?’’

दादी ने कहा, ‘‘जेई तो मैं बता रही हूँ। छदम्मीमल बहुत झूठ बोलते थे। बात-बात में झूठ। देखो भगवानजी ने कौन दशा कर दी इनकी। झूठ बोलने से मुँह टेढ़ा हो जावै है।’’

बेबी-मुन्नी दोनों डर गयी। उन्होंने अपने मुँह पर हाथ रखकर कहा, ‘‘बाप रे! हम तो कभी झूठ नहीं बोलेंगे, नहीं तो हमारा मुँह भी ऐसा ही हो जाएगा।’’

लाला नत्थीमल का स्वभाव पहले से नरम पड़ चुका था। अब घर में उनके क्रोध को झेलने वाले भी नहीं बचे थे। लेकिन उनकी शक़ करने की आदत वैसी की वैसी थी। वे अपना सारा रुपया घर की तिजोरी में रखते और समय-समय पर कमरे के किवाड़ लगाकर पूरी रोकड़ गिनते। घर में दो तिजोरियाँ थीं। एक दिन उन्होंने मनीषा से कई गड्डियाँ गिनवायीं। चौड़े-चौड़े सौ के नोट, मोटे डोरे से बँधे हुए थे। जब मनीषा ने बिना किसी गलती के कई गड्डियाँ एकदम ठीक गिन दीं, लालाजी प्रसन्न हो गये, ‘‘है तू पक्की लाला नत्थीमल की नतनी, मान गये उस्ताद!’’

मनीषा ने कहा, ‘‘बाबा आप ये सारे रुपये बैंक में क्यों नहीं रखते हो। घर में चोरी होने का ख़तरा है।’’

दादाजी बोले, ‘‘बैंक में तो और ज्यांदा ख़तरा जानो। कभी बैंक का दिवाला पिट जाय तो समझो सारी रकम डूब जाय।’’

कुछ साल पहले मथुरा में लक्ष्मी कमर्शियल बैंक का दिवाला पिट गया था और बहुत-से उसके खाताधारी कंगाल होकर सडक़ पर आ गये थे।

‘‘सरकारी बैंक में रखें तो फेल नहीं होता वह।’’

‘‘तू बावली है, देख तुझे रुपये का कायदा समझाऊँ। यह देख यह दस का नोट है। इसे मैं नेक देर बाहर की हवा लगाऊँ तो यह भुस्स हो जायगौ।’’

मनीषा हँसने लगी, ‘‘बाबा जब तक इसे बाज़ार की हवा नहीं लगाओगे यह कैसे भुस्स होगा।’’

‘‘वो ही तू नहीं जानै। रुपये का स्वभाव चलायमान होवे। बाज़ार न भी जाओ, कोई तुम्हारे हाथ में देख ले तो उधार माँग लेगा, और कुछ नहीं तो घरवाली को कोई चीज़-बस्त लेनी याद आ जायगी या कहीं रख के भूल जाओगे।’’

मनीषा कौतुक से अपने बाबा को देख रही थी जो जितनी बार ‘रुपया’ शब्द बोलते, अपना मुँह थोड़ी देर खुला रखते।

एक शाम मनीषा और ब्रजबाला आँगन में बैठकर गिट्टे खेल रही थीं कि मनीषा को बड़ी ज़ोर से पेट दर्द हुआ। ‘ओह माँ’ करती हुई वह वहीं लेट गयी। उसे लगा उसके अन्दर से कोई पिघलता हुआ लावा बाहर बहा जा रहा है।

ब्रजबाला अन्दर से दादी को बुला लायी। दादी ने फौरन ब्रजबाला से कहा, ‘‘इसे बाथरूम लेकर चल।’’

दादी के निर्देशन में बिरजो ने मनीषा को साफ़-सुथरा कर दिया।

दादी बोलीं, ‘‘मुन्नी अब तेरे दूध के दाँत टूट गये, आगे से लड़कियों की तरह चलना सीख, पहरना सीख। अब तू बड़ी हो रही है।’’

बिरजो ने कहा, ‘‘अम्मा ने तो मोसे कहा था अब तू लुगाई बन गयी छोरी।’’

मनीषा बहुत डर गयी। यह क्या मुसीबत लग गयी उसके पीछे कि न अब दौडऩा, न उछलना, न कूद-कूदकर चलना। उसने कहा, ‘‘दादी चलकर डॉक्टर से हमारी मलहम-पट्टी करवा दो, हम ऐसे नहीं रहेंगे।’’

दादी ने कहा, ‘‘पगली इसकी मलहम-पट्टी घर में ही होती है। और अब चौके में मत जाना।’’

लो बोलो। बन्दिश तो मनीषा को तनिक बरदाश्त नहीं। उसे बड़ी ज़ोर से अपना घर याद आया।

‘‘तू तो सुच्ची है न बिरजो!’’ दादी ने पूछा।

बिरजो ने गर्दन हिलाकर हामी भरी।

दादी ने मनीषा को पुचकारा, ‘‘चल तू मेरे कमरे में बैठकर मोय गाँधीजी की किताब सुनाया कर।’’

मनीषा ने एक रात किताबों का अनुसन्धान करते हुए उन्नाबी किरमिच में बँधी महात्मा गाँधी की ‘सत्य के प्रयोग’ पुस्तक ढूँढ़ निकाली थी जिसके पहले पृष्ठ पर पापा की लेखनी में लिखा हुआ था—‘जीवनसंगिनी प्रिया इन्दुमती को उपहारस्वरूप भेंट।’ वह उसके कई अध्याय पढ़ गयी। उसे ताज्जुब यह हुआ कि जहाँ कई अन्य महापुरुषों की आत्मकथाएँ एकदम नीरस और निगूढ़ थीं, महात्मा गाँधी की आत्मकथा सरल और सुबोध थी। छोटे-छोटे अध्याय थे जो हर बार नयी कहानी का आनन्द देते।

मनीषा बोली, ‘‘दादी आधी किताब तो मुझे याद हो गयी, तुम मुँहज़ुबानी सुन लो।’’

महात्मा गाँधी के लडक़पन के प्रसंग सुन दादी विभोर हो गयीं। बोलीं, ‘‘हे भगवान कित्ते सच्चे थे गाँधी बाबा! अरे अपनी गलतियाँ भी लिखकर चले गये। बताओ वे चाहते तो का झूठ नहीं लिख सकते थे?’’

मनीषा ने कहा, ‘‘दादी, पापा कहते हैं झूठ लिखा तो कहानी होती है, सच लिखो तो आत्मकथा।’’

बाबा की आदत थी वे अपने तख्त पर बैठकर कामकाज में लगे रहते मगर एक कान से हर बात सुनते रहते। वे फ़ौरन बोले, ‘‘तभी तेरा बाप झूठी कहानी बना-बनाकर रेडियो पर सुनावै है।’’

‘‘पापा तो कभी झूठ नहीं बोलते।’’ मनीषा ने तुरन्त प्रतिवाद किया।

‘‘बोलने की नहीं, मैं लिखने की कह रहा हूँ। शरमनलाल बता रहे थे, जेई घर के बारे में जाने कौन-कौन-सी बातों के जोड़-मेल से ड्रामा बनाया वा ने। उसका नाम भी बताया गया रेडियो में, कविमोहन अग्रवाल।’’

‘‘कौन-सी तुमने अपने कानों से सुनी जो पूछ रहे हो?’’ दादी ने बेटे का बचाव किया।

‘‘असल बात यह नहीं है। सच्ची बात यह है कि छोरे को अपने घर से, अपने माँ-बाप से राई-रत्ती भी मोह नायँ। उसने कभी सोची बहनों के ब्याह हो गये, मेरे माँ-बाप कैसे रहेंगे अकेले। नहीं वह तो सरकारी अफ़सर बनेगा, कुर्सी तोड़ेगा।’’

दादी को गुस्सा आने लगा, ‘‘तुमने कभी छोरे से मोह दिखाया। हमेशा दुर-दुर करते रहे। प्यार वह चीज़ है जो बाँट-तराजू से नहीं तोली जावै। तुमने बाँट-तराजू के सिवा कुछ जाना ही नायँ।’’

लाला नत्थीमल की आँखें लाल होने लगीं, ‘‘जे लड़कियाँ घर से जायँ तो तुझे मैं ठीक करूँ, बक-बक करना बहुत आ गया है तुझे!’’

