कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और compleet

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raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 11 Oct 2014 03:19

माल रोड पे हम थोड़े ही दूर गये होंगे कि सड़क से घाटी का बहोत अच्छा सीन नज़र आ रहा था. हम दोनो वही जा के रेलिंग पकड़ के खड़े हो गये और नीचे का नज़ारा देखने लगे. पहाड़ो से नीचे उतरते बादल, घाटियो मे तैरते, सूरमे, सफेद, रूई के गोलो जैसे और तभी जैसे ग़लती से उनका हाथ मेरे हाथ से छू गया और मुझे जैसे करेंट लग गया हो. मेने झटके से हाथ हटा लिया. उसी समय एक बादल का फाहे जैसा टुकड़ा आके मेरे नरम नरम गालो को छू गया. मुझे इतना अच्छा लगा जैसे मेने उनकी ओर निगाह की तो अचानक देखा कि उनकी निगाह चोरी चोरी मेरे उभारो पे चिपकी है. उन्होने तुरंत अपनी निगाह हटा ली जैसे कोई शरारती बच्चा शरारत करते पकड़ा जाय और मे मुस्करा पड़ी और मुझे मुस्कराते देख के वो भी हंस पड़े और बोले, अभी बहोत कुछ देखना है चलो. और हम लोग चल दिए. खूब भीड़ थी, लेकिन हम लोग अपनी मस्ती मे बस चले जा रहे थे. तभी एक मोमोज़ की दुकान दिखी. अबके मेने उनसे कहा और हम लोग अंदर चल के बैठ गये. मेने उनसे पूछा की कौन से मोमो लेंगे, तो वो बोले कि मे नों-वेज नही ख़ाता, लेकिन तुम लेलो. मेने कहा कि नही मोमो मुझे भी वेज ही अच्छे लगते है, लेकिन क्या रिलिजियस रीज़न से या किसी और कारण से वो पूरे वेज है तो पता चला कि कुछ एक दो बार उन्होने नोन-वेज खाया था लेकिन बस ऐसे ही छोड़ दिया और उनके घर मे भी लोग नही खाते. बात बदलकर अब मेने उनसे स्पोर्ट्स के बारे मे और उनके इंट्रेस्ट्स के बारे मे बात शुरू की तो पता चला कि वो क्रिकेट खेलते है और ऑल राउनदर है, नई बॉल से बोलिंग करते है.. ( वो इन्होने वैसे कहा कि जैसे बस थोड़ा बहुत, पर बाद मे उनकी भाभी से पता चला कि वो अंडर 19 मे अपने स्टेट की ओर से खेल चुके है), उन्हे फोटोग्रफी का भी शौक है और स्विम्मिंग भी. पढ़ना भी उनकी हॉबी है. मे एक दम चहक उठी क्यो कि वो मेरी भी हॉबी थी. मेने भी बताया कि थोड़ी बहोत स्विम्मिंग मे भी कर लेती हू. और मुझे वेस्टर्न ड्रेस, डॅन्स, म्यूज़िक और मस्ती करने मे बहोत मज़ा आता है. तब तक हम लोग बाहर निकल चुके थे. कुलड़ी तक हम लोगो ने दो चक्कर लगाया होगा. लौट ते हुए उन्होने कहा कि चलो आइस्क्रीम खाते है. ठंडक मे आइस्क्रीम खाने का मज़ा ही कुछ और है. हम लोगो ने सॉफ्टी ले ली. वही सामने ही केम रेस्टौरेंट था. वहाँ एक बोर्ड लगा था क़ब्ररे का. मेने आँखे नचा के चिढ़ाते हुए पूछा, " क्यो अभी तक देखा कि नही?"

" नही, लेकिन देखने का इरादा है, क्यों, तुम्हे तो नही बुरा लगता, कोई पाबंदी."

" एकदम नही, बल्कि मे तो कहती हू एकदम देखना चाहिए. जहा तक पाबंदी का सवाल है, मे सिर्फ़ पाबंदी पे पाबंदी लगाने की कायल हू." वो खूब ज़ोर से हँसे और मेने भी हँसने मे उनका साथ दिया. हम दोनो इस तरह टहल रहे थे, जैसे बहोत पुराने दोस्त हो. तभी एक किताब की दुकान दिखी और हम दोनो अंदर घुस लिए. मे किताब देख रही थी और वो भी. जब हम दोनो बाहर निकले तो इनके हाथ मे एक पॅकेट था, किताब का. मेने उसे खोलना चाहा तो वो बोले नही होटेल मे जाके खोलना.

शाम होने वाली थी. लौट ते हुए घाटी का द्रिश्य और रोमॅंटिक हो रहा था. हम दोनो वही, जहाँ पहले जाके खड़े थे, रेलिंग पकड़ के खड़े होगये. बहोत ही खूबसूरत सा एक इंद्रधनुष घाटी मे बन रहा था. हम दोनो सॅट के खड़े थे.

वो बोले, " तुम्हे मालूम है, लोग कहते है इंद्रधनुष को देख के कुछ माँगो तो ज़रूर मिलता है. चलो माँगते है."

" एकदम" मुस्कारके मे बोली और इंद्रधनुष की ओर देख के आँखे बंद कर ली. मेने महसूस किया कि उनका हाथ मेरे हाथ को छू रहा है लेकिन अबकी बार मेने हाथ नही हटाया. उनका स्पर्श बस लग रहा था जैसे वो इंद्रा धनुष पिघल के मेरी देह मे घुल गया हो. मेरे साँसे, धड़कन तेज हो गयी. थी तब मेने उनका हाथ अपने हाथ पे महसूस किया. मुझे लगा जैसे मेरा सीना पत्थर की तरह सख़्त हो गया हो. मेने आँखे खोली तो देखा कि वो एकटक मेरी ओर देख रहे थे. शर्मा के मेने नज़र झुका ली और कहा,

" माँगा अपने?"

" हाँ और तुमने", मुस्कराकर बिना मेरा हाथ छोड़े वो बोले.

" हाँ" ब्लश करते हुए मेने कहा जैसे उन्हे मालूम चल गया हो कि मेने उन्ही को माँगा. मेरी ओर देख के वो बोले,

" मेरा बस चले तो इस इंद्रधनुष को तुम्हारे गले मे पहना दू."

" धत्त, अभ चलिए भी. ज़्यादा रोमॅंटिक ना बानिए. देर हो रही है. वहाँ मम्मी, भाभी इंतजार कर रही होंगी.

और सच मे वो लग इंतजार कर रहे थे. मम्मी तो बहोत बेचैन हो रही थी लेकिन उनकी बेचैनी ये थी कि राजीव ने मुझे पसंद किया कि नही.

मम्मी पानी वानी लेने के लिए अंदर गयी तो भाभी ने मुस्करा के, अपनी बड़ी बड़ी आँखे नचा के उनसे पूछा,

" तो क्या क्या देखा आप ने और पसंद आया कि नही"

"भाभी, हिल स्टेशन पे जो देखने को होता है वही, पहाड़ और घटियाँ, और दोनो ही बहोत खूबसूरत "

उनकी बात काट के मेरे उभरे उभारो को घूरते हुए, भाभी ने चुटकी ली, " पहाड़ तो ठीक है लेकिन आपने घाटी भी देख ली?" मेरी जाँघो के बीच मे अर्थ पूर्ण ढंग से देखते हुए वो मुस्काराईं. उनकी बात का मतलब समझ के अपने आप मेरी जंघे सिकुड गयी. लेकिन राजीव चुप रहने वाले नही थे. भाभी बहोत ही लो कट ब्लाउस पहनती थी जिसमे उनका गहरा क्लीवेज एकदम सॉफ दिखता था और आज तो उनका आँचल कुछ ज़्यादा ही धलक रहा था.

उनके दीर्घ उरोजो को देखते हुए वो बोले, " भाभी जहाँ इतने बड़े बड़े पहाड़ होंगे वहाँ उनके बीच की घाटी तो दिखेगी ही."

