एक अनोखा बंधन

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The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:24

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भौजी: Don’t yo tell me that your “little princess” ordered all this?

मैं: mmm… As a matter of fact she did!

भौजी गुस्से में मुंह बना के मुझे देखने लगती हैं|

मैं: Oh Come on Yaar…. It’s nothing! Just a Veg Biryani, Makhni Dal, Shahi Paneer and Rumali Rotis.

भौजी: आप ना..... (भौजी कहते-कहते रुक गईं और मुझसे रूठ गईं)

मैंने नेहा को गोद से उतार और बाथरूम में हाथ धोने भेज दिया| फिर मैं उनके पास गया और घुटनों पे बैठ के उनके चेहरे को ऊपर किया और होठों पे kiss किया| तब जाके उनका गुस्सा शांत हुआ|

भौजी: अब कितने पैसे बचे हैं आपके पास?

मैं: काफी हैं!!!

भौजी: एक-दो दिन रुकने के लिए काफी हैं?

मैं: (पूरा आत्मविश्वास दिखाते हुए कहा) हाँ!

जबकि ऐसा नहीं था| मेरे पास सिर्फ ३००/- बचे थे| ५००/- का किराया और ३००/- का खाना-पीना| कुछ मेरे पास पहले से भी थे! इतने में नेहा बहार आ गई और हम खाने के लिए सोफे पे बैठ गए|

मैं: मैं नीचे अंकल से पूछ रहा था की बहार हालात कैसे हैं? उन्होंने बताया की अभी कुछ शान्ति है पर इस समय कोई टैक्सी या जीप नहीं मिलेगी| साथ ही साथ मैंने पिताजी को फ़ोन भी कर दिया|

भौजी: क्या बात हुई पिताजी से?

मैं: उन्हें साड़ी बात बताई और वो कह रहे थे की तुम लोग रुके कहाँ हो? तो मैंने उन्हें ये बताया की हम धर्मशाला में ठहरे हैं| दो कमरे बुक हैं, एक मेरा और एक आपका और नेहा का|

भौजी: अच्छा किया जो आपने फोन करके बता दिया| अब कम से कम घर में कोई चिंता तो नहीं करेगा|

फिर खाना शुरू हुआ...मैं नेहा को खिला रहा था और भौजी मुझे| खान-खाते खाते नौ बज गए और थोड़ी देर बाद बैरा भी आ गया बर्तन लेने| मैंने उसे फिर से टिप दी और कुछ लाने को भी कहा, वो ख़ुशी-ख़ुशी चला गया| भौजी ने मुझे उससे खुसुर-फुसुर करते देख लिया था|

भौजी: क्या कह रहे थे आप उससे?

मैं: कुछ नहीं|

भौजी: जूठ.... बताओ अब क्या मंगाया है आपने?

मैं: कुछ नहीं बाबा!

आधे घंटे बाद वो बैरा तीन ग्लास गर्म दूध ले आया जो मैंने रिसीव किया और दरवाजा लॉक अकरके बैठ गया|

भौजी: आपको पता है ना मैं दूध नहीं पीती?

मैं: हाँ... पर फिर मैं आपको जैसे-तैसे पिला भी तो देता हूँ|

भौजी: ना.... आपने भी मुझे उस दिन एक Kiss के लिए बहुत तड़पाया था ना?

मैं: ठीक है... मैं भी नहीं पियूँगा|

भौजी: तो मंगाया क्यों?

मैं: ताकि हम दोनों पी सकें|

भौजी: अच्छा बाबा...आप जीते.... मैं हारी!

तब जाके उन्होंने वो दूध पिया|

दूध पीने के बाद मैंने नेहा को अपनी गोद में लिया और उसे सुलाने के लिए कहानी सुनाई| भौजी भी मेरे पास ही बैठी थीं और मेरे कंधे पी सर रख के कहानी सुनने लगीं| कहानी सुनते-सुनते नेहा सो गई, फिर मैंने उसे सोफे पी ठीक से लिटाया और एक चादर ओढ़ा दी क्योंकि AC ओन था| तबतक भौजी उठ के अपने कपडे उतार रहीं थी| अब हमारे पास कपडे तो थे नहीं बदलने को...क्योंकि वो बैग पिताजी के पास रह गया था|भौजी अपनी साडी उतार रहीं थी और मैं खड़ा उन्हें देख रहा था| तभी भौजी ने नजर उठा के मेरी ओर देखा और कहा;

भौजी: क्या देख रहे हो?

मैं: कुछ नहीं....

भौजी: लो आप ही उतार दो| (ऐसा कहते हुए उन्होंने साडी का एक कोना मेरी ओर बढ़ा दिया)

मैं: ना...आप ही उतारो|

भौजी ने साडी बड़ी अदा के साथ उतारी और उसे तहा के अलमारी में रख दिया| अब वो सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में थी| मुझे लगा की वो ऐसे ही सोयेंगी पर देखते ही देखते वो अपने ब्लाउज के बटन खोलने लगीं, और ब्लाउज भी उतार के साडी के साथ रख दिया| मेरे सामने भौजी ब्रा और पेटीकोट में थीं| बहुत ही कामुक दृश्य था और उस एक पल के लिए मैं साड़ी चिंताएं भूल गया|

भौजी: आप ऐसे ही सोने वाले हो?

मैं: नहीं....

मैंने भी अपनी टी-शर्ट उतारी और जीन्स उतार के पलंग पी रख दी| ये मेरी बहुत बुरी आदत है की मैं अपने कपडे जहाँ-तहँ फेक देता हूँ| भौजी ने वो कपडे उठाये और तहा ने लगीं| इसी बीच में बाथरूम चला गया| जब मैं बाथरूम से निकला तो कमरे में बस एक लाल रंग का जीरो वाट का बल्ब जल रहा था और भौजी बिस्तर पी मेरी ओर करवट लेके लेटीं थीं और उन्होंने चादर ओढ़ रखी थी|

मैं: ठण्ड लग रही है तो AC बंद कर दूँ?

भौजी: नहीं... कपडे कम पहने हैं ना इसलिए...चलने दो!

