मस्ती ही मस्ती पार्ट

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sexy
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मस्ती ही मस्ती पार्ट

Unread post by sexy » 14 Aug 2015 16:08

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मस्ती ही मस्ती पार्ट --०१



दोस्तों ये कहानी काल्पनिक है भाइयों, आपको पढने के पहले ही वॉर्न कर दूँ कि मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो शायद आप में से कुछ को अच्छी ना लगें! ये केवल एंटरटेनमैंट के लिये लिखी गयी हैं! इस में गाँड की भरपूर चटायी के बारे में, पिशाब से खेलने और उसको पीने के बारे में, इन्सेस्ट, गालियाँ, गेज़ और लडकियों के प्रति गन्दी गन्दी इन्सल्ट्स, फ़ोर्स्ड सैक्स, किन्की सैक्स वगैरह जैसी बातें हैं!इसकी रेटिंग कुछ पार्ट्स में एक्स।एक्स.एक्स. होनी चाहिये! इसमें चुदायी की ओवरडोज़ है! कभी कभी लगेगा, कि सिर्फ़ चुदायी ही जीवन है! जिस किसी को ये बातें अच्छी ना लगें वो कॄप्या आगे ना पढें!

ये बात उन दिनों कि जब मैं सिर्फ़ 20 साल का हुआ करता था और होटल डिप्लोमा करके देहली में एक कम्प्यूटर कोर्स करने गया था! तब मोबाइल और ई-मेल्स नहीं थे, कम्प्यूटर भी नया नया आया था इसलिये गेज़ को ढूँढने के लिये सिर्फ़ इन्स्टिंक्ट, चाँस, लक और एक्सपीरिएंस ही इस्तेमाल होता था! अब तो मैं आराम से इंटरनेट के ग्रुप्स और चैट्स पर लडकों से मिलता हूँ मगर तब बात अलग थी! अभी मैं कुछ दिन से, इन्फ़ैक्ट डेढ साल से ज़ायैद नाम के एक लडके से चैट करता हूँ! उसने मुझे अपने फ़ेस के अलावा अपने जिस्म की बहुत पिक्स दिखाई हैं और खूब दिल खोल के चैट किया है! वो मुझे लम्बी लम्बी मेल्स लिखता है! लडका अभी शायद 18-19 का ही है, मुझे भी पता है कि वो मिलेगा नहीं! नेट पर अक्सर लोग मिलते हैं और बिछड जाते हैं... इंटरनेट कुम्भ के मेले की तरह है, जिसमें खो जाना आसान है!

इन्फ़ैक्ट, मैं जितने लोगों से नेट पर चैट करता हूँ उसमें से मिलते कम और बिछडते ज़्यादा हैं, मगर फ़िर भी आदत सी बन गयी है! जब तक ज़ायैद जैसे लडके, चाहे कुछ देर को ही सही, दिल बहलाते रहेंगे, मैं बहलता रहूँगा! मेरे ऑफ़िस में भी इसका चलन है! सभी साइड में एक विन्डो खोल कर चैट करते रहते हैं! वैसे आजकल मेरे ऑफ़िस में एक नया एग्ज़िक्यूटिव आया हुआ है! देखिये, उसके साथ कुछ हो पाता है या वो भी कुम्भ में खो जायेगा! इन्फ़ैक्ट अभी ये लिखते लिखते भी ज़ायैद से चैट कर रहा हूँ और वो चिकना सा सैक्सी एग्ज़िक्यूटिव भी मेरे आसपास ही अपना काम कर रहा है! अभी कुछ देर पहले, वो अपनी ड्रॉअर में कुछ ढूँढने के लिये बहुत देर तक झुका हुआ था! उसकी मज़बूत गाँड फ़ैल के मेरी नज़रों के सामने थी! उसकी थाईज़, पैंट के अंदर से टाइट होकर दिख रही थी!!! काश मैं उनको सहला पाता, उनको छू पाता या उनको किस कर पाता!

मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो कुछ लोगों को बुरी लग सकती हैं! इसलिये मैं पहले ही बता दूँ कि ये कहानी भी मेरी और कहानियों की तरह केवल एंटरटेन्मैंट के लिये लिखी गयी है! इस में पता नहीं कितना सच है और कितना झूठ! बहुत सी ऐसी चीज़ों का विवरण है, जो मैने ना कभी की हैं और शायद ना कभी करूँगा... बस फ़ैंटेसीज़ हैं, या लोगों से सुना है, देखा है... इसलिये उनके बारे में लिखा है!
वैसे ऐसा कुछ भी नहीं है जो चुदायी शास्त्र में नहीं होता है! हम मे से बहुत लोग शायद मेरी कहानी के कैरेक्टर्स की तरह बहुत सी चीज़ें कर भी चुके होंगे! इसलिये भाइयों, इस कहानी को थोडा नमक मिर्च के साथ पढियेगा तो मज़ा आयेगा!

ये सब टाइप करने के कारण 'मेरा' वैसे भी कुछ खडा है और मैं चुपचाप अपनी ज़िप पर हाथ रख कर हल्के हल्के अपना लँड भी सहला लेता हूँ! कुछ देर पहले वो मेरी तरफ़ मुडा था और मुझे देख कर मुस्कुराया था! उसकी स्माइल बहुत ही सुंदर है! लगता है सारी की सारी गदरायी नमकीन जवानी जैसे पिघल कर होंठों पर आ गयी हो! उसकी उम्र 21 से ज़्यादा नहीं हुई होगी! वो हमारे यहाँ अपनी पहली जॉब ही कर रहा है और अभी दो महीने ही हुए हैं! पहले दिन ही उसकी जवानी मेरी नज़र में बस गई थी! मगर ये कहानी यहाँ शुरु नहीं होती है!

चलिये, आपको करीब 15 साल पहले ले चलता हूँ जब ये कहानी शुरु हो रही थी! मेरे कम्प्यूटर कोर्स के दिन थे! मैं जिस ढाबे पर खाना खाता था, वहाँ एक चिकना सा बिहारी लडका, असद, रोटियाँ बनाता था! उस ढाबे पर जाने का कारण ही था कि मैं उसकी जवानी आराम से निहार सकूँ! मैं ऐसी टेबल पर बैठता, जिससे मुझे वो तंदूर पर झुकता हुआ साफ़ दिखे और मैं उसकी निक्‍कर में लिपटी गदरायी गाँड और नँगी सुडौल माँसल जाँघों को देख सकूँ!

वो उम्र में मुझसे कुछ साल छोटा था मगर उसकी जवानी बडी उमँग से भरी थी! साले की पतली कमर चिकनी और गोरी थी, उसके बाज़ू कटावदार थे, रँग गोरा था, चूतड गोल और रसीले थे और आगे ज़िप के अंदर लौडा जैसे उफ़नता रहता था! वो चिकना और देसी था, मासूम सा मर्द, मुस्कुरा के रोटियाँ देता, मगर ढाबे की भीड में मैं बस उसको देख कर उसके नाम की मुठ ही मार सकता था! कभी रोटियाँ पैक करवाने के बहाने उसके पास कुछ देर खडा होकर उसको पास से देखता और वैसे ही मैने उससे काफ़ी दोस्ती कर ली!

उसका ढाबा मेरे रूम से एक घर आगे था, वो ग्राउँड पर था और मेरा रूम फ़र्स्ट फ़्लोर पर! अक्सर वो बालकॉनी से भी दिखता था! रात में वो वहीं ढाबे पर सोता! उसके साथ पाँच और लडके रहते थे! एक दिन ठँड में बारिश हो गयी तो एरीआ सूनसान हो गया! उस दिन 7 बजे ही आधी रात का सन्‍नाटा था! मैं जब उसके ढाबे पर गया तो वो और लडकों के साथ छुपा हुआ कम्बल ओढ कर टी.वी. देख रहा था! मैने भी दो पेग लगा रखे थे! वो हाथ मलता हुआ आया और तंदूर खोल कर रोटियाँ डालने लगा! दूसरे लडके ने मेरा खाना लगाया! उस दिन जब तीन रोटियाँ हो गयी तो मैने असद को अपने पास बिठा लिया! ठँड के मारे असद का सुंदर सा चेहरा गुलाबी हो गया था, उसके होंठ मुझसे बातें करने में थिरक रहे थे, वो एक पुरानी सी जैकेट पहने था!
'आज टी.वी. का प्रोग्राम है?' मैने पूछा!
'नहीं, ये साले आज कहीं से अध्‍धा ले आये थे...'
'तुम भी पीते हो क्या?'
'नहीं, मगर आज इन्होने पिला दी...'

मैं खुश हो गया! वो मुझे अचानक और ज़्यादा सैक्सी लगने लगा!
'तो क्या अब फ़िर प्रोग्राम चलेगा?'
'कहाँ... सब खत्म हो गयी... एक एक ही पेग बन पाया...'
'तो आज मेरे रूम पर आ जाओ, मेरे पास और भी है...'
'सच?'
'हाँ'
'मगर मैं कैसे आपके रूम पर आ सकता हूँ?'
'क्यों? इसमें क्या है, मैं चलता हूँ... तुम आ जाओ... इनको मत बताना, क्योंकि सबके लिये नहीं होगी...'

मैने उसको अकेले बुलाने का बहाना किया जो कामयाब रहा!
'नहीं नहीं... सबको थोडी पिलाऊँगा भैया...'
'तो आ जाओ'
'कुछ जुगाड करता हूँ...'
उसके साथ अकेले बैठ के दारू पीने की सोच के ही मेरा लौडा ठनक के खडा हो गया! उस दिन उसके चेहरे पर कसक, कामुकता और कसमसाहट थी! शायद मौसम ही इतना सैक्सी था, जिस वजह से उसकी जवानी हिचकोले खा रही थी! उसकी आँखों में एक पेग का नशा और एक कसक भरी प्यास थी जो शायद वैसे मौसम और माहौल में कोई भी गे या स्ट्रेट लडका महसूस कर सकता था और वैसे माहौल में चूत का बडा से बडा रसिया इतना कामातुर हो चुका होता कि वो गाँड मारने से भी परहेज़ नहीं करता!

