एक अनोखा बंधन

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The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 08:46

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अब आगे....

उस एक पल के लिए मेरे ऊपर वासना बेकाबू हो गई.. मैं सब दर्द भूल गया था| मैं बेतहाशा भौजी के होंटों को चूसता रहा... भौजी इसका विरोध बिलकुल नहीं कर रही थी... धीरे-धीरे वो भी मेरा सहयोग करने लॉगिन| उन्होंने अपना मुख हल्का सा खोला... बिना मौका गंवाए मैंने उनके मुख में अपनी जीभ प्रवेश करा दी! जब उन्होंने अपनी जीभ से जवाबी हमला किया तो मैंने उनकी जीभ को अपने दातों टेल दबा दिया और रसपान करने लगा| मैं काबू से बहार होगया था... मेरे हाथ अब फिसलते हुए भौजी के कंधो तक आगये थे.. मैंने झुक के भौजी के दायें स्तन को अपने होठों की गिरफ्त में ले लिए| अपने अंदर भड़की वासना के कारन मैंने बिना सोचे समझे भौजी के स्तन को काट लिया! दर्द इतना तीव्र था की एक पल के लिए तो भौजी कसमसा के रह गयीं.. परन्तु उन्होंने मुझे अपने से दूर नहीं किया... बल्कि अपनी ओर खींचने के लिए मेरे सर को अपने स्तन पे दबा दिया| मैं उनके स्तन को किसी शिशु की भाँती पीने लगा और अब मेरा हाथ उनके बाएं स्तन का मर्दन करने लगा था| उनका बयां निप्पल मेरी उँगलियों के बीच था और मैं उसे भी रह-रह के निचोड़ने लगा था.. जब मैं ऐसा करता तो भौजी की सिसकारी छूट रही थी....

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ... अम्म्म्म ... हन्ंणणन् "

मैं भौजी के सिस्कारियों से उत्तेजित हो रहा था और उनके दायें निप्पल को दाँतों से दबाने लगा| मैं नहीं जानता था की मैं अनजाने में भौजी को पीड़ा दे रहा हूँ| जब मेरा मन उनके दायें स्तन से भर गया तब मैंने उनके बाएं स्तन को अपने मुख की चपेट में ले लिया| अब मैं उस स्तन का भी स्तनपान करने लगा और दायें स्तन का मर्दन अपने हाथों से करता रहा| कभी चूसता ... कभी काटता ... कभी निप्पल को निचोड़ देता| जब मेरा मन भर गया तब मैंने भौजी के स्तनों की हालत देखी| दोनों स्तन लाल हो चुके थे... और भौजी के मुख पे आंसूं की कुछ बूँदें छलक आईं थी| परन्तु उन्होंने मुझसे इसकी जरा भी शिकायत नहीं की.. वो चाहती तो मुझे रोक सकती थीं.. या बता सकती थीं की मानु मुझे दर्द हो रहा है| परन्तु उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.... मैं कुछ क्षण तक उन्हें देखता रहा ... निहारता रहा.... सोचने लगा की क्या एच में वो मुझे इतना प्यार करती हैं?

मैं: भौजी आपको दर्द हो रहा था न?

भौजी: नहीं तो... तुम मुझे प्यार कर रहे थे, मार थोड़े ही रहे थे जो दर्द होता| पर तुमने ऐसा क्यों पूछा??

मैं: आप झूठ बोल रही हो... आपके स्तन पे बने ये लाल निशान कुछ और ही कहानी बता रहे हैं|

भौजी: ये तो तुम्हारे प्यार की निशानी है... जब तुम नहीं होगे तब ये मुझे टुंगरे साथ बिठाये हर लम्हे को याद दिलाएंगे|

इतना कह के भौजी निचे घुटनों के बल बैठीं और मेरी पेंट खोल दी| मेरा लंड बहार निकला और उसे पहले तो चूमा| फिर अपनी जीभ के बीच वाले भाग से एक बार चाटा....

"स्स्स्स... अंह्ह्ह" मेरी सिसकारी छूटी|

अब उन्होंने अपना मुख पूरा खोला और जीभ बहार निकली और जितना हो सकता था मेरे लंड को अपने मुख में भर लिया| मेरा लंड उनकी जीभ और तालु के बीच में रगड़ा जा रहा था... इतना मज़ा आ रहा था की मैं अपने पंजों के बल खड़ा हो गया| शरीर का हर रोंगटे खड़ा हो चूका था| भाभी ने धीरे-धीरे लंड को मुख में भरे अपनी गर्दन को आएगे पीछे करना शुरू किया| ऐसा लगा जैसे भौजी आज मेरा सारा रास पी जाएँगी!!! मैं अब किसी भी समय छूटने वाला था... मैंने भौजी को बीच में ही रोक दिया| भौजी को खड़ा किया... बिना उनकी साडी उतारे उनकी बायीं टांग मैंने अपने हाथ में ले ली और भौजी ने अपने हाथ से मेरे लंड को सही दिशा दिखाई| जैसे ही मुझे दिशा का ज्ञात हुआ मैंने एक जोरदार धक्का मारा... धक्के की तीव्रता इतनी तेज थी की हमारा बैलेंस बिगड़ा और मैं और भौजी दिव्वार से जा टिके| अब भौजी की नंगी पीठ दिवार से लगी थी और सामने से उनके स्तन मेरी छाती में धंसे हुए थे| भौजी बड़ी जोर से छटपटाई.. मैं भी हैरान था की आखिर ऐसा कौन सा तगड़ा जोर लगा दिया मैंने की भौजी छटपटा गईं,

मैं: आप ठीक तो हो ना?

भौजी अपने आप को संभालते हुए बोलीं : "हाँ"

मैं: तो आप एक डैम से छटपटाने क्यों लगीं?

भौजी: वो बस ऐसे ही.. तुम प्लीज मत रुको!!!

मैंने सोचा शायद मैंने वासना के आवेश में आके कुछ ज्यादा ही जोर लगा दिया होगा| मैंने अपनी गति धीरे-धीरे राखी... हर झटके से भौजी के स्तन हिल जाते और भौजी की करहाने की आवाज आने लगती:

"स्स्स्स....अंंंंंंं ... मानु......अह्ह्ह्हह्ह"

उनके दोनों हाथ मेरे सर के बालों में फिर रहे थे... और मुझे बड़ा अच्छा महसूस हो रहा था| वासना बड़ी जोर-शोर से हिलोरे मार रही थी और भौजी भी अलगःभाग चरम सीमा तक पहुँच गयी थीं| उनकी आँखें बंद थीं और वो बस सिस्कारियां लिए जा रही थी....

"आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह,ssssssssssssssssssss स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स "

अब मैं कोई और पोजीशन इख्तियार करना चाहता था तो मैंने अपना लंड बहार खींच लिया ... भौजी को पलटा और नीचे झुकाया जिससे वो घोड़ी के सामान झुक गयीं, मैंने अपना लंड पीछे से उनकी योनि में डाल दिया, और फिर से धक्के लगाना शुरू कर दिया| भौजी चार्म सीमा पर पहुँच गई और स्खलित हो गईं| उनका रास बहता हुआ बहार आया और मेरे लंड को पूरी तरह भिगो दिया| गर्शन काम हो चूका था और मैं अब भी झटके दिए जा रहा था|

भौजी की पीठ चाँद की रौशनी में चमक रही थी और मेरा मन किया की मैं उसे एक बार चुम लूँ| मैंने भौजी की पीठ से बाल हटाया और जो मैंने देखा उससे मैं सन्न रह गया| भौजी की पीठ बेल्ट की मार से बने दो निशान थे... ये देखते ही मेरी आँखों में खून उत्तर आया और मैं छिटक के भौजी से दूर हो गया| अब मुझे आभास हुआ की जब मैंने पहली बार झटका मारा था तो भौजी क्यों छटपटाई थीं| उनकी जख्मी नंगी पीठ दिवार से रगड़ गई थी जिससे उन्हें बहुत दर्द हुआ होगा| इधर भौजी को एहसास हुआ की मैं अचनका रुक क्यों गया तो वो पीछे मूड के मुझे देखने लगीं|

भौजी: क्या हुआ मानु?

मैं: आपकी पीठ पे वो निशान... आज सुबह के हैं ना?

भौजी: हाँ मानु... तुम्हारे आने से पहले उन्होंने मुझे...

मैं: और आपने मुझे ये बात बताना जर्रुरी नहीं समझा?

भौजी: नहीं मानु... ये घाव तो बहुत थोड़े हैं| तुमने तो मुझपे अपने आप को कुर्बान कर दिया था|

मैं अंदर कमरे में गया और भौजी की पथ पे लगाने के लिए मलहम ले आया|

भौजी: ये क्या कर रहे हो?

मैं: आपकी पीठ पे दवाई लगा रहा हूँ|

भौजी: पर तुम तो मुझे प्यार कर रहे थे, और तुम तो अभी झड़......

मैं: वो सब बाद में, पहले आपकी पीठ में दवाई लगाना जरुरी है| मेरी वजह से आपका जखम और उभर गया है|

मैंने भौजी को खींच के उनकी चारपाई पर पेट के बल लेटाया और उनका घाव साफ़ कर के उसपे मलहम लगाया| भौजी ने बड़ी कोशिश की कि मैं पहले सम्भोग पूरा करूँ पर मेरा मन उनकी दशा देख के फैट गया था| इतना दुःख तो मुझे तब भी नहीं हुआ था जब मैंने उन्हें बुखार से तपते हुए देखा था| अब मुझे समझ आ रहा था कि भौजी क्यों चाहती थी कि मैं उन्हें भगा के ले जाऊँ| इस समय भौजी को सच में बहुत दर्द हो रहा था ... और मैं बेवकूफ उन्हें और दर्द देने की सोच रहा था| दवाई लगाने के बाद मैं उन्हें पंखा करने लगा ताकि ठंडी हवा से उनके घाव को कुछ आराम मिले| मन ही मन मेरे अंदर गुस्सा भी उबलने लगा था और मैंने एक फैसला किया|

मैं: मैंने एक फैला किया है|

भौजी: क्या? स्स्स्स्स

मैं: कल मैं आपको और नेहा को भगा ले जाऊँगा|

भौजी: नहीं मानु.. तुम अभी गुस्से में हो| हम कल बात करते हैं|

मैं: नहीं कल ऑफर होने से पहले जब सभी घरवाले खेत में काम करने निकल जायेंगे तब हम तीनों यहाँ से भागेंगे|

भौजी: मानु, तुम्हें मेरी कसम .. ऐसी बात मत करो|

मैंने झल्लाते हुए कहा: "तो आपको यहाँ मरने के लिए छोड़ दूँ?"

बस इतना कहते हुए मैं उठा और अपनी चारपाई पे जाके पेट के बल लेट गया| अब भौजी ने मुझे अपनी कसम दी थी इसलिए मैं अभी तो चुप हो गया पर दिमाग में भौजी को भगाने का प्लान बना चूका था|

सुबह हुई, मैं फटा-फ़ट उठा... शायद पीठ के घाव कुछ भर गए थे, क्योंकि दर्द कुछ कम था| बहार आया तो बड़के दादा और बड़की अम्मा (बड़े चाचा और चाची) चाय पी रहे थे| उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया:

बड़के दादा: आओ मुन्ना... बैठो| कैसी तबियत है? घाव कुछ भरे लगते हैं.... दर्द कम हुआ? नहीं तो चलो डॉक्टर के ले चलें|

मैं: नहीं दादा... अब दर्द कम है|

बड़की अम्मा: लो चाय पियो|

मैं: नहीं अम्मा अभी मुंह नहीं धोया, पूजा भी नहीं की|

बड़के दादा: मुन्ना, हमें कल शाम को अजय ने बताया ...जो कुछ हुआ उसके लिए हम बहुत शर्मिंदा हैं|

मैं: नहीं दादा... ऐसा मत कहिये| मैं भौजी को दवाई देने जा रहा था जब मुझे चीखने-चिल्लाने की आवाज आई| मैं दौड़ा-दौड़ा वहां पहुँचा... आगे जो हुआ वो आपको पता ही है|

बड़के दादा: तुम ये बात छुपाने को क्यों कह रहे थे... गलती चन्दर की है| सजा तो उसे मिलेगी ही... चाहे वो सजा मेरा छोटा भाई दे या मैं| हम तुम्हारे पिताजी को सब सच बताएँगे...

मैं: जैसा आपको ठीक लगे| मैं तो बस यही चाहता था की इस बात पे ज्यादा बवाल न हो| वैसे अम्मा आपने भौजी का हाल तो पूछा ही नहीं?

बड़की अम्मा: क्यों? उसे क्या हुआ? चोट तो तुम्हें लगी थी|

मैं: दरअसल अम्मा, मेरे पहुँचने से पहले भैया ने भौजी पे हाथ उठा दिया था| उनकी पीठ पे भी बेल्ट के दो जख्म बने हैं|

बड़की अम्मा: हाय राम... बहु तुमने हमें क्यों नहीं बताया?

