एक अनोखा बंधन

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The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:05

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अब आगे...

भोजन के पश्चात मैं अपनी चारपाई पे बैठा था और नेहा हमेशा की तरह कहानी सुनते-सुनते मेरी गोद में ही सो गई| भौजी जब नेहा को लेने आईं तो मैंने उनसे कुछ बात की;

मैं: आप चले जाओ शादी में, मेरे लिए| नहीं तो घर के सब लोग मुझे ही दोष देंगे|

भौजी: मैं आपकी कोई भी बात मान सकती हूँ पर मैं सच में इस शादी में नहीं जाना चाहती| मैं आपसे अलग नहीं रह सकती| प्लीज मुझे जाने के लिए मत कहिये, मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ| और रही बात आपको दोष देने की तो मैं देखती हूँ कौन आपसे कुछ कहता है|

मैं ठीक है, पर वादा करो की मुझे लेके आप किसी से लड़ाई नहीं करोगे| अगर इस बारे में कोई कुछ कहे भी तो भी आप चुप रहोगे| बोलो मंजूर है?

भौजी: आपने मुझे गजब दुविधा में डाल दिया.. पर ठीक है आपसे अलग रहने से तो अच्छा है की मैं चुप रहूँ| पर अगर बात हद्द से बढ़ गई तो मैं आपकी भी नहीं सुनुँगी|

ऐसा पहली बार था की मैंने भौजी के ऐसे बागी तेवर देखे थे!

मैं: मुझे आप से एक और बात कहनी है, मुझे आपका ये डबल मीनिंग वाली बातें करना बिलकुल पसंद नहीं| इसलिए आइन्दा ये डबल मीनिंग वाली बातें मुझसे मत करना|

भौजी: डबल मीनिंग बात?

मैं: शाम को जब हम दोनों क्रिकेट की बात कर रहे थे तब... डबल मीनिंग वाली बातें मतलब= दो अर्थ वाली बातें| ये बातें आपको शोभा नहीं देती| आपका चरित्र ऐसा नहीं है इसलिए आइन्दा कभी भी मुझसे ऐसी बातें मत करना|

भौजी: सॉरी जी! मैं तो बस थोड़ा मजाक कर रही थी| आगे से इस बात का ध्यान रखूंगी|

मैं बस थोड़ा मुस्कुराया और बात खत्म की| भौजी नेहा को गोद में ले के चली गईं... मैं भी लेट गया पर अब भी मैं भौजी "ख्वाइश" पूरी करने के बारे में सोच रहा था| कई बार मित्रों सीधा रास्ता मुश्किल होता है परन्तु मंजिल तक तो पहुंचा ही देता है| जैसे ही घडी में रात के एक बजे मैं उठा और भौजी के घर की ओर चल दिया| दरवाजा खुला था, और मैं चुप-चाप अंदर पहुँच गया| देखा तो भौजी अंदर सो रहीं थी! जब उन्हें सोते हुए देखा तो बस देखता ही रह गया ... बहुत प्यारी लग रही थीं वो| मैं बस दरवाजे पे खड़ा उन्हें निहारता रहा... मन ही नहीं किया की वहां से जाऊँ या उन्हें जगाऊँ| मैं धीरे-धीरे भौजी के पास गया और झुक के उनके होठों को चूमा| शायद भौजी को जबरदस्त नींद आ रही थी इसलिए उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी| मैं चुप-चाप दुबारा दरवाजा बंद कर के वापस अपनी चारपाई पे आके सो गया|

नई सुबह.. नया दिन... पर आज कुछ तो ख़ास बात थी| जब मेरी आँख खुली तो मुझे "चक्की" चलने की आवाज आई| मैं उठ के बैठा और पाया की मेरे आस-पास कोई नहीं है| कुछ देर में मुझे माँ और बड़की अम्मा आते हुए दिखाई दिए| मेरे नजदीक आके माँ ने कहा की; "जल्दी से हाथ-मुंह धो के तैयार हो जाओ| और हाँ नहाना मत!" मैंने ना नहाने का करना पूछा तो पता चला की आज मुझे "बुक्वा" लगेगा|

मित्रों चूँकि आप नहीं जानते की "बुक्वा" क्या होता है तो मैं आपको इसके बारे में डिटेल में बताता हूँ| हमारे गाँव में स्त्रियाँ घर की चक्की पे सरसों को पीसती हैं और फिर उस मिश्रण में सरसों का तेल मिलाया जाता है| कहते हैं की इस मिश्रण को बदन पे लगाने से निखार और तमाम खाज-खुजली की तकलीफें ठीक हो जाती हैं| इसे घर की स्त्रियाँ ही लगाती हैं पर हाँ ये सिर्फ और सिर्फ घर के पुरुषों के लिए होता है| घर के बड़े जैसे मेरे पिताजी या बड़के दादा को बुक्वा केवल और केवल बड़की अम्मा ही लगाती हैं| चन्दर भैया, या अजय भैया को बुक्वा या तो बड़की अम्मा अथवा उनकी पत्नियाँ ही बुक्वा लगाती हैं| और सबसे छोटे देवर अर्थात मैं मैं जिससे चाहे बुक्वा लगा सकता हूँ| सरल शब्दों में कहें तो स्त्रियाँ अपने से छोटे पुरूषों को बुक्वा लगा सकती हैं, परन्तु अपने से बड़ों को नहीं| किसी भी बहार के पुरुष को ये सेवा किसी भी हाल में उपलब्ध नहीं होती| ना ही वो इसे लगाते हुए देख सकता है| इसे लगाने के विधि कुछ ख़ास नहीं है, बस इस मिश्रण को हाथों से लेप की तरह लगाया जाता है और कुछ समय बाद (तकरीबन 1 - 2 घंटे) इसे पानी से धोके उतार दिया जाता है| फिर साबुन से नहा के ये काम पूरा होता है| चूँकि मैं छोटा था तो मुझे बुक्वा लगाने की जिम्मेदारी भाभियों की थी| अब मेरी प्यारी भौजी से अच्छा विकल्प क्या हो सकता है!

बुक्वा लगाने की बात सुन के मैं खुश तो था ही पर नजाने मन में भौजी का चन्दर भैया को बुक्वा लगाने के बारे में सोच कर मन खराब हो गया| मैं मुंह हाथ धो के भौजी को ढूंढता हुआ उनके घर पहुँचा| वहां पहुँच के देखा तो भौजी चक्की चला रहीं थी और सरसों पीस रहीं थीं| दरअसल चक्की भौजी के घर में ही थी, मैंने उन्हें देखा परन्तु बोला कुछ नहीं| थोड़ा अजीब सा लग रहा था... शायद भौजी मेरी परेशानी भाँप गई और उनके मुख पे भी बिलकुल वैसे ही भाव थे जैसे मेरे मुख पे थे| मैं बिना कुछ बोले वापस आ गया और अपनी बारी का इन्तेजार बड़े घर में करने लगा| मैं सोच रहा था की बार-बार मुझे भौजी का इस तरह रिश्ते जोड़ना बहुत अच्छा लगने लगा था| कभी अपने पिताजी को मेरा ससुर कहना, मेरे पिताजी को अपना ससुर मानना, अपने भाई को मेरा साला कहना, मेरी माँ को चाची ना कह के माँ कहना ये सब बातें मेरे दिल को छू जातीं ओर मुझे एक अलग ही एहसास कराती| मैं इतना बहक चूका था की रात्रि में बातों-बातों में भौजी के मायके को मैंने ससुराल कह दिया| वो तो शुक्र है की पिताजी ने इस बात को तवज्जो नहीं दी वरना कल तो मेरी ठुकाई पक्की थी| करीब एक घंटे बाद भौजी आई और उनके पास एक डोंगे जैसा ताम्बे का बर्तन था| मैं आँगन में चारपाई पे बैठा था| मेरी पीठ दरव्वाजे की ओर थी तो मुझे केवल भौजी के पायल की आवाज ही सुन पाया| भौजी बर्तन लिए मेरे सामने कड़ी हो गईं ओर सवालियां नज़रों से मुझे देखने लगी|

इससे पहले की वो कुछ पूछें मैं स्वयं ही चुप्पी तोड़ते हुए बोला;

मैं: लगा दिया आपने चन्दर भैया को बुक्वा?