मनीषा को बाबा के गुस्से से डर लगता था। उनका चेहरा खिंच जाता, माथे की एक नस उभरकर फडक़ने लगती और उनके हाथ-पैर काँपते। ऐसा लगता जैसे वे अभी किसी को मार देंगे या शाप दे देंगे। बिल्कुल इसी तरह की मुद्रा उसने पापा की भी देखी थी। पापा कभी-कभी गुस्सा करते लेकिन जब करते तब पूरा घर थर्रा जाता।

मनीषा कमरे से बाहर आ गयी। बिरजो चौके में खटर-पटर कर रही थी। मनीषा ने उसकी तरफ़ क़दम बढ़ाये तभी उसे दादी की वर्जना याद आयी। बिरजो ने उसे रसोई में आने का इशारा किया, साथ ही मुँह पर उँगली रखकर चुप रहने का। मनीषा को यह छल क़बूल नहीं था। वह छत पर चली गयी।

उसका मन उचाट हो रहा था। पापा पर गुस्सा आया, हमें यहाँ फँसाकर चले गये और वहाँ से चिट्ठी तक नहीं लिखी। लिखना तो माँ को भी आता है पर किसी को मुन्नी की याद आये तब न। फाइनल यर की पढ़ाई सिर पर है और वह यहाँ टाइम ख़राब कर रही है।

जैसे आकाश के तारों और नीम की पत्तियों ने उसकी पुकार पापा तक पहुँचा दी, सोमवार को ही पूना से पापा की लम्बी-सी चिट्ठी आयी जिसके अन्त में मम्मी ने भी चार लाइनें लिखी थीं ‘री मुन्नी तू वहाँ जाकर बैठ गयी। तुझे पता है तेरे बिना मेरा एक भी दिन नहीं कटता। बेबी चार रोज़ से दिल्ली गयी हुई है। जीजी की तबीयत सँभल गयी होगी। तू जल्दी से आ जा। एक दिन कान्ता भी घर आयी थी, तुझे न देखकर बड़ी झींकी।’’

मनीषा का मन मम्मी-पापा के प्यार में सराबोर हो गया। मेरे मम्मी-पापा। देखा मुझे कित्ता चाहते हैं। कवि शैले की तरह उसका मन हुआ कोई उसे पेड़ का पत्ता बना दे, चिडिय़ा बना दे, कागज़ का टुकड़ा बना दे और वह उड़ती-उड़ती अभी पहुँच जाय पूना। वह स्टेशन रोड पर कान्ता के घर जाकर उसे चौंका दे। वह मम्मी को बन्द गार्डन पर भेलपुरी खिला लाये। रात को पापा के पैरों में दर्द होता है। मनीषा नहीं है तो कौन उनके पैरों पर खड़ा होता होगा। यकायक मनीषा वर्तमान में लौटी। उडऩा तो दूर इस वक्त तो वह ठीक से चल भी नहीं पा रही। ऐसा लग रहा है जैसे टाँगों के बीच में बिस्तरबन्द बँधा है।

विद्यावती ने कहा, ‘‘इत्ती दूर छोरी अकेली कैसे जायगी?’’

लालाजी ने कहा, ‘‘दो एक जने से बात कर के देखूँ, ऐसे परदेस में बैठा है छोरा कि जल्दी कोई वहाँ जाने को तैयार भी नहीं होगा।’’

‘‘बलराम से पूछो, उसे घूमबे-फिरबे का शौक है।’’ विद्यावती ने सुझाव दिया।

लीला बुआ का बड़ा लडक़ा बिल्लू ही अब अपने पूरे नाम बलराम से पुकारा जाता था। उसने चक्की का काम छोटे भाई गिल्लू उर्फ गिरीश को थमा दिया था और खुद खादी भंडार में सेल्समैन हो गया था। उसकी शादी इटावा के एक व्यापारी परिवार की लडक़ी कालिन्दी से हो गयी थी। कभी-कभी वह आकर नाना-नानी का हाल देख जाता।

बलराम के हामी भरने पर बाबा ने पूना के दो टिकट कटाये। बिरजो मचलने लगी, ‘‘हम भी जाएँगे मुन्नी के संग। हमने तो हिंडौन और मथुरा छोड़ और कुछ देखा ही नायँ।’’

लालाजी ने डाँट लगायी, ‘‘ चुप्पे से यहाँ बैठकर पढ़ाई कर। फेल हो गयी तो हमारी नाक कटाएगी।’’

मनीषा का थोड़ा-सा सामान था, एक थैले में समा गया। लेकिन दादी को चैन कहाँ। उन्होंने कहा, ‘‘मथुरा से कोई पेड़े लिये बिना भी जाता है। और मुन्नी चूसमा आम कवि को बड़े भायें, एक डोली ले जा।’’ लीला बुआ ने घीया के लच्छे और खुरचन भिजवा दी। बाबा ने बड़े सुन्दर कपड़े का एक थान बाज़ार से ला दिया, ‘‘दोनों बहनें अपने सलवार-कमीज़ बनवा लेना, बड़ी हो गयी हो, फ्रॉक मत पहरा करो।’’

मनीषा को थोड़ी झेंप लगी। कहीं बाबा को उसके पेट दर्द का पता तो नहीं चल गया। उसका बस चलता तो अपने दादी-बाबा के आगे अनन्त काल तक बच्ची ही बनी रही आती। चलते वक्त दादी ने मनीषा को घपची में भरकर ख़ूब दुलार किया, ‘‘अब तू हर छुट्टी में अइयो अच्छा।’’ बाबा ने उसे दस रुपये का नोट देकर आशीर्वाद दिया।

वापसी का सफ़र आगमन के सफ़र जैसा नहीं था। इस बार आरक्षण तो करवाया नहीं गया था। सामान्य डिब्बे में ठूँसमठूँस मुसाफिर भरे हुए थे। जिस भी डिब्बे के दरवाज़े पर वे जाते लोग कहते, आगे जाओ यहाँ जगह नहीं है।

बलराम ने एक डिब्बे में लोगों को धक्का-मुक्का देकर किसी तरह चढऩे लायक गुंजाइश निकाली। गरमी से सबका बुरा हाल था। कानपुर पहुँचने पर उन्हें बैठने की जगह मिली। खिडक़ी वाली सीट बलराम ने ले ली, ‘‘यहाँ कोयला उड़ेगा, तू सामने वाली सीट पर बैठ।’’

रात सोने से पहले मनीषा को टॉयलेट जाने की ज़रूरत पड़ी। वह यात्रियों के बीच जगह बनाती किसी तरह गयी लेकिन वहाँ का दृश्य देखकर उलटे पैरों लौट आयी। टॉयलेट के दरवाज़े तक लोग अपने असबाब समेत ज़मीन पर बैठे हुए थे। कई मुसाफिर तो बैठे-बैठे सो रहे थे।

बलराम ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, मुँह क्यों बना लिया?’’

‘‘कुछ नहीं।’’ मनीषा बोली।

‘‘बाथरूम जाना है तुझे, चल मैं रास्ता बनाऊँ।’’ बलराम आगे-आगे चला।

बलराम पहलवान की तरह लम्बा और बलिष्ठ था। सिर पर चोटी, बदन पर खादी का कुर्ता-पाजामा, लोग दूर से उसे नेता या लठैत समझते। उसके जाते ही ज़मीन पर बैठे लोगों ने सिकुडक़र इतनी जगह निकाल दी कि मनीषा एक पाँव टिकाती टॉयलेट में घुस पायी।

टॉयलेट का अन्दर का नज़ारा और भी भयानक था। नल में से टोंटी ग़ायब थी और ज़ंजीर से मग। इससे पहले मनीषा ने हमेशा आरक्षित डब्बों में सफ़र किया था। सरकारी तबादलों में वे सब प्रथम श्रेणी में यात्रा किया करते थे। वहाँ टायलेट साफ़ हुआ करते। एक ही राहत थी। मनीषा का रक्तस्राव रुक गया था। उसने अपने को बन्धनमुक्त किया, बहते नल से हाथ स्वच्छ किये और मन-ही-मन भगवान को याद किया, हे भगवान यह तबालत अब फिर कभी न हो।’

बिरजो ने रास्ते के लिए पूरियाँ, आलू की सूखी सब्ज़ी और भरवाँ करेले रख दिये थे। ठीक यही खाना बुआ ने बलराम के साथ रखा। देखकर मनीषा को हँसी आ गयी। उसे लगा इस डिब्बे में हर मुसाफिर के पास यही खाना निकलेगा। जब चखकर देखा तो अन्तर समझ में आ गया। दोनों खानों के स्वाद में फ़र्क था, मिर्च-मसाले में, यहाँ तक कि शक्ल-सूरत में भी। मम्मी की बात याद आयी कि चीज़ वही होती है पर हर हाथ के साथ खाने का स्वाद बदलता है।

तीस घंटे के लम्बे सफ़र में न नींद मिली न आराम, केवल घर पहुँचने की ललक ने मनीषा को सजग रखा। पूना स्टेशन पर उतरकर उसे लगा जैसे वह बरसों बाद अपने शहर लौटी है। उसकी फ्रॉक काफ़ी मैली हो गयी थी और बाल बिखर गये थे। बलराम का भी हुलिया ख़राब था। सफेद कुर्ता-पाजामा इस वक्त तक चितकबरा लग रहा था, उसमें रास्ते की इतनी धूल और इंजन की कालिख समा गयी थी।

जब वे घर पहुँचे माँ उन्हें देखकर खुश बाद में हुई, हक्की-बक्की पहले। पापा ऑफिस जा चुके थे। बलराम ने रिक्शे से उतारकर सामान अन्दर रखा।

‘‘यह क्या धजा बना रखी है अपनी?’’