भौजी: नहीं अम्मा.... ज्यादा दर्द नहीं था|

मैं: तो आप रात में चीखे क्यों था? अम्मा भौजी करवट लेके लेटी थी, जैसे ही ये सीढ़ी लेटी एकदम से चीख पड़ीं और उठ के बैठ गईं|

बड़की अम्मा: चल बहु अंदर चल, मैं मलहम लगा दूँ|

मैं भी वहां से उठा बड़े घर की और चल दिया| समय था की मैं अपने बनाये प्लान को अंजाम दूँ... मैंने जल्दी-जल्दी अपने दो-चार कपडे पैक किये| अगला काम था पैसे का जुगाड़ करना, मेरे पास पर्स में करीब दो सौ रूपए थे| उस समय ATM कार्ड तो था नहीं.. हाँ परन्तु पिताजी के पास MULTI CITY चेक की किताब थी और मुझे पिताजी के दस्तखत करने की नक़ल बड़े अच्छे से आता था| मैंने किताब से एक चेक फायदा और उसमें एक लाख रुपये की राशि भर दी| जल्दी से नह धो के तैयार हुआ, पूजा की और भगवान से दुआ मांगी की मुझे मानसिक शक्ति देना की मैं अपनी नई जिम्मेदारी निभा सकूँ| जब मैं भौजी के पास पहुँचा तो अजय भैया खेत जाने के लिए निकलने वाले थे:

अजय भैया: मानु भैया, चाचा का फ़ोन आया था वे चार बजे तक आएंगे|

मैं: अच्छा.. और चन्दर भैया?

अजय भैया: उनका पता नहीं.. मैंने मां को फ़ोन किया था| उन्होंने बताया की वो वहीँ हैं और अभी तक सो रहे हैं.. मैंने उन्हें कल हुए हादसे के बारे में भी बताया| उन्हें भी जानके बहुत अफ़सोस हुआ....

मैं: भौजी चाय दे दो|

भैया हंसिया ले के खेत की ओर निकल गए| अब घर में केवल मैं, नेहा ओर भौजी ही थे|

मैं: चलो जल्दी से तैयार हो जाओ?

भौजी: क्यों?

मैं: भूल गए रात को मैंने क्या कहा था?

भौजी मेरा हाथ पकड़ के मुझे अपने घर की ओर खींचती हुई ले गई| मुझे चारपाई पे बैठाया ओर बोलीं:

"मानु तुम्हें क्या हो गया है? क्यों तुम ऐसी बातें बोल रहे हो? तुम भी जानते हो की नई जिंदगी शुरू करना इतना आसान नहीं होता? हम कहाँ रहेंगे? क्या खाएंगे? और कहाँ जायेंगे? नेहा की परवरिश का क्या? है तुम्हारे पास इन बातों का जवाब?"

मैं: भौजी मैंने सब सोच लिया है| हम यहाँ से सीधा दिल्ली जायेंगे, वहां मेरा एक भाई जैसा दोस्त है, वो हमारा कुछ दिनों के रहने का इन्तेजाम कर देगा| उसके मामा जी जयपुर में रहते हैं, वही मेरी नौकरी भी लगवा देंगे| आप, मैं और नेहा जयपुर में ही रहेंगे|

भौजी: और इसके लिए कुछ पैसे भी तो चाहिए होंगे? वो कहाँ से लाओगे... मेरे पास तो कुछ जेवर ही हैं जो मेरे माँ-बापू ने दिए थे|

मैं: उनकी जर्रूरत नहीं पड़ेगी... मेरे पास लाख रूपए का चेक है, जिसे हम भारत के किसी भी बैंक से कॅश करा सकते हैं| इतने पैसों से हमारा गुजारा हो जायेगा... धीरे-धीरे मैं कमाने लगूँगा ओर फिर सब कुछ ठीक हो जायेगा|

भौजी: और ये पैसे आये कहाँ से तुम्हारे पास?

मैं: पिताजी के बैंक से! पर आप चिंता मत करो मैं ये पैसे उन्हें लौटा दूँगा|

भौजी: मुझे तुम्हारी बात पे भरोसा है, पर मेरी एक बात का जवाब दो: जब हम यहाँ से भाग जायेंगे तो तुम्हारे माँ-पिताजी का क्या होगा? वो किसी को मुँह दिखाने लायक नहीं रहेंगे ... हमारी कितनी बदनामी होगी| अगर मैं ये मान भी लूँ की तुम्हें इस बात का कोई फर्क नहीं पड़ता तो मुझे एक बात बताओ, हम जहाँ भी रहेंगे वहां लोग तो होंगे ही| हम जंगल में तो रहने नहीं जा रहे, तुम्हारी उम्र सोलह्-सत्रह साल होगी और मेरी चौबीस साल| तुम जमाने से क्या कहोगे? ये सच तो तुम छुपा नहीं सकते? और इसका असर नेहा की जिंदगी पे भी पड़ेगा| क्या तुम यही चाहते हो? अगर हाँ तो मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए अभी तैयार हूँ|

इतना कह के भौजी ने जल्दी-जल्दी अपने कपडे सूटकेस में फेंकने शुरू कर दिए|

मैं: नहीं... पर मैं आपको इस नर्क में अकेला भी तो नहीं छोड़ सकता| आज तो मैं था तो मैंने आपको बचा इया... कल जब मैं नहीं रहूँगा तब? तब आपकी रक्षा कौन करेगा?

भौजी: मानु मुझे हमारे प्यार पे पूरा भरोसा है... और भगवान पर भी| वही मेरी और नेहा की रक्षा करेगा|

अब बहंस करने का कोई फायदा नहीं था.... भौजी की बातों में सच्चाई थी| हमारे जैसे देश में जहाँ लोग पति-पत्नी के बीच के प्यार को नहीं बल्कि उनकी उम्र, कद, काठी इत्यादि को ज्यादा मानता देते हैं ऐसे देश में हमारे प्यार के लिए कोई जगह नहीं थी| मैं गुम-सुम सा बैठा रहा.. और भौजी दूसरी चारपाई पर बैठी मुझे देख रही थी|
जब मैं उठने को हुआ तो भौजी मेरे पास आइन और मुझे गले लगा लिया| वो खुद को रोने से नहीं रोक पाईं.. मैंने उन्हें चुप कराया:

मैं: अब आप चुप हो जाओ हम कहीं नहीं जा रहे! ये लो...

ये कहते हुए मैंने चेक फाड़ डाला और बात घुमा दी ...

मैं: कल जो आप ने मलहम लगाया था न उससे काफी आराम मिला| थोड़ा और लगा दो ....

भौजी ने पहले मुझे मलहम लगाया उसके बाद मैंने भौजी को मलहम लगाया| हाथ-मुँह धो के हम बाहर आ गए| भौजी खाना बना रही थी और मैं पास की चारपाई पर लेटा उन्हें निहार रहा था| अब तो मुझे भौजी और नेहा की और ज्यादा चिंता होने लगी थी.... मेरी अनुपस्थिति में भैया दोनों का क्या हाल करेंगे ये सोच के ही डर लगता था|

भौजी: क्या सोच रहे हो मानु?

मैं: कुछ नहीं|

भौजी: रात का अधूरा काम कब करोगे?

मैं: अभी मन नहीं कर रहा|

भौजी: तुम तो मन मार लेते हो, पर मेरे मन का क्या? वो तो तब ही खुश होता है जब तुम खुश रहते हो|

मैं: भौजी मैं....

