कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और compleet

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raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 11 Oct 2014 17:35

शादी सुहागरात और हनीमून--4

गतान्क से आगे…………………………………..

मेरी जीन्स पीछे से गंदी हो गयी थी. पीछे मूड के वो वहाँ झाड़ने के बहाने मेरे हिप्स पे हाथ लगाने लगे. मेने हंस के मुस्कराती आँखो से कहा, बदमाशी मत करो तो बड़े भोले बन के वो बोले, मे तो सिर्फ़ धूल झाड़ रहा था. हाँ, मुझे मालूम है जनाब क्या कर रहे है, मे बोली और उनको दिखा के एक बार मस्ती से अपने नितंब मटका के आगे बढ़ गयी.

पीछे से वो बोले, अरे शराफ़त का तो जमाना ही नही है.

सामने झरना दिख रहा था, कई धाराए दो तीन काफ़ी मोटी थी बाकी पतली. नीचे पानी इकट्ठा हो रहा था. पानी काफ़ी उपर से गिर रहा था और बहोत ही रोमॅंटिक दृश्य था. लोग काफ़ी थे. कई तो सीधे पानी के नीचे खड़े थे, उनमे ज़्यादातर कपल्स थे, कुछ हनिमूनर्स लग रहे थे और कुछ ऐसे ही लड़के लड़कियो के जोड़े. वो बोले चलो ना ज़रा पास से देखो. मेने मना किया तो वो बोले डरती क्यो हो, मे हू ना. हिम्मत कर के मे झरने के पास तक गयी. पानी की बूँदों का फव्वारा हमारे चेहरे पे पड़ रहा था, बहोत अच्छा लग रहा था. मेने नीचे झुक के अंगुली मे कुछ पानी लिया और शरारत से उनके चेहरे के उपर फेंक दिया. अच्छा बताता हू, वो बोले. मे पीछे हटी पर मुझे ये नही मालूम कि मे एक पतली धार के पास आ गयी थी. उन्होने मेरा एक हाथ पकड़ के हल्के से धक्का दिया और मे सीधे धार के नीचे. काफ़ी भीग गयी मे, लेकिन फिर किसी तरह निकल के खड़ी हो गयी. मूह फूला के. पास आ के उन्होने पूछा, "गुस्सा हो क्या."

मे कुछ नही बोली. "कैसे मनोगी ओके.. सॉरी बाबा.." मुंझे लगा कुछ ज़्यादा होगया. मेने फिर पूरी ताक़त से उनको धार के नीचे धकेल दिया. अब वो भीग रहे थे और मे खिलखिला रही थी.

मेने उनसे कहा, "ऐसे. मानूँगी."

"अच्छा.." और अब उन्होने मुझे भी खींच लिया. अब हम दोनो धार के नीचे खड़े भीग रहे थे. उन्होने मुझे कस के अपनी बाहों मे बंद रखा था. सर पे पानी से बचने के लिए जो मेने सर हटाया तो सारी धार सीधे मेरे टी शर्ट के बीच और उसके ज़ोर से मेरे उपर के दोनो बटन टूट गये और पानी की धार सीधे मेरे बूब्स पे और पल भर मे ही मेरी लेसी ब्रा अच्छी तरह गीली हो कर मेरी देह से चिपक गयी और मेरी सफेद टी शर्ट भी. तभी मेरे पैर सरके और मेने कस के राजीव को अपनी बाहों मे भींच लिया.

मेरे उभार उनके सीने से एकदम चिपक गये. राजीव की उंगलिया मेरे उरोजो के उभार से साइड से जाने अंजाने छू गयी. मेरे सारे शरीर मे जैसे करेंट दौड़ गया. पहली बार किसी मर्द की उंगलिया मेरे "वहाँ" टच कर गयी थी और मे एकदम सिकुड गयी लाज से लेकिन.. अच्छा भी बहोत लगा. मन कर रहा था कि वह कस के भीच ले मुझे. पहले तो मेने सहारे के लिए उसे पकड़ा था लेकिन अब मेरी उंगलिया कस के उसकी पीठ पे गढ़ी हुई थी.. शायद वो बिना कहे मेरे मन की बात भाँप गये थे और अब उन्होने कस के, मुझे पकड़ने के बहाने भीच लिया.

मेने थोड़ा सा छुड़ाने की कोशिश की लेकिन हम दोनो जानते थे कि वो बहने है उसका एक हाथ तो मेरी पीठ पे कस के मुझे पकड़े था और अब दूसरा मेरे हिप्स पे मेने अगल बगल देखा तो बगल मे और मोटी धार मे अनेक जोड़े चिपके हुए थे. जब मेने झुक कर नीचे देखा तो मेरी नज़र एकदम झुक गयी. ना सिर्फ़ मेरे उरोज सफेद टी शर्ट से (जो अब गीली होके पूरी तरह ट्रांशापरेंट हो गयी थी) चिपके हुए साफ दिख रहे थे, बल्कि पानी के ज़ोर से मेरी लेसी, हाफ कप, तीन ब्रा भी सरक के नीचे होगयि थी.