‘‘जनरल डब्बे में आये हैं, बैठे-बैठे।’’ मनीषा ने बताया।

‘‘मामीजी प्रणाम!’’ बलराम ने इन्दु के पैर छुए।

‘‘मैं तो पहचानी ही नहीं बिल्लू तू इतना बड़ा हो गया।’’ इन्दु ने जल्दी-जल्दी लीला बीबीजी का समाचार लिया और कहा, ‘‘तुम लोग एक-एक कर नहाते जाओ।’’

खाने के बाद मनीषा अपने बिस्तर पर ऐसी सोयी कि शाम सात बजे उसकी नींद खुली।

कविमोहन दफ्तर से आकर चाय पी चुका था और अब बलराम के साथ मथुरा की बातें कर रहा था।

मनीषा रसोई में जाकर माँ के गले से झूल गयी, ‘‘मम्मी दीदी कब आएगी?’’

‘‘अभी छह दिन और लगेंगे। यूथ फेस्टिवल दस दिन का होता है, बाकी आने-जाने के तीन दिन और जोड़ लो।’’

‘‘किस आइटम में गयी है।’’

‘‘उसके कॉलेज से ग्रुप डांस का ट्रुप गया है। बैजू, सुनयना, द्राक्षा सब गयी हैं।’’ माँ ने आवाज़ थोड़ी दबाकर कहा, ‘‘ये कित्ते दिन रहेगा?’’

‘‘कौन?’’ मनीषा नहीं समझी।

‘‘बिल्लू और कौन। इत्ती भारी ख़ुराक है इसकी बाप रे! कौन इसकी रोटियाँ बनाएगा!’’

कवि को सबसे सुखद ख़बर यह लगी कि मन्नालाल आठ साल बाद घर वापस आ गये हैं। कहाँ रहे, कैसे रहे, कुछ नहीं बताते पर अब साधु-सन्तों का साथ एकदम छोड़ दिया है। चक्की पर भी नहीं जाते। बरामदे में बैठकर अख़बार पढ़ते रहते हैं। घर की अच्छी चौकीदारी हो गयी है। कोई धनिया-पुदीना भी लेने निकले तो उनसे पूछकर जाय।

‘‘अब तो लीली दीदी खुश होंगी।’’ कवि ने कहा।

‘‘अम्मा को दूसरे दुख हो गये हैं। अब वे बहुओं से परेशान रहती हैं और बहुएँ उनसे।’’

‘‘अब जीजाजी से लड़ती तो नहीं?’’ कवि ने शरारत से पूछा।

‘‘अम्मा ज़रा नहीं बदलीं। बाबूजी से कहती हैं सुखवास की उमर में बनवास दे दिया, बनवास की उमर में कौन सुख देने आये हो?’’

‘‘पगली है, जीजाजी को गुस्सा आ गया तो फिर भाग खड़े होंगे।’’

‘‘पहले से काफ़ी झम गये हैं बाबूजी। कहते हैं मैं सगुन-निरगुन सब देख आया।’’

‘‘चलो बीबीजी के माथे से कलंक उतरा।’’ इन्दु ने कहा।

‘‘ऐसा नहीं है। जैसी अकडफ़ूँ वे पहले थीं वैसी ही अब हैं। मजाल है पड़ोस में उनके गये बिना कोई करवाचौथ या सकट मना ले। अभी भी अपने को अमर सुहागिनों में गिनती हैं। उनका कहना है सुहागिनों में सबसे ऊँचा दर्जा उनका है।’’

‘‘पर अब तो ननदोईजी लौट आये।’’

‘‘इससे क्या। अम्मा अपने ऊपर तो मक्खी भी नहीं बैठने देतीं। कहती हैं, मोय का मिलौ। पहले इनके गये की बेडिय़ाँ पाँव में पड़ी रहीं, अब इनके आये की पड़ी हैं।’’

इन्दु की मुख-मुद्रा भी सोचग्रस्त हो गयी। उसने कहा, ‘‘कहती तो जीजी सही हैं। पति घर में न हो तो लाख तोहमतें ऐसे ही लग जाती हैं। औरत का तो वह हाल है न मायके सुख न ससुराल सुख।’’

‘‘अम्मा की तो कोई ससुराल भी नहीं है। फिर भी वे दुखी दिखाई देती हैं।’’

इन्दु बलराम से बात तो अच्छे से करती रहीं। उसे अपनी क्यारियाँ भी दिखलायीं। बस खाना खिलाते समय वह विचित्र व्यवहार करती। रात में ढेर से चावल बना दिये। बलराम ने धीमी आवाज़ में कहा, ‘‘मुझे बादी की शिक़ायत है, चावल तो मैं दिन में भी नहीं खाता।’’

इन्दु ने भवें सिकोडक़र कहा, ‘‘इत्ती गरमी में मेरे से रोटी नहीं सेकी जाती, ब्रेड खा लो।’’

कवि ने बात सँभालने की कोशिश की, ‘‘चलो आज हम सब बाहर चलकर खायँ, घूमना भी हो जाएगा।’’

बलराम बोला, ‘‘मेरे लिए परेशान मत हो मामाजी, मुझे भूख ही नायँ।’’

‘‘हमें तो लगी है भूख।’’ कहकर कवि ने उसे मनाया।

इन्दु जल्दी से बन-ठनकर तैयार हो गयी।

मनीषा ने भी फ्रॉक बदली और बालों में नये रिबन लगाये।

बलराम ने मामी की तरफ सराहना से देखकर कवि से कहा, ‘‘हमारी मामीजी तो फिल्मस्टार लग रही हैं, एकदम नूतन जैसी।’’

इन्दु ने अकड़ से कहा, ‘‘नूतन तो, लोग कहते हैं, काली है।’’

पग-पग पर इन्दु का फूहड़पन झेलना कवि के लिए आसान न था, वह बलराम के सामने बहस कर तमाशा नहीं खड़ा करना चाहता था। उसने बरामदे में निकलकर सिगरेट सुलगा ली।

वे सब कैम्प स्ट्रीट में ‘इंडस’ में जाकर बैठे। यहाँ का टोमाटो सूप और तन्दूरी पराँठा मनीषा को बहुत पसन्द था। उसने पापा को बता दिया।

कवि हँसने लगा, ‘‘दोनो का क्या मेल है। पराँठे के लिए सब्ज़ी नहीं लेगी।’’

इन्दु ने अपना पुराना सिक्का चलाया, ‘‘यह मेरे में से खा लेगी।’’

कवि ने बिना उसकी तरफ़ देखे अपना ध्यान बच्चों पर फोकस रखा, ‘‘यहाँ थाली सिस्टम नहीं है। अपनी मर्जी का खाना मँगाने को इंग्लिश में a la carte कहते हैं।’’

‘‘पापा गलत! इंग्लिश में नहीं फ्रेंच में।’’ मनीषा चहकी।

पापा की गलती निकालने का मौक़ा भी कब-कब मिलता है उसे!

‘‘इंग्लिश ने यह शब्द अपना लिया है तो इंग्लिश का ही माना जाएगा न। अच्छा इसका मतलब समझा दे। तू तो फ्रेंच पढ़ती है।’’

दस्तूर स्कूल में मनीषा द्वितीय भाषा के रूप में फ्रेंच पढ़ रही थी। उच्चारण के सिवा उसे फ्रेंच भाषा की हर अदा पसन्द थी। उसने कहा, ‘‘इसका मतलब है, सूची में दिये गये हर व्यंजन की कीमत अलग-अलग है।’’ बलराम को हैरानी हुई, ‘‘इत्ती लम्बी बात के लिए बस दो-ढाई शब्द।’’

‘‘और क्या। फ्रेंच तो इंग्लिश से भी ज्यासदा समृद्ध है। आपने शादी के कार्डों के नीचे लिखा देखा होगा RSVP। यह भी फ्रेंच शब्द है respondez si'l vous plait मतलब ‘कृपया उत्तर दें’।’’

‘‘अच्छा अब तू अपना ज्ञान मत बघार।’’ इन्दु ने कहा।

खाने के बाद जब वे बाहर निकले, बाज़ार अभी खुला हुआ था। ‘दोराबजी’ और ‘स्पेन्सर्स’ के बड़े स्टोर देखकर बलराम को बड़ा अचम्भा हुआ, हाँ खादी भवन यहाँ भी वैसा ही था जैसा मथुरा में। बलराम ने पूछा, ‘‘मामाजी क्या वजह है कि कुछ चीज़ें तो बहुत बदल जाती हैं पर कुछ वैसी ही पुरानी रही आती हैं।’’

‘‘बहुत अच्छा सवाल पूछा है तुमने बिल्लू। देखो समाज दो तरह से बदलता है, एक प्रकृति के नियम से, दूसरा सभ्यता के दबाव से। खान-पान, पहनावा और निवास पर प्रकृति का नियम लागू होता है। बाकी सब चीज़ों पर समय और सभ्यता का असर पड़ता है।’’

‘‘इतनी दुकानें बदलीं, इतना बाज़ार बदला पर खादी भंडार क्यों नहीं बदला?’’