" अरे पहले इन छोटे छोटे पहाड़ो पे चढ़ लो फिर बड़े पहाड़ो पे नंबर लगाना." अब भाभी ने खुल के मेरे दुपट्टे से बिना ढके उरोजो की ओर इशारा करते हुए कहा. शर्मा के मे गुलाबी हो गयी और उठ के अपने कमरे की ओर चल दी. थी तब मेने सुना राजीव भाभी से कह रहे थे,

" एक दम भाभी. लेकिन फिर भूलिएगा नही," सेर को सवा सेर मिल गया था. अंदर पहुँची तो मेरा सीना धक धक हो रहा था. मेरे गाल दहक रहे थे. जब मे वॉश बेसिन के सामने पहुँची तो मेरा चेहरा धक से रह गया. दुपट्टा मेरे गले से चिपका था और मेरे दोनो उरोज खूब उठे साफ साफ दिख रहे थे. तभी तो वो और भाभी इस तरह से पहाड़ का नाम ले ले के मज़ाक कर रहे थे. बाहर ज़ोर ज़ोर से हँसने की, उनकी, मम्मी और भाभी की आवाज़ आराही थी. मेने सोचा कि दुपट्टा ठीक कर लू पर कुछ सोच के मेने 'उंह' किया और मुस्कराते हुए बाहर निकल गयी. उन लोगो मे किसी बात पे मतभेद चल रहा था. बात ये थी कि, मम्मी उन को रात के खाने पे बुला रही थी और वो हम लोगो को अकॅडमी ले चलने की ज़िद कर रहे थे. मेने थोड़ी देर सुना और फिर बीच बचाव करते हुए फ़ैसला सुना दिया कि हम लोग अकॅडमी चल चलते है और वो रात का खाने हम लोगों के साथ ही खा लेंगे. वो झट से मान गये. भाभी ने उन्हे चिड़ाया कि अभी से ये हालत है, मेरे कहते ही झट से मान गये अब शरमाने की उनकी बारी थी.

उनके जाने के कुछ देर बाद हम लोगो को अकॅडमी के गेट पे पहुँचना था, जहा वो मिलते. शेवोय के पास मे ही था.

उनके जाते ही मम्मी से नही रहा गया. वो मुझसे पूछने लगी, " बोल क्या बात हुई. तुझे पसंद किया या नही. तूने कुछ पूछा, शादी के लिए राज़ी है ना."

" मम्मी बाते तो बहोत हुई लेकिन, ये मेने नही पूछा." मे बोली.

" तू रहेगी बुद्धू की बुद्धू इतने अच्छा लड़का अगर हाथ से निकल गया ना" मम्मी के चेहरे पे परेशानी के भाव थे.

" अरे आप यू ही परेशान हो रही है. मेरी इस प्यारी ननद को कौन मना कर सकता है" भाभी ने मेरे गाल पे चिकोटी काट ते हुए कहा.

क्रमशः…………………………

शादी सुहागरात और हनीमून--2

gataank se aage…………………………………..

chaunk ke ham logon ki halat kharaab ho gayi. pehle to ham dono khade ho gaye, phir baith gaye. me to taiyaar bhi nahi thi 'dikhane' ke liye. bhabhi ne kisi tarah baat samhalate huye kaha, " lekin aap to dedh do ghante baad.. aur aap?.. aap ko dhundhane me koyi dikkat to nahi huyi?"

" nahi, jab ap ka phone aaya to mene yahi socha tha lekin phir socha ki yaha baith ke kya karunga chalu aap logo ke paas hi. aur reception me apaka room number to bata diya tha lekin phir usne ye bhi bola ki aap dono thodi der pehle yahi aayi thi to mene socha dekh lu" aur phir mujhe dekhate hue bola,

"aur apaki photo to mene dekh hi rakhi thi."

sharma ke mene sar jhuka liya. bas man kar raha tha ki dharati phat jaay.. ye kya tarika hua.. ki time ke pehle aur vo ham logo ke bare me kya sochega. shayad meri pareshani usne bhamp li thi. baat badalte hue usne bhabhi se poocha,

" kya aap masuri pehli baar aayi hai.."

" haa me to pehli baar aayi hu, lekin ye aa chuki hai. ye do saal doon me boarding me padhti thi." bhabhi ne baat sambhali.

" chaliye andar kamre me chalte hain." bhabhi ne daavat di aur mujhse kaha ki andar jake mummy ko bol du ki Rajiv aa gaye hain.

meri to jaise jaan me jaan lauti. hiran jaise jaal se choti, me sarpat bhagi suite me. mummy ko bata ke andar ke kamre me ghus kar palang pe aundhe muh let gayi. tarah tarah ke khayal... vo kya sochenge, me abhi taiyaar bhi nahi thi tab tak bhabhi aur unki avaaj sunaai di. lekin me kamre se bahar nahi aayi. bhabhi ne room service ko order de diya tha. thodi der me baat ke sath kahakahe, khilkhilaane ki avaaj aai

kuch der me bhabhi andar aayi aur meri chotiya pakad ke unhone khincha aur kaha, " he, Rajiv ghumane chalne ke liye kah rahe hai. taiyaar ho jaao." mene ana kani ki to bhabhi ne chidha chidha ke meri halat kharaab kar di. pehle mummy ne dikhane ke liye saadee tay kar rakhi thi, lekin ab dekh to unhone liya hi tha. to bhabhi ne kaha ki salwaar sut pahan lo aur ankh nacha ke boli haan dupatta gale se chipka kar rakhna, jara bhi niche nahi. masuri me aa ke agar pahad nahi dekhe to mene bhabhi ki salah maan li sivay dupatte ke. uffff mene aap ko apne baare me to bataya hi nahi ki us samay me kaisi lagti thi.

surru ke ped si lambi, patli, 5-7 ki. par itni patli bhi nahi, slender and full half curves. gori. badi badi ankhe, khoob mote aur lambe balon ki choti, patli lambi gardan aur mere ubhar 34C, (apnee class ki ladkyon me sabse jyada vikasit me lagti thi aur isi liye pichli baar mujhe holi pe 'big B' ka title mila tha), meri patli kamar aur slendar bodi frame pe kaphi ubhare lagte the, aur vahi halat hips ki bhi thi, bhare bhare.

bhabhi ne mera halka sa makeup bhi kiya, halka sa kajal, halki gulabi lipstik aur thoda sa rooj high cheekbones pe. ek baar to shishe me dekh ke me khud sharma gayi. bahar nikli to Rajiv ne apni baton se mummy aur bhabhi dono ko band rakha tha. Sevoy se ham log library point tak pahunche honge ki mummy ne kaha ki unke pairon me thodi moch si aa gayi hai aur vo hotel vapas jayengi. bhabhi ne bhi kaha ki vo mummy ko chhod ayengi. ham log bhi vapas hone chahate the par un dono ne mane kar diya. me mummy ki trick saaph saaph samajh gayi par vo log thodi hi dur gayi hongi ki bhabhi ne mujhe vapas bulaya aur apne hath se mere dupatte ko gale se chipaka ke set kar diya..aur gaal pe kas ke chikoti kaat ke bola, "abh agar tune ise theek karne ki koshish ki ne to aur muskara ke boli, ja maje kar".

library point ke paas ek dukaan thi. ham log uske paas khade the aur un logo ko jate huye dekh rahe the. jaise hi vo log ankho se ojhal huye, unhone poocha, " he tumhe, jalebi kaisi lagti hai?"

" achchi, kyon" muskarake me boli..

" mujhe bhi bahot achchi lagti hai, aur is dukaan ki to bahot famous hai chalo khate hai" aur ham dono us dukaan me ghus gaye.

me masuri ane ke pehle se soch rahi thi kya baat karungi kaise bolundgi lekin jab aaj mauka pada to unhone itane sahaj tarike se mujhe lagta tha vo to apne bare me hi bate karte rahenge par unhone mujhse is tarah kuch kaha ki.. me hi sab kuch bolti chali gayi aur apne bare me sab kuch bata diya. mujhe kya achha lagta hai, schol aur ghar ke bare me.. aur bate karte karte ham dono do teen plate jalebi gatak gaye.