मेरे उत्तेजना से कड़े निपल भी (राम तेरी गंगा मैली मे मंदाकिनी जैसे दिख रही थी, वैसे ही बल्कि और साफ साफ). जब तक मे संभालती उन्होने मेरा हाथ पकड़ कर खींचा और हम लोग एक खूब मोटी धार के नीचे, ये धार एक बड़ी सी चट्टान कि आड़ मे थी जहाँ से कुछ नही दिख रहा था और न ही हम लोग किसी को दिख रहे थे.

वहाँ फिसलन से बचने के लिए अबकी और कस के उसने मुझे भींच लिया और मे ने भी कस के उन्हे अपनी दोनो बाहों मे. मेरे दोनो टीन उरोज कस के उन के सीने से दबे थे और वो भी उन्हे और कस के भीच रहे थे. बस लग रहा था हम दोनो की धड़कने मिल गयी है. पानी के शोर मे कुछ भी सुनाई नही दे रहा था. बस रस बरस रहा था, और हम दोनो भीग रहे थे. लग रहा था हम दोनो एक दूसरे मे घुल रहे हो उनका पौरुष मेरे अंदर छन छन कर भीं रहा हो झरने मे जैसे लाज शरम के सारे बंदन भी घुल, धुल गये हो.

raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 11 Oct 2014 17:36

मेरे दोनो कबूतर खुलने के लिए जैसे छटपटा रहे थे, और उनकी खड़ी चोन्चे सीधे उनके चौड़े मजबूत सीने पे जब उन्होने मेरे नितंबों को पकड़ के कस के भींचा तो मेरी फैली जाँघो के ठीक बीच... उनका बुल्ज़ (मुझे एकदम याद आया कि सुबह भाभी किस तरह उनके "खुन्टे" के बारे मे बोल रही थी) और मे बजाय छितकने के और सॅट गयी. शायद उस समय वो और आगे बढ़ जाते तो भी मे मना ना कर पाती उत्तेजना और पहली बार परे उस सुख से जिसे बता पाना शायद अब तक मेरे लिए मुश्किल है मेरी हालत खराब थी.

झरने मे शायद हम 10-5 मिनिट ही रहे हो लेकिन जब मे उन का हाथ पकड़ के बाहर निकली तो लगा कितना समय निकल गया. जब बाहर निकल कर मेरी ठोडी पकड़ के उन्होने पूछा बोलो कैसा लगा, तो मे शरमा के दूर हट गयी और बोली, "धत्त", मेरी बड़ी बड़ी आँखे झुकी हुई थी. और मे दोनो हाथो से अपने गीले उरोजो को छुपाने की असफल कोशिश कर रही थी.

उन्होने अपने बॅग से कुछ तौलिए निकले. मेने जैसे ही हाथ बढ़ाया तो वो मुस्करा के बोले,

"नही पहले एक पोज़". मेने बहोत ना नुकुर की पर जिस तरह वो रिक्वेस्ट कर रहे थे मेरी मना बहोत देर चलने वाली नही थी. अचानक वो बोले हॅंड्ज़-अप और मेरे दोनो हाथ जो मेरे सीने पे थे उपर हो गये.

"एक दम, अब अपने दोनो पंजे एक दूसरे मे फँसा के.. हाँ सिर के पीछे जैसे मॉडेल्स करती है"

मे जानती थी कि इसके बिना छुट्टी नही मिलने वाली है. मुझे गुस्सा भी लग रहा था और मुस्कान भी आ रही थी.

एक फोटो से छुट्टी नही मिली. एक उन्होने एक चट्टान के उपर से चढ़ के ली और दूसरी ज़मीन पे बैठ के. (वो तो मुझे फोटो देखने से पता चला कि एक मे जनाब ने मेरे गहरे क्लीवेज और दूसरे मे पूरे उभार की) और एक दो फोटो और खींचने के बाद ही मुझे तौलिया मिला. हम लोग ऐसी जगह थे जहाँ चारो ओर उँची चट्टाने थी, पूरी तरह परदा था और खूब कड़क धूप आ रही थी. मुझे चिढ़ाते हुए वो बोले, "सुखा दू. अच्छी तरह रगड़ रगड़ के सुखाउन्गा. तुरंत सूख जाएगा" मेने भी उसी अंदाज मे आँख नाचा के कहा कि, वो मेरी ओर पीठ कर लें जब तक मैं ना बोलू. अच्छे बच्चे की तरह बात मान के तुरंत वो मूड गये. अपनी शर्ट तो उन्होने उतार के पास के चट्टान पे सूखने डाल दी थी. उसके नीचे उन्होने कुछ नही पहन रखा था, इस लिए उनकी पूरी देह साफ साफ दिख रही थी. मेने मूड के उनकी ओर पीठ कर ली और अपनी टी शर्ट उठा के अंदर तक तौलिए से अच्छी तरह पोन्छा.