इससे पहले की मैं और कुछ कहता पिताजी ने आके मुझे डरा दिया| भौजी हींहोने घूँघट हटा रखा था, पिताजी को देखते ही डेढ़ हाथ का घूँघट काड लिया|


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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 08:47

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अब आगे....

पिताजी: और लाड़-साहब फैले पड़े हो? हो गया आराम या अभी बाकी है?

इतना कहते हुए पिताजी ने थपकी देने के लिए मेरी पीठ पे ज़ोरदार हाथ मार| हाथ लगते ही मेरी चीख निकल पड़ी:

"आअह्ह्ह"

भौजी भागती हुई मेरे पास आईं और पिताजी को सारा हाल सुनाया, इधर मैं दर्द से करहा रहा था| पूितजी ने मेरी टी-शर्ट उठाई और मेरी पीठ का हाल देख के माँ और पिताजी ने सर पीट लिया|

माँ: हाय राम!!! मेरे बेटे की क्या हालत कर दी| डॉक्टर के पास गया था?

मैं: नहीं... भौजी ने मलहम लगाया था| उससे कुछ आराम है.. PAIN किलर भी ली थी|

पिताजी: बड़े भैया कहाँ हैं?

भौजी: चाचा वो खेत गए हैं|

पिताजी: मैं वहीँ जाता हूँ... तब तक तुम दोनों इसका ख्याल रखो| इसे डॉक्टर के नहीं जाना तो ना सही, मैं डॉक्टर को यहीं ले आता हूँ|

माँ मेरे पास बैठी सर पे हाथ फेर रहीं थीं... और भौजी खाना बना रहीं थी| खाना लघभग तैयार था.. दाल में छौंका लगा और खाना तैयार| भौजी ने माँ से कहा की आप नह धो लो तब तक वो मेरे पास बैठेंगी| माँ स्नान करने चलीं गईं और भौजी मेरी पीठ पे फूंक मार रहीं थी| उनकी ठंडी-ठंडी फूंक से मुझे बहुत आराम मिला|

पिताजी डॉक्टर को ले आये, साथ-साथ बड़के दादा (बड़े चाचा), बड़की अम्मा (बड़ी चाची) और अजय भैया, सभी अपना काम काज छोड़के आ गए| डॉक्टर मेरे पास आया और मुझसे अंग्रेजी में बात करने लगा:

डॉक्टर: Hey Man! How are you? (दोस्त क्या हाल है तुम्हारा?)

मैं: In Pain…. AAH!!! (दर्द हो रहा है डॉक्टर साहब!)

डॉक्टर: oh yeah, your dad told me about your Bravery Stunt. You did a great job, you seem to care a lot about your Bhabhi! (हाँ, तुम्हारे पिताजी ने मुझे रास्ते में तुम्हारी वीरता के बारे में सब बताया| शाबाश!!! तुम अपनी भाभी का ज्यादा ही ध्यान रखते हो?)

मैं: Yeah, she’s my best friend. (जी, क्योंकि ये मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं|)

डॉक्टर: What I see, I can see a different bond between you two. Anyways your wound’s all messed up.. did you put any Gel on the affected area? (मुझे ना जाने क्यों ऐसा महसूस होता है की तुम दोनों के बीच में एक अटूट रिश्ता है| खेर, तुम्हारे पीठ के जख्मों की हालत अच्छी नहीं है, क्या तुमने इस्पे कोई मलहम लगाईं थी?)

मैं: That’s just some Ayurvedic Ointment. (हाँ, कोई आयुर्वेदिक मलहम लगाईं थी|)

डॉक्टर: You shouldn’t just apply anything without first consulting a qualified doctor. You could have phoned me? (बिना किसी डॉक्टर की राय लिए तुम्हें कोई भी दवाई नहीं लगानी चाहिए| फिर तुम मुझे फ़ोन भी तो कर सकते थे|)

मैं: Actually sir this all happened so fast, almost forgot that Ive your number. Extremely Sorry! (दरअसल ये सब इतनी अचानक हुआ की मुझे याद ही नहीं रहा की मेरे पास आपका नंबर भी है| मुझे माफ़ कर दीजिये|)

डॉक्टर: No Need to be sorry, I’ll have to first clean your wound with Spirit, after that I’ll have to do some dressing. No doubt that it’ll hurt a lot. (माफ़ी मांगने की कोई आवश्यकता नहीं है| अब मुझे पहले तुम्हारे घावों को स्पिरिट से धोना होगा उसके बाद मुझे इनकी पट्टी करने होगी| इसमें कोई दो राय नहीं की तुम्हें दर्द बहुत होगा| )

मैं: Okay, I think I can handle that much pain. (जी ठीक है, मैं दर्द बर्दाश्त कर लूँगा|)

जब मैं और डॉक्टर अंग्रेजी में बात कर रहे थे तो घर के सभी मुँह खोले हमें उत्सुकता से देख रहे थे| क्योंकि आज पहली बार डॉक्टर मरीज को चेक करने आया था, वरना हमेशा ही बीमार गाँव वालों को ही डॉक्टर के पास जाना पड़ता था ऊपर से डॉक्टर और मैं अंग्रेजी में गुफ्तगू कर रहे थे| इस से एक बात तो तय थी की पिताजी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया था, आखिर उनके खानदान में मैं ही एक अकेला ऐसा लड़का था जो दसवीं से ज्यादा पढ़ा था और वो भी अंग्रेजी मीडियम स्कूल से! भौजी के चेहरे से लग रहा था की उन्हें भी मुझपे नाज था... गर्व था.. इसलिए वो भी हलके-हलके मुस्कुरा रहीं थी|

डॉक्टर बड़े संभाल-संभाल के अपने हाथ चला रहा था पर जब स्पिरिट घावों में लगती तो बहुत जलन होती| मैं बस दाँत पीस के रह जाता... डॉक्टर ने मेरी पट्टी कर दी और मुझे एक इंजेक्शन देने लगा:

डॉक्टर: I need to give you this injection, it’s got some morphine so you’ll feel a bit better. Its simply to lessen your pain. (मुझे तुम्हें ये इंजेक्शन लगाना होगा, इससे तुम्हारा दर्द कुछ काम होगा|)

मैं: okay Doc, but I’ve a request. Actually during that incident she was also hurt, there are two belt marks on her back but she won’t let you examine! So if you don’t mind can you gimme some pain killers for her and some spirit and bandages. I’ll ask my Chachi and she’ll do the dressing. Don’t worry we’ll pay you for that! Just add it in the bill and my Dad will pay it but please don’t tell him about what I just said.
(ठीक है डॉक्टर साहब, पर मेरी आपसे एक गुजारिश है| दरअसल जब वो हादसा हुआ तो भाभी को भी चोट आई थी| उनकी पीठ पे भी दो बेल्ट के निशान हैं, वो आपसे इसका इलाज किसी भी हालत में नहीं कराएंगी| क्या आप मुझे कुछ PAIN KILLER और थोड़ी स्पिरिट और पट्टी दे सकते हैं, मैं अपनी चाची से कह के उनकी पट्टी करवा दूँगा| आप फीस की चिंता ना करें वो हम दे देंगे, बस आप टोटल बिल में ही जोड़ देना मेरे पिताजी आपको पैसे दे देंगे| और हाँ ये बात आप प्लीज पिताजी से मत कहना|)