मैं वहाँ पेमेंट करके उससे आँखों ही आँखों में इशारा करके बडी कामुकता से अपने रूम पहुँचा और वहाँ पहुँच के सिर्फ़ अपने बेक़ाबू लँड को ही सहलाता रहा! मेरे अंदर बेसब्री थी, पता नहीं साला कुछ करने देगा कि नहीं मगर फ़िर भी ये तो था कि मैं कम से कम उसकी जवानी को अकेले सामने बिठा के निहार तो सकता था! मैने जब चुपचाप खिडकी से नीचे झाँका तो वो नहीं दिखा मगर तभी मेरे दरवाज़े पर नॉक हुआ! मैने धडकते हुये दिल से दरवाज़ा खोला! वो अपनी उसी जैकेट और नीचे ट्रैक के ब्लूइश ग्रे लोअर में खडा था! ठँड के मारे उसकी हालत खराब थी!
'भैयाजी, बडी ठँड है... बहनचोद गाँड फ़ट गयी...'
'हाँ, ठँड तो बहुत है...'
मैने अपने लँड को छुपाने के लिये अपने लोअर के नीचे अँडरवीअर पहन ली थी!
'आओ, वोडका से गर्मी आ जायेगी...'
मैं बेड पर टेक लगा के आधा लेट के बैठ गया और वो बगल पर पडी कुर्सी पर बैठ गया, जहाँ मैने जानबूझ के कुछ अश्लील किताबें रख दी थी! मैने जल्दी जल्दी दो पेग बनाये और एक उसको दे दिया! साले ने गटागट अपना ग्लास खाली कर दिया!

'क्यों गर्मी आयी?' मैने पूछा!
'अभी कहाँ भैया, अभी तो ठँडी ही उतरी है...'
'एक और ले लूँ क्या?' मैने उसको एक और पेग दिया!
वो जब कुर्सी पर बैठा था तो उसकी सुडौल जाँघें फ़ैल गयी थीं और उसके लोअर से बाहर आयी जा रहीं थीं! उसके लँड के पास सलवटें पड गयी थीं और उसके टट्‍टे भी साफ़ पता चलने लगे थे! मेरी नज़र रह रह कर वहीं टिक रही थी! नशे में उसकी आँखें मस्त लगने लगीं थीं!. उसने मुझे अपना जिस्म निहारते हुए देखा! एक बार उसका हाथ नर्वसनेस में अपने आँडूओं पर गया और एक बार इंस्टिंक्टिली अपने लँड पर, मगर उसने कुछ देर में वहाँ से हाथ हटा लिया!

'आओ बेड पर बैठो ना आराम से...' मैने उसको इंवाइट किया!
'ठँड बहुत है भैया, कुछ ओढने का नहीं है...'
'आओ ना, रज़ाई ओढ कर साथ में बैठ जाओ...'
अब वो नशे में था! वो मेरे बगल में आ गया और मैने पैरों पर रज़ाई डाल ली! उसमें से पसीने की खुश्बू आ रही थी, तीखा मर्दाना देसी पसीना!
मैने बातों बातों में उसकी जाँघ पर हाथ रख कर हल्का सा सहलाया और फ़िर हाथ हटा लिया! उसकी जाँघ गर्म और मुलायम थी! कुछ देर में हमें एक दूसरे के बदन की गर्मी मिलने लगी तो रज़ाई कम्फ़र्टेबल हो गयी!
'ये किताबें कैसी हैं?'
'वहीं... लँड चूत वाली...' मैने डायरेक्टली कहा तो वो हल्का सा शरमाया! मगर लौंडा हरामी था!
'हाय... इस मौसम मे दारू के बाद गर्म गर्म चूत मिल जाती तो मज़ा आ जाता... खैर फ़ोटो ही दिखा दो भैया...' मैने एक पोर्न बुक उठा के उसका एक एक पेज उसको गोद में रख कर दिखाने लगा!
'अरे मेरी जान.. क्या आइटम है... साली की बुर देखो...' उसने एक नँगी लडकी की चूत देख के कहा! जब तक मैं दूसरी किताब पर पहुँचा वो कामातुर हो चुका था! मैं जब किताब उठाने के लिये उसके ऊपर से टेबल की तरफ़ झुका और उसकी जाँघ पर हाथ रख कर मज़ा लेने के लिये जैसे ही हाथ रखा तो वो हल्का सा ऊपर की तरफ़ हुआ और मेरा हाथ सीधा उसके लँड पर पडा जो उस समय तक पत्‍थर सा सख्त हो चुका था!

'अरे ये कहाँ थाम रहे हो?' उसने हरामीपने से कहा मगर मैने तब तक हाथ हटा लिया!
'अबे नशे में हाथ सरक गया...' मैने कहा!
'और साला सरक के सही निशाने पर पहुँच गया...'
'साला खडा है क्या?'
'और क्या, अब भी खडा नहीं होगा... तीर की तरह तना हुआ है... माल फ़ेंकने को तैयार...' उसकी बातें गर्म थी! मैने दूसरी किताब भी उसको दिखायी, इस वाली में चुदायी थी!
'बहनचोद, क्या चुदवा रही है साली...'
'इसका लौडा देखो, कितना मोटा है...'

फ़िर वो जब मूतने के लिये गया और वापस आया तो मेरी नज़र उसके खडे लँड पर पडी जो उसकी लोअर को तम्बू की तरह उठाये हुए था! मैं उसको देखता रहा, वो जब फ़िर मेरे बगल में बैठा तो मैं रज़ाई सही करने के बहाने एक बार फ़िर उसके लँड को सहला दिया और इस बार हल्का सा मसल दिया! मेरे ऐसा करने पर इस बार उसके चेहरे पर एक हरामी सी मुस्कुराहट आ गयी और आँखों में चमक!
'क्यों लँड खडा है क्या?'
'और क्या भैया, इतना भरपूर आइटम दिखाओगे तो साला ठनक ही जायेगा ना...'
वो मेरे बगल में था और जब हम एक दूसरे की तरफ़ मुह करके बातें करते तो उसकी गर्म साँसें मेरे चेहरे से टकराती!
'कोई लडकी वगैरह पटायी क्या?' मैने फ़िर पूछा!
'अरे ढाबे पर लडकी कहाँ मिलने वाली है... साले सब लडके होते हैं...'
'हाँ वो तो देखा है मैने...' मैने जवाब दिया!
'यहाँ तो लडकों के साथ ही रहना होता है... आप तो अकेले रहते हो, आप कोई लडकी नहीं लाये कभी?'
'मुझे तो मिलती ही नहीं यार...'

मैने अब रज़ाई के अंदर अपना हाथ आराम से उसकी चिकनी माँसल जाँघ पर रखा तो वो कुछ बोला नहीं!
'तो तुम अकेले सोते हो?'
'कहाँ भैया, आजकल तो एक रज़ाई में तीन लडके सोते हैं...'
मैने अब उसकी जाँघों को सहलाना शुरु किया!
'लडकों के साथ सोने में खतरा नहीं है?'
'कैसा खतरा... हमसे खतरनाक कौन हो सकता है?'
'अच्छा... कैसे?'
'बस लँड खडा हो जाता है कभी कभी... मगर किसी ने कुछ कोशिश की तो साले का छेद बंद कर दूँगा...'
'कैसे?'
'गाँड में लौडा डाल के... और कैसे...'
'मतलब लडको के साथ ही?'
'जब लडके ही मिलते हैं तो क्या करूँ?'
मैने अब अपना हाथ थोडा ऊपर खिसकाया!
'गाँड मार चुके हो क्या?'
'आप को क्या लगता है?'
'मुझे क्या लगेगा...'
'लौडे का साइज़ देख कर समझ नहीं आया?'
'लौडा कहाँ देखा?'
मेरा हाथ अब उसकी जाँघ को, लौडे के बहुत करीब और दोनो जाँघों के बीच के हिस्से की तरफ़ सहलाने लगा!
'ऊपर से दिखा तो होगा ना...'
'ऊपर से आइडिआ कहाँ लगता है?'
'तो क्या अंदर से आइडिआ लगाना चाहते हो?'
मैं अब गर्म हो रहा था और जल्द से जल्द उसकी बाहों में समा जाना चाहता था!
'अंदर से कैसे यार?'
'पजामे में हाथ डाल के और कैसे?'
'तुम बुरा मान जाओगे...'
'इसमें बुरा मानने की क्या बात है? आपको इतनी देर से सहलाने तो दे रहा हूँ...'
मैं थोडा झेंपा... लगता था लडका तैयार है!
'मगर लँड कहाँ सहलाया?'
'उसके पास तो पहुँच रहे हो...'
मैने अब और रास्ता नहीं देखा और अपनी हथेली उसके लँड पर रख दी तो उसका लँड उछला, साला गर्म और सख्त हो गया था! अच्छा मोटा और लम्बा लँड था!
'अआह भैया... सिउउहहआहह... ऐसे क्या मज़ा आयेगा... अंदर हाथ घुसाओ ना...'
'अबे तू तो बडा खिलाडी है...'
मेरे ये कहने पर वो हल्के से हँसा!
'हा हा हा... ये खेल तो अपने आप आ जाता है...'
मैने अब अपना हाथ उसकी लोअर की इलास्टिक पर फ़िराया!
'अंदर डाल के मसल दो ना...' जब उसने कहा तो मैने अपना हाथ उसकी लोअर के ऊपरी हिस्से से अंदर घुसा दिया! अंदर उसका लौडा उफ़ान पर था, मैने अपनी उँगलियों से उसकी नयी नयी झाँटें सहलायी, उनमें अपनी उँगलियों को नचाया तो उसने फ़िर सिसकारी भरी! फ़िर मैने उसके लँड को पकड लिया और उसके सुपाडे पर अपना अँगूठा फ़िराया तो पाया कि वो प्रीकम से भीगा हुआ था! मैने उसके प्रीकम को उसके लँड पर रगड दिया वो अब मेरे क़ाबू में आने लगा था! उसका लँड मेरे हाथ में नाच रहा था, तभी उसका हाथ मेरे लँड की तरफ़ आया!
'अपना भी दिखाइये ना...' कह कर उसने मेरे लँड पर अपना मुलायम और गर्म हाथ रखा तो मेरा लौडा भी मचल गया! मैने उसके कँधे पर सर रख के उसकी गर्दन को हल्के से अपने होंठों से छुआ! वो पसीने के कारण नमकीन सी थी और वहाँ उसके पसीने की खुश्बू भी बहुत तेज़ थी! मैने अब हाथ पूरा उसकी लोअर में घुसा दिया और वैसे ही उसकी पूरी जाँघें सहलाने लगा! बीच में मैं हाथ ऊपर तक लाकर उसके टट्‍टों को थाम के हल्के हल्के दबाता भी था और उसके लँड को पकड के दबा देता था!