और फिर फ्रंट ओपन ब्रा खोल के वहाँ भी ब्रा को अड्जस्ट कर के जीन्स की भी बटन खोल के. मैं बीच बीच मे गर्दन मोड़ के देख ले रही थी कही वह चुपके से देख तो नही रहे है. पर लाइक आ पर्फेक्ट जैन्तल्मेन एक बार भी ..कनखियो से भी नही. और अब सारी बटन बंद कर के जब मेने उनकी ओर देखा तो उनके शरीर की एक एक मसल्स ज़रा भी फट नही रही थी, कमर एकदम जो कहते है ने कहर कटी, शेर की तरह पतली कुछ कुछ मेल मॉडेल्स जो दिखाते है वैसे ही.. एक बार फिर मेरी देह मे वैसी ही सिहरन होने लगी जैसे उनकी बाहों मे झरने के नीचे सर झटक के मे चुपके से दबे पाँव उनके पीछे गयी और पीछे से कस के उन्हे अचानक पकड़ लिया लेकिन जैसे ही मेरी गोलाइयाँ मेरी टी शर्ट के अंदर से ही सही, उनके पीठ से लग रही थी, मुझे लग रहा था मेरी आँखे अपने आप मूंद रही है. वो अचानक मुड़े और उन्होने मुझे थाम लिया.

और हम दोनो बेसाखता हस्ने लगे. उन्होने अपनी शर्ट उठाई और पास मे ही एक घास के मैदान की ओर दौड़ पड़े और मे भी उनके पीछे पीछे. वो लेट गये घुटने मोड़ के. मे भी उनके घुटने पे पीठ टेक उनकी ओर मुँह कर के बतियाने लगी. जाड़े की गुनगुनाती, हल्की चिकोटी काटती धूप, पास मे झरने का खिलखिलाने का शोर, खुल कर दुनिया को भूल आपस मे मस्त सरवर मे केली क्रीड़ा करते हंस के जोड़ो की तरह औरत मर्द, एकदम रूमानी माहौल हो रहा था. और मे उनसे ऐसे घुल मिल के बात कर रही थी जैसे हम एक दिन पहले नही ना जाने कितने दिनो से एक दूसरे को जानते हो. और मे ऐसी बेवकूफ़ अपने मन की सारी परेशानिया, बाते, उनसे कह गयी. बिना कुछ सोचे कि. लेकिन एक तरह से अच्छा ही हुआ. मे अपनी पढ़ाई के बारे मे सोच रही थी. उन्होने रास्ता सुझाया कि उनकी भी अभी ट्रैनिंग तो दो बरस की है. तब तक मे ग्रॅजुयेशन का पहला साल तो कर ही लूँगी. मे ये सोचने लगी कि क्या मुझे फिर अलग रहने पड़ेगा तो मेरे मन की भाँप, वो बोले कि अरे बुद्धू, ट्रैनिंग का अगला साल तो फील्ड ट्रैनिंग का होगा, किसी जिले मे. तो फिर हम साथ साथ ही रहेंगे. हाँ और दो तीन महीने की मसूरी मे फिर ट्रैनिंग होगी तो हम लोग यहाँ साथ साथ रहेगे और मेरे मूह से अपने आप निकल आया, और फिर यहाँ भी आएँगे. वो मुस्करा पड़े और बोले कि लेकिन थी तुम्हे उतने सस्ते मे नही छोड़ूँगा जैसे आज बच गयी. मेने शर्मा के सर झुका लिया.

फिर ड्रेस के बारे मे भी मुझसे नही रहा गया और मैं पूछ बैठी कि मुझे वेस्टर्न ड्रेस पहनने अच्छे लगते है तो हंस के वो बोले मुझे भी और शरारत से मेरे खुले खुले उभारो को घूरते बोले, तुम्हारे उपर तो वो और भी अच्छे लगेंगे. मेने शरमा के अपने टी शर्ट के बटन बंद करने की कोशिश की पर वो तो झरने की तेज धार मे टूट के बह गये थे.

उन्होने फिर कहा, "अरे यार शादी होने का ये मतलब थोड़े ही है कि तुम दादी अम्मा बन जाओ, मेरा बस चले तो जो मॉडेल्स पहनती है ना वैसे ही डेरिंग ड्रेस पहनाऊ." अब फिर लजाने की मेरी बारी थी.