डॉक्टर: Usually I don’t do this but since you’ve asked me so politely I’ll give you the medicine. (मैं आम तौर पे ऐसा नहीं करता पर चुकी तुमने बड़े प्यार से कहा है तो इसलिए मैं दवाई दे देता हूँ|)

मैं: Thank You Doc. (शुक्रिया डॉक्टर साहब|)

डॉक्टर ने मुझे दवाई अलग से दी और अपने पैसे ले के चला गया| उसके जाने के बाद सभी जन मुझे घेर के बैठ गए और पूछने लगे की क्या बात हुई हम दोनों के बीच| मैंने सभी को सब बाताई सिवाय "मेरा भौजी का ख्याल रखने के"| सभी बहुत खुश थे, माँ पिताजी को भी तसल्ली थी की अब मैं जल्दी अच्छा हो जाऊँगा| तभी वहां माधुरी भी आ गई उसने जब मेरी ऐसी हालत देखी तो अपनी चिंता जाहिर करते हुए पूछने लगी की ये सब कैसे हुआ| माँ ने उसे साड़ी बात बताई, उसने कनखी नजर से भौजी को ताड़ा, जैसे उन पे गुस्सा हो और फिर चुप-चाप चली गई| मैंने उसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी.... भोजन का समय हो गया था, सब ने भोजन किया| भोजन के उपरान्त बड़के दादा, बड़की अम्मा और अजय भैया वास खेत चले गए काम करने के लिए और माँ-पिताजी बड़े घर जा रहे थे सोने| उन्होंने मुझे अपने साथ चलने को कहा पर मैंने ये कह के टाल दिया की "मैं धुप में नहीं जा रहा" | पिताजी भौजी को ध्यान रखने के लिए बोल गए| आप भौजी के घर में सिर्फ मैं, नेहा और भौजी ही बचे थे| दरवाजा खुला था, भौजी अपनी चारपाई पर लेटी थीं और मैं अपनी चारपाई पे लेटा था बीच वाली चारपाई पे नेहा लेटी थी|

मैं: ये लो आपके लिए....

ये कहते हुए मैंने भौजी को डॉक्टर के द्वारा दी हुई स्पिरिट और पट्टी दी|

भौजी: ये किस लिए?

मैं: मैंने डॉक्टर से आपके लिए लिया था|

भौजी: तो क्या तुमने उसे बता दिया की ये क्यों चाहिए?

मैं: हाँ

भौजी: तो उसने चेक अप के लिए तो कहा नहीं?

मैं: मैंने उसे समझा दिया था की किसी भी हालत में आप उससे चेक अप नहीं करवाओगे| उसे रिक्वेस्ट करके आपके लिए ले लिया| अब इसे लो और बड़की अम्मा (बड़ी चाची) से लगवा लेना|

भौजी: तुम्हीं क्यों नहीं लगा देते?

मैं: मैं लगा तो दूँ पर अगर ईमान डोल गया तो?

भौजी: तो क्या? तुम्हारी पत्नी हूँ...

मैं: हाय!!! पर अगर अम्मा ने पूछा की किस ने दवाई लगाईं तो क्या कहोगी?

भौजी: कह दूँगी नेहा ने लगाईं|

मैं: बहुत होशियार होगये हो आप?

भौजी: अब तुम्हारे साथ रह-रह के कुछ तो सीखूंगी ही|

उनकी कही बात ने सच में मेरे अंदर एक नई जान फूंक दी थी| उनके इस प्यार भरे लहजे ने मेरी जान ले ली थी और मैं उनकी इन अदाओं का कायल हो चूका था| भौजी ने दरवाजा बंद किया, और मेरे सामने खड़े-खड़े अपने ब्लाउज के बटन खोलने लगीं| मैं बड़े प्यार से उन्हें देखता रहा... भौजी की आंखें मुझपे टिकीं थी और मेरी आँखें भौजी की अदाओं को निहार रहीं थी| हमेशा की तरह भौजी ने आज भी ब्रा नहीं पहनी थी... भौजी मेरी ओर पीठ करके खड़ी हो गईं| मैंने एक नजर नेहा की ओर देखा, वो सो रही थी| मैंने स्पिरिट में थोड़ी रुई डुबोई ओर भौजी के घाव पर रख दिया| भौजी के मुख से सिसकारी निकली:

"स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स... अह्ह्ह ... मानु बहुत जल रहा है|"

मैं: दर्द तो होगा.... पर पट्टी के बाद ठंडा-ठंडा लगेगा|

मैंने धीरे-धीरे भौजी के घावों को स्पिरिट से धोया उसके बाद, डॉक्टर के द्वारा दी गए पाउडर से भौजी की ड्रेसिंग की| जब मैं भौजी को पट्टी बांध रहा था तो बार बार उनके स्तन को अपने हाथों से सहला देता| जब पट्टी बांध गई तो भौजी मेरी ओर मुड़ी ओर सवालिया नज़रों से मुझे देखने लगी| मैंने उनके होठों को चूम लिया, मेरे चुम्बन से भौजी मदहोश हो रही थीं ओर इधर मैं उनकी बातों से मन्त्र मुग्ध हो चूका था| उनकी "पत्नी" वाली बात ने मुझे उनका दीवाना बना दिया था| मैं नीचे झुका ओर उनकी साडी पकड़ के ऊपर उठा के उनके हाथों में थम दी| अब हम लेट के तो सम्भोग नहीं कर सकते थे, क्योंकि या तो उन्हें नहीं तो मुझे बहुत दर्द होता| दिमाग में अलग ही स्टाइल ने दस्तक दी, मैंने अपना लंड निकला और उनकी योनि के ऊपर रगड़ने लगा| फिर अचानक मैंने हाथ हटा दिया और भौजी बायीं टांग पकड़ के चारपाई के ऊपर रख दी| भौजी ने मेरे लंड को पकड़ के अपनी योनि के भीतर प्रवेश कराया| अब मैंने एक झटके में भौजी को अपनी गोद में उठा लिया| इसे अकस्मात् झटके के कारन मेरा लंड उनकी पहले से गीली योनि में फिसलता हुआ उनकी बच्चे दानी से टकराया| भौजी एक डैम से चिहुक उठी:

"आह्ह...उम्म्म"