‘‘तुम्हें पता है खादी भंडार गाँधीजी के सिद्धान्तों पर चलाए जाते हैं—सादा जीवन, उच्च विचार। बाकी दुकानों में जो भी तडक़-भडक़ डाली जाती है उसका ख़र्च तो ग्राहक की जेब से ही जाता है न।’’

‘‘मामाजी अगर आपको अबेर न हो तो मैं नैक यहाँ का खादी भंडार देख आऊँ।’’ बलराम कहने के साथ ही अन्दर चला गया।

वे तीनों बाहर शो विंडो के पास खड़े थे। कवि ने कहा, ‘‘मेरा मन है लीली दीदी को खादी सिल्क की एक बढिय़ा साड़ी भेजूँ। बलराम ले जाएगा।’’

‘‘बीबीजी ने तुम्हारे लिए कछु भेजा जो तुम भेजने की सोच रहे हो।’’

‘‘लीली दीदी हमेशा मुझे देती रही हैं। तुम हर चीज़ में अड़ैंच क्यों डालती हो।’’

‘‘अड़ैंच कहाँ, मैं तो कह रही थी बलराम खादी भंडार में काम करता है, जितनी मर्जी साड़ी खरीदे और माँ को पहराये।’’

बात आयी-गयी हो गयी। लेकिन कवि के कलेजे में उसकी फाँस चुभी रह गयी। ऐसे ही लमहों में उसका मन अपने घर से उचाट हो जाता। उसे लगता जैसे वह अपने नहीं किसी और के घर में रह रहा है। सबके निमित्त वह कमाता रहे, अपने निमित्त कुछ भी करने की आज़ादी उसे नहीं है। उसे यह भी लगता कि घर-परिवार में अगर इतनी जकड़बन्दी रही तो वह दिन दूर नहीं जब घर-परिवार समाप्त हो जाएँगे। अपने प्रिय कवि की पंक्तियाँ उसे कई बार याद आतीं—‘घर रहेंगे हमीं उनमें रह न पाएँगे’ या ‘जब-जब सिर उठाया, अपनी चौखट से टकराया’।

अगले दिन बलराम की वापसी थी। वह बड़े सवेरे उठकर नहाकर तैयार हो गया। इन्दु ने कहा, ‘‘तुम्हारी गाड़ी तो ग्यारह बजे है, तुमने अभी से सामान बाँध लिया।’’

‘‘बस मामीजी, घर में सब रास्ता देख रहे होंगे। और खादी भंडार पर तो उससे भी ज्या़दा। सबसे पुराना वर्कर तो मैं हूँ, बाकी तो आते-जाते रहते हैं।’’

‘‘यहाँ मन नहीं लगा तुम्हारा?’’ इन्दु ने पूछा।

‘‘ऐसी बात नहीं है मामीजी। आपने वह मिसल सुनी होगी न,

मथुरा की छोरी और बिन्दावन की गाय

जो और कहीं ब्याहो, तो भूखी रह जाय।’’

इन्दु कुछ शर्मिन्दा-सी वहाँ से हट गयी। उसे लगा वह बलराम के साथ कुछ ज्याोदा बेदिली दिखा गयी। पर अब क्या हो सकता था।

वह कवि के पास गयी और दबे स्वर में बोली, ‘‘क्यों जी तुम्हारे कुरते-पाजामे का कोरा कपड़ा जो रखा है, बलराम को दे दें।’’

कवि बोला, ‘‘रहने दो, वह तो कपड़ों के बीचोंबीच बैठा है, जो मर्जी बनवा ले।’’

इन्दु भुनभुनाती वहाँसे चली गयी, ‘‘मेरी तो कोई बात इन्हें अच्छी ही नायं लगे।’’

Jemsbond
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Re: दुक्खम्‌-सुक्खम्‌

Unread post by Jemsbond » 25 Dec 2014 09:11

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तालकटोरा बाग में हुए दस दिवसीय यूथ फेस्टिवल में समूह नृत्य प्रतियोगिता में पूना विश्वविद्यालय ने प्रथम स्थान पाया। सभी अख़बारों में इस आइटम की तस्वीर छपी। कवि-परिवार ने आँखें गड़ाकर प्रतिभा को पहचानने की कोशिश की। समूह नृत्य में कुल छह लड़कियों का झुंड था। सज-धजकर सब एक समान सुन्दर लग रही थीं। बड़ी मुश्किल से प्रतिभा की पहचान हो पायी। अख़बारों की प्रतियाँ सँभालकर रख ली गयीं।

वाडिया कॉलेज का नाम सुर्खियों में आ गया। फर्गुसन कॉलेज से परिचर्चा और वाद-विवाद प्रतियोगिता के लिए विद्यार्थी गये थे। डेक्कन कॉलेज की संगीता कुलकर्णी शास्त्रीय गायन में प्रतियोगी थी। केवल समूह-नृत्य में पूना विश्वविद्यालय विजयी हुआ था। बड़ी-सी शील्ड मिली थी जो कॉलेज में प्रिंसिपल के कार्यालय में सजा दी गयी। प्रतिमा को प्रमाण-पत्र और चाँदी का एक कप मिला।

प्रतिभा के लौटते ही घर में रौनक आ गयी।

इन्दु ने अलमारी से किताबें खिसकाकर उसके प्रमाण-पत्र और इनाम के लिए जगह बनायी।

‘‘अरे अरे, किताबें क्यों हटा रही हो?’’ कवि ने टोका।

‘‘और कहाँ रखूँ। रेडियो और ताक, दोनों जगह तो इनामों से ठसाठस भरी हुई हैं।’’

‘‘पुराने वाले इनाम एक पेटी में रख दो, जब बेबी का ब्याह होगा, अपने साथ ले जाएगी।’’ कवि ने कहा।

प्रतिभा बीच में बोली, ‘‘नो चांस। फिर तो पेटी पड़ी रहेगी सारी उम्र। मुझे शादी करनी ही नहीं।’’

‘‘हर लडक़ी यही कहती है, फिर भी हर लडक़ी की शादी होती है। जैसे ही मिस्टर राइट मिला, लड़कियों का इरादा बदल जाता है।’’

‘‘पापा, मुझे चिढ़ाओ मत नहीं तो मैं सच में चिढ़ जाऊँगी।’’

‘‘अब तो तेरा बी.ए. हो गया, आई,ए.एस. की तैयारी शुरू कर दे।’’

प्रतिभा उलझी हुई सी पापा को देखने लगी। उसे लगा यही मौक़ा है अपनी बात बोलने का।

‘‘पापा, हमें आई.ए.एस. नहीं देना।’’

‘‘फिर क्या करेगी। एम.ए. करके लेक्चरर बनेगी?’’

‘‘नहीं पापा, मैं बम्बई जाऊँगी। वहाँ बड़ा स्कोप है। फेस्टिवल में हमें कई ऑफ़र मिले।’’

‘‘यही कसर बची थी। अब फिल्मों में नाच दिखाएगी।’’ इन्दु बिगडऩे लगी।

‘‘नहीं माँ, फिल्मों में नहीं, हमें मॉडलिंग के लिए एक बड़ी एजेंसी ने कहा है। तुम मैगज़ीन पढ़ती हो, उसमें आधे से ज्यािदा पन्नों पर विज्ञापन छपते हैं। बस यही करना होता है। कोई साबुन या टूथपेस्ट हाथ में लेकर फोटो खिंचाओ, और लखपति हो जाओ।’’ प्रतिभा ने समझाया।

‘‘कितनी घटिया ऐम्बिशन लेकर आयी हो तुम दिल्ली से। क्या इसी के लिए तुम्हें इतना पढ़ाया-लिखाया और कलाएँ सिखायीं?’’ कवि को गुस्सा आ गया।

‘‘पापा अगर नाटक में काम करना, नृत्य करना ठीक है तो मॉडलिंग में क्या बुराई है यह बताइए। इस शहर में कितने ही शो कर चुकी हूँ मैं, नाम के सिवाय कुछ नहीं कमाया मैंने।’’

‘‘और क्या कमाना है तुझे बोल। क्या शकल दिखाकर पैसे कमाएगी। हमारे मुल्क में मॉडल को किस नज़र से देखा जाता है, तू नहीं जानती। कान खोलकर सुन ले। कोई मॉडलिंग-वॉडलिंग नहीं करनी है। चुपचाप आगे पढ़ो, पढ़ाई में नाम कमा, कला में नाम कमा। पैसा कमाने को मैं बैठा हूँ।’’

‘‘पापा मेरे साथ की वैजू, सुनयना सब बम्बई जाने वाली हैं, बस एक बार मैं उनके साथ हो आऊँ, प्लीज़।’’

‘‘तेरी यही बात हमें बुरी लगे। पूना में तुझे डांस, म्यूजिक और स्टेज़ के मौक़े मिल तो रहे हैं।’’

‘‘पर पापा यहाँ मुख्य रूप से मराठी रंगमंच का बोलबाला है, हिन्दी रंगमंच की कोई पहचान नहीं है।’’

‘‘अभी तू छोटी है। जब मेरा तबादला बम्बई होगा तब देखी जायगी।’’

‘‘आपकी भारत सरकार को सपने नहीं आ रहे हैं। पूना के बाद वह आपको विजयवाड़ा भी भेज सकती है। हो सकता है बम्बई पहुँचने में आपको दस साल लग जायँ। मैं तो तब तक बुड्ढी हो जाऊँगी।’’

‘‘तुझे क्या जल्दी है। पढ़-लिखकर नाम कमा। क्या-क्या मैंने सपने देख रखे हैं तेरे लिए। तुझे तो मैं विजयलक्ष्मी पंडित बनाऊँगा।’’