भौजी: मैंने नहीं .... अम्मा ने लगाया| मैं तो चक्की चलने में व्यस्त थी ....

मैं कुछ बोला नहीं बस एक ठंडी साँस छोड़ी... और टी-शर्ट उतार दी| भौजी ने ऊँगली से मेरे पजामे की ओर इशारा किया और उसे भी उतारने को कहा| अब मैं केवल कच्छा पहने उनके सामने बैठा था| भौजी ने उबटन लगन शुरू किया... सबसे पहले उन्होंने छाती पे उबटन लगाया;

भौजी: तो आप का मूड इसलिए खराब था की मैं आपके भैया को उबटन लगाउंगी?

मैं: हाँ... पूछो मत| ऐसा लग रहा था जैसे शरीर पे चींटे काट रहे हों|

भौजी: पर मैं तो सिर्फ आपकी हूँ| और मैं किसी पराये मर्द को कैसे स्पर्श कर सकती हूँ?

मैं: जानता हूँ... पर यदि बड़की अम्मा ने आपसे भैया को उबटन लगाने को कहा होता तो? आप कैसे मन करते उन्हें ?

भौजी: बड़ा आसान है.... मैं अपना हाथ जख्मी कर लेती!

मैं: आपका दिमाग खराब है?

भौजी: हाँ !!! आपसे प्यार जो किया है..... निभाना तो पड़ेगा ही|

मैं: आप सच में पागल हो! अगर आप उन्हें उबटन लगा भी देते तो क्या होता? दुनिया के सामने तो वो आपके पति हैं|

भौजी: आपको क्या हुआ था जब आपने माधुरी के साथ.... ??? वही हाल मेरा भी होता!
(भौजी इतना कहके रूक गईं और दस सेकंड बाद अपनी बात पूरी की|)

मैं जानता था... और ये कहें की समझ सकता था की उनपे और मुझ पे क्या बीतती| खेर भौजी ने स्वयं ही बातें घुमा दीं;

मैं: एक बात कहूँ.... आप सोते हुए बहुत प्यारे लगते हो?

भौजी: ओह! आपने कब देख लिया मुझे सोते हुए? हमेशा तो मेरे सोने से पहले ही आप चले जाते हो| दिन में तो मैं कभी सोती नहीं|

मैं: कल रात को मैं आया था... देखा आप सो रहे थे| दस मिनट तक आपको निहारता रहा ... फिर आपके होठों को KISS किया और वापस चला गया|

भौजी: तो मुझे उठाया क्यों नहीं?

मैं: मन नहीं किया... मन तो कर रहा था की वहीँ खड़ा सारी रात आपको सोता हुआ देखता रहूँ|

भौजी: आप भी ना...

अब तक भौजी मेरे पूरे बदन पे बुक्वा लगा चुकीं थी....

मैं: (अपना कच्छा सामने की ओर खींच के भौजी को दिखाते हुए) इस पे भी थोड़ा बुक्वा लगा दो| इसमें भी थोड़ी चमक आ जाए... ये भी गोरा हो जाए!

भौजी: ना जी ना.... अगर ये गोरा हो गया तो फिर यहाँ-वहां मुँह मारेगा|

अब ये सुन के तो मेरे तन-बदन में आग लग गई| गुस्से से मैं तमतमा गया ओर उठ के खड़ा हो गया| गुस्सा मेरी शक्ल से झलक रहा था... मैं अंदर अपने कमरे की ओर बढ़ा ओर अंदर जाके बैग में अपने कपडे भरने लगा| मुझे ऐसा करता देख भौजी के प्राण सूख गए ओर वो बोलीं;

भौजी: ये आप क्या कर रहे हो? ........ प्लीज मेरे साथ ऐसा मत करो| मुझे छोड़ के मत जाओ!!!

मैं: नहीं... आप को अब भी मुझ पे विशवास नहीं| आप को अंदर ही अंदर अब भी लगता है की मैंने आपके साथ दगा किया|

भौजी: नहीं... वो तो बस मैं आपसे थोड़ा मजाक कर रही थी| प्लीज मुझे इस तरह छोड़ के मत जाओ... मैं मर जाऊँगी!!! (इतना कह के भौजी रोने लगीं)

मैं: मजाक !!! आपको हर-बार यही विषय मिलता है मजाक करने के लिए? आपको पता है ना की मुझे इस बात से कितनी तकलीफ होती है? बार-बार आपका इस विषय को छेड़ने से मुझे ग्लानि महसूस होती है... अपने आपको कोसता हूँ..... पर फिर भी..... मैं तो कभी आपसे इस विषय में मजाक नहीं करता?

इतना कह के मैं भौजी की ओर मुड़ा और उनके नजदीक आया| गुस्स्सा तो अब भी अंदर था पर फिर भी मैंने भौजी के आँसूं पोछे और वहाँ से चला गया|मैं कुऐं की मुंडेर जो की मेरी पसंदीदा जगह बन चुकी थी वहाँ पे अकेला बैठा था|अकेला बैठा मैं यही सोच रहा था की क्या मैंने भौजी को इस तरह डाँट के सही किया? पर उन्हें भी तो पता होना चाहिए की मुझे कितना बुरा लगता होगा? मैं ये भी भूल चूका था की मैं केवल कच्छे में हूँ| डेढ़ घंटे तक मैं वहीँ बैठ रहा ... और फिर भौजी वहाँ आईं और मुझे नहाने के लिए कहा| मैं वापस बड़े घर आ गया और नहाने के लिए बाल्टी भरने लगा|जैसे ही मैं बाल्टी ले के स्नान घर की ओर बढ़ा... भौजी ने मेरे हाथ से बाल्टी ले ली| साफ़ जाहिर था की भौजी ही मुझे नहलाने वाली हैं| उनके मुख पे मुझे अफ़सोस ओर शर्मिंदगी के मिले-जुले भाव दिख रहे थे|

भौजी: आई ...ऍम....सॉरी जी!!!

मैं कुछ नहीं बोला... अब भी मेरे मुख पे गंभीर भाव थे|

भौजी: तो आप मुझसे बात नहीं करेंगे? प्लीज माफ़ कर दीजिये ना ... आगे से ऐसा मजाक कभी नहीं करुँगी| प्लीज .....
आगे की बात पूरी होने से पहले ही रसिका भाभी आ गईं|

रसिका भाभी: तो मानु जी, नहाना हो रहा है!