उन्होने ये भी बताया कि वो अपनी खींची फोटो डेवेलप भी खुद करते है और अकादमी मे एक डार्क रूम है, उसी मे, इस लिए जो उन्होने फोटो खींची है और खींचेंगे वो 'फॉर और आइज़ ओन्ली" होंगे. मेने उनसे कुछ कहा तो नही था, पर मेरे मन जो थोड़ी बहोत चिंता थी वो भी दूर हो गयी. तभी हम दोनो ने दूर सड़क पे मुड़ती हुई कार देखी, जिससे भाभी और मम्मी को आना था. हम दोनो खड़े हो गये.. वही लोग थे.

धूप से कपड़े तो सुख गये थे पर भाभी की तेज निगाहो से बचना बहोत मुश्किल था. उनकी ओर देख के वो मुस्करा के बोली, "आख़िर आप ने मेरी ननद को गीली कर ही दिया लेकिन आप की क्या ग़लती. ऐसा साथ पाकर कोई भी लड़की गीली हो जाएगी.

raj..
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Re: कामुक-कहानियाँ शादी सुहागरात और हनीमून

Unread post by raj.. » 11 Oct 2014 17:36

पहले तो मे थोड़ा झिझकी, लेकिन मेने भी सोचा क़ि अफेन्स ईज़ बेस्ट डिफेन्स. मे झट से बोल पड़ी, "ये क्यों नही कहती कि आप का गीला होने का मन कर रहा है. ले जाइए नी भाभी को झरने के नीचे."

और वो तुरंत भाभी का हाथ पकड़ के खींच ले गये और भाभी भी खुशी खुशी झरने मे अंदर घुसने के पहले मुझे सुना के वो उनसे बोली, "तुम्हे नही लगता कहीं से जलने की बू आ रही है".

"हां भाभी लगता तो है" मेरे ओर देख के सूंघने की आक्टिंग करते हुए, नाक सिकोड के वो बोले.

"लगे रहो लगे रहो. यहाँ कोई जल वल नही रहा है." मे मुस्करा के बोली.

"देखा. तभी मे कह रहा था कि चोर की दाढ़ी मे तिनका." वो हंस के बोले.

"दाढ़ी मे या" कुछ हंस के भाभी ने उनके कान मे कहा और फिर वो दोनो हस्ने लगे. उसके बाद तो झरने के नीचे कुछ मुझे दिखा चिढ़ा के वो ऐसे लिपट चिपेट रहे थे, झरने की धार का मज़ा ले रहे थे कि पास के हनिमूनर्स जोड़े मात खा रहे थे.

मम्मी मुझसे पूछने लगी कि हम दोनो मे क्या क्या बाते हुई. मेरी मम्मी, मम्मी से बहोत ज़्यादा थी, मेरी पक्की सहेली, बेस्ट कॉन्फिडेंट, जिनसे मे कुछ नही छिपाती थी. मम्मी के मन मे बस ये फिकर लगी थी कि मे कुछ ऐसा ना गड़बॅड कर दू, कहीं कुछ ऐसा नी हो जाए कि रिश्ता टूट जाए. लेकिन जब मेने मम्मी को सारी बाते बताई वो बहोत खुश हुई खास कर पढ़ाई के बारे मे. जब भाभी और 'वो' लौट कर के आए, तो दोनो हाथ पकड़े, हस्ते हुए. भाभी की साड़ी तो पूरी तरह उनकी देह से चिपकी, खास तौर से उनका लो कट ब्लाउस, उनकी गोरी गोलाइयाँ अच्छी तरह झाँक रही थी. थोड़ी देर मे, वो चेंज कर के आई तो मुझे चिढ़ा के पूछने लगी, "क्यो बुरा तो नही माना"

"नही एकदम नही, अच्छी तरह गीली हुई कि नही"

"कुछ जगह बची रह गयी लेकिन तुम चाहे जितनी जलो, मे छोड़ने वाली नही. आख़िर नेंदोई पे सलहज का भी पूरा हक़ होता है, क्यों." उन्होने राजीव से मुस्करा के पूछा."

"एकदम भाभी, मेरे लिए तो बोनस है." मम्मी हम लोगो की छेड़छाड़ सुन कर चुप चाप मुस्करा रही थी और खाना निकालने मे लगी थी.

खाना उन लोगो ने रास्ते मे पॅक करा लिया था. खाने के बाद उन्होने दो अंगूठिया निकाली और वहीं रिंग सेरेमनी भी हो गयी.

मेने सबको बताया कि राजीव कॅमरा लाए है, फिर क्या था, फोटोग्रफी भी हुई. उन्होने पहले हम तीनो की खींची और फिर हम सब के साथ ऑटो पे लगा के सब की ली. मेने ज़िद की - कि एक फोटो मैं खींचुँगी उनकी, भाभी के साथ. भाभी तो झट से तैयार हो गयी. वो वहीं थोड़े शर्मा के दूर खड़े थे.