‘‘पापा वह मैं कभी नहीं बन सकती क्योंकि उसके लिए पहले आपको मोतीलाल नेहरू बनना होगा।’’ प्रतिभा ने कहा।

जैसे कमरे में सनाका खिंच गया। पिता के रूप में कवि की समस्त उपलब्धियों को ध्वस्त करता, प्रतिभा का आक्षेप उसकी असहमति, असन्तोष और अस्वीकार का घोषणा-पत्र बन गया। कवि अब तक यही सोचता रहा कि बेटी का विकास वहीं तक है जहाँ तक वह उसके जीवन में रोशनी डालता चलता है। उसे नहीं पता चला कि अपने समवयस्क साथियों, पुस्तकों, अख़बारों और पत्र-पत्रिकाओं के जरिये बेटी ने अपने सपनों की नयी दुनिया देख ली है। दुख यही था कि इतनी आज़ादी और अग्रगामिता के बावजूद वह न लेखक बनना चाहती थी न कलाकार, न वह अफ़सर बनना चाहती थी न लेक्चरर, वह मॉडल बनना चाहती थी। उसे बाहरी तडक़-भडक़, सौन्दर्य की सराहना, समृद्धि के सरल उपाय अपनी ओर खींच रहे थे।

पिता-पुत्री के बीच विवाद अनिर्णीत रह गया। प्रतिभा तमककर अपने कमरे में चली गयी। कवि घायल सिंह सा अँधेरे बरामदे में इधर से उधर, तेज़ क़दमों से घूमता रहा। उसकी उँगलियों से सिगरेट एक मिनट को भी न छूटी, न बुझी।

इन्दु रसोई में भुनभुनाती रही, ‘‘जब अच्छी-भली कॉलेज की नौकरी छोडक़र रेडियो थियेटर में आने का कौल भरा था, तभी सोचना था लड़कियाँ कौन चाल की बनेंगी। बड़ी विज्ञापनबाज़ी करेगी, कित्ती जगहँसाई होगी, आस-पड़ौस के लोग क्या कहेंगे। इसी पर सारी उम्मीदें टिकी थीं, यही ऐसी निकल गयी। छोटी तो अलग ऊदबिलाव है, उससे तो पहले ही कोई आशा नहीं है।’’

सरोजिनी, आशा, उषा, सब दूसरे स्कूल में पढ़ती थीं, तुकाराव माध्यमिक विद्यालय। नौशेरवान दस्तूर स्कूल में साथ पढ़ती थी कान्ता चोपड़ा, जिसके साथ सुबह स्कूल जाना और दोपहर को घर लौटना रोज़ का नियम था। कान्ता उसकी हमउम्र थी, उससे ज्याेदा सेहतमन्द और सक्रिय। उसके पिता रेलवे में चीफ़ गुड्स इंस्पेक्टर थे और उन्हें स्टेशन के पास ही बँगला मिला हुआ था।

महीने भर बाद जब छुट्टियों का होमवर्क उतारने मनीषा उसके घर पहुँची वह रूसी हुई थी, ‘‘जा मैं नहीं बोलती, बिना मुझे बताये इतनी दूर जाकर बैठ गयी।’’

मनीषा ने मनाया, ‘‘मेरी प्यारी कन्तू, तू बता मैं कब बताती तुझे। दादी माँ बीमार थीं, पापा ने दफ्तर से आकर ख़बर दी। सवेरे तो हम चले गये।’’

‘‘मरी चिट्ठी नहीं लिख सकती थी, कैसे मैंने एक-एक दिन काटा है।’’

थोड़ी देर की रूसा-रूसी के बाद कान्ता अपना बस्ता लेकर आयी। उसने सभी कापियाँ दिखायीं और कहा, ‘‘एक ख़बर मुँहज़ुबानी सुन लो। प्रिंसिपल ने कहा है, एस.एल.सी. क्लास में पहले दिन वे सब लड़कियों का यूनिफॉर्म चेक करेंगी। सब चीज़ क़ायदे की होनी चाहिए, ट्यूनिक, जूते, बैग, यहाँ तक कि अन्तर्वस्त्र भी।’’

मनीषा बात में उलझ गयी, ‘‘यूनिफॉर्म तो हम पूरा पहनते हैं। अन्तर्वस्त्र का क्या मतलब है। हम घर में सिली शमीज़ पहनते तो हैं।’’

‘‘यह नहीं, उनका मतलब है बाज़ार में सिले अन्तर्वस्त्र जैसे निम्मी, बारबरा और गर्टरूड पहनती हैं।’’

‘‘यह तो मुश्किल पड़ गयी।’’

स्कूल खुलने में दस दिन बचे थे। उनमें होमवर्क पूरा करना था। मम्मी से यह कहने की हिम्मत नहीं थी कि मम्मी मैं बड़ी हो रही हूँ। तुम्हारी तरह मेरे लिए भी अन्तर्वस्त्र पहनना ज़रूरी है।

मम्मी कतरब्योंत की विशेषज्ञ थीं। जब भी कभी मनीषा के लिए कपड़े सिलवाने की बात चलती, मम्मी अपनी पुरानी साड़ी या प्रतिभा का पुराना सलवार-सूट और कैंची लेकर बैठ जातीं, ‘‘अभी घंटे भर में मुन्नी की ड्रैस बन जाएगी। छोटे बच्चों का क्या है, वे तो कुछ भी पहन लें।’’

पौ फटने की बेला में कलियों का चटखकर खिलना किसने देखा है, होशियार से होशियार माली ने भी नहीं। इसी तरह लड़कियों का बड़ा होना होता है। उन्हें नहीं पता कब उन्हें फ्रॉक पहनते-पहनते, सलवार-कुरते की ज़रूरत महसूस होने लगती है; कूद-कूदकर चलने की बजाय, धीमे-धीमे, छोटे पग उठाने को कुदरत मज़बूर कर देती है। अपने को लडक़ा मानने की हेकड़ क़ायम रखना मनीषा और कान्ता के लिए दुश्वार हो रहा था। देह के अलावा मनोजगत में भी कई परिवर्तन हो रहे थे।

मनीषा ने कान्ता को बताया कि मथुरा में उसकी जान को क्या बला लग गयी थी।

‘‘थैंक गॉड, वह गंगा-यमुना चार दिनों में खत्म हो गयी। मैं तो बड़ी डर गयी थी।’’ मनीषा ने कहा।

‘‘ले, मैं तो दो साल से भुगत रही हूँ,’’ कान्ता बोली, ‘‘मम्मी मुझे रसोई में जाने से रोक देती हैं, बस सिलाई मशीन के सामने बैठा देती हैं, कि सियो घर भर के डस्टर और पाजामे।’’

‘‘तूने मुझे नहीं बताया?’’

‘‘क्या बताती, तू तो पहाड़ी घोड़े की तरह कूद-कूदकर चलती थी। तेरी समझ में क्या आता।’’

‘‘अब बता इस नयी तबालत का क्या करना है। अन्तर्वस्त्र कहाँ से लायें।’’

‘‘एक मिनट। मैंने मम्मी को खरीदते देखा है, डेढ़ रुपये की आती है। अपन दोनों डेढ़-डेढ़ रुपया जुटा लें तो बाज़ार चलें।’’

डेढ़ रुपया जुटाना कोई मुश्किल काम नहीं था। मुश्किल थी गोपनीयता। इस खरीदारी के लिए उन दोनों ने दोपहर का एक ऐसा वक्त चुना जब सडक़ पर ज्यािदा भीड़ न हो और उन्हें कोई दुकान की सीढिय़ाँ चढ़ते न देखे।

आपस में दोनों ने तय किया था कि ऐसी दुकान पर चलें जहाँ सेल्सगर्ल हो। बाज़ार में ऐसी कोई दुकान थी ही नहीं। फिर लड़कियों ने कहा, ‘‘चलो ऐसी जगह चलें जहाँ बुज़ुर्ग सेल्समैन हो।’’ ऐसी भी कोई दुकान नहीं मिली। अन्त में वे एक ऐसी दुकान की सीढिय़ाँ चढ़ गयीं जहाँ कोई ग्राहक नहीं था और सेल्समैन बूढ़ा तो नहीं पर अधेड़ ज़रूर था। अन्दर पहुँचकर कान्ता ने मनीषा को कोहनी मारी, ‘‘तू बोल।’’ मनीषा क्या बोलती। पता ही नहीं था अन्तर्वस्त्र की खरीदारी कैसे करते हैं, क्या बोलना पड़ता है।

सेल्समैन ने कुछ भाँपकर कहा, ‘‘कहिए, क्या दिखाएँ ब्रा, पैंटी या रूमाल?’’

मनीषा ने तुरन्त अनजान बनते हुए कहा, ‘‘हाँ, वह क्या कहते हैं, रूमाल दिखाइए।’’

कान्ता आँखों ही आँखों में मनीषा को घुडक़ रही थी पर मनीषा पूरी एकाग्रता से रूमाल देखने लगी। चार-चार आने में कैमरिक के सुन्दर रूमाल मिल रहे थे।

मनीषा ने चार खरीद लिये। एक रुपया चुकता कर दुकान से चल दी। पीछे-पीछे गुस्से से लाल-पीली कान्ता पैर पटकती, सीढिय़ाँ उतरी।

कान्ता ने बिगडक़र कहा, ‘‘अब स्कूल इंसपेक्शन पर तेरे रूमाल पहनकर जाएँगे क्या?’’