वो भी अब मेरे ट्रैक के अंदर हाथ घुसा कर मेरे लँड को सहला रहा था, उसने जब मेरी अँडरवीअर के अंदर उँगलियाँ घुसायी तो मेरी सिसकारी निकल गयी! कुछ देर बाद हमने एक दूसरे को मुड के देखा और फ़िर एक दूसरे से लिपट के लेट गये और अपने लँड को आपस में भिडाने लगे! मैने उसकी एक जाँघ को अपनी जाँघों के बीच फ़ँसा के दबा लिया और उनसे ऐसे रगडने लगा कि मेरा घुटना उसके लँड तक जाने लगा! इस बीच मैने पहली बार उसकी कमर सहलाते हुये उसकी गाँड को सहलाना भी शुरु कर दिया तो वो भी मेरी गाँड सहलाने लगा!

'क्या करवायेगा?' मैने कामातुर होकर उससे पूछा!
'क्या करेंगें?' उसने पूछा!
'चूस लूँ क्या?'
'चूस लो...'

फ़िर हम धीरे धीरे नँगे हुए! उसने अपना लोअर उतार के मेरी ट्रैक और अँडरवीअर भी उतरवा दिये! मैं रज़ाई में नीचे सरका और फ़िर अपने होंठ उसकी झाँटों में लगा दिये तो मेरी नाक उसके पसीने की खुश्बू से मस्त हो गयी! उसने सिसकारी भरी 'सिउउहहह...' मैने अपना एक हाथ ऊपर करके उसका सीना सहलाया! उसके सीने पर कटावदार मसल्स थी, मैं एक एक करके अपने अँगूठे से उसकी चूचियाँ रगडी! वो और मस्त हो गया और दूसरे हाथ को उसकी जाँघों के बीच फ़ँसा के उसके टट्‍टे दबा के सहलाने लगा! और वैसे ही अपनी उँगलियों से उसकी गाँड के छेद के पास भी सहला देता! उसकी गाँड पर अभी बाल नहीं थे! गाँड चिकनी और गर्म थी! मैने उसके भीगे हुये सुपाडे पर अपने होंठ रखे तो उसकी साँस रुक गयी! मैने ज़बान निकाल के एक बार उसके सुपाडे पर फ़िरायी तो उसके प्रीकम का नमकीन टेस्ट महसूस हुआ! मैने अपने होंठों को हल्का सा खोल के उसके सुपाडे को उनसे भींचा, प्यार से पकड के दबाया तो उसकी सिसकारी से माहौल भर गया!
'हाय... इइइससस... उउउहहह... भैया...'
'क्यों, मज़ा आया?' मैने पूछा!
'बहु...त... मगर अभी तो आपने शुरु किया है...'
'हाँ बेटा, अब देखना... आगे आगे कितना मज़ा देता हूँ...'

उसने रज़ाई में हाथ घुसा के मेरा सर अपने दोनो हाथों से पकड लिया और मैने अपने मुह को खोल के उसके सुपाडे को चूसना शुरू कर दिया! मैने अब अपना एक हाथ उसकी गाँड पर आराम से रख के उसको दबा के रगडना शुरु कर दिया और उसके छेद तक अपनी उँगलियाँ प्यार से रगडने लगा! उसकी गाँड हल्के हल्के चुसवाने के मोशन में आने लगी! उसका लँड धीरे धीरे मेरे हलक तक घुसने और निकलने लगा और उसकी गाँड भिंच भिंच के आगे पीछे होने लगी!

अब रज़ाई के अंदर चुसायी की 'चप चप' गूँजने लगी और उसका लँड सधे हुये अँदाज़ में मेरा मुह चोदने लगा! कुछ देर में हमने रज़ाई हटा दी! अब वैसे ही गर्मी हो चुकी थी! उसका गोरा बदन नँगा होकर और ज़्यादा मस्त लग रहा था! मैं दूसरे हाथ से उसकी जाँघ और टट्‍टे सहला रहा था! उसने मेरा सर पकड रखा था! फ़िर उसके धक्‍के तेज़ होने लगे, वो मेरे दाँत हिला हिला के अपने लँड की मार से मेरे मुह को मस्त कर रहा था और साथ में सिसकारियाँ भरे जा रहा था!

फ़िर उसका लँड मेरे मुह में फ़ूलने लगा, और हिचक के दहाडने लगा! उसके धक्‍कों में अग्रेशन बढ गया! उसकी सिसकारी, मोनिंग में बदलने लगीं! वो सिसकरियाँ ले लेकर करहाने लगा!
'अआहहह... हा..ये... अआहहह...' तो मैं समझ गया कि अब किसी भी पल उसका माल झड जायेगा और फ़िर उसका सुपाडा उछला और उसने मेरे सर को अपने हाथ से भरपूर जकड के सिसकारी ली 'हाँ... अआहहह...' और फ़िर उसके लँड से बुलेट की तरह वीर्य की पहली धार सीधे मेरे हलक से टकरायी और उसके बाद सिसकारियों के साथ उसके लँड ने हिचकोले खाना शुरु किया और अपना गर्म गर्म वीर्य मेरे मुह में झाड दिया! जब वो थोडा शांत हुआ तो मैने वैसे ही लेटे लेटे उसका वीर्य हलक के अंदर निगल लिया और फ़िर जब उसके लँड पर ज़बान फ़ेरी तो उसके नमकीन और मर्दाने टेस्ट का अहसास हुआ! मैने उसके झडे हुये लँड को भी खूब चूसा!

उसके बाद वो उठा! अब वो थोडा डिस-इंट्रेस्टेड सा लगा और अपने कपडे पहनने लगा!
'यहीं सो जा ना...' मैने कहा तो वो कोल्डली बोला 'नहीं यार, लौंडे सोचेंगे कहाँ गया?'
'फ़िर आयेगा?'
'देखूँगा...'
'देखना क्या है... आ जाना ना... मज़ा नहीं आया क्या?'
'मज़ा तो ठीक है और भी सब देखना पढता है... चल दरवाज़ा बन्द कर ले, मैं चलता हूँ...'

वो चला तो गया मगर मुझे काफ़ी मस्त कर गया! उसके जाने के बाद मैने उसके नाम की मुठ मारी! अगले कुछ दिन वो मुझसे नज़रें बचा के कतराता रहा तो मैं समझ गया कि लौंडे को शायद शर्म और गिल्ट है इसलिये मैने भी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया! इस टाइप के लौंडे मुझे पहले भी बहुत मिल चुके थे!


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Re: मस्ती ही मस्ती पार्ट

Unread post by sexy » 14 Aug 2015 16:08

मस्ती ही मस्ती पार्ट --०२
भाइयों, आपको पढने के पहले ही वॉर्न कर दूँ कि मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो शायद आप में से कुछ को अच्छी ना लगें! ये केवल एंटरटेनमैंट के लिये लिखी गयी हैं! इस में गाँड की भरपूर चटायी के बारे में, पिशाब से खेलने और उसको पीने के बारे में, इन्सेस्ट, गालियाँ, गेज़ और लडकियों के प्रति गन्दी गन्दी इन्सल्ट्स, फ़ोर्स्ड सैक्स, किन्की सैक्स वगैरह जैसी बातें हैं!इसकी रेटिंग कुछ पार्ट्स में एक्स।एक्स.एक्स. होनी चाहिये! इसमें चुदायी की ओवरडोज़ है! कभी कभी लगेगा, कि सिर्फ़ चुदायी ही जीवन है! जिस किसी को ये बातें अच्छी ना लगें वो कॄप्या आगे ना पढें!
उसके करीब हफ़्ते भर बाद मेरे घर से लैटर आया जिसमें लिखा था कि वहाँ के मोहल्ले के एक भैया अपनी जॉब के इंटरव्यु के लिये आ रहे हैं और मेरे रूम पर 2-3 दिन रुकेंगे! राशिद भैया मुझे बहुत पसंद भी थे इसलिये मैं खुश हो गया! वो मुझसे 7 साल बडे थे और काफ़ी सुंदर और हैंडसम थे! रँग गोरा और कद लम्बा था, चेहरा सैक्सी, बदन गठीला और मस्क्युलर... टाइट कपडों में बडे लुभावने लगते थे! वो डिस्ट्रिक्ट लेवल के बॉलर थे और काफ़ी नॉर्मल से अग्रेसिव मर्द थे! मैने कभी उनके साथ कुछ ट्राई तो नहीं किया था मगर बस वो उनमें से थे जिनको मैं सिर्फ़ देख कर ही नज़रें गर्म कर लेता था! मैं लास्ट उनसे उनकी शादी के वक़्त चार साल पहले मिला था, उसके तुरन्त बाद पता चला कि उनको एक लडका भी हो गया और अब तो शायद उनको दो लडके थे और उनकी बीवी फ़िर प्रैगनेंट थी! वाह क्या मर्द था, साला शादी के बाद चूत का भरपूर इस्तेमाल कर रहा था! वैसे उसकी कसमसाती हुई मज़बूत जवानी से इससे कम की उम्मीद भी नहीं रखनी चाहिये थी!

वो लैटर पढते ही मैं खुश हो गया, उस दिन क्लास में भी बहुत दिल लगा और क्लास के लडके भी बहुत ज़्यादा अच्छे लगे... स्पेशिअली मर्दाना और अक्खड विनोद सिशोदिया, जो एक बडा हरामी जाट लडका था और कभी कभी ही क्लास में दिखता था! साले की भरपूर जवानी उससे संभाले नहीं संभलती थी! उस दिन वो बेइज़ कलर की टाइट सी पैंट में मेरे ही आगे बैठा अपने बगल वाले लडके से गन्दी गन्दी बातें कर रहा था! अचानक टीचर ने उसको खडा किया तो मेरी नज़र उसकी मज़बूत गाँड पर पडी! अचानक उठने के कारण उसकी गाँड पर पैंट की कुछ सलवटें थी, उसके गोल गोल चूतड गदराये और भरे हुये थे! उनके बीच उसकी पैंट की सिलाई सीधी उसके छेद के पास से घुसती हुई उसके आँडूओं के नीचे की तरफ़ जा रही थी! उसने एक हाथ से अपनी बैक पॉकेट सहलायी! उसका हाथ भी मस्क्युलर और बडा था! एक एक उँगली गदरायी हुई थी! जब वो सवाल का जवाब नहीं दे पाया तो टीचर ने उसको खडे रहने के लिये कहा! अब मेरा ध्यान क्लास में कहाँ लगता क्योंकि मुझसे कुछ ही दूर पर विनोद की जवानी खुल के मेरे सामने जो थी! मैने उस दिन उसकी गाँड और पिछली जाँघ की जवानी और कशिश को खूब जी भर के निहारा! फ़ाइनली लैक्चर के बाद सब बाहर आये तो विनोद टीचर को गन्दी गन्दी गालियाँ देता रहा! उस दिन वो मेरे साथ ही कैन्टीन में चाय पीने के लिये बैठ गया, साथ में कुछ और लडके भी आ गये मगर मैं सिर्फ़ विनोद की जवानी ही निहारता रहा क्योंकि वो कभी कभी ही मिलता था!