मैं: जी नहाने ही जा रहा था| (इतना कह के मैंने भौजी के हाथ से बाल्टी लेने के लिए हाथ बढ़ाया, परन्तु भौजी ने बाल्टी पीछे खींच ली|)

भौजी: आप रहने दो.... मैं नहला देती हूँ|

रसिका भाभी: (इस बात पे भी चुटकी लेने से बाज़ नहीं आई|) आय-हाय!!! देवर-भाभी का प्यार तो देखो!!! ही... ही...ही...ही !!!

अब मैं कहता भी क्या, मैं अर्ध नग्न हालत में चुप-चाप खड़ा हो गया और भौजी मुझे नहलाने लगी| पहले उन्होंने पानी की मदद से साड़ी उबटन छुड़ाई और फिर साबुन लगने लगीं| एक पल के लिए भौजी पीछे मुड़ीं और रसिका भाभी को देखा| रसिका भाभी अपने कमरे में थीं तो मौके का फायदा उठा के भौजी ने मेरे कच्छे की इलास्टिक को पकड़ के सामने की ओर खींचा, जिससे उन्हें मेरा सोया हुआ लंड दिख गया| उन्होंने उसे छूना चाहा परन्तु मैंने झट से उनका हाथ हटते हुए कच्छे की इलास्टिक छुड़ा ली| मैं जल्दी से भाग के कमरे में गया ओर तौलिया लपेट लिया ओर कपडे बदल कर, तेल कंघी कर के भर आ गया| जब मैं बहार आया तो भौजी अब भी स्नान घर के पास खडीन मेरी ओर देख रहीं थीं|

ऐसा नहीं था की मैं अकड़ दिखा रहा था या अब भी नाराज था| माफ़ तो मैं उन्हें पहले ही कर चूका था... मैं तो बस उन्हें थोड़ा तड़पा रहा था, क्योंकि आगे के लिए मैंने जो सोचा था उसके लिए थोड़ा गुस्सा दिखाना जर्रुरी था|

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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:06

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अब आगे...

मैं आँगन में पड़ी चारपाई पे बैठ गया.... अब भी मेरे ओर भौजी के बेच बात-चीत नहीं हो रही थी| हालाँकि भौजी पूरा प्रयास कर रहीं थी की मैं उनसे बात करूँ पर मैं चुप-चाप होने का नाटक कर रहा था| भौजी परेशान दिख रही थी, क्या मैं उनसे नाराज हूँ या नहीं? खेर अम्मा ओर माँ एक साथ बड़े घर में दाखिल हुईं| अम्मा ने भौजी से कहा की वे माँ को भी बुक्वा लगा दें| इतना कहके बड़की अम्मा रसिका भाभी को अपने साथ किसी काम के लिए ले गईं| अब बड़े घर में केवल मैं, माँ ओर भौजी रह गए| माँ नीचे बैठ गईं ओर भौजी ठीक उनके पीछे बैठी उनकी पीठ पे बुक्वा लगा रहीं थी| मेरी ओर भौजी की पीठ थी, यानी मैं सबसे पीछे बैठा था| तभी भौजी ने माँ से उनका मंगलसूत्र उतारने को कहा, नहीं तो उसमें भी बुक्वा लग जाता| माँ ने मुझे बुलाया ओर मेरे हाथ में अपना मंगल सूत्र दिया ओर कहा की इसे संभाल के रख दे| मुझे ना जाने क्या सूझी ओर मैंने मंगलसूत्र भौजी के गले में डाल दिया! भौजी एक दम से हैरान मेरी ओर देखने लगीं जैसे पूछ रहीं हो की क्या मैं अब भी नाराज हूँ या मैं मजाक कर रहा हूँ? मैंने माँ से कहा की मैं खेत जा रहा हूँ और आपका मंगलसूत्र भौजी के पास है|

दोपहर के भोजन के समय जब मैं वापस आया तो माँ ने मुझसे कहा की मैं उनका मंगलसूत्र भौजी से ले आऊँ| सच कहूँ तो मेरा मन बिलकुल नहीं था, भौजी से मंगलसूत्र वापस लेने का| परन्तु करता क्या, वो मंगलसूत्र 22000/- का था! मैं मुंह बनाके भौजी के पास गया और बेमन से उनसे माँ का मंगलसूत्र माँगा| भौजी ने वो मंगलसूत्र संभाल के अपनी अटैची में रखा था| उन्होंने मंगलसूत्र मेरे हाथ में देते हुए मुझसे पूछा;
भौजी: आपको मालुम है मंगलसूत्र पहनना क्या होता है?

मैं: हाँ....
बस इसके आगे मैंने उनसे कोई बात नहीं की और वहाँ से चला गया| मैं जानता था की मैंने उन्हें मंगलसूत्र पहनाया है और उसका अर्थ क्या है| और मुझे इसमें कुछ भी गलत नहीं लगा| मैंने मंगलसूत्र लाके माँ को दिया और नेहा को लेने स्कूल चला गया|

दोपहर का भोजन करने के बाद मैंने अपना ध्यान नेहा में लगा दिया और भौजी को ऐसा दिखाया जैसे मुझे उनकी कोई परवाह ही नहीं| भौजी मेरे और नेहा के पास ही लेट गईं और नेहा को कहने लगीं; "पापा से कहो की कहानी सुनायें!" अब ये सुन के तो मेरी आँखें फ़ैल गईं!!! ये क्या कह रहीं हैं भौजी? वो भी नेहा से? ये तो खुशकिस्मती थी की छप्पर के नीचे जहाँ हम बैठे थे वहाँ हम तीनों के आलावा कोई नहीं था| और मेरी बेवकूफी देखिये की मैंने उनकी बात का जवाब भी दे दिया; "बेटा मम्मी से कहो की कहानी रात में सुनाई जाती है, दिन में नहीं|" जवाब देके मुझे मेरी ही गलती का एहसास हुआ तो मैंने अपनी जबान दांतों टेल दबा ली और इसे देख भौजी खिल-खिला के हंस दी| परन्तु मैं मुस्कुराया नहीं... बहुत मुश्किल से अपने को रोका! मैं नेहा को लेके बैट-बॉल खेलने के लिए चला गया| भौजी तख़्त पे लेते मुझे देख रही थी और तरह-तरह के मुंह बनाके मुझे हंसाने की कोशिश कर रही थी| पर मैं पूरी कोशिश कर रहा था की मैं उनकी ओर ध्यान ना दूँ|

जब बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं बैट छोड़के खेत की ओर भाग गया और कुछ दूर पहुँच के भौजी के द्वारा बनाये गए उन चेहरों को याद कर के बहुत हँसा| कुछ देर बाद मैं वापस आया तो देखा तो चन्दर भैया ओर अजय भैया तैयार हो रहे थे| मैंने जब उनसे पूछा तो उन्होंने बताया की मामा के घर किसी काम से जा रहे हैं, और कल शाम तक लौटेंगे| अकस्मात् ही मेरी किस्मत मुझ पे इतना मेहरबान हो गई थी| मेरा रास्ता लघभग साफ़ था बस एक ही अड़चन थी.... वो थी रसिका भाभी! खेर अगर किस्मत को मंजूर होगा तो उनका भी कोई न कोई उपाय मुझे सूझ ही जाएगा| अब मुझे अपने प्लान को अम्ल में लाना था... पर दिक्कत ये थी की मुझे हमला ठीक समय और अकस्मात् करना था, वरना सब कुछ नष्ट हो जाता| खेर मेरा भौजी से बातचीत ना करने का ड्रामा चालु था और काफी हद्द तक मैंने भौजी को दुविधा में डाल दिया था की क्या मैं वाकई में उनसे नाराज हूँ या मजाक कर रहा हूँ| एक पल के लिए तो मुझे भी ऐसा लगा की भौजी उदास हैं और उन्हें यकीन हो गया की मैं उनसे नाराज हूँ| मन तो किया उन्हें सब सच कहूँ पर मैं रिस्क नहीं लेना चाहता था| और सबसे बड़ी बात मैं उन्हें खुश देखना चाहता था और अगर मैं उन्हें सब बता देता तो ये सस्पेंस ख़त्म हो जाता| रात्रि भोज के समय भौजी ने मुझसे बात करने के लिए एक और पहल की, पर इस बार उन्होंने नेहा का सहारा लिया| नेहा मेरे पास आई और मेरी ऊँगली पकड़ के भौजी के पास ले आई| भौजी छप्पर के नीचे तख़्त पे लेटी थीं;

नेहा: बैठो चाचू|

मैं: अच्छा बोलो क्या चाहिए मेरी लाड़ली को?