‘‘तो क्या करती! सेल्समैन के बोलते ही मैं इतनी घबरा गयी। कैसे आँखें फाड़-फाडक़र हमें देख रहा था!’’

कान्ता के पास उसका डेढ़ रुपया सुरक्षित था।

मनीषा बोली, ‘‘अगली दुकान चलकर तेरे लिए तो ब्रा ले लें। मेरी देखी जाएगी।’’

‘‘क्या देखी जाएगी?’’ कान्ता भडक़ी।

‘‘मैं मम्मी या दीदी की पहन लूँगी।’’

‘‘हाफक्रैक है तू। कोई किसी की ब्रा नहीं पहन सकता। सबकी अपनी अलग होती है।’’

तभी दिमाग में बल्ब जला।

कान्ता का।

उसे याद आया रोज़ शाम पाँच बजे उसकी कॉलोनी में एक ठेलेवाला आता था। उसके ठेले पर रोज़मर्रा की ज़रूरत की हर चीज़ उपलब्ध रहती—किताब, कॉपी, पेन्सिल, पेन से लेकर कद्दूकस और नींबू निचोडऩी तक। एक कोने में वह फ्रॉक के कपड़े, सलवार-सूट और होजियरी का सामान भी रखता। वहीं कुछ पतले गत्ते के डब्बे भी लगे रहते। कान्ता को लगा ज़रूर ये डब्बे अन्तर्वस्त्रों के होंगे तभी उसके ठेले पर लड़कियों और स्त्रियों की इतनी भीड़ जमी रहती। रामलाल का ठेला पूरी कॉलोनी में मशहूर था। होता यह था कि वह एक के अहाते में ठेला खड़ा करता। कुछ देर में आस-पास के घरों के बच्चे-बच्चियाँ, लड़कियाँ, स्त्रियाँ सब वहीं इकट्ठी हो जातीं। एक उत्सव-सा होता उसका आना। वहाँ सब जनी एक-दूसरे का हाल पूछतीं और सौदा देखतीं। रामलाल मुस्कराकर अपना टेढ़ा दाँत दिखाते हुए कहता, ‘‘देख लो, देख लो, देखने का कोई दाम नहीं लगता।’’

छोटे बच्चे एक रबर या एक पैकेट च्यूइंगम खरीदकर खुश हो जाते। लड़कियाँ नेल पॉलिश, लिपस्टिक के डब्बों की तरफ़ हसरत से देखतीं। सौदेबाज़ी में गृहणियाँ हावी रहतीं क्योंकि उन्हीं की अंटी में पैसे होते।

वैसे कान्ता को ठेलेवाले से सामान लेना पसन्द नहीं था। ठेले की सीमित सामग्री में बाज़ार घूमने की उत्तेजना कहाँ! पर अन्तर्वस्त्र खरीदने के लिए गोपनीयता और विश्वसनीयता भी चाहिए थी।

साढ़े चार बजे शाम, हाथ-मुँह धोकर मनीषा ने अपनी साइकिल अभी बाहर रखी ही थी कि माँ की घुडक़ी सुनाई दी, ‘‘इत्ती धूप में कहाँ जाना है। यह नहीं कि घर में बैठकर पढ़े-लिखे। तू जा रही है तो बाहर से कपड़े कौन उठाएगा?’’

रोज़ साढ़े चार बजे, पिछवाड़े की रस्सी से, सूख रहे कपड़े उठाना मनीषा का काम था।

मनीषा ने खुशामदी आवाज़ में कहा, ‘‘नाराज़ क्यों होती हो मम्मी। मैं अभी उठा देती हूँ।’’

उसका रोज़ का एक खेल यह था कि वह बाकी सारे कपड़े कन्धे पर डालकर लाती पर मम्मी और दीदी के अन्तर्वस्त्र फुटरूलर या किसी डंडी पर लटकाकर लाती और अन्दर आकर चिढ़ाती, ‘‘यह किसकी ऐ ऐ है?’’ मम्मी और दीदी लपककर अपने कपड़े पकड़तीं और कहतीं, ‘‘जब तू पहनेगी न, तब हम बताएँगे।’’ आज यह खेल नहीं हुआ तो माँ ने अचरज से मनीषा की तरफ़ देखा, ‘‘आज तो बड़ी सिधाई से कपड़े उठाये हैं।’’

‘‘साइन्स कॉपी लेनी है, दो रुपये दो।’’ मनीषा ने कहा।

‘‘अभी कल तो तूने डेढ़ रुपया लिया था।’’ माँ ने त्योरी चढ़ाई।

‘‘उसके मैंने रूमाल ले लिये। मेरे रूमाल फट गये थे।’’ मनीषा ने कहा।

मम्मी ने मुँह-ही-मुँह में बड़बड़ाते हुए पर्स से दो का नोट निकाला।

जब मनीषा रेलवे कॉलोनी पहुँची, पाँच बजने ही वाले थे। कान्ता ने मनीषा के लिए दूध में बर्फ और रूहअफ़ज़ा शर्बत डालकर अपनी तरह का मिल्कशेक बनाया। उसने एक प्लेट में बेसन के मोटे सेव रखकर कहा, ‘‘ले पकौड़े खा।’’

मनीषा हँसने लगी, ‘‘हर बात उलटी बोलती है, ये पकौड़े कहाँ हैं, ये तो सेव हैं।’’

‘‘हमारे पंजाब में इन्हें पकौड़े ही बोलते हैं।’’

सेव बहुत स्वादिष्ट थे, उनमें साबुत काली मिर्च और धनिये के दाने पड़े हुए थे।

कान्ता ने खिडक़ी से बाहर झाँका।

रामलाल का ठेला, बगल के अहाते में चार नम्बर की मिसेज़ खान के घर के सामने खड़ा था।

‘‘चलो वहीं चलते हैं।’’ कान्ता ने मनीषा को साथ लिया।

ठेले पर जैसे ही जरा उछीड़ हुई कान्ता ने रामलाल से धीरे से कहा, ‘‘लेडीज़ वाली बनियान दिखाना।’’

‘‘कौन से नम्बर की?’’ रामलाल ने पूछा।

वे क्या बतातीं। कभी नापा ही नहीं था। यह पहली बार का अनुभव था।

मनीषा ने अक्ल से काम लिया, ‘‘सबसे छोटी।’’

रामलाल ने दो पतले, चपटे डब्बे उन दोनों की तरफ़ बढ़ा दिये, ‘‘ट्राइ कर लो बेबी लोग।’’

समस्या यह थी कि इन्हें कहाँ, कैसे ट्राइ करके देखा जाए।

मिसेज़ ख़ान उनकी मुश्किल ताड़ गयीं। उन्होंने कहा, ‘‘मेरे बाथरूम में ट्राइ कर लो न।’’

उनके घर के दो बेडरूमों में दो बाथरूम थे।

किसी तरह तनियों, हुकों और इलास्टिक के पेचीदा व्याकरण को समझकर जब मनीषा ने ब्रा पहनी तो पता चला कि यह सबसे छोटा नम्बर यानी 26 भी बहुत बड़ा है। उसे उतारकर उसने अपने कपड़े वापस पहने। मनीषा बाहर निकली, यह सोचती कि कान्ता भी अन्तर्वस्त्र नापास कर चुकी होगी। पर वह तो प्रसन्न खड़ी थी।

‘‘एकदम ठीक है।’’ उसने घोषणा की।

मनीषा ने ठेलेवाले से कहा, ‘‘और छोटी वाली नहीं है।’’

‘‘जीरो साइज़ नहीं आती।’’ रामलाल ने कहा और पैकेट वापस रख लिया।

कान्ता ने उसे डेढ़ रुपया दे दिया।

मनीषा ने तय किया वह वही अपनी रोज़ वाली शमीज़ पहनकर जाएगी, प्रिंसिपल को जो सज़ा देनी है, दे। कह देगी उसका साइज़ बनता ही नहीं है।

अगले दिन स्कूल का पहला दिन था। पहनना तो सबको यूनिफॉर्म ही था पर हर लडक़ी की सजधज निराली थी। किसी ने यूनिफॉर्म के साथ कैमरिक का ब्लाउज़ पहना हुआ था तो किसी ने लिनिन का। हर लडक़ी का सीने का उभार, नये अन्तर्वस्त्रों में विशाल लग रहा था, उनमें गर्व का अहंकार था। मनीषा जैसी दो-चार मरियल-करियल लड़कियाँ थीं जो अपने पिछले साल के यूनिफॉर्म और अन्तर्वस्त्रों में नज़र आ रही थीं।