Mall road pe ham thode hi dur gaye honge ki sadak se ghati ka bahot achha scene nejar aa raha tha. ham dono vahi ja ke railing pakad ke khade ho gaye aur niche ka nejara dekhne lage. pahado se niche utarte baadal, ghatiyo me tairte, surme, saphed, rui ke golo jaise aur thihi jaise galati se unka hath mere hath se chu gaya aur mujhe jaise current lag gaya ho. mene jhatke se hath hata liya. usi samay ek baadal ka phahe jaisa tukda ake mere neram neram galo ko chu gaya. mujhe itne achha laga jaise mene unkee or nigah ki to achanek dekha ki unkee nigah chori chori mere ubharo pe chipki hai. unhone turant apni nigah hata li jaise koyi shararati bachcha shararat karte pakada jaay aur me muskara padi aur mujhe muskarate dekh ke vo bhi hans pade aur bole, abhi bahot kuch dekhne hai chalo. aur ham log chal diye. khoob bhied thi, lekin ham log apni masti me bas chale ja rahe the. thihi ek momoz ki dukaan dikhi. abki mene unse kaha aur ham log andar chal ke baith gaye. mene unse poochha ki kaun se momo lenge, to vo bole ki me non-vej nahi khata, lekin tum lelo. mene kaha ki nahi momo mujhe bhi vej hi achche lagte hai, lekin kya religious reason se ya kisi aur karan se vo pure vej hai to pata chala ki kuch ek do baar unhone non-vej khaya tha lekin bas aise hi chhod diya aur unke ghar me bhi log nahi khate. baat badalkar abh mene unse sports ke bare me aur unke interests ke bare me baat shuru ki to pata chala ki vo cricket khelte hai aur all roandar hai, neyi ball se bowling karte hai.. ( vo inhone vaise kaha ki jaise bas thoda bahut, par baad me unkee bhabhi se pata chala ki vo andar 19 me apne state ki or se khel chuke hai), unhe photography ka bhi shauk hai aur swimming bhi. padhne bhi unkee hobby hai. me ek dam chahak uthi kyo ki vo meri bhi hobby thi. mene bhi bataya ki thodi bahot swimming me bhi kar leti hu. aur mujhe western dress, dance, music aur masti karne me bahot maja ata hai. thi tak ham log bahar nikal chuke the. Kuladi tak ham logo ne do chakkar lagaya hoga. laut te hue unhone kaha ki chalo icecream khate hai. thandak me icecream khane ka maja hi kuch aur hai. ham logo ne softy le li. vahi samne hi kame restaurent tha. vaha ek board laga tha cabrre ka. mene ankhe necha ke chidhate hue poocha, " kyo abhi tak dekha ki nahi?"

" nahi, lekin dekhne ka irada hai, kyon, tumhe to nahi bura lagta, koyi pabandi."

" ekdam nahi, balki me to kahti hu ekdam dekhne chahiye. jaha tak pabandi ka saval hai, me sirph pabandi pe pabandi lagane ki kayal hu." vo khoob jor se hanse aur mene bhi hansane me unka sath diya. ham dono is tarah tahal rahe the, jaise bahot purane dost ho. thihi ek kithi ki dukaan dikhi aur ham dono andar ghus liye. me kithie dekh rahi thi aur vo bhi. jab ham dono bahar nikle to inke hath me ek packet tha, kithi ka. mene use kholne chaha to vo bole nahi hotel me jake kholne.

sham hone vali thi. laut te huye ghati ka drishya aur romantic ho raha tha. ham dono vahi, jaha pehle jake khade the, railing pakad ke khade hogaye. bahot hi khubsurat sa ek indradhanush ghati me ban raha tha. ham dono sat ke khade the.

vo bole, " tumhe malum hai, log kahte hai indradhanush ko dekh ke kuch mango to jarur milta hai. chalo mangte hai."

" ekdam" muskarake me boli aur indradhanush ki or dekh ke ankhe band kar li. mene mahasus kiya ki unka hath mere hath ko chu raha hai lekin abki mene hath nahi hataya. unka sparsh bas lag raha tha jaise vo indra dhanush pighal ke mere deh me ghul gaya ho. mere sanse, dhadakan tej ho gayi. thi tak mene unka hath apne hath pe mahasus kiya. mujhe laga jaise mera sine pathar ki tarah sakht ho gaya ho. mene ankhe kholi to dekha ki vo ektak meri or dekh rahe the. sharma ke mene nejar jhuka li aur kaha,

" manga apne?"

" ha aur tumne", muskarakar bine mera hath chhode vo bole.

" ha" blush karte huye mene kaha jaise unhe malum chal gaya ho ki mene unhi ko manga. meri or dekh ke vo bole,

" mera bas chale to is indradhanush ko tumhare gale me pehne du."

" dhatt, abh chaliye bhi. jyada romantic ne baniye. der ho rahi hai. vaha mummy, bhabhi intajar kar rahi hongi.

aur sach me vo lag intejar kar rahe the. mummy to bahot bechain ho rahi thi lekin unkee bechaini ye thi ki Rajiv ne mujhe pasand kiya ki nahi.

mummy pani vani lene ke liye andar gayi to bhabhi ne muskara ke, apni badi badi ankhe necha ke unse poocha,

" to kya kya dekha aap ne aur pasand aya ki nahi"

"bhabhi, hill station pe jo dekhne ko hota hai vahi, pahad aur ghatiyam, aur dono hi bahot khubsurat "

unkee baat kaat ke mere ubhre ubharo ko ghurte huye, bhabhi ne chutaki li, " pahad to theek hai lekin apne ghaati bhi dekh li?" mere jhanghon ke beech me arth purn dhang se dekhte hue vo muskarayin. unkee baat ka matalab samajh ke apne aap meri janghe sikud gayi. lekin Rajiv chup rehne vale nahi the. bhabhi bahot hi lo cut blouse pehanti thi jisme unka gehra cleavage ekdam saaf dikhta tha aur aaj to unka aanchal kuch jyada hi dhalak raha tha.

unke deergh urojon ko dekhte hue vo bole, " bhabhi jaha itne bade bade pahad honge vaha unke beech ki ghaati to dikhegi hi."

" are pehle in chute chute pahado pe chadh lo phir bade pahado pe number lagane." abh bhabhi ne khul ke mere dupatte se bine dhake urojo ki or ishara karte hue kaha. sharma ke me gulabi ho gayi aur uth ke apne kamre ki or chal di. thi tak mene sune Rajiv bhabhi se kah rahe the,

" ek dam bhabhi. lekin phir bhuliyega nahi," ser ko sava ser mil gaya tha. andar pahunchi to mera seene dhak dhak ho raha tha. mere gaal dahak rahe the. jab me wash basin ke saamne pahunchi to mera chehra dhak se rah gaya. dupatta mere gale se chipka tha aur mere dono uroj khoob uthe saph saph dikh rahe the. thihi to vo aur bhabhi is tarah se pahad ka neam le le ke majak kar rahe the. bahar jor jor se hansane ki, unkee, mummy aur bhabhi ki avaaj aarahi thi. mene socha ki dupatta theek kar lu par kuch soch ke mene 'umh' kiya aur muskarate hue bahar nikal gayi. un logo me kisi baat pe matbhid chal raha tha. baat ye the ki, mummy un ko raat ke khane pe bula rahi thi aur vo ham logo ko academy le chalne ki jid kar rahe the. mene thodi der sune aur phir beech bachav karte hue phaisla sune diya ki ham log academy chal chalte hai aur vo raat ka khane ham logon ke saath hi kha lenge. vo jhat se maan gaye. bhabhi ne unhe chidhaya ki abhi se ye halat hai, mere kahte hi jhat se maan gaye abh sharmane ki unkee badi thi.

unke jane ke kuch der baad ham logo ko academy ke gate pe pahunchne tha, jaha vo milte. Sevoy ke paas me hi tha.

unke jate hi mummy se nahi raha gaya. vo mujhse puchne lagi, " bol kya baat huyi. tujhe pasand kiya nahi. tune kuch poocha, shaadi ke liye raji hai ne."

" mummy bate to bahot hui lekin, ye mene nahi poocha." me boli.

" tu rahegi buddhu ki buddhu itne achha ladka agar hath se nikal gaya ne" mummy ke chehare pe pareshani ke bhav the.

" are aap yu hi pareshan ho rahi hai. meri is pyari nened ko kaun mane kar sakta hai" bhabhi ne mere gaal pe chikoti kaat te huye kaha.

kramashah…………………………


raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 11 Oct 2014 17:33

शादी सुहागरात और हनीमून--3

गतान्क से आगे…………………………………..