भाभी लेकिन एकदम पास न सिर्फ़ चिपक के खड़ी हो गयी और उनका हाथ खींच के अपने कंधे पे रख लिया. अब वो भी खूब मज़े ले रहे थे. मेने छेड़ा,

"अर्रे इतने डर क्यों रहे हैं हाथ थोड़ा और नीचे, भाभी बुरा नही मानेंगी और भाभी थोड़ा अपना आँचल" भाभी ने ठीक करने के बहाने अपने आँचल ढालका लिया और उनका हाथ खींच के अपने बड़े बड़े उभारों पे सीधे. वो बेचारे बड़े नर्वस महसूस कर रहे थे. लेकिन हम मज़े ले रहे थे. वो हाथ हटा पाते उसके पहले मेने तुरंत एक स्नेप खींच लिया. मुझे क्या मालूम था कि मैं अपनी मुसीबत मोल ले रही हू.

भाभी ने कहा अब मैं भी तो तुम दोनो की एक फोटो ले लूँ और फिर कभी धूप कभी छाँव के बहाने हम दोनो को एक दम सुनसान जगह मे ले गयी. फिर हम दोनो को खड़ा कर दिया. वहाँ से कोई भी नही दिख रहा था. राजीव ने तो बिना कहे हाथ मेरे कंधे पे रख दिया और मैं भी इतनी बोल्ड हो गयी थी कि मेने भी हाथ नही हटाया. लेकिन भाभी को इससे कैसे संतोष होता. पास आके उन्होने उनका हाथ सीधे मेरे उभारों पर, और टी-शर्ट वैसे भी अभी भी इतनी गीली थी कि सब कुछ दिखता था. उन्होने उनकी उंगलिया, मेरे 'वहाँ' के बेस पे, शरम से मेरी हालत खराब थी. मेने हाथ हटाने की कोशिश की लेकिन उन्होने फोटो खींच ली. भाभी का बस चलता तो वो होंटो से भी.. मेने बहोत मना किया लेकिन तो भी 4-5 बहोत ही 'इंटिमेट' फोटो उन्होने हम दोनो की खींच कर ही छोड़ा.

क्रमशः…………………………

शादी सुहागरात और हनीमून--4

gataank se aage…………………………………..

meri jeans peechhe se gandi ho gayi thi. peechhe mud ke wo vaha jhaadane ke bahane mere hips pe hath lagane lage. mene hans ke muskarati ankho se kaha, badamashi mat karo to bade bhole ban ke wo bole, me to sirph dhul jhaad raha tha. ha, mujhe malum hai janeb kya kar rahe hai, me boli aur unko dikhake ek baar masti se apne nitamb mataka ke aage badh gayi.

peechhe se wo bole, are sharafat ka to jamane hi nahi hai.

saamne jhairaane dikh raha tha, kai dharaye do teen kaphi moti thi baki patli. niche paani ikatha ho raha tha. paani kaphi upar se gir raha tha aur bahot hi romantic drishya tha. log kaphi the. kai to sidhe paani ke niche khade the, unme jyadatar couples the, kuch honeymooners lag rahe the aur kuch aise hi ladke ladkiyo ke jode. wo bole chalo ne jara paas se dekho. mene mane kiya to wo bole darti kyo ho, me hu ne. himmat kar ke me jharne ke paastak gayi. paani ki bundon ka phavvara hamare chehare pe pad raha tha, bahot achha lag raha tha. mene niche jhuk ke anguli me kuch paani liya aur shararat se unke chehare ke upar phenk diya. achha batata hu, wo bole. me peechhe hati par mujhe ye nahi malum ki me ek patli dhar ke paas a gayi thi. unhone mere ek hath pakad ke halke se dhakka diya aur me sidhe dhar ke niche. kaphi bhig gayi me, lekin phir kisi tarah nikal ke khadi ho gayi. muh phula ke. paas aa ke unhone poocha, "gussa ho kya."



me kuch nahi boli. "kaise manogi ok.. sorry baba.." mumjhe laga kuch jyada hogaya. mene phir puri takat se unko dhar ke niche dhakel diya. abh wo bhig rahe the aur me khilkhila rahi thi.

mene unse kaha, "aise. manungi."

