कच्ची उम्र की लज़्ज़त new hindi sex story 2017

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rajkumari
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कच्ची उम्र की लज़्ज़त new hindi sex story 2017

Unread post by rajkumari » 23 Oct 2017 09:04

कच्ची उम्र की लज़्ज़त

मेरा नाम राज है, मैं 42 साल का तंदरुस्त, 5’11” रंग गेहुंआ, फिट बॉडी का आदमी हूँ। मेरी पत्नी डॉली 39 साल की, स्वस्थ, 5’5″ रंग गोरा और फिगर 36-26-38 है।
पंजाब के एक बड़े शहर में मेरा अपना एक छोटा सा सॉफ़्टवेयर एंड हार्डवेयर पार्ट्स सप्लाई का बिज़नेस है जिससे मुझे सब ख़र्चे और टैक्स इत्यादि निकाल के करीब दस से बारह लाख रुपये सलाना की कमाई हो जाती है। एक अपना ऑफिस है, गोदाम है, वर्कशॉप है, 9-10 लोगों का स्टाफ़ है, अपना घर है, कार है।
हमारे दो बच्चे हैं, एक बेटी 15 साल की और एक बेटा 12 साल का। हमारी 16 साल की शादीशुदा जिंदगी में हमारी सैक्स लाइफ बहुत ही बढ़िया है। बिस्तर में डॉली और मैं नए नए तज़ुर्बे करते ही रहते हैं, कभी-कभी कोई तज़ुर्बा बैक-फ़ायर भी कर जाता है पर ओवरआल सब मस्त है।
यह घटना आज से 3 साल पहले की है, जब मेरी माँ जो मेरे साथ ही रहती थी, की अचानक मृत्यु हो गई। पिता जी आठ साल पहले ही चल बसे थे लिहाज़ा डॉली, मेरी पत्नी अचानक से घर में बिल्कुल अकेली हो गई।
मैं तो सुबह का निकला शाम को घर आता था, पीछे दोनों बच्चे स्कूल चले जाते थे और डॉली सारा दिन घर में अकेली रहती थी, अगर बाजार भी जाना हो तो घर ताला लगा के जाओ।
उन दिनों शहर में चोरियां बहुत होती थी और घर के मेनगेट पर लगा ताला तो जैसे चोरों को खुद आवाज़ मार कर बुलाता है।
एक दिन डॉली किसी काम से बाजार गई पर रास्ते में कुछ भूला याद आने पर आधे रास्ते से ही घर वापिस लौटी तो देखा कि चोरों ने मेनगेट का ताला तोड़ रखा था पर इससे पहले कि चोर अपनी किसी कारगुजारी को अंजाम देते, डॉली घर लौट आई और चोरों को फ़ौरन वहाँ से भागना पड़ा।

पर इस काण्ड के बाद डॉली बहुत डरी-डरी सी रहने लगी जिस का सीधा असर हमारे घर-परिवार पर और हमारी सेक्स-लाइफ़ पर पड़ने लगा।
अपनी सेक्स लाइफ बिगड़ते देख मुझे बहुत कोफ़्त होती… पर क्या करता?
अब मुझे इस समस्या का कोई समाधान सोचना था और बहुत जल्दी ही सोचना था पर कुछ सूझ नहीं रहा था और फिर एक दिन जैसे भगवान् ने खुद इस समस्या का समाधान भेज दिया।
मेरी बड़ी साली साहिबा जिनकी शादी मेरे शहर से 25-30 किलोमीटर दूर एक कस्बे में एक खाते पीते आढ़ती परिवार में हुई थी, की बेटी रिंकी ने B.Com पास कर ली थी लेकिन समस्या यह थी कि क़स्बे में कोई अच्छा कॉलेज नहीं था जहां मास्टर्स की जा सके और मेरे शहर में कई अच्छे कॉलेजों समेत यूनिवर्सिटी भी थी।
लिहाज़ा रिंकी ने मेरे शहर में एक नामी गिरामी कॉलेज में M.Com में ऐडमिशन ले लिया था लेकिन किस्मत से रिंकी को हॉस्टल में जगह नहीं मिल पाई थी सो मेरी साली साहिबा थोड़ी परेशान सी थी कि एक दिन मैं और डॉली उनके घर उनसे मिलने जा पहुंचे।
बातों बातों में इस बात का ज़िक्र भी आया तो मेरी पत्नी ने रिंकी को अपने घर रहने के लिए कह दिया। मैंने भी सोचा कि चलो ठीक ही है, कम से कम डॉली एक नार्मल औरत सा जीवन तो जियेगी।
मेरी शादी के समय रिंकी सात-आठ साल की पतली सी, मरगिल्ली सी लड़की थी जो हर वक़्त या तो रोती रहती थी या रोने को तैयार रहती थी। बहुत दफा तो वो घर आये मेहमानों के सामने ही नहीं आती थी और हम पर तो साहब ! हर वक़्त अपनी पत्नी का नशा सवार रहता था, मैंने भी रिंकी पर पहले कभी ध्यान नहीं दिया था।
लब्बोलुआब ये कि यह फाइनल हो गया कि रिंकी हमारे घर रह कर ही M.Com करेगी। फैसला ये हुआ कि मम्मी वाला कमरा रिंकी को दे दिया जाए ताकि वो अपनी पढ़ाई बे रोक-टोक कर सके।
इस बात से डॉली इतनी खुश हुई कि उस रात बिस्तर में डॉली ने कहर बरपा दिया। ऐसा बहुत दिनों बाद हुआ था लिहाज़ा मैं भी खुश था।
एक हफ्ते बाद रिंकी हमारे घर आ गई।
उस रात डाइनिंग टेबल पर मैंने पहली बार रिंकी को गौर से देखा। डेढ़ पसली की मरघिल्ली सी, रोंदू सी लड़की, माशा-अल्लाह ! जवान हो गई थी, करीब 5′-4″ कद, कमान सा कसा हुआ पतला लेकिन स्वस्थ शरीर, रंग गेहुँआ, लंबे बाल, सुतवाँ नाक, पतले गुलाबी लेकिन भरे-भरे होंठ, तीखे नैननक्श और काले कजरारे नयन!
फ़िगर अंदाजन 34-26-34 था।
यूं मैं कोई सैक्स-मैनियॉक नहीं पर ईमानदारी से कहूँ तो उस वक़्त मन ही मन मैं रिंकी के नंगे जिस्म की कल्पना करने लगा था।
खैर जी ! डिनर हुआ। सब लिविंग रूम में आ बैठे, बच्चे TV देखने लगे, रिंकी और डॉली दोनों बातें करने लगी और मैं इजी चेयर पर बैठा किताब पढ़ने लगा पर मेरे कान तो उन दोनों की बातों पर ही लगे हुए थे।
मैंने नोटिस किया कि बोल तो सिर्फ डॉली ही रही थी और रिंकी तो बस हाँ-हूँ कर रही थी।
खैर, धीरे धीरे रिंकी हमारे परिवार का अंग होती चली गई, दोनों बच्चों को रिंकी पढ़ा देती थी। रात का डिनर पकाना भी रिंकी की जिम्मेवारी हो गई थी लेकिन अब भी रिंकी मेरे सामने कम ही आती थी, आती भी थी तो मुझ से बहुत कम बोलती थी, बस हां जी… नहीं जी… ठीक है जी!