नेहा: कुछ नहीं चाचू, आप बैठो! (भौजी की ओर देख के बोली) चाचू आप मम्मी से नाराज हो?

मैं: आप ऐसा क्यों पूछ रहे हो ?

नेहा: आप मम्मी से बात नहीं कर रहे हो? आप तो मम्मी के बहुत अच्छे दोस्त हो ना तो फिर?

मैं समझ गया की ये जज्बात भौजी के हैं बस बोल नेहा रही है| अबतक नेहा की मासूमियत सुन के बड़की अम्मा भी आ गईं...

बड़की अम्मा: क्या हुआ मुन्नी? मुझे बताओ....

नेहा: दादी देखो ना चाचू मम्मी से बात नहीं कर रहे हैं|

बड़की अम्मा: क्या हुआ मुन्ना? बी क्या किया तुम्हारी भौजी ने? क्यों नाराज हो?

मैं: जी कुछ भी तो नहीं.... मैं तो ...... बस नेहा के साथ खेलने में व्यस्त था| (भौजी को उलाहना देते हुए कहा) अगर मैं नाराज होता तो दिल्ली वापस नहीं चला जाता?

ये सुन के बड़की अम्मा हँसे लगी ओर में भी जूठी हँसी हंसने लगा| मैं वहाँ से उठा और अपनी चारपाई पे लेटा आसमान में तारे देखने लगा| दोपहर की ही तरह भोजन रसिका भाभी ने पकाया था, क्योंकि चक्की चलाने की वजह से भौजी थक गईं थीं| जब सब को भोजन परोसा गया तो मैं अपनी थाली ले के अपनी चारपाई पे बैठ गया| मैंने नेहा को इशारे से अपने पास बुलाया और सारा भोजन उसे खिला दिया| दरअसल ये मेरा खुद को सजा देने का तरीका था| आज सारा दिन मैंने भौजी को बड़ा सताया था इसलिए प्रायश्चित तो बनता था| भोजन के कुछ देर बाद भौजी फिर से मेरे पास आईं और बोलीं; "अगर आप मुझसे बात नहीं करोगे तो मैं भोजन नहीं खाऊँगी|" मैं कुछ नहीं बोला और भौजी अपने घर के भीतर चलीं गई| मैं जानता था की वो भोजन नहीं करने वाली, इसलिए मैं बड़की अम्मा के पास गया और उनसे भौजी के लिए भोजन परोसने के लिए कहा|

बड़की अम्मा: पता नहीं भैया तुम दोनों के बीच में क्या चलता रहता है| कभी तुम नाराज होते हो तो कभी तुम्हारी भौजी| पता नहीं आज क्या हुआ बहु को सारा गुम-सुम सी रही, और अब भोजन के लिए कहा तो कह गई मुझे नींद आ रही है| मुन्ना वो सिर्फ तुम्हारी ही मानती है, ये लो भोजन करा दो|

मैं: आप चिंता ना करो अम्मा मैं उन्हें भोजन करा देता हूँ|

रसिका भाभी: हाँ भाई दीदी तो सिर्फ "आपकी ही सुनती हैं" !!! ही..ही..ही...

अब भी रसिका भाभी चुटकी लेने से बाज़ नहीं आई पर ठीक है! मैं भौजी के घर के भीतर पहुंचा तो देखा की भौजी चारपाई पे लेटी हैं| पर भूखे पेट किसे नींद आई है जो उन्हें आती| मैंने बड़े रूखेपन का दिखावा किया और बहुत रूखे तरीके से उन्हें कहा;

मैं: चलो उठो.... भोजन कर लो|

भौजी: अगर आप मुझसे बात नहीं करोगे तो मैं नहीं खाऊँगी|

मैं: भोजन मैंने भी नहीं किया है... अपना हिस्स का मैंने नेहा को खिला दिया था| अगर आपको नहीं खाना तो मत कहाओ, मैं थाली यहीं रख के जा रहा हूँ|

भौजी: रुकिए, आप मेरे साथ ही खा लीजिये|

मैं: नहीं.... रसिका भाभी आजकल ज्यादा ही नजर रख रहीं है हम पर| मैं जा रहा हूँ आप भोजन कर लो|

मुझे संदेह था की भौजी भोजन नहीं करेंगी इसलिए मैं पानी देने के बहाने वापस आया| देखा तो भौजी गर्दन झुकाये बेमन से भोजन कर रहीं थी| मैं पानी का गिलास रख के वापस जाने लगा तो भौजी बोलीं; "देख लो मैं भोजन कर रहीं हूँ, आप भी भोजन कर लो|" मैंने उनकी बात का जवाब नहीं दिया बस गर्दन हाँ में हिलाई और बहार चला आया| मैं चुप-चाप नेहा को गोद में लिए अपनी चारपाई पे लेट गया| करीब पंद्रह मिनट बाद भौजी बहार आईं और मुझे लेटा हुआ देखा, साफ़ था की मैंने भोजन नहीं किया है| मैं कनखी नजरों से उन्हें देख रहा था, वो बर्तन रख के रसोई की ओर गईं परन्तु आज सारे बर्तन खाली थे, कुछ भी भोजन नहीं बचा था| भौजी पाँव पटकते हुए मेरे पास आईं और मेरे कान में खुस-फुसाई; "आपने भोजन नहीं किया ना? चलिए उठिए मैं कुछ बना देती हूँ, नहीं तो कुछ नमकीन वगैरह ही खा लीजिये| प्लीज उठिए ना ..." पर मैं कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा था और सोने का नाटक कर रहा था| उनकी बेचैनी और तड़प मैं साफ़ महसूस कर पा रहा था पर मैं शिथिल पड़ा रहा| भौजी ने नेहा को अपने साथ ले जाने के लिए जब उठाने लगी तो मैंने नेहा को और कसके अपनी छाती से जकड लिया| अब भौजी समझ गईं थी की मैं सोने का नाटक कर रह हूँ इसलिए वो फिर से कुछ खाने के लिए जोर देने लगीं| “चलिए ना... कुछ तो खा लीजिये? प्लीज ..... प्लीज ..... अगर खाना नहीं था तो मुझे क्यों खाने को कहा? प्लीज चलिए ना, मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ प्लीज !!”