'यार, ये बहन का लौडा, सर मेरी गाँड मारता रहता है...' विनोद बोला तो कुणाल ने उसका साथ दिया!
'हाँ, लगता है... उसको 'तेरी' पसंद आ गयी है...' बाकी लडके हँसे!
'साला मूड घूम गया ना तो किसी दिन पलट के उसकी गाँड में लौडा दे दूँगा...' सब फ़िर हँसे!
'हाँ, साला जब देखो, गाँड मारता रहता है...' उसके मुह से वैसी बातें बडी सैक्सी लग रहीं थी, साथ में वो कभी कभी अपने आँडूए और लँड भी अड्जस्ट करता जा रहा था! बिल्कुल स्ट्रेट, मादक और अग्रेसिव जाट था! मैं बस मन मसोस कर उसको ही देखता रहा, और कभी कभी कुणाल को... जो था तो हरामी मगर उसमें मासूमियत और चिकनापन भी था! कुणाल विनोद के एरीये में ही कहीं रहता था इसलिये दोनो कुछ फ़्रैंक थे!
'साले ने ज़्यादा परेशान किया तो इसकी बेटी की चूत में लौडा दे दूँगा...'
'इसकी बेटी कहाँ मिलेगी?' मैने पूछा!
'अरे यहीं आगे स्कूल में पढती है... साली बडा कन्टाप माल है, स्कर्ट कमर मटका के जाती है...' मेरा मन और मचल गया! मैं ये सोचने लगा कि अगर विनोद जैसे गबरू मर्द ने अपने शेर जैसे लौडे से सर की नाज़ुक सी बेटी को चोदा तो उसका क्या हाल होगा! मुझे तो विनोद की गाँड उठती और गिरती हुई दिखने लगी!
कुणाल ने अपना एक हाथ विनोद की जाँघ पर रखा और बोला 'अबे, मैं चलता हूँ...'
'ठीक है मादरचोद, मगर ये जाँघ क्यों सहला रहा है साले... लौडा पकडेगा क्या?'
'अबे हट भोसडी के... अभी इतने बुरे दिन नहीं आये हैं...' सब फ़िर हँसने लगे!

मैं उनकी बातों से सिर्फ़ गर्म होता रहा, फ़िर जब लँड खडा हो गया तो सोचा, पिशाब कर लूँ तो शायद लँड थोडा बैठ जाये! मैं कैन्टीन के पीछे की तरफ़ ओपन एअर टॉयलेट के भी पीछे मूतने के लिये चल पडा! वहाँ मैं इसलिये जाता था कि वहाँ सूनसान में कोई होता नहीं था इसलिये मैं अपने लँड को आराम से खोल के उसकी ठनक कम कर सकता था! एक बार तो मैने वहाँ खडे खडे मुठ भी मारी थी मगर उसके बाद हिम्मत नहीं पडी थी! मैने वहाँ पहुँच कर अपनी पैंट से लौडा बाहर निकाला, जो उस समय पूरा मस्त ठनक के खडा था और मूतने के पहले विनोद की जवानी याद करके अपना लँड हल्के हल्के मसलने लगा! बिल्कुल ऐसा लगा कि विनोद मेरे सामने नँगा हो रहा है! मेरे लँड में उसके नाम की गुदगुदी हो रही थी! इतना मज़ा आया कि मेरी तो आँख एक दो बार बन्द सी होने लगी! अभी मज़ा मिलना ही शुरु हुआ ही था कि अचानक कुछ आहट हुई और एक और लडका उधर की तरफ़ आता दिखा!

मैं उसको जानता था, उसका नाम धर्मेन्द्र था और वो इलाहबाद का रहने वाला था जो मेरे साथ ही कोर्स करने वहाँ से आया था! धर्मेन्द्र मुझे देख के मुस्कुराया मगर कुछ पल में उसकी नज़र मेरे लँड पर पडी तो मैने देखा कि उसने कुछ ज़्यादा इंट्रेस्ट लेकर मेरे लँड को देखा! वैसे धर्मेन्द्र उस टाइप का लगता तो नहीं था, काफ़ी हट्‍टा कट्‍टा साँवला सा गदराया हुआ स्ट्रेट लौंडा लगता था जो नयी नयी जवानी में शायद किसी चूत की सील तोडने के सपने देखता होगा मगर शायद मेरे खडे लँड को देख के उसको कुछ अटपटा लगा! उसकी आँखों में एक झिलमिल सा नशा सा दिखा! उसके होंठ हल्की सी प्यास से थर्राये और फ़िर वो मुस्कुराते हुये मेरे कुछ ही दूर पर खडा होकर अपनी ज़िप खोल के जब मूतने लगा तो मुझ से भी ना रहा गया और मेरी नज़र भी उसके लँड पर पडी जो काफ़ी बडा और मोटा था!

उसने अपना लँड कुछ इस स्टाइल से पकडा हुआ था कि मुझे साफ़ दिख रहा था और जब उसने अपना लँड छुपाने की कोशिश नहीं की तो मैने भी उससे अपना लँड नहीं छुपाया! उसका लँड भी खडा सा होने लगा और कुछ देर में भरपूर खडा हो गया! हम एक दूसरे से कुछ बोले नहीं, बस चुपचाप प्यासी सी नज़रों से एक दूसरे का लँड देखते रहे! मस्ती इतनी छा गयी कि मूतने के बाद भी लँड अंदर करने का दिल नहीं कर रहा था! धर्मेन्द्र भी अपना लँड हाथ में लिये मुझे आराम से दिखा रहा था! तभी किसी और की आहट आयी तो हम दोनो ने ही अपने अपने लँड अपनी ज़िप में घुसा के बन्द किये और वहाँ से वापस हो लिये! जब मैं विनोद की तरफ़ जा रहा था तो धर्मेन्द्र मुझे गहरी नज़रों से देखता हुआ वहाँ से गुज़रा! उसकी आँखें मुझे कुछ इशारा कर रहीं थी! बस किसी तरह उसके साथ सैटिंग करनी थी, लगता था धर्मेन्द्र का काम तो हो गया था! एकदम अन-एक्स्पेक्टेड मगर सॉलिड लौंडा!

विनोद अब अकेला था, बाकी जा चुके थे!
'आजा बैठ ना... क्यों, तू जा नहीं रहा है क्या?'
'जाना तो है यार...'
'किस तरफ़ रहता है?' उसने पूछा तो मैने अपना एरीआ बताया!
'मुझे उसी तरफ़ जाना है, चल तुझे बाइक पर छोड दूँ...' उसने जब ऑफ़र दिया तो मैं तैयार हो गया! उसके पास बुलेट थी जो उसकी देसी जवानी को सूट कर रही थी, उसने किक मार के स्टार्ट की और जब टाँगें उठा के उस पर बैठा तो अचानक उसकी पैंट बहुत ज़्यादा टाइट हो गयी और टी-शर्ट भी पीछे से ऐसी उठी कि उसकी अँडरवीअर की इलास्टिक और कमर दिखने लगी! मैं जल्दी से उसके पीछे बैठ गया! मेरी जाँघ एक दो बार उसकी कमर से टच हुई और एक दो बार मैने बातों बातों में उसके कंधे और एक दो बार उसकी जाँघ पर भी हाथ रखा! ये पहला मौका था, जब मुझे वो सब करने को मिल रहा था!

उसने मेरी गली पर असद के ढाबे के सामने ही बाइक रोक दी तो मैने उसको चाय पीने के लिये रोक लिया! वो मेरे रूम पर आ गया!
'तू अकेला रहता है?'
'हाँ...'
'तब तो बढिया है... कभी अपने रूम की चाबी दे दियो यार...'
'क्यों क्या करेगा?' मैने मुस्कुरा के पूछा!
'रंडी लाऊँगा...'
'अच्छा यार, ले लेना चाबी...'
'अबे कभी दारू वारू का प्रोग्राम बना ना... यहाँ तो बढिया सैटिंग है...'
'हाँ यार, कभी भी बना ले...' वो भी एक्साइटेड हो गया!
'वाह यार, मज़ा आ जायेगा...' उस दिन हम थोडा फ़्रैंक हुये!
'चल तुझे किसी दिन अपना एरीआ दिखा दूँ... देख ले, जाटों का मोहल्ला कैसा होता है...'
'ठीक है यार, कभी भी बुला लेना... चल पडूँगा...'

अब तो मुझे विनोद और भी सैक्सी लगने लगा था! मेरे मन में तो कीडा घूमने लगा! अभी ढाबे से एक लडका चाय ले आया! वो नया सा था, मैने उसको पहले नहीं देखा था! कमसिन सा, गुलाबी, गोरा, नाज़ुक सा लौंडा था!

'क्यों, तू नया है क्या?'
'जी भैयाजी...'
'क्या नाम है?'
'विशम्भर...'
'कहाँ का रहने वाला है?'
'बीकानेर का...'
'ला बे, इधर रख दे चाय...' विनोद उससे बोला फ़िर जब वो चला गया तो वो अचानक बोला 'साला बडा चिकना सा था...'
'क्या मतलब यार... कौन चिकना था?' मेरे मन में तो उसकी बात से उमँग जग उठी!
'यही ढाबे वाला... साले के होंठ और कमर देखे थे लौंडिया की तरह थे...'
'अबे तू ये सब क्यों देख रहा था?'
'साले, जवान हूँ... देखने में क्या जाता है... हा हा हा हा...' फ़िर उसने बात पलट दी!