मैं तो इसी बात में खुश था कि मुझे मेरी पत्नी का ज्यादा समय मिल रहा था और मेरी सेक्स लाइफ नार्मल से भी अच्छी हो गई थी। धीरे धीरे समय गुजरने लगा।
शुरू शुरू में तो रिंकी हर शनिवार अपने घर चली जाया करती थी और सोमवार सवेरे सीधे कॉलेज आकर शाम को घर आती थी लेकिन धीरे धीरे रिंकी का अपने घर जाना कम होने लगा। अब रिंकी दो महीने में एक बार या बड़ी हद दो बार अपने घर जाती थी।
फर्स्ट ईयर के फाइनल एग्जाम ख़त्म होने के बाद रिंकी तीन महीने के लिए अपने घर चली गई। करीब पांच हफ्ते बाद एक रात, एक रस्मी से अभिसार से असंतुष्ट सा मैं डॉली के नग्न शरीर पर हाथ फेर रहा था कि डॉली ने मुझ से कहा- राज… चलो, कल जाकर रिंकी को ले आयें। रिंकी के बिना मेरा दिल नहीं लग रहा और दोनों बच्चे भी उदास हैं।
मैंने हामी भर दी।
अगले दिन हम दोनों जाकर रिंकी को ले आये। खुश डॉली ने उस रात अभिसार में मेरे छक्के छुड़ा दिए, डॉली ने मेरा लिंग चूस-चूस कर मुझे स्खलित किया और बाद में खुद मेरा लिंग पकड़ कर, उस पर तेल लगाया और अपने हाथ से मेरा लिंग अपनी गुदा पर रख कर मुझे गुदा मैथुन के लिए आमंत्रित किया, रतिक्रिया के किसी भी आसन को उसने ‘ना’ नहीं कहा बल्कि दो कदम आगे जाकर कुछ अपनी ओर से और नया कर दिया।
ख़ैर! जिंदगी वापिस पटरी आ गई थी लेकिन अब एक फर्क था, अब रिंकी सारा दिन घर पर ही रहती थी, उसके कॉलेज खुलने में अभी डेढ़ महीना बाकी था।

मैं दोपहर को खाना खाने घर आता था, पहले जब रिंकी कॉलेज गई होती थी तो मैं अक्सर दोपहर को ही डॉली को थाम लिया करता था, कभी रसोई में, कभी स्टोर में, कभी लॉबी में और कभी ड्राइंग रूम में भी… एक-आध बार तो बाथरूम में शावर के नीचे भी!
रिंकी के आने से दोपहर की इन तमाम खुराफातों में लगाम लग गई थी। कोफ़्त होती थी कभी कभी पर क्या किया जा सकता था?

फिर भी दांव लगा कर कभी-कभार मैं डॉली से छोटी-मोटी चुहलबाज़ी तो कर ही लेता था, जैसे पास से गुज़रती डॉली के नितम्बों को सहला देना, उसके उरोजों पर हल्के से हाथ फेर देना, निप्पल दबा देना, रसोई में सब्ज़ी बनाती डॉली से सट कर खड़े होकर कढ़ाई में सब्ज़ी देखने के बहाने डॉली के कान के पास एक छोटा सा चुम्बन ले लेना या उसकी साड़ी के पल्लू की आड़ में उसका हाथ पकड़ कर अपने लिंग पर दबा देना।
मेरे ऐसा करने पर डॉली दिखावटी गुस्सा दिखाती जरूर थी लेकिन तिरछी आँखों से मुझे देखते हुये उसके होंठों पर स्वीकृति की एक मौन सी मुस्कान भी होती थी।
दिन बढ़िया गुज़र रहे थे लेकिन मैं रिंकी में और उसके मेरे प्रति व्यवहार में कुछ कुछ फर्क महसूस कर रहा था। मैं अक्सर नोट करता कि डाइनिंग टेबल पर खाना खाते वक़्त या लिविंग रूम में टी.वी देखते वक़्त या कभी कभी कोई किताब पढ़ते-पढ़ते मैं जब जब सिर उठा कर रिंकी की ओर देखता तो उसे मेरी ओर ही देखते पाता और जैसे ही मेरी रिंकी की नज़र से नज़र मिलती तो वो या तो नज़र नीची कर लेती या कहीं और देखने लगती।
मुझे कुछ समय के लिए उलझन तो होती पर जल्दी ही मेरा ध्यान किसी और बात पर चला जाता और बात आई-गई हो जाती।
बरसात का मौसम आ गया था, बहुत निकम्मी किस्म की गर्मी पड़ रही थी, जिस दिन बरसात होती उस दिन तो मौसम ठीक रहता, अगले दिन जब धूप निकलती तो उमस के मारे जान निकलने लगती, जगह जगह खड़ा पानी बास मारने लगता और मक्खी-मच्छर पैदा करने की ज़िंदा फैक्टरी बन जाता।
एयर कंडीशनड कमरों में ही जिंदगी सिमटी पड़ी थी।
उसी मौसम में एक दिन रिंकी के कमरे के A.C की गैस लीक हो गई। बच्चों का बैडरूम छोटा था और उसमें तीसरे बेड की जगह नहीं थी, ड्राइंग रूम और लिविंग रूम तो रात को सोने के किये डिज़ाइन्ड ही नहीं थे तो एक ही चारा बचता था कि जब तक रिंकी के कमरे का A.C रिपेयर हो कर नहीं आता, रिंकी का बेड हमारे बैडरूम में हमारे बेड की बगल में ही लगाया जाए।
ऐसा ही हुआ और ऐसा होने से हम पति-पत्नी की रात वाली रासलीला पर टेम्परेरी बैन लग गया था!