पर अगले ही पल उन्होंने अपनी टांगों से मेरी कमर को जकड लिया, अपने हाथों से मेरी गर्दन को अपनी गिरफ्त में ले लिया और मैंने उनको उनकी कमर से थाम लिया| मैं उन्हें इसी हालत में लिए स्नान घर में ले गया, क्योंकि मैं नहीं चाहता था की नेहा हमारी सिस्कारियां सुन उठ जाए और हमें सम्भोग करते हुए देखे| अंदर पहुँच मैंने होले-होले झटके मारता रहा, क्योंकि मुझे आभास था की इस अवस्था में मेरे लंड का उनकी बच्चे दानी से टकराना संभव है| मैं उन्हें दर्द नहीं देना चाहता था इसलिए पूरी कोशिश कर रहा था की पूरा लंड उनकी योनि में ना जाए! ग्रशण इतना अधिक था की हमारा सम्भोग ज्यादा देर नहीं चला| सर्वप्रथम मैं स्खलित हुआ पर फिर भी मैंने नीचे से झटके मारना बंद नहीं किया| अगले ही पल भौजी भी स्खलित हो गईं, उनकी योनि में हम दोनों के शरीर का रास भरने लगा था और जब भौजी ने अपने पाँव जम्मन पे रखे तब मैंने अपना लंड बहार निकला| तब जैसे एक पाँव खीर भौजी की योनि से निकल जमीन पे पचाक!!! कर गिरी| ना जाने क्यों पर भौजी नीचे पड़े मिश्रण को देखने लगीं... मैंने उनका मुख अपने हाथों से उठाया और उनके होठों को चूमा, भौजी की आँखें बंद थीं| उसके बाद भौजी ने लोटे से पानी डालके मेरे लंड को साफ़ किया, मेरे पजामे पर भी हमारे रस की कुछ बूँदें गिरी थीं| जिसे भौजी ने पानी से साफ़ किया और फिर मैं बहार आ गया|

मैंने जा के धीरे से दरवाजा खोला ताकि किसी को शक न हो| पाँच मिनट बाद भौजी भी आ गईं, और वो कुछ निराश लग रहीं थी| वो आपके सीधे अपनी चारपाई पर पेट के बल लेट गईं और मैं अपनी चारपाई पर लेट गया|


The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 08:48

24

अब आगे....



मैं: क्या हुआ आप इस तरह गुम-सुम क्यों हो गए?

भौजी: कुछ नहीं, बस ऐसे ही|

मैं: तो अब आप....

आगे पूरी बात होने से पहले ही माधुरी आ गई:

माधुरी: अरे मानु जी अब आप की तबियत कैसी है?

मैं: ठीक है|

भौजी: अच्छा हुआ तुम आ गई, अभी तुम्हारी ही बात हो रही थी|

माधुरी: सच? क्या बात हो रही थी?

मैं: मैं पूछ रहा था की आखिर आप कल क्यों नहीं दिखाई दीं?

माधुरी: वो दरअसल कल रसिका भाभी अपने मायके जाने वाली थीं तो मैंने सोचा क्यों न मैं कहीं घूम आऊँ| आज दोपहर को जब घर आई तब मुझे पता चला की कल क्या-क्या हुआ? वैसे आप दोस्ती बहुत अच्छी निभाते हो, दोस्त की खातिर अपनी जान की भी परवाह भी नहीं की?

मैं: दोस्तों के लिए तो अपनी जान हाजिर है!!! वैसे ये बात क्या पूरे गाँव को पता है?

माधुरी: अरे इस गाँव में कोई बात छुपी है क्या? ये ही नहीं आस पास के गाँव वाले भी आपका सम्मान करने लगे हैं|

बस इसी तरह माधुरी सवाल पूछती रही और मैं जवाब देता रहा| हमारी बातें सुन नेहा उठ गई| आँख मलते-मलते बैठी और फिर मेरे पास आई और मुझे पप्पी दी और फिर अपनी मम्मी को पप्पी दी| फिर बाहर खेलने चली गई, माधुरी का मुँह देखने लायक था| जैसे उसे भौजी से जलन होने लगी थी|

माधुरी: क्या बात है मानु जी, इन कुछ दिनों में ही आपका इतना लगाव हो गया नेहा से?

मैं कुछ नहीं बोला बस मुस्कुरा दिया और इससे पहले की वो और सवाल पूछती मैं उठ के बाहर निकलने लगा|

माधुरी: कहाँ चल दिए?

मैं: नेहा के साथ खेलने, आप बैठो और भौजी को कंपनी दो|

मैं बाहर आके नेहा को ढूंढने लगा, वो छापर के नीचे गुड़ियों के साथ खेल रही थी| मैं भी वहीँ उसके पास बैठ गया, और उसके साथ खेलने लगा| मेरे पीछे-पीछे माधुरी भी आ गई:

मैं: क्या हुआ भौजी के साथ मन नहीं लगा?

माधुरी: वो तो सो रहीं हैं|

अब वो भी हमारे साथ खेलने लगी, हंसी मजाक चल रहा था| वो बार-बार मेरे बारे में जानने की कोशिश करती और सवाल पूछती| मैं भी उसे जवाब देता और बदले में वो प्यार से मुस्कुरा देती| करीब दो घंटे बीत गए, समय हुआ था चार बज के बीस मिनट| मैं उठ के खड़ा हुआ और अंगड़ाई लेने लगा.. तभी मुझे भौजी के चीखने की आवाज आई|

भौजी रोती-बिलखती हुई, भागती हुई मेरी तरफ आ रही थी| मैं बड़ा हैरान था और उनकी ओर बढ़ने लगा| भौजी मुझसे कास के लिपट गई और रोती रही| मैं उन्हें चुप कराने की भर- पुर कोशिश करता रहा परन्तु भौजी चुप ही नहीं हो रही थी, बस फुट-फुट के रो रहीं थी| मैं उनके सर पे हाथ फेरते हुए उन्हें चुप कराने लगा, छप्पर के नीचे बिछी चारपाई पे नेहा के पास बैठाया| नेहा उनके आंसूं पोछने लगी पर उनका रोना बंद ही नहीं हो रहा था|माधुरी भी उनकी बगल में बैठ गई और पीठ सहलाने लगी|

मैं: क्या हुआ ये बताओ ?

भौजी कुछ नहीं बोल रही थी बस मेरा सीधा हाथ थामे हुए थी| मैंने माधुरी से पानी लाने को कहा:

मैं: प्लीज मत रोओ, आपको मेरी कसम!!!

मैं जानता था की उन्हें चुप कराने के यही तरीका है, अब ये सब मैं माधुरी के सामने तो नहीं कह सकता था| इतने में माधुरी पानी ले के आ गई, उसने गौर किया की भौजी ने रोना बंद कर दिया है और अब वे बस सुबक रहीं थी|

मैं: ये लो पानी पीओ| अब शांत हो जाओ...

भौजी ने सुबकते हुए पानी पिया.. उन्हें खांसी भी आई| माधुरी उनके पास ही बैठी थी, तो उसने उनकी पीठ को सहलाया| अब भौजी कुछ काबू में लग रहीं थी| उनका सुबकना बंद तो नहीं पर काम हो चूका था|

मैं: अच्छा अब बताओ की हुआ क्या? आपने कुछ डरावना देख लिया: भूत, प्रेत ?