मुझे अँधेरे में उम्मीद की एक किरण दिखी! अब मुझे लगा उससे दोस्ती बढाने में फ़ायदा है! उससे जाते जाते मैने उसके घर जाने का प्रॉमिस किया और उससे भी अपने रूम में आते रहने के लिये कहा! उसके जाने के बाद विशम्भर ग्लास लेने आया तो मैने उसको तबियत से ऊपर से नीचे तक निहारा! वो एक टैरिकॉट की पुरानी सी व्हाइट पैंट पहने था और साथ में एक फ़ुल नैक का स्वेटर!
'क्यों, कब से आया है?'
'मैं यहाँ तो परसों से ही आया हूँ... पहले मालिक के घर पर काम करता था...'
'अच्छा, बढिया है... यहाँ आ जाया कर... बैठ के बातें करेंगे...'
'जी भैयाजी' वो सच में बिल्कुल मिश्री की डली की तरह मीठा और काजू की तरह मसालेदार लौंडा था! मैने उसकी नज़र के सामने ही उसको निहारा और अपने होंठों पर ज़बान फ़ेरी!
'रात में खाना ले आना...'
'कितने बजे?'
'कितने बजे सोता है तू?'
'जी आजकल तो 12 बजे...'
'ठीक है... उसके पहले जब टाइम हो, ले आना...'

जब मैने विशम्भर को भेज के दरवाज़ा बन्द कर रहा था तो सामने से एक बडा मादक लौंडा आता दिखा! वो कुछ नये से अन्दाज़ में इधर उधर देख रहा था और उसके कंधे पर एक बैग टंगा था! यही कोई 17-18 साल का चकाचक पीस था जो एक सुंदर सा मल्टी कलर्ड स्वेटर और ब्राउन कार्गो पहने था! मस्त सा देसी चिकना था जिसके चेहरे पर अभी बाल भी नहीं आये थे और आँखों मदमस्त भूरी थीं! उसने मुझसे गौरव के बारे में पूछा, जो मेरे रूम के ऊपर वाले रूम में सैकँड फ़्लोर पर रहता था! वो लडका चला गया मगर मैने उतनी सी देर में उसके जिस्म के हर कटाव को देख-पढ लिया!

अभी मैं दरवाज़ा बन्द करके लौटा ही था कि फ़िर नॉक हुआ! खोला तो पाया, वही लडका था!
'गौरव तो शायद है नहीं, क्या मैं कुछ देर यहाँ बैठ जाऊँ?' वो जब कमरे में आकर मेरी पलँग पर बैठा तो मैने पाया कि वो उससे कहीं ज़्यादा खूबसूरत था, जितना मुझे पहली नज़र में लगा था! मैने उसको जी भर के निहारा! काफ़ी देर होने पर भी गौरव नहीं आया!
'चिन्ता मत करो, यहीं सो जाना...' मैने उसको आश्‍वासन दिया!
'ये रह कहाँ गया?'
'पता नहीं, मुझे तो कभी कभी मिलता है...' उस नये लडके का नाम निशिकांत शुक्ला था और वो उन्‍नाव से इंजीनीरिंग डिप्लोमा के फ़ॉर्म्स लेने आया था मगर उसको ये नहीं मालूम था कि गौरव तो तीन दिन के लिये अपने कॉलेज के दोस्तों के साथ शिमला गया हुआ था! उसकी मौजूदगी में विशम्भर का आना भी बेकार था सो मैं उसके साथ ढाबे पर चला गया! वहाँ असद मिला तो मैने उससे हाथ मिलाया!
'कहाँ हो यार, तुम तो दिखे ही नहीं...'
'बस ऐसे ही काम में लगा हूँ...' ना उसकी बातों से और ना मेरी बातों से हमारे बीच बने उस नये सम्बन्ध की झलक दिखी!

मैने और निशिकांत ने साथ में खाना खाया! वो खाते हुये भी सुंदर लग रहा था! हमारी टेबल पर विशम्भर खाना ला रहा था! मैने धीरे धीरे निशी से सैक्सी बातें शुरु कर दी थीं और वो भी खुलने लगा था जिससे मुझे उसकी हरामी गहरायी का पता चलने लगा था! लौंडा शातिर था, तभी सामने से एक लडकी जीन्स पहन के निकली तो वो बोला!
'देखो साली की गाँड देखो... साली के छेद में सुपाडा भिडा देंगे तो साँस रुक जायेगी!'
'हाँ यार, बढिया माल है...'
'हाँ साली गाँड उठा उठा के चूत देगी... रात भर में ही साली को लोड कर देंगे...'
वो खूब मस्ती से सैक्सी बातें कर रहा था! फ़िर जब हम रूम पर आये तो हमने सिगरेट पी!
'यार लगता है, आज तुमको यहीं सोना पडेगा...'
'अब क्या करें यार... तुम्हें दिक्‍कत तो नहीं होगी?'
'नहीं साथ में सो जायेंगे...' मेरे ये कहने पर वो चँचलता से मुस्कुराया!
'ध्यान से सोना पडेगा...'
'जाडे में सही रहता है...'
'हाँ, मगर गर्मी चढती है तो डेंजर हो जाता है...'
'तो क्या हुआ?'
'अभी तो कुछ नहीं हुआ, मगर वॉर्निंग दे रहा हूँ...'
'बेटा डरायेगा तो सोयेगा कहाँ? बाहर सडक पर?' मैने हँसते हुए कहा!
'हाँ यार... सोना भी है... मजबूरी है..'

तेज़ ठँड थी! उसने बाथरूम में जाकर कपडे चेंज किये और ठिठुरते हुये शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहन के आया और रज़ाई में घुस गया!
'यार, गाँड फ़ाडू सर्दी है आज...' मैने बाथरूम में चेंज करने गया और देखा कि उसकी कार्गो दरवाज़े के पीछे खूंटी पर टंगी है! उसके अंदर उसकी चड्‍डी थी, ब्लैक फ़्रैंची... मुझसे रहा ना गया और मैने उसकी चड्‍डी हाथ में लेकर उसमें मुह घुसा के उसकी जवानी की खुश्बू सूंघी और मस्त हो गया! लौंडों की चड्‍डियाँ सूंघना मेरा पुराना शौक़ है! शायद उसका लँड खडा भी हुआ था क्योंकि उसकी चड्‍डी पर एक दो हल्के सफ़ेद धब्बे भी थे! मैने उनको ज़बान से चाटा और फ़िर अपनी शॉर्ट्स और टी-शर्ट पहन के बाहर आ गया और सर्दी का ड्रामा करते हुए जब रज़ाई में घुसा जो उसकी जवानी की गर्मी से पहले ही गर्म हो चुकी थी! कुछ देर में हम दोनो ही गर्म हो गये और हमने रूम की लाइट ऑफ़ कर दी मगर फ़िर भी बाहर से काफ़ी लाइट आ रही थी!

कुछ देर तो हम सीधे लेटे रहे, फ़िर जब एक दूसरे की तरफ़ करवट ली तो एक दूसरे की साँसें एक दूसरे के चेहरे को छूने लगीं! उसकी साँस में मस्त खुश्बू थी, देसी जवानी की! वो मुझे बेक़ाबू कर रहा था! हमारे पैर भी आपस में टच कर रहे थे! निशिकांत का जिस्म गदराया और गर्म था! अभी मैं सम्भल भी नहीं पाया था कि उसने एक करवट ली और अपनी एक जाँघ मेरी कमर पर चढा के अपना एक हाथ मेरे पेट के अक्रॉस रख दिया! मुझे उस शाम पहली बार उसकी ताक़त का आभास हुआ! वो मेरे ऊपर अपना वज़न दिये हुए था! मैने उसको छेडा नहीं और उसकी उस पकड का मज़ा लेता रहा! मैं चित्त लेता था और वो करवट से! उसकी जाँघ मेरे लँड से कुछ ही दूर थी, मेरा लँड खडा होने की कगार पर था! मैं भी चुपचाप लेटा सोने का नाटक करता रहा! उस करवट में उसका मुह भी मेरी गर्दन पर साइड से बहुत नज़दीक आ गया था जिस से उसकी गर्म साँस मेरी गरदन से टकरा रही थी!

कुछ देर बाद निशिकांत ने अपना पैर मेरे ऊपर कुछ और चढाया! अब उसकी जाँघ सीधे मेरे लँड पर आ गयी और अब मैं लँड के ठनकने को नहीं रोक पाया! मैने सोचा सोने का ड्रामा करता रहता हूँ, अगर वो उठ के मेरे लँड को खडा पायेगा तो खुद ही पैर हटा लेगा! मगर मुझे तो अब नींद आ ही नहीं रही थी! अभी मैं कुछ समझ ही पाता कि अचानक निशी का पैर हिला और मेरे लँड पर उसकी जाँघ हल्के हल्के रगडी! मैने अभी सोचा वो नींद में है! मेरा लँड अब हुल्लाड मार रहा था! इसी बीच उसका हाथ मेरे पेट से नीचे की तरफ़ सरका! उसकी जाँघ हल्के से मेरे लँड से अलग हुई और देखते देखते निशिकांत की हथेली मेरे खडे हुये लँड के ऊपर रगडने लगी! जब उसने अगले कुछ पल में मेरे लँड को अपनी मुठ्‍ठी में पकड के हल्का सा दबाया तो मेरी समझ में आया कि वो एक्चुअली जागा हुआ है! क्योंकि तब मुझे अपनी कमर पर उसके लँड की गर्मी और सख्ती का भी आभास हुआ! उसने अब अपने लँड को हल्के हल्के धक्‍कों से मेरी कमर पर रगडना शुरू कर दिया! मैने इस बार अपना हाथ नीचे किया और पहली बार उसके लँड की सख्ती को अपनी हथेली की उलटी तरफ़ महसूस किया और देखते देखते मैने उसके लँड को थाम लिया! उसका लँड जवानी के जोश में हुल्लाड मार रहा था! ज़्यादा मोटा नहीं था मगर सख्त और लम्बा था! मैने कुछ उँगलियों से उसको पकड के नापा और उसके सुपाडे को अपनी उँगली और अँगूठे से दबाया! कुछ देर एक दूसरे का लँड सहलाने के बाद बिना कुछ कहे हम एक दूसरे की तरफ़ पलटे और एक दूसरे से चिपक के भिड गये!