जब हम गेट पे पहुँचे तो वो इंतजार कर रहे थे. एल.बी.एस.ए.एन.ए. (लाल बहादुर शास्त्री अकॅडमी ऑफ नीशनल आड्मिनिस्ट्रेशन) का नाम तो मेने पहले भी सुन रखा था. बड़ा सा गेट, एक रास्ता उपर की ओर जाता था जो उन्होने बताया कि कंपनी बाग की ओर जाता है. वो हम लोगो को लाउंज मे लेगये. सारा स्ट्रक्चर वुडन, ( कुछ सालो बाद आग से वो सारा कुछ नष्ट हो गया, उसकी जगह सेमेंट की अच्छी बिल्डिंग बनी पर वो बात नही) इतना अच्छा लगता था और वहाँ खिड़की से बाहर पहाड़ो की चोटिया, नीचे दूर तक तन कर खड़े देवदार के पेड़ और मौसम साफ हो गया था इसलिए कुछ पे हल्की बर्फ बस मन कर रहा था कि देखते ही रहो राजीव बगल मे खड़े थे उनके पास मे होने से ही एक अजब सा अहसास बदन मे सिहरन भी थी और बदन दहक भी रहा था. उन्होने मुझसे कहा कि, "तुम्हे किताबो का शौक है चलो तुम्हे लाइब्ररी दिखा के लाते है". मम्मी और भाभी बोली कि, "तुम लोग देख आओ हम लोग यही बैठते है". लाइब्ररी बेसमेंट मे थी. उतरते हुए मे थोड़ा लड़खड़ाई और राजीव ने कस के पकड़ लिया. मेरे पूरे बदन मे एक सिहरन सी दौड़ गयी.

अंदर चारो ओर किताबे ही किताबे, नॉवेल, आर्ट कविता हर तरह की किताबे . लौट ते हुए मेने देखा कि काउंटर पे एक खूब गोरी पर्वत बाला, गोरे बल्कि दहक्ते गाल. दो तीन प्रोबेशनेर उससे लसे हुए थे.

मेने हंस के कहा, " इस किताब के पढ़ने वाले भी काफ़ी लगते है."

" हाँ काफ़ी लंबी लिस्ट है". हंस के वो बोले.

" कही आप का नंबर तो इस की वेटिंग लिस्ट मे तो नही" मेने छेड़ा.

" यूह्यूम, मेरी किताब मुझे मिल गयी है" हंस के मुझे देख के वो बोले. एक अजब सी शरारत भरी चमक उनकी आँखो मे थी.

मे झट से दौड़ के सीढ़ियो से उपर चढ़ गयी, खिलखिलाती, हँसती, जैसे बादलो को हटा के कच्ची धूप नीचे आँगन मे उतर आई. लाउंज से फिर वो हम लोगो को हॉस्टिल, ऑडिटोरियम हर जगह ले गये. चारो ओर पाइन के पेड़, हरियाली और खरगोश, तैरते बादल के टुकड़े. पूरी पहाड़ी उतर के हम लोग हॉस्टिल तक पहुँचे. वही पर एक बड़ा सा मैदान था जिसमे हॉर्स राइडिंग के लिए लड़के लड़किया जा रहे थे. एक पगडंडी के रास्ते से हम लोग उपर आए. दूर कुछ झोपडे से दिख रहे थे. मेने पूछा और वहाँ क्या मिलता है.

हल्के से वो बोले, " वहाँ तिब्बती छन्ग मिलती है"

" अपने कभी पिया क्या" भाभी ने चिड़ाया.

" कोई मिला नही पिलाने वाला"

" वाला या वाली" भाभी कहाँ चुप रहने वाली थी

" वही समझ लीजिए" भाभी ने मेरे कान मे कहा कि मे उन्हे रात मे रुकने के लिए पटा लू. मे कैसे कहती, अजब पशोपश मे थी. लेकिन जब वो गेट पे हम लोगो को छोड़ रहे थे तो उन्होने बोला कि उनकी कोई ऑफिसर्स क्लब की मीटिंग है जिसके वो सेक्रेटरी है इसलिए वो थोड़ी देर से आएँगे. मे बोल पड़ी कि रात को हम लोगो के साथ रुकिएगा तो हम लोग बाते करेंगे और फिर कल हम लोगो को केमप्टी फाल भी चलना है. वो एक पल तो मुझे देखते रहे और फिर मुस्करा के बोले ठीक है.

भाभी रास्ते भर मुझे चिढ़ाती रही. लेकिन होटेल पहुँचते ही मम्मी पे फिर वही परेशानी का दौरा पड़ गया. पता नही उन्हे मे पसंद आई कि नही, और फिर उसने अपने घर वालो को क्या बताया.

भाभी लाख कहती रही लेकिन वो नही मानी. आख़िर भाभी नीचे होटेल मे गयी उनकी भाभी को फोन करने. तय ये हुआ था कि हम लोगो से मिलने के बाद उनकी भाभी उनसे फोन कर के हम लोगो को बताएगी कि क्या हुआ. मम्मी एक दम साँसे बाँधे इंतजार करती रही.

भाभी लौट के आई तो बस मुस्करा रही थी. उनकी आँखों मे खुशी नाच रही थी. बस उन्होने कस के मुझे बाहों मे भर लिया और लगी चूमने गालों पे, होंठों पे. और फिर कस कस के मेरे उभार दबाती मसल के बोली, अब इनको दबाने रगड़ने का पूरा इंतेजाम हो गया. भाभी इतने पे भी नही रुकी और उन का एक हाथ सीधे मेरी शलवार के उपर से जाँघो के बीच जा के 'वहाँ' भीच लिया और वो हंस के कहने लगी "और इस बुलबुल के चारे का भी."

उन्होने इस बात का ध्यान भी नही किया कि मम्मी बगल मे खड़ी है. "अरे मुझे तो बताओ क्या हुआ क्या कहा", मम्मी बेसबर हो के बोली.

अब भाभी ने मुझे छोड़ के मम्मी को पकड़ लिया और बोली, " बधाई हो, लड़के ने हां कर दी और वो शादी के लिए जल्दी भी कर रहा है. उसे ये पसंद ही नही बल्कि उसकी भाभी तो कह रही थी कि फिदा हो गया है".

मम्मी ने खुश हो के तुरंत मेरी बालाएँ ली. सारे पीर, देव याद किए और खुशी मे मुझे अपनी बाहों मे भर लिया. मेरे माथे, गाल पे कस के चूमने लगी. फिर भाभी से कहा ज़रा पता करो आस पास कोई मंदिर हो तो अभी दर्शन कर आए. हम सब बाहर निकले और मम्मी ने होटेल से ही पापा को, दादी को सबको ये खुश खबरी दी. दादी से तो उन्होने ये भी कहा कि ये ईश्वर की कृपा है कि दादी ने ऐसी बात कही और इतनी जल्दी इतने अच्छा लड़का मिल गया. राजीव की तारीफ करके वो अगा नही रही थी.

मंदिर से लौट के भाभी फिर चालू हो गयी. मम्मी से, वो मुझे चिढ़ाते हुए बोली, " कुंडली कैसी मिली थी और वो शुक्र"

" अरे चौदह गुण मिले थे और शुक्र भी काफ़ी उँचे घर मे था." मम्मी भी मुस्करा रही थी.

" अरे तब तो तेरी अच्छी मुसीबत होगी, रोज कस के रगड़ाई करेगा वो." मेरे गालो पे कस के चिकोटी काट के भाभी ने छेड़ा.

" धत्त" मे शर्मा गयी. मे बार बार दरवाजे की ओर देख रही थी. भाभी ने मेरी चोरी पकड़ ली.

" अरे किस बात का इंतजार हो रहा है उसके आने का या साथ साथ सोने का."

भाभी मुस्करा के बोली " आप ही सोइएगा साथ" मे मूह फूला के बोली.

" अरे सोने के लिए तुमने बुलाया है तो तुम्हे ही साथ सोने होगा. और फिर घबराती क्यो हो कुछ दिनो की ही तो बात है, शादी के बाद तो साथ सोना ही होगा और सोना क्यों वोना भी होगा." भाभी ने जिस तरह से मूह बनाया हम सब को मालूम हो गया कि वो क्या कह रही थी."