लेकिन प्रिंसिपल तो उस दिन आयी ही नहीं। उन्हें आई.सी.एस.ई. बोर्ड की मीटिंग में भाग लेने मुम्बई जाना पड़ा। कई लड़कियों की जान में जान आयी। कुछ लड़कियों के अन्तर्वस्त्र पुराने, मटमैले या बेढंगे थे, उन्हें डर था कि प्रिंसिपल उन्हें कसाई की तरह भँभोड़ेंगी और किचकिचाएँगी। कुछ लड़कियों की समस्या यह थी कि उन्होंने छुट्टियों में अपने कान छिदवा लिये थे। स्कूल का नियम था कि कोई छात्रा या शिक्षक नाक या कान में कोई आभूषण पहनकर न आये। अगर लड़कियों की हथेली पर मेंहदी दिख जाए तो उन्हें सज़ा मिलती थी। स्कूल को उत्सव और शृंगार से बेहद चिढ़ थी। मिसेज़ भरूचा, मिस पावरी, मिस दस्तूर और मिसेज़ कोठावाला इतनी गोरी थीं कि उनका रंग ही उनका आभूषण था लेकिन छात्राओं में तो केवल दस प्रतिशत पारसी थीं, बाकी उत्तर या मध्य भारत की थी जिनके परिवारों में पर्व-त्यौहार, मेले-उत्सव के अनुष्ठान पारम्परिक तरीके से मनाये जाते। ऐसे परिवारों की लड़कियों को स्कूल जेलख़ाना लगता। वे सोचतीं कब हम सीनियर सेकेंडरी लेवल इम्तहान ख़त्म करें, कब हमें यहाँ से छुटकारा मिले।

Jemsbond
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Re: दुक्खम्‌-सुक्खम्‌

Unread post by Jemsbond » 25 Dec 2014 09:11

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प्रतिभा अग्रवाल न जाने कब टीनएजर से सीधी वयस्क हो गयी। यह परिवर्तन नृत्य-भारती संस्थान आते-जाते हुआ या वाडिया कॉलेज आते-जाते अथवा यह युवा-समारोह में जाकर हुआ, इसकी पड़ताल करना बेहद मुश्किल था लेकिन यह एक बेहद जटिल स्विचओवर, बहरहाल, हो गया।

अभी तक जो लडक़ी अपने पापा की हर बात को एक भक्त की दृष्टि से देखा करती अब नास्तिक की दृष्टि से देखने लगी। कवि दफ्तर से आकर दफ्तर के कारनामे सुनाता, प्रतिभा कन्नी काटकर अपने कमरे में चली जाती। रातों में वह फुस-फुस मनीषा को बताती, ‘‘पता है मुन्नी, पापा को दफ्तर के लोग ज़रा भी पसन्द नहीं करते। उन्होंने प्रोड्यूसरों का जीना हराम कर रखा है। मुझे निसार सर ने बताया, जितना मैं रेडियो स्टेशन पर तबला बजाकर कमा रहा हूँ इससे तिगुना मैं घर बैठे कमा लूँगा।’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘बड़ी-बड़ी नृत्यांगनाओं के शो होते रहते हैं। वे मुँहमाँगे दामों पर तबला संगतकार बुलवाती हैं। अपने साजिन्दों को विदेश तक ले जाती हैं। नाच की जान तबले में बसी होती है।’’

‘‘बोल और गाने में नहीं होती।’’ मनीषा पूछती।

‘‘थोड़ी-थोड़ी सबमें होती है पर सबसे ज्याछदा तबले में।’’

‘‘निसार सर पापा की बुराई क्यों करते हैं?’’

प्रतिभा बुरा मान जाती, ‘‘वे बुराई थोड़े ही करते हैं। वे सचाई बताते हैं। आकाशवाणी में प्रोग्राम का जिम्मा प्रोड्यूसरों का है। संगीत के प्रोड्यूसर नगेन्द्र गौतम अच्छे आदमी हैं पर पापा उनके ऊपर अफ़सरी झाड़ते हैं, कहते हैं तीन महीने का प्लान बनाकर मीटिंग में पेश करो, फिर लाल पेन से उनके कागज़ों पर निशान लगा देते हैं कि इस कलाकार को हर बार क्यों ले रहे हो, उस कलाकार को क्यों नहीं लिया? अगर कोई बड़ी कलाकार स्टूडियो में आ जाय तो खुद जाकर कंट्रोलरूम में बैठ जाते हैं।’’

मनीषा समझ न पाती कि इन बातों में बुराई क्या थी। बहन से झगड़ा न हो जाय इसलिए वह उसके कमरे से हट जाती। मनीषा जानती थी कि पापा रेडियो में प्रोग्राम प्रसारण की गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं कर सकते। वे कहते, ‘‘मेरे पद का नाम है प्रोग्राम एक्ज़ीक्यूटिव यानी कार्यक्रम को कार्यान्वित करनेवाला। रेडियो में कोई भी प्रोग्राम मुझसे ओके करवाये बग़ैर नहीं जाएगा।’’ केन्द्रनिदेशक चावला कविमोहन को बोलने देते क्योंकि वे उनकी योग्यता से प्रभावित थे। वे कहते, ऐसा आदमी रेडियो को बड़ी मुश्किल से मिलता है जिसे प्रशासन और प्रोग्राम दोनों की समझ हो।

ऑल इंडिया रेडियो का नाम आकाशवाणी अब ज़ोर पकड़ गया था लेकिन जनता के बीच में अभी भी रेडियो स्टेशन नाम ही चलता। धीरे-धीरे सूचना और प्रसारण मन्त्रालय ने रेडियो में प्रोड्यूसर-स्कीम लागू कर दी। उच्चस्तरीय बैठक में यह तय किया गया कि प्रोग्राम की देखभाल और प्लानिंग का काम विषयगत विद्वानों को सौंपा जाए। यह किसी ने नहीं सोचा कि क्या विद्वानों को रेडियो जैसे तन्त्र की अभियान्त्रिकी का ज्ञान है। वरिष्ठ साहित्यकारों, संगीतकारों और कलाकारों की प्रोड्यूसर पद पर नियुक्तियाँ की गयीं।

बुद्धिजीवियों के बीच इस सरकारी क़दम का व्यापक स्वागत हुआ। लेकिन रेडियो के वरिष्ठ अधिकारियों को काफ़ी तकलीफ़ हुई।

प्रोग्रामों का रचनात्मक पक्ष अब पूरी तरह से प्रोड्यूसरों के हाथ में चला गया। अफ़सरों के जिम्मे महज़ दफ्तर का अनुशासन रह गया।

अनुशासन कवि की जीवन-शैली बन गया था। पर वह अनुशासन के बटन कई बार ज़रूरत से ज्यासदा कस देता।

काम करनेवाला बिलबिला उठता।

ननकू ऐसे ही एक दिन चला गया। पचास साल का अधेड़ नौकर। रात में बिस्तर पर उसने चादर बिछायी। कवि वहीं खड़ा था। उसने कहा, ‘‘चादर टेढ़ी बिछी है।’’ ननकू ने दायें-बायें खींचकर चादर सीधी की। कवि ने कुछ ज़ोर से कहा, ‘‘अभी भी टेढ़ी है।’’

‘‘हमसे नहीं होता,’’ कहकर ननकू अन्दर जाने लगा। कवि ने उसे कन्धे से पकडक़र धमकाया, ‘‘कान पकडक़र उठक-बैठक लगा और बोल अब से चादर टेढ़ी नहीं बिछाऊँगा।’’

ननकू ने कान तो पकड़े पर कुछ बोला नहीं। रोनी सूरत लिये वह आँगन में आ गया। सुबह जब घर के लोग उठे, देखा पीछे का दरवाज़ा उढक़ा हुआ है और ननकू ग़ायब है।

इन्दु को बहुत तकलीफ़ हुई। डेढ़ साल पुराना, घर का काम सीखा हुआ नौकर एक रात में काम छोड़ गया। पर कवि को कोई अफ़सोस नहीं हुआ। बोले, ‘‘गलती उसकी थी, मेरी नहीं।’’

बेटियों पर भी उनका अनुशासन बहुत कठोर था। दरअसल कवि को हर समय एक ही धुन सवार रहती, दूसरों के निर्माण और सुधार की। गर्मी की लम्बी छुट्टियों में वे बच्चों को कभी दोपहर में सोने की छूट नहीं देते। वे सुबह ही उन्हें कोई मोटी-सी किताब पकड़ा देते, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद या पंडित नेहरू की आत्मकथा और कहते, ‘‘इसका एक चैप्टर पढक़र याद करना, मैं ऑफिस से आकर पूछूँगा।’’ मनीषा को महापुरुषों की आत्मकथाओं या जीवनियों से वितृष्णा उसी उमर से शुरू हुई थी। कभी इन महापुरुषों के संघर्ष-काल में वह कोई तारीख़ भूल जाती तो पापा तुरन्त होमवर्क दे देते, ‘‘चलो, यह चैप्टर तीन बार लिखकर दिखाओ।’’

सख्ती का आलम ऐसा था कि रोज़ बेबी जो पूना में रोहिणी भाटे के स्कूल में कत्थक सीख रही थी, उससे कहा जाता, ‘‘दिखाओ, आज कौन-से स्टेप्स सीखे तुमने।’’