मैं कुछ नहीं बोला, परन्तु लगता है शायद पिताजी ने भौजी की खुसफुसाहट सुन ली इसलिए वे अपनी चारपाई से मेरी चारपाई की ओर देखते हुए बोले; "क्या हुआ बहु बेटा? क्या ये नालायक फिर तंग कर रहा है?" पिताजी की आवाज बड़ी कड़क थी अगर मैं कुछ नहीं bolta तो भौजी पिताजी से अवश्य कह देती की मैंने कुछ नहीं खाया| इसलिए मैं बोल पड़ा; "नहीं पिताजी, नेहा मेरे साथ सो रही है और भौजी उसे लेने आईं है पर नेहा ने मेरी टी-शर्ट पकड़ रख है| मैं इन्हें कर रहा हूँ की नेहा को यहीं सोने दो पर ये मान ही नहीं रही?" पिताजी बोले; "सोने दो बहु दोनों चाचा-भतीजी को एक साथ| और तुम भी जाके सो जाओ रात बहुत हो रही है|" भौजी चुप-चाप चलीं गई पर जाते-जाते भी वो शिकायत भरी नजरों से मुझे देख रहीं थी| एक नै सुबह, और आज मैं जल्दी उठ गया| खाली पेट सोने कहाँ देता है!!! दैनिक दिनचर्या निपटा कर मैं सही समय का इंतेजआर करने लगा| आज रविवार था तो नेहा के स्कूल की छुट्टी थी, तो मैं नेहा के साथ खेलने में लगा था| जैसे ही पिताजी और बड़के दादा खेत में काम करने को निकले मैं पहले रसिका भाभी को ढूंढने लगा| और मेरा अंदाजा सही निकला, भाभी बुखार का बहाना करके बिस्तर पर पड़ी हुई थीं| मैं उनका हाल-चाल पूछने लगा और वो कहने लगी की तबियत नासाज़ है और वो तो बस आजका दिन आराम ही करेंगी| अब मैं नेहा को अपनी ऊँगली पकड़ा कर बड़की अम्मा और माँ के पास पहुँचा|

अम्मा और माँ कच्चे आम धो के काट रहे थे, आचार बनाने के लिए|

मैं: अम्मा मुझे आपसे कुछ बात करनी थी|

बड़की अम्मा: हाँ कहो मुन्ना

मैं: अम्मा देखो आप तो जानते ही हो की भौजी मेरी वजह से शादी में नहीं गई| तो मैं सोच रहा था की आज मैं, आप, माँ, नेहा, भौजी और रसिका भाभी सब पिक्चर देखने जाएँ| पिताजी और अब्द्के दादा को इसलिए नहीं लजायेंगे क्योंकि उनके होते हुए भाभियाँ असहेज महसूस करेंगी| तो चलिए ना ?

बड़की अम्मा: देखो मुन्ना हमें तो ये फिल्म-विल्म का शौक है नहीं| तुम जाओ और बहुओं को ले जाओ| अब कहँ हम इन फिल्मों के चक्कर में पड़ें|

माँ: ठीक है बेटा तू बहुओं को साथ ले जाना उनका भी मन बहल जायेगा|

मैं तुरंत वहाँ से रसिका भाभी के पास दुबारा भागा, क्योंकि अब वो ही एक काँटा रह गई थी हमारे बीच! रसिका भाभी घोड़े बेच के सो रही थी, इसलिए मैं दुबारा अम्मा के पास आया और उन्हें बताया;

मैं: अम्मा, रसिका भाभी तो घोड़े बेच के सो रहीं हैं| सुबह जब मैंने उनसे हाल-चाल पूछा था तो उन्होंने कहा था की उनका बदन टूट रहा है और बुखार भी है| इसलिए वो सारा दिन आराम करेंगी| तो अब क्या करूँ?

ये सुनके बड़की अम्मा थोड़ा चिंत में पड़ गईं, परन्तु इसे पहले वो कुछ कहतीं मैंने भोली सी सूरत बनाई और कहा;

मैं: अम्मा अगर आपकी आज्ञा हो तो मैं नेहा और भौजी फिल्म देख आएं?

बड़की अम्मा: हाँ... ये ठीक रहेगा| तुम तीनों हो आओ|

मैं: परन्तु अम्मा घर में सब का खाना कौन बनाएगा?

बड़की अम्मा: मुन्ना तुम चिंता नहीं करो... मैं संभाल लुंगी| तुम जाओ इसे बहाने बहु का मन भी कुछ हल्का होगा|

मैं ख़ुशी-ख़ुशी भौजी के घर में घुसा तो देखा भौजी जमीन पे बैठी, सर झुकाये शायद रो रहीं थी| आज सुबह से मैंने उन्हें अपनी शक्ल नहीं दिखाई थी और वैसे भी मैंने कल से बोल-चाल बंद कर रखी थी| उन्हें इस तरह उदास देख के मन तो बहुत दुखा|

मैं: चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, हम फिल्म देखने जा रहे हैं|

भौजी ने मेरी ओर देखा और आँखों ही आँखों जैसे इस सब का कारन पूछ रहीं हो|

मैं: बाकी बातें रास्ते में, जल्दी करो दोपहर का शो है, सिर्फ आप मैं और नेहा ही जा रहे हैं| अगर पिताजी और बड़के दादा आ गए तो जबरदस्ती रसिका भाभी को भी ले जाना पड़ेगा|

भौजी जल्दी से उठीं और फटाफट तैयार होने लगीं और इधर मैं भी भाग के गया और पाँच मिनट में तैयार हो के आ गया| परन्तु भौजी ने तैयार होने में आधे घंटे का समय लिया, और लें भी क्यों ना औरत जो हैं!!! पर एक बहुत अवश्य कहूँगा की ये आधे घंटे का इन्तेजार व्यर्थ नहीं गया| जब भौजी को मैंने देखा तो बस बिना आँखें झपकाये देखता ही रह गया! पीतांबरी साडी में भौजी बहुत सुन्दर लग रहीं थी| उसपे पीले और नारंगी रंग की मिली जुली बिंदी... हाय!!! बस उन्होंने लिपस्टिक नहीं लगाईं थी परन्तु उसे उनकी सुंदरता में कुछ भी कमी नहीं आई| सर पे पल्लू और साडी में बने फूल का डिज़ाइन जिसे की बड़े प्यार से काढ़ा हुआ था..... हाय..हाय.हाय..!!! गजब!!! उँगलियों पे नेलपॉलिश और उनके बदन से आ रही गुलाब की सुगंध ने तो मुझे मन्त्र मुग्ध कर दिया| मन किया भौजी को भगा ले जाऊँ!

भौजी बड़े िढ़ालते हुए मेरे पास आईं और बोलीं; "चलना नहीं है क्या? पिक्चर छूट जायेगी!!!" हाय उनके कोकिल कंध से निकले शब्दों ने तो जैसे मुझे सन्न कर दिया|माँ को बाय-बाय कह के हम निकल पड़े| हमारे घर से मुख्य सड़क करीब पंद्रह मिनट दूर है|हम घर से करीब दस मिनट की दूरी पर आ चुके थे| अब भौजी ने बातें शुरू किया;

भौजी: अगर आप बुरा ना मनो तो एक बात कहूँ?

मैं: हाँ..हाँ बोलो

भौजी: आज आप बहुत हङ्सुम... लग रहे हो|

मैं: (भौजी के इस तरह हड़बड़ा कर अंग्रेजी में हैंडसम बोलने पे मुझे हंसी आ गई|) आप का मतलब हैंडसम ? हा..हा...हा...हा...

भौजी: हाँ..हाँ.. वही हैंडसम लग रहे हो!