मैं कच्छे और बनियान पहने था... तो मैंने AC थोड़ा धीमे कर दिए और मैं भी चादर के अंदर घुस गया| एक चादर के अंदर मैं और भौजी वो भी बस अपने inner garments में! वाओ!
मैं भी भौजी की ओर करवट लेके लेट गया पर उन्हें जरा भी स्पर्श नहीं किया| मेरे हाथ अपनी जगह थे| भौजी ने अपना हाथ उठा के मेरी कमर पे रखा, और तब मैंने भी अपना हाथ उठा के उनकी कमर पे रखा| दोनों की धड़कनें तेज होने लगीं थी...!!! हम दोनों प्यासी नजरों से एक दूसरे को देख रहे थे और बस मन कर रहा था की टूट पड़ो! मैंने ही पहल की और अपने होठों को उनके करीब लाया ओर उनकी आँखों में देखते हुए उनकी सहमति माँगी| जिसे उन्होंने बड़े प्यार से अपनी नजरें झुका कर दे दिया| मैंने उनके होठों को अपने होठों से छुआ और धीरे से उनके नीचले होंठ को अपने मुंह में suck कर लिया और उसे चूसने लगा| भौजी ने अपना हाथ मेरी कमर से हटा के मेरे सर के बालों में घुसा दिया और उँगलियाँ फिराने लगीं| मैंने अपने मुंह को थोड़ा और खोला और उनके दोनों होठों को मुंह में भर कर चूसने लगा| अब भौजी ने भी सहयोग देना शुरू कर दिया|उनकी तरफ से मिल रहे सहयोग के चलते मैंने उनके होठों को छोड़ दिया और उन्होंने अब अपनी जीभ मेरे मुख में प्रवेश करा दी| मैंने भी अपनी जिह्वा को खुला छोड़ दिया और मेरी जीभ उनकी जीभ से खेलने लगी| भौजी ने अपना हाथ मेरे बालों से हटा के मेरी बनियान के अंदर डाल दिया और अब मेरा भी मन कर रहा था की मैं खुद को Unleash कर दूँ उन पर.........| पांच मिनट के Smooch के बाद मैं उनके ऊपर आ गया|

मैंने उनकी ब्रा में हाथ डाला और उनके स्तनों को दबाने लगा| भौजी ने हाथ घुमा के अपनी ब्रा के हूकों को खोल दिया और मैंने बड़े प्यार से उसे खींच के उनसे अलग कर दिया| भौजी के स्तन एकदम नंगे मेरे सामने थे और मैंने उन पे अपने दाँत गड़ा दिए| भौजी सिसिया उठीं;

मैं: प्लीज आवाज मत करो.... नेहा जग जाएगी!

भौजी: आपने मेरे तन बदन में आग लगा दी है| अब ये आवाजें कैसे रोकूँ? स्स्स्स्स्स्स ....अह्ह्हह्ह !!!

मैंने सोचा बीटा तुहे ही थोड़ा आराम से करना होगा वरना इनकी आवाज से एह जाग जर्रूर जाएगी| मैंने थोड़े धीरे से भौजी के स्तन को दांतों से दबाया और चूसने लगा| भौजी मेरे सर को अपने स्तनों पे दबा रहीं थीं और मैं बारी-बारी से उनके स्तनों का पान कर रहा था| भौजी की धड़कनें बहुत तेज हो चलीं थीं और उनकी सांसें भी तेज होने लगीं थीं| मैंने उनके स्तनों को छोड़ा और धीरे-धीरे उन्हें Kiss करते हुए नीचे बढ़ा और उनके पेटीकोट के ऊपर आकर रूक गे| पेटीकोट का नाड़ा मैंने अपने दातों से खोला और उसे उतार के नीचे फेंक दिया| अब मुझे भौजी की पेंटी दिखी... पहले तो मैंने उस उँगलियों से छू के देखा...वो गीली हो चुकी थी|

मैं: You’re already Wet!

भौजी: You made me….

उनके चेहरे को देख के साफ़ लग रह था की उनके अंदर किस तरह की आग भड़की हुई है| मैंने उनकी पेंटी भी उतार फेंकी और उनकी योनि पे टूट पड़ा| दोनों हाथों के अंगूठों की मदद से मैंने उनकी योनि के द्वारों को खोला और अपनी जीभ अंदर डाल दी| उनकी योनि अंदर से रस से भर इहइ थी और मैं बड़े प्यार से उस रास को चाट रहा था| जितना चाटता उतना ही और निकलता...जैसे अंतहीन रस का भण्डार था| जब वो भाव नहीं रुका तो मैंने अपनी जीभ से उनकी योनि के द्वारों को अपनी जीभ से बारी-बारी से चूसना और कुरेदना शुरू कर दिया| अब तो जैस वो रस बहार आने को आमादा था और बहार की ओर रिसने लगा| मैंने उसकी एक भी बूँद बर्बाद नहीं की और चाटता रहा| फिर भी भौजी की तड़प शांत नहीं हुई...मैंने अपनी जीभ को उनकी योनि में पुनः प्रवेश कराया और जैसे लंड अंदर-बहार करते हैं, उसी प्रकार जीभ को भी अंदर-बहार करने लगा| भौजी कसमसाने लगीं और उनका शरीर कमान की तरह तन गया| मतलब भौजी झड़ने वालीं थीं| मैंने ये चुसाई जारी रखी और आगे दो मिनटों में भौजी के मुंह से; "आन्न्न्ह्ह्ह !!! स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स" की आवाज निकली और वो झड़ गईं, उनका सारा रस मेरे मुंह में समां गया| जब वो शांत हुईं तब मैंने अपना मुंह उनकी योनि से हटाया| मेरे मुंह से उनकी योनि से नबिक्ले रस का एक तार लटक रहा था! भौजी ने गपक के उसे अपने मुंह में भर लिया और मुझे अपने ऊपर खींच लिया| मैंने उनके माथे पे Kiss किया ताकि अभी-अभी जिस तूफ़ान ने उनके अंदर खलबली मचाई थी वो शांत हो जाए| करीब पांच मिनट बाद वो सामान्य हुईं और मैंने उनके गालों को चूमा|

मैं: Are you comfortable?

भौजी ने हाँ में सर हिलाया|उन्होंने उठने की कोशिश, शायद वो चाहतीं थी की वो मेरे ऊपर आएं, पर मैंने उन्हें हिलने नहीं दिया|

मैं: क्या हुआ?

भौजी: अब मेरी बारी... (मतलब अब वह मेरा चूसना चाहतीं थीं)

मैं: नहीं.... अभी नहीं!

मैं उनके ऊपर ही पड़ा रहा और उनहीं बेतहाशा kiss करने लगा| वो भी मेरी Kiss का जवाब Kiss से ही दे रहीं थीं| जब मैं रुकता तो वो मेरे गालों को अपने मुंह में भर के काट लेतीं... कभी चूसतीं ... मेरा लंड में आई अकड़न अब मेरा बुरा हाल कर रही थी| लंड का उभार अब उन्हें भी अपनी योनि पे चुभने लगा था| उन्होंने एक हाथ नीचे ले जाके मेरे लंड पे रख दिया और उसे दबाने लगीं| मेरे मुंह से "आह!" निकली और वो समझ गेन की लंड पे पड़ रहे कच्छे का दबाव मुझे दर्द दे रहा है|

भौजी: आपके "उस" पर दबाव ज्यादा है| अपने inner garments उतार क्यों नहीं देते?
(भौजी ने "उस" कहते समय अपनी आँखों से नीचे की तरफ इशारा किया था|)

मैं: मुझे लगा आप उतारोगे!