अब माहौल गर्म था! हमने कुछ बात नहीं की मगर मैने सीधा अपने गालों से उसके चिकने गालों को सहलाया, और फ़िर जब मैने अपने होंठ उसके होंठ पर रख कर उनको सहलाया तो उसने मुह खोल दिया और हम एक दूसरे के होंठों को चूम कर चूसने लगे और हमारी ज़बान एक दूसरे से गुँथने लगीं! वो लपक लपक के मेरे होंठ चुस रहा था और भूखे शेर की तरह अपने मुह को मेरे मुह पर दबा रहा था! जब उसने अपना हाथ मेरी गाँड पर रख कर मेरे छेद के पास अपनी उँगलियाँ दबायी तो मैने अपना एक पैर उसके ऊपर चढा के अपनी गाँड उसके लिये सही से खोल दी!

मैने उसके लँड को उसकी शॉर्ट्स के निचले हिस्से से बाहर करके उसको थाम के दबाना शुरु कर दिया! उसने मेरी शॉर्ट्स थोडा नीचे खिसका दी और मेरी गाँड को अपने हाथों से नोचने लगा और मेरे छेद को अपनी उँगलियों से कुरेदने लगा! मेरा छेद तो फ़ौरन खुलने लगा! अब मैं नीचे हुआ और अपना सर उसकी जाँघों के बीच रख दिया! उसने मेरे सर को एक बार कस के जकड लिया! वहाँ उसके पसीने और बदन की मादक खुश्बू थी! मैने उसकी जाँघ पर किस किया और फ़िर ऊपर होकर सीधा उसके सुपाडे को मुह में ले लिया! उसका सुपाडा अपने आप खुल गया और वो मेरे मुह को चोदने लगा! इस बीच मैने उसकी शॉर्ट्स सरका के उतार दी और फ़िर खुद भी नँगा हो गया! फ़िर वो मेरी छाती पर चढ गया और मुझसे अपना लँड चुसवाने लगा! मैने वैसा करने में उसकी गाँड की दोनो फ़ाँको को पकड के दबाना शुरु कर दिया! फ़िर वो पलट के बैठ गया, अब उसकी गाँड मेरे मुह की तरफ़ थी! उसने उसी पोज़िशन में अपना लँड अड्जस्ट करके मेरे मुह में डाला और मेरे ऊपर झुक गया! कुछ देर में मुझे अपने सुपाडे पर जब उसके होंठ महसूस हुए तो मेरी गाँड भी उठने लगी और मैं उसके गर्म मुह का मज़ा लेने लगा! उसने अपने हाथों को मेरे चूतड के नीचे फ़ँसा के मेरी गाँड दबाना शुरू कर दी! फ़िर उसने मुझे पलट दिया और जब पहली बार मेरी गाँड को किस किया तो मैं मचल गया और मेरी गाँड बेतहाशा कुलबुला गयी!

उसने मेरी गाँड को फ़ैला रखा था और फ़िर उसने आराम से मेरी गाँड की फ़ाँकों के बीच की दरार में अपना मुह घुसा दिया और साथ में एक उँगली को मेरे छेद पर दबाने लगा! अब वो कभी मेरे छेद को किस करता कभी उसमें उँगली करता! उसकी उँगली धीरे धीरे मेरे छेद में घुसने लगी!
'तेल है?' उसने पहली बार कुछ कहा!
'हाँ सामने टेबल से ले ले...' उसने बस एक पैर नीचे उतार के टेबल से चमेली के तेल की बॉटल उठा ली! फ़िर तो उसकी उँगली सटासट मेरे छेद में घुसने लगी!
'चढ जाऊँ ऊपर?' वो कुछ देर बाद फ़िर बोला!
'हाँ चढ जा ना...' मैने कहा! उसने अपने लँड पर तेल लगाया और जब मैने उसको देखा तो उसका चिकना और गोरा शरीर दमक रहा था! उसकी छाती के और बाज़ुओं के कटाव साफ़ दिख रहे थे! फ़िर उसका सुपाडा सीधा मेरे छेद पर आकर टिका तो मैने कसमसा कर सिसकारी भरते हुए अपने छेद और गाँड को भींच लिया! उसने अपने लँड को हाथ में लेकर मेरी दरार पर एक दो बार दबा दबा के पूरा रगडा! वो कमर से शुरु होकर सीधा मेरे आँडूओं की जड तक अपना लँड रगडता! मेरी गाँड अपने आप ही मस्त होकर उचक जाती और जाँघें फ़ैल जाती! उसने रुक कर मेरी जाँघ का पिछला हिस्सा, चूतड और कमर रगड के दबाये!
'अआहहहह... नि...शी... अआहहह... सी.. उउउहहह...' मैं सिर्फ़ सिसकारी भरता!

उसने फ़िर अपने उलटे हाथ से अपने लँड को पकड के मेरे छेद पर लगाया और दूसरे हाथ की एक उँगली और अँगूठे से मेरे छेद को फ़ैलाया और जब दबाव दिया तो पहले से ही मस्त हो चुकी मेरी गाँड कुलबुला गयी और उसका सुपाडा मेरे छेद में समा गया! इस बार उसने भी मस्ती से भर के सिसकारी भरी!
'अआहहह... सु...उहहह... सु..हहह...' और अपने लँड पर ज़ोर बढा कर उसको धीरे धीरे करके तब तक दबाता रहा जब तक वो पूरा का पूरा मेरी गाँड के अंदर नहीं घुस गया! फ़िर उसने अपने दोनो हाथों से मेरे कंधे पकड लिये और अपने गालों को पीछे से मेरे गालों के बगल में लाकर चिपकाता रहा और हल्के हल्के धक्‍के देकर मेरी गाँड चोदना शुरु कर दी! उसके हर धक्‍के में अच्छी देसी ताक़त थी! मेरी गाँड तुरन्त भरपूर ठरक में आ गयी! मैं भी उससे गाँड उठा उठा के चुदवाने लगा! उससे धक्‍कों में इतनी ताक़त थी कि कुछ देर में कमरे में चुदायी की चपाचप चप चपाचप गूँजने लगी और साथ में हम दोनो की सिसकारियाँ...

वो जब थक जाता तो वैसे ही गाँड में लँड डाले डाले ही मेरे ऊपर पस्त होकर लेट जाता! वैसे ही लेटने में उसने कहा!
'मज़ा आ रहा है ना?'
'हाँ यार बहुत...'
'देख, कैसे किस्मत से मिल गये...'
'हाँ वो तो है...'
'ओए यार, किसी से ये सब बताना नहीं... पता चले कि तू गौरव से कह दे... साला पूरे में फ़ैला देगा... ये सब मैं बस चुपचाप करता हूँ...'
'कहूँगा क्यों यार... मैं भी चुपचाप करता हूँ और वैसे भी गौरव से ज़्यादा दोस्ती नहीं है...'

सुस्ताने के बाद उसने फ़िर मेरी गाँड मारना शुरु कर दिया!
'साली सारी थकान मिट गयी... थकान मिटाने का बेस्ट तरीका है...'
'हाँ, पूरी एक्सरसाइज़ हो जाती है...'
'चल राजा, थोडी गाँड ऊपर उठा... कुतिया की तरह...' मैने उसके ये कहने पर अपने घुटने मोड के गाँड पूरी ऊपर उठा दी! उसने फ़िर अपने एक हाथ से चप चप एक दो बार मेरी गाँड पर अपनी हथेली मारी!
'वैसे तेरी चिकनी है...'
'थैंक्स यार...' उसके बाद वो मेरी गाँड के पीछे घुटनो के बल बैठा और फ़िर लँड मेरी गाँड के अंदर बाहर करने लगा! उस रात उसने काफ़ी देर चोद चोद के मेरी गाँड को मस्त कर दिया! फ़िर वैसे ही चिपक के मेरे साथ नँगा सो गया! जब सुबह मेरी आँख खुली तो तो वो बाथरूम में नहा रहा था! उस सुबह हमने पिछली रात की कोई बात नहीं की, बस एक दो बार हसरत भरी नज़रों से एक दूसरे को देखा!

उस दिन हम साथ ही निकले! मैने उसको बस पकडवा दी और लौटने का टाइम फ़िक्स कर लिया और खुद अपनी क्लासेज़ के लिये चला गया! उस दिन कॉलेज के गेट पर घुसते ही धर्मेन्द्र मिल गया! उस दिन उसने जब मुस्कुरा के मुझसे हाथ मिलाया तो उसकी पकड और उसकी नज़रों में जानी पहचानी ठरक थी! इन्फ़ैक्ट वो अब मुझे भी बहुत ज़्यादा सैक्सी लग रहा था! उस दिन से धर्मेन्द्र और मैं भी ठरक के कारण क्लोज़ आने लगे थे! उसको देखते ही मेरा मन तो कर रहा था कि उसको नँगा करके उसके सामने नँगा हो जाऊँ मगर कॉलेज में बना के रखनी पडती है! बातों बातों में पता चला कि धर्मेन्द्र को उस दिन 11 बजे स्पोर्ट्स प्रैक्टिस के लिये जाना था! वो कॉलेज की वॉलीबॉल टीम में खेलता था! मैने फ़िर उसके मज़बूत हाथ देखे जो वॉलीबॉल खेल कर मस्त गदरा गये थे! बीच बीच में मुझे निशिकांत के साथ गुज़ारी हुई रात भी याद आती रही!

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Re: मस्ती ही मस्ती पार्ट

Unread post by sexy » 14 Aug 2015 16:09

मस्ती ही मस्ती पार्ट --०३

भाइयों, आपको पढने के पहले ही वॉर्न कर दूँ कि मेरी इस कहानी में भी बहुत सी ऐसी चीज़ें हैं जो शायद आप में से कुछ को अच्छी ना लगें! ये केवल एंटरटेनमैंट के लिये लिखी गयी हैं! इस में गाँड की भरपूर चटायी के बारे में, पिशाब से खेलने और उसको पीने के बारे में, इन्सेस्ट, गालियाँ, गेज़ और लडकियों के प्रति गन्दी गन्दी इन्सल्ट्स, फ़ोर्स्ड सैक्स, किन्की सैक्स वगैरह जैसी बातें हैं!इसकी रेटिंग कुछ पार्ट्स में एक्स।एक्स.एक्स. होनी चाहिये! इसमें चुदायी की ओवरडोज़ है! कभी कभी लगेगा, कि सिर्फ़ चुदायी ही जीवन है! जिस किसी को ये बातें अच्छी ना लगें वो कॄप्या आगे ना पढें!