मैं: थैंक यू|

भौजी का ऐसा कहने ककरण ये था की मैंने आज लाल रंग की टाइट वाली टी-शर्ट पहनी थी| ऊपर क दो बटन खुले थे और कालर खड़े किये हुए थे| नीचे मैंने ब्लू जीन्स पहनी थी और ब्राउन लोफ़र्स| मैं चलते समय अपने दोनों हाथ जीन्स के आगे की दोनों पॉकेट में डाले चल रहा था|

मैं: वैसे क़यामत तो आज आप ढा रहे हो| बस अपना ये घूँघट थोड़ा काम करो| सर पे पल्ला केवल अपने बालों के जुड़े तक ही रखो|
भौजी ने तुरंत ही मेरा सुझाव मान लिया और अपनी तारीफ सुन के थोड़ा मुस्कुराईं| फिर अचानक से गंभीर होते हुए बोलीं;

भौजी: आई...ऍम... सॉरी!

मैं: आपको सॉरी कहने की कोई जर्रूरत नहीं, मैं आपसे नाराज नहीं हूँ| मैंने तो आपको कल ही माफ़ कर दिया था| दरअसल मैं थोड़ा ज्यादा ही सेंसिटिव मतलव संवेदनशील हूँ| मैं जल्दी ही बातों को दिल पे ले लेता हूँ| आपने जरा सा मजाक ही तो किया था, और मैं बेकार में इतना भड़क गया और आपको डाँट दिया| I’M Sorry !!! वादा करता हूँ की मैं अपने इस व्यवहार को सुधारूँगा|

भौजी: आप जानते हो की आपकी एक ख़ास बात जिसने मुझे प्रभावित किया वो क्या है? आप अपनी गलती मानने में कभी नहीं जिझकते|

मैं: बस एक अच्छाई ही है... एक बुराई भी है| मैं बहुत जल्दी पिघल जाता हूँ... उस दिन जब आपने माधुरी और मेरी बात सुन ली थी, उस दिन मुझे माधुरी के लिए वाकई में बहुत बुरा लग रहा था| आखिर उसका दिल मेरी वजह से टूटा|

भौजी: ये बुराई नहीं है, आप किसी को भी दुखी नहीं देख सकते बस! चाहे वो इंसान कितना ही बुरा क्यों ना हो| खेर मैं आपसे नाराज हूँ!

मैं: क्यों?

भौजी: कल रात आपने खुद कुछ नहीं कहे और जबरदस्ती मुझे भोजन करा दिया| ऐसा क्यों किया आपने? जानते हैं आपने मुझे पाप का भागी बना दिया!

मैं: मैं प्रायश्चित कर रहा था|

भौजी: कैसा प्रायश्चित?

मैं: कल सारा दिन मैंने अपना जूठा गुस्सा दिखा के आपको बहुत तंग किया| मैं जानता हूँ आप मेरे इस बर्ताव से कितना बुझे हुए थे| मैं आपसे बात नहीं कर रहा था.. आपके आस-पास होक भी आपसे दूर था| इसलिए मैं प्रायश्चित कर रहा था|

भौजी: तो वो सब आप दिखाव कर रहे थे.... हाय राम! आपने तो मेरी जान ही निकाल दी थी| अब बड़े वो हैं!
(ये कहते हुए भौजी ने मेरी छाती पे धीरे से मुक्का मारा)

मैं: आह! हा..हा...हा...हा...


The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:07

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अब आगे...

भौजी: तो वो सब आप दिखाव कर रहे थे.... हाय राम! आपने तो मेरी जान ही निकाल दी थी| अब बड़े वो हैं!
(ये कहते हुए भौजी ने मेरी छाती पे धीरे से मुक्का मारा)

मैं: आह! हा..हा...हा...हा...

भौजी: अच्छा ये तो बताओ की ये अचानक फिल्म का प्लान कैसे बनाया आपने?

मैं: उस दिन आपने कहा था ना की आपने आखरी बार पिक्चर दिम्मी में हमारे घर पे देखि थी| तो मैंने सोचा की क्यों ना आपको एक पिक्चर तो दिखा ही दूँ| आखिर आपका पति हूँ! और इसी बहाने मैं आपकी फीस भी चूका दूँगा!!!

भौजी: अच्छा जी!!! मतलब आगे से आप से कुछ भी कहूँ तो मुझे सोच-समझ के कहना होगा वरना आप मेरी अनजाने में कही हर बात पूरी कर दोगे| और रही बात फीस की तो वो अब भी अधूरी है!!!

मैं: चिंता ना करो आज के दिन मैं आपकी फीस तो अवश्य दे दूँगा!

भौजी: अच्छा ये तो बताओ की पिक्चर कौन सी है?

मैं: तारा रम पम पम....

भौजी ने मेरा हाथ थाम लिया जैसे कोई नव विवाहित जोड़ा एक दूसरे का हाथ पकड़ चलता है! भौजी बहुत खुश थीं... हम इसी तरह बातें करते-करते मुख रास्ते पे पहुंचे और बाजार के लिए जीप में बैठ गए| मैं भौजी के साथ एक दम चिपक के बैठा था और मेरा हाथ उनके कंधे पे था| भौजी ने घूँघट कर रखा था और वो कसमसा कर मेरी छाती से चिपकी हुई थीं और नेहा मेरी गोद में बैठी थी|

हम थिएटर पहुंचे और थिएटर की हालत देख के मैंने अपना सर पीट लिया| थर्ड क्लास थिएटर... बेंत की कुर्सियां, आराम से बैठना तो भूल ही जाओ| ना कोई AC न कुछ .... बस छत पे और बगल में लगे पंखे जो इतने बूढ़े थे की चलते समय कांपते थे और इतनी आवाज़ करते थे की बिचारा हीरो अपना डायलाग भूल जाये| पॉपकॉर्न की तो बात ही मत पूछो! खाने के लिए वहाँ कुछ नहीं था! वहाँ आने वाले ज्यादातर लौंडे थे जो अपनी-अपनी आइटम ले के आते थे| शायद ही ये थिएटर कभी हाउस फुल रहा हो| न फर्श पे कालीन न दीवारों पे पैंट... अंग्रेजी में कहें तो SHIT HOLE !!! अगर मैं B GRADE मूवी दिखाने वाले थिएटर से तुलना करूँ तो वो थिएटर इस पुराने थिएटर के सामने शीश महल लगेंगे| शुक्र है मैंने अपने मित्रों को कभी इस बारे में नहीं बताया वरना वो बहुत मजाक उड़ाते! खेर अब पिक्चर दिखाने लाया था तो पिक्चर तो दिखानी पड़ी! मैंने काउंटर से टिकट खरीदी और अंदर हॉल में घुसा| किस्मत से हॉल में ज्यादा लोग नहीं थे| कुल मिला कर मुझे वहाँ पंद्रह-बीस लोग दिखे| हमारी सीट ऊपर से चौथी लाइन में कोने की थीं| परन्तु हॉल पूरा खाली था तो मैंने बीच की सीट में ही बैठने का फैसला किया| पर भौजी ने मना कर दिया| मैंने नेहा को गोद में ले रखा था इसलिए सबसे पहले उसे बिठाया और फिर उसकी बगल में मैं बैठ गया और भौजी को नेहा की दूसरी बगल बैठने को कहा| इसपर भौजी ने नेहा को गोद में उठाया और मेरी बगल में बैठ गयीं और नेहा को अपनी बगल में बिठाया| मैंने भौजी से बस इतना ही कहा; "ध्यान रखना उसका कहीं उठ के भाग ना जाए!" भौजी ने गर्दन हिला के अपनी सहमति दी| उसके बाद भौजी मेरा हाथ अपने हाथ से लॉक करके बैठ गईं| उनकी गर्दन मेरे कंधे पे टिकी थी|

पिक्चर शुरू होने से पहले जो Advertisemnts होते हैं वो दिखाए जा रहे थे| पर भौजी तो जैसे मुझसे लिपटी हुई थीं...