"achha.." aur abh unhone mujhe bhi khinch liya. abh ham dono dhar ke niche khade bhig rahe the. unhone mujhe kas ke apni bahon me band rakha tha. sar pe paani se bachne ke liye jo mene sar hataya to sari dhar sidhe mere t shirt ke beech aur uske jor se mere upar ke dono button toot gaye aur paani ki dhar sidhe mere boobs pe aur pal bhar me hi meri lacy bra achchi tarah gili ho kar meri deh se chipak gayi aur meri saphed t shirt bhi. tabhi mere pair sarke aur mene kas ke Rajiv ko apni bahon me bhinch liya.



mere ubhar unke sine se ekdam chipak gaye. Rajiv ki ungaliya mere urojo ke ubhar se side se jane anjane chho gayi. mere sare sharir me jaise current daud gaya. pehli baar kisi mard ki ungaliya mere "wahan" toch kar gayi thi aur me ekdam sikud gayi laaj se lekin.. achha bhi bahot laga. man kar raha tha ki wah kas ke bhiench le mujhe. pehle to mene sahare ke liye use pakada tha lekin abh meri ungaliya kas ke uski peeth pe gadi huyi thi.. shayad wo bine kahe mere man ki baat bhamp gaye the aur abh unhone kas ke, mujhe pakadne ke bahane bhiench liya.

mene thoda sa chhudane ki koshish ki lekin ham dono jante the ki wo bahane hai uska ek hath to meri peeth pe kas ke mujhe pakde tha aur abh dusra mere hips pe mene agal bagal dekha to bagal me aur moti dhar me anek jode chipake huye the. jab mene jhuk kar niche dekha to meri najar ekdam jhuk gayi. ne sirph mere uroj saphed t shirt se (jo abh gili hoke puri tarah transaparent ho gayi thi) chipake huye saph dikh rahe the, balki paani ke jor se meri lacy, half cup, teen bra bhi sarak ke niche hogayi thi.



mere uttejane se kade nipple bhi (ram teri ganga maili me Mandakini jaise dikh rahi thi, waise hi balki aur saph saph). jab tak me sambhalti unhone mera hath pakad kar khincha aur ham log ek khoob moti dhar ke niche, ye dhar ek badi si chattan ki ad me thi jaha se kuch nahi dikh raha tha aur n hi ham log kisi ko dikh rahe the.

wahan phisalan se bachne ke liye abki aur kas ke usne mujhe bhinch liya aur me ne bhi kas ke unhe apni dono bahon me. mere dono teen uroj kas ke un ke sine se dabe the aur wo bhi unhe aur kas ke bhiench rahe the. bas lag raha tha ham dono ki dhadkane mil gayi hai. paani ke shor me kuch bhi suneyi nahi de raha tha. bas ras baras raha tha, aur ham dono bhieg rahe the. lag raha tha ham dono ek dusare me ghul rahe ho unka paurush mere andar chan chan kar bhin raha ho jharne me jaise laaj sharam ke sare bandan bhi ghul, dhul gaye ho.



mere dono kabutar khulne ke liye jaise chatpata rahe the, aur unkee khadi chonche sidhe unke chaude majbut sine pe jab unhone mere nitambon ko pakad ke kas ke bhincha to meri phaili jhanghon ke theek beech... unka bulj (mujhe ekdam yaad aya ki subah bhabhi kis tarah unke "khunte" ke bare me bol rahi thi) aur me baje chitakne ke aur sat gayi. shayad us samay wo aur aage badh jate to bhi me mane ne kar pati uttejane aur pehli bar pare us sukh se jise bata pane shayad abh tak mere liye mushkil hai meri halat kharaab thi.

jharne me shayad ham 10-5 minute hi rahe ho lekin jab me un ka hath pakad ke bahar nikali to laga kitne samay nikal gaya. jab bahar nikal kar meri thodi pakad ke unhone poocha bolo kaisa laga, to me sharama ke dur hat gayi aur boli, "dhatt", meri badi badi ankhe jhuki huyi thi. aur me dono hatho se apne gile urojon ko chupane ki asaphal koshish kar rahi thi.



unhone apne bag se kuch tauliye nikale. mene jaise hi hath badhaya to wo muskara ke bole,

"nahi pehle ek pose". mene bahot ne nukur ki par jis tarah wo request kar rahe the meri mane bahot der chalne wali nahi thi. achanek wo bole hands-up aur mere dono hath jo mere sine pe the upar ho gaye.