उस दिन विनोद थोडा दूर बैठा था मगर फ़िर भी मैं उसको देखता रहा! इन्फ़ैक्ट मेरा बस चलता तो मैं क्लास के हर लडके से गाँड मरवा लेता मगर मजबूरी थी! उस दिन क्लास के बाद कैन्टीन में विनोद फ़िर मिला वो अब मुझसे काफ़ी फ़्रैंक हो चुका था, मुझे बार बार उसकी विशम्भर के बारे में कही हुई बात याद आती रही और मैं अन्दाज़ लगाता रहा कि क्या वो सीरिअस था या बस ऐसे लडकों वाला मज़ाक किया था! असल में स्कूल - कॉलेज में हरामी लडकों की बातों से उनकी सैक्शुएलिटी का अन्दाज़ लगाना बहुत मुश्किल हो जाता है!

कुछ देर में कुणाल भी आ गया और उसके साथ एक और क्लासमेट था! बातें करते करते विनोद बोला
"बहनचोद, अब चलता हूँ... बहुत थक गया यार..."
"ऐसा क्या किया साले, जो थक गया..."
"बहनचोद रात में तीन बार मुठ मारी यार... बहन का लौडा, मेरा लँड मुरझा ही नहीं रहा था..."
"अपने घर वालों से कह दे, तेरी शादी करवा दें..." उस दिन फ़िर विनोद ने गे बात कही!
"शादी क्यों कर लूँ साले... तू चिकना है ना, चल तेरी गाँड मार दूँ..."
"बेटा मेरी गाँड में घुसने की ताक़त नहीं होगी तेरे लँड में..." कुणाल ने कहा!
"बेटा ताक़त तो एक बार में दिखा दूँगा... साले, सुबह तक फ़ाड के रख दूँगा..."
"रहने दे गाँडू, जा कोई लौंडिया पटा ले..."
"लौंडिया ही तो नहीं मिलती है साले... तभी तो तुझे डार्लिंग बनने को कह रहा हूँ..."
"कहा ना, मेरी नहीं ले पायेगा..."
"बेटा दे तो एक बार..."
"साले, जा इसकी ले ले..."
"अबे रहने दे, मुझे क्यों इस में शामिल कर रहे हो..." कुणाल ने मेरी तरफ़ इशारा करते हुये कहा तो मैने नाटक में कहा!
"देखा, साला डर गया..."
"डर वर तो एक बार में निकल जायेगा..." विनोद बोला!
"रहने दे, तू इसकी ही ले ले..." मैने कुणाल की तरफ़ इशारा करते हुये कहा!
"हाय... चिकने... बात करने में ही फ़ट गयी तेरी?" कुणाल बोला!
"हाँ साला चिकना है... चिकने डर जाते हैं..." विनोद ने कहा!
"हा हा हा हा हा..."

कुछ भी हो, मुझे विनोद का आइडिआ लगने लगा था! मैं उस दिन धर्मेन्द्र को मिस कर रहा था! फ़िर कुणाल और विनोद ने पास के कम्युनिटी सेन्टर पर जाकर बीअर पीने का प्रोग्राम बनाया तो मैं सिर्फ़ इसलिये तैयार हो गया कि मैं उन दोनो को नशे में देखना चाहता था! फ़्रैंड्स कॉलोनी का कम्युनिटी सेन्टर काफ़ी भीड भाड वाला है, मगर वहाँ बहुत सी जगहें ऐसी हैं जहाँ चुपचाप अँधेरे में बैठा जा सकता है! हमारे कॉलेज के बहुत लडके वहीं जाते थे! वहाँ जामिया के बहुत लौंडे घूमते रहते थे, सब एक से एक करारे और जवान... टाइट पैंट्स और जीन्स पहने, वहाँ लडकियाँ देखते थे और अपने लँड मसलते थे!

हमने बीअर ली और एक कोने में चुपचाप बैठ गये! वो ऐसी जगह थी जहाँ से हम सब देख सकते थे, पर हमें कोई नहीं! एक बीअर के बाद विनोद बहकने लगा! मैने उतनी देर में कुछ ही घूँट पिये मगर कुणाल भी काफ़ी गटक गया! तभी पास से एक लडकी गुज़री तो विनोद ने मेरे सामने ही अपना लँड पकड के मसल डाला और बोला
"हाय... अब चढने के बाद किसी पर 'चढने' का दिल करता है यार... लौडा अपने आप फ़नफ़नाने लगता है..."
"क्यों, 'तेरा' खडा हो गया क्या?" मुझसे ना रहा गया और मैने पूछ ही लिया!
"'इसका' तो साला, किसी को भी देख के खडा हो जाता है... इसके सामने झुकना मत, वरना तेरी गाँड देख के भी खडा कर लेगा..." कुणाल बोला!
"मेरी देख के क्या करेगा यार..." मैने कहा!
"बेटा अगर करने पर आऊँ तो देख लियो... फ़िर हिलने नहीं दूँगा और टट्‍टे तक तेरी गाँड में डाल दूँगा..." इस पर विनोद बोला! कुणाल हँसा... मुझे कोई जवाब नहीं सूझा!

मगर मैं गर्म तो हो ही गया! अब मेरी गाँड विनोद के लँड के लिये कुलबुलाने लगी!
"अबे मैं होमो नहीं हूँ..." मैने कहा!
"होमो तो हम बना देते हैं बेटा... जब करने पर आते हैं..."
"तू इसकी ही मार..." मैने कुणाल की तरफ़ इशारा करके कहा! अब ना जाने क्यों मुझे लगने लगा था कि विनोद और कुणाल मिलकर मुझे फ़ँसाने की कोशिश कर रहे थे!
"किसी दिन अपने रूम में बुला तो दिखा दूँगा" विनोद बोला!
"तू अकेला रहता है क्या?" कुणाल ने पूछा!
"हाँ" मैने जवाब दिया!
"तो इससे बच के रहियो, साला बडा हरामी है..."
"रहने दे यार, इतना आसान नहीं है..." अभी मैने कहा ही था कि सामने से धर्मेन्द्र आता दिखा! उसने सिगरेट जला रखी थी! उसको देखते ही मैं मस्त हो गया!

"ओए, ये कहाँ से आ गया?" कुणाल बोला और उतनी देर में विनोद ने धर्मेन्द्र को आवाज़ लगा दी! धर्मेन्द्र का चेहरा भी मुझे देख के खिल गया, वो भी हमारे साथ बीअर पीने को तैयार हो गया! अब तो मैं मस्त हो चुका था! कुछ देर में धर्मेन्द्र को भी चढ गयी! फ़िर वहाँ से जाने की बारी आयी तो कुणाल बोला!
"अबे मैं तो चलता हूँ... तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?"
कुणाल के जाने के बाद विनोद मुझे और धर्मेन्द्र को अपनी बाइक पर छोडने के लिये तैयार हो गया, मगर ट्रिपल राइडिंग के कारण वो बोला कि गलियों से चलेगा! विनोद के गाडी स्टार्ट की और धर्मेन्द्र उसके पीछे बैठ गया और मैं उसके पीछे! पहली बार धर्मेन्द्र और मेरे बदन आपस में टच हुये तो बदन में एक सनसनी दौड गयी! मेरी जाँघें, धर्मेन्द्र की जाँघों से बिल्कुल चिपकी हुई थी! थोडा आगे बढे तो उसने अपने दोनो हाथ मेरी दोनो जाँघों पर रख दिये! उसकी हथेलियों की गर्मी से मेरा लँड तुरन्त खडा हो गया, जिसको मैं बहुत कोशिश करके उसकी कमर से दूर रखे हुये था! फ़िर धर्मेन्द्र ने कुछ पलट के मुझसे कुछ पूछा जो मैं बाइक की आवाज़ के कारण सुन नहीं पाया! इस बार उसने अपना मुह मेरे कान के पास लाकर जब मेरे कान के पास बोला तो मेरे चेहरे पर उसकी गर्म साँस टकरायी और तभी बाइक एक गढ्‍ढे से गुज़री तो उसकी जर्क से उसके होंठ ऑल्मोस्ट मेरे होंठों से छू गये! जर्क से बचने के लिये उसने मेरी जाँघ को भी दबा के पकड लिया!

मैं श्योर था, धर्मेन्द्र मेरे साथ कुछ करने में ज़रुर इंट्रेस्टेड है! बैठने बैठने में मैने इस बात का ध्यान नहीं दिया कि मेरा लँड अब उसकी कमर से चिपक गया था! मगर उसने इस बात पर ज़रा भी ध्यान नहीं दिया हुआ था! शायद उसको मज़ा आ रहा था! फ़िर मेरा एरीआ आ गया, मगर फ़िर भी वहाँ से लगभग 15 मिनिट की वॉक तो थी ही!
"यार, यहीं उतर जा... मेरा सर घूम रहा है... यहाँ से चले जाना... मैं जल्दी घर पहुँचना चाहता हूँ..." साला विनोद बोला!
"चल कोई बात नहीं..." मगर जब उतरा तो धर्मेन्द्र भी उतर गया!
"मैं भी उतर लेता हूँ, यहीं से चला जाऊँगा..." उसने कहा तो विनोद ने नशे के मारे ज़्यादा ध्यान नहीं दिया! उसके जाने के बाद मैं और धर्मेन्द्र साथ चल पडे! सडक पर अँधेरा था और ज़्यादा लोग नहीं थे! मैं उसके साथ एक अँधेरे कच्चे रास्ते से चला, जो शॉर्ट-कट भी था और मस्त भी! कुछ दूर पर ही धर्मेन्द्र ने मेरा हाथ पकड लिया!
"यार, अँधेरा बहुत है..."
"सही है यार... हाथ पकड के चलते हैं दोनो भाई..." मैने उसकी उँगलियों में उँगलियाँ फ़ँसा के उसकी हथेली से अपनी हथेली चिपका के उसका हाथ पकड लिया! कुछ देर के बाद वो मेरी हथेली पर अपनी उँगलियों से सहलाने लगा तो मैने भी अपनी उँगलियों से उसका हाथ और हथेली दबाना और सहलाना शुरु कर दिया!
"तू अकेला रहता है?"
"हाँ..."
"साथ चलूँ क्या? थोडी देर बातें करेंगे..."
"चल, मगर तुझे देर नहीं हो जायेगी?" मेरा दिल अब धडक रहा था! वो काफ़ी मस्त देसी आइटम था और लगातार मेरा हाथ दबाये और सहलाये जा रहा था! उसने बीअर के साथ साथ मुझे अपनी जवानी का नशा भी चढा दिया था!
"लेट तो हो गया है... थोडी देर में चला जाऊँगा..."
"चल, साथ बैठेंगे... मज़ा आयेगा..." मैने कहा!
"हाँ, थोडा नशे का मज़ा लेंगे..."