मेने शर्मा के सिर नीचे कर लिया. भाभी तो इस से भी ज़्यादा बोलती थी, पर मम्मी के सामने.. इस तरह. भाभी फिर चालू हो गयी, " अरी बिन्नो, मन मन भावे मूड हिलावे मन तो कर रहा होगा कि कितनी जल्दी मिले और गपक कर लू. वैसे एक मिनिट नही छोड़ेगा तुझे. चढ़ा रहेगा.. शरमाती क्यो है शादी तो होती इसीलिए है."

" मम्मी, देखिए भाभी को बहोत तंग कर रही है. " मेने शिकायत लगाई. मम्मी की हँसी दब नही पा रही थी. वो कमरे मे जा रही थी वही दरवाजे पे ठहर के, भाभी का ही साथ लेती, बोली, " अर्रे ठीक तो कह रही है वो, क्या ग़लत कह रही है..और अगर मेरी ननद होती ना तो मे सिर्फ़ बात से थोड़े ही छोड़ती" अब क्या था भाभी को तो और छूट मिल गयी.

वो मेरी ओर बढ़ी और खुल के बोली, " ननद रानी, अभी नखरे दिखा रही हो. सुहाग रात की अगली सुबह पूछूंगी कितनी बार चुदवाया कितनी बार मूसल घोंटा. चलो ज़रा अभी चेक वेक्क कर लू तुम्हारी सोन चिड़िया"

मे बच के थोड़ा दूर हट गयी और तकिया खींच के भाभी को मारा. भाभी तो बगल हट के बच गयी पर तकिया कॅच हो गया. राजीव उसी समय दरवाजे के अंदर से घुसे थे और वो उनके उपर पड़ा. उन्होने झटक से कॅच कर लिया. " कॅच करने मे बड़े एक्सपर्ट हैं आप." मे बात बनाने के लिए बोली.

" और क्या, तभी तो तुम्हे कॅच कर लिया." भाभी कहाँ चुप रहने वाली थी.

raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 11 Oct 2014 17:34

तब तक मम्मी कमरे से निकल आई और हम लोग नीचे रेस्टौरेंट मे खाने के लिए उतरने लगे, वो और मम्मी आगे आगे और मे और भाभी पीछे पीछे. भाभी साइड से मेरे बूब्स के उभार छू के धीरे से बोली, इसे कॅच किया था कि नही. खाने की टेबल पे ज़्यादा बात तो वो मम्मी और भाभी के साथ कर रहे थे पर उनकी निगाहे चुपके चुपके मुझसे ही बतिया रही थी, और एक दो बार टेबल के नीचे से जाने अंजाने उनका पैर भी और मैं सिहरन से भर जाती.

खाने के बाद भाभी, मे और वो देर तक बाते करते रहे. हम लोगो का दो कमरों का सूयीट था. मम्मी अपने कमरे मे सोने चली गयी. मे और भाभी उनसे बाते करते रहे. और भाभी को मान गयी मे, छेड़ते मज़ाक करते, उन्होने उनके बारे मे, उनके घर वालो के बारे मे ढेर सारी बाते पूछ ली. अगले दिन के लिए तय हुआ था कि कॅंप-टी फॉल जाएँगे. उन्होने बताया कि एक छोटा सा ट्रेक भी है और उससे कम समय मे पहुँच सकते है. मे तो मचल गयी कि मेने बहोत दिनों से ट्रेकिंग नही की है, ट्रेक से ही चलेंगे. वो तो झट मान गये, लेकिन मम्मी का सवाल था, इसलिए तय हुआ कि वो भाभी के साथ कार से आएँगी और हम दोनो ट्रेक से.

बगल के कनेक्टिंग रूम मे जब हम उन्हे छोड़ने गये तो भाभी ने फिर छेड़ा अरे कम से कम गुड नाइट किस तो दे दे. मे शर्मा के भाग के अपने कमरे मे चली आई. मुझे लगा कि वो क्या सोचेंगे. तभी मेरे नज़र उस पॅकेट पे पड़ी जो उन्होने मुझे दिन मे किताब की दुकान से निकलते समय गिफ्ट की थी. उसे खोला तो अंदर एक इंग्लीश की कविताओ की किताब थी, पर तभी मुझे उसमे एक कार्ड सा नज़र आया. उसे निकाला तो उसपर बहोत सुंदर हॅंड राइटिंग मे लिखा था, 'लिखने बैठी ज़की सबी, गाही गाही गरब गरूर, भाए ने केते जगत के, चतुर चितेरे कूर.'

तभी भाभी के आने के आहट हुई तो मेने झट से किताब वापस पॅकेट मे डाल दिया. लेकिन भाभी ने देख लिया और उसे उठा के बोली, " देखें तेरे उसने क्या गिफ्ट दिया है. कौन सी किताब है, काम सुत्र या प्रेम पत्रो की." जब उन्होने कविता की किताब देखी तो पूछा, "इसके अंदर फूल वुल था क्या.." मे अब क्या छिपाती. मेने कहा, "नही लेकिन एक कार्ड ज़रूर था लेकिन उस पर जो लिखा था वो मेरी समझ मे नही आया."

वो बोली दिखा. भाभी ह.ई.न.द.ई मे म.आ. थी और खास कर श्रीनगर साहित्य मे उनको काफ़ी महारत थी. एक दो बार उन्होने पढ़ा और मुस्करा के बोली, " तेरा वो बड़ा रोमॅंटिक है और रसिक भी. बड़ी तगड़ी तारीफ की है उसने तेरे रूप की. लगता है दीवाना हो गया है तेरे उपर."

" भाभी पहले मतलब बताइए ना," मेने बड़े नखरे से पूछा.

" मतलब है कि नायिका का चित्र बनाने के लिए बड़े बड़े चित्रकार गर्व के साथ इकठ्ठा हुए लेकिन उसका रूप इतना था कि कोई भी चित्र उसके रूप और लावण्य की बराबरी नही कर सका. कितनी तारीफ की है उसने. मे होती तो एक चुम्मि तो दे ही देती बिचारे को."

" दे दीजिए ना बिचारे को मुझे कोई ऐतराज नही होगा." अब मेरी चिढ़ाने की बारी थी.

" अच्छा बताती हूँ तुम्हे कि उसे क्या क्या और कैसे देना है लेकिन आज मुझे सोने की जल्दी है, सुबह जल्दी उठना है. कल रात मे बताउन्गि तुझे, ट्रेन मे" और वो बत्ती बुझा के करवट बदल के सो गयी पर मुझे नींद कहा. आँखो मे बार बार राजीव की सूरत तैरती. इतना कठिन एग्ज़ॅम पास किया लेकिन कितना सिंपल और भाभी की बात भी, दूसरा कोई लड़का होता तो दस चक्कर दौड़ाता सच मे अगर वो एक बार अगर माँगे ना तो मे दे ही दू कम से कम एक चुम्मि. शादी की बात तो अब तय ही हो गयी है.

थोड़ी देर मे जब मुझसे नही रहा गया तो साइड लॅंप जला के वो कविता की किताब खोल ली पहली ही कविता शेक्स्पियर का एक लव सोनेट थी,

शल आइ कनपेर थी टू आ सम्मर्स डे, थौ आर मोर लव्ली आंड टेम्परेट

मे पढ़ कविता रही थी लेकिन लग रहा था जैसे वो मेरे बगल मे बैठा हो और सुना रहा हो और मे अपने कानो की अंजलि बना के एक एक शब्द रोप रही हू. तभी मेने ध्यान दिया कि कुछ लेटर्स अंडारलिनेड है, हल्के से और जब मेने उन्हे मिला के पढ़ा तो लिखा था, 'यू आर स्पेशल आइ लव यू'. मेरी साँस थम गयी. किताब सीने पे दबा बस मे सोचती रही और वैसे ही सो गयी.

सुबह नींद खुली तो थोड़ी देर हो चुकी थी. भाभी कभी की उठ चुकी थी और मम्मी के पास बैठी थी. उन्होने ध्यान नही दिया कि मे कमरे मे घुस चुकी हू. वो उंगली के इशारे से बता रही थी, इत्ता बड़ा और दोनो खिलखिला के हंस दी मेने बड़े भोलेपन से पूछा, " क्या भाभी ..किसका कितना?" मम्मी ने आँख तरेर के मना किया पर भाभी तो भाभी थी.