भौजी मुस्कुरा दीं और मेरी बनियान उतार के नीचे फेंक दी| फिर उन्होंने मेरा कच्छा उतारना चाहा परन्तु उतार नहीं पाईं मैंने स्वयं कच्छे को थोड़ा नीचे सरकाया और फिर उन्होंने उसे अपनी लात के जोर से नीचे धकेला और फिर मैंने थड़ा सहयोग दिया और वो भी उतर के नीचे जा गिरा| अब मैं फिर से उनकी आँखों में झाँकने लगा...शायद उनकी अनुमति चाहता था| भौजी क्या समझीं ये नहीं जानता पर उन्होंने अपने हाथ से मेरे लंड को पकड़ के दिशा दी और मैंने धीरे से Push किया और लंड उनकी योनि में प्रवेश कर गया| भौजी ने अपनी गर्दन को पीछे की और खींचा जैसे की कोई सख्त गर्म चीज उनकी योनि में उतर गई हो और "स्स्सह्ह्ह अह्ह्हह्ह" के साथ अपने अंदर उठ रहे तूफ़ान को दर्शाया| इधर मेरा हाल भी कुछ ऐसा ही था... उनकी योनि अंदर से धधक रही भट्टी जैसी थी,,,जिसके ताप ने मेरे लंड में रक्त का प्रवाह बढ़ा दिया था| मैंने धीरे-धीरे लंड को अंदर-भीतर करना शुरू किया| एक बार में मैं केवल आधा ही अंदर जा रहा था और भौजी सिसिया रहीं थीं|

भौजी: आपने पूरा अंदर नहीं किया ना?

मैं: नहीं...

भौजी: क्यों?

मैं: आप और जोर से चिलओगे!

भौजी: नहीं चिलाउंगी... प्लीज !!!

अब उनकी बात मैं कैसे टाल सकता था| पर मैं उन्हें कष्ट नहीं देना चाहता था, इसलिए मैने धीरे-धीरे लंड को अंदर Push करना शुरू कर दिया| चूँकि योनि अंदर से गीली थी इसलिए लंड बिना किसी अड़चन के अंदर फिसल रह था परन्तु जैसे ही समूचा लंड अंदर गया भौजी की आँखें खुली की खुली रह गईं| उनके मुंह से "आआअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह ह्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म.....स्स्स्सआःह्ह्ह्ह्ह" जैसी आवाज निकलने लगीं|

मैं: Am I hurting you?

भौजी ने ना में सर हिलाया| मुझे लगा शायद वो इसे इंजॉय कर रहीं हैं और उस आनंद के कारन उनके मुँह से सिस्कारियां छूट रहीं हैं, और अब तो मुझे भी मजा आने लगा था, तो मैंने मौजों में बहते हुए अपनी रफ़्तार बढ़ा दीं| अब तो भौजी की आवाज में MOANING की आवाज आने लगी| मन ने कहा की उन्हें बहुत ननद आ रहा है, तू ब्रेक मत लगा| इसलिए मैं बिना रुके धक्के मारता रहा| जैसे ही मैं अंदर डालता तो भौजी का शरीर कमान की तरह उठने लगता, और निकालते ही वो वापस अपनी मुद्रा में लेट जातीं| रफ़्तार बढ़ चुकी थी और मैं अब चरमोत्कर्ष पे पहुँचने वाला था| उधर भौजी तो झड़ चुकीं थीं और मेरी छाती पे हाथ रख के मुझे रोकना चाह रहीं थीं पर मैं फिर भी Push करने में लगा हुआ था| आखिर एक जोर दार बिस्फोट के साथ मेरा वीर्य उनके गर्भ में समाता चला गया| जैसे ही वीर्य की आखरी बूँद उनके अंदर छूटी मैं उनसे अलग हो कर लेट गया| दोनों की सांसें तेज थीं और शरीर भी थका हुआ था| करीब पांच मिनट बाद धड़कनें और सांसें सामान्य हुईं|


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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:25

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मैं उठा और बाथरूम में मूतने घुस गया| जब मैं बहार आया तो नेहा को चेक करने लगा की कहीं वो हमारी आवाज सुन के उठ तो नहीं गई| मैं उसके सिरहाने बैठ गया और उसके बालों पे हाथ फेरने लगा| भौजी को लगा की मैं नेहा के पास सोने वाला हूँ|

भौजी: ये क्या? आप फिर से अलग सोने वाले हो?

मैं: मैं..... (मेरे कुछ कहने से पहले ही उन्होंने अपनी बात रख दी|)

भौजी: अगर यही करना था तो यहाँ आने का प्लान क्यों बनाया? (और भौजी मुंह फेर के दुरी तरफ करवट लेके लेट गईं)

मैं: अरे बाबा ...मैं तो बस नेहा को देखने आया था की कहीं वो जाग तो नहीं गई|

इतना कहके मैं वापस चादर में घुस गया और उनसे सट के लेट गया| जैसे ही मेरे नंगे बदन का एहसास भौजी को हुआ वो मेरी और पलटी और मेरे आगोश में समा गईं|

मैं: Are You Happy?

भौजी: Nope……

मैं: What??? I thought this is what you wanted?

भौजी: इतनी जल्दी नहीं.... अभी तो पूरी रात बाकी है|

इतने कहते हुए वो उठीं और मुझपे सवार हो गईं और मेरे लबों को अपने लबों से ढक दिया| मेरे हाथ उनकी नंगी पीठ पे फिसलने लगे| पता नहीं क्यों पर उन्हें Kiss करते समय मेरे मुंह से "म्म्म्म्म...हम्म्म्म" जैसी आवाज निकलने लगी| मेरी आवाज सुन भौजी को नाजाने क्या हुआ उन्होंने मुझे और तड़पना शुरू कर दिया| वो मेरे होंठों को अपने होठों से छूटी और फिर हट जातीं... फिर छूतीं...फिर हट जातीं| फिर उन्होंने ध्यान मेरे निप्प्लेस पे केंद्रित किया| उन्होंने झुक के उन्हें बारी-बाजरी अपने दाँतों से काटना शुरू कर दिया| उनके हर बार काटने पर मुंह से "आह" निकल जाती| काट-काट के उन्होंने निप्पलों को लाल कर दिया| फिर वो खिसक मेरे घुटनों पे बैठ गईं और झुक के मेरे मुरझाये हुए लंड को अपने मुँह में भर लिया| लंड चूँकि सिकुड़ चूका था तो वो पूरा का पूरा उनके मुँह में चला गया| पर चूँकि अभी-अभी पतन के बाद वो सो रहा था| भौजी पूरी कोशिश करने लगीं की वो खड़ा हो जाए पर कमबख्त माना ही नहीं! भौजी ने उसे दो मिनट तक अच्छे से चूसा परन्तु वो अकड़ने का नाम ही नहीं ले रहा था| मुझे खुद पे गुस्सा आने लगा की "यार भौजी का कितना मन है...और ये कमबख्त खड़ा ही नहीं हो रहा|"

मैं: Sorry यार.... इसे थोड़ा समय लगेगा!

भौजी का मुँह उतर गया| मैंने उन्हें फिर से अपने नीचे लिटाया और उस मुरझाये हुए को जैसे-तैसे अंदर डाल दिया| अंदर जाने में उसने परेशान तो किया पर फिर मैं भौजी के ऊपर लेट के उन्हें Kiss करने लगा और भौजी के नादर की आग भड़कने लगी|

भौजी: कोई बात नहीं...थोड़ा आराम कर लो!