भौजी कुछ नहीं बोलीं बस ना में गर्दन हिला दी|

मैं: तो क्या हुआ? आप तो सो रहे थे ना.... कोई सपना देखा आपने?

इस्पे भौजी की आँखों में फिर से आंसूं छलक आये| मैं इस बात को और न बढ़ाते हुए उन्हें चुप कराने लगा:

मैं: अच्छा आप से कोई बात नहीं पूछेगा| बस शांत हो जाओ!

देखने वाली बात ये थी की भौजी ने अब भी मेरा हाथ थामा हुआ था| नेहा भी परेशान हो गई थी और लग रहा था की उसका साईरन कभी भी बज जायेगा, तो मैंने बात बदलते हुए भौजी को चारपाई पे लेटने का परामर्श दिया और मैं उनके पास ही बैठ गया ताकि उन्हें संतुष्टि रहे| ये तो साफ़ था की भौजी ने मेरे बारे में ही कोई सपना देखा था, पर क्या? ये नहीं मालूम था|अब घर के सभी लोग काम से लौट आये थे, माँ पिताजी भी फ्रेश हो के आगये थे| माँ ने मुझे भौजी के साथ बैठे हुए देखा:

माँ: क्या हुआ बहु? अब क्या कर दिया इस नालायक ने?

भौजी: कुछ नहीं चाची|

माधुरी: जी इन्होने कोई डरावना सपना देखा था, इसलिए डर गईं|

उसकी बात पे मुझे गुस्सा तो बहुत आया पर मैं कह कुछ नहीं पाया| ये सुनने के बाद भौजी ने मेरा हाथ छोड़ा और उठ के मुंह धोने चलीं गई| मैं उनके पीछे जाना चाहता था परन्तु मेरा ऐसा करना उचित नहीं होता इसलिए मैं वहीँ बैठ रहा| कुछ समय बाद माधुरी भी चली गई|

रात के सात बजे होंगे, साईकिल की घंटी की आवाज आई| ये और कोई नहीं बल्कि चन्दर भैया और मामा थे|पिताजी और बड़के दादा (बड़े चाचा) गुस्से से लाल हो गए थे|

बड़के दादा: यहाँ क्या लेने आया है? निकल जा यहाँ से !!

उन्होंने चन्दर भैया को झिड़कते हुए कहा|

बड़की अम्मा (बड़ी चाची): तुझे जनम देके मैंने जीवन की सबसे बड़ी गलती की|

अब बड़के दादा ने मारने के लिए लट्ठ उठा लिया और चन्दर भैया की ओर दौड़े| ये नजारा मैं पीछे खड़ा देख रहा था| भौजी रसोई से निकली और मेरी बगल में आके खड़ी हो गईं| मुझे लगा की शायद डर से वो मेरा हाथ थामेंगी पर अचानक ही वो नेहा जो मेरे साथ मेरी ऊँगली पकड़ के खड़ी थी उसे ले के रसोई की ओर चल दीं| मैं पलट के उनके इस व्यवहार के लिए उन्हें आस्चर्यचकित नज़रों से देख रहा था|

बड़के दादा: तेरी हिम्मत कैसे हुई अपने छोटे भाई पे हाथ उठाने की| वो मुझे तुझसे ज्यादा प्यारा है..

उन्होंने चन्दर भैया को मारने के लिए लट्ठ उठाया.... मामा ने बीच बचाव करने की कोशिश की परन्तु बड़के दादा काबू में नहीं आ रहे थे| अंत में पिताजी ने उनको थामा और उनके हाथ से लट्ठ छीन के फेंक दिया|

पिताजी : भैया आप ये क्या कर रहे हो? अपने बेटे को मार डालोगे? वो नशे में था... होश नहीं था| सजा देनी है तो ऐसी दो की अगली बार शराब को हाथ लगाने से पहले दस बार सोचे|

चन्दर भैया रट हुए बड़के दादा के पैरों में गिर गए|

चन्दर भैया: पिताजी मुझे माफ़ कर दो, मैं नशे में था| मुझसे गलती हो गई, मैं आइन्दा कभी शराब को हाथ नहीं लगाउँगा|

बड़के दादा: माफ़ी मांगनी है तो अपने चाचा से मांग, मुझे तेरी सूरत भी नहीं देखनी|

ये कहते हुए बड़के दादा ने उन्हें झिड़क दिया|

चन्दर भैया: चाचा मुझे माफ़ कर दो| मैंने बहुत बड़ी गलती कर दी!!!

पिताजी: ठीक है परन्तु कसम खाओ की आज के बाद कभी शराब को हाथ भी नहीं लगाओगे|

चन्दर भैया: मैं अपनी माँ की कसम खाता हूँ की आज के बाद शराब को कभी हाथ नहीं लगाउँगा|

अब चन्दर भैया मेरी ओर बढ़ने लगे, उन्हें देखते ही कल सुबह हुए दृश्य आँखों के सामने आ गए| खून खौलने लगा, मन तो किया की लट्ठ से उनकी हड्डियां तोड़ दूँ|

चन्दर भैया: मानु भैया, मुझे माफ़ करदो!!! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई| आप जो सजा दो उसके लिए मैं तैयार हूँ|

ये कहते हुए वो मेरे पाँव छूने लगे| मैंने उन्हें रोक और कहा: "भैया चाहता तो मैं भी आप पर हाथ उठा सकता था| परन्तु सिर्फ भौजी की वजह से मैंने कुछ नहीं करा और चुप-चाप सहता रहा| मैं आपको केवल एक ही शर्त पे माफ़ करूँगा, अगर आप कसम खाओ को आगे से कभी भी आप नेहा या भौजी पर हाथ नहीं उठाओगे|"

मेरी बात सुनके सब स्तब्ध थे, पर फिर सबने इस बात का समर्थन किया|

चन्दर भैया: मैं अपनी माँ की कसम खता हूँ की आज के बाद कभी भी मैं अपनी पत्नी और बच्ची पर हाथ नहीं उठाऊँगा|

मामा: मुन्ना जरा देखें तो तुम्हारे घाव कैसे हैं?

मैं: जी अब काफी बेहतर हैं|

भौजी अब भी सहमी सी कड़ी थीं और नेहा तो बिलकुल भौजी के पीछे ही दुबक गई थी| भोजन का समय था इसलिए मामा, चन्दर भैया, अजय भैया, पिताजी और बड़के दादा सब हाथ-मुँह धो के भोजन के लिए बैठ गए| मैं कुऐं के पास घूम रहा था, तभी नेहा भागी-भागी मेरे पास आई:
"चाचू चलो खाना खा लो?"