" तेरे उसका बता रही थी तंबू कितने तना था. अरे बुद्धू, छोटा होता है या बड़ा होता है, सुबह सुबह सबका खड़ा होता है. सुबह सुबह मे इसी लिए खुद बेड टी लेके गयी थी कि देखु की तंबू कितना तना है"

" तंबू या उसका बंबू" मेरे उपर भी भाभी का असर आ गया था.

" अरे मे तो तंबू देख के आई हू. बंबू तू जाके देख, तेरा ही तो है. आँखों से देख, छू के देख, पकड़ के देख, लेकिन ये मे बता रही हू बिन्नो, खुन्टा जबरदस्त है. फॅट जाएगी तेरी अच्छी तरह तैयारी करनी पड़ेगी तुझे कुश्ती की."

" मम्मी देखिए भाभी कैसी चिढ़ाती रहती है" मेने कस के शिकायत की.

" क्यों चिढ़ती हो. अरे भाभी हो तो उसे ज़रा समझाओ, तैयारी कर्वाओ." भाभी को डाँटने के बहाने वो भी मज़ाक मे शामिल हो गयी. मे बनावटी गुस्सा दिखा के तैयार होने के लिए कमरे मे मूड गयी.

ट्रेकिंग पे जाना था इसीलिए मेने सोचा कि जीन्स पहनु पर मुझे लगा कि कही मम्मी लेकिन भाभी ने कहा कि मे जीन्स टी शर्ट ही पहनु और वो मम्मी को पटा लेंगी. उन्होने मेरी एक सफेद टी शर्ट निकाल भी दी और उसके साथ ब्रा भी. ब्रा बड़ी वैसी थी पर भाभी ने डाँट के मुझे पहनाया, हाफ कप, लेसी, थोड़ी नीचे से पॅडेड और पुश अप. उससे मेरे तीन बूब्स ना सिर्फ़ और उभरे लग रहे थे बल्कि क्लीवेज भी और गहरा. फिर कल की तरह हल्का सा मेकप भी. टी शर्ट मेने बाहर निकाल के रखी थी पर भाभी ने अपने हाथ से मेरी जीन्स की बटन खोल के उसे अंदर तक कर दिया और बेल्ट कस के मेरी पतली कमर पे बाँध दी. जब मेने हल्के से झुक के देखा तो मेरे किशोर उरोज एकदम साफ साफ, मे कुछ करती उसके पहले उन्होने मुझे धक्का दे के कमरे से बाहर कर दिया. राजीव वहाँ पहले से ही मेरा इंतजार कर रहे थे. टी शर्ट और जीन्स मे वो बहोत हंडसॉम लग रहे थे. एकदम 'वी' की तरह का शेप, चौड़ी छाती और पतली सी कमर, मे कुछ बोलती उसके पहले ही भाभी ने कहा कि तुम लोग चलो. मम्मी अभी पूजा कर रही है उन्हे टाइम लगेगा. फिर हम लोगो को मंदिर जाना है और थोड़ी शॉपिंग करनी है. ड्राइवर को मालूम है, हम लोग पहुँच जाएँगे और लंच भी वही करेंगे.

आज मुझे भी बहोत मस्ती छा रही थी. थोड़ी ही देर मे सड़क से उतर के जैसे ही ट्रेकिंग का रास्ता शुरू हुआ, मे आगे आगे, तेज़ी से (बिना ये ध्यान दिए कि हिप हॅंगिंग टाइट जीन्स मे मेरे नितंब कैसे मटक रहे है) थोड़ी देर मे राजीव ने आ के मेरा साथ पकड़ लिया. सड़क पीछे छूट चुकी थी. एकदम सन्नाटा था और उस ने मेरा हाथ थाम लिया. ज़ोर ज़ोर से हाथ हिलाते, एक दूसरे को ओर देखते (और अब वह कभी चुप, कभी खुल के किसी नदीदे बच्चे की तरह मेरे उभारो को देखता). कुछ ही देर मे उन्होने गाना शुरू कर दिया,

"सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीन, हमे डर है हम खो ना जाए कहीं, सुहाना सफ़र...'

और हम दोनो मस्ती के आलम मे चले जा रहे थे. मे भी सुर मे सुर मिला रही थी. वो थोड़ा आगे बढ़ गये. तेज़ी से आगे बढ़ने के चक्कर मे मेरा पैर फिसला..और धड़.. धड़ा धड़ मे नीचे की ओर गिरी. थोड़ी ही देर मे कंकड़ों पे फिसलती तेज़ी से. मेरी तो सांस रुक गयी थी. उन्होने पीछे मूड के देखा और डर के मारे मेरी आँखे बंद हो गयी थी.. अगले पल मे सीधे उनकी बाहों मे. मेरा इतना वजन और पहाड़ लेकिन उन्होने सब संभाल लिया. जब मेरी जान मे जान आई तो मेने महसूस किया कि मेरे गुदाज उभार उनके कड़े सीने से कस के दबे हुए थे और मे उनकी मजबूत बाहों मे. उनकी कड़ी तगड़ी मसल्स की ताक़त मैं महसूस कर सकती थी. मेरी पूरी देह सिहरन से कांप रही थी लेकिन डर से नही एक अजब सी उत्तेजना से, जिसे मेने इससे पहले कभी महसूस नही किया था. मेरे उभार पत्थर से कड़े हो गये थे. मेरी पीठ पे जहा मेरी ब्रा का स्ट्रॅप था मे उनकी उंगलियो को महसूस कर रही थी और उनकी गर्म साँसे मेरे गोरे गुलाबी कपोलों पे मन कर रहा था. बस हम दोनो ऐसे ही पकड़े रहे. वक़्त रुक सा गया था..लेकिन कुछ देर मे हम दोनो को होश आया और हम लोग अलग हो गये. शर्म से मेरी निगाहे नीची थी मेने कुछ बुद बुदाया, थॅंक्स जैसा और बोली वो पत्थर मुझे दिखा नही. शरारत के अंदाज मे उन्होने पत्थर को थॅंक्स बोला और मेरी ओर मूड के पूछा लगी तो नही.

मैं क्या बोलती जो चोट लगी थी वो बताने लायक नही थी.

क्रमशः…………………………

शादी सुहागरात और हनीमून--3

gataank se aage…………………………………..

jab ham gate pe pahunche to vo intejar kar rahe the. L.B.S.A.N.A. (Lal Bahadur Shastri Academy of Netionel Administration) ka neam to mene pehle bhi sun rakha tha. bada sa gate, ek rasta upar ki or jata tha jo unhone bataya ki company baag ki or jata hai. vo ham logo ko lounge me legaye. sara structure wooden, ( kuch salo baad aag se vo sara kuch nesht ho gaya, uski jagah cement ki achchi building bani par vo baat nahi) itne achha lagta tha aur vaha khidki se bahar pahado ki chotiya, niche dur tak tan kar khade devdar ke ped aur mausam saph ho gaya tha isaliye kuch pe halki barph bas man kar raha tha ki dekhte hi raho Rajiv bagal me khade the unke paas me hone se hi ek ajab sa ahasaas badan me sihairaan bhi thi aur badan dahak bhi raha tha. unhone mujhse kaha ki, "tumhe kitaabo ka shauk hai chalo tumhe library dikha ke late hai". mummy aur bhabhi boli ki, "tum log dekh ao ham log yahi baithte hai". library basement me thi. utarte hue me thoda ladkhadei aur Rajiv ne kas ke pakad liya. mere pure badan me ek sihran si daud gayi.

andar charo or kitaabe hi kitaabe, novel, art kavita har tarah. laut te hue mene dekha ki counter pe ek khoob gori parvat bala, gore balki dahakte gaal. do teen probeshaner usse lase hue the.

mene hans ke kaha, " is kitaab ke padhne vale bhi kaphi lagte hai."

" ha kaphi lambi list hai". hans ke vo bole.

" kahi aap ka number to is ki waiting list me to nahi" mene chheda.