मैं: ना...

मैं उन्हें फिर से बेतहशा चूमने लगा| भौजी के मुँह से "मम्म" जैसी आह निकलने लगी और ये आवाज मेरे दिल की धड़कनें बढ़ाने के लिए काफी थी| पूरे शरीर में जैसे खून का बहाव अचानक से बढ़ गया| और ये क्या लंड भौजी की योनि की गर्मी पा के अकड़ने लगा|

भौजी: "आआह" !!!

मैं: क्या हुआ?

भौजी: आपका "वो" आह्ह्ह !!!

मैं: दर्द हो रहा है?

भौजी: नहीं.... आप हिलना मत|

लंड में जैसे-जैसे कसावट आ रही थी वो भौजी की योनि जो सिकुड़ गई थी उसे फिर से चौड़ी करने लगा| देखते ही देखते लंड फिर से अकड़ के फुँफकार मारने लगा|

भौजी: आआह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह....स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स

मैंने धीरे-धीरे लंड को अंदर-बहार करना शुरू कर दिया| और भौजी के मुख पे आये भाव साफ़ बता रहे थे की वो इसे कितना एन्जॉय कर रहीं हैं|

मैं: आपको Hardcore तरीका देखना है?

भौजी: हाँ.... स्स्स्स्स्स्स्स्स्स आह्ह्ह्हह्ह !!!

मैंने धक्कों की रफ़्तार एकदम से तेज कर दी और मैं जितनी ताकत थी सब झोंक डाली.... भौजी के मुँह से सिस्कारियों की रेल शुरू हो गई; "आआअह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स्स ....माआअ म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म ..... आह आह आह ......स्स्स्स...अह्ह्हह्ह ह्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म्म" और इसी शोर के साथ भौजी स्खलित हो गईं| मैं जनता था की अगर मैं अभी नहीं रुका तो भौजी को दर्द हो सकता है... इसलिए चार-पांच बार के धक्कों के बाद मैं रुक गया और भौजी के मुख को देखने लगा| भौजी ने आँखें मूँद रखीं थीं, करीब दो मिनट बाद उन्होंने आँखें खोलीं और मुझे देखा| मेरी आँखों में प्यास साफ़ झलक रही थी|

उन्होंने करवट ली, मुझे नीचे लिटाया और मेरे लंड पे सवार हो गईं| फिर उन्होंने ऊपर-नीचे होना शुरू किया| उनके हर धक्के से लंड उनके गर्भ से टकराता और भौजी उतना ही ऊपर उचक जातीं| उनकी योनि अंदर से मेरे लंड को खा रही थी...निचोड़ रही थी... चूस रही थी| पांच मिनट के झटकों ने ही मेरी हालत ख़राब कर दी| मैं झड़ने वाला था.... और मैंने भौजी के स्तनों को अपने हाथों में दबोच कस के दबा दिया| भौजी के मुँह से एक जोरदार चींख निकली; "आअह्ह्ह!!!" और हम दोनों एक साथ झड़ गए| भौजी की योनि में हम दोनों का रस भरा हुआ था और वो बहने लगा था....बह्ते-बह्ते वो मेरे टट्टों से होता हुआ बिस्तर पे जा गिरा| मैंने अचानक से करवट बदली और भुजी को अपने नीचे लिटा दिया| उनके स्तन मेरे दबाने से लाल हो गए थे और शायद दुःख भी रहे होंगे| इसलिए मैंने अपनी जीभ से उन्हें धीरे-धीरे चाटने लगा ताकि मुँह की गरमाई से शायद वो कम दुःखें| भौजी ने अपने दोनों हाथ मेरे सर पे रख दिए और उँगलियाँ मेरे बालों में फिराने लगीं|

मुझे नहीं पता की उनके स्तनों में दर्द होना बंद हुआ या नहीं पर इस बात का खेद था की मेरी वजह से उन्हें तकलीफ हुई और ये बात मेरे चेहरे से साफ़ झलक रही थी|

भौजी: बस बाबा... अब दर्द नहीं हो रहा| अब आप भी लेट जाओ... कब तक इसी तरह मुझे प्यार करते रहोगे?

मैं: सारी उम्र!

भौजी: आपको मेरा कितना ख्याल है....मेरी हर ख्वाइश पूरी करते हो..... सब से लड़ पड़ते हो सिर्फ मेरे लिए! प्यार करते समय भी अगर मेरे मुँह से आह! निकले तो परेशान हो जाते हो.... अब इससे ज्यादा एक औरत और क्या चाहती है अपने पति से? I LOVE YOU !

मैं: I LOVE YOU TOO !!!

फिर हमने एक smooch किया और मैं उनकी बगल में लेट गया| भौजी ने मेरे बाएं हाथ को खोल के सीधा किया और उसे अपना तकिया बना उस पे अपना सर रख दिया और मुझे झप्पी दाल के सो गईं| सुबह जब आँख खुली तो सुबह के सात बज रहे थे और नेहा और भौजी दोनों अभी तक नहीं उठे थे|

मैं उठा और भौजी को वापस चादर ओढ़ा दी| AC बंद किया... बाथरूम में मुँह-हाथ धोने घुस गया| बहार आके मैंने TV ओन किया और न्यूज़ देखने लगा| बेब्स से ये बात साफ़ हुई की हालत सुधरे हुए हैं और कोई भी दंगा वगेरह नहीं भड़का| ये सुन के दिल को सकूँ मिला!!! मैंने फटा-फैट अपने कपडे पहनने शुरू कर दिए| पहले सोचा की चाय आर्डर कर दूँ फिर सोचा की यार भौजी ने कपडे नहीं पहने हैं ऐसे में ये ठीक नहीं होगा| फिर मैंने प्यार से नेहा को उठाया और उसे गोद में ले के बाथरूम गया और हाथ-मुँह धुल के वापस सोफे पे बैठा दिया| उसका फेवरट टॉम एंड जेरी आ रहा था और वो बड़े चाव से उसे देख रही थी|

मैं उठ के भौजी के पास गया और बेडपोस्ट का सहारा ले के बैठ गया| फिर धीरे से उनके सर पे हाथ फेरा और गाल पे Kiss किया| मेरे Kiss करने पे भौजी थोड़ा कुनमुनाई और फिर आँखें खोल के मेरी ओर देखा ओर मुस्कुरा के; "Good Morning" बोलीं| मैंने भी जवाब में "Good Morning" कहा|

मैं: चलिए बेगम साहिबा ... उठिए! घर नहीं जाना क्या?

मेरी बात सुन के जैसे उनका सारा मूड ही ऑफ हो गया| ओर वो मुँह बना के उठीं ओर चादर जो उनके ऊपर पड़ी थी उसे ही लपेट के बाथरूम में घुस गईं| जब दस मिनट तक वो वापस नहीं आइन तो मुझे मजबूरन बाथरूम का दवाए खटखटाना पड़ा|

मैं: यार I'M Sorry!