पर क्या करते… मज़बूरी थी।
हमारे बैडरूम में बेड के साथ ही लेफ्ट साइड बाथरूम का दरवाज़ा था और मेरी पत्नी बैड के लेफ्ट साइड सोना पसंद करती थी और मैं राईट साइड सोता था, हमारे बेड के साथ ही राईट साइड रिंकी का फोल्डिंग बेड लगाया गया था। रात आती, खाना-वाना खा कर हम लोग सोने के लिए बैडरूम में आते।
डॉली मेरे बायें और रिंकी मेरे दायें… ये दोनों बातें करने लगती और मैं बीच में ही सो जाता।
दो-एक दिन बाद एक रात को अचानक मेरी आँख खुली तो पाया कि रिंकी बाईं करवट सो रही थी यानी उसका मुंह मेरी ओर था और उसका दायां हाथ मेरी छाती पर था।
मैंने सिर उठा कर देखा तो डॉली को घनघोर नींद के हवाले पाया। मैंने धीरे से रिंकी का हाथ अपनी छाती से उठाया और उस हाथ उस की बगल पर रख दिया।
पर नींद बहुत देर तक नहीं आई, दिल में बहुत उथल-पुथल सी चल रही थी।
क्या रिंकी ने जानबूझ कर ऐसा किया था? अगर हाँ तो क्यों? क्या रिंकी मेरे साथ… सोच कर झुरझुरी सी उठी और अचानक ही मेरे लिंग में तनाव आ गया।
इसी उहपोह में जाने कब मेरी आँख लग गई।
दिन चढ़ा, सब कुछ अपनी जगह पर, हर चीज़ नार्मल सी थी पर मेरे दिल में इक अनजान सी फ़ीलिंग थी, रह रह कर रिंकी के हाथ की छुअन मुझे अपनी छाती पर फील हो रही थी और रह रह कर मेरे लिंग में तनाव आ रहा था।
उस दिन मैंने अपनी शादी के बाद पहली बार बाथरूम में नहाते समय हस्त मैथुन किया।
अगली रात आई, फिर वही सोने का अरेन्जमेन्ट, डॉली डबलबेड के बाईं ओर, मैं दाईं ओर और रिंकी का फोल्डिंग बेड हमारे डबलबेड के दाईं ओर सटा हुआ और मुझ में और रिंकी में ज्यादा से ज्यादा डेढ़ फुट का फासला।
आज मैं अभी किताब ही पढ़ रहा था कि ये दोनों सोने की तैयारी करने लगी। जल्दी सोने का कारण पूछने पर रिंकी ने बताया कि आज दोनों बाज़ार गईं थी, थक गई हैं।
पन्द्रह बीस मिनट बाद मैंने लाईट बंद की और खुद उल्टा हो कर सोने की कोशिश करने लगा, उल्टा बोले तो पेट के बल! पन्द्रह-बीस मिनट ही बीते होंगे कि रिंकी का हाथ आज़ फिर से मेरे ऊपर आ पड़ा लेकिन आज़ चूंकि मैं उल्टा पड़ा था सो इस बार उसका हाथ मेरी पीठ पर पड़ा।
तीन चार मिनट बाद रिंकी ने अपना हाथ मेरी पीठ से उठा लिया और खुद सीधी होकर, मतलब पीठ के बल लेट कर सोने का उपक्रम करने लगी। उसका मेरी ओर वाला हाथ मतलब बायां हाथ उसके सिर के पास सिरहाने पर ही पड़ा था। मेरा मुंह रिंकी की ओर ही था और मेरा और रिंकी का फासला ज्यादा से ज्यादा डेढ़ फुट का रहा होगा।
अचानक मैंने अपने बायें हाथ को रिंकी पर रख दिया… मेरा दिल पसलियों में धाड़-धाड़ बज़ रहा था।
कोई हरकत नहीं.. ना मेरी ओर से… ना रिंकी की ओर से…
अचानक रिंकी ने सिर उठाया और मेरी ओर ध्यान से देखने लगी, मींची आँखों में मैं सोने की एक्टिंग करने लगा। एक डेढ़ मिनट मुझे ध्यान से देखने के बाद जब उसे यकीन हो गया कि मैं गहरी नींद में सो रहा था तो उसने अपने हाथ पर जो मेरा हाथ थामे था, चादर डाल थी और चादर के नीचे मेरे हाथ की उँगलियों को एकके बाद एक करके चूमने लगी।
उम्म्ह… अहह… हय… याह… उत्तेजना के मारे मेरा बुरा हाल था, तनाव के कारण मेरा लिंग जैसे फटने की कगार पर था। मैं रिंकी के हाथ का स्पंदन महसूस कर सकता था पर मैंने अपनी ओर से कोई हरकत नहीं की।
करीब आधे घंटे बाद रिंकी ने ऐसा करना बंद किया।
मैंने सर उठा कर देखा तो लगा कि रिंकी सो गई थी शायद! मेरा हाथ अब भी उसके हाथ में जकड़ा हुआ था। ऐसे ही जाने कब मैं सचमुच नींद के आगोश में चला गया।
सुबह उठा तो पाया कि डॉली और रिंकी उठ कर कब की जा चुकी थी, तभी डॉली अख़बार ले कर आ गई। दिल में अनाम सी ख़ुशी लिए मैंने जिंदगी का एक नया दिन शुरू किया।
तभी रिंकी भी बैडरूम में चाय की ट्रे लेकर आई, नहाई-धोई, सफ़ेद पजामी सूट में ताज़ा ताज़ा शैम्पू किये बालों से मनभावन सी खुशबू उड़ाती एकदम ताज़ा दम, सफ़ेद सूट में से सफ़ेद ब्रा साफ़ साफ़ उजाग़र हो रही थी।
जैसे ही मेरी रिंकी की आँख से आँख मिली, रिंकी की नज़र झुक गई और क्षण भर को ही ग़ुलाबी भरे भरे होंठों पर एक गुप्त सी मुस्कान आकर लुप्त हो गई।
रात वाली बात याद आते ही मेरे लिंग में जान सी आने लगी।
जैसे ही रिंकी बैठने लगी तो मेरी वाली साइड से सफ़ेद पजामी में से गहरे रंग की पैंटी साफ़ साफ़ झलकने लगी। एक क्षण में ही मेरा लिंग फुल जोश में फुंफ़कारने लगा और मैंने अपने साथ बैठी डॉली का हाथ चादर के अंदर ही पकड़ कर अपने लिंग पर रख कर ऊपर से अपने हाथ से दबा लिया।
डॉली चिंहुक उठी, लगी अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश करने… लेकिन मैं जाने दूं तब ना! जैसे ही डॉली ने मुझे देख कर आँखें तरेरी तो रिंकी ने पूछा- क्या हुआ मौसी?
‘कुछ नहीं…’ कह कर डॉली ने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश बंद कर दी और चादर के नीचे से मेरा लिंग जोर से पकड़ लिया।
मैं अपने मुक्त हुए हाथ से डॉली की जाँघ जांचने लगा।
सारा दिन जैसे हवाओं के हिण्डोले पर बीता, जो मेरे और रिंकी के बीच चल रहा था, उस बारे में सारा दिन मेरे अपने ही अंदर तर्क कुतर्क चलते रहे।
एक बात तो पक्की थी कि रिंकी की तो ख़ैर कच्ची उम्र थी पर मैं जो कर रहा था वो सामाजिक और नैतिक दृष्टि से गलत था और मैं खुद जानता था कि मैं गलत कर रहा था।
लेकिन वो जैसा कहते हैं कि गुनाह की लज़्ज़त मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी।
साली की बेटी की कच्ची उम्र की लज़्ज़त मेरा पीछा नहीं छोड़ रही थी, मैंने सोच लिया था कि आज से मैं रिंकी वाली साइड सोऊंगा ही
नहीं लेकिन जैसे-जैसे दिन बीत रहा था, मेरा पक्का इरादा डाँवाडोल हो रहा था।
शाम आई… मैं घर आया, आते ही रिंकी मेरे लिए पानी का गिलास ले कर आई, ग़िलास पकड़ते वक़्त मैंने रिंकी की आँखों में देखा,
रिंकी ने शर्मा कर नज़र नीची कर ली और खाली गिलास ले कर चली गई।
आज रात तो कुछ हो कर रहना था, ऐसी सोच आते ही पतलून के अंदर ही मेरा लिंग भयंकर रौद्र रूप में आ गया, रात की प्रतीक्षा में
समय काटना मुश्किल हो गया था।
शाम को बाथरूम में नहाते समय मैंने एक बार फिर ‘अपना हाथ जगन्नाथ’ किया।

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Re: कच्ची उम्र की लज़्ज़त new hindi sex story 2017

Unread post by rajkumari » 23 Oct 2017 09:04

डिनर करते समय मैंने रह रह कर आती जाती डॉली के नितंबों पर चुटकी काटी। डिनर टेबल पर ही डॉली ने मुझ से रिंकी के कमरे के
A.C के बारे में पूछा कि कब ठीक हो के आएगा?