" uhum, meri kitaab mujhe mil gayi hai" hans ke mujhe dekh ke vo bole. ek ajab si sharaarat bhari chamak unkee ankho me thi.

me jhat se daud ke seedhiyo se upar chadh gayi, khilkhilati, hansti, jaise badalo ko hata ke kachchi dhup niche angan me utar aye. lounge se phir vo ham logo ko hostel, auditorium har jagah le gaye. charo or pine ke ped, hariyali aur khargosh, tairte baadal ke tukde. puri pahadi utar ke ham log hostel tak pahunche. vahi par ek bada sa maidan tha jisme horse riding ke liye ladke ladkiya ja rahe the. ek pagadandi ke raste se ham log upar aye. dur kuch jhopade se dikh rahe the. mene poocha aur vaha kya milta hai.

halke se vo bole, " vaha tibbati chhang milti hai"

" apne kabhi piya kya" bhabhi ne chidhaya.

" koi mila nahi pilane vala"

" vala ya vali" bhabhi kaha chup rehne vali thi

" vahi samajh lijiye" bhabhi ne mere kan me kaha ki me unhe raat me rukne ke liye pata lu. me kaise kahti, ajab pashopash me thi. lekin jab vo gate pe ham logo ko chhod rahe the to unhone bola ki unkee koyi officers club ki meneting hai jiske vo secretary hai isliye vo thodi der se ayenge. me bol padi ki raat ko ham logo ke saath rukiyega to ham log bate karenge aur phir kal ham logo ko kaimpti phal bhi chalne hai. vo ek pal to mujhe dekhte rahe aur phir muskara ke bole theek hai.

bhabhi raste bhar mujhe chidhati rahi. lekin hotel pahunchate hi mummy pe phir vahi pareshani ka daura pad gaya. pata nahi unhe me pasand aayi ki nahi, aur phir usne apne ghar valo ko kya bataya.

bhabhi lakh kahti rahi lekin vo nahi mani. akhir bhabhi niche hotel me gayi unkee bhabhi ko phone karne. tay ye hua tha ki ham logo se milne ke baad unkee bhabhi unse phone kar ke ham logo ko batayegi ki kya hua. mummy ek dam saanse bande intejar karti rahi.

bhabhi laut ke aayi to bas muskara rahi thi. unkee ankhon me khushi neach rahi thi. bas unhone kas ke mujhe bahon me bhar liya aur lagi chumne galon pe, honthon pe. aur phir kas kas ke mere ubhar dabati masal ke boli, abh inko dabane ragadne ka pura intejam ho gaya. bhabhi itne pe bhi nahi ruki aur un ka ek hath sidhe meri shalavar ke upar se jhanghon ke beech ja ke 'vaha' bhiench liya aur vo hans ke kahne lagi "aur is bulbul ke chaare ka bhi."

unhone is baat ka dhyan bhi nahi kiya ki mummy bagal me khadi hai. "are mujhe to batao kya hua kya kaha", mummy besabar ho ke boli.

abh bhabhi ne mujhe chhod ke mummy ko pakad liya aur boli, " badhayi ho, ladke ne haa kar di aur vo shaadi ke liye jaldi bhi kar raha hai. use ye pasand hi nahi balki uski bhabhi to kah rahi thi ki fida ho gaya hai".

mummy ne khush ho ke turant meri balaye li. saare peer, dev yaad kiye aur khushi me mujhe ankvar me bhar liya. mere mathe, gaal pe kas ke chumne lagi. phir bhabhi se kaha jara pata karo aas paas koi mandir ho to abhi darshan kar aaye. ham sab bahar nikle aur mummy ne hotel se hi papa ko, daadi ko sabko ye khush khabadi di. daadi se to unhone ye bhi kaha ki ye ishvar ki kripa hai ki daadi ne aisi baat kahi aur itni jaldi itne achha ladka mil gaya. Rajiv ki tariph karke vo agha nahi rahi thi.

mandir se laut ke bhabhi phir chalu ho gayi. mummy se, vo mujhe chidhate hue boli, " kundali kaisi mili thi aur vo shukra"

" are chaudah gun mile the aur shukr bhi kaphi unche ghar me tha." mummy bhi muskara rahi thi.

" are thi to teri achchi musibat hogi, roj kas ke ragadai karega vo." mere galo pe kas ke chikoti kaat ke bhabhi ne chheda.

" dhatt" me sharma gayi. me baar baar darvaje ki or dekh rahi thi. bhabhi ne meri chori pakad li.

" are kis baat ka intejar ho raha hai uske ane ka ya saath saath sone ka."

bhabhi muskara ke boli " aap hi soiyega saath" me muh phula ke boli.

" are sone ke liye tumne bulaya hai to tumhe hi saath sone hoga. aur phir ghabrati kyo ho kuch dino ki hi to baat hai, shaadi ke baad to saath sone hi hoga aur sone kyon vone bhi hoga." bhabhi ne jis tarah se muh baanea ham sab ko malum ho gaya ki vo kya kah rahi thi."

mene sharma ke sir niche kar liya. bhabhi to is se bhi jyada bolti thi, par mummy ke saamne.. is tarah. bhabhi phir chalu ho gayi, " ari binno, man man bhave mud hilave man to kar raha hoga ki kitni jaldi mile aur gapak kar lu. vaise ek minute nahi chhodega tujhe. chadha rahega.. sharmaati kyo hai shaadi to hoti isiliye hai."

" mummy, dekhiye bhabhi ko bahot tang kar rhi hai. " mene shikayat lagayi. mummy ki hansi dab nahi pa rahi thi. vo kamre me ja rahi thi vahi darvaaje pe thahar ke, bhabhi ka hi saath leti, boli, " arre theek to kah rahi hai vo, kya galat kah rahi hai..aur agar meri nanad hoti ne to me sirph baat se thodi chodati" abh kya tha bhabhi ko to aur chhot mil gayi.

wo meri or badhi aur khul ke boli, " nanad rani, abhi nakhare dikha rahi ho. suhaag raat ki aglee subah puchungi kitni baar chudavaayaa kitni baar musal ghonta. chalo jara abhi check veck kar lu tumhari son chidiya"

me bach ke thoda dur hat gayi aur takiya kheench ke bhabhi ko mara. bhabhi to bagal hat ke bach gayi par takiya catch ho gaya. Rajiv usi samay darvaaje ke andar se ghuse the aur wo unke upar pada. unhone jhatak se catch kar liya. " catch karne me bade expert hain aap." me baat banaane ke liye boli.

" aur kya, tabhi to tumhe catch kar liya." bhabhi kahan chup rehne vali thi.

tab tak mummy kamre se nikal aayi aur ham log niche restaurent me khane ke liye utarne lage, wo aur mummy aage aage aur me aur bhabhi peechhe peechhe. bhabhi side se mere boobs ke ubhar chho ke dhire se boli, ise catch kiya tha ki nahi. khane ki thile pe jyada baat to wo mummy aur bhabhi ke saath kar rahe the par unkee nigahe chupke chupke mujhse hi batiya rahi thi, aur ek do baar thile ke niche se jane anjane unka pair bhi aur me sihairaan se bhar jati.

khane ke baad bhabhi, me aur wo der tak bate karte rahe. ham logo ka do kamron ka suite tha. mummy apne kamre me sone chali gayi. me aur bhabhi unse bate karte rahe. aur bhabhi ko maan gayi me, chedate majak karte, unhone unke bare me, unke ghar valo ke bare me dher sari bate puch li. agle din ke liye tay hua tha ki camp-t fall jayenge. unhone bataya ki ek chhota sa trek bhi hai aur usse kam samay me pahunch sakate hai. me to machal gayi ki mene bahot dinon se treking nahi ki hai, trek se hi chalenge. wo to jhat maan gaye, lekin mummy ka saval tha, isliye tay hua ki wo bhabhi ke saath car se ayengi aur ham dono trek se.

bagal ke connecting room me jab ham unhe chhodne gaye to bhabhi ne phir chheda are kam se kam good night kiss to de de. me sharma ke bhag ke apne kamre me chali aayi. mujhe laga ki wo kya sochenge. tabhi mere najar us packet pe padi jo unhone mujhe din me kitaab ki dukaan se nikalte samay gift ki thi. use khola to andar ek english ki kavitao ki kitaab thi, par tabhi mujhe usme ek card sa najar aya. use nikala to uspar bahot sundar hand writing me likha tha, 'likhan baithi jaki sabi, gahi gahi garab garur, bhaye ne kete jagat ke, chatur chitere kur.'

tabhi bhabhi ke ane ke ahat huyi to mene jhat se kitaab vapas packet me daal diya. lekin bhabhi ne dekh liya aur use utha ke boli, " dekhen tere usne kya gift diya hai. kaun si kitaab hai, kaam sutra ya prem patro ki." jab unhone kavita ki kitaab dekhi to poocha, "isake andar phul vul tha kya.." me abh kya chhipati. mene kaha, "nahi lekin ek card jarur tha lekin us par jo likha tha wo meri samajh me nahi aya."

wo boli dikha. bhabhi h.i.n.d.i me M.A. thi aur khas kar shringar sahitya me unko kaphi maharat thi. ek do baar unhone padha aur muskara ke boli, " tera wo bada romantic hai aur rasik bhi. badi tagadi tariph ki hai usne tere roop ki. lagta hai diwane ho gaya hai tere upar."