मैं: अभी नहीं मैं बाद में खाऊँगा| तुम जाओ खाना खाओ और जल्दी सो जाओ|

नेहा: नहीं चाचू मम्मी ने कहा है की आप को साथ ले कर आऊँ|

मैंने सोचा की शायद भौजी को मुझ से कोई बात करनी होगी| इसलिए मैं नेहा के साथ चल दिया|
मैंने भौजी से खुसफुसा के कहा की मैं आपके साथ ही भोजन करूँगा तो उन्होंने ना में सर हिला दिया| अब मैं बहुत परेशान हो चूका था, पहले तो स्नानघर में भौजी का निराश होना और अब उनका मेरे साथ भोजन करने से मन कर देना| ये चिंता मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही थी| मैंने उन्हें कुछ नहीं कहा परन्तु ये तो स्पष्ट था की मेरे चेहरे के भावों से वो समझ ही चुकीं थी की मेरा मूड ख़राब है|बेमन से खाना खाया और अपने बिस्तर पे लेता आसमान में तारे देखने लगा| शाम को जो भी हुआ उसका एक सुखद पहलु भी था, की भैया को मेरे और भौजी के रिश्ते के बारे में कुछ पता नहीं चला| क्योंकि अगर पता होता तो वो सब कुछ सच कह देते और फिर मेरी जो तोड़ाई होती उसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती| मैं भौजी का इन्तेजार करता रहा..... और नींद कब आ गई पता ही नहीं चला|

उमीदों वाली सुबह हुई, मैंने सोच लिया था की मैं किसी भी हालत में भौजी से पूछ के रहूँगा की आपने मुझसे बोल-चाल क्यों बंद कर रखी है| परन्तु मौका मिले तब ना, सुबह-सुबह का समय था तो सब घरवाले रॉयस के आस-पास ही मंडरा रहे थे| मैं नहा-धो के तैयार हो गया और चाय पीने आ गया,

मैं: भौजी चाय देना?

भौजी: ये लो .. नेहा बेटा सुनो तुम भी चाय पी लो|

इतना कह के भौजी चलीं गईं, मुझे ऐसा लग रहा था की वो मुझसे नजर चुरा रहीं है| नौ बजे तक सभी खेत चले गए, अब घर पे केवल भौजी, मैं, नेहा, माँ और पिताजी थे| अब माँ-पिताजी को कैसे बीजी करूँ? मैं अकेला ही कुऐं के आस-पास घूमने लगा, अब माँ-पिताजी को तो बिजी करने का कोई उपाय सूझ नहीं रहा था| उधर बड़े घर में, माँ कपडे समेट रही थी और पिताजी बाहर किसी से बात कर रहे थे| भौजी मुझे रसोई से अकेला टहलता हुआ देख रही थीं और उहोने नेहा को मुझे बुलाने भेजा| मैं बहुत खुश हुआ की चलो कम से कम मुझे बुलाया तो सही|

भौजी: मानु.... नाराज हो?

मैं: नाराज होने का हक़ है मुझे?

भौजी: प्लीज ऐसा मत कहो?

मैं: तो बताओ की आपको कल क्या हो गया था? पहले स्नान घर में आप एक डैम से उदास हो गए| फिर कुश देर बाद आपने कोई भयानक सपना देखा, मुझसे लिपट के इतनी बुरी तरह रोये| और फिर आपका मेरे से ऐसे सलूक करना जैसे मैं कोई अजनबी हूँ?

भौजी: दरअसल मैं कोशिश कर रही थी की तुम से दूर रह सकूँ| कुछ घंटों के लिए ही सही परन्तु मैं तुम्हें बता नहीं सकती कल रात मैं कितना तड़पी हूँ, कितना रोइ हूँ!!!

मैं: मुझसे दूर रहने की कोशिश? ठीक है मैं खुद ही आपसे दूर चला जाता हूँ|

मैं उठ के जाने लगा तो भौजी ने मेरा हाथ थामा और मुझे रोका और रोने लगी|

भौजी: मानु प्लीज मुझे छोड़ के मत जाओ, कुछ घंटे तुम्हारे बिना .... मेरा बुरा हाल हो गया| मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकती.. मैं मर जाऊँगी|

मैं: आपको पता है कल मुझे कैसा लगा? ऐसा लगा मानो मैं कोई अजनबी हूँ जिससे से बात करने से भी आप कतरा रहे हो|

भौजी: मानु कल मैंने एक बहुत ही भयानक सपना देखा|

मैं: कैसा सपना?

भौजी: की तुम मुझे छोड़के शहर चले गए और अब वापस कभी नहीं आओगे|

मैं: वो तो सिर्फ एक सपना था| मैंने आपसे अलग कैसे रह सकता हूँ, साल में एक बार ही सही पर आऊँगा जर्रूर|

भौजी: तुम नहीं आओगे!

मैं: आपको कैसे पता?

भौजी: तुम अब बड़ी क्लास में हो कल को तुम बोर्ड की परीक्षा दोगे| फिर तुम्हें कॉलेज में एडमिशन मिलेगा, अब कॉलेज में तो दो महीने की गर्मियों की छुटियाँ नहीं होती जिनमें तुम मुझे मिलने आओगे| और चलो आ भी गए तो कितने दिन? दो दिन या हद से हद तीन दिन रुकोगे और फिर पूरे एक साल बाद आओगे वो भी शायद!!! तुम्हारे नए दोस्त बनेंगे, नई लड़कियाँ मिलेंगी जो तुम्हें पसंद करेंगी और शायद तुम्हें उनसे प्यार भी हो जायेगा और तुम मुझे भूल जाओगे| फिर तुम्हारी शादी, बच्चे और धीरे-धीरे ये यादें तुम्हारे मन से भी मिट जाएँगी| पर मेरा क्या होगा? मैंने तुम्हें अपना पति माना है? अपने आप को तुम्हें समर्पित कर चुकी हूँ| मैं ये पहाड़ जैसी जिंदगी कैसे काटूंगी?

मैं: नहीं भौजी ऐसा नहीं हो सकता, मैं सिर्फ आपसे प्यार करता हूँ| आपको मेरे प्यार पे विश्वास नहीं?

भौजी: विश्वास है परन्तु चाचा-चाची कभी न कभी टी तुम्हारी शादी कराएँगे, तब क्या?

मैं: अगर मेरे बस में होता तो मैं कभी शादी नहीं करता| परन्तु मुझे दुःख है की माँ-पिताजी के ख़ुशी के लिए मुझे कभी न कभी शादी तो करनी पड़ेगी| पर आप यकीन मानो मैं अपनी पत्नी को कभी भी वो प्यार नहीं दे पाउँगा जो मैं आपको देना चाहता हूँ| वो कभी भी आपकी जगह नहीं ले सकती!!! इस समस्या का कोई उपाय नहीं है!!!

भौजी: उपाय तो है|

मैं: क्या?

भौजी: अगर मैं तुम से कुछ माँगू तो तुम मुझे दोगे?

मैं: हाँ बोलो?

कहानी जारी रहेगी....