यूं मैंने कह तो दिया कि एक-आध दिन में आ जाएगा पर मेरा इरादा तो रिंकी के कमरे के A.C को कयामत के दिन तक ना लाने का
हो रहा था।राम राम कर के डिनर निपटाया।
वैसे हम फ़ैमिली के सब लोग डिनर के बाद लिविंग रूम बैठ कर कुछ देर गप्पें हांकते है लेकिन उस दिन मैं सीधा अपने बैडरूम में
चला गया।
बाथरूम में ब्रश करने के बाद मैंने अपना अंडरवियर उतार कर वाशिंग-बास्केट में डाल दिया और पजामा बिना अंडरवियर के पहन कर
सीधे अपने बिस्तर पर जा कर A.C का टेम्प्रेचर 20 डिग्री पर सेट कर दिया।
डॉली और रिंकी अभी बैडरूम में आईं नहीं थी, मैंने बिस्तर में लेट कर आँखें बंद कर ली, बीसेक मिनट बाद दोनों बैडरूम में आईं और
मुझे सोता पाया।
10-15 मिनट हल्की-फ़ुल्की बाद गप्पें हांकने के बाद दोनों सोने की तैयारी करने लगी और बैडरूम की लाइट बंद कर दी गई।
जैसे ही बैडरूम की लाइट बंद हुई मैंने तड़ाक से आँखें खोल ली और रिंकी को देखने लगा। रिंकी तब अपने बिस्तर पर लेटने की तैयारी
कर रही थी और अपने बाल बाँध रही थी।
मैंने चुपके से अपनी दाईं बाजु रिंकी के बिस्तर पर तकिये से ज़रा सी नीचे दूर तक फैला दी।
रिंकी चादर ऊपर खींच कर जैसे ही अपने बिस्तर पर लेटी, मेरी बाजु उसकी गर्दन के नीचे से उसके परले कंधे तक पहुँच गई। उसने
अपने हाथ से अपने दाएं कंधे के पास टटोल कर देखा तो मेरा दायां हाथ उसके हाथ में आ गया।
जैसे ही रिंकी के हाथ की उंगलियां मेरे हाथ से टच हुई, मैंने उस का हाथ जोर से पकड़ लिया।
पहले तो रिंकी ने दो-चार पल अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की लेकिन जल्दी ही मेरा हाथ कस के पकड़ लिया।
मुझे तो दो जहान् की खुशियां मिल गई जैसे… मानो सारी कायनात ठहर गई हो!
मेरा दिल मेरे सीने में धाड़-धाड़ बज़ रहा था और मैं अपने ही दिल की धड़कन बड़ी साफ़-साफ़ सुन रहा था। पता नहीं ऐसे दो मिनट
बीते के दो घंटे… कुछ याद नहीं।
फिर मैंने रिंकी की ओर करवट ली और अपना बायां हाथ रिंकी के बाएं उरोज़ पर रख दिया, रिंकी ने मेरा वो हाथ फ़ौरन परे झटक दिया
और अपना सर बायें से दायें हिला कर जैसे अपना एतराज़ जताया लेकिन मैंने दोबारा अपना हाथ उसके बायें उरोज़ पर रख दिया।
रिंकी ने दोबारा मेरा हाथ अपने उरोज़ पर से उठाना चाहा लेकिन इस बार मेरा हाथ ना उठाने का इरादा पक्का था, दो एक मिनट की
असफ़ल कोशिश करने के बाद रिंकी ने अपना हाथ मेरे हाथ से उठा लिया और जैसे मुझे मनमानी करने की इज़ाज़त दे दी।
मैं अँधेरे में रिंकी के उरोज़ की नरमी और गर्मी दोनों को अपने हाथ में महसूस कर रहा था।
धीरे धीरे मैंने अपनी उँगलियों को रिंकी के उरोज़ पर ज़ुम्बिश देनी शुरू की। रिंकी का उरोज़ बहुत नर्म सा था, मैं उस पर बहुत नरमी से
उंगलियां चला रहा था।
अचानक एक जगह हल्की सी कुछ सख़्त सी मालूम पड़ी। हल्का सा टटोलने पर पता पड़ा कि यह उरोज़ का निप्पल है।
जैसे ही मेरा हाथ निप्पल को लगा, वो और ज़्यादा टाईट और बड़ा हो कर ख़डा हो गया। मैंने अपना हाथ रिंकी की चादर के अंदर डाल
कर, रिंकी की नाईट सूट का ऊपर वाला एक बटन खोल कर, ब्रा के अंदर से हौले से रिंकी के उरोज़ पर रखा तो रिंकी के पूरे ज़िस्म में
झुरझुरी की एक लहर सी दौड़ गई जिसे मैंने स्पष्टत महसूस किया।
रिंकी की गर्म तेज़ साँसें मैं अपनी कलाई पर महसूस कर रहा था। रिंकी के उरोज़ के कठोर निप्पल का स्पर्श मैं अपनी हथेली के ठीक
बीचों बीच महसूस कर पा रहा था।
धीरे से मैंने अपनी पाँचों उंगलियां उरोज़ के साथ साथ ऊपर उठानी शुरू की और अंत में निप्पल उँगलियों के बीच में आ गया जिसे मैंने
हलके से दबाया।
रिंकी के मुख से शाश्वत आनन्द की ‘आह’ की हल्की सी सिसकारी प्रफुटित हुई। जल्दी ही मैंने अपना हाथ दूसरे उरोज़ की ओर सरकाया
दूर वाला उरोज़ थोड़ा दूर पड़ रहा था तो रिंकी बिना कहे खुद ही सरक कर मेरी ओर ख़िसक आई।
अब ठीक था।
मैंने अपना हाथ ब्रा के ऊपर से ही परले उरोज़ पर ऱखा और उरोज़ को थोड़ा सा दबाया। प्रिय के मुंह से बहुत ही हलकी सी ‘सी… सी’
की सिसकारी निकली।
मैंने अपना हाथ उठा कर धीरे से ब्रा के अंदर सरकाया और परले उरोज़ पर कोमलता से हाथ धर दिया। परले उरोज़ का निप्पल अभी
दबा दबा सा था लेकिन जैसे ही मेरे हाथ ने निप्पल को छूआ, निप्पल ने सर उठाना शुरू कर दिया और एक सैकिंड में ही अभिमानी
योद्धा गर्व से सर ऊंचा उठाये खड़ा हो गया।
अचानक मुझे लगा की मेरे परले हाथ की हथेली पर कुछ नरम-नरम, कुछ गरम-गरम सा लग रहा है, देखा तो अपनी चादर के अंदर
रिंकी मेरा हाथ बहुत शिद्दत से चूम रही थी, पूरे हाथ पर जीभ फ़िरा रही थी।
जल्दी ही रिंकी ने मेरे हाथ की उँगलियाँ एक एक कर के अपने मुँह में डाल कर चूसनी शुरू कर दी। मैं रिंकी के होंठों की नरमी और
उस की जीभ का नरम स्पर्श अपनी उँगलियों पर महसूस कर कर के रोमांचित हो रहा था।
मेरा लिंग 90 डिग्री पर चादर और पजामे का तंबू बनाये फौलाद सा सख्त खड़ा था, मारे उत्तेज़ना के मेरे नलों में तेज़ दर्द हो रहा था।
अब सहन करना मुश्किल था, लेकिन इस से और आगे बढ़ना खतरे से खाली नहीं था।
अपने ही बैडरूम में, अपनी ही पत्नी की कुंवारी भांजी के साथ शारीरिक संबंध बनाते या बनाने की कोशिश करते, अपनी ही पत्नी के
हाथों रंगे-हाथ पकड़े जाने से ज़्यादा शर्मनाक कुछ और हो नहीं सकता था।
मैं ऐसी बेवकूफी करने वाला हरगिज़ नहीं था।
जिंदगी रही तो आगे ऐसे बहुत मौक़े मिलेंगे जब आदमी अपने दिल की कर गुज़रे और रिंकी तो राज़ी थी ही!