पर आदर से की आवाज नहीं आई... मैं घबरा गया ओर दरवाजा तोड़ने की तैयारी करने लगा| पर जैसे ही मैंने दरवाजे को छुआ वो खुल गया| अंदर जाके देखा तो भौजी कमोड पर बैठीं थीं ओर कुछ बोल नहीं रहीं थी|

मैं: (अपने घुटनों पे आते हुए) Please ..... I'M Sorry ! I didn’t mean to….

भौजी: नहीं... आपकी कोई गलती नहीं.... बस थोड़ा सा emotional हो गई थी| I LOVE YOU !!!

मैं: I LOVE YOU TOO !!! मैं जानता हूँ आप वापस घर नहीं जाना चाहते और सच मानिये मैं भी नहीं जाना चाहता| पर हमारे पास और कोई चारा नहीं है| घर तो जाना ही पड़ेगा ना?

भौजी ने हाँ में सर हिलाया| मैं जानता था की उन का मन उदास है और अब कहीं न कहीं मैं खुद को दोषी मैंने लगा था| मैं आगे बढ़ा और उनके होंठों को चूम लिया| भौजी थोड़ा सामान्य दिखीं और मैं बहार आ गया और पाँव लटका के पलंग पे बैठ गया| करीब पांच मिनट बाद भौजी बहार निकलीं और अपने कपडे अलमारी से निकाले और वपस बाथरूम में घुस गईं और तैयार हो के बहार आ गईं| अब मेरेमुँह लटका हुआ था ... भौजी मेरे पास आईं और बोलीं;

भौजी: अब आप खुद को दोष मत दो| मैं भूल ही गई थी की हमें घर भी वापस जाना है| प्लीज....

मैं: ठीक है... आप बैठो... मैं चाय के लिए बोल के आता हूँ|

भौजी: नहीं चाय रहने दो... पहले से ही बहुत लेट हो चुके हैं| नौ बज रहे हैं...चलिए चलते हैं|

मैं: नहीं... खाली पेट कहीं नहीं जायेंगे?

भौजी: पर मैंने ब्रश नहीं किया?

मैं: तो क्या हुआ... एक दिन बिना ब्रश के कुछ खा लो! और वैसे भी अब तो मैं आपको भूखा बिलकुल नहीं रहने दूँगा| (मेरा इशारा भौजी की प्रेगनेंसी की ओर था)

भौजी मेरी बात समझ गईं और मुस्कुरा दीं| मैं चाय-नाश्ता बोलने के लिए रिसेप्शन पे गया और वहीँ से पिताजी को फ़ोन मिलाया;

मैं:हेल्लो पिताजी प्रणाम!

पिताजी: खुश रहो बेटा... अब कैसे हालात हैं वहाँ?

मैं: सब शांत है पिताजी...बस चाय पीके निकल ही रहे हैं|

पिताजी: ठीक है बेटा सही-सलामत यहाँ पहुँचो|

मैं: जी पिताजी|

मैं वापस अपने कमरे में पहुंचा और दो मिनट बाद ही वहाँ चाय-नाश्ता लिए बैरा आ गया|

भौजी: आप तो चाय बोलने गए थे? ये नाश्ता कैसे?

मैं: Complementry है!

भौजी: हाँ-हाँ मैं ही बेवकूफ हूँ यहाँ| Complementry !!!

मैं: यार... आपको भूखा नहीं रहना चाहिए ना?

भौजी: हाँ बाबा समझ गई.... अब आप मेरा ख़याल नहीं रखोगे तो कौन रखेगा?

मैं मुस्कुरा दिया और हमने बैठ के नाश्ता किया| नाश्ते में गोभी और पनीर के परांठे थे और बहुत टेस्टी भी थे|

मैं: डिलीशियस!!!

भौजी: अच्छा जी?

मैं: I mean not as Delicious as you’re!

ये सुन भौजी खिल-खिला के हंस पड़ीं| तब जाके मन को चैन मिला की कम से कम वो हँसीं तो| हम तैयार हो नीचे आ गए, रिसेप्शन पे वही बुजुर्ग अंकल खड़े थे|

बुजुर्ग अंकल: जा रहे हो बेटा?

मैं: जी... अभी माहोल शांत है...सोचा यही समय है निकलने का|

बुजुर्ग अंकल: हाँ बेटा ...पर अब घबराने की कोई बात नहीं है| हालात काबू में हैं!!! तो अब कब आना होगा?

मैं: जी अभी तो कुछ नहीं कह सकता पर जब भी आएंगे यहीं रुकेंगे|

बुजुर्ग अंकल: हाँ बेटा जर्रूर|

मैं: अच्छा अंकल चलते हैं|

बुजुर्ग अंकल: खुदा हाफ़िज़ बेटा!

मैं: खुदा हाफ़िज़ अंकल|

होटल से टैक्सी स्टैंड कुछ दूरी पे था तो मैंने बहार निकल के रिक्शा किया और उसने हमें टैक्सी स्टैंड छोड़ा| टैक्सी स्टैंड पहुँचने तक भौजी ने मेरा हाथ पकड़ रखा था|

भौजी: वो अंकल मुसलमान थे?

मैं: तो?

भौजी: फिर भी उन्होंने हमारी मदद की?

मैं: वो इंसानियत का फ़र्ज़ अदा कर रहे थे, और उनकी जगह मैं होता तो मैं भी उनकी मदद अवश्य करता| मेरे हिंदी होने से उन्हीने कोई फर्क नहीं था और न ही मुझे उनके मुसलमान होने से कोई फर्क पड़ा| ख़ास बात ये थी की उन्होंने हमारी मदद की!

भौजी: आप सही कहते हो| मुसीबत में जो साथ दे वही सच्चा इंसान होता है| "मजहब हमें नहीं बांटता हम मजहब के नाम पे खुद को बांटते हैं!!!"

रिक्शे में बैठे नेहा रास्ते भर इधर-उधर देख के बहुत खुश थी| टैक्सी स्टैंड पहुँच हम जीप का इन्तेजार करने लगे, यही सही समय था नेहा से कुछ बात करने का;

मैं: नेहा बेटा सुनो?

नेहा: जी पापा!

मैं: (भौजी से) अरे आपने इसे मेरी तरह हर बात बोलने से पहले "जी" लगाना सीखा दिया?

भौजी: नहीं तो... बच्ची थोड़े ही है| बड़ी हो गई है मेरी लाडो और अपने पापा से कुछ न कुछ तो सीखेगी ही?

मैं: अच्छा नेहा बेटा आप ने एक अच्छी आदत सीखी है| अपने से बड़ों से बात करते समय "जी" लगाया कोर और हाँ बड़ों को कभी भी उनका नाम लेके नहीं पुकारना ये शिष्टाचार नहीं है| उन्हें पुकारते समय, चाचा जी, नाना जी, अंकल जी, मम्मी जी आदि तरीके से बोलना चाहिए ठीक है बेटा?

नेहा: जी पापा जी!