मैं: आप बड़े रोमांटिक हो रहे हो!

भौजी: तो?

मैंने पीछे मुड़ के देखा की कोई हमारे पीछे तो नहीं बैठा, तो देख के हैरान हुआ की हॉल का एक कर्मचारी जो सब को सीटें बता रहा था वो हमें ही देख रहा था| चूँकि अभी तक लाइट्स बंद नहीं हुई थी और हलकी सी रौशनी में वो हमें साफ़ देख रहा था और मुस्कुरा रहा था| शायद वो सोच रहा होगा की हम पति-पत्नी हैं!

मैं: यार .... पीछे वो आदमी हमें ही देख रहा है और मुस्कुरा रहा है|

भौजी: तो मुस्कुराने दो! छोडो उसे ... तो मेरी फीस कब पूरी करोगे?

मैं: यहाँ नहीं, ये सार्वजानिक जगह है|

भौजी: ना मैं कुछ नहीं जानती... मुझे एक KISS अभी चाहिए|

मैं: अभी? नेहा ना देख ले... अच्छा कम से कम लाइट्स तो बंद होने दो|

भौजी कहाँ मानने वालीं थी और उन्होंने मेरे गाल पे अपने होंठ रख दिए| मैंने अपनी गर्दन अलग की और उनकी तरफ देखने लगा| उनकी आँखों में मुझे वो तड़प साफ़ नज़र आ रही थी.... वो कशिश जिसने मुझे पागल बना रखा था| मैंने अपना हाथ उनके कंधे पे रखा और उनके माथे को चूम लिया| वो आदमीं वहाँ से हमें ये सब करते हुए साफ़ देख सकता था|
मैं: अब तो खुश?

भौजी: ना ... ये तो ब्याज था असल तो अभी बाकी है|

मैं: पहले लाइट बंद होने दो फिर असल भी दे दूँगा|

इतने में नेहा बेचारी अकेला महसूस करने लगी और छटपटाने लगी| भौजी उसे प्यार से समझने लगी पर वो नहीं मानी| मैंने नेहा को अपनी गोद में ले लिया और उसे अपनी गोद में बिठा के पिक्चर देखने को कहा| भौजी एक पल के लिए थोड़ा नाराज हुई;

भौजी: इसी के साथ देख लो आप पिक्चर, मैं चली|
(मैंने उनका हाथ पकड़ के उन्हें वापस अपनी तरफ खींच लिया|)

मैं: यार आप ही बताओ इस बेचारी को अकेलापन नहीं लगेगा? नेहा बेटा आपको अकेलापन लग रहा था ना?

नेहा: हाँ चाचू ... मैं यहीं बैठ के पिक्चर देखूंगी|

भौजी: शैतान ... पापा की टांगें दुखेंगी|

मैंने भौजी की तरफ देखा और उन्हें आँखों से इशारा किया की ये आप क्या कह रहे हो? पर भौजी बाज़ नहीं आईं, आजतो जैसे उन्होंने सोच लिया था की आज वो मेरी खाट कड़ी कर के रहेंगी|

भौजी: बेटा पिक्चर ढाई घंटे की है... तबतक तू गोद में बैठेगी तो चाचा के पाँव में खून रूक जायेगा| फिर उन्हें चलने में दिक्कत होगी| चल उतर नीचे शैतान और अपनी कुर्सी पे बैठ|

नेहा: भी अब होशियार हो गई थी उसने भौजी से ऐसा सवाल पूछ ही लिया की भौजी एक पल के लिए स्तब्ध रह गईं;

नेहा: मम्मी ... ये तो चाचू हैं| पापा तो घर पर हैं!

भौजी का मुँह बन गया पर वो जानती थीं की अगर उन्होंने नेहा से कुछ कहा तो मैं बिगड़ जाऊँगा| इसलिए मैंने बात बनाते हुए कहा;

मैं: बेटा आपकी मम्मी का मतलब था चाचू की गोद से उतरो| आप हमेशा अपने पापा के साथ ही घूमने जाते हो ना तो इसलिए उन्हें एक पल के लिए लगा होगा की मेरी जगह आपके पापा ही बैठे हैं|

नेहा: पर पापा तो हमें कहीं ले जाते ही नहीं|

भौजी: (बीच में बोल पड़ीं) बेटा देखो आपके चाचू हमारा कितना ख्याल रखते हैं इसलिए मैंने कहा की ये आपके पापा की तरह ही हैं| अब चलो एक बार "पापा" कहो?

मैं फिर से भौजी को घूर के देखने लगा और उनसे शिकायत करने लगा की ये आप क्या कह रहे हो| इतने में नेहा बोल पड़ी; "पापा"

उसके मुँह से "पापा" सुन के अनायास ही मेरे मुख से निकला; " Awwww मेरा बच्चा !!!" और मैं एक दम से भावुक हो गया और नेहा को अपनी छाती से कस के लगा लिया| सच में उस दिन मुझे पता चला की किसी बच्चे के मुख से "पापा" सुन के कितनी ख़ुशी मिलती है| नेहा के छोटे-छोटे हाथों ने भी मेरी पीठ के इर्द-गिर्द पकड़ बन ली, और जैसे उसने सच में मुझे अपना "पापा" मान लिया हो| भौजी की आँखों से भी आँसूं की बूंदें छलक आईं थी| तभी लाइट्स ऑफ हुईं और मैंने नेहा को अपनी छाती से अलग किया और उससे बड़े प्यार से कहा; "बेटा कभी भी भूल से सब के सामने मुझे पापा मत कहना, ठीक है? जब हम अकेले में हों तब ही पापा कहना|" नेहा ने हाँ में सर हिलाया और मैंने उसे गोद में ठीक से बिठाया जिससे नेहा का मुँह परदे (स्क्रीन) की ओर था| पिक्चर शुरू हो चुकी थी परन्तु भौजी का ध्यान अब भी नेहा के "पापा" कहने पे लगा हुआ था| मैंने भौजी की ठुड्डी को पकड़ा ओर उन्हें उनके ख्यालों से बाहर निकाला|

मैंने खुसफुसाते हुए उनसे कहा;

मैं: थैंक यू!!!

भौजी: किस लिए?

मैं: आज आपने मुझे एक अनमोल सुख दिया| नेहा के मुँह से "पापा" सुनके देखो मेरे रोंगटे खड़े हो गए|

भौजी: मैं भी ... आज मानो मेरी एक हसरत मेरी प्यारी बेटी ने पूरी कर दी|

मैं: हमारी बेटी!!! चलो अब पिक्चर देखो|

भौजी: नहीं पहले मेरी फीस ....

मैं: अच्छा बाबा ये लो....