बेमन से मन ममोस कर मैं उठा और बाथरूम में जाकर पेशाब करने के लिए पजामा खोला तो मेरा लिंग झटके से बाहर आया।
जैसे ही मैंने लिंग का मुंह कमोड की ओर पेशाब करने के लिए किया, मेरे पेशाब की धार कमोड में नीचे जाने की बजाए कमोड के ऊपर
सामने दीवार कर पड़ी, मैं अपने लिंग को नीचे की ओर झुकाऊं पर मेरा लिंग नीचे की ओर हो ही ना!
जैसे तैसे पेशाब करके मैं वापिस बैडरूम में आया ही था कि डॉली ने मुझ से टाइम पूछा, मेरी तो फट के हाथ में आ गई।
ख़ैर जी!
डॉली को टाइम बता कर A.C का टेम्प्रेचर थोड़ा बढ़ा कर मैं भी सोने की कोशिश करने लगा, उधर रिंकी भी चुपचाप चित पड़ी सोने का
बहाना कर रही थी।
बहुत रात बीतने के बाद मुझे नींद आई।
अगला सारा दिन मैंने मन ही मन चिढ़ते कुढ़ते हुए गुज़ारा। जो कुछ और जितना कुछ रिंकी के साथ रातों को हो रहा था, उस से ज़्यादा
होने की गुंजाईश बहुत कम थी और ऐसा होना भी बहुत दिनों तक ऐसा होना मुमकिन नहीं था।
आज नहीं तो कल, रिंकी के कमरे का A.C ठीक हो कर आना ही था। ऊपर से अपने ही बैडरूम में डॉली के किसी भी क्षण उठ जाने का डर हम दोनों को खुल कर खेलने नहीं देता था।
मुझे जल्दी ही कुछ करना था।
किसी दिन रिंकी को ले कर किसी होटल में चला जाऊं?
ना… ना! यह निहायत ही बकवास आईडिया था, आधा शहर मुझे जानता था और रिंकी को होटल ले कर जाने के अपने खतरे थे।
और… घर में? घर में मेरे बच्चे थे, डॉली थी… नहीं नहीं! ऐसा होना भी मुमकिन नहीं था।
तो फिर… क्या करूँ? कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लिहाज़ा मैं चिड़चिड़ा सा हो रहा था।
रात को डिनर करने के बाद फिर बाथरूम में ब्रश करने के बाद मैं अपना अंडरवियर उतार कर पजामा बिना अंडरवियर के पहन कर A.C का टेम्प्रेचर 20 डिग्री पर सेट कर के सीधे अपने बिस्तर पर जा पड़ा। आज रिंकी और डॉली दोनों अभी तक बेडरूम में नहीं आई थी।
अपने आप में उलझे हुए मेरी कब आँख लग गई, मुझे पता ही नहीं चला।
अचानक मेरे कान में कुछ सुरसुरी सी हुई, मैंने नींद में ही हाथ चलाया तो मेरे हाथ में रिंकी का हाथ आ गया, रिंकी चुपके से मुझे जगाने की कोशिश कर रही थी।
मैंने रिंकी का हाथ अपनी छाती पर रख कर ऊपर अपना हाथ रख दिया और रिंकी की साइड वाला हाथ चादर के अंदर से उसके चेहरे पर फेरने लगा।
माथा, गाल, कान, आँखें, नाक, होंठ, ठुड्डी, गर्दन… धीरे-धीरे मेरा हाथ नीचे की ओर अग्रसर था और रिंकी की साँसें क्रमशः भारी होती जा रही थी और रिंकी मुझे पिछले रोज़ की तरह से रोक भी नहीं रही थी, लगता था कि रिंकी खुद ऐसा चाह रही थी।
जैसे ही मेरा हाथ गर्दन के नीचे से होता हुआ रिंकी कंधे से होता हुआ रिंकी की छातियों तक पहुंचा तो मैं एक सुखद आश्चर्य से भर उठा। आज प्रिय ने नाईट सूट के नीचे ब्रा नहीं पहनी थी, बस एक पतली बनियान सी पहनी हुई थी। मेरा हाथ उरोज़ को छूते ही रिंकी के शरीर में वही परिचित झुनझुनाहट की लहर उठी।
आज मैं कल जैसी नर्म दिली से पेश नहीं आ रहा था, उरोज़ का निप्पल हाथ में आते ही फूल कर सख़्त हो गया था, मैं अंगूठे और एक उंगली के बीच में निप्पल लेकर हल्के हल्के मसलने लगा।
रिंकी का दायां हाथ मेरे हाथ के ऊपर रखा था, जहां जहां उसे तीव्र आनन्द की अनुभूति होती, वहीं वहीं उसका हाथ मेरे हाथ पर कस जाता।
मेरा मन कर रहा था कि मैं रिंकी के उरोज़ों का अपने होंठों से रसपान करूँ लेकिन उस में अभी भयंकर ख़तरा था सो मैंने अपने मन पर काबू पाया और इसी खेल को आगे बढ़ाने में लग गया।
मैंने अपना दायां हाथ रिंकी के उरोजों से उठा कर रिंकी के बाएं हाथ पर (जो मेरी छाती पर ही पड़ा था) रख दिया।
रिंकी के हाथ को सहलाते सहलाते मैंने रिंकी का हाथ उठा कर पजामे के ऊपर से ही अपने गर्म, तने हुए लिंग पर रख दिया।
रिंकी को जैसे 440 वाट का करंट लगा, उसने झट से अपना हाथ मेरे लिंग से उठाने की कोशिश की लेकिन उस के हाथ के ऊपर तो मेरा हाथ था, कैसे जाने देता?