"ek dam, abh apne dono panje ek dusare me phansa ke.. ha sir ke peechhe jaise models karti hai"

me janti thi ki iske bine chutti nahi milne wali hai. mujhe gussa bhi lag raha tha aur muskan bhi aa rahi thi.



ek photo se chhutti nahi mili. ek unhone ek chattaan ke upar se chadh ke li aur dusari jamin pe baith ke. (wo to mujhe photo dekhne se pata chala ki ek me janeb ne mere gahare cleavage aur dusare me pure ubhar ki) aur ek do photo aur khinchane ke baad hi mujhe tauliya mila. ham log aisi jagah the jaha charo or unchi chattane thi, puri tarah parda tha aur khoob kadak dhup aa rahi thi. mujhe chidhate hue wo bole, "sukha du. achchi tarah ragad ragad ke sukhaunga. turant sukh jayega" mene bhi usi andaj me ankh necha ke kaha ki, wo meri or peeth kar le jab tak me ne bolu. achche bachche ki tarah baat maan ke turant wo mud gaye. apni shirt to unhone utar ke paas ke chattan pe sukhane daal di thi. uske niche unhone kuch nahi pahan rakha tha, is liye unkee puri deh saph saph. mene mud ke unkee or peeth kar li aur apni t shirt utha ke andar tak tauliye se achchi tarah poncha.



aur phir front open bra khol ke wahan bhi bra ko adjust kar ke jeans ki bhi button khol ke. me beech beech me gardan mod ke dekh le rahi thi kahi vah chupke se dekh to nahi rahe hai. par like a perfect gentleman ek baar bhi ..kankhiyo se bhi nahi. aur abh sari button band kar ke jab mene unkee or dekha to unke sharir ki ek ek masals jara bhi fat nahi, kamar ekdam jo kahte hai ne kahar kati, sher ki tarah patli kuch kuch male models jo dikhate hai waise hi.. ek baar phir meri deh me waisi hi sihairaan hone lagi jaise unkee bahon me jharne ke niche sar jhatak ke me chupke se dabe paanv unke peechhe gayi aur peechhe se kas ke unhe achanek pakad liya lekin jaise hi meri golaiya meri ti shart ke andar se hi sahi, unke peeth se lag rahi thi, mujhe lag raha tha meri ankhe apne aap mund rahi hai. wo achanek mude aur unhone mujhe tham liya.



aur ham dono besaakhta hasne lage. unhone apni shirt uthayi aur paas me hi ek ghas ke maidan ki or daud pade aur me bhi unke peechhe peechhe. wo let gaye ghutane mod ke. me bhi unke ghutane pe peeth tek unkee or mumh kar ke batiyane lagi. jade ki gunguneti, halki chikoti katati dhup, paas me jharne ka khilkhilane ka shor, khul kar duniya ko bhul aapas me mast saravar me keli krida karte hans ke jodo ki tarah aurat mard, ekdam rumani mahaul ho raha tha. aur me unse aise ghul mil ke baat kar rahi thi jaise ham ek din pehle nahi ne jane kitne dino se ek dusre ko jante ho. aur me aisi bewakuph apne man ki sari pareshaniya, bate, unse kah gayi. bine kuch soche ki. lekin ek tarah se achha hi hua. me apni padhai ke bare me soch rahi thi. unhone rasta sujhaya ki unkee bhi abhi training to do baras ki hai. thi tak me graduation ka pahala saal to kar hi lundgi. me ye sochne lagi ki kya mujhe phir alag rehne padega to mere man ki bhamp, wo bole ki are buddhu, training ka agla saal to field training ka hoga, kisi jile me. to phir ham saath saath hi rahenge. ha aur do teen mahine ki masuri me phir training hogi to ham log yaha saath saath rahege aur mere muh se apne aap nikal aya, aur phir yaha bhi ayenge. wo muskara pade aur bole ki lekin thi tumhe utane saste me nahi chhodunga jaise aaj bach gayi. mene sharma ke sar jhuka liya.



phir dress ke bare me bhi mujhse nahi raha gaya aur me puch baithi ki mujhe western dress pehanne achche lagte hai to hans ke wo bole mujhe bhi aur shararat se mere khule khule ubharo ko ghurte bole, tumhare upar to wo aur bhi achche lagige. mene sharama ke apne t shirt ke button band karne ki koshish ki par wo to jharne ki tej dhaar me tut ke bah gaye the.

unhone phir kaha, "are yaar shaadi hone ka ye matalab thodi ki tum daadi amma ban jao, mera bas chale to jo models pehanti hai ne waise hi daring dress pahaneu." abh phir lajane ki meri badi thi.



unhone ye bhi bataya ki wo apni khinchi photo develop bhi khud karte hai aur acadamy me ek dark room hai, usi me, is liye jo unhone photo khinchi hai aur khinchenge wo 'for our eyes only" honge. mene unse kuch kaha to nahi tha, par mere man jo thodi bahot chinta thi wo bhi dur ho gayi. tabhi ham dono ne dur sadak pe mudti huyi car dekhi, jisse bhabhi aur mummy ko ane tha. ham dono khade ho gaye.. wahi log the.

dhop se kapade to sukh gaye the par bhabhi ki tej nigaho se bachne bahot mushkil tha. unkee or dekh ke wo muskara ke boli, "akhir aap ne meri nanad ko geeli kar hi diya lekin aap ki kya galati. aisa saath paakar koyi bhi ladaki geeli ho jayegi.

pehle to me thoda jhijhaki, lekin mene bhi socha ki offence is best defence. me jhat se bol padi, "ye kyon nahi kahti ki aap ka geela hone ka man kar raha hai. le jaiye nea bhabhi ko jharne ke neeche."

aur wo turant bhabhi ka haath pakad ke kheench le gaye aur bhabhi bhi khushi khushi jharne me andar ghusne ke pehle mujhe sune ke wo unse boli, "tumhe nahi lagta kahin se jalne ki boo aa rahi hai".