अब हम बिन्दास एक दूसरे का हाथ सहला रहे थे! थोडा आगे जाने पर उसने पहली बार मेरी कमर में हाथ डाल दिया और मुझे अपने करीब पकड के चलने लगा! उसने मेरी कमर को सिर्फ़ पकडा नहीं था बल्कि उसको हल्के हल्के सहलाना भी शुरु कर दिया था! शायद वो मेरा इरादा और रज़ामन्दी नाप रहा था! मैने भी बदले में उसके कंधे पर हाथ रख दिया! उसके कंधे अच्छे गदराये और मस्क्युलर थे! मैने उसकी बाज़ू और एक कंधा सहलाना और दबाना शुरु कर दिया!
"और कोई तो नहीं होता तेरे रूम पे?"
"नहीं यार..." उसका हाथ थोडा नीचे मेरी गाँड के पास सरका! वो बहुत फ़ूँक फ़ूँक के कदम रख रहा था!

उसने चुपचाप मेरे चूतडों की गोलायी को अपनी उँगलियों से तराशा! मुझे उसका हर टच मदहोश कर रहा था! थोडा बीअर का नशा भी था, थोडी मेरी ठरक और थोडी उसकी कशिश का! फ़िर उसने मेरी पीछे की पॉकेट पर हथेली लगायी!
"क्या कर रहा है?" मैने कहा!
"डर मत, पॉकेट नहीं मारूँगा..."
"वैसे भी पर्स में कुछ नहीं है..."
"तुझे सिर्फ़ पॉकेट मारे जाने का डर रहता है क्या?"
"हाँ..."
"उसके अलावा चाहे कुछ मार ली जाये?"
"उसके अलावा है ही क्या?"
"बहुत कुछ..." उसने मेरी एक फ़ाँक को हल्के से दबाया!
"उसकी चिन्ता नहीं है..."
"सही है... तब तो हमारी दोस्ती लम्बी चलेगी..."
"हाँ" कहकर मैने इस बार उसकी कमर में हाथ दे दिया! अब मेरी गली आने लगी थी! हम वहाँ तक पहुँचते पहुँचते काफ़ी ठरक चुके थे!
"ओह शिट यार... आज तो मेरे रूम पर एक गेस्ट आने वाला है..." और तब मुझे याद आया!
"क्या यार... क्या बात करता है... तूने तो कहा था कि..."
"यार बिल्कुल दिमाग से उतर गया यार... मेरे पडौसी..." मैने उसको निशिकांत के बारे में वो सब बताया जो मैं बता सकता था! धर्मेन्द्र का तो जैसे सारा मूड ही चौपट हो गया! फ़िर भी एक उम्मीद थी, शायद निशी अभी वापस ना आया हो!

मूड तो मेरा भी खराब हो गया कि एक नया लौंडा इतनी नज़दीक आने के बाद हाथ से निकल ना जाये! मैने उसकी गाँड और उसने मेरी गाँड अब लगभग दबाना शुरु कर दिया था! हम दोनो ही डेस्परेट हो चुके थे!
"यार के.एल.पी.डी. हो गयी यार..." धर्मेन्द्र ने जैसे अपना इरादा साफ़ कर दिया!
मैने कहा "एक जगह है..."
"कहाँ?"
"सीदियों पर..."
"नहीं यार, वहाँ कोई देख सकता है..." वैसे वो सही कह रहा था!
"फ़िर किसी दिन का रख लेते हैं..."
"अब तो रखना ही पडेगा... आज मुठ मार लूँगा..."
"आ साइड में आजा... मुठ तो मार ही दूँ तेरी..." ये वो अनकही बातें थी जो अब हम एक दूसरे से कह रहे थे!
"ले पकड के देख ले... मगर यहाँ सेफ़ है?" उसने कहा!
"किसको पता चलेगा यार?"
"लोग बडे हरामी होते हैं अँधेरे होने में दो लडकों को देख के समझ जायेंगे..." मैने अब अपना हाथ उसकी गाँड से हटा के आगे उसकी ज़िप पर रखा! अंदर उसका लँड ठनक के हुलाड मार रहा था! मैने उसको कुछ बार दबाया!
"वैसे भी साला इतनी देर से खडा है... चड्‍डी तो भीग ही चुकी है... चल आजा..."

मेरी गली से थोडी दूर एक छोटा सा मैदान था, जहाँ शादी वगैरह के टैंट लगते थे! एक दिन पहले ही किसी की शादी हुई थी जिसकी टेबल्स वगैरह पीछे पडी थी! उनके पीछे बॉउंड्री वॉल थी और उससे पूरी आड हो गयी थी! वहाँ लोग पिशाब भी करते थे मैने उसको वो जगह दिखायी जहाँ उस समय अँधेरा था!
"चल पिशाब करने के बहाने वहाँ चलते हैं... पहले मैं जाता हूँ, पीछे से तू आजा..." मैने धर्मेन्द्र से कहा!
"चल तू जा.."
मैं नर्वसनेस और ठरक से विभोर होकर वहाँ गया! उस जगह से ही पिशाब की बदबू आ रही थी मगर मुझे उस समय सब अच्छा लग रहा था! कुछ ही देर में धर्मेन्द्र आ गया तो मैं उससे लिपट गया मगर वो बोला "आज बस मुठ मार दे, फ़िर किसी दिन सही से लिपट के मज़ा करेंगे..." मैने उसके पैरों के बीच अपना हाथ फ़ँसा दिया और सहलाने लगा मगर उसने टाइम खराब ना करते हुये तुरन्त अपनी ज़िप खोल के अपना मोटा काला नाग खोल दिया तो मैने प्यार से उसको पकड लिया और अपनी मुठ्‍ठी से हल्के हल्के दबाने लगा, हम दोनो सिसकारियाँ भरने लगे!

मैं उसके बगल में उसकी कमर से अपना लँड भिडा के खडा था और एक तरह से उसकी कमर चोद रहा था और साथ में उसके लँड को मसल रहा था!
"उस दिन देखा था ना तूने?"
"हाँ..."
"पसन्द आया मेरा?"
"हाँ बहुत" उसने एक हाथ मेरी कमर में फ़ँसा के मेरी गाँड के छेद और फ़ाँकों को दबाना शुरु कर दिया! उसके हाथ में लँड की ताक़त थी, वो अपनी उँगली कसमसा कसमसा के मेरी दरार में फ़ँसा रहा था! मेरा छेद खुल चुका था, मेरे अंदर चुदने की चपास जग चुकी थी!
"राजा, तेरी गाँड मारूँगा..."
"हाँ राजा मार लेना" उसके बोलने का अन्दाज़ बिल्कुल देसी यू.पी. वाला था!
"तुझे डार्लिंग बना लूँगा..."
"हाँ बना ले ना मुझे डार्लिंग..."
"यही लौडा तेरी गाँड में घपाघप अंदर बाहर दूँगा राजा... पूरा चैन दे दूँगा तेरी गाँड को..." उसका लँड अब पूरे शबाब में आकर दहक रहा था! मेरी हथेली उसकी गर्मी से जलने लगी थी! उसका सुपाडा प्रीकम से भीगा हुआ था! मैं कभी उसको पकड के दबाता कभी उसके आँडूए पकड लेता और फ़िर उसकी मुठ मारता!
"चूसेगा?" उसने अचानक पूछा!
"ठीक है..." मैने कहा और उसके सामने घुटने के बल बैठ कर जब मैने अपने होंठ उसके लौडे पर लगाये और मुह खोल के उसके लौडे को चूसना शुरू किया तो वो घुटने मोड के मेरे मुह में अपना लँड धकेलने लगा और फ़िर कुछ देर बाद उससे ना रहा गया और उसके लँड का गर्म गर्म भयँकर नमकीन माल मेरे मुह में भरता चला गया! जिसको मैं प्रेम से पुचकार पुचकार के पी गया!

"अआह... राजा... अब थोडी ठँड पडी..."
"बस थोडी?"
"हाँ राजा, जिस दिन तेरी गाँड के अंदर माल डालूँगा ना... उस दिन पूरी चपास मिटेगी... स्वाद कैसा लगा?"
"उँहह... बढिया है..."
"चल अगली बार तक यही याद रहेगा... मगर यार, बात अपने तक रखना..."
"हाँ यार..."
"वरना साले इन लौंडों को तू जानता ही है..."
"हाँ यार जानता हूँ..."

हम जब वहाँ से ढाबे की तरफ़ आये तो निशिकांत वहाँ बैठा था!
"देख, वो बैठा है..." मैने उसको बैठा देख के दूर से धर्मेन्द्र को बताया!
"साला चिकना माल है... इसका भी चूस डाल..."
"नहीं यार, इज़्ज़त की बात होती है..."
"हाँ सही बात है, अब सबसे फ़्रैंक थोडी हो जाते हैं..." उसने मुझसे सहमती दिखायी!

वो फ़िर वहाँ से चला गया! मैने और निशी ने खाना खाया! इस बीच मैने फ़िर मौका निकाल के असद से बात कर ली!
"किसी दिन रूम पर आ ना यार..."
"हाँ, आऊँगा... देखते हो ना, दिन भर यहीं रहता हूँ..."
"हाँ मगर चाहे तो थोडा टाइम निकल ले यार..."
"ठीक है देखूँगा..."
"कब तक देखेगा यार?"
"क्या करूँ..." वो उस दिन के बाद फ़िर ऐसे बहाने कर रहा था जैसे हमारे बीच कुछ हुआ ही नहीं और मैं उस पर लाइन मार रहा था! उस दिन खाने के बाद मैने एक दस का नोट निकाल के विशम्भर को दे दिया तो वो खुश हो गया! ये तो चिडिया फ़ँसाने के लिये पहला दाना था! मुझे पता था विशम्भर की गाँड गुलाब जामुन की तरह मुलायम होगी! मैं बस दो दिन तक उसकी गाँड में नाक घुसा कर उसको सूंघना और उसको किस करके चूसना चाहता था!