दो एक पल की धींगामुश्ती के बाद रिंकी ने हार मान ली और मेरे लिंग पर से अपना हाथ हटाने की कोशिश छोड़ दी।
मैंने अपने हाथ से जो रिंकी का वो हाथ थामे था जिस की गिरफ़्त में मेरा गर्म, फौलाद सा तना हुआ लिंग था, को दो पल के लिए अपने लिंग से हटाया और अपना पजामा अपनी जांघों से नीचे कर के वापिस अपना लिंग रिंकी को पकड़ा दिया। रिंकी के शरीर में फिर से वही जानी-पहचानी कंपकंपी की लहर उठी।
अब के रिंकी का हाथ खुद ही लिंग की चमड़ी को आगे पीछे कर के मेरे लिंग से खेलने लगा, कभी वो शिशनमुंड पर उंगलिया फेरती, कभी लिंग की चमड़ी पीछे कर के शिशनमुंड को अपनी हथेली में भींचती, कभी मेरे अण्डकोषों को सहलाती।
ऊपर मेरे हाथों द्वारा रिंकी की छातियों का काम-मर्दन जारी था। धीरे धीरे मैं अपना दायां हाथ रिंकी के पेट पर ले गया, नाईट सूट के अप्पर को पेट से ऊंचा करके मैंने रिंकी के पेट पर हल्के से हाथ फेरा और फिर से रिंकी के शरीर में वही जानी पहचानी कंपकंपी की लहर को महसूस किया, रिंकी का हाथ मेरे लिंग पर जोरों से कस गया।
मैं धीरे धीरे अपना हाथ रिंकी के पेट पर घुमाता घुमाता नाभि के आस पास ले गया, रिंकी के शरीर में रह रह कर कंपन की लहरें उठ रही थी।
जैसे ही मेरा हाथ रिंकी के नाईट सूट के लोअर के नाड़े को टच हुआ, रिंकी ने अपने दाएं हाथ से मेरा हाथ पकड़ लिया और मजबूती से मेरा हाथ ऊपर को खींचने लगी।
मैंने जैसे-तैसे अपना हाथ छुड़ाया और फिर से दोबारा जैसे ही रिंकी के नाईट सूट के लोअर के नाड़े को छूआ, रिंकी की फिर वापिस वही प्रतिक्रिया हुई, उसने मजबूती से मेरा हाथ पकड़ कर वापिस ऊपर खींच लिया।
ऐसा लगता था कि रिंकी मुझे किसी कीमत पर अपना लोअर खोलने नहीं देगी।
मजबूरी थी… प्यार था, लड़ाई नहीं जो जोर जबरदस्ती करते, जो करना था खामोशी से और आपसी समझ बूझ से ही करना था।
मैंने रिंकी का हाथ उठा कर वापिस अपने लिंग पर रख दिया और अब की बार अपना हाथ चादर के अंदर पर उसके नाईट सूट के सूती लोअर बाहर से ही रिंकी की बाईं जांघ कर रख दिया रिंकी के शरीर में कंपन की लहर उठी और अब मैं रिंकी की जांघ सहलाते सहलाते अपना हाथ जांघ अंदर को और ऊपर की ओर ले जाने लगा।
मेरी स्कीम काम कर गई, आनन्द स्वरूप रिंकी के मुंह से हल्की-हल्की सिसकारी निकलने लगी ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ उसका हाथ जोर-जोर से मेरे लिंग पर ऊपर-नीचे चलने लगा।
रिंकी की बाईं जांघ पर स्मूथ चलती मेरी उंगलियों ने अचानक महसूस किया कि उंगलियों और रेशमी जांघ के बीच में कोई मोटा सा कपड़ा आ गया हो।
मैं समझ गया कि यह रिंकी की पेंटी थी। धीरे धीरे मैं जाँघों के ऊपरी जोड़ की ओर बढ़ा।
उफ़! एकदम गर्म और सीली सी जगह… मैंने वहां अपना हाथ रोक कर अपनी उंगलियों से सितार सी बजाई।
फ़ौरन ही रिंकी ने मेरे लिंग को इतने जोर से दबाया कि पूछो मत!
मैंने नाईट सूट के सूती लोअर के बाहर से ही रिंकी की पेंटी को साइड से ऊपर उठाया और नाईट सूट के कपडे समेत अपनी चारों उंगलियां रिंकी की पेंटी के अंदर डाल दी। मेरे हाथ के नीचे जन्नत थी पर मुझे इस जन्नत पर कुछ जटाजूट सा कुछ महसूस होता। शायद रिंकी अपने गुप्तांगों के बाल नहीं काटती थी।
मैं कुछ देर अपनी उंगलियों से सितार बजाने जैसी हरकत करता रहा और इधर रिंकी मेरे लिंग को मथती जा रही थी।
अचानक ही मैंने अपना दायां हाथ रिंकी की योनि से उठाया और फुर्ती से रिंकी के नाईट सूट के लोअर का नाड़ा खोल कर अपना हाथ रिंकी की पेंटी के अंदर से रिंकी की बालों भरी योनि पर रख दिया।
प्रिय ने फ़ौरन अपना दायां हाथ मेरे हाथ पर रखा और मेरा हाथ अपनी योनि से उठाने की कोशिश करने लगी लेकिन अब तो बाज़ी बीत चुकी थी, अब मैं कैसे हाथ उठाने देता।
मैंने सख्ती से अपना हाथ रिंकी की योनि पर टिकाये रखा और साथ साथ अपनी बीच वाली उंगली योनि की दरार पर ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर फिराता रहा।
कुछ ही देर बाद रिंकी ने मेरे उस हाथ की पुश्त पर जिससे मैं उसकी योनि का जुग़राफ़िया नाप रहा था, एक हल्की सी चपत मारी और अपना हाथ उठा कर परे करके जैसे मुझे खुल कर खेलने की परमीशन दे दी।
रिंकी की योनि से बेशुमार काम-रस बह रहा था, उसकी पूरी पेंटी भीग चुकी थी। मैंने योनि की दरार पर उंगली फेरते फेरते अपनी बीच वाली उंगली से रिंकी की योनि के भगनासा को सहलाया, रिंकी ने जल्दी से अपनी दोनों जाँघें जोर से अंदर को भींच ली।
मैंने वही उंगली रिंकी की योनि में जरा नीचे अंदर को दबाई तो रिंकी के मुंह से ‘उफ़्फ़’ निकल गया।
रिंकी शतप्रतिशत कंवारी थी, लगता था कि रिंकी ने कभी हस्तमैथुन भी नहीं किया था।
तभी मुझे अपनी बाईं ओर हल्की सी हलचल और कपड़ों की सरसराहट का अहसास हुआ, मैंने तत्काल अपना हाथ रिंकी की योनि पर से खींचा और रिंकी से जरा सा उरली तरफ सरक कर गहरी नींद में सोने के जैसी ऐक्टिंग करने लगा।
मिंची आँखों से देखा तो डॉली बाथरूम जाने के लिए उठ रही थी।
जैसे ही डॉली बाथरूम में घुसी मैंने फ़ौरन अपने कपड़े ठीक किये और फुसफुसाती आवाज़ में रिंकी को भी अपने कपड़े ठीक करने को कह दिया।
सब कुछ ठीक ठाक करने के बाद हम दोनों ऐसे अलग अलग लेट गए जैसे गहरी नींद में हों।
बाथरूम से बाहर आ कर डॉली ने AC का टेम्प्रेचर बढ़ाया और वापिस बिस्तर पर आकर मुझे पीछे से आलिंगन में ले लिया।
बाल बाल बचे थे हम!