मैं: शाबाश! खेर मुझे ये बात नहीं करनी थी आपसे| अब आप मेरी एक बात सुनो, घर में अगर कोई आपसे पूछे की आप कहाँ रुके थे रात भर तो आप क्या कहोगे?

नेहा: आप के साथ! (उसने बड़े प्यार और नादानी से जवाब दिया|)

मैं: नहीं बेटा| अगर को पूछे तो कहना की हम धर्मशाला में रुके थे... एक कमरे में आप और आपकी मम्मी सोये और एक में मैं अकेला सोया था| ठीक है?

नेहा: जी पापा जी|

मैं: शाबाश!

इतने में जीप आ गई और हम तीनों एक लाइन में पीछे बैठ गए| जीप में ज्यादा तर औरतें बैठीं थीं ... शायद किसी पूजा मण्डली की थीं और वो हमें ऐसे बैठे देख खुश थीं| उनमें से एक औरत बोली;

औरत: तुम दोनों पति पत्नी हो?

भौजी: हाँ ... क्यों?

औरत: कुछ नहीं... भगवान जोड़ी बनाये रखे|

और इस तरह बातों का सील-सिला जारी हुआ| वो औरतें भी अपनी मण्डली की कुछ लोगों से अलग हो गए थे| खेर कुछ देर बाद हम बाजार पहुँच गए और वहाँ से अगली सवारी ले के मैन रोड उत्तर गए| अब यहाँ से घर तक पैदल जाना था| रास्ते भर हम दोनों हँसते-खेलते हुए बातें करते हुए जा रहे थे| घर पहुंचे और भौजी ने डेढ़ हाथ का घूँघट काढ लिया| हमें देख सभी लोग खुश हो गए...ऐसा लगा जैसे हम सरहद से लौटे हों?
पिताजी बाहें फैलाये खड़े थे और मैं जाके उनके गले लग गया|

पिताजी: बेटा चल पहले अपनी माँ से मिल ले| वो कल से बहुत परेशान है|

अब ये सुन के मेरे प्राण सूखने लगे| मैं तुरंत बड़े घर की ओर भागा और माँ को कमरे में चारपाई पे बैठा हुआ पाया| मैं तुरंत उनके गले लग गया और तब जाके उनके मन को शान्ति मिली होगी|

माँ: बेटा... तूने तो जान निकाल दी थी मेरी|

मैं: देखो ... मैं बिलकुल ठीक-ठाक हूँ|

भौजी ने भी हमारी बात सुनी थी और वो भी मेरे पीछे-पीछे आ गईं|

भौजी: माँ... इन्होने मेरा और नेहा का बहुत ध्यान रखा|

उनके मुंह से "माँ" सुन के माँ का मुंह फिर से फीका पड़ गया| मैंने बात को नया मोड़ देते हुए माहोल को हल्का किया:

मैं: माँ.... आपके हाथ की चाय पीने का मन कर रहा है|

माँ: मैं अभी बनाती हूँ, तू तब तक नहा धो ले|

और माँ उठ के चाय बनाने चलीं गईं| माँ की नाराजगी भौजी से छुप ना पाइ और वो भी कुछ उदास दिखाई दीं|

मैं: यार... I’m Sorry! But you’re a being Pushy! मैं जानता हूँ की आप दिल से उन्हें अपनी माँ मानते हो....पर आपको ये बात उनसे साफ़ करनी होगी की आखिर आपके दिल में क्या है| अगर आप इसी तरह जबरदस्ती रिश्ते बनाओगे तो बात बिगड़ सकती है| हो सकता है की माँ को या औरों को शक हो की हमारा रिश्ता क्या है?

भौजी ने गर्दन झुका ली और बिना कुछ कहे वहां से चलीं गई|


The Romantic
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Re: एक अनोखा बंधन

Unread post by The Romantic » 16 Dec 2014 09:26

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कुछ समय बाद मैं, माँ और पिताजी साथ बैठे थे और मैं पिताजी को कल जो हुआ उसके बारे में बता रहा था| इतने में वहाँ बड़के दादा, रसिका भाभी, भौजी और बड़की अम्मा भी आ गए;

मैं: जैसे ही पीछे से भगदड़ मची मैं नेहा और भौजी अकेले रह गए| भीड़ का धक्का इतना तेज था की वो आप लोगों को आगे बहा के ले गया पर इधर हम फंस गए| अगर हम उसी बहाव में बहते तो शायद हम लोगों के पैरों तले दब जाते! इसलिए हमदोनों नेहा को लेके एक छोटी सी गली में घुस गया| भीड़ ने आगे का रास्ता ब्लॉक कर दिया था इसलिए हम टैक्सी स्टैंड वाले रास्ते की ओर नहीं बढ़ सकते थे| मैंने भौजी औरपीछे जाने के लिए कहा, मुझे लगा शायद थोड़ा घूम के ही सही हम टैक्सी स्टैंड तक पहुँच जाएँ पर आगे कोई रास्ता ही नहीं था| इतने में भीड़ का एक झुण्ड हमारी ओर भगा आ रहा था...मैं बहुत घबरा गया| अगर अकेला होता तो भाग निकलता पर नेहा साथ थी इसलिए मैं छुपने के लिए कोई आश्रय ढूंढने लगा| तभी वहाँ एक होटल का बोर्ड दिखा हम उसके बहार खड़े हो गए ओर दरवाजा भड़भड़ाने लगे पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला| हार के एक धर्मशाला के बहार पहुंचे ओर उसका दरवाजा खटखटाया पर कोई नहीं खोल रहा था| तब मैंने चिल्ला के कहा की मेरे साथ एक छोटी सी बच्ची है ओर नेहा ने भी अब तक रोना शुरू कर दिया था| उसकी आवाज सुन एक बुजुर्ग से अंकल ने दरवाजा खोला ओर हम फटा-फट अंदर घुस गए| अब वो तो शुक्र है की माँ ने मुझे कुछ पैसे पहले दिए थे जिसकी वजह से हमें वहाँ दो कमरे मिल गए वरना रात सड़क पे बितानी पड़ती|
(इस बात चीत में मैंने कहीं भी भौजी को "भौजी: कह के सम्बोधित नहीं किया...क्योंकि अब उन्हें भौजी कहने में शर्म आने लगी थी! ओर वो भी कभी मुझे मानु जी या तुम नहीं कहतीं थी...हमेशा इन्होने या आप कहके ही सम्भोधित करती थीं|)

पिताजी: भई मानना पड़ेगा तुम्हारी माँ की होशियारी काम आ ही गई|

माँ: देखा आपने...जब भी मैं पैसे आधे-आधे करती थी तो सबसे ज्यादा आपको ही तकलीफ होती थी| आज मेरी सूझबूझ काम आ ही गई|

पिताजी: (माँ की पीठ थपथपाते हुए) शाबाश देवी जी!