इतना कह के मैं भौजी की ओर मुड़ा और उनके होंठों पे Kiss किया| मुझे लगा था की ये बस छोटा सा Kiss होगा परन्तु भौजी बेकाबू होने लगीं और मेरे निचले होंठ को अपने होठों में दबा लिया और चूसने लगीं| अब मुझे थोड़ी जिझक हो रही थी क्योंकि नेहा मेरी गोद में बैठी थी परन्तु उसका ध्यान फिल्म पर था| मैंने कनखी आँखों से उसे देखा, जब मुझे लगा की उसका ध्यान आगे की ओर है तब मैंने अपना डायन हाथ भौजी के दायें गाल पे रखा ओर उन्हें पूरी भावना से (Passionately) Kiss करने लगा| कभी मैं उनके होंठ चूसता तो कभी वो मेरे होंठ चूसती| उनके मुख से मुझे मीठी सी सुगंध आ रही थी जिससे मैं बेकाबू होने लगा था| मैंने एक बार फिर से नेहा की ओर कनखी नजरों से देखा तो ऐसा लगा जैसे वो कुछ कहने वाली है, मैं तुरंत भौजी से अलग हो गया| और एक पल के लिए पीछे खड़े उस कर्मचारी की ओर देखा, वो साल अब भी हमें ही देख रहा था| मैं झेंप गया ओर भौजी के कंधे पे हाथ रखते हुए उनके कान में खुसफुसाया;

मैं: वो आदमीं पीछे से हमें Kiss करते हुए देख रहा था|

भौजी: तो क्या हुआ?

मैं: कुछ नहीं ... छोडो और फिल्म देखो|

भौजी: मैं आपसे अब भी नाराज हूँ, आपने मेरी फीस ठीक से नहीं दी|

मैं: अरे बाबा, फिल्म दिखाना फीस की पहली किश्त थी| अभी दो किश्तें और बाकी हैं| और ये Kiss तो दवाइयों का खर्च समझ लो|अब चैन से फिल्म देखो|

भौजी: आपने तो मेरी उत्सुकता और भी बढ़ा दी|

बस भौजी फिर से मेरे कंधे पर सर रखके फिल्म देखने लगी| पर मेरा मन फिल्म में बिलकुल भी नहीं लग रहा था, पंखों के शोर ने और इस तंग कुर्सी ने बुरा हाल कर दिया| परफिर भी मन मार के भौजी के लिए वहीँ बैठा रहा| भौजी ने अपने दोनों हाथों से मेरे दायें हाथ को थम हुआ था और बहुत ही दिलचस्पी के साथ फिल्म देख रहीं थी| बीच-बीच में मैं उन्हिएँ फिल्म के कुछ पहलुओं के बारे में भी बता देता था और भौजी बड़े गौर से बात सुनती| इंटरवल हुआ तो नेहा फिर से मेरी ओर मुड़ी ओर मेरी छाती से चिपक गई| एक घंटे से बेंत वाली कुर्सी पे बैठे-बैठे मेरी हालत बुरी हो गई| मैं उठा और भौजी से बोला; "आप नेहा को सम्भालो मैं बाथरूम हो के आता हूँ|" जब मैं चलने लगा तो ऐसा लगा जैसे पूरे पिछवाड़े में बेंत छप गई हो! बाथरूम हो के आया और साथ में नेहा के लिए चिप्स का एक पैकेट ले आया| चिप्स देख के नेहा बहुत खुश हो गई और फिर से मेरी गोद में आने के लिए जिद्द करने लगी| भौजी उसे मन कर रही थी पर मैंने खुद ही नेहा को अपनी गोद में ले लिया और उसे चिप्स का पैकेट दे दिया| दूसरा पैकेट चिप्स का मैंने भौजी को दिया और हम बैठे चिप्स खाने लगे| कुछ ही देर में इंटरवल ख़त्म हुआ और फिल्म चालु हुई| अब भौजी समझ गईं थी की मेरा फिल्म देखने में जरा भी इंटरेस्ट नहीं है| इसलिए उन्होंने शरारत करना शुरू कर दिया| वो अपनी उँगलियों को मेरी गर्दन, कान और होठों पे घुमाने लगीं| मैंने उनकी ओर मुड़ के देखा तो उनकी आँखें परदे (स्क्रीन) पे टिकी थीं ओर वो ऐसे दिखा रहीं थी जैसे उनकी उँगलियाँ अपने आप ही मेरे साथ खेल रहीं हो| अब शरारत करने की बारी मेरी थी तो जैसे ही उन्होंने अपनी ऊँगली मेरे होठों पे फिर से फेरी मैंने गप से उनकी ऊँगली अपने मुंह में भर लीं और चूसने लगा| उनकी उँगलियों से मुझे अभी-अभी खाए चिप्स का स्वाद आ रहा था और मैं उनकी उँगलियाँ चाटने लगा और भौजी ने कोई भी प्रतिक्रिया करना बंद कर दिया| कुछ देर बाद मैंने अपना हाथ उनके कंधे से हटाया और उनका बायां हाथ जिसकी उँगलियाँ मैं चूस रहा था उसे पकड़ के हटा दिया पर भौजी की शरत खत्म नहीं हुईं और उन्होंने अपने दायें हाथ से मेरा दायाँ हाथ पकड़ा और मेरी बीच वाली ऊँगली अपने मुंह में ले के चूसने लगी|

वो मेरी ऊँगली ऐसे चूस रहीं थी जैसे उनके मुंह में मेरा लंड हो और बीच-बीच में भौजी मेरी ऊँगली को हलके से काट लेती थी| अब मैंने अपना बायें हाथ को अपने माथे पे रख लिया, क्योंकि अब मेरी हालत खराब होने लगी थी| नेहा मेरी गोद में बैठी थी और नीचे लंड पंत में तम्बू बनाने लगा था| मैंने अपनी ऊँगली छुड़ाने की कोशिश की पर उन्होंने नहीं छोड़ा और उल्टा अपने बाएं हाथ को मेरे गले पे रखा और उँगलियों को चालते हुए नीचे की ओर बढ़ने लगीं| मेरी पैंट की जीप के ऊपर पहुँच कर वो अपनी उँगलियों से मेरे लंड को पकड़ने की कोशिश करने लगीं| अब चूँकि मैंने जीन्स पहनी थी इसलिए वो लंड पकड़ नहीं पा रहीं थी| मैंने अपने बाएं हाथ से उनका हाथ हटाया और धीरे से अपनी ऊँगली उनके मुँह के गिरफ्त से छुड़ाई| भौजी मुस्कुराते हुए मुझे देखने लगी; "आप बहुत शरारती हो! मेरी हालत खराब कर दी आपने ... वो बुरी तरह से फूल चूका है| अब प्लीज चुप-चाप पिक्चर देखो| कोई शैतानी नहीं! " भौजी अपनी ऊँगली को दाँतों टेल दबाते हुए दुबारा पिक्चर देखने लगीं| मेरी आवाज सुनके नेहा भी पलट के हमें देखने लगी और मैंने बस इतना कहा; "बीटा कुछ नहीं आप पिक्चर देखो|" कुछ देर में पिक्चर खत्म हुई और हम उठ के खड़े हुए| काफी देर से नेहा मेरी ही गोद में थी तो भौजी ने उसे अपनी गोद में ले लिया| मैं आगे -आगे चल रहा था और भौजी और नेहा पीछे थे| मैंने मुड़ के देखा तो पाया भौजी नेहा को कुछ समझा रहीं थी| मैं समझ गया की माजरा क्या है, और मैंने फिर से नेहा को अपनी गोद में ले लिया और हम बाहर आ गए|