मुझे बहुत देर बाद नींद आई।
अगले दिन शनिवार था और शनिवार के बाद इतवार की छुट्टी थी।
शाम को लगभग 4 बज़े A.C वाले का फ़ोन आया कि A.C ठीक हो गया था और वो पूछ रहा था कि कब अपने आदमी मेरे घर भेजे ताकि A.C वापिस फ़िट किया जा सके।
मैंने उसे इतवार शाम को आकर A.C फिट करने को बोला।
अब मेरे पास केवल एक ही रात थी जिसमें मैंने कुछ कर गुज़रना था और मैं रात को सबकुछ कर गुज़रने को दृढ़प्रतिज्ञ था। शाम को मैंने अपने परिचित कैमिस्ट से गहरी नींद आने की गोलियों की एक स्ट्रिप ली और आईसक्रीम की दूकान से एक ब्रिक बटरस्काच आईसक्रीम ले कर घर आया।
डॉली को बटरस्काच आईसक्रीम बहुत पसंद थी।
चार गोलियां पीस कर में पुड़ी में अपने पास रख ली।

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rajkumari
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Re: कच्ची उम्र की लज़्ज़त new hindi sex story 2017

Unread post by rajkumari » 23 Oct 2017 09:04

अगली रात डिनर के टाइम डिनर टेबल पर रिंकी डिनर सर्व कर रही थी, आमतौर पर डॉली डिनर सर्व करती थी लेकिन उस दिन रिंकी डिनर सर्व कर रही थी, आते-जाते बहाने बहाने से मुझे यहां वहां छू रही थी।
डिनर हुआ, आईस क्रीम मैंने खुद सबको सर्व की। बच्चों की और डॉली वाली प्लेट में मैंने वो पीसी हुईं नींद की गोलियां मिला दी। सब ने आईसक्रीम खाई और करीब 9:30 बजे मैं एक दोहरी मनस्थिति में अपने बैडरूम में आ गया।
नींद की गोलियों का असर डॉली पर एक से डेढ़ घंटे बाद होना था।
ब्रश करने के बाद मैंने हस्तमैथुन किया और अपना अंडरवियर पहने बिना ही पजामा पहन लिया और एक नावेल लेकर वापिस अपने बिस्तर पर आ जमा। मैं अपने बिस्तर पर दो तकियों के साथ पीठ टिका कर, पेट तक चादर ले कर ओढ़ कर और घुटने मोड़ कर नॉवल पढ़ने लगा।
सब काम निपटा कर, करीब सवा दस बजे रिंकी और डॉली दोनों बैडरूम में आईं। तब तक बैडरूम में चलते A.C की बड़ी सुखद सी ठंडक फ़ैल चुकी थी।
आते डॉली बोली- आज तो मैं बहुत थक सी गई हूँ, बहुत नींद आ रही है!
‘मुझे भी!’ रिंकी ने भी हामी भरी।
‘तो सो जाओ, किसने रोका है।’ मैंने कहा।
‘और आप?’ डॉली ने पूछा।
‘मैं थोड़ा पढ़ कर सोऊंगा, मुझे अभी नींद नहीं आ रही है।’ मैंने कहा।
‘ठीक है… पर आप ट्यूब लाइट बंद करके टेबललैम्प जला लें!’ डॉली ने मुझ से कहा।
मैंने सिरहाने फिक्स टेबल-लैम्प जला कर ट्यूब लाइट बंद कर दी।
अब स्थिति यूं थी कि मेरे सर के ऊपर थोड़ा बाएं तरफ टेबल-लैम्प जल रहा था और रिंकी मेरे दाईं तरफ क़दरतन अंधेरे में थी और मेरे दाईं ओर से, मतलब डॉली की ओर से रिंकी को साफ़ साफ़ देख पाना मुश्किल था क्योंकि बीच में मैं था और रिंकी मेरी परछाई में थी।
बीस-पच्चीस मिनट बिना किसी हरकत के बीते। वैसे तो मेरी नज़र नॉवेल के पन्नों पर थी लेकिन दिमाग रिंकी की ओर था।
कनखियों से रिंकी की ओर देखा तो पाया कि रिंकी बाईं करवट लेटी हुई मेरी ओर ही देख रही थी।
फिर रिंकी ने आँखों ही आँखों में मुझे लाइट बंद करने का इशारा किया लेकिन मैंने उसे अभी रुक जाने का इशारा किया। जबाब में रिंकी ने मुझे ठेंगा दिखा कर मुंह बिचकाया, ऊपर चादर ले कर उलटी तरफ करवट ली और मेरी तरफ पीठ कर के लेट गई।
मुझे हंसी आ गई और मैंने हाथ बढ़ा कर रिंकी का कंधा छूआ तो उसने मेरा हाथ झटक दिया। मैंने दोबारा वही हाथ उस की कमर पर रखा तो रिंकी ने दुबारा मेरा हाथ अपनी कमर से झटक दिया।
लड़की सचमुच रूठ गई थी।
अब के मैंने अपना हाथ हौले से रिंकी के ऊपर वाले नितम्ब पर रख दिया, इस बार रिंकी ने मेरा हाथ नहीं झटका। मैं धीरे-धीरे कोमलता से रिंकी का पूरा नितम्ब सहलाने लगा।
अचानक मुझे महसूस हुआ कि आज रिंकी ने लोअर के नीचे पैंटी नहीं पहन रखी थी। वही हाथ रिंकी की पीठ पर फिराने से पता चला कि ब्रा भी नदारद थी। इन सब का सामूहिक मतलब तो ये था कि मेरी प्रेयसी अभिसार के लिए आज पूरी तरह से तैयार थी।
ऐसा सोचते ही मेरा लिंग अपनी पूरी भयंकरता के साथ मेरे पजामे में फुंफ़कारने लगा।
अपना वही हाथ रिंकी के कंधे तक ला कर मैंने रिंकी का कंधा हलके से अपनी ओर खींचा तो रिंकी सीधी हो कर लेट गई और आँख के इशारे से मुझे टेबल-लैम्प बुझाने को कहा।
मैंने पहले डॉली की ओर घूम कर देखा, अपना चेहरा परली तरफ घुमा कर हल्क़े से कंबल में चित लेटी डॉली गहरी निद्रा में थी। मैंने हाथ बढ़ा कर टेबल लैम्प बंद किया और अंधेरा होते ही झुक कर रिंकी के होंठों पर होंठ रख दिए।
रिंकी ने फ़ौरन अपनी बाजुएं मेरे गले में डाल दी और बड़ी शिद्दत से मेरे होंठ चूसने लगी।
थोड़ी देर बाद मैं सीधा हुआ और फ़ौरन दोबारा रिंकी की ओर झुक कर मैंने रिंकी के माथे पर, आँखों पर, गालों पर, नाक पर, गर्दन पर, गर्दन के नीचे, सैंकड़ों चुम्बन जड़ दिए।
रिंकी के दाएं कान की लौ चुभलाते समय मैं रिंकी के मुंह से, आनंद के मारे निकलने वाली ‘सी…सी… सीई… सीई… सीई… ई…ई…ई’ की सिसकारियाँ साफ़ साफ़ सुन रहा था।
मैंने रिंकी के नाईट सूट के ऊपर के दो बटन खोल दिए और अपना हाथ अंदर सरकाया। रुई के समान नरम और कोमल दो गोलों ने जिन के सिरों पर अलग अलग दो निप्पलों के ताज़ सजे थे, मेरे हाथ की उँगलियों का खड़े होकर स्वागत किया।
क्या भावनात्मक क्षण थे!