पिताजी: भैया आप समधी साहब को भी फोन कर दो की सब ठीक-ठाक पहुँच गए हैं|

बड़के दादा: हाँ भैया मैंने खबर पहुँचा दी है|

मैं: आपने ससुर जी..... मतलब... को खबर पहुंचा दी?
(भौजी की आदत मुझे भी लग गई थी....अब बात को सम्भालूँ कैसे ये समझ नहीं आया, पर मैं फिर भी बच गया| वो ऐसे की कुछ साल पहले अजय भैया की साली जब घर आई थी तब उन दिनों मैं भी घर पे था, तो वो मुझे भी जीजा कहती थी...इसी बात के मद्दे नजर पिताजी ने कुछ नहीं कहा|)

पिताजी: अरे बेटा खबर तो पहुंचानी जर्रुरी थी| मैं तो तुम्हें भी बताने वाला था की तुम्हारी माँ यहाँ कितनी परेशान है, वो तो घर भी नहीं आना चाहती थी| कह रही थी जबतक लड़का नहीं आता मैं सड़क पर रह लुंगी पर घर नहीं जाउंगी| वो तो मैंने उसे समझाया-बुझाया तब जाके मानी| ओर जब तुम्हारा फोन आया तो उसने मना कर दिया की मैं तुमहिं कुछ ना बताऊँ वरना तुम उसी भगदड़ में भाग आओगे|

मैं: ये आपने सही कहा...अगर मुझे पता होता तो मैं रात को ही जैसे-तैसे पहुँच जाता|

पिताजी: इसीलिए कुछ नहीं बताया|

बड़के दादा: मुन्ना तुम्हारी बात सुन के हमें तुम पे बहुत गर्व है| तुमने इस खानदान की गरिमा बढ़ाई है| शाबाश!!! (ओर बड़के दादा मेरी पीठ थपथपाने लगे) ओर हाँ समधी साहब ने तुम्हें बुलाया है| इसी बहाने तुम उन्हें प्रसाद भी दे आना|

अब मेरा हाल तो ऐसे था जैसे अंधे को क्या चाहिए, दो आँखें! मैं तो खुद उनसे मिलना चाहता था आखिर जिस शोरूम की कार इतनी मस्त है उस शोरूम के मालिक से मिलना तो बनता ही था!!!

मैं: जी जर्रूर...

बात खत्म हुई ओर बड़के दादा और अम्मा उठ के भूसे वाले कमरे में सफाई करने चले गए| इधर रसिका भाभी उठ के कपडे धोने कुऐं पर चलीं गईं| अब बच गए पिताजी, माँ, भौजी और मैं| भौजी डेढ़ हाथ का घूँघट काढ़े चुप-चाप खड़ीं थी, ऐसा लग रहा था जैसे वो कुछ कहना चाहतीं हों| मुझे लगा की कहीं उन्हेोन मेरी बातों का बुरा तो नहीं लगा लिया?

पर जब वो बोलीं तो बातें स्पष्ट हो गईं;

भौजी: पिताजी... माँ.... मुझे आपसे कुछ कहना है?

पिताजी: बोलो बहु|

भौजी: मैं आपको और माँ को अपने माँ-पिताजी ही मानती हूँ| आप लोगों के यहाँ होने से मुझे बिलकुल घर जैसा लगता है| आप के यहाँ रहते हुए मुझे कभी अपने मायके की याद नहीं आती और ना ही मन करता है मायके जाने का| कल जिस तरह से इन्होने मेरी और नेहा की रक्षा की उसके बाद तो जैसे आप सब का मेरी जिंदगी पर पूरा हक़ है| पर यदि मेरे आपको माँ-पिताजी कहने से कोई आपत्ति है तो आप बता दें, मैं आपको चाचा-चाची ही कहूँगी!

माँ: नहीं बहु...ऐसी कोई बात नहीं है| तुम हमें अपने माँ-पिताजी की तरह मानती हो ये तो अच्छी बात है, पर क्या जीजी तुम्हें प्यार नहीं करतीं?

भौजी: करती हैं... पर आप सब तो बेहतर जानते हो की यहाँ एक लड़का होने की आस बंधी है| नेहा के होने के बाद तो शायद ही कभी अम्मा और दादा ने उसे पुचकारा हो| ऐसे में मुझे वो दर्ज़ा वो प्यार कभी नहीं मिला जो आप लोग देते हैं|

पिताजी: बहु देखो... अपने बड़े भाई साहब से तो मैं इस बारे में कुछ नहीं कह सकता पर यकीन मानो हमें तुम्हारा हमें माँ-पिताजी कहना बिलकुल बुरा नहीं लगा| ऐसी छोटी-छोटी बातों को दिल से ना लगाया करो|

भौजी: जी पिताजी!

पिताजी: तो लाड साहब कब जाना है अपनी भौजी के मायके?

मैं: जी आप कहें तो आज..नहीं तो कल!

पिताजी: बेटा प्रसाद कभी लेट नहीं करना चाहिए| आज शाम ही चले जाना पर रात होने से पहले लौट आना?

मैं: जी ठीक है.... पर माँ आज रात का खाना आप बनाना?

भौजी: क्यों? मेरा हाथ का खाना अच्छा नहीं लगता आपको?

भौजी की बात सुन माँ-पिताजी हँस पड़े|

मैं: अच्छा लगता है... पर बहुत दीं हुए माँ के हाथ का खाना खाए हुए! वैसे अगर माँ और बड़की अम्मा दोनों खाना बनायें तो स्वाद ही कुछ और होगा|

मेरी इस बात पे पिताजी ने हांमी भरी और बड़की अम्मा को आवाज लगा के रात के खाने का प्लान बता दिया|

भौजी और माँ-पिताजी की जो भी बात हुई उसमें मैंने बिलकुल भी हिस्सा नहीं लिया था|कारन साफ़ था, मैं किसी का भी पक्षपात नहीं करना चाहता था| मैं चाहता था की भौजी अपना मुद्दा स्वयं सामने रखें और अपनी दलील भी स्वयं दें| इससे उनमें आत्मविश्वास बढ़ेगा! दोपहर के भोजन के बाद मुझे और भौजी को साथ बैठने का कुछ समय मिला, हम भौजी के घर में बैठे थे;

मैं: I hope you’re not angry on me!

भौजी: नहीं तो...आपको किसने कहा मैं आपसे खफा हूँ?

मैं: मुझे लगा शायद आपने मेरी बात का बुरा मान लिया है|

भौजी: आपने जो कहा वो बिलकुल सही कहा था, इसमें बुरा मैंने वाली बात तो थी ही नहीं|

मैं: तो मेरे पास बैठो!

भौजी उठ के मेरे पास बैठ गईं|और मेरे कुछ कहे बिना ही उन्होंने मुझे Kiss किया| पर ये बहुत छोटा सा Kiss था!

मैं: इतना छोटा?

भौजी: ये आपकी Good Morning Kiss थी| सुबह से Pending थी ना! (और भौजी मुस्कुरा दीं)

शाम होने से पहले ही मैं तैयार हो के बैठ गया| मैंने आज "शर्ट" पहनी थी और नीचे पेंट, काले जूते जो पोलिश से चमक रहे थे| बस एक टाई की कमी थी तो पक्का लगता की मैं इंटरव्यू देने जा रहा हूँ|

भौजी: वाओ! You’re looking Dashing!