" bhabhi pehle matalab bataiye ne," mene bade nakhare se poocha.

" matalab hai ki naayika ka chitr banaane ke liye bade bade chitrakar garv ke saath ikaththaa hue lekin uska roop itna tha ki koyi bhi chitra uske roop aur lavanya ki baraabari nahi kar saka. kitni tariph ki hai usne. me hoti to ek chummi to de hi deti bichare ko."

" de dijiye ne bichare ko mujhe koyi aitraaj nahi hoga." ab meri chidhane ki baari thi.

" achha batati tumhe ki use kya kya aur kaise dene hai lekin aaj mujhe sone ki jaldi hai, subah jaldi uthane hai. kal raat me bataungi tujhe, train me" aur wo batti bujha ke karavat baadal ke so gayi par mujhe neend kaha. ankho me baar baar Rajiv ki surat tairti. itne kathin exam paas kiya lekin kitte simple aur bhabhi ki baat bhi, dusara koyi ladka hota to das chakkar daudata sach me agar wo ek baar agar maange ne to me de hi du kam se kam chummi. shaadi ki baat to abh tay hi ho gayi hai.

thodi der me jab mujhse nahi raha gaya to side lamp jala ke wo kavita ki kitaab khol li pehli hi kavita Shakespeare ka ek lav sonet thi,

shall i conpare thee to a summers day, thou are more lovely and tempret

me padh kavita rahi thi lekin lag raha tha jaise wo mere bagal me baitha ho aur sune raha ho aur me apne kano ki anjali bane ke ek ek shabd rop rahi hu. tabhi mene dhyan diya ki kuch letters andarlined hai, halke se aur jab mene unhe mila ke padha to likha tha, 'you are special i love you'. meri saans tham gayi. kitaab sine pe daba bas me sochati rahi aur vaise hi so gayi.

subah neend khuli to thodi der ho chuki thi. bhabhi kabhi ki uth chuki thi aur mummy ke paas baithi thi. unhone dhyan nahi diya ki me kamre me ghus chuki hu. wo ungali ke ishare se bata rahi thi, itta bada aur dono khilkhila ke hans di mene bade bholepan se poocha, " kya bhabhi ..kiska kitne?" mummy ne ankh tarer ke mane kiya par bhabhi to bhabhi thi.

" tere uska bata rahi thi tambu kitne tane tha. are buddhu, chuta hota hai ya bada hota hai, subah subah sabka khada hota hai. subah subah me isi liye khud bed tea leke gayi thi ki dekhu ki tambu kitne tane hai"

" tambu ya uska bambu" mere upar bhi bhabhi ka asar aa gaya tha.

" are me to tambu dekh ke aayi hu. bambu tu jake dekh, tera hi to hai. ankhon se dekh, chho ke dekh, pakad ke dekh, lekin ye me bata rahi hu binno, khumta jabardast hai. phat jayegi teri achchi tarah taiyaari karani padegi tujhe kushti ki."

" mummy dekhiye bhabhi kaisi chidhati rahti hai" mene kas ke shikayat ki.

" kyon chidhati ho. are bhabhi ho to use jara samjhao, taiyaari karwao." bhabhi ko dantane ke bahane wo bhi majak me shamil ho gayi. me banevati gussa dikha ke taiyaar hone ke liye kamre me mud gayi.

trecking pe jane tha isilaye mene socha ki jeans pahanu par mujhe laga ki kahi mummy lekin bhabhi ne kaha ki me jeans t shirt hi pehnu aur wo mummy ko pata lengi. unhone meri ek saphed ti shirt nikal bhi di aur uske saath bra bhi. bra badi vaisi thi par bhabhi ne dant ke mujhe pehneya, half cup, lacy, thodi niche se padded aur push up. usse mere teen boobs ne sirph aur ubhre lag rahe the balki cleavage bhi aur gehra. phir kal ki tarah halka sa makeup bhi. t shirt mene bahar nikal ke rakhi thi par bhabhi ne apne hath se meri jeans ki button khol ke use andar tuck kar diya aur belt kas ke meri patli kamar pe band di. jab mene halke se jhuk ke dekha to mere kishor uroj ekdam saph saph, me kuch karti uske pehle unhone mujhe dhakka de ke kamre se bahar kar diya. Rajiv vaha pehle se hi mera intejar kar rahe the. t shirt aur jeans me wo bahot handsom lag rahe the. ekdam 'V' ki tarah ka shape, chaudi chhati aur patli si kamar, me kuch bolti uske pehle hi bhabhi ne kaha ki tum log chalo. mummy abhi puja kar rahi hai unhe time lagega. phir ham logo ko mandir jane hai aur thodi shopping karni hai. driver ko malum hai, ham log pahunch jayenge aur lundch bhi vahi karenge.

aaj mujhe bhi bahot masti cha rahi thi. thodi hi der me sadak se utar ke jaise hi trekking ka rasta shuru hua, me aage aage, teji se (bine ye dhyan diye ki hip hanging tight jeans me mere nitamb kaise matak rahe hai) thodi der me Rajiv ne aa ke mera saath pakad liya. sadak peechhe chut chuki thi. ekdam sanneta tha aur us ne mera hath tham liya. jor jor se hath hilate, ek dusare ko or dekhte (aur abh vah kabhi chup, kabhi khul ke kisi nedide bachche ki tarah mere ubharo ko dekhta). kuch hi der me unhone gane shuru kar diya,

"suhane safar aur ye mausam haseen, hame dar hai ham kho ne jaye kaheen, suhane saphar...'

aur ham dono masti ke alam me chale ja rahe the. me bhi sur me sur mila rahi thi. wo thoda aage badh gaye. teji se aage badhne ke chakkar me mera pair phisla..aur dhad.. dhada dhad me niche ki or giri. thodi hi der me kankadon pe phisalti teji se. meri to sans ruk gayi thi. unhone peechhe mud ke dekha aur dar ke mare meri ankhe band ho gayi thi.. agle pal me sidhe unkee baahon me. mera itne vajan aur monentum lekin unhone sab sambhal liya. jab meri jaan me jaan aayi to mene mehsus kiya ki mere gudaj ubhar unke kade sine se kas ke dabe huye the aur me unkee majabut bahon me. unkee kadi tagadi muscles ki takat me mehsus kar sakati thi. meri puri deh sihairaan se kamp rahi thi lekin dar se nahi ek ajab si uttejane se, jise mene isse pehle kabhi mehsus nahi kiya tha. mere ubhar patthar se kade ho gaye the. meri peeth pe jaha meri bra ka strap tha me unkee ungaliyo ko mahsus kar rahi thi aur unkee garm sanse mere gore gulabi kapolon pe man kar raha tha. bas ham dono aise hi pakde rahe. waqt ruk sa gaya tha..lekin kuch der me ham dono ko hosh aya aur ham log alag ho gaye. sharm se meri nigahe nichi thi mene kuch bud budaya, thanks jaisa aur boli wo patthar mujhe dikha nahi. shararat ke andaj me unhone patthar ko thanks bola aur meri or mud ke poocha lagi to nahi.

me kya bolti jo chut lagi thi wo batane layak nahi thi.

kramashah…………………………