"haan bhabhi lagta to hai" mere or dekh ke sunghne ki acting karte huye, neak sikod ke wo bole.

"lage raho lage raho. yahan koyi jal wal nahi raha hai." me muskara ke boli.

"dekha. tabhi me kah raha tha ki chor ki daddhi me tinka." wo hans ke bole.

"daddhi me ya" kuch hans ke bhabhi ne unke kaan me kaha aur phir wo dono hasne lage. uske baad to jharne ke neeche kuch mujhe dikha chidha ke wo aise lipat chipat rahe the, jharne ki dhaar ka maja le rahe the ki paas ke honeymooners jode maat kha rahe the.

mummy mujhse puchne lagi ki hum dono me kya kya bate huyi. meri mummy, mummy se bahot jyada thi, meri pakki saheli, best confidant, jinse me kuch nahi chipati thi. mummy ke man me bas ye phikar lagi thi ki me kuch aisa nea gadhbad kar du, kahin kuch aisa nea ho jaye ki rishta toot jaye. lekin jab mene mummy ko sari bate batayi wo bahot khush huyi khas kar padhai ke bare me. jab bhabhi aur 'wo' laut kar ke aye, to dono haath pakde, haste hue. bhabhi ki saree to puri tarah unkee deh se chipki, khas taur se unka low cut blouse, unkee gori golaiyan achchi tarah jhank rahi thi. thodi dher me, wo change kar ke aayi to mujhe chidha ke puchne lagi, "kyo bura to nahi mane"



"nahi ekdam nahi, achchi tarah geeli huyi ki nahi"

"kuch jagah bachi rah gayi lekin tum chahe jitne jalo, me chhodne waali nahi. akhir nendoyi pe salhaj ka bhi poora haq hota hai, kyon." unhone Rajiv se muskara ke poocha."

"ekdam bhabhi, mere liye to bonus hai." mummy hum logo ki chhedchhad sun kar chup chap muskara rahi thi aur khane nikalne me lagi thi.

khane un logo ne raste me pak kara liya tha. khane ke bad unhone do anguthiya nikali aur wahin ring ceremony bhi ho gayi.

mene sabko bataya ki Rajiv camera laye hai, phir kya tha, photography bhi huyi. unhone pehle hum tino ki khinchi aur phir hum sab ke saath auto pe laga ke sab ki li. mene jid ki - ki ek photo mai khinchungi unki, bhabhi ke saath. bhabhi to jhhat se taiyaar ho gayi. wo wahin thode sharma ke door khade the.

bhabhi lekin ekdam paas n sirph chipak ke khadi ho gayi aur unka haath kheench ke apne kandhe pe rakh liya. abh wo bhi khub maje le rahe the. mene chheda,

"arre itne darr kyon rahe hain haath thoda aur neeche, bhabhi bura nahi manenge aur bhabhi thoda apne aanchal" bhabhi ne theek karne ke behane apne aanchal dhalka liya aur unka haath kheench ke apne bade bade ubharon pe seedhe. wo bechare bade nerwous mehsoos kar rahe the. lekin hum maje le rahe the. wo haath hata pate uske pehle mene turant ek snep kheench liya. mujhe kya malum tha ki mai apni musibat mol le rahi hon.

bhabhi ne kaha abh mai bhi to tum dono ki ek pair le loon aur phir kabhi dhop kabhi chhaien ke behane hum dono ko ek dam sunsaan jagah me le gayi. phir hum dono ko khada kar diya. wahan se koyi bhi nahi dikh raha tha. Rajiv ne to bine kahe haath mere kandhe pe rakh diya aur mai bhi itni bold ho gayi thi ki mene bhi haath nahi hataya. lekin bhabhi ko isse kaise santosh hota. paas aake unhone unka haath seedhe mere ubharon par, aur t-shirt waise bhi abhi bhi itni geeli thi ki sab kuch dikhta tha. unhone unki ungaliya, mere 'wahan' ke base pe, sharam se meri haalat kharaab thi. mene haath hatane ki koshish ki lekin unhone photo kheench li. bhabhi ka bas chalta to wo honto se bhi.. mene bahot mane kiya lekin to bhi 4-5 bahot hi 'intimate' photoen unhone hum dono ki kheench kar hi chhoda.

kramashah…………………………