मैं: Thanks !!! कहते हैं ना “First Impression is the Last Impression”|

भौजी: मेरा हाथ मांगने के लिए आप कुछ लेट नहीं हो गए? ही..ही..ही...

मैं: Very Funny !!! अब आप भी ढंग के कपडे पहनना|

भौजी: हाँ भई... एबीएन आप Dashing लग रहे हो तो मुझे तो ब्यूटीफुल लगना ही पड़ेगा ना! अच्छा ये बताओ कौन सी साडी पहनू?

मैं: इसे मेरे लिए सरप्राइज ही रखो बस जो भी हो मेरी शर्ट से मैचिंग हो!

भौजी: ठीक है, आप बहार जाओ मैं तैयार हो के आती हूँ|

मैं: बहार जाऊं? मेरे सामने तैयार होने में कोई हर्ज़ है?

भौजी: नहीं तो... मुझे क्या... आपने तो मुझे देखा ही है|

मैं: I was Kidding !!! मैं बहार जा रहा हूँ!

और भौजी हंसने लगीं.....

अब आगे....

मैं बहार आके नेहा के साथ खेल रहा था और मुझे इस तर सजा धजा देख रसिका भाभी की आह निकल ही गई;

रसिका भाभी: हाय! नजर न लग जाए आप को मेरी! जबरदस्त लग रहे हो!

मैं: किसी और की तो नहीं पर हाँ आपकी नजर जर्रूर लग जाएगी|If you don’t mind mean asking….. ओह... अगर आपको बुरा ना लगे तो मैं आपसे कुछ पूछना चाहता हूँ?

रसिका भाभी: हुकुम करो मालिक!

मैं: प्लीज ... दुबारा मुझे ये मत कहना! खेर... उस दिन सब जानते हुए आप ने वो बात हमारे सामने इसीलिए दोहराई थी ना क्योंकि आप हमें ब्लैकमेल करना चाहतीं थीं... है ना?

रसिका भाभी: नहीं तो... वो तो मैं....

मैं: आप रहने दो... मैं जानता हूँ आपका उद्देश्य क्या था? अब साफ़-साफ़ बता क्यों नहीं देती की क्या चाहती थीं आप?

रसिका भाभी: आपको

मैं: इतने सब के बाद भी आप का मन मुझसे नहीं हटा?

रसिका भाभी: क्या करें.... अपनी भौजी की प्यास तो आप बुझा देते हो.... पर मेरा क्या? मैंने सोचा था की दीदी डर जाएँगी और मना नहीं करेंगी! शायद मैं उन्हें मना भी लेती उसके लिए... (रसिका भाभी ने बात आधी छोड़ दी)

मैं: किसके लिए?

रसिका भाभी: आप, मैं और दीदी एक साथ चुदाई करते!

मैं: OH FUCK !!! You gotta be kidding me !!! (मैंने गुस्से से झल्लाते हुए कहा|)

रसिका भाभी: क..क......क्या....क्या हुआ?

मैं: यकीन नहीं आता! Fuck…… Man….. You’re…..आपको कोई ..... मैं आपसे बात ही नहीं करना चाहता| इतना मैल भरा है आपके मन में!!! छी!!!

रसिका भाभी: मानु जी... प्लीज.... ये बात दीदी को मत बताना....आप तो कुछ ही दिन में चले जायेंगे.... और यहाँ दीदी के आलावा मेरा और है कौन जो ध्यान रखे .... प्लीज...मैं आपके आगे हाथ जोड़ती हूँ...पाँव पड़ती हूँ|

मैं आगे कुछ नहीं बोला.... और नेहा को गोद में लेके दूर आज्ञा| मुझे तो अब उनसे घिन्न आने लगी थी!!! छी!!!

नेहा: पापा जी...क्या हुआ?

मैं: कुछ नहीं बेटा...आप जाके खेलो और हाँ कपडे गंदे मत करना|

नेहा गोद से उतरी और वरुण के साथ खेलने चली गई| मैं हाथ बंधे खड़ा था और इतने में मुझे पिताजी की आवाज आई;

पिताजी: अरे वाह भई! आज तो सज-धज के जा रहे हो...वो भी अपनी भौजी के मायके?

मैं: (मैंने पिताजी की बात उन्हीं पे डाल दी|) पिताजी आपसे ही सीखा है की कहीं जाओ तो ऐसे कपडे पहनो की देखने वाला कहे की वाह!

पिताजी: शाबाश बेटे! समधीजी को हमारा प्रणाम कहना और रात वहां मत रुकना!

मैंने हाँ में सर हिलाया और इतने में पिताजी को खेतों में कोई जाना-पहचाना दिखा और उसे आवाज लगते हुए वो खेतों में चले गए|

भौजी जब तैयार होक बहार निकलीं तो उन्हें देखते ही मैं रसिका भाभी की सारी बात भूल गया|लाल रंग की शिफॉन की साडी ...उसपे काले रंग का डिज़ाइनर बॉर्डर... और काले रंग का ब्लाउज वाओ!! बिलकुल इस फोटो जैसा| बस इसमें ब्लाउज डिज़ाइनर है और फूल स्लीव का है पर उनका पलाइन था और आधी स्लीव का था|

उन्हें देखते ही दिल की धड़कनें थम गईं और मैं मुंह खोले उन्हें देखता रहा|बाल खुले हुए थे और सर पे पल्लू था|

भौजी: ऐसे क्या देख रहे हो?

मैं: You’re looking faboulous!

भौजी: Awww… Thanks!!!

तभी वहाँ बड़की अम्मा आ गईं और उन्हें बता के हम चलने को हुए;

मैं: नेहा...नेहा ....कहाँ हो बेटा?

नेहा भागती हुई आई और उसके कपडे गंदे हो गए थे|

भौजी उसे देखते ही गुस्सा हो गईं|

भौजी: ये लड़की ना... मना किया था न तुझे....

मैं: (भौजी की बात काटते हुए) कोई बात नहीं...आओ बेटा… मैं आपको तैयार करता हूँ|

भौजी: लाइए ... मैं तैयार कर देती हूँ|

मैं: रहने दो... आपकी साडी की क्रीज़ खराब हो जाएगी| वैसे भी आप नेहा पे भड़के हुए हो खामखा डाँट दोगे!

मैं नेहा को अंदर ले जाके तैयार कर के ले आया और हम भौजी के मायके के लिए निकल पड़े| रास्ते में हम बातें कर रहे थे;

मैं: यार प्लीज ये घूँघट हटा दो!

भौजी ने बिना कुछ कहे घूँघट हैट दिया और अब उनके खुले बाल मुझ पे जादू कर रहे थे| उन्हें इस तरह देख मुझे बीती रात वाला समय याद आने लगा|

भौजी: क्या हुआ? क्या देख रहे हो?

मैं: कुछ नहीं आपको इस तरह देख के मुझे कल रात की याद आ गई|

भौजी मेरी बात समझ गईं और उन्होंने मुझे प्यार से दाहिनी बाजू पे मुक्का मारा|

मैं: oww !!!