मेरा दिल करे कि दोनों कबूतरों को अपने सीने से लगा कर चुम्बनों से भर दूं, निप्पलों को इतना चूसूं… इतना चूसूं कि रिंकी के मुंह से आहें निकल जाएँ।
यूं तो रिंकी के मुंह से आहें तो मेरे उसके उरोजों को छूने से पहले ही निकलना शुरू हो गई थी।
उधर रिंकी का बायां हाथ मेरे पाजामे के ऊपर से ही मेरा लिंग ढूंढ रहा था। रिंकी ने मेरे पजामे का कपड़ा खींच कर मुझे मेरे लिंग को पजामे की कैद से छुड़ाने का इशारा किया, मैंने तत्क्षण अपना पजामा अपनी जाँघों तक नीचे खींच लिया।
रिंकी ने बेसब्री से मेरे तपते, कड़े-खड़े लिंग को अपने हाथ में लिया और उसके शिश्नमुण्ड पर अपनी उंगलियां फेरने लगी।
मेरे लिंग से उत्तेजनावश बहुत प्री-कम निकल रहा था और उससे रिंकी का सारा हाथ सन गया।
अचानक रिंकी ने वही हाथ अपने मुंह की ओर किया और अपने हाथ की मेरे प्री-कम से सनी उंगलियां अपने मुंह में डाल कर चूसने लगी।
मैंने तभी रिंकी के नाईट सूट के बाकी बटन भी खोल दिए और उसकी इनर उठा कर दोनों उरोज़ नग्न कर के अपनी जीभ से यहां-वहां चाटने लगा।
इससे रिंकी बिस्तर पर मछली की तरह तड़फने लगी, रिंकी जोर जोर से मेरा लिंग हिला दबा रही थी और मैं रिंकी के उरोजों का, निप्पलों का स्वाद चेक कर रहा था।
रिंकी पर झुके झुके मैंने अपना बायाँ हाथ रिंकी के पेट की ओर बढ़ाया, नाभि पर एक-आध मिनट हाथ की उंगलियां गोल गोल घुमाने के बाद अपना हाथ नीचे की ओर बढ़ा कर हौले से रिंकी के नाईट सूट का नाड़ा खोल दिया।
सरप्राइज ! आज रिंकी ने मुझे ऐसा करने से नहीं रोका।
मैंने जैसे ही अपना हाथ और नीचे करके रिंकी की पेंटी विहीन योनि पर रखा, एक और आश्चर्य मेरा इंतज़ार कर रहा था, आज रिंकी की योनि एकदम साफ़-सुथरी और चिकनी थी, योनि पर बालों का दूर दूर तक कोई निशान नहीं था, लगता था कि रिंकी ने शाम को ही योनि के बाल साफ़ किये थे।
छोटी सी योनि ज्यादा से ज्यादा साढ़े चार से पांच इन्च की जिस पर ढाई इंच से तीन इंच की दरार थी, दरार के ऊपर वाले सिरे पर छोटे मटर के साइज़ का भगनासा और रिंकी की योनि रस से इतनी सराबोर कि दरार में से रस बह-बह जांघों की अंदर वाली साइडों को भिगो रहा था।
मैंने अपने हाथ की बीच वाली उंगली दरार पर ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर फेरनी शुरू की, रिंकी के शरीर में रह रह कर काम तरंगें उठ रही थी जो मैं स्पष्टत: महसूस कर रहा था।
इधर रिंकी मेरे लिंग का भुरता बनाने पर तुली हुई थी, जोर जोर से लिंग दबा रही थी, चुटकियां काट रही थी और लिंग के शिश्नमुण्ड को अपनी उँगलियों में दबा दबा कर रस निकालने की कोशिश कर रही थी और बदले में मैं रिंकी के दोनों उरोज़ चूम रहा था, यहाँ-वहाँ चाट रहा था, निप्पल्स चूस रहा था।
निःसंदेह, हम दोनों जन्नत में थे।
रिंकी की योनि पर अपनी उंगलियां चलाते-चलाते मैंने अपने हाथ की बीच वाली उ।गली दरार में घुसा दी और अंगूठे और पहली उ।बगली से प्रिय का भगनासा हल्का हल्का मींजने लगा।
इस पर रिंकी ने उत्तेज़नावश अपनी दोनों टाँगें और चौड़ी कर दी ताकि मेरी बीच वाली उंगली थोड़ी और योनि में प्रवेश पा सके।
मुझे पता था कि रिंकी पूर्णतः कँवारी थी और मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं था, बस इक वही रात थी और जिंदगी में दोबारा ऐसी रात आनी मुश्किल थी। मैंने रिंकी की योनि में धँसी अपनी उंगली को योनि के अंदर ही गोल गोल घुमाना शुरू कर दिया।
इस का नतीजा फ़ौरन सामने आया, रिंकी बार बार रिदम में अपने नितम्ब बिस्तर से ऐसे ऊपर उठाने लगी जैसे चाहती हो कि मेरी पूरी उंगली उसकी योनि के अंदर चली जाए।
रिंकी की योनि से बेशुमार रस बह रहा था। मेरे लिंग पर उस की पकड़ और मज़बूत हो गई थी। मैं अपनी उंगली को हर गोल घेरे के बाद थोड़ा और अंदर की ओर धँसा देता था।
धीरे धीरे गोल गोल घूमती मेरी करीब पूरी उंगली रिंकी की योनि में उतर गई।
अब मैंने अपनी उंगली को बाहर निकाला और बीच वाली और तर्जनी उंगली को भी योनि में गोल गोल घुमाते घुमाते डालना शुरू कर दिया।
रस से सरोबार रिंकी की योनि में मेरी दोनों उंगलियां प्रविष्ट हो गई।
अब ठीक था, अपनी प्रेयसी को प्रेम-जीवन के और इस सृष्टि के एक अनुपम और गृहतम रहस्य से परिचित करवाने का समय आ गया था।
मैंने टाइम देखा, सवा बारह बज रहे थे, मतलब कि नींद की गोलियों का जादू पूरी तरह डॉली पर चल चुका था और अब मेरे लिए ‘वन्स इन आ लाइफ टाइम’ जैसा मौका था।
मैं बिस्तर से उठ खड़ा हुआ और पहले अपना पजामा संभाला। परली तरफ जाकर, इससे पहले रिंकी कुछ समझ पाती, रिंकी को अपनी गोद में उठा कर और अपने से लिपटा कर बाहर ड्राइंग रूम में आ गया।