घर का सामान बाज़ार से ख़रीदकर लाना मुन्नी के हिस्से का काम था। कॉलेज से लौटने के बाद उसका काफ़ी समय बस दौड़ते बीतता। कभी घर में बेसन ख़त्म तो कभी बिस्किट-ब्रेड। फिर बिजली का बिल, गैस सिलिंडर का इन्तज़ाम सब मुन्नी के जिम्मे। जैसे ही वह सामान लेने बाहर निकलती, कवि फुटनोट लगा देते, ‘‘देख पैसे ठीक से सँभाल और सुन रसीद ज़रूर लेकर आना।’’

मनीषा का दिमाग भन्ना जाता। यह एक हिदायत सुन-सुनकर उसके कान पक गये। सब्ज़ी ख़रीदते हुए वह सोचती, ‘पाव भर भिंडी और आध किलो बैंगन की रसीद कैसे मिले। रास्ता चलते, सौदा ख़रीदते, वापस आते वह सोचती, पापा का नाम कविमोहन नहीं रसीदमोहन होना चाहिए था। रसीद कच्ची हो या पक्की, होनी ज़रूर होती।

घर में हर रोज़ ख़र्च लिखा जाता। एक भूरे रंग का किरमिच का रजिस्टर था। उस पर खड़े हाशिये डालकर रोज़ का ख़र्च दर्ज होता। पहले कवि लिखा करते पर जब से दफ्तर का काम बढ़ता गया कवि ने यह महकमा इन्दु को सौंप दिया। इन्दु ऐसे लिखतीं : –) मिरची, =) अदरक, º) धनिया। तब रुपये-आने चलते थे। अक्सर घर में एक रुपये की सब्ज़ी आती, एक रुपये का फल। एक रुपया लेकर कवि दफ्तर जाता। एक रुपये रोज़ का दूध आता।

लेकिन रोज़ रात माँ बिस्तर पर बैठ हिसाब मिलाकर कहतीं, ‘‘बाप रे! आज तो बड़ा ख़र्च हो गया।’’

मनीषा हँसती, ‘‘माँ ज्यारदा कहाँ एक-एक रुपया ही तो ख़र्च हुआ है।’’

‘‘एक-एक कर ही तो सारे रुपये निकल जाते हैं। तेरे पापा इत्ती मेहनत करते हैं, कभी इन्हें चवन्नी का दही न खिला सकी।’’

दोनों के बीच में ऐसा प्रेमतन्तु था कि उनमें कभी विवाद या संघर्ष भी न होता।

कवि रोज़ डायरी लिखते। पहले बेटियाँ सोचती थीं कि पापा भी ख़र्च का हिसाब लिखते हैं। वे आपस में चुहल करतीं कि कैसे दो आदमी मिलकर सारा दिन ख़र्च का हिसाब लिखते हैं पर हिसाब है कि निपटने में ही नहीं आता।

बहुत बाद में पापा की एक पुरानी डायरी मनीषा के हाथ पड़ गयी। उसने जल्दी-जल्दी उसके पृष्ठ पलटे। उसमें कहीं कोई ख़र्च का हिसाब नहीं लिखा था। उसमें पापा के विचारों का गंगासागर था। उन सुभाषितों से उनके सौन्दर्यबोध, विचार-सम्पदा, बौद्धिक ऐश्वर्य और मौलिक चिन्तन का परिचय मिलता था। वे कभी आधी रात में उठकर टेबिल लैम्प जलाकर लिखते, कभी भोर में जाग जाते। वे पढ़ते, प्रतिक्रियायित होते और स्फुट विचार लिखते। उन पर किसी वाद, प्रतिवाद का प्रभाव या बन्धन नहीं था। कई बार प्रगतिवादी मित्रों ने इन्हें प्रगतिशील साहित्य गोष्ठियों में प्रतिबद्ध साथी की तरह दर्ज करना चाहा पर वहाँ जाकर वे सृष्टि के रहस्य और अलौकिक शक्तियों की मीमांसा पर भाषण झाड़ आये। जहाँ किसी तात्त्विक विषय पर शाश्वत चिन्तन होता वहाँ वे समाज की समकालीन समस्याओं पर बोलने लगते। उन्हें अपने बारे में विभ्रम बनाये रखना अच्छा लगता।

अकेले में वे इन्दु से कहते, ‘‘सरकारी आदमी को केवल अपने कर्तव्य से बँधा होना चाहिए। विचारधारा से बँधना अपने गले में चौखटा बाँधना है।’’

इसमें कहीं उनका असुरक्षा-बोध भी शामिल रहता। उन दिनों प्रतिबद्ध होने का अर्थ कम्युनिस्ट होना होता था और कम्युनिस्ट का ठप्पा लगते ही नौकरी से हाथ धोना पड़ता।

तब भी देश में लोकतन्त्र था लेकिन लोकतन्त्र के एक हिस्से को हमेशा शक की निगाह से देखा जाता था। हालाँकि माक्र्सवादी और कांग्रेसी दोनों अपनी-अपनी तरह के क्रान्तिकारी रहे थे, एक के हिस्से सत्ता आयी थी तो दूसरे के हिस्से संघर्ष। कवि से जब कोई उसकी राजनीतिक विचारधारा जानना चाहता वह टाल जाता। वह कहता यह न सतयुग है, न कलियुग, यह तो छद्मयुग है। इसमें सावधान रहना ही सबसे अच्छा है। जो हो उससे उलट प्रचारित करो तभी सुरक्षा है। वह रैक में सबसे सामने किताब रखता ‘द गॉड दैट फेल्ड’।

फिर भी दफ्तर में छोटी-बड़ी बातों पर लडऩा उसके स्वभाव का अंग था। एक बार एक संगीत-सभा में रसूलनबाई पधारीं। ऐन उस समय जब संगीत-सभा शुरू होनी थी, उनका पनडब्बा खो गया। बिना पान मुँह में दबाये, वे गाती नहीं थीं। ऐसा लगा जैसे उनका कार्यक्रम नहीं हो पाएगा। रेडियो स्टेशन में उनके पनडब्बे की ढूँढ़ मची। अन्त में दफ्तर के चपरासी, ढोंढू बुवा ने मंच के तख्तम के नीचे से उनका पनडब्बा ढूँढ़ निकाला। संगीत-सभा न होने का संकट टल गया। बनारसी पान की गिलौरी मुँह में दबा रसूलनबाई ने ठुमरी के बोल उठाये ‘बैरन भई रतियाँ’। अगले रोज़ एक पैक्स अजय श्रीवास्वत ने दावा किया कि पनडब्बा उसने ढूँढ़ा था। उसे इसका क्रेडिट मिलना चाहिए। कवि भिड़ गया। उसने कहा, ढोंढू बुवा ने जब पनडब्बा ढूँढ़ा वह वहीं था। अजय श्रीवास्तव फिज़ूल में तिल का ताड़ बना रहे हैं।

रेडियो में अजय श्रीवास्तव जैसी मानसिकता के लोगों की बहुतायत होती जा रही थी। वे काम कम और काम का शोर ज्यायदा करते। और भी दस किस्म की कमज़ोरियाँ उनमें थीं। ड्रामा विभाग में कैज़ुअल कलाकारों का शोषण शुरू से होता आया था। बेचारे कैज़ुअल कलाकार चुपचाप अफ़सरों और प्रोड्यूसरों की ज्याअदती सहते पर कहते कुछ नहीं। उन्हीं दिनों यह भी उजागर हुआ कि ड्रामा प्रोड्यूसर हर कैज़ुअल आर्टिस्ट को अपनी रंग मंडली का सदस्य बनाते हैं। इसके लिए बाकायदा गंडा-बँधवाई का अनुष्ठान होता है। कलाकार अपना एक माह का मानदेय गुरुदक्षिणा के रूप में प्रोड्यूसर को सौंपता है। महिला कलाकारों का शारीरिक-शोषण होता है। यहाँ तक कि शहर के लोग धीरे-धीरे रेडियो स्टेशन को रंडियो स्टेशन कहने लगे।

कवि शिकायत करने में ज़रा भी देर न लगाता। एक बार ड्रामा प्रोड्यूसर गिरधर पांडे कमल देसाई नाम की कैज़ुअल आर्टिस्ट का चुम्बन लेते हुए स्टूडियो में पकड़े गये। केन्द्र निदेशक मामले को दबा देना चाहते थे पर कवि ने पत्रकारों को असलियत बताकर तूफ़ान बरपा कर दिया। स्थानीय अख़बारों में कई दिन तक रेडियो स्टेशन के खिलाफ़ छपता रहा। बात मन्त्रालय तक पहुँची। केन्द्र निदेशक ने जवाबतलबी में अपनी रिपोर्ट में लिखा कि ये अफ़वाहें निराधार हैं। प्रोड्यूसर महोदय स्टूडियो में अपनी पत्नी के साथ थे, उस समय किसी नाटक की कोई रिहर्सल नहीं थी। पति अपनी पत्नी से कहीं भी प्रेम प्रदर्शित कर सकता है।

प्रोड्यूसर की निरीह पत्नी ने सारी घटना की ताईद कर दी और प्रोड्यूसर की कुर्सी बची रह गयी लेकिन शहर में मज़ाक बन गया, ‘अपनी बीवी से मुहब्बत करनी है तो रेडियो स्टेशन आइए।’